लोकदेवता रामदेवजी: राजस्थान के पंचपीर में प्रमुख, सांप्रदायिक सद्भाव के प्रतीक

RPSC, RAS, RSMSSB, पटवारी, ग्राम सेवक, REET, SI तथा कंप्यूटर अनुदेशक जैसी लगभग सभी राजस्थान-स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं में लोकदेवताओं का खंड निश्चित रूप से पूछा जाता है, और रामदेवजी से जुड़े तथ्य — जन्म तिथि, माता-पिता, पत्नी, गुरु, समाधि, मेला, नृत्य — बार-बार प्रश्नों में दोहराए जाते हैं। इस लेख में हम रामदेवजी के जीवन, कार्यों, सामाजिक योगदान और उनसे जुड़े सभी परीक्षोपयोगी तथ्यों को विस्तार से समझेंगे।
लोकदेवता की अवधारणा: रामदेवजी का स्थान कहाँ है?
राजस्थान में लोकदेवता उन ऐतिहासिक अथवा अर्ध-ऐतिहासिक व्यक्तियों को कहा जाता है, जिन्होंने अपने जीवनकाल में असाधारण वीरता, त्याग, सामाजिक सेवा या चमत्कारिक कार्य किए और मृत्यु के पश्चात लोकमानस में देवता के रूप में पूजे जाने लगे। राजस्थान में पाँच प्रमुख लोकदेवताओं को "पंचपीर" कहा जाता है। इन्हें याद रखने के लिए एक लोकप्रिय ट्रिक प्रयोग की जाती है:
"गोपा मेहरा" — गोगाजी, पाबूजी, मेहाजी (मांगलिया), हड़बूजी, रामदेवजी
ध्यान देने योग्य बात यह है कि अत्यंत लोकप्रिय होने के बावजूद तेजाजी को पंचपीरों में शामिल नहीं किया जाता, यह परीक्षाओं में बार-बार पूछा जाने वाला भ्रामक बिंदु है। इन पाँचों पीरों में रामदेवजी को सर्वाधिक व्यापक जनाधार और सांप्रदायिक सद्भाव के प्रतीक के रूप में विशिष्ट स्थान प्राप्त है।
जन्म परिचय: कुल, माता-पिता एवं जन्म तिथि
रामदेवजी का जन्म तंवर वंशीय राजपूत कुल में हुआ था। परीक्षोपयोगी स्रोतों के अनुसार उनका जन्मस्थान बाड़मेर जिले की शिव तहसील का ऊँडूकासमेर (उंडू कासमेर) गाँव माना जाता है — यह बिंदु विशेष रूप से याद रखने योग्य है क्योंकि विद्यार्थी प्रायः जन्मस्थान और समाधि स्थान (रामदेवरा) को एक-दूसरे से भ्रमित कर देते हैं। स्मरण रखें:
- जन्मस्थान — ऊँडूकासमेर, शिव तहसील, बाड़मेर
- समाधि स्थान — रामदेवरा (रुणीचा), पोकरण तहसील, जैसलमेर
रामदेवजी के पिता का नाम अजमालजी तंवर और माता का नाम मैणादे था। उनका जन्म भाद्रपद शुक्ल द्वितीया, विक्रम संवत 1409 को हुआ, जिसे लोक भाषा में "बाबे री बीज" कहा जाता है। उनका बड़ा भाई वीरमदेव था, जिसे बलराम का अवतार माना जाता है, तथा उनकी बहन का नाम लांछा था। रामदेवजी को अर्जुन का वंशज भी माना जाता है, और हिंदू परंपरा में उन्हें भगवान विष्णु/श्रीकृष्ण का अवतार माना गया है।
रामदेवजी का विवाह अमरकोट (वर्तमान पाकिस्तान) के सोढ़ा राजपूत दलै सिंह की पुत्री नेतलदे (निहालदे) से हुआ था। यह भी ध्यान देने योग्य है कि अमरकोट रियासत वर्तमान में पाकिस्तान के सिंध प्रांत में स्थित है, जो रामदेवजी के प्रभाव क्षेत्र की व्यापकता को दर्शाती है।
गुरु बालीनाथ और आध्यात्मिक साधना
रामदेवजी के गुरु योगी बालीनाथ जी थे। बालीनाथ जी की गुफा मसूरिया पहाड़ी, जोधपुर में स्थित है, जहाँ आज भी उनकी समाधि है। रामदेवजी ने अपने गुरु से योग-साधना ग्रहण की और इसी साधना के बल पर उन्होंने अनेक लोकहितकारी कार्य किए। बाल्यावस्था से ही रामदेवजी में असाधारण आध्यात्मिक शक्तियों के लक्षण दिखाई देने लगे थे, और लोकगाथाओं में उनके अनेक चमत्कारों का वर्णन मिलता है — जैसे रोगियों को स्वस्थ करना और संकट में फँसे लोगों की रक्षा करना।
भैरव राक्षस का वध और पोकरण का पुनर्निर्माण
रामदेवजी के जीवन की सबसे प्रसिद्ध घटना भैरव नामक तांत्रिक राक्षस का वध है। कहा जाता है कि उस समय पोकरण क्षेत्र में भैरव नामक राक्षस का आतंक फैला हुआ था, जिससे आम जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया था। रामदेवजी ने अपनी योग-शक्ति से इस राक्षस का वध कर क्षेत्र की जनता को भय से मुक्ति दिलाई। इसके पश्चात उन्होंने उजड़ चुके पोकरण कस्बे को पुनः बसाया।
एक अन्य परंपरा के अनुसार रामदेवजी को समकालीन शासक मल्लीनाथजी ने पोकरण का क्षेत्र प्रदान किया था। बाद में रामदेवजी ने यह क्षेत्र अपनी भतीजी के विवाह में दहेज स्वरूप दे दिया। पोकरण से लगभग आठ मील उत्तर में जो गाँव बसा, वही आगे चलकर रामदेवरा के नाम से प्रसिद्ध हुआ, और यहीं उन्होंने रामसरोवर नामक जलाशय का भी निर्माण करवाया।
सामाजिक सुधारक के रूप में रामदेवजी
रामदेवजी केवल एक चमत्कारी संत ही नहीं, बल्कि एक दूरदर्शी समाज सुधारक भी थे। उनके प्रमुख सामाजिक योगदान इस प्रकार हैं:
- उन्होंने समाज में व्याप्त छुआछूत और ऊँच-नीच जैसी कुरीतियों का घोर विरोध किया।
- उन्होंने मूर्तिपूजा, तीर्थयात्रा और जातिव्यवस्था के आडंबरपूर्ण रूपों की आलोचना की और गुरु की महत्ता तथा कर्मों की शुद्धता पर बल दिया।
- उनके अनुसार मनुष्य का भाग्य उसके कर्मों से ही निर्धारित होता है।
- उन्होंने पश्चिमी भारत में हो रहे बलपूर्वक धर्म-परिवर्तन को रोकने में प्रभावी भूमिका निभाई।
- उन्होंने मेघवाल जाति की डालीबाई को अपनी धर्म-बहन के रूप में स्वीकार कर सामाजिक समानता का संदेश दिया।
इतिहासकार इस बात को रेखांकित करते हैं कि यूरोप में समता और बंधुत्व की क्रांति से सदियों पहले ही रामदेवजी ने राजस्थान के समाज को यह संदेश दे दिया था। यही कारण है कि उन्हें "साम्प्रदायिक सद्भाव के लोकदेवता" के रूप में जाना जाता है।
धर्म-बहन डालीबाई
रामदेवजी की धर्म-बहन डालीबाई मेघवाल जाति से थीं। जातिगत भेदभाव के विरुद्ध रामदेवजी के व्यावहारिक संदेश का यह सबसे बड़ा प्रमाण माना जाता है। रामदेवरा में स्थित "डालीबाई कंगन" नामक स्थान की मान्यता है कि इससे निकलने पर व्यक्ति समस्त रोगों से मुक्त हो जाता है। परंपरा के अनुसार डालीबाई ने रामदेवजी से एक दिन पूर्व ही समाधि ले ली थी। मेघवाल समुदाय के भक्तों को "रिखिया" कहा जाता है, जो आज भी रामदेवजी की परंपरा के प्रमुख वाहक माने जाते हैं।
कामड़िया पंथ की स्थापना
रामदेवजी ने अपने अनुयायियों के लिए कामड़िया पंथ (कामड़ पंथ) की स्थापना की। यह पंथ जातिगत भेदभाव से मुक्त होकर समता और भक्ति के सिद्धांतों पर आधारित है। इस पंथ से जुड़े प्रमुख तथ्य:
- रामदेवजी की फड़ का वाचन कामड़ जाति के भोपा द्वारा "रावणहत्था" नामक वाद्ययंत्र के साथ किया जाता है।
- कामड़िया पंथ की महिलाएँ रामदेवजी के मेले में प्रसिद्ध तेरहताली नृत्य प्रस्तुत करती हैं।
- रामदेवजी को एकमात्र ऐसा लोकदेवता माना जाता है जो स्वयं कवि भी थे — उनकी रचनाओं को "चौबीस वाणियाँ" कहा जाता है।
तेरहताली नृत्य
रामदेवरा मेले का सबसे बड़ा आकर्षण तेरहताली नृत्य है, जो कामड़ जाति की महिलाओं द्वारा प्रस्तुत किया जाता है। इस नृत्य की विशेषताएँ:
- यह राजस्थान का एकमात्र ऐसा लोकनृत्य है जो बैठकर किया जाता है।
- नृत्यांगना के शरीर पर 13 मंजीरे बाँधे जाते हैं, इसी कारण इसे "तेरहताली" कहा जाता है।
- इस नृत्य की सर्वाधिक प्रसिद्ध नृत्यांगना मांगीबाई (उदयपुर) मानी जाती हैं।
समाधि, रामदेवरा और मेला
रामदेवजी ने विक्रम संवत 1515 (सन् 1458) में भाद्रपद शुक्ल एकादशी को रामदेवरा में स्थित रामसरोवर के तट पर जीवित समाधि ली थी। यही स्थान आज "रुणीचा" के नाम से प्रसिद्ध है और इसे रामदेवजी का प्रमुख समाधि स्थल माना जाता है।
रामदेवरा में स्थित मुख्य मंदिर का निर्माण महाराजा गंगासिंह ने करवाया था। प्रतिवर्ष भाद्रपद शुक्ल द्वितीया से एकादशी तक यहाँ विशाल मेला आयोजित होता है, जिसे "मारवाड़ का कुंभ" कहा जाता है। मेले की प्रमुख विशेषताएँ:
- मेले के दौरान रात्रि जागरण किया जाता है, जिसे लोकभाषा में "जम्मा (जम्प)" कहा जाता है।
- रामदेवजी के मंदिरों को "देवरा" कहा जाता है, जिन पर उनकी ध्वजा फहराई जाती है, जिसे "नेजा" कहते हैं।
- यह ध्वजा प्रायः श्वेत रंग की अथवा पाँच रंगों की होती है, जिस पर रामदेवजी के लाल रंग के चरण-चिह्न अंकित होते हैं।
- रामदेवजी के तीर्थयात्रियों को "जातरू" कहा जाता है।
- भक्तगण रामदेवजी को श्रद्धास्वरूप कपड़े से बना घोड़ा चढ़ाते हैं, क्योंकि उनके वाहन का नाम "लीला (नीला घोड़ा)" था।
- रामदेवजी के प्रतीक चिह्न को "पगल्ये" (चरण चिह्न) कहा जाता है, जिसकी पूजा की जाती है।
प्रमुख मंदिर
रामदेवजी की आराधना केवल राजस्थान तक सीमित नहीं है, अपितु निम्न स्थानों पर भी उनके प्रसिद्ध मंदिर स्थित हैं:
राजस्थान की लोक आस्था और सांप्रदायिक सद्भाव की परंपरा में जिन देवताओं का नाम
| मंदिर स्थल | जिला/राज्य |
|---|---|
| रामदेवरा (रुणीचा) — मुख्य समाधि स्थल | पोकरण तहसील, जैसलमेर |
| खुण्डियास (राजस्थान का "छोटा रामदेवरा") | अजमेर |
| मसूरिया | जोधपुर |
| सुरताखेड़ा | चित्तौड़गढ़ |
| बिराठिया | पाली |
| छोटा रामदेवरा | गुजरात |
रामदेवजी: विभिन्न नामों से पहचान
रामदेवजी को विभिन्न समुदायों में अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है, जो परीक्षा में प्रायः पूछे जाते हैं:
- रामसा पीर — मुस्लिम समुदाय द्वारा प्रयुक्त नाम
- रुणीचा रा धणी — रुणीचा के स्वामी के अर्थ में
- पीरों के पीर
- कृष्ण का अवतार — हिंदू मान्यता अनुसार
- साम्प्रदायिक सद्भाव के देवता
लोकसाहित्य और सामाजिक प्रभाव
रामदेवजी से जुड़े लोकसाहित्य में भैरव राक्षस, लखी बंजारा तथा रत्ना राईका जैसे पात्रों का उल्लेख मिलता है, जो उनके जीवन की विभिन्न घटनाओं से संबंधित हैं। उनके जीवन-चरित्र का सबसे बड़ा संदेश यह है कि उन्होंने बिना किसी जाति अथवा धर्म के भेदभाव के, समाज के सभी वर्गों की भलाई के लिए कार्य किया। यही कारण है कि आज भी हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदाय समान श्रद्धा के साथ रामदेवरा की यात्रा करते हैं।
रामदेवजी और अन्य लोकदेवताओं में तुलना
राजस्थान के अध्ययन में विद्यार्थी प्रायः विभिन्न लोकदेवताओं के तथ्यों को आपस में मिला बैठते हैं। इसलिए रामदेवजी को शेष पंचपीरों के साथ तुलनात्मक रूप से समझना अत्यंत उपयोगी रहता है।
पाबूजी को ऊँटों का देवता तथा गौरक्षक देवता माना जाता है, और उनका संबंध कोलू गाँव (फलौदी, जोधपुर) से है। गोगाजी को साँपों के देवता के रूप में पूजा जाता है और उनका प्रमुख केंद्र गोगामेड़ी (हनुमानगढ़) है। मेहाजी मांगलिया गौवंश की रक्षा के लिए बलिदान देने वाले देवता माने जाते हैं। इन सभी की तुलना में रामदेवजी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उनकी पूजा-पद्धति में हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों की समान भागीदारी होती है, जो अन्य किसी लोकदेवता में इस स्तर पर नहीं मिलती। यही कारण है कि उन्हें विशेष रूप से "साम्प्रदायिक सद्भाव का लोकदेवता" कहा जाता है।
इसके अतिरिक्त, रामदेवजी और तेजाजी (जाटों के आराध्य, जन्म खरनाल, नागौर) के मध्य भी अंतर स्पष्ट रहना चाहिए, क्योंकि परीक्षाओं में दोनों के तथ्यों को मिलाकर भ्रामक प्रश्न बनाए जाते हैं — तेजाजी सर्पदंश और कृषि-कार्यों से जुड़े देवता हैं, जबकि रामदेवजी सामाजिक समरसता और योग-साधना से जुड़े देवता हैं।
रामदेवजी की विरासत और वर्तमान प्रासंगिकता
रामदेवजी का प्रभाव आज पाँच सदियों बाद भी उतना ही जीवंत है। रामदेवरा में उनके 21वीं पीढ़ी के वंशज गादीपति के रूप में मंदिर की परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं, जो यह दर्शाता है कि यह आस्था कोई क्षणिक लोक-परंपरा नहीं, बल्कि एक सतत सांस्कृतिक धारा है। रामदेवरा मेले में प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालु — हिंदू और मुस्लिम दोनों — पैदल यात्रा (जातरा) करते हुए पहुँचते हैं, जो भारत में सामाजिक समरसता के सबसे बड़े जीवंत उदाहरणों में से एक है।
समाजशास्त्रीय दृष्टि से देखें तो रामदेवजी की परंपरा तीन स्तरों पर महत्वपूर्ण है:
- जातिगत समरसता — मेघवाल समुदाय की डालीबाई को धर्म-बहन का दर्जा देकर उन्होंने जाति-भेद को व्यावहारिक रूप से चुनौती दी।
- धार्मिक सद्भाव — हिंदू-मुस्लिम दोनों समुदायों में समान श्रद्धा ने उन्हें सांस्कृतिक एकता का प्रतीक बना दिया।
- लोक-साहित्यिक योगदान — कवि के रूप में उनकी चौबीस वाणियाँ आज भी कामड़िया पंथ की मौखिक परंपरा में जीवित हैं, जो राजस्थानी लोक-साहित्य की एक अमूल्य धरोहर हैं।
प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से रामदेवजी का अध्याय इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह राजस्थान GK के "कला एवं संस्कृति" खंड के अंतर्गत लोकदेवता, लोकनृत्य (तेरहताली) और मेले — तीनों उप-विषयों को एक साथ जोड़ता है। अतः इस टॉपिक की गहन तैयारी परीक्षा में बहु-आयामी लाभ देती है।
परीक्षा के लिए त्वरित रिवीजन तालिका
| बिंदु | तथ्य |
|---|---|
| वंश | तंवर वंशीय राजपूत |
| जन्मस्थान | ऊँडूकासमेर, शिव तहसील, बाड़मेर |
| जन्म तिथि | भाद्रपद शुक्ल द्वितीया, वि.सं. 1409 ("बाबे री बीज") |
| पिता | अजमालजी तंवर |
| माता | मैणादे |
| पत्नी | नेतलदे (निहालदे), अमरकोट के दलै सिंह सोढ़ा की पुत्री |
| गुरु | बालीनाथजी (गुफा — मसूरिया पहाड़ी, जोधपुर) |
| धर्म-बहन | डालीबाई (मेघवाल जाति) |
| पंथ स्थापना | कामड़िया पंथ |
| समाधि स्थल | रामदेवरा (रुणीचा), पोकरण, जैसलमेर |
| समाधि तिथि | भाद्रपद शुक्ल एकादशी, वि.सं. 1515 (सन् 1458) |
| मेला | भाद्रपद शुक्ल द्वितीया से एकादशी |
| मेले की उपाधि | "मारवाड़ का कुंभ" |
| प्रसिद्ध नृत्य | तेरहताली (कामड़ जाति की महिलाओं द्वारा) |
| वाहन | नीला घोड़ा — "लीला" |
| ध्वजा | नेजा (श्वेत/पंचरंगी) |
| तीर्थयात्री | जातरू |
| मंदिर | देवरा |
| प्रतीक चिह्न | पगल्ये (चरण चिह्न) |
शिक्षक टिप्पणी (Teacher's Notes)
याद रखने की ट्रिक: जन्मस्थान और समाधिस्थान को भ्रमित न करें — "जन्म बाड़मेर में, समाधि जैसलमेर में" याद रखें।
सामान्य भूल: अनेक विद्यार्थी रुणीचा को जन्मस्थान समझ लेते हैं, जबकि यह वास्तव में समाधि स्थल (रामदेवरा) का ही दूसरा नाम है।
महत्वपूर्ण तुलना बिंदु: पंचपीरों में तेजाजी शामिल नहीं हैं — यह RPSC व RSMSSB परीक्षाओं में बार-बार पूछा गया एक भ्रामक तथ्य है।
संबंधित टॉपिक: तेरहताली नृत्य को घूमर व कालबेलिया जैसे अन्य राजस्थानी लोकनृत्यों के साथ तुलनात्मक रूप से पढ़ें, विशेषतः "बैठकर किया जाने वाला एकमात्र नृत्य" वाला बिंदु अक्सर पूछा जाता है।
PYQ अभ्यास प्रश्न: लोकदेवता रामदेवजी
नीचे रामदेवजी से संबंधित 15+ परीक्षोपयोगी बहुविकल्पीय प्रश्न दिए गए हैं, जो विभिन्न राजस्थान प्रतियोगी परीक्षाओं (RPSC, RSMSSB, पटवारी, ग्राम सेवक, REET, SI आदि) के पूर्व पैटर्न पर आधारित हैं।
प्रश्न 1. रामदेवजी का जन्म किस गाँव में हुआ था? (अ) रामदेवरा (ब) ऊँडूकासमेर (स) पोकरण (द) रुणीचा
उत्तर: (ब) ऊँडूकासमेर व्याख्या: रामदेवजी का जन्म बाड़मेर जिले की शिव तहसील के ऊँडूकासमेर गाँव में हुआ था, जबकि रामदेवरा (रुणीचा) उनका समाधि स्थल है।
प्रश्न 2. रामदेवजी के पिता का नाम क्या था? (अ) दलै सिंह सोढ़ा (ब) बालीनाथ (स) अजमालजी तंवर (द) मल्लीनाथजी
उत्तर: (स) अजमालजी तंवर
प्रश्न 3. रामदेवजी की माता का नाम क्या था? (अ) मैणादे (ब) नेतलदे (स) डालीबाई (द) लांछा
उत्तर: (अ) मैणादे
प्रश्न 4. रामदेवजी के गुरु कौन थे? (अ) मल्लीनाथजी (ब) बालीनाथजी (स) भैरवनाथ (द) अजमालजी
उत्तर: (ब) बालीनाथजी व्याख्या: बालीनाथजी की गुफा जोधपुर के निकट मसूरिया पहाड़ी पर स्थित है।
प्रश्न 5. रामदेवजी की समाधि कहाँ स्थित है? (अ) पोकरण, जैसलमेर (ब) खरनाल, नागौर (स) मसूरिया, जोधपुर (द) अमरकोट
उत्तर: (अ) पोकरण, जैसलमेर (रामदेवरा/रुणीचा)
प्रश्न 6. निम्नलिखित में से कौन राजस्थान के पंचपीरों में शामिल नहीं है? (अ) गोगाजी (ब) पाबूजी (स) तेजाजी (द) हड़बूजी
उत्तर: (स) तेजाजी व्याख्या: पंचपीर हैं — पाबूजी, हड़बूजी, रामदेवजी, मेहाजी मांगलिया और गोगाजी। तेजाजी अत्यंत लोकप्रिय होते हुए भी पंचपीरों में शामिल नहीं हैं।
प्रश्न 7. रामदेवजी की धर्म-बहन का नाम क्या था और वे किस जाति से थीं? (अ) मैणादे, राजपूत (ब) डालीबाई, मेघवाल (स) नेतलदे, सोढ़ा (द) लांछा, तंवर
उत्तर: (ब) डालीबाई, मेघवाल
प्रश्न 8. रामदेवजी द्वारा स्थापित पंथ का नाम क्या है? (अ) निरंजनी पंथ (ब) कामड़िया पंथ (स) दादू पंथ (द) विश्नोई पंथ
उत्तर: (ब) कामड़िया पंथ
प्रश्न 9. रामदेवरा में प्रतिवर्ष लगने वाला मेला किस उपाधि से जाना जाता है? (अ) मेवाड़ का कुंभ (ब) मारवाड़ का कुंभ (स) थार का कुंभ (द) पश्चिमी कुंभ
उत्तर: (ब) मारवाड़ का कुंभ
प्रश्न 10. रामदेवजी के मेले का सबसे प्रसिद्ध नृत्य कौन-सा है? (अ) घूमर (ब) कालबेलिया (स) तेरहताली (द) गैर
उत्तर: (स) तेरहताली व्याख्या: यह राजस्थान का एकमात्र बैठकर किया जाने वाला नृत्य है, जिसमें 13 मंजीरे बाँधे जाते हैं।
प्रश्न 11. तेरहताली नृत्य की प्रसिद्ध नृत्यांगना कौन थीं? (अ) डालीबाई (ब) मांगीबाई (स) मैणादे (द) नेतलदे
उत्तर: (ब) मांगीबाई (उदयपुर)
प्रश्न 12. रामदेवजी की पत्नी नेतलदे किस रियासत से संबंधित थीं? (अ) जैसलमेर (ब) अमरकोट (स) पोकरण (द) बाड़मेर
उत्तर: (ब) अमरकोट व्याख्या: अमरकोट वर्तमान में पाकिस्तान में स्थित है। नेतलदे वहाँ के सोढ़ा राजपूत दलै सिंह की पुत्री थीं।
प्रश्न 13. रामदेवजी के मंदिरों को क्या कहा जाता है? (अ) मठ (ब) देवरा (स) थान (द) गादी
उत्तर: (ब) देवरा
प्रश्न 14. रामदेवजी की ध्वजा को क्या कहा जाता है? (अ) निशान (ब) पताका (स) नेजा (द) झंडी
उत्तर: (स) नेजा
प्रश्न 15. रामदेवजी के तीर्थयात्रियों को किस नाम से जाना जाता है? (अ) कावड़िया (ब) जातरू (स) रिखिया (द) भोपा
उत्तर: (ब) जातरू
प्रश्न 16. रामदेवजी को मुस्लिम समुदाय किस नाम से पूजता है? (अ) पीर बाबा (ब) रामसा पीर (स) गाजी पीर (द) सतपीर
उत्तर: (ब) रामसा पीर
प्रश्न 17. रामदेवजी को किस राक्षस के वध के लिए जाना जाता है? (अ) महिषासुर (ब) भस्मासुर (स) भैरव राक्षस (द) रक्तबीज
उत्तर: (स) भैरव राक्षस
प्रश्न 18. रामदेवजी का वाहन कौन-सा था? (अ) श्वेत घोड़ा (ब) नीला घोड़ा (लीला) (स) हाथी (द) ऊँट
उत्तर: (ब) नीला घोड़ा (लीला)
प्रश्न 19. रामदेवजी का समाधि दिवस किस तिथि को मनाया जाता है? (अ) भाद्रपद शुक्ल द्वितीया (ब) भाद्रपद शुक्ल एकादशी (स) भाद्रपद कृष्ण अमावस्या (द) आश्विन शुक्ल दशमी
उत्तर: (ब) भाद्रपद शुक्ल एकादशी
प्रश्न 20. गुजरात में स्थित रामदेवजी के प्रसिद्ध मंदिर को क्या कहा जाता है? (अ) बड़ा रामदेवरा (ब) छोटा रामदेवरा (स) नया रामदेवरा (द) गुजरात रामदेवरा
उत्तर: (ब) छोटा रामदेवरा
महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)
रामदेवजी पंचपीरों में शामिल एक प्रमुख लोकदेवता हैं जिनका संबंध बाड़मेर-जैसलमेर क्षेत्र से है, जबकि तेजाजी जाटों के आराध्य देव माने जाते हैं जिनका जन्म नागौर के खरनाल गाँव में हुआ था। तेजाजी को पंचपीरों में शामिल नहीं किया जाता।
रामदेवजी का जन्म बाड़मेर के ऊँडूकासमेर गाँव में हुआ था, परंतु उन्होंने अपने जीवन का बड़ा भाग पोकरण क्षेत्र में बिताया और रामदेवरा (रुणीचा) में ही जीवित समाधि ली, इसीलिए यह स्थान उनका प्रमुख पूजा-केंद्र बन गया।
यह राजस्थान का एकमात्र ऐसा लोकनृत्य है जो बैठकर प्रस्तुत किया जाता है, तथा इसमें नृत्यांगना के शरीर पर 13 मंजीरे बाँधे जाते हैं।