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राजस्थान की लोकगाथाएँ व प्रेमाख्यान: ढोला-मारू, मूमल — RAS/CET

सुधीर ढाका (इतिहास, कला-संस्कृति, हिंदी व्याकरण, विज्ञान व प्रौद्योगिकी नोट्स लेखक)
प्रकाशित:
20 मिनट पठन

कैसे बना: यह नोट सुयोग अकादमी के लेखक ने परीक्षा सिलेबस के अनुसार लिखा/संपादित किया है। प्रकाशन तिथि ऊपर और अंतिम संशोधन तिथि लेख के अंत में दी गई है। त्रुटि दिखे तो संपर्क करें। टीम परिचय

स्रोत आधार: RPSC / RSMSSB कला-संस्कृति इकाई (लोक कला, मेले, किले)। सिलेबस विषय; कॉपीराइट सामग्री का पेस्ट नहीं।

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संक्षिप्त उत्तर: राजस्थान की लोकगाथाएँ मौखिक परंपरा में गाई जाने वाली लंबी कथात्मक रचनाएँ हैं, जिन्हें दो बड़े वर्गों में पढ़ा जाता है — प्रेमाख्यान और वीर/लोकदेवता गाथाएँ। सबसे प्रसिद्ध प्रेमगाथा ढोला-मारू है: नरवर (मध्य प्रदेश) के राजा नल का पुत्र ढोला (साल्हकुमार) और पूगल (बीकानेर) के राजा पिंगल की पुत्री मारवणी; बीच में ढोला की दूसरी पत्नी मालवणी और बाधक ऊमर-सूमरा। इसके दोहे 'ढोला मारू रा दूहा' कहलाते हैं, जबकि जैसलमेर के रावल हरराज के आश्रित जैन कवि कुशललाभ ने 'ढोला मारवणी चौपाई' रची। मूमल-महेंद्र में लोद्रवा (जैसलमेर, काक नदी) की मूमल और अमरकोट का महेंद्र है। बाघा-भारमली का संबंध रूठी रानी उमादे की दासी भारमली और कोटड़ा (बाड़मेर) के बाघा से है, जिनके दूहे आसा बारहठ ने कहे। जेठवा-ऊजळी में ऊजळी एक चारण कन्या है। वीर गाथाओं में पाबूजी की फड़ (नायक भोपे, रावणहत्था), देवनारायण/बगड़ावत (गुर्जर भोपे, जंतर), रामदेवजी के ब्यावले (कामड़, तंदूरा), तेजाजी और गोगाजी की गाथाएँ प्रमुख हैं। इन्हें भोपे, मांगणियार, लंगा, ढाढी, जोगी, भाट, कामड़ और चारण पीढ़ी-दर-पीढ़ी गाते आए हैं।


संक्षिप्त उत्तर

लोकगाथा

नायक / नायिका

मुख्य क्षेत्र

एक-पंक्ति पहचान

ढोला-मारू

ढोला (साल्हकुमार) – मारवणी; मालवणी

नरवर (म.प्र.) – पूगल (बीकानेर)

राजस्थान की सबसे प्रसिद्ध प्रेमगाथा; 'ढोला मारू रा दूहा'

मूमल-महेंद्र

मूमल – महेंद्र (राणा)

लोद्रवा (जैसलमेर) – अमरकोट (सिंध)

काक नदी, 'मूमल की मेड़ी'; दुखांत; मूमल गीत

बाघा-भारमली

बाघा (कोटड़िया) – भारमली

कोटड़ा (बाड़मेर), जैसलमेर, जोधपुर

रूठी रानी उमादे की दासी; आसा बारहठ

जेठवा-ऊजळी

जेठवा – ऊजळी (चारण कन्या)

सौराष्ट्र मूल; पश्चिमी राजस्थान में प्रचलित

विरह के दूहे; जाति-बंधन से अधूरा प्रेम

पाबूजी की गाथा

पाबूजी राठौड़

कोलू (फलोदी) / मारवाड़

फड़ वाचन; नायक भोपे; रावणहत्था

बगड़ावत / देवनारायण

24 बगड़ावत भाई, सवाई भोज, देवनारायण

भीलवाड़ा-अजमेर-टोंक क्षेत्र

सबसे लंबी फड़; गुर्जर भोपे; जंतर

रामदेवजी के ब्यावले

बाबा रामदेव

रामदेवरा (रूणीचा), जैसलमेर

कामड़ पंथ; तंदूरा; तेरहताली

तेजाजी के गीत

तेजाजी

खड़नाल (नागौर), सुरसुरा (अजमेर)

खेती के समय 'तेजा टेर'/तेजा गायन

गोगाजी की गाथा

गोगाजी (जाहरपीर)

ददरेवा (चूरू), गोगामेड़ी (हनुमानगढ़)

भोपों द्वारा डेरू के साथ गायन


2. लोकगाथा क्या है? — परिभाषा, विशेषताएँ और प्रकार

लोकगाथा (Folk Ballad) वह लंबी गेय कथा है जो किसी नायक, प्रेमी-युगल या लोकदेवता के जीवन को गीत, दूहा और वार्ता के मिश्रण में सुनाती है। राजस्थान में इन्हें 'गाथा', 'पवाड़ा', 'बात' या केवल नायक के नाम से (जैसे 'ढोला', 'मूमल', 'पाबूजी') पुकारा जाता है। ये रचनाएँ लिखित ग्रंथ बनने से बहुत पहले से गाँव-ढाणियों, मेलों और रात्रि-जागरणों में गाई जाती रहीं; बाद में चारण-जैन कवियों और आधुनिक संग्रहकर्ताओं ने इनके कई रूपों को लिपिबद्ध किया।

2.1 प्रमुख विशेषताएँ

  • मौखिक परंपरा: मूल रचयिता प्रायः अज्ञात; हर गायक-परिवार अपना पाठ जोड़ता-घटाता है, इसलिए एक ही गाथा के कई पाठ (versions) मिलते हैं।

  • गेयता: कथा गाकर सुनाई जाती है — साथ में वाद्य (रावणहत्था, जंतर, कमायचा, सारंगी, तंदूरा, डेरू)।

  • पेशेवर गायक समुदाय: भोपे, ढाढी, मांगणियार, लंगा, जोगी, भाट, कामड़ — इनकी आजीविका इन्हीं गाथाओं से जुड़ी रही।

  • दृश्य माध्यम: कुछ गाथाएँ चित्र-पट के सहारे गाई जाती हैं — फड़ (पाबूजी, देवनारायण) और कावड़ (चलता-फिरता काष्ठ-मंदिर)।

  • मरुस्थलीय परिवेश: ऊँट, कुरजाँ पक्षी, बादल-बरसात, रेत के धोरे, कुएँ-बावड़ी — विरह और यात्रा के प्रतीक।

  • नैतिक मूल्य: वचन-पालन, शरणागत-रक्षा, गौरक्षा, प्रेम में निष्ठा — विशेषकर वीर गाथाओं में।

2.2 प्रकार (वर्गीकरण)

प्रकार

केंद्रीय भाव

उदाहरण

प्रेमाख्यान / प्रेमगाथा

संयोग-वियोग, विरह, मिलन

ढोला-मारू, मूमल-महेंद्र, बाघा-भारमली, जेठवा-ऊजळी, सैणी-बीझानंद, जलाल-बूबना

वीर गाथा (पवाड़ा)

शौर्य, वचन, गौरक्षा, प्रतिशोध

पाबूजी रा पवाड़ा, बगड़ावत, डूंगजी-जवाहरजी के गीत

लोकदेवता / धार्मिक गाथा

चमत्कार, भक्ति, लोक-आस्था

रामदेवजी के ब्यावले, तेजाजी के गीत, गोगाजी की गाथा, देवनारायण

योगी / वैराग्य गाथा

त्याग, नाथ-परंपरा

भरथरी, गोपीचंद (जोगियों द्वारा)

याद रखें: प्रेमाख्यान = "दूहा + विरह"; वीर गाथा = "पवाड़ा + फड़ + भोपा"


3. ढोला-मारू — राजस्थान की सर्वाधिक लोकप्रिय प्रेमगाथा

3.1 पात्र

पात्र

परिचय

ढोला (साल्हकुमार)

नरवर (वर्तमान मध्य प्रदेश) के राजा नल का पुत्र; कथा का नायक

मारवणी (मारू)

पूगल (बीकानेर) के राजा पिंगल की पुत्री; मरुधरा की नायिका

मालवणी

मालवा की राजकुमारी; ढोला की दूसरी पत्नी — मिलन में बाधा डालती है

ढाढी

पेशेवर गायक, जिनके गीतों द्वारा मारवणी अपना संदेश ढोला तक पहुँचाती है

ऊमर-सूमरा

मार्ग का खलनायक, जो मारवणी को हथियाना चाहता है

करहा (ऊँट)

ढोला का तेज़ ऊँट — मरु-यात्रा का प्रतीक

3.2 कथा-सार

  1. लोक-कथा के प्रचलित पाठ के अनुसार पूगल में अकाल के समय राजा पिंगल पुष्कर गए, जहाँ नरवर के राजा नल भी आए थे; वहीं बचपन में ढोला और मारवणी का विवाह हो गया (पाठों में स्थान-संबंधी भेद मिलते हैं)।

  2. बड़ा होने पर ढोला को बाल-विवाह की याद नहीं रहती और उसका विवाह मालवणी से हो जाता है। मालवणी पूगल से आने वाले हर संदेशवाहक को रास्ते में ही रुकवा देती है।

  3. युवा मारवणी विरह में व्याकुल होकर ढाढियों को नरवर भेजती है। ढाढी गीतों (दूहों) में मारवणी का रूप और विरह सुनाते हैं — यहीं से "ढोला मारू रा दूहा" की विरह-धारा बनती है।

  4. ढोला मालवणी के रोकने के बावजूद ऊँट (करहा) पर पूगल पहुँचता है और मारवणी को लेकर लौटता है।

  5. लौटते समय लोक-प्रचलित पाठ में मारवणी को साँप डस लेता है और एक योगी-योगिनी (कुछ पाठों में शिव-पार्वती) उसे जीवित करते हैं; फिर ऊमर-सूमरा का षड्यंत्र विफल कर युगल नरवर पहुँचता है। कथा सुखांत है।

3.3 ग्रंथ और रचयिता — सावधानी से पढ़ें

  • "ढोला मारू रा दूहा": यह मूलतः लोक में प्रचलित दोहों का संग्रह है, जिसका मूल रचयिता निश्चित नहीं। कई परीक्षा-पुस्तकें इसका रचयिता/संकलनकर्ता कवि कल्लोल को बताती हैं (15वीं सदी के आसपास); कुछ विद्वान इसे सामूहिक लोक-रचना मानते हैं। परीक्षा में विकल्प के रूप में "कल्लोल" दिखे तो वही अपेक्षित उत्तर है।

  • "ढोला मारवणी चौपाई": जैसलमेर के रावल हरराज के आश्रित जैन कवि कुशललाभ ने दूहों के बीच चौपाइयाँ जोड़कर कथा को सुव्यवस्थित रूप दिया (16वीं सदी)। कुशललाभ की अन्य रचनाएँ — "माधवानल कामकंदला चौपाई" और "पिंगल शिरोमणि"।

  • आधुनिक संपादन: रामसिंह, सूर्यकरण पारीक और नरोत्तमदास स्वामी द्वारा संपादित "ढोला मारू रा दूहा" (काशी नागरी प्रचारिणी सभा) — इस ग्रंथ का सबसे प्रसिद्ध संस्करण।

ट्रिक: "दूहा = कल्लोल (लोक), चौपाई = कुशललाभ (जैन कवि, हरराज)"

3.4 साहित्यिक और सांस्कृतिक महत्व

  • राजस्थानी (डिंगल-पिंगल से भिन्न, लोकभाषा) का श्रेष्ठ विरह-काव्य; मरुभूमि की प्रकृति — बादल, बिजली, कुरजाँ, ऊँट — का सजीव चित्रण।

  • मारवणी का नख-शिख वर्णन और बारहमासा/ऋतु-वर्णन इस काव्य की पहचान है।

  • "ढोला" शब्द लोकगीतों में प्रियतम/पति का पर्याय बन गया; "मारू" राजस्थान की नायिका का प्रतीक।

  • ऊँट पर सवार ढोला-मारू का युगल राजस्थानी लघुचित्रों, भित्तिचित्रों और हस्तशिल्प में अत्यंत लोकप्रिय विषय है।

  • मांड गायकी का प्रसिद्ध गीत "केसरिया बालम पधारो म्हारे देस" लोक-मान्यता में ढोला-मारू की विरह-परंपरा से जोड़ा जाता है; मांड पर विस्तार के लिए लोक गायन शैलियाँ: मांड व पवाड़ा देखें।


4. मूमल-महेंद्र — जैसलमेर की दुखांत प्रेमगाथा

मूमल लोद्रवा (जैसलमेर) की अपूर्व सुंदरी थी, जो काक नदी के तट पर बनी अपनी "मूमल की मेड़ी" (महल) में रहती थी। महेंद्र अमरकोट (उमरकोट, अब पाकिस्तान के सिंध प्रांत में) का सोढ़ा राजकुमार था। सिंधी परंपरा में यही कथा "मूमल-राणो" नाम से प्रसिद्ध है (राणो = राणा महेंद्र)।

4.1 कथा-सार

  1. मूमल ने अपनी मेड़ी तक पहुँचने के लिए कठिन परीक्षाएँ रखी थीं; महेंद्र बुद्धि और साहस से सफल होकर मूमल का प्रेम पाता है।

  2. महेंद्र रात में तेज़ ऊँट पर अमरकोट से लोद्रवा आता और भोर से पहले लौट जाता।

  3. एक रात देर होने पर मूमल की बहन सूमल पुरुष-वेश में मूमल के पास सो जाती है। महेंद्र दूर से यह देखकर भ्रमित होता है और बिना कुछ कहे लौट जाता है।

  4. सच सामने आने तक बहुत देर हो चुकी होती है — विरह में मूमल प्राण त्याग देती है और महेंद्र भी शोक में मृत्यु को प्राप्त होता है। कथा दुखांत है।

4.2 मूमल गीत

  • "मूमल" जैसलमेर-बाड़मेर क्षेत्र का प्रसिद्ध शृंगारिक लोकगीत है, जिसमें मूमल के रूप-सौंदर्य का नख-शिख वर्णन होता है।

  • इसे प्रमुखतः मांगणियार और लंगा गायक गाते हैं; जैसलमेर के मरु महोत्सव जैसे आयोजनों में यह गीत लगभग अनिवार्य प्रस्तुति है।

  • लोद्रवा जैसलमेर की पुरानी राजधानी भी रहा है और जैन मंदिर के लिए भी प्रसिद्ध है — परीक्षा में "लोद्रवा" दोनों संदर्भों में पूछा जा सकता है।

ट्रिक: "मूमल–मेड़ी–मरु (लोद्रवा)"; "महेंद्र–अमरकोट"; बीच में "सूमल" की भूल


5. बाघा-भारमली और रूठी रानी — इतिहास से जुड़ी प्रेमगाथा

यह गाथा इसलिए विशेष है कि इसके पात्र ऐतिहासिक हैं। जैसलमेर के रावल लूणकरण की पुत्री उमादे का विवाह मारवाड़ के राव मालदेव से हुआ। उमादे के साथ दहेज में आई दासी भारमली पर मालदेव आसक्त हो गए; इससे नाराज़ उमादे जीवन भर पति से रूठी रहीं और इतिहास में "रूठी रानी" कहलाईं।

5.1 बाघा कोटड़िया

  • भारमली को मालदेव से दूर करने के प्रयास में उसे कोटड़ा (बाड़मेर क्षेत्र) के जागीरदार बाघा (बाघजी राठौड़, "बाघा कोटड़िया") के पास पहुँचा दिया गया।

  • वहाँ बाघा और भारमली में गहरा प्रेम हुआ; मालदेव के बुलाने पर भी भारमली नहीं लौटी।

  • बाघा के आश्रित कवि आसा बारहठ ने बाघा की मृत्यु पर विरह/शोक के दूहे (मरसिया) कहे — ये "बाघा-भारमली रा दूहा" के नाम से प्रसिद्ध हैं। आसा बारहठ ने रूठी रानी उमादे पर भी काव्य रचा।

पात्र

संबंध

उमादे (रूठी रानी)

जैसलमेर के रावल लूणकरण की पुत्री; राव मालदेव की रानी

भारमली

उमादे की दासी (रानी नहीं)

राव मालदेव

मारवाड़ (जोधपुर) के शासक; भारमली पर आसक्त

बाघा कोटड़िया

कोटड़ा (बाड़मेर) का जागीरदार; भारमली का प्रेमी

आसा बारहठ

चारण कवि; बाघा के दूहे/मरसिये

ट्रिक: "उमादे रूठी, भारमली छूटी, बाघा से जुड़ी, आसा ने कही"


6. जेठवा-ऊजळी और अन्य प्रेमाख्यान

6.1 जेठवा-ऊजळी

ऊजळी एक चारण कन्या थी और जेठवा (मेहा जेठवा) सौराष्ट्र (गुजरात) के जेठवा राजवंश का राजकुमार। ऊजळी ने जेठवा से विवाह की इच्छा की, पर जाति-बंधन और सामाजिक मर्यादा के कारण जेठवा विवाह न कर सका। जेठवा की मृत्यु के बाद ऊजळी के विरह के दूहे/सोरठे राजस्थानी-गुजराती लोक-साहित्य में अमर हो गए। कथा का मूल सौराष्ट्र में है, पर इसके दूहे पश्चिमी राजस्थान में भी खूब गाए जाते हैं — इसलिए राजस्थान की प्रेमगाथाओं की सूची में यह नाम आता है।

6.2 नाम-स्तर पर याद रखने योग्य प्रेमाख्यान

निम्न गाथाओं के पाठ अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न मिलते हैं; परीक्षा में प्रायः केवल युगल-जोड़ी की पहचान पूछी जाती है ("इनमें से कौन राजस्थान की प्रेमगाथा है?")। इसलिए जोड़ी सही याद रखें, विस्तृत कथानक के अलग-अलग दावों पर निर्भर न रहें।

प्रेमगाथा (जोड़ी)

परीक्षा-उपयोगी संकेत

सैणी-बीझानंद

चारण परंपरा से जुड़ी दुखांत प्रेमगाथा

नागजी-नागवंती

पश्चिमी लोक-परंपरा की विरह-प्रधान गाथा

जलाल-बूबना

मरु क्षेत्र में गाई जाने वाली प्रेमगाथा

निहालदे-सुल्तान

लोकगाथा; गायन-परंपरा में प्रचलित

जेठवा-ऊजळी

चारण कन्या ऊजळी; विरह के सोरठे

ध्यान दें: हीर-रांझा, सोहनी-महिवाल, सस्सी-पुन्नू मूलतः पंजाब/सिंध की प्रेमगाथाएँ हैं — "राजस्थान की प्रेमगाथा" वाले प्रश्न में ये प्रायः गलत विकल्प (distractor) होती हैं।


7. साहित्यिक प्रेमाख्यान — लिखित ग्रंथों में प्रेमकथा

लोकगाथाओं के समानांतर राजस्थान में कई लिखित प्रेमाख्यान रचे गए। इनके रचयिता ज्ञात हैं, इसलिए परीक्षा में "ग्रंथ–रचयिता" मिलान इन्हीं से बनता है। ग्रंथों की विस्तृत सूची के लिए राजस्थान के प्रमुख ग्रंथ व लेखक देखें।

ग्रंथ

रचयिता

प्रेम-प्रसंग / विषय

टिप्पणी

बीसलदेव रासो

नरपति नाल्ह

अजमेर के विग्रहराज चतुर्थ (बीसलदेव) और रानी राजमती

राजमती को मालवा के भोज परमार की पुत्री बताया गया; बीसलदेव के उड़ीसा जाने से विरह; रचनाकाल विवादित

ढोला मारवणी चौपाई

कुशललाभ

ढोला-मारवणी

जैसलमेर के रावल हरराज का आश्रय

माधवानल कामकंदला चौपाई

कुशललाभ

ब्राह्मण माधवानल और नर्तकी कामकंदला

संस्कृत-लोक परंपरा की कथा का राजस्थानी रूप

कान्हड़दे प्रबंध

पद्मनाभ (1455 ई.)

जालौर के वीरमदे और अलाउद्दीन की पुत्री फिरोजा

मुख्यतः जालौर के कान्हड़दे की वीरगाथा; अखैराज सोनगरा का आश्रय

वेलि क्रिसन रुकमणी री

पृथ्वीराज राठौड़ (पीथल)

श्रीकृष्ण-रुक्मिणी विवाह

दुरसा आढ़ा ने "पाँचवाँ वेद व 19वाँ पुराण" कहा; डिंगल

गोरा-बादल पदमिणी चउपई

हेमरतन सूरि

पद्मिनी प्रसंग, गोरा-बादल का शौर्य

जायसी के "पद्मावत" (अवधी) से अलग राजस्थानी रचना

पद्मिनी-प्रसंग के ऐतिहासिक संदर्भ के लिए राजस्थान के प्रमुख साके व जौहर पढ़ें।

ट्रिक: "नाल्ह–बीसल–राजमती | पद्मनाभ–फिरोजा–वीरमदे | पीथल–वेलि | कुशल–ढोला+माधवानल"


8. वीर व लोकदेवता गाथाएँ — फड़, पवाड़े और ब्यावले

इन गाथाओं का विस्तृत जीवन-परिचय अलग नोट्स में है; यहाँ केवल गाथा-गायन का पक्ष — कौन गाता है, किस वाद्य के साथ, किस माध्यम से — दिया गया है। फड़-भोपा परंपरा का मूल नोट: लोकदेवता, लोकगाथा, फड़ व भोपा परंपरा।

8.1 पाबूजी की गाथा व फड़

  • पाबूजी राठौड़ (कोलू, फलोदी) ने देवल चारणी की गायें छुड़ाने के लिए जायल के जींदराव खींची से युद्ध में प्राण दिए — विवाह के फेरों के बीच उठकर जाने का प्रसंग गाथा का केंद्र है।

  • फड़ का वाचन नायक (थोरी) जाति के भोपे करते हैं; भोपा रावणहत्था बजाता है और भोपी दीपक से फड़ के चित्र दिखाती है। गायन रात भर चलता है।

  • पाबूजी पर "पाबू प्रकाश" की रचना आशिया मोडजी ने की। उनकी वीरगाथाएँ "पाबूजी रा पवाड़ा" कहलाती हैं।

  • विस्तार: पाबूजी लोकदेवता नोट्स।

8.2 बगड़ावत और देवनारायण की फड़

  • बगड़ावत — 24 भाइयों (बगड़ावतों) की वीरगाथा, जिनमें सवाई भोज प्रमुख हैं; सवाई भोज के पुत्र देवनारायण ने बगड़ावतों की मृत्यु का प्रतिशोध लिया। यह राजस्थान की सबसे लंबी लोकगाथाओं में गिनी जाती है।

  • वाचन गुर्जर भोपे करते हैं, वाद्य जंतर। देवनारायण की फड़ को परीक्षा-पुस्तकें सबसे लंबी फड़ बताती हैं, जबकि सबसे लोकप्रिय फड़ पाबूजी की मानी जाती है।

  • फड़ चित्रण की प्रसिद्ध परंपरा शाहपुरा (भीलवाड़ा) के जोशी परिवार से जुड़ी है — देखें फड़ चित्रकला और देवनारायण जी व गुर्जर फड़ परंपरा।

8.3 रामदेवजी के ब्यावले व जम्मा

  • रामदेवजी (रूणीचा/रामदेवरा, जैसलमेर) के भजन-गीत "ब्यावले" कहलाते हैं, जिन्हें कामड़ पंथ के लोग तंदूरा के साथ गाते हैं; कामड़ महिलाएँ तेरहताली नृत्य करती हैं।

  • रात्रि-जागरण को "जम्मा" कहते हैं। रामदेवजी की रचना "चौबीस बाणियाँ" मानी जाती है।

  • विस्तार: बाबा रामदेवजी।

8.4 तेजाजी के गीत

  • तेजाजी (जन्म खड़नाल, नागौर; देहांत सुरसुरा, अजमेर) ने लाछा गूजरी की गायें छुड़ाईं और वचन निभाने के लिए नाग से जीभ पर डसवाया।

  • किसान वर्षा-ऋतु में खेत जोतते-बोते समय तेजाजी के गीत गाते हैं — इन्हें "तेजा टेर"/तेजा गायन कहा जाता है; भाद्रपद शुक्ल दशमी (तेजा दशमी) को परबतसर में बड़ा मेला।

  • विस्तार: तेजाजी महाराज।

8.5 गोगाजी की गाथा

  • गोगाजी (जन्म ददरेवा, चूरू; समाधि गोगामेड़ी, हनुमानगढ़) हिंदू-मुस्लिम दोनों में जाहरपीर के रूप में पूजे जाते हैं।

  • उनकी गाथा प्रायः उनके भोपे डेरू (डमरू जैसा वाद्य) के साथ गाते हैं; गाथा में मौसेरे भाइयों अर्जन-सुर्जन से युद्ध और गुरु गोरखनाथ का आशीर्वाद प्रमुख प्रसंग हैं।

  • विस्तार: गोगाजी — जाहरपीर।

8.6 अन्य वीर व योगी गाथाएँ

  • डूंगजी-जवाहरजी: शेखावाटी के लोकनायक, जिन्होंने अंग्रेज़ी छावनी नसीराबाद पर धावा बोला; उनके पवाड़े शेखावाटी में गाए जाते हैं।

  • भरथरी व गोपीचंद: नाथपंथी जोगी सारंगी के साथ राजा भरथरी (भर्तृहरि) और गोपीचंद के वैराग्य की गाथाएँ गाते हैं।

  • अमरसिंह राठौड़: नागौर के अमरसिंह राठौड़ की कथा भाट समुदाय के कठपुतली खेल का सबसे लोकप्रिय कथानक है — देखें कठपुतली कला व भाट।

  • कावड़ कथा: बस्सी (चित्तौड़गढ़) में बनी कावड़ के पटों को खोलते हुए कावड़िया भाट रामायण-महाभारत व लोकदेवताओं की कथा सुनाते हैं — देखें कावड़ कला।


9. लोकगाथाओं के गायक समुदाय

समुदाय

मुख्य क्षेत्र

प्रमुख वाद्य

गाथा / योगदान

भोपे (नायक/थोरी)

मारवाड़

रावणहत्था

पाबूजी की फड़

भोपे (गुर्जर)

भीलवाड़ा-अजमेर-टोंक

जंतर

देवनारायण की फड़, बगड़ावत

कामड़

मारवाड़-पाली-जैसलमेर

तंदूरा, मंजीरे

रामदेवजी के ब्यावले; तेरहताली

मांगणियार

जैसलमेर-बाड़मेर

कमायचा, खड़ताल

मूमल, ढोला-मारू, लोकगीत; राजपूत यजमान

लंगा

बाड़मेर-जोधपुर

सारंगी (सिंधी/गुजरातण)

प्रेमगीत व गाथाएँ; सिंधी मुस्लिम यजमान

ढाढी

मारवाड़

—

यशगान; ढोला-मारू कथा में संदेशवाहक

जोगी (नाथपंथी)

विभिन्न क्षेत्र

सारंगी

भरथरी, गोपीचंद

भाट

मारवाड़, जयपुर

ढोलक, कठपुतली

वंशावली; कठपुतली खेल (अमरसिंह राठौड़)

कावड़िया भाट

मेवाड़

कावड़ (काष्ठ-पट)

कावड़ कथा

चारण

पूरे राजस्थान

—

डिंगल गीत, दूहे, मरसिये (जैसे आसा बारहठ)

मांगणियार और लंगा के प्रसिद्ध कलाकारों के लिए राजस्थान के लोक गायक-गायिकाएँ और वाद्यों के लिए राजस्थान के लोक वाद्य यंत्र देखें।

ट्रिक: "पाबू–रावणहत्था, देव–जंतर, रामदेव–तंदूरा, गोगा–डेरू, मांगणियार–कमायचा, लंगा–सारंगी"


10. गाथा-गायन की विधाएँ (Forms)

विधा

अर्थ / स्वरूप

उदाहरण

दूहा (दोहा)

दो पंक्तियों का छंद; विरह और नीति का प्रमुख वाहक

ढोला मारू रा दूहा, बाघा-भारमली रा दूहा

सोरठा

दोहे का उलटा छंद; सौराष्ट्र-मारवाड़ में लोकप्रिय

जेठवा-ऊजळी के सोरठे

पवाड़ा

वीरों की शौर्य-गाथा

पाबूजी रा पवाड़ा, डूंगजी-जवाहरजी के पवाड़े

बात (वात)

गद्य-पद्य मिश्रित कथा-शैली

राजस्थानी बात साहित्य; विजयदान देथा का संग्रह

वचनिका

तुकांत गद्य-पद्य मिश्रित चारण शैली

अचलदास खींची री वचनिका (शिवदास गाडण)

मरसिया

किसी वीर/आश्रयदाता की मृत्यु पर शोक-काव्य

आसा बारहठ के बाघा पर दूहे

ब्यावला

लोकदेवता के विवाह/भक्ति प्रसंग के गीत

रामदेवजी के ब्यावले

मांड

राजस्थान की शास्त्रीय-निकट लोक गायन शैली

केसरिया बालम

लोकगीतों के विरह-प्रतीक — कुरजाँ (संदेशवाहक पक्षी), पणिहारी, ओल्यूँ (याद) — इन्हीं प्रेमगाथाओं की भावभूमि से निकले हैं। विस्तार: राजस्थान का लोक संगीत व प्रमुख लोकगीत।


11. मास्टर तालिका: गाथा – नायक/नायिका – क्षेत्र – ग्रंथ/रचयिता – विशेषता

गाथा

नायक / नायिका

क्षेत्र

ग्रंथ / रचयिता / वाचक

विशेषता

ढोला-मारू

ढोला – मारवणी (मालवणी)

नरवर – पूगल

ढोला मारू रा दूहा (कल्लोल, मत-भेद); ढोला मारवणी चौपाई (कुशललाभ)

सुखांत; ढाढी; ऊँट; ऊमर-सूमरा

मूमल-महेंद्र

मूमल – महेंद्र

लोद्रवा – अमरकोट

लोक-परंपरा; मांगणियार-लंगा

दुखांत; काक नदी; सूमल; मूमल की मेड़ी

बाघा-भारमली

बाघा – भारमली

कोटड़ा (बाड़मेर)

आसा बारहठ के दूहे

रूठी रानी उमादे, राव मालदेव

जेठवा-ऊजळी

जेठवा – ऊजळी

सौराष्ट्र मूल

ऊजळी के सोरठे (लोक)

चारण कन्या; अधूरा प्रेम

बीसलदेव-राजमती

विग्रहराज चतुर्थ – राजमती

अजमेर

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह)

विरह; उड़ीसा प्रवास

वीरमदे-फिरोजा

वीरमदे – फिरोजा

जालौर

कान्हड़दे प्रबंध (पद्मनाभ)

अलाउद्दीन की पुत्री

माधवानल-कामकंदला

माधवानल – कामकंदला

—

कुशललाभ

संगीत-प्रधान प्रेमकथा

पाबूजी

पाबूजी

कोलू (फलोदी)

पाबू प्रकाश (आशिया मोडजी); नायक भोपे

फड़ + रावणहत्था

बगड़ावत/देवनारायण

सवाई भोज, देवनारायण

भीलवाड़ा क्षेत्र

गुर्जर भोपे

सबसे लंबी फड़; जंतर

रामदेवजी

बाबा रामदेव

रूणीचा

कामड़

ब्यावले; तंदूरा; जम्मा

तेजाजी

तेजाजी – पेमल

खड़नाल – सुरसुरा

किसान

तेजा टेर; खेती के समय

गोगाजी

गोगाजी

ददरेवा – गोगामेड़ी

भोपे

डेरू; जाहरपीर


12. परीक्षा में पूछे जाने वाले तथ्य (One-liners)

  1. ढोला नरवर (मध्य प्रदेश) के राजा नल का पुत्र था; उसका मूल नाम साल्हकुमार बताया जाता है।

  2. मारवणी पूगल (बीकानेर) के राजा पिंगल की पुत्री थी।

  3. ढोला की दूसरी पत्नी मालवणी मालवा की राजकुमारी थी।

  4. मारवणी ने ढाढियों के माध्यम से ढोला को संदेश भेजा।

  5. ढोला-मारू कथा का खलनायक ऊमर-सूमरा है।

  6. "ढोला मारवणी चौपाई" — कुशललाभ, जैसलमेर के रावल हरराज के आश्रित।

  7. मूमल लोद्रवा (जैसलमेर) की थी; उसकी मेड़ी काक नदी के किनारे बताई जाती है।

  8. महेंद्र अमरकोट (वर्तमान पाकिस्तान) का सोढ़ा राजकुमार था।

  9. मूमल-महेंद्र की कथा दुखांत है; भ्रम का कारण मूमल की बहन सूमल का पुरुष-वेश।

  10. भारमली रूठी रानी उमादे की दासी थी; उमादे जैसलमेर के रावल लूणकरण की पुत्री और राव मालदेव की रानी थीं।

  11. बाघा कोटड़िया कोटड़ा (बाड़मेर) का जागीरदार; उसके दूहे आसा बारहठ ने कहे।

  12. ऊजळी चारण कन्या थी, जिसका प्रेम जेठवा से था।

  13. बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह) — बीसलदेव और राजमती का विरह-काव्य।

  14. कान्हड़दे प्रबंध (पद्मनाभ) में वीरमदे-फिरोजा का प्रसंग है।

  15. वेलि क्रिसन रुकमणी री — पृथ्वीराज राठौड़; दुरसा आढ़ा ने इसे "पाँचवाँ वेद व 19वाँ पुराण" कहा।

  16. पाबूजी की फड़ — नायक भोपे — रावणहत्था; देवनारायण की फड़ — गुर्जर भोपे — जंतर।

  17. देवनारायण की फड़ सबसे लंबी, पाबूजी की फड़ सबसे लोकप्रिय मानी जाती है।

  18. "पाबू प्रकाश" — आशिया मोडजी।

  19. रामदेवजी के भजन ब्यावले; कामड़ — तंदूरा; रात्रि-जागरण — जम्मा।

  20. किसानों द्वारा खेती के समय गाया जाने वाला तेजाजी का गीत — तेजा टेर।

  21. गोगाजी के भोपे गाथा-गायन में डेरू बजाते हैं।

  22. मांगणियार का प्रमुख वाद्य कमायचा; लंगा का सारंगी।

  23. नाथपंथी जोगी भरथरी-गोपीचंद की गाथाएँ गाते हैं।

  24. भाटों के कठपुतली खेल का प्रमुख कथानक — अमरसिंह राठौड़।


13. भ्रम व सावधानियाँ (Exam Trap Section)

भ्रम

सही तथ्य

ढोला राजस्थान (पूगल) का था

ढोला नरवर (म.प्र.) का; पूगल (बीकानेर) मारवणी का

मालवणी और मारवणी एक ही हैं

मारवणी पूगल की (पहली, बाल-विवाह); मालवणी मालवा की (दूसरी पत्नी)

"ढोला मारू रा दूहा" कुशललाभ की रचना

कुशललाभ की रचना "ढोला मारवणी चौपाई"; दूहे लोक-परंपरा के (परीक्षा-पुस्तकों में कल्लोल)

मूमल अमरकोट की थी

मूमल लोद्रवा (जैसलमेर) की; महेंद्र अमरकोट का

मूमल-महेंद्र सुखांत कथा

दुखांत; ढोला-मारू सुखांत

भारमली मालदेव की रानी थी

भारमली दासी थी; रानी उमादे (रूठी रानी)

आसा बारहठ ने ढोला-मारू लिखा

आसा बारहठ — बाघा-भारमली व उमादे से जुड़ा काव्य

पाबूजी की फड़ में जंतर

पाबूजी — रावणहत्था; जंतर — देवनारायण

सबसे लंबी फड़ पाबूजी की

सबसे लंबी — देवनारायण; सबसे लोकप्रिय — पाबूजी

हीर-रांझा राजस्थान की प्रेमगाथा

हीर-रांझा पंजाब की; राजस्थान — ढोला-मारू, मूमल-महेंद्र

"पद्मावत" राजस्थानी ग्रंथ

"पद्मावत" — जायसी (अवधी); राजस्थानी — "गोरा-बादल पदमिणी चउपई" (हेमरतन सूरि)

मांगणियार सारंगी, लंगा कमायचा

उलटा — मांगणियार कमायचा, लंगा सारंगी


14. इसे आसानी से याद कैसे रखें?

ढोला-मारू: "न-प (नरवर-पूगल) — नल का बेटा, पिंगल की बेटी; बीच में मालवणी, रास्ते में सूमरा"

मूमल: "लो-का-मे (लोद्रवा, काक, मेड़ी) — अमरकोट से महेंद्र, सूमल से भूल"

बाघा-भारमली: "उमादे की दासी, बाघा की प्यासी, आसा की भाषा"

वाद्य: "पारा–देज–रात–गोडे" = पाबू-रावणहत्था, देव-जंतर, रामदेव-तंदूरा, गोगा-डेरू

ग्रंथ: "कुशल की दो चौपाई — ढोला और माधवानल"


15. संबंधित नोट्स

लोककथाओं के आधुनिक संग्रह में विजयदान देथा की "बातां री फुलवाड़ी" सबसे प्रसिद्ध है, जिसमें राजस्थान की सैकड़ों लोककथाएँ पुनर्सृजित हैं।


16. एक दिन पहले — रिवीज़न सूची

  1. ढोला–नरवर–नल; मारवणी–पूगल–पिंगल; मालवणी–मालवा; ढाढी; ऊमर-सूमरा; ऊँट करहा; सुखांत।

  2. दूहा–कल्लोल (मत-भेद); चौपाई–कुशललाभ–रावल हरराज; संपादन–रामसिंह, सूर्यकरण पारीक, नरोत्तमदास स्वामी।

  3. मूमल–लोद्रवा–काक नदी–मेड़ी; महेंद्र–अमरकोट; सूमल; दुखांत; मूमल गीत–नख-शिख।

  4. उमादे (रूठी रानी)–लूणकरण की पुत्री–मालदेव; भारमली दासी; बाघा–कोटड़ा; आसा बारहठ।

  5. ऊजळी–चारण कन्या–जेठवा; सैणी-बीझानंद, नागजी-नागवंती, जलाल-बूबना, निहालदे-सुल्तान।

  6. बीसलदेव रासो–नाल्ह; कान्हड़दे प्रबंध–पद्मनाभ; वेलि–पीथल; गोरा-बादल–हेमरतन।

  7. पाबू–नायक भोपे–रावणहत्था–पाबू प्रकाश; देवनारायण–गुर्जर भोपे–जंतर–सबसे लंबी फड़।

  8. रामदेव–कामड़–तंदूरा–ब्यावले–जम्मा; तेजा टेर; गोगा–डेरू; जोगी–भरथरी; भाट–कठपुतली।


17. अभ्यास

नोट पढ़ने के बाद इस पेज के अंत में दिए 25 प्रश्नों का क्विज़ हल करें। जिन प्रश्नों में गलती हो, उनके लिए खंड 11 (मास्टर तालिका), खंड 9 (गायक समुदाय व वाद्य) और खंड 13 (भ्रम व सावधानियाँ) दोबारा पढ़ें। ग्रंथ-रचयिता वाले प्रश्नों में "दूहा" और "चौपाई" का अंतर विशेष ध्यान से देखें।


18. निष्कर्ष: परीक्षा के लिए क्या याद रखें?

राजस्थान की लोकगाथाएँ मरुभूमि के जीवन का दर्पण हैं — ढोला-मारू का विरह और मिलन, मूमल-महेंद्र की दुखद भूल, बाघा-भारमली का इतिहास से जुड़ा प्रेम, और पाबूजी, देवनारायण, रामदेव, तेजाजी, गोगाजी की वीरता-भक्ति। इन्हें जीवित रखने का श्रेय भोपे, मांगणियार, लंगा, ढाढी, जोगी, भाट और चारण समुदायों को है। परीक्षा के लिए तीन बातें सबसे ज़रूरी हैं — नायक-नायिका का स्थान, ग्रंथ-रचयिता मिलान और गाथा-वाचक व उसका वाद्य।

ढोला–नरवर | मारवणी–पूगल | मूमल–लोद्रवा | महेंद्र–अमरकोट | भारमली–उमादे की दासी | बाघा–कोटड़ा | चौपाई–कुशललाभ | पाबू–रावणहत्था | देव–जंतर | रामदेव–तंदूरा


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महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

ढोला (साल्हकुमार) नरवर (वर्तमान मध्य प्रदेश) के राजा नल का पुत्र था, जबकि मारवणी पूगल (बीकानेर) के राजा पिंगल की पुत्री थी। ढोला की दूसरी पत्नी मालवणी मालवा की राजकुमारी थी।

'ढोला मारू रा दूहा' लोक में प्रचलित दोहों का संग्रह है; कई परीक्षा-पुस्तकें इसका रचयिता कवि कल्लोल बताती हैं, जबकि कुछ विद्वान इसे सामूहिक लोक-रचना मानते हैं। 'ढोला मारवणी चौपाई' जैसलमेर के रावल हरराज के आश्रित जैन कवि कुशललाभ की रचना है, जिसमें दूहों के बीच चौपाइयाँ जोड़ी गईं।

मूमल लोद्रवा (जैसलमेर) की सुंदरी थी, जिसकी मेड़ी काक नदी के तट पर बताई जाती है। महेंद्र अमरकोट (वर्तमान पाकिस्तान के सिंध प्रांत में) का सोढ़ा राजकुमार था। यह कथा दुखांत है।

भारमली जैसलमेर के रावल लूणकरण की पुत्री उमादे की दासी थी। उमादे का विवाह राव मालदेव से हुआ और मालदेव भारमली पर आसक्त हुए, जिससे उमादे 'रूठी रानी' कहलाईं। बाद में भारमली कोटड़ा (बाड़मेर) के बाघा कोटड़िया के पास पहुँची और दोनों में प्रेम हुआ।

बाघा के आश्रित चारण कवि आसा बारहठ ने बाघा की मृत्यु पर विरह व शोक के दूहे (मरसिया) कहे, जो बाघा-भारमली रा दूहा के नाम से प्रसिद्ध हैं।

ऊजळी एक चारण कन्या थी, जिसका प्रेम सौराष्ट्र के जेठवा राजकुमार (मेहा जेठवा) से था। जाति-बंधन के कारण विवाह नहीं हो सका और ऊजळी के विरह के सोरठे लोक-साहित्य में प्रसिद्ध हुए।

पाबूजी की फड़ का वाचन नायक (थोरी) जाति के भोपे रावणहत्था के साथ करते हैं, जबकि देवनारायण की फड़ का वाचन गुर्जर भोपे जंतर वाद्य के साथ करते हैं। देवनारायण की फड़ सबसे लंबी और पाबूजी की फड़ सबसे लोकप्रिय मानी जाती है।

रामदेवजी के भजन-गीत 'ब्यावले' कहलाते हैं, जिन्हें कामड़ पंथ के लोग तंदूरा के साथ गाते हैं। कामड़ महिलाएँ तेरहताली नृत्य करती हैं और रामदेवजी के रात्रि-जागरण को 'जम्मा' कहते हैं।

नरपति नाल्ह रचित बीसलदेव रासो अजमेर के विग्रहराज चतुर्थ (बीसलदेव) और रानी राजमती के विरह पर आधारित है। बीसलदेव के उड़ीसा चले जाने से राजमती का विरह इसका मुख्य विषय है; इसका रचनाकाल विवादित है।

जैसलमेर-बाड़मेर के मांगणियार गायकों का प्रमुख वाद्य कमायचा है और उनके यजमान राजपूत होते हैं। बाड़मेर-जोधपुर के लंगा गायकों का प्रमुख वाद्य सारंगी है और उनके यजमान सिंधी मुस्लिम होते हैं। मूमल और ढोला-मारू जैसे गीत ये दोनों समुदाय गाते हैं।

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