राजस्थान के प्रमुख साके व जौहर — चित्तौड़ 3, जैसलमेर ढाई, गागरोण 2 — RAS/CET
कैसे बना: यह नोट सुयोग अकादमी के लेखक ने परीक्षा सिलेबस के अनुसार लिखा/संपादित किया है। प्रकाशन तिथि ऊपर और अंतिम संशोधन तिथि लेख के अंत में दी गई है। त्रुटि दिखे तो संपर्क करें। टीम परिचय
स्रोत आधार: RPSC RAS / RSMSSB CET पाठ्यक्रम — राजस्थान इतिहास इकाई। पाठ्यपुस्तक पृष्ठ यहाँ नहीं चिपकाए गए।
सुयोग AI गुरु
नोट्स के मुख्य बिंदु, मॉक MCQ या डाउट पूछें
संक्षिप्त उत्तर: राजस्थान के इतिहास में साका वह चरम बलिदान है जिसमें दो घटनाएँ साथ होती हैं — स्त्रियों का जौहर (शत्रु के हाथ पड़ने से बचने हेतु सामूहिक अग्नि-प्रवेश) और पुरुषों का केसरिया (केसरिया बाना पहनकर, दुर्ग के द्वार खोलकर अंतिम युद्ध में प्राणोत्सर्ग)। केवल एक घटना हो तो उसे अर्द्ध साका कहते हैं। परीक्षा-पुस्तकों के अनुसार राजस्थान का प्रथम साका रणथंभौर (1301) है — हम्मीर देव चौहान बनाम अलाउद्दीन खिलजी, जौहर रानी रंगदेवी के नेतृत्व में। चित्तौड़ के तीन साके — 1303 (रावल रतनसिंह, रानी पद्मिनी / अलाउद्दीन), 1534–35 (विक्रमादित्य काल, रानी कर्णावती / गुजरात का बहादुरशाह) और 1567–68 (जयमल-पत्ता / अकबर)। सिवाणा (1308) — सातलदेव (शीतलदेव); जालौर (1311 के आसपास) — कान्हड़देव सोनगरा; दोनों अलाउद्दीन के विरुद्ध। जैसलमेर के ढाई साके — मूलराज-रतनसी (अलाउद्दीन काल), दूदा-त्रिलोकसी (फिरोज तुगलक काल) और 1550 का अर्द्ध साका (रावल लूणकरण, जौहर नहीं हुआ)। गागरोण के दो साके — 1423 (अचलदास खींची / मालवा का होशंगशाह) और 1444 (पाल्हणसी / महमूद खिलजी)। प्रमुख साहित्यिक स्रोत — हम्मीर महाकाव्य (नयनचंद्र सूरि), पद्मावत (जायसी, 1540), कान्हड़दे प्रबंध (पद्मनाभ) और अचलदास खींची री वचनिका (शिवदास गाडण)।
संक्षिप्त उत्तर
बिंदु | तथ्य | याद रखने योग्य संकेत |
|---|---|---|
साका की परिभाषा | जौहर (स्त्रियाँ) + केसरिया (पुरुष) | दोनों हों तो पूर्ण साका |
अर्द्ध साका | जौहर या केसरिया में से केवल एक | जैसलमेर 1550 (लूणकरण) — सबसे प्रसिद्ध उदाहरण |
राजस्थान का प्रथम साका | रणथंभौर, 1301 | हम्मीर देव चौहान, रानी रंगदेवी |
सर्वाधिक साके | चित्तौड़गढ़ — 3 | 1303, 1534–35, 1567–68 |
ढाई साके | जैसलमेर | दो पूर्ण + एक अर्द्ध |
जल दुर्ग के दो साके | गागरोण (झालावाड़) | 1423 व 1444, दोनों मालवा के सुल्तानों से |
अलाउद्दीन खिलजी से जुड़े साके | रणथंभौर, चित्तौड़ (प्रथम), सिवाणा, जालौर, जैसलमेर (प्रथम) | पाँच दुर्ग — "र-चि-सि-जा-जै" |
अकबर से जुड़ा साका | चित्तौड़ का तीसरा (1567–68) | जयमल राठौड़ व पत्ता सिसोदिया |
मुख्य स्रोत | हम्मीर महाकाव्य, पद्मावत, कान्हड़दे प्रबंध, अचलदास खींची री वचनिका | क्रमशः रणथंभौर, चित्तौड़, जालौर, गागरोण |
2. सिलेबस में यह टॉपिक क्यों महत्वपूर्ण है?
साके व जौहर राजस्थान इतिहास के "मध्यकालीन संघर्ष" भाग का स्थायी प्रश्न-क्षेत्र हैं। RAS प्रारंभिक, राजस्थान CET (12वीं व स्नातक), पटवारी, VDO, REET व SI जैसी परीक्षाओं में इनसे सामान्यतः चार प्रकार के प्रश्न बनते हैं:
सुमेलन (Match): दुर्ग — शासक — आक्रांता — वर्ष (जैसे जालौर — कान्हड़देव — अलाउद्दीन)।
गिनती आधारित: "किस दुर्ग में ढाई साके हुए?", "चित्तौड़ में कितने साके हुए?"
नेतृत्व आधारित: "चित्तौड़ के दूसरे साके में जौहर का नेतृत्व किसने किया?" (रानी कर्णावती)।
साहित्य आधारित: "कान्हड़दे प्रबंध किस साके का वर्णन करता है?", "अचलदास खींची री वचनिका के लेखक कौन?"
यह नोट सभी साकों को एक संदर्भ-पत्र के रूप में जोड़ता है; राजवंशों का विस्तृत इतिहास संबंधित नोट्स में है, यहाँ फोकस साकों की तुलना, गिनती, नेतृत्व व स्रोतों पर है।
3. मूल अवधारणाएँ: साका, जौहर, केसरिया और अर्द्ध साका
3.1 जौहर
जब दुर्ग की रक्षा असंभव हो जाती और शत्रु की विजय निश्चित दिखती, तब दुर्ग की स्त्रियाँ (रानियाँ, राजपरिवार व सामंतों की स्त्रियाँ) अपने सम्मान की रक्षा के लिए सामूहिक रूप से अग्नि-कुंड में प्रवेश करती थीं — इसे जौहर कहा गया। प्रायः जौहर का नेतृत्व पटरानी या प्रमुख रानी करती थी। कुछ ग्रंथों में जल में कूदकर प्राण देने को "जल जौहर" कहा गया है; रणथंभौर के संदर्भ में यह शब्द अधिक मिलता है।
3.2 केसरिया
जौहर के बाद पुरुष योद्धा केसरिया वस्त्र (केसरिया बाना) धारण कर, मुँह में तुलसी-दल रखकर, दुर्ग के द्वार खोल देते और शत्रु पर टूट पड़ते थे। लक्ष्य विजय नहीं, बल्कि अंतिम साँस तक लड़ते हुए वीरगति था। इसे "केसरिया करना" कहा जाता है।
3.3 साका (पूर्ण साका)
जब जौहर और केसरिया दोनों एक ही घेराबंदी में घटित हों, तो उसे साका कहते हैं। अधिकांश परीक्षा-पुस्तकें यही परिभाषा देती हैं।
3.4 अर्द्ध साका
यदि केवल केसरिया हुआ हो और जौहर न हो सका हो (या इसके विपरीत), तो उसे अर्द्ध साका कहा जाता है। सबसे प्रसिद्ध उदाहरण जैसलमेर का 1550 का साका है, जिसमें रावल लूणकरण के समय जौहर नहीं हो सका — इसी कारण जैसलमेर के साके "ढाई" गिने जाते हैं।
शब्द | कौन करता है | क्या होता है | उदाहरण |
|---|---|---|---|
जौहर | स्त्रियाँ | सामूहिक अग्नि-प्रवेश (कभी-कभी जल में) | रानी पद्मिनी, चित्तौड़ 1303 |
केसरिया | पुरुष योद्धा | केसरिया बाना पहनकर अंतिम युद्ध | जयमल-पत्ता, चित्तौड़ 1568 |
साका | दोनों | जौहर + केसरिया | रणथंभौर 1301 |
अर्द्ध साका | केवल एक पक्ष | जौहर या केसरिया में से एक | जैसलमेर 1550 |
सूत्र: जौहर (स्त्री) + केसरिया (पुरुष) = साका; आधा हुआ तो "अर्द्ध साका"।
4. पृष्ठभूमि: साके क्यों हुए?
राजस्थान के अधिकतर साके 13वीं–16वीं शताब्दी के बीच हुए, जब दिल्ली सल्तनत, मालवा-गुजरात की प्रांतीय सल्तनतें और बाद में मुगल राजपूत दुर्गों पर अधिकार करना चाहते थे। कुछ सामान्य कारण:
सामरिक महत्व: रणथंभौर, चित्तौड़, जालौर, सिवाणा जैसे दुर्ग गुजरात-मालवा व दक्कन के मार्गों पर स्थित थे; इन पर नियंत्रण साम्राज्य-विस्तार के लिए आवश्यक था।
शरणागत की रक्षा: रणथंभौर में हम्मीर ने अलाउद्दीन के विद्रोही मंगोल सेनापति मुहम्मदशाह (महिमाशाह) को शरण दी — यही आक्रमण का तात्कालिक कारण माना जाता है।
लंबी घेराबंदी: महीनों चलने वाले घेरे में रसद व पानी समाप्त होना निर्णायक होता था।
विश्वासघात: रणथंभौर (रतिपाल व रणमल), सिवाणा (भायला/भावले पंवार) और जालौर (बीका दहिया) — तीनों में भेद देने वाले का उल्लेख मिलता है।
राजस्थान के दुर्गों के प्रकारों (गिरि, जल, धान्वन आदि) की जानकारी के लिए दुर्गों के प्रकार और राजस्थान के प्रमुख दुर्ग देखें।
5. रणथंभौर का साका (1301) — राजस्थान का प्रथम साका
पक्ष | विवरण |
|---|---|
दुर्ग | रणथंभौर (वर्तमान सवाई माधोपुर जिला) — गिरि/वन दुर्ग |
शासक | हम्मीर देव चौहान ("हठी हम्मीर") |
आक्रांता | अलाउद्दीन खिलजी (दिल्ली सल्तनत) |
वर्ष | 1301 (अधिकतर पुस्तकों में जुलाई 1301) |
जौहर नेतृत्व | रानी रंगदेवी |
तात्कालिक कारण | विद्रोही मंगोल सेनापति मुहम्मदशाह को शरण देना व लौटाने से इनकार |
विश्वासघाती | रतिपाल व रणमल (हम्मीर के सेनानायक) |
समकालीन वर्णन | अमीर खुसरो (अलाउद्दीन के साथ अभियान में) |
साहित्यिक स्रोत | हम्मीर महाकाव्य (नयनचंद्र सूरि), हम्मीर रासो, हम्मीरायण |
5.1 घटनाक्रम
हम्मीर ने अलाउद्दीन के विद्रोही मंगोल सरदारों — विशेषकर मुहम्मदशाह — को शरण दी।
पहले अभियान में अलाउद्दीन के सेनापति उलुग खाँ व नुसरत खाँ आए; घेराबंदी के दौरान नुसरत खाँ दुर्ग से फेंके गए पत्थर (मंजनीक) से घायल होकर मारा गया।
इसके बाद अलाउद्दीन स्वयं रणथंभौर पहुँचा और लंबा घेरा डाला।
हम्मीर के सेनानायक रतिपाल व रणमल के शत्रु से मिल जाने पर दुर्ग की स्थिति कमजोर हुई।
रानी रंगदेवी के नेतृत्व में स्त्रियों ने जौहर किया; हम्मीर व उसके योद्धाओं ने केसरिया किया और वीरगति पाई।
5.2 "जल जौहर" का प्रश्न
कई राजस्थान GK पुस्तकों में लिखा मिलता है कि रानी रंगदेवी ने दुर्ग के भीतर पद्मला तालाब में कूदकर जल जौहर किया, और इसी संदर्भ में हम्मीर की पुत्री देवलदे का नाम भी आता है। मूल स्रोतों में विवरण एक-सा नहीं है, इसलिए परीक्षा में सुरक्षित उत्तर यह है: "रणथंभौर के साके में जौहर का नेतृत्व रानी रंगदेवी ने किया।" "जल जौहर" शब्द किसी विकल्प में आए तो उसे रणथंभौर से ही जोड़ें।
5.3 क्यों "प्रथम साका"?
राजस्थान GK की मानक पुस्तकों में रणथंभौर (1301) को राजस्थान का प्रथम (सबसे पहला प्रसिद्ध) साका कहा जाता है। ध्यान रहे — जैसलमेर के पहले साके की तिथि कुछ स्रोतों में 1299 दी गई है, जो 1301 से पहले की है; परंतु अधिकांश पुस्तकें जैसलमेर के प्रथम साके को 1312–13 के आसपास रखती हैं। अतः परीक्षा का स्वीकृत उत्तर: रणथंभौर।
हम्मीर के 17 युद्ध, "हम्मीर हठ" व रणथंभौर दुर्ग का विस्तृत विवरण हम्मीर देव व रणथंभौर का साका नोट में है।
6. चित्तौड़गढ़ के तीन साके
चित्तौड़गढ़ (गिरि दुर्ग, गंभीरी व बेड़च नदियों के समीप) राजस्थान का वह दुर्ग है जहाँ सर्वाधिक तीन साके हुए। इसीलिए कहा जाता है — "गढ़ तो चित्तौड़गढ़, बाकी सब गढ़ैया।"
साका | वर्ष | मेवाड़ का शासक | आक्रांता | जौहर नेतृत्व | केसरिया नेतृत्व/प्रमुख योद्धा |
|---|---|---|---|---|---|
प्रथम | 1303 | रावल रतनसिंह | अलाउद्दीन खिलजी | रानी पद्मिनी | रतनसिंह; गोरा व बादल |
द्वितीय | 1534–35 | राणा विक्रमादित्य (अल्पवयस्क) | बहादुरशाह (गुजरात) | रानी कर्णावती (राणा सांगा की रानी) | रावत बाघसिंह (देवलिया-प्रतापगढ़) |
तृतीय | 1567–68 | महाराणा उदयसिंह (दुर्ग छोड़ चुके थे) | अकबर | पत्ता की पत्नी फूल कंवर (अधिकांश पुस्तकों में) | जयमल राठौड़ (मेड़तिया) व पत्ता (फत्ता) सिसोदिया; कल्ला राठौड़ |
6.1 प्रथम साका (1303) — रतनसिंह व पद्मिनी
शासक: रावल रतनसिंह (गुहिल वंश की रावल शाखा का अंतिम प्रमुख शासक)।
आक्रांता: अलाउद्दीन खिलजी; दुर्ग पर अधिकार 1303 में (अनेक पुस्तकें 26 अगस्त 1303 लिखती हैं)।
जौहर: रानी पद्मिनी के नेतृत्व में — इसे चित्तौड़ का प्रथम जौहर कहा जाता है।
केसरिया: रतनसिंह के साथ सेनानायक गोरा व बादल (लोकपरंपरा में गोरा को पद्मिनी का चाचा और बादल को भतीजा/भाई बताया जाता है) वीरगति को प्राप्त हुए।
नाम परिवर्तन: अलाउद्दीन ने दुर्ग अपने पुत्र खिज्र खाँ को सौंपा और चित्तौड़ का नाम खिज्राबाद रखा।
समकालीन लेखक: अमीर खुसरो इस अभियान में साथ था (खजाइन-उल-फुतूह) — उसमें पद्मिनी का उल्लेख नहीं है।
पद्मिनी कथा का स्रोत: लगभग 237 वर्ष बाद मलिक मुहम्मद जायसी का पद्मावत (1540, अवधी); कथा में राघव चेतन, दर्पण-प्रसंग व सिंहल द्वीप का वर्णन है।
इतिहास बनाम साहित्य: पद्मिनी-प्रसंग की ऐतिहासिकता पर इतिहासकारों में मतभेद है, क्योंकि समकालीन फ़ारसी स्रोतों में यह नहीं मिलता। परीक्षा में "पद्मावत किसने लिखा/कब" या "प्रथम साके में जौहर किसने किया" जैसे प्रश्नों का उत्तर पारंपरिक मान्यता (पद्मिनी, जायसी, 1540) के अनुसार ही दें।
6.2 द्वितीय साका (1534–35) — विक्रमादित्य काल, रानी कर्णावती
पृष्ठभूमि: राणा सांगा (मृत्यु 1528) के बाद मेवाड़ कमजोर हुआ; अल्पवयस्क विक्रमादित्य के शासन में सामंत असंतुष्ट थे।
आक्रांता: गुजरात का सुल्तान बहादुरशाह।
जौहर: राजमाता रानी कर्णावती (हाड़ी रानी, राणा सांगा की पत्नी) के नेतृत्व में।
केसरिया: देवलिया (प्रतापगढ़) के रावत बाघसिंह के नेतृत्व में; उन्हें अस्थायी रूप से राणा का प्रतिनिधि बनाकर दुर्ग की रक्षा सौंपी गई थी।
राजकुमारों की सुरक्षा: विक्रमादित्य व छोटे राजकुमार उदयसिंह को सुरक्षित रूप से बूंदी भेजा गया।
राखी-प्रसंग: लोकप्रचलित कथा के अनुसार कर्णावती ने मुगल बादशाह हुमायूँ को राखी भेजकर सहायता माँगी; हुमायूँ समय पर नहीं पहुँचा। (यह प्रसंग परवर्ती वृत्तांतों पर आधारित है।)
तिथि: अधिकांश पुस्तकें दुर्ग-पतन मार्च 1535 में बताती हैं; कई जगह इसे "1534 का साका" भी लिखा जाता है — दोनों वर्ष एक ही घटना के हैं।
6.3 तृतीय साका (1567–68) — जयमल-पत्ता बनाम अकबर
आक्रांता: मुगल बादशाह अकबर (स्वयं घेराबंदी में उपस्थित)। घेरा अक्टूबर 1567 में आरंभ, दुर्ग-पतन फरवरी 1568।
महाराणा उदयसिंह सामंतों की सलाह पर दुर्ग की रक्षा जयमल व पत्ता को सौंपकर पहाड़ियों (गोगुंदा की ओर) चले गए थे।
जयमल राठौड़ — मेड़ता के राठौड़ (राव वीरमदेव के पुत्र, मीरा बाई के चचेरे भाई)। अकबर की बंदूक की गोली से पैर में घायल होने पर वे अपने भतीजे कल्ला राठौड़ के कंधों पर बैठकर लड़े — इसी कारण लोक में कल्लाजी को "चार हाथों वाले लोकदेवता" कहा जाता है।
पत्ता (फत्ता) सिसोदिया — केलवा (आमेट) के सिसोदिया सरदार; युवा अवस्था में वीरगति।
जौहर: अधिकांश परीक्षा-पुस्तकों के अनुसार पत्ता की पत्नी फूल कंवर के नेतृत्व में; कुछ पुस्तकें जौहर में पत्ता की माता व पत्नी — दोनों का उल्लेख करती हैं।
परिणाम: दुर्ग जीतने के बाद अकबर ने बड़े पैमाने पर कत्लेआम करवाया (संख्या स्रोतों में भिन्न — लगभग 30,000 का आँकड़ा प्रचलित है); अकबर ने अपनी विजय का फतहनामा जारी किया।
सम्मान: जयमल-पत्ता की वीरता से प्रभावित होकर अकबर ने आगरा दुर्ग के द्वार पर उनकी हाथी पर सवार प्रतिमाएँ लगवाईं (यह तथ्य प्रायः पूछा जाता है)।
कल्लाजी राठौड़ के लोकदेवता रूप के लिए मल्लीनाथ, कल्लाजी व अन्य लोकदेवता और मेवाड़ की वंशावली के लिए मेवाड़ राजवंश देखें।
7. सिवाणा का साका (1308)
पक्ष | विवरण |
|---|---|
दुर्ग | सिवाणा (वर्तमान बालोतरा/बाड़मेर क्षेत्र) — छप्पन की पहाड़ियों में स्थित गिरि दुर्ग |
शासक | सातलदेव (शीतलदेव) चौहान — जालौर के कान्हड़देव के संबंधी (प्रायः भतीजा बताया जाता है) |
आक्रांता | अलाउद्दीन खिलजी |
वर्ष | 1308 |
विश्वासघाती | भायला (भावले) पंवार — दुर्ग के जलस्रोत को दूषित करवाने का उल्लेख |
नाम परिवर्तन | अलाउद्दीन ने सिवाणा का नाम खैराबाद रखा |
सिवाणा की "जालौर की कुंजी" | सिवाणा को जालौर दुर्ग की कुंजी कहा जाता है — पहले सिवाणा गिरा, फिर जालौर |
सिवाणा का पतन जालौर अभियान की भूमिका था। यहाँ स्त्रियों ने जौहर किया और सातलदेव ने केसरिया कर वीरगति प्राप्त की। ध्यान दें: सिवाणा का शासक "सातलदेव/शीतलदेव" और जालौर का शासक "कान्हड़देव" — दोनों चौहान, दोनों अलाउद्दीन से लड़े; प्रश्न में दुर्ग के नाम से ही भेद करें।
7.1 सिवाणा का दूसरा साका?
कुछ राजस्थान GK पुस्तकें सिवाणा का दूसरा साका भी गिनाती हैं — अकबर के काल में राठौड़ वीर कल्ला रायमलोत के समय, जब मुगल पक्ष से मोटा राजा उदयसिंह (जोधपुर) ने दुर्ग घेरा। इसकी तिथि व विवरण पुस्तकों में एक-से नहीं हैं; इसलिए किसी प्रश्न में "सिवाणा का साका" बिना विशेषण के आए तो 1308 — सातलदेव — अलाउद्दीन ही चुनें। (यह कल्ला रायमलोत, चित्तौड़ वाले कल्लाजी राठौड़ से भिन्न व्यक्ति हैं।)
8. जालौर का साका (1311 के आसपास)
पक्ष | विवरण |
|---|---|
दुर्ग | जालौर (सोनगिरि/स्वर्णगिरि पहाड़ी पर) — गिरि दुर्ग |
शासक | कान्हड़देव सोनगरा चौहान; पुत्र वीरमदेव |
आक्रांता | अलाउद्दीन खिलजी (सेनापति कमालुद्दीन गुर्ग का उल्लेख) |
वर्ष | 1311 (कुछ पुस्तकों में 1310–11 या 1311–12) |
जौहर नेतृत्व | रानी जैतलदे (परीक्षा-पुस्तकों में प्रचलित नाम) |
विश्वासघाती | बीका दहिया — जिसकी पत्नी ने स्वयं उसका वध कर दिया, ऐसी लोककथा प्रचलित है |
नाम परिवर्तन | जालौर का नाम जलालाबाद रखा गया |
साहित्यिक स्रोत | कान्हड़दे प्रबंध — कवि पद्मनाभ (1455 ई. के आसपास, अखैराज सोनगरा के आश्रय में) |
8.1 पृष्ठभूमि व कथा
गुजरात (सोमनाथ) अभियान से लौटती अलाउद्दीन की सेना को कान्हड़देव ने अपने क्षेत्र से गुजरने नहीं दिया/उस पर हमला किया — यह संघर्ष का आरंभिक कारण माना जाता है।
लोककथा के अनुसार अलाउद्दीन की पुत्री फिरोजा कान्हड़देव के पुत्र वीरमदेव से विवाह करना चाहती थी; वीरमदेव के इनकार ने वैमनस्य बढ़ाया। ("वीरमदेव सोनगरा री बात" में यह कथा मिलती है।)
पहले सिवाणा (1308) गिरा, फिर लंबे घेरे के बाद जालौर पर अधिकार हुआ।
कान्हड़देव व वीरमदेव ने केसरिया किया; स्त्रियों ने जौहर किया।
सोनगरा चौहानों व जालौर दुर्ग के लिए जालौर सोनगरा चौहान व सिवाना तथा चौहान शाखाओं की तुलना के लिए चौहान वंश की 5 शाखाएँ देखें।
9. जैसलमेर के ढाई साके
जैसलमेर (सोनार किला, त्रिकूट पहाड़ी पर स्थित धान्वन/मरु दुर्ग) के साकों को "ढाई साके" कहा जाता है — दो पूर्ण साके और एक अर्द्ध साका। तिथियों में पुस्तकों के बीच अंतर है, अतः नीचे सामान्यतः स्वीकृत रूप दिया गया है।
क्रम | काल/वर्ष | भाटी शासक/योद्धा | आक्रांता | प्रकृति |
|---|---|---|---|---|
प्रथम | अलाउद्दीन खिलजी काल — अधिकतर पुस्तकों में 1312–13 के आसपास; कुछ में 1299 | रावल मूलराज व रतनसी (रत्नसिंह) | अलाउद्दीन खिलजी की सेना | पूर्ण साका (जौहर + केसरिया) |
द्वितीय | फिरोजशाह तुगलक काल (14वीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध) | रावल दूदा व त्रिलोकसी | फिरोजशाह तुगलक की सेना | पूर्ण साका |
तृतीय (अर्द्ध) | 1550 | रावल लूणकरण | कंधार का अमीर अली | अर्द्ध साका — केसरिया हुआ, जौहर नहीं |
9.1 प्रथम साका — मूलराज व रतनसी
अलाउद्दीन खिलजी की सेना ने लंबी घेराबंदी की। रावल मूलराज व उनके भाई रतनसी ने केसरिया किया और स्त्रियों ने जौहर किया। तिथि को लेकर मतभेद के कारण प्रश्न प्रायः "किस सुल्तान के समय" के रूप में आता है — उत्तर अलाउद्दीन खिलजी।
9.2 द्वितीय साका — दूदा व त्रिलोकसी
फिरोजशाह तुगलक के समय रावल दूदा और त्रिलोकसी के नेतृत्व में भाटियों ने केसरिया किया तथा स्त्रियों ने जौहर किया। सटीक वर्ष पर पुस्तकों में सहमति नहीं है; याद रखें — "दूदा-त्रिलोकसी = तुगलक"।
9.3 तीसरा (अर्द्ध) साका — लूणकरण, 1550
कंधार के अमीर अली ने मित्रता का दिखावा कर (स्त्रियों की डोलियों में सैनिक छिपाकर, ऐसी कथा प्रचलित है) दुर्ग में प्रवेश किया। अचानक हमले के कारण जौहर का समय नहीं मिला; परंपरा के अनुसार रावल लूणकरण ने स्वयं राजपरिवार की स्त्रियों के प्राण लिए और फिर योद्धाओं के साथ केसरिया किया। जौहर न होने से इसे अर्द्ध साका माना जाता है — यही जैसलमेर के "आधे" साके का आधार है।
जैसलमेर = मूलराज (खिलजी) + दूदा (तुगलक) + लूणकरण (अमीर अली, अर्द्ध) = ढाई साके।
भाटी वंश व जैसलमेर दुर्ग के लिए जैसलमेर भाटी राजवंश देखें।
10. गागरोण के दो साके
गागरोण दुर्ग (वर्तमान झालावाड़ जिला) आहू व कालीसिंध नदियों के संगम पर बना प्रसिद्ध जल दुर्ग है, जो बिना नींव के चट्टान पर खड़ा माना जाता है। यहाँ खींची चौहानों का शासन था और दोनों साके मालवा के सुल्तानों के आक्रमण में हुए।
साका | वर्ष | खींची शासक | आक्रांता | मुख्य स्रोत/टिप्पणी |
|---|---|---|---|---|
प्रथम | 1423 | अचलदास खींची | मालवा का सुल्तान होशंगशाह (हुशंगशाह) | अचलदास खींची री वचनिका — शिवदास गाडण |
द्वितीय | 1444 | पाल्हणसी (अचलदास का पुत्र) | मालवा का सुल्तान महमूद खिलजी (प्रथम) | विजय के बाद दुर्ग का नाम मुस्तफाबाद रखा गया |
10.1 प्रथम साका (1423)
मालवा के होशंगशाह ने गागरोण को घेरा। अचलदास खींची ने केसरिया किया और रानियों ने जौहर किया। इस युद्ध व जौहर का सजीव वर्णन चारण कवि शिवदास गाडण की डिंगल कृति "अचलदास खींची री वचनिका" में है — यह स्रोत-आधारित प्रश्नों का प्रिय तथ्य है।
10.2 द्वितीय साका (1444)
मालवा के महमूद खिलजी ने आक्रमण किया। अचलदास के पुत्र पाल्हणसी के समय दुर्ग का पतन हुआ; पाल्हणसी दुर्ग छोड़कर निकले और बाद में मारे गए, जबकि दुर्ग में धीरा (धीरजदेव) आदि योद्धाओं ने केसरिया किया — विवरण पुस्तकों में कुछ भिन्न है। विजय के बाद महमूद खिलजी ने गागरोण का नाम मुस्तफाबाद रखा।
गागरोण: 1423 होशंग-अचल, 1444 महमूद-पाल्हण — "होशंग पहले, महमूद बाद में"।
झालावाड़ क्षेत्र के इतिहास के लिए झालावाड़ व किशनगढ़ रियासत देखें।
11. अन्य उल्लेखित साके व जौहर
कुछ पुस्तकें उपर्युक्त प्रमुख साकों के अतिरिक्त अन्य घटनाओं को भी साका/जौहर के रूप में सूचीबद्ध करती हैं। ये कम पूछे जाते हैं और इनके विवरण में भी स्रोतों के बीच अंतर है:
भटनेर (हनुमानगढ़), 1398: राव दूलचंद भाटी बनाम तैमूर — कुछ पुस्तकें इसे साका/अर्द्ध साका गिनाती हैं।
सिवाणा (दूसरा), अकबर काल: वीर कल्ला रायमलोत — खंड 7.1 देखें।
परीक्षा-नीति: यदि प्रश्न "राजस्थान के प्रमुख साके" पूछे, तो मानक सूची — रणथंभौर, चित्तौड़ (3), सिवाणा, जालौर, जैसलमेर (ढाई), गागरोण (2) — पर ही भरोसा करें।
12. मास्टर तालिका: स्थान–वर्ष–शासक–आक्रांता–नेतृत्व
दुर्ग (वर्तमान जिला) | वर्ष | राजपूत शासक/योद्धा | आक्रांता | जौहर नेतृत्व |
|---|---|---|---|---|
रणथंभौर (सवाई माधोपुर) | 1301 | हम्मीर देव चौहान | अलाउद्दीन खिलजी | रानी रंगदेवी |
चित्तौड़ — प्रथम (चित्तौड़गढ़) | 1303 | रावल रतनसिंह; गोरा-बादल | अलाउद्दीन खिलजी | रानी पद्मिनी |
सिवाणा (बालोतरा/बाड़मेर क्षेत्र) | 1308 | सातलदेव (शीतलदेव) चौहान | अलाउद्दीन खिलजी | दुर्ग की रानियाँ (नाम पर सहमति नहीं) |
जालौर (जालौर) | 1311 के आसपास | कान्हड़देव सोनगरा; वीरमदेव | अलाउद्दीन खिलजी | रानी जैतलदे |
जैसलमेर — प्रथम | अलाउद्दीन काल (1312–13 / 1299 — मतभेद) | रावल मूलराज, रतनसी | अलाउद्दीन खिलजी की सेना | दुर्ग की रानियाँ |
जैसलमेर — द्वितीय | फिरोज तुगलक काल | रावल दूदा, त्रिलोकसी | फिरोजशाह तुगलक की सेना | दुर्ग की रानियाँ |
गागरोण — प्रथम (झालावाड़) | 1423 | अचलदास खींची | होशंगशाह (मालवा) | अचलदास की रानियाँ |
गागरोण — द्वितीय | 1444 | पाल्हणसी खींची | महमूद खिलजी (मालवा) | दुर्ग की रानियाँ |
चित्तौड़ — द्वितीय | 1534–35 | राणा विक्रमादित्य; रावत बाघसिंह | बहादुरशाह (गुजरात) | रानी कर्णावती |
जैसलमेर — तृतीय (अर्द्ध) | 1550 | रावल लूणकरण | अमीर अली (कंधार) | जौहर नहीं हुआ |
चित्तौड़ — तृतीय | 1567–68 | जयमल राठौड़, पत्ता सिसोदिया | अकबर | फूल कंवर (पत्ता की पत्नी) |
13. गिनती तालिका: किस दुर्ग में कितने साके?
दुर्ग | साकों की संख्या | दुर्ग का प्रकार | शासक वंश |
|---|---|---|---|
चित्तौड़गढ़ | 3 (सर्वाधिक) | गिरि दुर्ग | गुहिल/सिसोदिया |
जैसलमेर | ढाई (2 पूर्ण + 1 अर्द्ध) | धान्वन/मरु व गिरि दुर्ग | भाटी |
गागरोण | 2 | जल दुर्ग | खींची चौहान |
रणथंभौर | 1 (राजस्थान का प्रथम) | गिरि/वन दुर्ग | चौहान (हम्मीर) |
जालौर | 1 | गिरि दुर्ग | सोनगरा चौहान |
सिवाणा | 1 (कुछ पुस्तकों में 2) | गिरि दुर्ग | चौहान (सातलदेव) |
संख्या याद रखें: चित्तौड़ 3 > जैसलमेर 2½ > गागरोण 2 > शेष 1-1।
14. साकों के साहित्यिक व ऐतिहासिक स्रोत
ग्रंथ | रचनाकार | भाषा/काल | किस साके से संबंध |
|---|---|---|---|
हम्मीर महाकाव्य | नयनचंद्र सूरि (जैन विद्वान) | संस्कृत, 15वीं शताब्दी | रणथंभौर 1301 |
हम्मीर रासो | जोधराज (एक अन्य हम्मीर रासो सारंगधर के नाम से भी जुड़ा) | राजस्थानी/हिंदी | रणथंभौर |
हम्मीरायण | भांडउ व्यास | राजस्थानी | रणथंभौर |
खजाइन-उल-फुतूह | अमीर खुसरो | फ़ारसी, समकालीन | रणथंभौर व चित्तौड़ (अलाउद्दीन के अभियान) |
पद्मावत | मलिक मुहम्मद जायसी | अवधी, 1540 | चित्तौड़ का प्रथम साका (पद्मिनी) |
कान्हड़दे प्रबंध | पद्मनाभ | पुरानी राजस्थानी/गुजराती, 1455 के आसपास | जालौर (व सिवाणा) |
वीरमदेव सोनगरा री बात | अज्ञात (बात-साहित्य) | राजस्थानी | जालौर — वीरमदेव-फिरोजा कथा |
अचलदास खींची री वचनिका | शिवदास गाडण (चारण) | डिंगल, 15वीं शताब्दी | गागरोण का प्रथम साका 1423 |
सावधानी: "हम्मीर हठ" (चंद्रशेखर) और "हम्मीर रासो" अलग-अलग कृतियाँ हैं; दोनों रणथंभौर के हम्मीर से जुड़ी हैं। जायसी उत्तर प्रदेश (जायस) के सूफ़ी कवि थे — राजस्थानी कवि नहीं।
राजस्थान के साहित्यकारों की विस्तृत सूची के लिए राजस्थान के प्रमुख साहित्यकार व रचनाएँ देखें।
15. कालक्रम (Timeline)
वर्ष | घटना |
|---|---|
1301 | रणथंभौर का साका — हम्मीर देव, रानी रंगदेवी (प्रथम साका) |
1303 | चित्तौड़ का प्रथम साका — रतनसिंह, पद्मिनी; नाम खिज्राबाद |
1308 | सिवाणा का साका — सातलदेव; नाम खैराबाद |
1311 (लगभग) | जालौर का साका — कान्हड़देव, वीरमदेव; नाम जलालाबाद |
14वीं सदी (अलाउद्दीन काल) | जैसलमेर का प्रथम साका — मूलराज, रतनसी |
14वीं सदी (फिरोज तुगलक काल) | जैसलमेर का द्वितीय साका — दूदा, त्रिलोकसी |
1423 | गागरोण का प्रथम साका — अचलदास खींची / होशंगशाह |
1444 | गागरोण का द्वितीय साका — पाल्हणसी / महमूद खिलजी; नाम मुस्तफाबाद |
1455 (लगभग) | पद्मनाभ द्वारा कान्हड़दे प्रबंध की रचना |
1534–35 | चित्तौड़ का द्वितीय साका — कर्णावती, बाघसिंह / बहादुरशाह |
1540 | जायसी द्वारा पद्मावत की रचना |
1550 | जैसलमेर का अर्द्ध साका — लूणकरण / अमीर अली |
1567–68 | चित्तौड़ का तृतीय साका — जयमल, पत्ता, कल्ला / अकबर |
16. परीक्षा में पूछे जाने वाले तथ्य (One-liners)
जौहर + केसरिया = साका; केवल एक = अर्द्ध साका।
राजस्थान का प्रथम साका — रणथंभौर (1301)।
रणथंभौर के साके में जौहर — रानी रंगदेवी; "जल जौहर" शब्द इसी से जुड़ा।
सर्वाधिक साके — चित्तौड़गढ़ (3)।
चित्तौड़ का प्रथम जौहर — रानी पद्मिनी (1303); दुर्ग का नया नाम खिज्राबाद।
पद्मावत — मलिक मुहम्मद जायसी, 1540।
चित्तौड़ का दूसरा साका — बहादुरशाह (गुजरात), जौहर रानी कर्णावती, केसरिया रावत बाघसिंह।
चित्तौड़ का तीसरा साका — अकबर; नायक जयमल व पत्ता।
जयमल को कंधे पर बैठाकर लड़ने वाले — कल्ला राठौड़ (चार हाथों वाले लोकदेवता)।
सिवाणा 1308 — सातलदेव; नाम खैराबाद; "जालौर की कुंजी"।
जालौर — कान्हड़देव सोनगरा; नाम जलालाबाद; विश्वासघाती बीका दहिया।
कान्हड़दे प्रबंध — पद्मनाभ।
जैसलमेर — ढाई साके; अर्द्ध साका 1550, रावल लूणकरण, आक्रांता अमीर अली।
गागरोण — जल दुर्ग, आहू-कालीसिंध संगम, दो साके।
गागरोण 1423 — अचलदास खींची / होशंगशाह; स्रोत शिवदास गाडण की वचनिका।
गागरोण 1444 — पाल्हणसी / महमूद खिलजी; नाम मुस्तफाबाद।
अलाउद्दीन से जुड़े पाँच साके — रणथंभौर, चित्तौड़ (प्रथम), सिवाणा, जालौर, जैसलमेर (प्रथम)।
17. भ्रम व सावधानियाँ (Exam Traps)
भ्रम | सही तथ्य |
|---|---|
"राजस्थान का प्रथम साका चित्तौड़ (1303) है" | नहीं — रणथंभौर (1301) प्रथम है; चित्तौड़ का प्रथम साका 1303 है। |
"जैसलमेर में तीन पूर्ण साके हुए" | ढाई — 1550 का साका अर्द्ध था क्योंकि जौहर नहीं हुआ। |
"चित्तौड़ का दूसरा साका अकबर के समय" | दूसरा बहादुरशाह (1534–35); अकबर के समय तीसरा (1567–68)। |
"रानी कर्णावती महाराणा प्रताप की माता थीं" | नहीं — कर्णावती राणा सांगा की रानी थीं; प्रताप की माता जयवंता बाई थीं। |
"तीसरे साके के समय उदयसिंह दुर्ग में लड़े" | उदयसिंह दुर्ग छोड़ चुके थे; रक्षा जयमल-पत्ता ने की। |
"गागरोण के दोनों साके दिल्ली सुल्तानों से" | दोनों मालवा के सुल्तानों (होशंगशाह, महमूद खिलजी) से। |
"महमूद खिलजी = अलाउद्दीन खिलजी का वंशज" | महमूद खिलजी मालवा का सुल्तान था; दिल्ली के खिलजी वंश से भिन्न। |
"अचलदास खींची री वचनिका — पद्मनाभ" | वचनिका — शिवदास गाडण; पद्मनाभ — कान्हड़दे प्रबंध। |
"पद्मावत समकालीन (1303) ग्रंथ है" | पद्मावत 1540 का है — घटना के लगभग 237 वर्ष बाद। |
"सिवाणा का शासक कान्हड़देव" | सिवाणा — सातलदेव; जालौर — कान्हड़देव। |
नाम परिवर्तन मिलाना | चित्तौड़ — खिज्राबाद; सिवाणा — खैराबाद; जालौर — जलालाबाद; गागरोण — मुस्तफाबाद। |
"कल्लाजी राठौड़ = कल्ला रायमलोत" | चित्तौड़ (1568) के कल्लाजी जयमल के भतीजे; सिवाणा के कल्ला रायमलोत अलग व्यक्ति। |
18. इसे आसानी से याद कैसे रखें?
अलाउद्दीन क्रम (1301→1311): "रण-चित-सि-जा" = रणथंभौर 1301, चित्तौड़ 1303, सिवाणा 1308, जालौर 1311।
नाम परिवर्तन: "खिज्र-खैर-जलाल-मुस्तफा" = चित्तौड़-सिवाणा-जालौर-गागरोण।
चित्तौड़ की तीन रानियाँ: "प-क-फू" = पद्मिनी (1303), कर्णावती (1535), फूल कंवर (1568)।
चित्तौड़ के तीन आक्रांता: "अ-ब-अ" = अलाउद्दीन, बहादुरशाह, अकबर।
स्रोत: "हम्मीर-नयन, पद्मिनी-जायसी, कान्हड़-पद्मनाभ, अचल-शिवदास"।
19. संबंधित नोट्स
20. एक दिन पहले — 12 रेखाएँ
साका = जौहर + केसरिया; अर्द्ध साका = केवल एक।
प्रथम साका — रणथंभौर 1301, हम्मीर, रंगदेवी।
चित्तौड़ 3 — 1303 पद्मिनी, 1535 कर्णावती, 1568 जयमल-पत्ता।
सिवाणा 1308 — सातलदेव, खैराबाद।
जालौर 1311 — कान्हड़देव, जलालाबाद, बीका दहिया।
जैसलमेर ढाई — मूलराज, दूदा, लूणकरण (अर्द्ध, 1550)।
गागरोण 2 — 1423 अचलदास/होशंग, 1444 पाल्हणसी/महमूद।
अलाउद्दीन के पाँच साके — रणथंभौर, चित्तौड़, सिवाणा, जालौर, जैसलमेर।
बहादुरशाह — केवल चित्तौड़ 1534–35; अकबर — चित्तौड़ 1567–68।
पद्मावत — जायसी, 1540।
कान्हड़दे प्रबंध — पद्मनाभ; वचनिका — शिवदास गाडण।
आगरा दुर्ग पर जयमल-पत्ता की प्रतिमाएँ — अकबर।
21. अभ्यास
नोट पढ़ने के बाद इस पेज के अंत में दिए 25 प्रश्नों का क्विज़ हल करें। जिन प्रश्नों में गलती हो, उनके लिए खंड 12 (मास्टर तालिका), खंड 13 (गिनती व आक्रांता-वार तालिका) और खंड 14 (साहित्यिक स्रोत) दोबारा पढ़ें। तिथि-आधारित प्रश्नों के लिए खंड 15 की समयरेखा को कम से कम दो बार लिखकर दोहराएँ।
22. निष्कर्ष: परीक्षा के लिए क्या याद रखें?
राजस्थान के साके मध्यकालीन संघर्ष की सबसे मार्मिक घटनाएँ हैं — जहाँ पराजय निश्चित होने पर भी आत्मसमर्पण के स्थान पर आत्मोत्सर्ग चुना गया। ऐतिहासिक दृष्टि से इनमें से कई प्रसंगों (जैसे पद्मिनी कथा, जैसलमेर की तिथियाँ) पर स्रोतों में मतभेद है, पर परीक्षा के लिए मानक ढाँचा स्पष्ट है। तीन स्तंभ याद रखें — परिभाषा (साका बनाम अर्द्ध साका), गिनती (चित्तौड़ 3, जैसलमेर ढाई, गागरोण 2) और मिलान (दुर्ग–शासक–आक्रांता–रानी–स्रोत)।
1301 रणथंभौर · 1303 चित्तौड़ · 1308 सिवाणा · 1311 जालौर · 1423 गागरोण · 1444 गागरोण · 1534–35 चित्तौड़ · 1550 जैसलमेर (अर्द्ध) · 1567–68 चित्तौड़
इस टॉपिक का क्विज़ कहाँ दें?
“राजस्थान के प्रमुख साके व जौहर — चित्तौड़ 3, जैसलमेर ढाई, गागरोण 2 — RAS/CET” पढ़ने के बाद इन क्विज़ से तुरंत दोहराएँ — गलत उत्तर वाले बिंदु नोट में दोबारा देखें।
- राजस्थान के प्रमुख साके व जौहर — अभ्यास क्विज़25 प्रश्नों से खुद को परखें
- राव शेखा व शेखावाटी का इतिहास — अभ्यास क्विज़अभ्यास शुरू करें
- वागड़ की रियासतें — डूंगरपुर, बांसवाड़ा व प्रतापगढ़ — अभ्यास क्विज़25 प्रश्नों का क्विज़ दें
- झालावाड़ व किशनगढ़ रियासत का इतिहास — अभ्यास क्विज़अपनी तैयारी जाँचें
पूरे सिलेबस का अभ्यास: राजस्थान CET 12वीं स्तर 2026 संपूर्ण टेस्ट सीरीज़ (All-in-One Mega Pack) — पहला टेस्ट फ्री आज़माएँ

यह टॉपिक पढ़ लिया? अब असली परीक्षा जैसे मॉक टेस्ट में खुद को परखें
राजस्थान CET 12वीं स्तर 2026 संपूर्ण टेस्ट सीरीज़ (All-in-One Mega Pack)
- नवीनतम परीक्षा पैटर्न, समय-सीमा और नेगेटिव मार्किंग के साथ
- रैंक, कमजोर टॉपिक विश्लेषण और हर प्रश्न की हिंदी व्याख्या
- वेबसाइट एवं एंड्रॉइड ऐप दोनों पर तुरंत एक्सेस
महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)
जौहर में दुर्ग की स्त्रियाँ शत्रु के हाथ पड़ने से बचने के लिए सामूहिक अग्नि-प्रवेश करती थीं; केसरिया में पुरुष योद्धा केसरिया बाना पहनकर दुर्ग के द्वार खोलकर अंतिम युद्ध करते थे। जब जौहर और केसरिया दोनों एक ही घेराबंदी में हों, तो उसे साका कहा जाता है।
जब जौहर और केसरिया में से केवल एक घटना हो, तो उसे अर्द्ध साका कहते हैं। सबसे प्रसिद्ध उदाहरण जैसलमेर का 1550 का साका है, जिसमें कंधार के अमीर अली के अचानक आक्रमण के कारण जौहर नहीं हो सका और रावल लूणकरण ने केवल केसरिया किया।
परीक्षा-पुस्तकों के अनुसार रणथंभौर का साका (1301) राजस्थान का प्रथम साका है, जिसमें हम्मीर देव चौहान ने अलाउद्दीन खिलजी के विरुद्ध केसरिया किया और रानी रंगदेवी के नेतृत्व में जौहर हुआ।
चित्तौड़गढ़ में सर्वाधिक तीन साके हुए — 1303 (रावल रतनसिंह व रानी पद्मिनी बनाम अलाउद्दीन खिलजी), 1534–35 (विक्रमादित्य काल, रानी कर्णावती बनाम गुजरात का बहादुरशाह) और 1567–68 (जयमल व पत्ता बनाम अकबर)।
जैसलमेर में दो पूर्ण साके हुए — अलाउद्दीन खिलजी काल में मूलराज-रतनसी का और फिरोजशाह तुगलक काल में दूदा-त्रिलोकसी का। तीसरा 1550 में रावल लूणकरण के समय हुआ, जिसमें जौहर नहीं हुआ, इसलिए वह अर्द्ध साका माना जाता है। इस प्रकार कुल ढाई साके।
गागरोण (झालावाड़) का प्रथम साका 1423 में अचलदास खींची और मालवा के सुल्तान होशंगशाह के बीच हुआ; दूसरा 1444 में पाल्हणसी और मालवा के महमूद खिलजी के बीच हुआ। महमूद खिलजी ने दुर्ग का नाम मुस्तफाबाद रखा।
1534–35 के दूसरे साके में जौहर का नेतृत्व राणा सांगा की रानी कर्णावती ने किया और केसरिया का नेतृत्व देवलिया (प्रतापगढ़) के रावत बाघसिंह ने किया। आक्रांता गुजरात का सुल्तान बहादुरशाह था।
रणथंभौर (1301), चित्तौड़ का प्रथम साका (1303), सिवाणा (1308), जालौर (1311 के आसपास) और जैसलमेर का प्रथम साका — ये पाँचों अलाउद्दीन खिलजी या उसकी सेना के आक्रमण से जुड़े हैं।
हम्मीर महाकाव्य (नयनचंद्र सूरि) — रणथंभौर; पद्मावत (मलिक मुहम्मद जायसी, 1540) — चित्तौड़ का प्रथम साका; कान्हड़दे प्रबंध (पद्मनाभ) — जालौर; अचलदास खींची री वचनिका (शिवदास गाडण) — गागरोण का प्रथम साका।
अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ का नाम खिज्राबाद, सिवाणा का खैराबाद और जालौर का जलालाबाद रखा; मालवा के महमूद खिलजी ने गागरोण का नाम मुस्तफाबाद रखा।
क्या आपको यह अध्ययन नोट्स पसंद आए? अपने दोस्तों के साथ अवश्य शेयर करें: