राजस्थान का शास्त्रीय संगीत: घराने एवं संगीत ग्रंथ — RAS/CET
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सुयोग AI गुरु
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संक्षिप्त उत्तर: राजस्थान केवल लोक संगीत ही नहीं, शास्त्रीय संगीत का भी बड़ा केंद्र रहा है। ख्याल गायकी का जयपुर-अतरौली घराना उस्ताद अल्लादिया खाँ से जुड़ा है, जिसकी परंपरा में केसरबाई केरकर, मोघूबाई कुर्डीकर, किशोरी अमोणकर और मल्लिकार्जुन मंसूर जैसे कलाकार आए। ध्रुपद का डागर घराना 19वीं सदी में जयपुर दरबार के बहराम खाँ डागर से पहचाना जाता है, जबकि मेवाती घराना घग्गे नज़ीर खाँ (जोधपुर दरबार से संबद्ध) से शुरू होकर पं. जसराज तक पहुँचा। राजस्थान GK पुस्तकों में सेनिया घराना (तानसेन के वंशज सूरतसेन, जयपुर) भी गिना जाता है। संगीत ग्रंथों में महाराणा कुंभा — संगीतराज, संगीत मीमांसा, सूड़ प्रबंध; पुंडरीक विट्ठल (आमेर के मानसिंह-माधोसिंह का आश्रय) — रागमाला, रागमंजरी, नर्तन निर्णय, सद्राग चंद्रोदय; भावभट्ट (बीकानेर के अनूपसिंह) — अनूप संगीत रत्नाकर, अनूप संगीत विलास, अनूपांकुश; और जयपुर के सवाई प्रतापसिंह — राधा गोविंद संगीत सार व गंधर्व बाईसी सबसे अधिक पूछे जाते हैं। ध्यान रहे — संगीत रत्नाकर (शारंगदेव) राजस्थान का ग्रंथ नहीं है।
संक्षिप्त उत्तर
विषय | मुख्य तथ्य (परीक्षा-उत्तर) |
|---|---|
जयपुर-अतरौली घराना | ख्याल गायकी; प्रवर्तक उस्ताद अल्लादिया खाँ |
डागर घराना | ध्रुपद गायकी; जयपुर दरबार के बहराम खाँ डागर |
मेवाती घराना | ख्याल; घग्गे नज़ीर खाँ; प्रसिद्ध गायक पं. जसराज |
सेनिया घराना | तानसेन की वंश-परंपरा; GK पुस्तकों में सूरतसेन, जयपुर |
जयपुर कथक घराना | कथक नृत्य; प्रवर्तक भानुजी |
महाराणा कुंभा | संगीतराज, संगीत मीमांसा, सूड़ प्रबंध, रसिकप्रिया (गीतगोविंद टीका) |
पुंडरीक विट्ठल | रागमाला, रागमंजरी, नर्तन निर्णय, सद्राग चंद्रोदय |
भावभट्ट | अनूप संगीत रत्नाकर, अनूप संगीत विलास, अनूपांकुश — बीकानेर के अनूपसिंह |
सवाई प्रतापसिंह (जयपुर) | राधा गोविंद संगीत सार; गंधर्व बाईसी; उपनाम ब्रजनिधि |
पं. विश्वमोहन भट्ट (जयपुर) | मोहन वीणा; ग्रैमी पुरस्कार (1994) |
राजस्थान संगीत नाटक अकादमी | जोधपुर (1957) |
2. सिलेबस में यह टॉपिक क्यों महत्वपूर्ण है?
RAS प्रारंभिक व मुख्य परीक्षा के "राजस्थान की कला एवं संस्कृति" खंड में लोक संगीत के साथ-साथ शास्त्रीय संगीत, संगीत ग्रंथ और राजदरबारी संरक्षण से जुड़े प्रश्न आते हैं। CET, पटवारी, VDO और REET जैसी परीक्षाओं में प्रश्न प्रायः सीधे मिलान के होते हैं — "संगीतराज के रचयिता कौन?", "अनूप संगीत रत्नाकर किसकी रचना है?", "मोहन वीणा किससे जुड़ी है?"। RAS मुख्य परीक्षा में "राजपूत शासकों का संगीत को संरक्षण" या "राजस्थान के संगीत घराने" पर छोटे उत्तर लिखने पड़ सकते हैं।
इस नोट का फोकस शास्त्रीय (मार्गी) संगीत है — घराने, ग्रंथ, दरबारी संरक्षक और आधुनिक शास्त्रीय कलाकार। लोकगीत, लोक गायन शैलियाँ और लोक वाद्य अलग नोट्स में विस्तार से दिए गए हैं (खंड 19 देखें)।
सबसे ज़्यादा पूछा जाने वाला भाग: ग्रंथ → लेखक → संरक्षक शासक का मिलान।
दूसरा भाग: घराना → प्रवर्तक → गायन शैली (ख्याल/ध्रुपद)।
तीसरा भाग: आधुनिक कलाकार → वाद्य → पुरस्कार।
ट्रैप: संगीत रत्नाकर, संगीत पारिजात, संगीत दर्पण जैसे गैर-राजस्थानी ग्रंथ विकल्पों में।
3. पृष्ठभूमि: शास्त्रीय संगीत, घराना और दरबारी संरक्षण
3.1 शास्त्रीय (मार्गी) बनाम लोक (देशी) संगीत
भारतीय संगीत परंपरा में दो धाराएँ मानी जाती हैं — मार्गी (शास्त्र-नियमों पर आधारित, राग-ताल की व्यवस्थित पद्धति) और देशी (क्षेत्रीय, जनजीवन से उपजा लोक संगीत)। राजस्थान में दोनों धाराएँ साथ-साथ फली-फूलीं: एक ओर लंगा-मांगणियार, भोपे और लोकगायक; दूसरी ओर राजदरबारों में ध्रुपद, ख्याल, बीन और सितार के उस्ताद।
3.2 घराना क्या है?
घराना हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की वह गुरु-शिष्य परंपरा है जिसकी गायकी या वादन की अपनी विशिष्ट शैली होती है — स्वर लगाने का ढंग, तान का प्रकार, राग-विस्तार की पद्धति और बंदिशों का भंडार। घराने का नाम सामान्यतः उस स्थान से पड़ता है जहाँ उसके प्रवर्तक या प्रमुख कलाकार रहे — जैसे जयपुर, अतरौली, ग्वालियर, आगरा, किराना। ध्यान दें: घराने का नाम कलाकार के जन्मस्थान का प्रमाण नहीं होता — जयपुर-अतरौली घराने के अधिकांश प्रसिद्ध कलाकार महाराष्ट्र-कर्नाटक के थे।
3.3 ध्रुपद और ख्याल
आधार | ध्रुपद | ख्याल |
|---|---|---|
प्रकृति | प्राचीन, गंभीर, शुद्ध व धीमा विस्तार | अपेक्षाकृत नवीन, कल्पनाशील व अलंकारिक |
आलाप | नोम-तोम आलाप | आकार में आलाप, तानें, बोल-तानें |
संगत वाद्य | पखावज, रुद्र वीणा | तबला, हारमोनियम, सारंगी |
राजस्थान से जुड़ा घराना | डागर घराना; खंडार वाणी | जयपुर-अतरौली, मेवाती |
ध्रुपद की चार वाणियाँ मानी जाती हैं — गौड़ी (गोबरहार), डागुर, खंडार और नौहार। इनमें खंडार वाणी का नाम परंपरागत रूप से खंडार (सवाई माधोपुर) से जोड़ा जाता है, यद्यपि इस पर संगीत-इतिहासकारों में पूर्ण सहमति नहीं है।
3.4 दरबारी संरक्षण क्यों महत्वपूर्ण था?
मध्यकाल में राजस्थान की रियासतें — मेवाड़, आमेर-जयपुर, बीकानेर, जोधपुर, अलवर, उदयपुर — कलाकारों को वेतन, जागीर और सम्मान देती थीं। शासक स्वयं भी संगीत-शास्त्र के ज्ञाता थे और ग्रंथ लिखते या लिखवाते थे। मुगल दरबार से संपर्क के कारण (विशेषकर कछवाहा और राठौड़ शासकों का) अनेक संगीतज्ञ राजस्थान आए। 19वीं-20वीं सदी में जब मुगल दरबार कमजोर हुआ, तब जयपुर, अलवर, उदयपुर जैसे दरबार उस्तादों के प्रमुख आश्रय बने।
4. जयपुर-अतरौली घराना (ख्याल गायकी)
जयपुर-अतरौली घराना ख्याल गायकी का सबसे प्रसिद्ध घराना है जिसका नाम राजस्थान से जुड़ा है। इसके प्रवर्तक उस्ताद अल्लादिया खाँ (लगभग 1855–1946) माने जाते हैं। उनका परिवार ध्रुपद-परंपरा से था और प्रारंभिक जीवन जयपुर-टोंक क्षेत्र से जुड़ा रहा (अधिकांश स्रोत उनका जन्म उनियारा के आसपास बताते हैं)। "अतरौली" उत्तर प्रदेश (अलीगढ़ क्षेत्र) का कस्बा है जहाँ से उनके पूर्वजों का संबंध बताया जाता है — इसलिए घराने का नाम दोनों स्थानों को जोड़कर पड़ा।
4.1 गायकी की विशेषताएँ
अप्रचलित (दुर्लभ) व जोड़ राग गाने के लिए प्रसिद्ध — जैसे दो रागों के मेल वाले राग।
जटिल, घुमावदार तानें और लयकारी पर विशेष ध्यान; आकार में गायकी।
बंदिश के शब्दों से अधिक स्वर-संरचना और राग-शुद्धता पर बल।
खुली आवाज़ और नियंत्रित साँस — लंबे स्वर-वाक्य।
4.2 प्रमुख कलाकार (परंपरा)
कलाकार | संबंध (सामान्य रूप से स्वीकृत) |
|---|---|
उस्ताद अल्लादिया खाँ | प्रवर्तक; बाद में कोल्हापुर व मुंबई में सक्रिय |
भुर्जी खाँ, मंजी खाँ | अल्लादिया खाँ के पुत्र; आगे शिष्य-परंपरा बढ़ाई |
केसरबाई केरकर | अल्लादिया खाँ की प्रमुख शिष्या; "सुरश्री" के रूप में प्रसिद्ध |
मोघूबाई कुर्डीकर | अल्लादिया खाँ की शिष्या; किशोरी अमोणकर की माता व गुरु |
मल्लिकार्जुन मंसूर | मंजी खाँ व भुर्जी खाँ से शिक्षा; कर्नाटक के महान गायक |
किशोरी अमोणकर | माता मोघूबाई से शिक्षा; जयपुर-अतरौली परंपरा की प्रमुख गायिका |
नोट: गुरु-शिष्य संबंधों का विवरण स्रोतों में थोड़ा भिन्न मिलता है (कौन किससे कितने समय सीखा)। परीक्षा के लिए इतना पर्याप्त है कि ये सभी कलाकार जयपुर-अतरौली घराने से जुड़े हैं और इसके प्रवर्तक अल्लादिया खाँ हैं।
ट्रिक: "अल्ला-केसर-मोघू-किशोरी-मंसूर" — जयपुर-अतरौली की गायकी श्रृंखला।
5. डागर घराना और ध्रुपद परंपरा
डागर घराना ध्रुपद गायकी का सबसे प्रसिद्ध परिवार है, जो डागुर वाणी की परंपरा का वाहक माना जाता है। इसकी आधुनिक वंशावली सामान्यतः उस्ताद बहराम खाँ डागर से गिनी जाती है, जो 19वीं सदी में जयपुर दरबार (सवाई रामसिंह द्वितीय के समय) से जुड़े थे। इसी कारण राजस्थान GK में डागर घराने को जयपुर से जोड़ा जाता है।
5.1 विशेषताएँ
ध्रुपद गायकी — नोम-तोम आलाप का धीमा, विस्तृत और गंभीर विकास।
संगत में पखावज; वादन में रुद्र वीणा की परंपरा भी इसी परिवार से जुड़ी।
परिवार की कई पीढ़ियाँ जयपुर, उदयपुर (मेवाड़) और अलवर जैसे राजस्थानी दरबारों में रहीं।
5.2 प्रमुख नाम
कलाकार | पहचान |
|---|---|
उस्ताद बहराम खाँ डागर | जयपुर दरबार; आधुनिक डागर वंशावली के मूल पुरुष |
उस्ताद ज़ाकिरुद्दीन खाँ व अल्लाबंदे खाँ | बहराम खाँ की परंपरा; राजस्थानी दरबारों से संबद्ध ध्रुपद गायक |
नासिर मोइनुद्दीन व नासिर अमीनुद्दीन डागर | "वरिष्ठ डागर बंधु" के रूप में प्रसिद्ध ध्रुपद जोड़ी |
ज़िया मोहिउद्दीन डागर | रुद्र वीणा वादक; उदयपुर से संबंध |
सावधानी: डागर परिवार के सदस्यों के दरबार-संबंध (कौन किस दरबार में) पुस्तकों में अलग-अलग दिए मिलते हैं; परीक्षा में मुख्य प्रश्न "डागर घराना — ध्रुपद — बहराम खाँ — जयपुर" पर ही आता है।
5.3 हवेली संगीत और नाथद्वारा
नाथद्वारा (राजसमंद) के श्रीनाथजी मंदिर में पुष्टिमार्गीय हवेली संगीत की परंपरा है, जो ध्रुपद-धमार शैली पर आधारित कीर्तन है और जिसमें अष्टछाप कवियों के पद गाए जाते हैं। इसी परिवेश में नाथद्वारा की पखावज परंपरा विकसित हुई; पखावज वादक पं. पुरुषोत्तम दास इसी परंपरा से जुड़े प्रसिद्ध नाम हैं।
6. मेवाती घराना
मेवाती घराना ख्याल गायकी का घराना है जिसके प्रवर्तक उस्ताद घग्गे नज़ीर खाँ माने जाते हैं। राजस्थान GK पुस्तकों में उन्हें जोधपुर दरबार से संबद्ध बताया जाता है। "मेवाती" नाम मेवात क्षेत्र (अलवर-भरतपुर और हरियाणा-उत्तर प्रदेश के सटे भाग) से जुड़ा है।
गायकी में भक्ति-भाव, मधुर स्वर-लगाव और शब्दों की स्पष्टता पर बल।
इस घराने के सबसे प्रसिद्ध गायक पं. जसराज (1930–2020) हुए, जिनके पिता पं. मोतीराम और बड़े भाई पं. मणिराम भी इसी परंपरा के गायक थे।
पं. जसराज ने जसरंगी नामक जुगलबंदी-शैली (पुरुष व स्त्री गायक का अलग-अलग राग में एक साथ गायन) विकसित की और हवेली संगीत को मंच पर लोकप्रिय बनाया।
ट्रिक: "मेवाती = घग्गे नज़ीर → जसराज" — मेवात से जस (यश)।
सावधानी: पं. जसराज का जन्म हरियाणा में हुआ था — उन्हें "राजस्थान में जन्मे कलाकार" के रूप में न पढ़ें; उनका राजस्थान से संबंध घराने के माध्यम से है।
7. सेनिया घराना, बीनकार परंपरा और जयपुर कथक घराना
7.1 सेनिया घराना
सेनिया शब्द तानसेन से बना है — तानसेन के वंशज और उनकी शिष्य-परंपरा सेनिया कहलाती है। यह मुख्यतः वादन (बीन, रबाब, सितार, सुरबहार) की परंपरा मानी जाती है। राजस्थान GK पुस्तकों में "सेनिया घराना — प्रवर्तक सूरतसेन (तानसेन के पुत्र), केंद्र जयपुर" लिखा मिलता है। संगीत-इतिहास में सेनिया परंपरा की कई शाखाएँ (जैसे रामपुर) हैं, इसलिए यदि प्रश्न राजस्थान-संदर्भ में हो तो जयपुर उत्तर चुनें।
7.2 जयपुर बीनकार परंपरा
जयपुर और अलवर दरबार रुद्र वीणा (बीन) वादकों के आश्रय-स्थल रहे। इसी परंपरा के आधुनिक प्रतिनिधि उस्ताद असद अली खाँ (1937–2011) थे — अलवर में जन्मे प्रसिद्ध रुद्र वीणा वादक, जिनका परिवार पीढ़ियों तक राजस्थानी दरबारों में रहा। उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।
7.3 जयपुर कथक घराना (नृत्य)
शास्त्रीय नृत्य कथक के तीन प्रमुख घराने हैं — जयपुर, लखनऊ और बनारस। जयपुर घराने के प्रवर्तक भानुजी माने जाते हैं। इस घराने में पैरों की तैयारी, तत्कार, लयकारी और पखावज के कठिन बोल पर बल रहता है, जबकि लखनऊ घराना भाव और नज़ाकत के लिए जाना जाता है। जयपुर में जयपुर कथक केंद्र कथक प्रशिक्षण की राज्य-स्तरीय संस्था है।
ट्रिक: जयपुर कथक = "भानु की ताल" (भानुजी + तत्कार); लखनऊ = "नवाबी नज़ाकत"।
8. घरानों की तुलना तालिका
घराना | विधा | प्रवर्तक / मूल पुरुष | राजस्थान से संबंध | प्रसिद्ध नाम |
|---|---|---|---|---|
जयपुर-अतरौली | ख्याल गायन | उस्ताद अल्लादिया खाँ | जयपुर-उनियारा क्षेत्र से प्रवर्तक का संबंध | केसरबाई केरकर, मोघूबाई, किशोरी अमोणकर, मल्लिकार्जुन मंसूर |
डागर | ध्रुपद गायन, रुद्र वीणा | बहराम खाँ डागर (आधुनिक वंशावली) | जयपुर दरबार; उदयपुर-अलवर से भी संबंध | डागर बंधु, ज़िया मोहिउद्दीन डागर |
मेवाती | ख्याल गायन | घग्गे नज़ीर खाँ | जोधपुर दरबार (GK पुस्तकों के अनुसार); मेवात क्षेत्र | पं. मोतीराम, पं. मणिराम, पं. जसराज |
सेनिया | वादन (बीन, रबाब, सितार) | सूरतसेन (तानसेन के पुत्र) — GK पुस्तकों में | जयपुर | तानसेन-वंश परंपरा |
जयपुर बीनकार परंपरा | रुद्र वीणा वादन | दरबारी बीनकार परिवार | जयपुर व अलवर | उस्ताद असद अली खाँ |
जयपुर कथक | शास्त्रीय नृत्य | भानुजी | जयपुर | तत्कार व लयकारी प्रधान |
9. महाराणा कुंभा — "अभिनव भरताचार्य"
मेवाड़ के महाराणा कुंभा (1433–1468) स्थापत्य के साथ-साथ संगीत के भी महान ज्ञाता और ग्रंथकार थे। उन्हें "अभिनव भरताचार्य" (नया भरत मुनि) की उपाधि दी जाती है। राजस्थान GK पुस्तकों में उनके संगीत गुरु सारंग व्यास बताए जाते हैं। वे वीणा-वादन में भी निपुण माने जाते हैं।
9.1 कुंभा की संगीत रचनाएँ
रचना | विषय |
|---|---|
संगीतराज | कुंभा का सबसे विशाल संगीत ग्रंथ; पाँच "रत्नकोश" (उल्लास) में विभाजित — पाठ्य, गीत, वाद्य, नृत्य और रस |
नृत्य रत्नकोश | संगीतराज का नृत्य-संबंधी भाग (कुछ पुस्तकों में अलग ग्रंथ के रूप में गिनाया जाता है) |
संगीत मीमांसा | संगीत-शास्त्र का विवेचन |
सूड़ प्रबंध | प्रबंध-गायन (सूड़ = प्राचीन प्रबंध गीतों का वर्ग) पर रचना |
रसिकप्रिया | जयदेव के गीतगोविंद की टीका |
संगीत रत्नाकर की टीका | शारंगदेव के संगीत रत्नाकर पर कुंभा की टीका |
स्रोत-भिन्नता: कुछ पुस्तकें "कामराज रतिसार" आदि अन्य ग्रंथ भी कुंभा के नाम से जोड़ती हैं; पर संगीत-प्रश्नों में मुख्य उत्तर संगीतराज, संगीत मीमांसा, सूड़ प्रबंध, रसिकप्रिया ही हैं।
रमाबाई: कुंभा की पुत्री रमाबाई को संगीत-शास्त्र की ज्ञाता बताया जाता है; उन्हें "वागीश्वरी" कहा गया।
कुंभा के युद्ध, विजय स्तंभ और स्थापत्य के लिए देखें — राणा कुंभा — विजय स्तंभ व कुंभलगढ़।
ट्रिक: कुंभा का "राज-मीमांसा-सूड़-रसिक" — संगीतराज, संगीत मीमांसा, सूड़ प्रबंध, रसिकप्रिया।
10. पुंडरीक विट्ठल — आमेर दरबार के संगीताचार्य
पुंडरीक विट्ठल 16वीं सदी के प्रसिद्ध संगीत-शास्त्री थे। वे मूलतः कर्नाटक क्षेत्र के थे और उत्तर तथा दक्षिण भारतीय संगीत-पद्धतियों के जानकार थे। पहले वे खानदेश के फारूकी शासक बुरहान खाँ के आश्रय में रहे, फिर उत्तर भारत आए। राजस्थान के संदर्भ में वे आमेर के कछवाहा शासकों — मानसिंह और माधोसिंह के आश्रय में बताए जाते हैं; उनका संबंध अकबर के दरबार से भी जोड़ा जाता है।
10.1 पुंडरीक विट्ठल के ग्रंथ
ग्रंथ | विशेषता |
|---|---|
सद्राग चंद्रोदय | राग-वर्गीकरण पर ग्रंथ; खानदेश (बुरहान खाँ) के आश्रय में रचित माना जाता है |
रागमाला | रागों का वर्णन — राग-रागिनी पद्धति |
रागमंजरी | रागों का वर्गीकरण व लक्षण |
नर्तन निर्णय | नृत्य-शास्त्र पर ग्रंथ; अकबर के समय से जोड़ा जाता है |
परीक्षा-उत्तर: राजस्थान GK में चारों ग्रंथ पुंडरीक विट्ठल के नाम से एक साथ पूछे जाते हैं और संरक्षक के रूप में आमेर के मानसिंह/माधोसिंह का नाम आता है। कौन-सा ग्रंथ किस दरबार में लिखा गया, इस पर इतिहासकारों के मत अलग हैं।
ट्रिक: "पुंडरीक की माला-मंजरी नर्तन में चंद्र-उदय" — रागमाला, रागमंजरी, नर्तन निर्णय, सद्राग चंद्रोदय।
कछवाहा शासकों का क्रम देखें — जयपुर शासक Timeline — आमेर से विलय।
11. भावभट्ट और बीकानेर के महाराजा अनूपसिंह
बीकानेर के महाराजा अनूपसिंह (शासन 1669–1698) विद्वान और कला-प्रेमी शासक थे; दक्कन अभियानों के दौरान उन्होंने अनेक दुर्लभ पांडुलिपियाँ एकत्र कीं, जो आज बीकानेर के अनूप संस्कृत पुस्तकालय का आधार हैं। उनके दरबारी संगीतज्ञ भावभट्ट थे, जिनके पिता जनार्दन भट्ट शाहजहाँ के दरबार के संगीतज्ञ बताए जाते हैं।
11.1 भावभट्ट के ग्रंथ
ग्रंथ | टिप्पणी |
|---|---|
अनूप संगीत रत्नाकर | संरक्षक अनूपसिंह के नाम पर; संगीत का विस्तृत विवेचन |
अनूप संगीत विलास | राग-ताल-प्रबंध संबंधी ग्रंथ |
अनूपांकुश (अनूप संगीतांकुश) | संगीत-शास्त्रीय ग्रंथ |
नष्टोद्दिष्ट प्रबोधक ध्रौपद टीका | ध्रुपद संबंधी (GK पुस्तकों में उल्लेख) |
मुरली प्रकाश | वंशी/मुरली संबंधी (GK पुस्तकों में उल्लेख) |
ट्रिक: जिस ग्रंथ के नाम में "अनूप" — वह भावभट्ट का और संरक्षक बीकानेर के अनूपसिंह।
बीकानेर के मुगलकालीन शासकों के लिए देखें — बीकानेर के मुगलकालीन शासक (रायसिंह, करणसिंह, अनूपसिंह)।
12. सवाई प्रतापसिंह, राधा गोविंद संगीत सार और गुणीजनखाना
जयपुर के सवाई प्रतापसिंह (शासन 1778–1803) — जिन्होंने हवा महल (1799) बनवाया — स्वयं कवि थे और "ब्रजनिधि" उपनाम से कृष्ण-भक्ति काव्य लिखते थे। संगीत के क्षेत्र में उनका सबसे बड़ा योगदान दो बातों में है:
राधा गोविंद संगीत सार — उन्होंने देश के संगीतज्ञों का सम्मेलन बुलाकर यह विशाल संगीत ग्रंथ तैयार करवाया। इसकी रचना/संपादन का श्रेय मुख्यतः देवर्षि ब्रजपाल भट्ट (और उनके सहयोगी विद्वानों) को दिया जाता है। प्रश्न में "किसके काल में/किसके संरक्षण में" पूछा जाए तो उत्तर सवाई प्रतापसिंह है।
गंधर्व बाईसी — उनके दरबार में 22 संगीतज्ञों/कलाकारों की मंडली, जिसे गंधर्व बाईसी कहा गया।
12.1 गुणीजनखाना
गुणीजनखाना जयपुर रियासत का वह विभाग था जिसमें दरबार से वेतन पाने वाले गायक, वादक, नर्तक और कलाकार पंजीकृत रहते थे — मुगलों के "कारखानों" की तर्ज़ पर। इसकी परंपरा कछवाहा दरबार में पहले से थी, पर सवाई प्रतापसिंह के समय यह अपने चरम पर माना जाता है। आगे सवाई रामसिंह द्वितीय के समय भी जयपुर दरबार में बड़े उस्ताद (जैसे बहराम खाँ डागर) रहे।
ट्रिक: "प्रताप का हवा महल + 22 गंधर्व + राधा-गोविंद" — ब्रजनिधि सवाई प्रतापसिंह।
13. अन्य संगीत ग्रंथ व संगीतज्ञ
ग्रंथ / योगदान | लेखक / व्यक्ति | राजस्थान से संबंध |
|---|---|---|
संगीत राग कल्पद्रुम | कृष्णानंद व्यास "रागसागर" | मेवाड़ (उदयपुर) से संबद्ध; हजारों गीतों-पदों का संकलन |
राधा गोविंद संगीत सार | देवर्षि ब्रजपाल भट्ट (संपादन) | सवाई प्रतापसिंह, जयपुर |
रसिकप्रिया | महाराणा कुंभा | गीतगोविंद की टीका, मेवाड़ |
अनूपांकुश | भावभट्ट | अनूपसिंह, बीकानेर |
नर्तन निर्णय | पुंडरीक विट्ठल | आमेर के कछवाहा / अकबर |
साहित्यिक ग्रंथों और उनके लेखकों की बड़ी सूची के लिए देखें — राजस्थान के प्रमुख ग्रंथ एवं उनके लेखक।
14. मास्टर तालिका: ग्रंथ → लेखक → संरक्षक
ग्रंथ | लेखक | संरक्षक / रियासत | काल (लगभग) |
|---|---|---|---|
संगीतराज | महाराणा कुंभा | मेवाड़ (स्वयं शासक) | 15वीं सदी |
संगीत मीमांसा | महाराणा कुंभा | मेवाड़ | 15वीं सदी |
सूड़ प्रबंध | महाराणा कुंभा | मेवाड़ | 15वीं सदी |
रसिकप्रिया (गीतगोविंद टीका) | महाराणा कुंभा | मेवाड़ | 15वीं सदी |
सद्राग चंद्रोदय | पुंडरीक विट्ठल | खानदेश के बुरहान खाँ (रचना); बाद में आमेर | 16वीं सदी |
रागमाला | पुंडरीक विट्ठल | आमेर — मानसिंह/माधोसिंह | 16वीं सदी |
रागमंजरी | पुंडरीक विट्ठल | आमेर — मानसिंह/माधोसिंह | 16वीं सदी |
नर्तन निर्णय | पुंडरीक विट्ठल | अकबर / आमेर | 16वीं सदी |
अनूप संगीत रत्नाकर | भावभट्ट | बीकानेर — अनूपसिंह | 17वीं सदी उत्तरार्ध |
अनूप संगीत विलास | भावभट्ट | बीकानेर — अनूपसिंह | 17वीं सदी उत्तरार्ध |
अनूपांकुश | भावभट्ट | बीकानेर — अनूपसिंह | 17वीं सदी उत्तरार्ध |
राधा गोविंद संगीत सार | देवर्षि ब्रजपाल भट्ट आदि | जयपुर — सवाई प्रतापसिंह | 18वीं सदी अंत |
संगीत राग कल्पद्रुम | कृष्णानंद व्यास | मेवाड़ से संबद्ध संकलनकर्ता | 19वीं सदी |
15. आधुनिक काल के शास्त्रीय कलाकार व संस्थाएँ
15.1 प्रमुख कलाकार
कलाकार | विधा / वाद्य | राजस्थान से संबंध | विशेष |
|---|---|---|---|
पं. विश्वमोहन भट्ट | मोहन वीणा (स्वयं विकसित स्लाइड-वाद्य) | जयपुर | ग्रैमी पुरस्कार 1994 ("A Meeting by the River", राई कूडर के साथ); पद्म श्री, पद्म भूषण |
सलिल भट्ट | सात्विक वीणा | जयपुर | विश्वमोहन भट्ट के पुत्र |
पं. राम नारायण | सारंगी | उदयपुर क्षेत्र में जन्म | सारंगी को एकल वाद्य के रूप में प्रतिष्ठित किया; पद्म विभूषण |
उस्ताद सुल्तान खाँ | सारंगी | सीकर क्षेत्र | प्रसिद्ध सारंगी वादक व गायक; पद्म भूषण |
उस्ताद असद अली खाँ | रुद्र वीणा | अलवर में जन्म | जयपुर बीनकार परंपरा; पद्म भूषण |
पं. पुरुषोत्तम दास | पखावज | नाथद्वारा | नाथद्वारा पखावज परंपरा |
नोट: मोहन वीणा को पं. विश्वमोहन भट्ट ने पाश्चात्य (हवाईयन/आर्क-टॉप) गिटार में अतिरिक्त तार जोड़कर विकसित किया; यह वाद्य उन्हीं के नाम से पहचाना जाता है। वे पं. रविशंकर के शिष्य रहे।
15.2 लोक और शास्त्रीय का सेतु
राजस्थान की मांड गायकी राग-आधारित होते हुए भी लोक-परंपरा का हिस्सा है; बीकानेर की अल्लाह जिलाई बाई ("केसरिया बालम") ने इसे शास्त्रीय मंचों तक पहुँचाया। मांड, पावड़ा आदि के लिए देखें — राजस्थान के प्रमुख लोक गायन: मांड, पावड़ा, पंडून का कड़ा एवं लोकगाथाएँ। अजमेर दरगाह की कव्वाली परंपरा भी सूफ़ी-शास्त्रीय संगीत का संगम है — देखें राजस्थान की सूफ़ी परंपरा व अजमेर दरगाह।
15.3 संस्थाएँ
राजस्थान संगीत नाटक अकादमी — जोधपुर; स्थापना 1957।
जयपुर कथक केंद्र — जयपुर; कथक नृत्य प्रशिक्षण (स्थापना सामान्यतः 1978 बताई जाती है)।
रवींद्र मंच (जयपुर) और जवाहर कला केंद्र (जयपुर) — संगीत-नाट्य प्रस्तुतियों के प्रमुख मंच।
अनूप संस्कृत पुस्तकालय (बीकानेर) — संगीत सहित दुर्लभ पांडुलिपियों का संग्रह।
16. कालक्रम (Timeline)
काल | घटना |
|---|---|
1433–1468 | महाराणा कुंभा — संगीतराज, संगीत मीमांसा, सूड़ प्रबंध, रसिकप्रिया |
16वीं सदी (उत्तरार्ध) | पुंडरीक विट्ठल — आमेर के मानसिंह/माधोसिंह और अकबर के समय से संबद्ध |
1669–1698 | बीकानेर के अनूपसिंह — भावभट्ट के अनूप-नामांकित ग्रंथ |
1778–1803 | जयपुर के सवाई प्रतापसिंह — राधा गोविंद संगीत सार, गंधर्व बाईसी, गुणीजनखाना का उत्कर्ष |
19वीं सदी | बहराम खाँ डागर — जयपुर दरबार (सवाई रामसिंह द्वितीय); घग्गे नज़ीर खाँ — मेवाती घराना |
19वीं सदी अंत – 20वीं सदी | अल्लादिया खाँ — जयपुर-अतरौली घराना |
1957 | राजस्थान संगीत नाटक अकादमी, जोधपुर |
1994 | पं. विश्वमोहन भट्ट को ग्रैमी पुरस्कार |
17. भ्रम व सावधानियाँ (Exam Trap Section)
Trap 1: संगीत रत्नाकर बनाम अनूप संगीत रत्नाकर
संगीत रत्नाकर 13वीं सदी में शारंगदेव ने देवगिरि (यादव दरबार) में लिखा — यह राजस्थान का ग्रंथ नहीं है। राजस्थान से जुड़ा ग्रंथ अनूप संगीत रत्नाकर (भावभट्ट, बीकानेर) है। कुंभा ने संगीत रत्नाकर पर टीका लिखी थी — इसलिए "कुंभा — संगीत रत्नाकर की टीका" सही है, "कुंभा — संगीत रत्नाकर के लेखक" गलत।
Trap 2: अन्य गैर-राजस्थानी संगीत ग्रंथ
ग्रंथ | लेखक | राजस्थान से? |
|---|---|---|
नाट्यशास्त्र | भरत मुनि | नहीं |
संगीत रत्नाकर | शारंगदेव | नहीं |
संगीत पारिजात | अहोबल | नहीं |
संगीत दर्पण | दामोदर मिश्र | नहीं |
राग तरंगिणी | लोचन | नहीं |
Trap 3: अल्लादिया खाँ बनाम अलाउद्दीन खाँ
अल्लादिया खाँ — जयपुर-अतरौली ख्याल घराना। अलाउद्दीन खाँ — मैहर घराना (मध्य प्रदेश), पं. रविशंकर व अली अकबर खाँ के गुरु। नाम मिलते-जुलते हैं, घराने अलग।
Trap 4: घराने का नाम ≠ कलाकार का जन्मस्थान
किशोरी अमोणकर, केसरबाई केरकर और मल्लिकार्जुन मंसूर जयपुर-अतरौली घराने के हैं पर राजस्थान में जन्मे नहीं थे। पं. जसराज मेवाती घराने के हैं पर हरियाणा में जन्मे। "राजस्थान में जन्मे कलाकार" पूछा जाए तो विश्वमोहन भट्ट, राम नारायण, असद अली खाँ, सुल्तान खाँ जैसे नाम सोचें।
Trap 5: किराना / ग्वालियर / आगरा राजस्थानी नहीं
गंगूबाई हंगल, भीमसेन जोशी — किराना घराना; ग्वालियर सबसे पुराना ख्याल घराना माना जाता है; आगरा घराना — फ़ैयाज़ खाँ। ये विकल्प राजस्थानी घरानों के प्रश्न में भटकाने के लिए आते हैं।
Trap 6: पुंडरीक विट्ठल का संरक्षक
पुंडरीक विट्ठल को बीकानेर या मेवाड़ से न जोड़ें। राजस्थान संदर्भ में उत्तर — आमेर के कछवाहा (मानसिंह/माधोसिंह); मुगल संदर्भ में — अकबर।
Trap 7: राधा गोविंद संगीत सार का "लेखक"
यदि विकल्पों में सवाई प्रतापसिंह और ब्रजपाल भट्ट दोनों हों — "किसके संरक्षण/काल में रचा गया" का उत्तर सवाई प्रतापसिंह, और "किसने संपादित/संकलित किया" का उत्तर देवर्षि ब्रजपाल भट्ट। अधिकांश GK प्रश्नों में शासक का नाम ही उत्तर रहता है।
Trap 8: मोहन वीणा बनाम सात्विक वीणा बनाम रुद्र वीणा
मोहन वीणा — पं. विश्वमोहन भट्ट; सात्विक वीणा — सलिल भट्ट; रुद्र वीणा — असद अली खाँ, ज़िया मोहिउद्दीन डागर (बीनकार परंपरा)।
Trap 9: सवाई प्रतापसिंह बनाम महाराणा प्रताप
राधा गोविंद संगीत सार और गंधर्व बाईसी जयपुर के सवाई प्रतापसिंह से जुड़े हैं, मेवाड़ के महाराणा प्रताप से नहीं।
18. परीक्षा में पूछे जाने वाले तथ्य (One-liners)
जयपुर-अतरौली घराने के प्रवर्तक — उस्ताद अल्लादिया खाँ।
जयपुर-अतरौली घराना किस गायन शैली का है — ख्याल।
किशोरी अमोणकर की माता व गुरु — मोघूबाई कुर्डीकर (जयपुर-अतरौली)।
डागर घराना किस शैली से जुड़ा है — ध्रुपद; जयपुर दरबार के बहराम खाँ डागर।
मेवाती घराने के प्रवर्तक — घग्गे नज़ीर खाँ; प्रसिद्ध गायक — पं. जसराज।
जसरंगी जुगलबंदी — पं. जसराज।
सेनिया घराना (GK पुस्तकों में) — सूरतसेन, जयपुर।
जयपुर कथक घराने के प्रवर्तक — भानुजी।
संगीतराज के रचयिता — महाराणा कुंभा; पाँच रत्नकोश।
गीतगोविंद की टीका रसिकप्रिया — महाराणा कुंभा।
कुंभा की संगीत-उपाधि — अभिनव भरताचार्य; संगीत गुरु — सारंग व्यास (GK पुस्तकों के अनुसार)।
कुंभा की पुत्री रमाबाई — "वागीश्वरी"।
रागमाला, रागमंजरी, नर्तन निर्णय, सद्राग चंद्रोदय — पुंडरीक विट्ठल।
पुंडरीक विट्ठल के राजस्थानी संरक्षक — आमेर के मानसिंह व माधोसिंह।
अनूप संगीत रत्नाकर, अनूप संगीत विलास, अनूपांकुश — भावभट्ट (बीकानेर, अनूपसिंह)।
भावभट्ट के पिता — जनार्दन भट्ट (शाहजहाँ के दरबार से संबद्ध)।
राधा गोविंद संगीत सार — सवाई प्रतापसिंह के काल में; संपादन देवर्षि ब्रजपाल भट्ट।
गंधर्व बाईसी — सवाई प्रतापसिंह के दरबार के 22 संगीतज्ञ।
संगीत राग कल्पद्रुम — कृष्णानंद व्यास "रागसागर"।
मोहन वीणा — पं. विश्वमोहन भट्ट; ग्रैमी 1994।
राजस्थान संगीत नाटक अकादमी — जोधपुर, 1957।
खंडार वाणी (ध्रुपद) — नाम खंडार (सवाई माधोपुर) से जोड़ा जाता है।
19. संबंधित नोट्स
राजस्थान के प्रमुख लोक गायन: मांड, पावड़ा, पंडून का कड़ा एवं लोकगाथाएँ
राजस्थान के लोक वाद्यों का वर्गीकरण: तत्, सुषिर, अवनद्ध एवं घन
20. इसे आसानी से याद कैसे रखें?
घराने: "अल्ला का जयपुर, बहराम का डागर, घग्गे का मेवात, सूरत का सेनिया, भानु का कथक"
ग्रंथकार: "कुंभा-राज, पुंडरीक-माला, भाव-अनूप, प्रताप-राधागोविंद"
संरक्षक: मेवाड़ = कुंभा (स्वयं) | आमेर = मानसिंह-माधोसिंह (पुंडरीक) | बीकानेर = अनूपसिंह (भावभट्ट) | जयपुर = सवाई प्रतापसिंह (ब्रजपाल भट्ट)
वीणा-त्रयी: मोहन = विश्वमोहन | सात्विक = सलिल | रुद्र = असद अली / डागर
21. एक दिन पहले — रिवीज़न सूची
जयपुर-अतरौली — अल्लादिया खाँ — ख्याल — केसरबाई, मोघूबाई, किशोरी अमोणकर, मल्लिकार्जुन मंसूर।
डागर — ध्रुपद — बहराम खाँ — जयपुर; मेवाती — घग्गे नज़ीर खाँ — जसराज — जसरंगी।
सेनिया — सूरतसेन (जयपुर, GK मत); बीनकार — असद अली खाँ (रुद्र वीणा); कथक — भानुजी।
कुंभा — संगीतराज (5 रत्नकोश), संगीत मीमांसा, सूड़ प्रबंध, रसिकप्रिया; अभिनव भरताचार्य; रमाबाई वागीश्वरी।
पुंडरीक विट्ठल — रागमाला, रागमंजरी, नर्तन निर्णय, सद्राग चंद्रोदय — आमेर/अकबर।
भावभट्ट — अनूप संगीत रत्नाकर, अनूप संगीत विलास, अनूपांकुश — बीकानेर अनूपसिंह।
सवाई प्रतापसिंह — ब्रजनिधि, राधा गोविंद संगीत सार, गंधर्व बाईसी, गुणीजनखाना।
विश्वमोहन भट्ट — मोहन वीणा — ग्रैमी 1994; संगीत नाटक अकादमी — जोधपुर 1957।
ट्रैप — संगीत रत्नाकर (शारंगदेव) राजस्थानी नहीं; अल्लादिया ≠ अलाउद्दीन।
22. अभ्यास
नोट पढ़ने के बाद इस पेज के अंत में दिए 25 प्रश्नों का क्विज़ हल करें। जिन प्रश्नों में गलती हो, उनके लिए खंड 8 (घरानों की तुलना), खंड 14 (ग्रंथ → लेखक → संरक्षक मास्टर तालिका) और खंड 17 (भ्रम व सावधानियाँ) दोहराएँ। ग्रंथों के प्रश्न प्रायः "निम्न में से कौन-सा सही सुमेलित नहीं है" के रूप में आते हैं — इसलिए हर ग्रंथ के साथ उसका लेखक और संरक्षक एक साथ याद करें।
23. निष्कर्ष: परीक्षा के लिए क्या याद रखें?
राजस्थान का शास्त्रीय संगीत राजदरबारों की देन है — मेवाड़ में महाराणा कुंभा स्वयं संगीत-शास्त्री बने, आमेर ने पुंडरीक विट्ठल को आश्रय दिया, बीकानेर के अनूपसिंह ने भावभट्ट से ग्रंथ लिखवाए और जयपुर के सवाई प्रतापसिंह ने राधा गोविंद संगीत सार व गंधर्व बाईसी से जयपुर को संगीत-राजधानी बनाया। 19वीं-20वीं सदी में यही दरबार डागर, मेवाती, जयपुर-अतरौली और बीनकार परंपराओं के आश्रय बने, और आधुनिक काल में पं. विश्वमोहन भट्ट, पं. राम नारायण जैसे कलाकारों ने राजस्थान का नाम विश्व-मंच तक पहुँचाया। परीक्षा के लिए तीन कड़ियाँ सबसे अहम हैं — घराना → प्रवर्तक, ग्रंथ → लेखक → संरक्षक और कलाकार → वाद्य।
अल्लादिया–जयपुर-अतरौली | बहराम–डागर | घग्गे नज़ीर–मेवाती | कुंभा–संगीतराज | पुंडरीक–रागमाला | भावभट्ट–अनूप | प्रतापसिंह–राधा गोविंद संगीत सार | विश्वमोहन–मोहन वीणा
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महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)
जयपुर-अतरौली ख्याल गायकी घराने के प्रवर्तक उस्ताद अल्लादिया खाँ (लगभग 1855–1946) माने जाते हैं। केसरबाई केरकर, मोघूबाई कुर्डीकर, किशोरी अमोणकर और मल्लिकार्जुन मंसूर इसी परंपरा के प्रसिद्ध कलाकार हैं।
डागर घराना ध्रुपद गायकी (डागुर वाणी) से जुड़ा है। इसकी आधुनिक वंशावली 19वीं सदी के जयपुर दरबार के उस्ताद बहराम खाँ डागर से गिनी जाती है।
मेवाती घराने के प्रवर्तक उस्ताद घग्गे नज़ीर खाँ माने जाते हैं, जिन्हें राजस्थान GK पुस्तकों में जोधपुर दरबार से संबद्ध बताया जाता है। इस घराने के सबसे प्रसिद्ध गायक पं. जसराज थे।
संगीतराज मेवाड़ के महाराणा कुंभा की रचना है। यह पाँच रत्नकोशों — पाठ्य, गीत, वाद्य, नृत्य और रस — में विभाजित है। कुंभा ने संगीत मीमांसा, सूड़ प्रबंध और गीतगोविंद की टीका रसिकप्रिया भी लिखी।
पुंडरीक विट्ठल ने रागमाला, रागमंजरी, नर्तन निर्णय और सद्राग चंद्रोदय लिखे। राजस्थान संदर्भ में वे आमेर के मानसिंह व माधोसिंह के आश्रय में बताए जाते हैं; उनका संबंध खानदेश के बुरहान खाँ और अकबर से भी जोड़ा जाता है।
अनूप संगीत रत्नाकर भावभट्ट की रचना है, जो बीकानेर के महाराजा अनूपसिंह के दरबारी संगीतज्ञ थे। भावभट्ट ने अनूप संगीत विलास और अनूपांकुश भी लिखे।
राधा गोविंद संगीत सार जयपुर के सवाई प्रतापसिंह (1778–1803) के संरक्षण में तैयार हुआ। इसके संपादन का श्रेय मुख्यतः देवर्षि ब्रजपाल भट्ट को दिया जाता है।
गंधर्व बाईसी जयपुर के सवाई प्रतापसिंह के दरबार में 22 संगीतज्ञों/कलाकारों की मंडली थी। जयपुर का गुणीजनखाना — कलाकारों का दरबारी विभाग — भी उनके समय में चरम पर माना जाता है।
मोहन वीणा जयपुर के पं. विश्वमोहन भट्ट द्वारा विकसित स्लाइड-वाद्य है। उन्हें 1994 में "A Meeting by the River" एल्बम के लिए ग्रैमी पुरस्कार मिला।
नहीं। संगीत रत्नाकर 13वीं सदी में शारंगदेव ने देवगिरि (यादव दरबार) में लिखा था। राजस्थान से जुड़ा ग्रंथ अनूप संगीत रत्नाकर (भावभट्ट) है; महाराणा कुंभा ने संगीत रत्नाकर पर टीका लिखी थी।
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