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कला एवं संस्कृति

राजस्थान के लोक वाद्य यंत्र: रावणहत्था, कमायचा, जंतर, अलगोजा एवं प्रमुख वाद्य

Sudhir Dhaka (इतिहास विशेषज्ञ)
15 अगस्त 2026
7 मिनट पठन
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राजस्थान के लोक वाद्य यंत्र: रावणहत्था, कमायचा, जंतर, अलगोजा एवं प्रमुख वाद्य

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राजस्थान के लोक वाद्य यंत्र: रावणहत्था, कमायचा, अलगोजा, भपंग, मोरचंग एवं प्रमुख लोक वाद्य | RPSC, RAS, CET Notes

लेखक: सुयोग अकादमी संपादकीय टीम
श्रेणी: राजस्थान कला एवं संस्कृति
परीक्षा उपयोगी: RPSC, RAS, Rajasthan CET, RSMSSB, REET, Patwari, ग्राम सेवक एवं अन्य राजस्थान प्रतियोगी परीक्षाएँ
अपडेट: अगस्त 2026

Quick Answer Box: राजस्थान के लोक वाद्य यंत्र एक नजर में

राजस्थान के लोक वाद्य यंत्र यहाँ की लोक-संस्कृति, लोकगीत, लोकनृत्य, लोकदेवताओं की गाथाओं और पारंपरिक सामाजिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इनका निर्माण प्रायः स्थानीय रूप से उपलब्ध लकड़ी, बाँस, लौकी, नारियल के खोल, पशु-चर्म, धातु और घोड़े के बाल जैसी सामग्रियों से किया जाता रहा है।

परीक्षा की दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण वाद्य हैं:

लोक वाद्यप्रमुख वर्गप्रमुख संबंध/पहचान
रावणहत्थातत/वितत वाद्यपाबूजी की फड़, भोपा
कमायचातत/वितत वाद्यमांगणियार समुदाय
सारंगीवितत वाद्यलंगा, जोगी
जंतरतत वाद्यदेवनारायण जी की फड़, गुर्जर भोपा
भपंगएक-तारी लोक वाद्यमेवात के जोगी
इकतारातत वाद्यजोगी, संत, कालबेलिया
अलगोजासुषिर वाद्यदोहरी बाँसुरी, भील/कालबेलिया
पुंगीसुषिर वाद्यकालबेलिया/सपेरा परंपरा
मोरचंगघन/ताल संबंधी वाद्यलंगा-मांगणियार लोकसंगीत
सतारासुषिर वाद्यबाँसुरी-अलगोजा-शहनाई का मिश्रित रूप
खड़तालघन वाद्यलोकगायन एवं भक्ति संगीत
मंजीराघन वाद्यभक्ति एवं लोकसंगीत
नगाड़ाअवनद्ध वाद्यउत्सव, युद्ध/राजकीय घोष
ढोलअवनद्ध वाद्यलोकनृत्य एवं उत्सव
चंगअवनद्ध वाद्यहोली एवं लोकनृत्य
तंदूरा/चौतारातार/ड्रोन वाद्यभक्ति गायन, तेरहताली

सबसे जरूरी परीक्षा सूत्र:
पाबूजी की फड़ → रावणहत्था
मांगणियार → कमायचा
देवनारायण जी की फड़ → जंतर
मेवात के जोगी → भपंग
दो बाँसुरियाँ → अलगोजा
कालबेलिया → पुंगी
लंगा → सारंगी/लोक तंत्री वाद्य

राजस्थान सरकार के सांस्कृतिक स्रोत राजस्थान के लोकसंगीत में एकतारा, मोरचंग, सारंगी, रावणहत्था और कमायचा जैसे तार वाद्यों तथा नगाड़ा, ढोल और डमरू जैसे ताल वाद्यों के प्रयोग का उल्लेख करते हैं।

1. राजस्थान के लोक वाद्य यंत्र क्या हैं?

राजस्थान की संस्कृति को समझने के लिए केवल इसके किले, महल, चित्रकला, लोकनृत्य और लोकदेवताओं का अध्ययन पर्याप्त नहीं है। राजस्थान की वास्तविक लोक-सांस्कृतिक पहचान उसके लोकगीतों, लोकगाथाओं और लोक वाद्य यंत्रों में दिखाई देती है।

मरुस्थलीय राजस्थान में संगीत का विकास वहाँ के सामाजिक जीवन, पशुपालक समुदायों, धार्मिक परंपराओं, लोकदेवताओं, उत्सवों और मौखिक परंपराओं के साथ हुआ। ग्रामीण क्षेत्रों में संगीत किसी औपचारिक मंच तक सीमित नहीं था। विवाह, जन्म, धार्मिक अनुष्ठान, मेले, त्योहार, वीरगाथाएँ, पशुपालन, वर्षा, विरह और सामाजिक अवसर—लगभग हर प्रसंग में लोक वाद्यों का उपयोग होता रहा।

राजस्थान के लोक वाद्यों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उनमें स्थानीय संसाधनों और लोक-कौशल का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। बाँस से बाँसुरी, लौकी से पुंगी या तुंबी, नारियल के खोल से रावणहत्थे का अनुनादक भाग और लकड़ी तथा पशु-चर्म से अनेक वाद्य बनाए जाते रहे हैं।

राजस्थान के लोक वाद्यों की परंपरा केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है। यह लोकसमाज की स्मृति, पहचान और मौखिक इतिहास को सुरक्षित रखने का भी माध्यम है।

उदाहरण के लिए, पाबूजी की लोकगाथा को फड़ के सामने प्रस्तुत करने की परंपरा में रावणहत्थे का प्रयोग केवल संगीत के लिए नहीं बल्कि पूरी कथा-वाचन परंपरा का अभिन्न हिस्सा है। राजस्थान से संबंधित सांस्कृतिक स्रोतों में रावणहत्थे को पाबूजी की कथा के कथावाचक समुदाय से जोड़ा गया है।

2. राजस्थान के लोक वाद्यों का वर्गीकरण

संगीतशास्त्रीय दृष्टि से वाद्यों को सामान्यतः उनकी ध्वनि उत्पन्न करने की प्रक्रिया के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है। राजस्थान के लोक वाद्यों को अध्ययन की सुविधा के लिए मुख्यतः चार वर्गों में समझा जा सकता है:

  1. तत/तंत्री वाद्य — तार के कंपन से ध्वनि उत्पन्न होती है।

  2. अवनद्ध वाद्य — चमड़े या झिल्ली पर आघात से ध्वनि उत्पन्न होती है।

  3. घन वाद्य — वाद्य के ठोस शरीर या धातु/लकड़ी के टकराने से ध्वनि उत्पन्न होती है।

  4. सुषिर वाद्य — वायु के कंपन से ध्वनि उत्पन्न होती है।

राजस्थान बोर्ड के 2025–26 संगीत पाठ्यक्रम में भी वाद्य यंत्रों के अध्ययन के लिए तन्तु, अवनद्ध, घन और सुशिर चार प्रमुख श्रेणियों का उल्लेख किया गया है।

वर्गीकरण की परीक्षा तालिका

वर्गध्वनि का आधारप्रमुख राजस्थान वाद्य
तत/तंत्रीतार का कंपनरावणहत्था, कमायचा, सारंगी, जंतर, इकतारा
सुषिरवायु का कंपनअलगोजा, पुंगी, सतारा, शहनाई, नाद
घनठोस पदार्थ के कंपन/टकरावमंजीरा, खड़ताल, घंटी, झालर
अवनद्धझिल्ली/चर्म पर आघातढोल, नगाड़ा, चंग, ताशा, डमरू

Exam Point: रावणहत्था को कई राजस्थान-संस्कृति स्रोत तार/तंत्री वाद्य की परंपरा में रखते हैं; तकनीकी वर्गीकरण में इसे गज से बजने वाला वितत वाद्य भी बताया जाता है। इसलिए प्रश्न में “गज से बजने वाला” लिखा हो तो रावणहत्था/सारंगी जैसे वाद्यों की ओर ध्यान दें।

3. रावणहत्था — पाबूजी की फड़ का प्रमुख वाद्य

रावणहत्था राजस्थान के सबसे प्रसिद्ध लोक वाद्यों में से एक है। प्रतियोगी परीक्षाओं में इसका सबसे महत्वपूर्ण संबंध पाबूजी की फड़ और भोपा से पूछा जाता है।

यह एक धनुष से बजाया जाने वाला तार वाद्य है। इसके निर्माण में बाँस, लकड़ी, नारियल का खोल, पशु-चर्म, धातु के तार और घोड़े के बाल जैसी सामग्रियों का उपयोग किया जाता है। भारत सरकार के हस्तशिल्प संबंधी स्रोत में रावणहत्थे के निर्माण के लिए बाँस, लकड़ी, नारियल के खोल, बकरी की खाल, धातु के तार और घोड़े के बाल जैसी सामग्रियों का उल्लेख है।

रावणहत्थे की प्रमुख विशेषताएँ

  • यह गज/धनुष से बजाया जाने वाला तार वाद्य है।

  • इसका अनुनादक भाग पारंपरिक रूप से नारियल के खोल से बनाया जाता है।

  • इसमें बाँस या लकड़ी का डांड/दंड होता है।

  • तारों में घोड़े के बाल और धातु के तारों का प्रयोग मिलता है।

  • इसके गज में घुंघरुओं की सजावट भी देखी जाती है।

  • इसका सबसे महत्वपूर्ण सांस्कृतिक संबंध पाबूजी की लोकगाथा से है।

पाबूजी की फड़ और रावणहत्था

पाबूजी की फड़ राजस्थान की प्रसिद्ध लोकचित्र एवं लोकगाथा परंपरा है। फड़ पर पाबूजी के जीवन और वीरगाथा के विभिन्न प्रसंग चित्रित किए जाते हैं। इसका वाचन भोपा द्वारा किया जाता है और परंपरागत रूप से रावणहत्थे का साथ मिलता है।

सुयोग अकादमी के पाबूजी संबंधी नोट में भी स्पष्ट किया गया है कि पाबूजी की फड़ के वाचन में भोपा रावणहत्था बजाते हुए गाथा प्रस्तुत करता है, जबकि भोपी फड़ पर संबंधित प्रसंग की ओर संकेत करती है।

याद रखने की ट्रिक

“पाबूजी की पड़ — रावणहत्थे की झंकार”

यदि प्रश्न में एक साथ ये शब्द आएँ:

पाबूजी + फड़ + भोपा + लोकगाथा → रावणहत्था

तो उत्तर रावणहत्था होगा।

4. कमायचा — मांगणियारों की संगीत पहचान

कमायचा पश्चिमी राजस्थान के लोकसंगीत की एक अत्यंत महत्वपूर्ण पहचान है। इसका संबंध विशेष रूप से मांगणियार समुदाय से है।

यह एक bowed lute अर्थात् गज से बजाया जाने वाला तार वाद्य है। भारत के Centre for Cultural Resources and Training (CCRT) के अनुसार कमायचा पश्चिमी राजस्थान के मांगणियारों द्वारा बजाया जाता है। इसका शरीर लकड़ी का होता है, अनुनादक भाग पर चमड़ा चढ़ाया जाता है और इसमें मुख्य तथा सहायक तार होते हैं।

कमायचा की विशेषताएँ

  • पश्चिमी राजस्थान का प्रमुख लोक तंत्री वाद्य।

  • मांगणियार समुदाय से विशेष रूप से संबंधित।

  • जैसलमेर और बाड़मेर क्षेत्र में इसका विशेष महत्व।

  • गज से बजाया जाता है।

  • इसका अनुनादक भाग अपेक्षाकृत बड़ा होता है।

  • गहरी और गंभीर ध्वनि इसकी विशेष पहचान मानी जाती है।

  • लोकगीत, माँड और पारंपरिक गायन में इसका उपयोग होता है।

कमायचा और मांगणियार

राजस्थान में मांगणियारों की संगीत परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही है। उनके लोकसंगीत में कमायचा, खड़ताल और अन्य वाद्यों का महत्वपूर्ण स्थान है।

Exam Formula:

मांगणियार → कमायचा

जबकि:

लंगा → सारंगी

इन दोनों को आपस में बदलना परीक्षा की सामान्य गलती है।

5. सारंगी — राजस्थान का प्रसिद्ध तार वाद्य

सारंगी भारतीय संगीत परंपरा में प्रसिद्ध तार वाद्य है और राजस्थान के लोकसंगीत में भी इसका विशेष स्थान है।

राजस्थान में सारंगी का संबंध विशेष रूप से लंगा और जोगी समुदायों से जोड़ा जाता है। राजस्थान के लोकसंगीत संबंधी स्रोतों में लंगा समुदाय के साथ सारंगी के प्रयोग का उल्लेख मिलता है।

सारंगी की प्रमुख बातें

  • यह धनुष से बजाई जाने वाली तार वाद्य परंपरा का हिस्सा है।

  • राजस्थान में लंगा और जोगी संगीत परंपरा में इसका उपयोग मिलता है।

  • लोकगीत और गायन की संगत में इसका उपयोग होता है।

  • इसकी ध्वनि मानवीय आवाज के निकट मानी जाती है।

परीक्षा में भ्रम

मांगणियार → कमायचा

लंगा → सारंगी

यह दो-लाइन की तुलना बहुत महत्वपूर्ण है।

6. जंतर — देवनारायण जी की फड़ से संबंध

जंतर राजस्थान का एक महत्वपूर्ण तार वाद्य है। इसका आकार वीणा से मिलता-जुलता बताया जाता है और इसमें तुंबों तथा तारों का प्रयोग होता है।

इसका सबसे महत्वपूर्ण परीक्षा-संबंध है:

जंतर → देवनारायण जी की फड़ → गुर्जर भोपा

देवनारायण जी की लोकगाथा का गायन करने वाले गुर्जर भोपों द्वारा जंतर का प्रयोग किया जाता है। लोक-सांस्कृतिक स्रोतों में जंतर को देवनारायण जी की फड़ के सामने गुर्जर भोपों द्वारा बजाए जाने वाले वाद्य के रूप में वर्णित किया गया है।

जंतर को कैसे याद करें?

“जंतर से देव की गाथा”

यहाँ “देव” से देवनारायण जी याद करें।

रावणहत्था बनाम जंतर

आधाररावणहत्थाजंतर
संबंधित लोकगाथापाबूजीदेवनारायण जी
प्रमुख कथावाचकभोपागुर्जर भोपा
वादन शैलीगज सेतार/तत वादन
प्रमुख पहचानपाबूजी की फड़देवनारायण जी की फड़
7. इकतारा — एक तार वाला वाद्य

इकतारा नाम से ही इसकी सबसे बड़ी विशेषता स्पष्ट होती है—यह मूलतः एक तार वाला लोक वाद्य है।

इसे विभिन्न साधु-संतों, जोगियों और लोकसमुदायों की संगीत परंपराओं में देखा जाता है। सामान्यतः इसका निर्माण बाँस और लौकी/तुंबी जैसे स्थानीय पदार्थों से किया जाता है।

प्रमुख बिंदु

  • एक प्रमुख तार।

  • सरल संरचना।

  • लोकभक्ति एवं साधु-संतों के गायन में उपयोग।

  • जोगी और अन्य लोकगायन परंपराओं से संबंध।

राजस्थान के लोक वाद्य स्रोतों में इकतारा को नाथ, कालबेलिया और संत परंपरा से जोड़ा गया है।

8. भपंग — मेवात का “बोलने वाला ड्रम”

भपंग राजस्थान के अनूठे लोक वाद्यों में से एक है। इसे कई स्रोतों में “बोलने वाला ड्रम” कहा गया है।

इसका संबंध विशेष रूप से अलवर और मेवात क्षेत्र के जोगी समुदाय से जोड़ा जाता है।

भपंग की संरचना साधारण होते हुए भी इसकी ध्वनि अत्यंत विशिष्ट होती है। इसमें लौकी/खोखले खोल, चमड़े और तार जैसी सामग्रियों का प्रयोग किया जाता है।

भपंग की परीक्षा-उपयोगी विशेषताएँ

  • मेवात क्षेत्र से संबंध।

  • जोगी समुदाय द्वारा प्रयोग।

  • एक तार आधारित विशिष्ट लोक वाद्य।

  • इसकी ध्वनि में स्वर और ताल दोनों का विशेष प्रभाव दिखाई देता है।

  • इसे “बोलने वाला ड्रम” कहा जाता है।

Exam Trick

“मेवात का जोगी → भपंग”

इसे मोरचंग से न मिलाएँ।

9. अलगोजा — दोहरी बाँसुरी

अलगोजा राजस्थान के प्रसिद्ध सुषिर वाद्यों में से एक है। इसकी सबसे महत्वपूर्ण पहचान है कि यह सामान्यतः दो बाँस की नलियों/बाँसुरियों के साथ बजाया जाता है।

वादक दोनों नलियों को एक साथ मुँह में रखकर बजाता है। एक नली से स्थिर स्वर या आधार ध्वनि और दूसरी से धुन का प्रभाव उत्पन्न किया जाता है।

अलगोजा की विशेषताएँ

  • बाँस से निर्मित।

  • दोहरी बाँसुरी।

  • मुँह से एक साथ दोनों नलियों में वायु प्रवाहित की जाती है।

  • भील और कालबेलिया सहित विभिन्न लोक परंपराओं में इसका प्रयोग मिलता है।

  • राजस्थान के ग्रामीण और लोकसंगीत में महत्वपूर्ण।

राजस्थान के लोकसंगीत संबंधी स्रोत अलगोजे को दो बाँसुरी के संयुक्त वादन के रूप में बताते हैं तथा भील और कालबेलिया परंपराओं से इसका संबंध बताते हैं।

अलगोजा याद रखने की ट्रिक

“अलगोजा = अलग-अलग दो बाँसुरियाँ”

यदि प्रश्न में “दो बाँस की बाँसुरियाँ एक साथ” लिखा हो तो उत्तर अलगोजा होगा।

10. पुंगी — कालबेलिया और सपेरा परंपरा का वाद्य

पुंगी या पूंगी राजस्थान की लोकसंगीत परंपरा में विशेष रूप से सपेरा और कालबेलिया समुदाय से जुड़ा सुषिर वाद्य है।

इसका निर्माण लौकी/तुंबी और नलियों से किया जाता है।

प्रमुख तथ्य

  • सुषिर वाद्य।

  • लौकी/तुंबी का उपयोग।

  • कालबेलिया और जोगी समुदाय से संबंध।

  • पारंपरिक रूप से सपेरा संस्कृति से जुड़ा।

  • लोकनृत्य और प्रदर्शन परंपराओं में इसका उपयोग।

Exam Formula:

कालबेलिया → पुंगी

ध्यान रखें कि कालबेलिया नृत्य के साथ अन्य वाद्यों का प्रयोग भी हो सकता है; प्रश्न यदि विशेष रूप से “सपेरों का पारंपरिक वाद्य” पूछे तो पुंगी महत्वपूर्ण उत्तर है।

11. मोरचंग — राजस्थान का विशिष्ट धातु वाद्य

मोरचंग राजस्थान के लोकसंगीत का अत्यंत विशिष्ट छोटा वाद्य है। इसे अंग्रेजी में Jew’s Harp के रूप में भी जाना जाता है।

यह सामान्य बाँसुरी या ढोल की तरह नहीं बजाया जाता। इसे मुँह के पास रखकर/होंठों के बीच पकड़कर बजाया जाता है और वादक मुँह की गुहा तथा श्वास के माध्यम से ध्वनि को आकार देता है।

राजस्थान फाउंडेशन की जानकारी में मोरचंग को राजस्थान के तार वाद्यों के साथ सूचीबद्ध किया गया है, जबकि अन्य वर्गीकरणों में इसकी ध्वनि उत्पत्ति के कारण इसे घन/इडियोफोन संबंधी श्रेणी में रखा जाता है। इसलिए परीक्षा में मोरचंग की पहचान और समुदाय पर अधिक ध्यान देना उपयोगी है।

प्रमुख बातें

  • छोटा धातु वाद्य।

  • मुँह के पास रखकर बजाया जाता है।

  • लोकसंगीत में लयात्मक प्रभाव पैदा करता है।

  • लंगा और मांगणियार संगीत परंपरा से इसका संबंध मिलता है।

12. सतारा — मिश्रित स्वरूप का सुषिर वाद्य

सतारा पश्चिमी राजस्थान के लोकसंगीत में प्रयुक्त एक सुषिर वाद्य है।

इसे कई स्रोत बाँसुरी, अलगोजा और शहनाई के संयुक्त/मिश्रित स्वरूप के रूप में वर्णित करते हैं। इसमें दो लंबी नलियों का प्रयोग होता है।

परीक्षा बिंदु

सतारा → पश्चिमी राजस्थान → सुषिर वाद्य

यदि विकल्पों में “अलगोजा और शहनाई के मिश्रित रूप” जैसा वर्णन मिले तो सतारा पर विचार करें।

13. नाद

नाद एक पारंपरिक सुषिर वाद्य है। यह बाँसुरी की तरह वायु के प्रवाह से ध्वनि उत्पन्न करता है।

लोक वाद्यों में नाद की संरचना अपेक्षाकृत सरल होती है और विभिन्न क्षेत्रीय लोकसमुदायों में इसके रूपों में अंतर देखा जा सकता है।

परीक्षा में नाद से जुड़े प्रश्न अपेक्षाकृत कम सीधे पूछे जाते हैं, लेकिन यदि “वायु से बजने वाला लोक वाद्य” और “राजस्थानी सुषिर वाद्य” के विकल्प दिए हों तो इसकी पहचान उपयोगी है।

14. शहनाई

शहनाई राजस्थान के लोक और मांगलिक संगीत में प्रयुक्त महत्वपूर्ण सुषिर वाद्य है।

विवाह, धार्मिक कार्यक्रम, राजकीय या सामाजिक समारोहों जैसे शुभ अवसरों पर शहनाई का प्रयोग भारतीय संगीत परंपरा में व्यापक रहा है।

प्रमुख तथ्य

  • सुषिर वाद्य।

  • सामान्यतः लकड़ी का शरीर।

  • धातु/लकड़ी की घंटी के आकार का अंतिम भाग।

  • शुभ एवं मांगलिक अवसरों से संबंध।

15. खड़ताल — राजस्थान की ताल परंपरा की पहचान

खड़ताल राजस्थान के लोकसंगीत में ताल देने वाला अत्यंत लोकप्रिय वाद्य है।

यह सामान्यतः लकड़ी के टुकड़ों से बना होता है और हाथों से बजाया जाता है। इसके माध्यम से तीव्र एवं स्पष्ट लय उत्पन्न की जाती है।

खड़ताल की विशेषताएँ

  • घन वाद्य की श्रेणी में रखा जाता है।

  • हाथों से बजाया जाता है।

  • लोकगीत और भक्ति गायन में उपयोग।

  • लोकनृत्यों में ताल देने के लिए भी उपयोगी।

  • पश्चिमी राजस्थान की संगीत परंपराओं में विशेष महत्व।

16. मंजीरा

मंजीरा छोटे धातु के गोलाकार फलक/चक्रों से बना ताल वाद्य है। दोनों भागों को आपस में टकराकर ध्वनि उत्पन्न की जाती है।

इसका प्रयोग:

  • भजन

  • लोकगीत

  • धार्मिक कार्यक्रम

  • लोकनृत्य

  • सामूहिक गायन

में व्यापक रूप से होता है।

Exam Point

धातु के दो छोटे चक्र → मंजीरा

17. चंग — होली का लोकप्रिय वाद्य

चंग राजस्थान के लोकसंगीत और विशेष रूप से होली के लोकनृत्य एवं गीतों से जुड़ा प्रमुख अवनद्ध वाद्य है।

यह एक गोल फ्रेम वाला वाद्य होता है जिस पर चमड़ा/झिल्ली लगी होती है। इसे हाथ से बजाकर लय उत्पन्न की जाती है।

चंग की प्रमुख पहचान

  • अवनद्ध वाद्य।

  • गोलाकार ढाँचा।

  • हाथ से बजाया जाता है।

  • होली के अवसर पर विशेष लोकप्रिय।

  • चंग नृत्य/लोकगीत परंपरा में उपयोग।

Exam Trick:
होली + राजस्थान + गोल ताल वाद्य = चंग

18. ढोल और ढोलक

ढोल और ढोलक राजस्थान के लोकप्रिय ताल वाद्यों में शामिल हैं। इनका उपयोग विभिन्न लोकनृत्यों, विवाह समारोहों, मेलों और सामाजिक आयोजनों में होता है।

इनका मूल सिद्धांत है—तनावपूर्ण चमड़े/झिल्ली पर आघात करके ध्वनि उत्पन्न करना।

राजस्थान की लोकसंगीत परंपरा में ढोल केवल संगीत वाद्य नहीं बल्कि सामूहिक उत्सव की ध्वनि का प्रतीक भी है।

19. नगाड़ा

नगाड़ा राजस्थान के पारंपरिक अवनद्ध वाद्यों में महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

इसका आकार सामान्य छोटे ढोल की तुलना में बड़ा और ध्वनि अधिक प्रभावशाली होती है। ऐतिहासिक रूप से नगाड़े का संबंध राजकीय घोष, युद्ध, धार्मिक अनुष्ठानों और बड़े आयोजनों से रहा है।

राजस्थान फाउंडेशन भी नगाड़ा और ढोल को राजस्थान के प्रमुख percussion instruments में सूचीबद्ध करता है।

Exam Point

नगाड़ा → भारी, ऊँची और दूर तक सुनाई देने वाली ताल ध्वनि

20. ताशा

ताशा पतली और चपटी झिल्ली वाला ताल वाद्य है। इसे सामान्यतः पतली छड़ियों से बजाया जाता है।

राजस्थान के लोकवाद्य संबंधी विवरणों में ताशे को तांबे के पतले, चपटे ढाँचे और झिल्ली से बना वाद्य बताया गया है।

21. तंदूरा/चौतारा — भक्ति संगीत का महत्वपूर्ण वाद्य

तंदूरा या चौतारा राजस्थान की भक्ति एवं लोकगायन परंपरा से जुड़ा तार वाद्य है।

इसका प्रयोग विशेष रूप से भक्ति गायन और तेरहताली जैसी परंपराओं की संगत में मिलता है।

यह वाद्य लगातार आधार स्वर/ड्रोन देने में सहायक होता है, जिसके ऊपर गायक अपनी गायकी प्रस्तुत करता है।

परीक्षा में याद रखें

तेरहताली → तंदूरा/चौतारा

22. मुरली और मुरला

राजस्थान के लोकसंगीत में बाँस और लकड़ी से बने कई प्रकार के सुषिर वाद्य पाए जाते हैं। मुरली/मुरला भी इसी लोक परंपरा के वाद्यों में शामिल हैं।

इनका प्रयोग विभिन्न ग्रामीण और लोकसमुदायों के संगीत में मिलता है। इनकी क्षेत्रीय बनावट और नाम में भिन्नता भी देखी जा सकती है।

23. नागफणी

नागफणी राजस्थान का पारंपरिक फूँक से बजाया जाने वाला वाद्य है। नाम के अनुरूप इसकी आकृति कुछ रूपों में सर्पाकार/मुड़ी हुई दिखाई देती है।

यह सामान्य मनोरंजनात्मक बाँसुरी की तुलना में अधिक घोषात्मक प्रकृति का वाद्य माना जाता है और धार्मिक/लोक अवसरों में इसका उपयोग मिलता है।

24. बांकिया

बांकिया एक पारंपरिक फूँक वाद्य है। इसका उपयोग लोक एवं मांगलिक अवसरों पर घोषात्मक ध्वनि उत्पन्न करने के लिए किया जाता रहा है।

राजस्थान फाउंडेशन राजस्थान के पारंपरिक वाद्यों की सूची में बांकिया का उल्लेख करता है।

25. भुंगल/रणभेरी

भुंगल या रणभेरी जैसे वाद्यों का संबंध घोष और युद्ध/वीर परंपरा से जोड़ा जाता है।

इनका मुख्य उद्देश्य हमेशा मधुर धुन बजाना नहीं होता था; कई बार इनकी तेज आवाज सामूहिक संकेत, युद्ध, जुलूस या प्रदर्शन की शुरुआत की सूचना देती थी।

26. राजस्थान के प्रमुख लोक वाद्य और उनसे जुड़े समुदाय

राजस्थान में लोकसंगीत की परंपरा अनेक संगीतजीवी समुदायों ने पीढ़ियों तक संरक्षित की है।

समुदायप्रमुख वाद्य/संगीत संबंध
मांगणियारकमायचा, खड़ताल आदि
लंगासारंगी, कमायचा/अन्य तंत्री वाद्य
भोपारावणहत्था, तंदूरा आदि संदर्भानुसार
गुर्जर भोपाजंतर
जोगीसारंगी, इकतारा, भपंग आदि
कालबेलियापुंगी, अलगोजा आदि
भीलअलगोजा सहित विभिन्न लोक वाद्य
दाढ़ीसारंगी, रबाब आदि परंपरा
भाटवंशावली एवं लोकगायन परंपरा

राजस्थान के लोकसंगीत परंपरा संबंधी विवरणों में लंगा, मांगणियार, जोगी, भोपा, कालबेलिया, दाढ़ी और भाट जैसी संगीतजीवी/लोककथावाचक परंपराओं का उल्लेख मिलता है।

27. लोक वाद्य और लोकदेवता: सबसे महत्वपूर्ण संबंध

राजस्थान के प्रतियोगी परीक्षा पाठ्यक्रम में लोकदेवता और लोकवाद्य अक्सर एक-दूसरे से जुड़े हुए पूछे जाते हैं।

सबसे महत्वपूर्ण संबंध

लोक परंपराप्रमुख वाद्य
पाबूजी की फड़रावणहत्था
देवनारायण जी की फड़जंतर
रामदेवजी की भक्ति परंपरातंदूरा/चौतारा सहित लोकवाद्य
तेरहतालीतंदूरा/चौतारा, मंजीरा आदि
कालबेलियापुंगी
मांगणियार गायनकमायचा
लंगा गायनसारंगी
मेवात के जोगीभपंग

यह संबंध इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रतियोगी परीक्षाओं में सीधे “कौन-सा वाद्य किस लोकगाथा/समुदाय से संबंधित है?” प्रकार के प्रश्न बनाए जाते हैं।

28. राजस्थान के लोक वाद्य: क्षेत्र के आधार पर समझें

राजस्थान की भौगोलिक विविधता उसके संगीत में भी दिखाई देती है।

पश्चिमी राजस्थान

जैसलमेर, बाड़मेर और आसपास के मरुस्थलीय क्षेत्रों में:

  • कमायचा

  • सारंगी

  • मोरचंग

  • अलगोजा

  • सतारा

  • खड़ताल

जैसे वाद्यों की परंपरा महत्वपूर्ण है।

मांगणियार और लंगा समुदायों की संगीत परंपरा पश्चिमी राजस्थान की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। CCRT भी कमायचा को पश्चिमी राजस्थान के मांगणियारों से जोड़ता है।

मेवात क्षेत्र

अलवर और मेवात क्षेत्र में:

  • भपंग

  • इकतारा

  • सारंगी

जैसे वाद्यों की परंपरा मिलती है।

मेवाड़ और दक्षिणी राजस्थान

भील और अन्य जनजातीय समुदायों की लोकपरंपराओं में:

  • अलगोजा

  • ढोल

  • मादल

  • मंजीरा

  • अन्य ताल वाद्य

का प्रयोग महत्वपूर्ण है।

29. लोक वाद्यों में स्थानीय सामग्री का उपयोग

राजस्थान के लोक वाद्यों की सबसे सुंदर विशेषताओं में से एक है—स्थानीय संसाधनों से वाद्य निर्माण

परंपरागत रूप से निम्न सामग्रियों का उपयोग किया गया:

बाँस

बाँस से:

  • अलगोजा

  • बाँसुरी

  • नाद

  • वाद्य के दंड

आदि बनाए जाते हैं।

लौकी/तुंबी

लौकी के सूखे खोल का प्रयोग:

  • पुंगी

  • इकतारा

  • विभिन्न अनुनादक वाद्यों

में होता है।

नारियल का खोल

रावणहत्थे के निर्माण में नारियल के खोल का प्रयोग इसकी विशेष पहचान है।

पशु-चर्म

ढोल, नगाड़ा और कई तार वाद्यों के अनुनादक भाग में चर्म का उपयोग पारंपरिक रूप से किया जाता रहा है।

घोड़े के बाल

गज और कुछ तारों में घोड़े के बालों का प्रयोग मिलता है, विशेषकर रावणहत्था और कमायचा जैसे गज-वाद्यों में।

30. लोक वाद्य और राजस्थान की लोकगायन परंपरा

राजस्थान का लोकसंगीत केवल वाद्य बजाने की कला नहीं है। यह कहानी, कविता, गायन और सामुदायिक स्मृति का मिश्रण है।

पाबूजी, देवनारायण, तेजाजी और अन्य लोकनायकों की कथाएँ पीढ़ियों तक मौखिक रूप से आगे बढ़ीं। इन कथाओं के साथ वाद्यों ने वातावरण, भाव और लय प्रदान की।

उदाहरण के लिए:

पाबूजी की गाथा + फड़ + भोपा + रावणहत्था

यह चार तत्व मिलकर एक संपूर्ण लोकनाट्यात्मक प्रस्तुति का रूप लेते हैं।

इसी तरह:

देवनारायण जी की गाथा + फड़ + गुर्जर भोपा + जंतर

एक अलग लोकपरंपरा का निर्माण करते हैं।

इसलिए राजस्थान के लोकवाद्यों का अध्ययन केवल संगीत के रूप में नहीं बल्कि लोकइतिहास और सांस्कृतिक मानवशास्त्र के रूप में भी किया जाना चाहिए।

31. राजस्थान के लोक वाद्य — एक Master Revision Table
वाद्यवर्गमुख्य पहचानसंबंधित समुदाय/परंपरा
रावणहत्थातार/विततपाबूजी की फड़भोपा
कमायचातार/विततगहरी ध्वनिमांगणियार
सारंगीतार/विततलोक गायन की संगतलंगा/जोगी
जंतरतारदेवनारायण जी की फड़गुर्जर भोपा
इकतारातारएक तारजोगी/संत
भपंगविशिष्ट तार/लोक वाद्यबोलने वाला ड्रममेवात जोगी
अलगोजासुषिरदोहरी बाँसुरीभील/कालबेलिया आदि
पुंगीसुषिरसपेरा वाद्यकालबेलिया/जोगी
सतारासुषिरमिश्रित स्वरूपपश्चिमी राजस्थान
शहनाईसुषिरमांगलिक अवसरविभिन्न समुदाय
मोरचंगघन/इडियोफोन परंपराJew’s Harpलंगा-मांगणियार
खड़तालघनहाथ से ताललोकगायक
मंजीराघनधातु के चक्रभक्ति/लोकसंगीत
नगाड़ाअवनद्धघोष/तालउत्सव/राजकीय परंपरा
ढोलअवनद्धप्रमुख ताल वाद्यलोकनृत्य
चंगअवनद्धहोलीचंग/होली परंपरा
ताशाअवनद्धचपटा ताल वाद्यलोक/समारोह
मादलअवनद्धजनजातीय नृत्यभील/अन्य जनजातीय समुदाय
तंदूरातार/ड्रोनभक्ति गायनलोकभक्ति
बांकियासुषिरघोषात्मक ध्वनिलोक/मांगलिक अवसर
नागफणीसुषिरसर्पाकार/घोष वाद्यलोक धार्मिक परंपरा
32. Exam Trap — इन गलतियों से बचें

Trap 1: पाबूजी और देवनारायण जी

गलत: पाबूजी → जंतर
सही: पाबूजी → रावणहत्था

गलत: देवनारायण जी → रावणहत्था
सही: देवनारायण जी → जंतर

Trap 2: मांगणियार और लंगा

मांगणियार → कमायचा

लंगा → सारंगी

दोनों पश्चिमी राजस्थान की प्रसिद्ध संगीत परंपराएँ हैं, इसलिए विकल्पों में इन्हें बदलकर पूछा जा सकता है।

Trap 3: अलगोजा और पुंगी

अलगोजा → दो बाँसुरी

पुंगी → लौकी/तुंबी आधारित सपेरा वाद्य

Trap 4: चंग और ढोल

चंग → होली से विशेष संबंध

ढोल → व्यापक लोकनृत्य/उत्सव ताल वाद्य

Trap 5: भपंग और मोरचंग

भपंग → मेवात के जोगी

मोरचंग → छोटा धातु वाद्य, Jew’s Harp

Trap 6: तंदूरा और जंतर

तंदूरा/चौतारा → भक्ति/तेरहताली संदर्भ

जंतर → देवनारायण जी की फड़

33. परीक्षा में लोक वाद्यों का महत्व

राजस्थान कला एवं संस्कृति के अध्ययन में लोक वाद्य एक छोटा टॉपिक दिखाई देता है, लेकिन इससे कई प्रकार के प्रश्न बनाए जा सकते हैं:

  1. वाद्य और समुदाय का मिलान।

  2. वाद्य और लोकदेवता का मिलान।

  3. वाद्य और लोकनृत्य का संबंध।

  4. वाद्य की श्रेणी।

  5. वाद्य की निर्माण सामग्री।

  6. वाद्य बजाने की विधि।

  7. वाद्य की क्षेत्रीय पहचान।

  8. वाद्य का दूसरा नाम।

  9. लोकगाथा के साथ वाद्य का संबंध।

  10. कथावाचक समुदाय और वाद्य का संबंध।

राजस्थान बोर्ड के संगीत पाठ्यक्रम में लोकसंगीत के अंतर्गत लोकगीत, लोकवाद्य और लोकनृत्य को अलग-अलग अध्ययन बिंदुओं के रूप में शामिल किया गया है, इसलिए यह विषय केवल RPSC/RSMSSB की GK तैयारी के लिए ही नहीं बल्कि संगीत/कला-संस्कृति आधारित पाठ्यक्रम के लिए भी उपयोगी है।

34. Syllabus Weight: कितनी प्राथमिकता दें?

लोक वाद्य यंत्रों का अलग से निश्चित प्रश्न-भार हर परीक्षा में तय नहीं होता। RPSC, RSMSSB और CET की अलग-अलग परीक्षाओं में कला एवं संस्कृति से प्रश्नों की संख्या और वितरण बदल सकता है।

लेकिन राजस्थान GK में कला एवं संस्कृति एक recurring/scoring area है। सुयोग अकादमी के Rajasthan GK syllabus framework में भी कला, संस्कृति एवं विरासत को महत्वपूर्ण परीक्षा क्षेत्र के रूप में रखा गया है, जिसमें लोकनृत्य, लोकगीत, लोकदेवता, मेले, चित्रकला और हस्तशिल्प जैसे विषय शामिल हैं।

Priority Level

TopicPriority
रावणहत्था + पाबूजी🔥🔥🔥🔥🔥
कमायचा + मांगणियार🔥🔥🔥🔥🔥
जंतर + देवनारायण🔥🔥🔥🔥🔥
अलगोजा🔥🔥🔥🔥
भपंग🔥🔥🔥🔥
सारंगी + लंगा🔥🔥🔥🔥
पुंगी + कालबेलिया🔥🔥🔥🔥
अंतिम संशोधन (Last Updated): 16 अगस्त 2026
✓ 100% सिलेबस सत्यापित (2026 पैटर्न)
Sudhir Dhakaइतिहास विशेषज्ञलेखक परिचय

🎯 विगत वर्षों के प्रश्न (Interactive PYQs)

Q1. रावणहत्था किस लोकदेवता की फड़ के वाचन से प्रमुख रूप से संबंधित है?

अभ्यास प्रश्न 2026

Q2. कमायचा किस समुदाय का प्रमुख लोक वाद्य माना जाता है?

अभ्यास प्रश्न 2026

Q3. जंतर का संबंध किस लोकदेवता की फड़ से है?

अभ्यास प्रश्न 2026

Q4. अलगोजा की सबसे प्रमुख विशेषता क्या है?

अभ्यास प्रश्न 2026

Q5. भपंग का संबंध राजस्थान के किस क्षेत्र से विशेष रूप से जोड़ा जाता है?

अभ्यास प्रश्न 2026

Q6. कालबेलिया समुदाय से संबंधित प्रमुख पारंपरिक सुषिर वाद्य कौन-सा है?

अभ्यास प्रश्न 2026

Q7. मांगणियारों के प्रमुख वाद्यों में कौन-सा शामिल है?

अभ्यास प्रश्न 2026

Q8. लंगा समुदाय की संगीत परंपरा में कौन-सा वाद्य महत्वपूर्ण है?

अभ्यास प्रश्न 2026

Q9. “बोलने वाला ड्रम” किस लोक वाद्य को कहा जाता है?

अभ्यास प्रश्न 2026

Q10. Jew’s Harp के नाम से कौन-सा वाद्य जाना जाता है?

अभ्यास प्रश्न 2026

Q11. होली के अवसर पर राजस्थान में विशेष रूप से प्रसिद्ध ताल वाद्य कौन-सा है?

अभ्यास प्रश्न 2026

Q12. निम्न में से कौन-सा सुषिर वाद्य है?

अभ्यास प्रश्न 2026

Q13. निम्न में से कौन-सा वाद्य गज से बजाया जाता है?

अभ्यास प्रश्न 2026

Q14. पाबूजी की फड़ का वाचन करने वाले पारंपरिक कथावाचक को क्या कहा जाता है?

अभ्यास प्रश्न 2026

Q15. देवनारायण जी की फड़ से संबंधित वाद्य कौन-सा है?

अभ्यास प्रश्न 2026

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