लोकदेवता एवं लोकगाथाएँ: फड़, भोपे एवं लोक परंपरा
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लोकदेवता एवं लोकगाथाएँ: फड़, भोपे एवं लोक परंपरा
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⚡ Quick Answer: राजस्थान में लोकदेवताओं की कथाएँ तीन माध्यमों से जीवित हैं — लोकगाथा (गाई जाने वाली वीर/भक्ति कथा), फड़ (कपड़े पर चित्रित गाथा) और भोपे (गाथा गाने वाले पुजारी-गायक)। पाबूजी की फड़ नायक भोपे रावणहत्था पर गाते हैं; देवनारायण की फड़ (सबसे लंबी) गुर्जर भोपे जंतर पर; रामदेवजी की फड़ कामड़ भोपे; रामदला-कृष्णदला की फड़ भांड भोपे बिना वाद्य; भैंसासुर की फड़ का वाचन नहीं होता। पाबूजी के ‘पवाड़े’ माठ वाद्य पर गाए जाते हैं। फड़ चित्रण का केंद्र शाहपुरा (भीलवाड़ा) का जोशी परिवार है — श्रीलाल जोशी को पद्मश्री (2006) मिला। देवनारायण की फड़ पर 1992 में डाक टिकट जारी हुआ।
1. लोकगाथा क्या है?
लोकगाथा वह लंबी पद्यात्मक कथा है जो किसी वीर, संत या प्रेमी-युगल के जीवन को गाकर सुनाती है और पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक रूप से चलती है। राजस्थान में लोकगाथाओं का सबसे बड़ा हिस्सा लोकदेवताओं से जुड़ा है — पाबूजी, देवनारायण, रामदेवजी, तेजाजी, गोगाजी। इन गाथाओं ने अनपढ़ ग्रामीण समाज तक इतिहास, धर्म और नैतिक मूल्य पहुँचाए। राजस्थानी में लोकगाथा को ‘पवाड़ा’ (वीर-कथा) भी कहा जाता है।
| तत्व | अर्थ |
|---|---|
| लोकगाथा/पवाड़ा | गाई जाने वाली लंबी वीर/भक्ति कथा |
| फड़ (पड़) | कपड़े पर चित्रित लोकगाथा — ‘चलता-फिरता मंदिर’ |
| भोपा | लोकदेवता का पुजारी-गायक जो फड़ बाँचता है |
| भोपी | भोपे की पत्नी/सहयोगी, जो दीपक से फड़ के चित्र दिखाती है |
| फड़ वाचन / पड़ बाँचना | फड़ के सामने रात भर गाथा गाने की प्रक्रिया |
| कावड़ | लकड़ी का चित्रित कपाटों वाला चलता-फिरता मंदिर |
लोकदेवताओं का परिचय: लोकदेवता एवं लोकदेवियाँ — Master Guide | फड़ की चित्र-शैली, रंग व तकनीक पर अलग लेख: फड़ चित्रकला
2. फड़ वाचन — एक प्रदर्शन परंपरा (चरणबद्ध)
- आमंत्रण: किसी परिवार में मन्नत पूरी होने, पशु बीमार होने या उत्सव पर भोपे को फड़ बँचवाने बुलाया जाता है।
- फड़ खोलना: सूर्यास्त के बाद गाँव के चौक में दो बाँसों के सहारे फड़ तानी जाती है; लपेटकर रखी फड़ को खोलना भी अनुष्ठान है।
- गायन-वादन: भोपा वाद्य (रावणहत्था/जंतर) बजाते हुए गाथा गाता है और नृत्य-मुद्राएँ करता है।
- चित्र-प्रदर्शन: भोपी हाथ में दीपक लेकर फड़ के उस हिस्से को रोशन करती है जिसका प्रसंग गाया जा रहा है।
- गद्य व्याख्या: गायन के बीच भोपा गद्य में प्रसंग समझाता है — इसे ‘अरथाव’ भी कहा जाता है।
- रात भर प्रस्तुति: पूरी गाथा कई रातों तक चल सकती है; भोर में आरती के साथ समापन।
- फड़ ठंडी करना: पुरानी या फटी फड़ को फेंका नहीं जाता — पुष्कर सरोवर में विधिपूर्वक विसर्जित किया जाता है।
3. प्रमुख फड़ें — भोपा, वाद्य एवं विशेषता (सबसे महत्वपूर्ण तालिका)
| फड़ | वाचक (भोपा) | वाद्य | विशेषता |
|---|---|---|---|
| पाबूजी की फड़ | नायक (आयड़) भोपे | रावणहत्था | सबसे लोकप्रिय फड़; रेबारी ऊँट बीमार होने पर बँचवाते हैं |
| देवनारायण जी की फड़ | गुर्जर भोपे | जंतर | सबसे लंबी फड़, सर्वाधिक प्रसंग; 1992 में डाक टिकट |
| रामदेवजी की फड़ | कामड़ भोपे | रावणहत्था | चित्रांकन चौथमल चितेरे से जोड़ा जाता है |
| रामदला-कृष्णदला की फड़ | भांड भोपे | कोई वाद्य नहीं | हाड़ौती क्षेत्र; राम-कृष्ण कथा; दिन में भी वाचन |
| भैंसासुर की फड़ | बावरी जाति | — | वाचन नहीं होता; पूजा की जाती है |
ट्रिक: “पाबू–नायक–रावणहत्था; देव–गुर्जर–जंतर; राम-कृष्ण–भांड–बिना बाजा; भैंसा–बावरी–बिना बाँचे”।
फड़ से जुड़े लोकदेवता: पाबूजी | देवनारायण जी | रामदेवजी
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4. भोपों के प्रकार — लोकदेवता अनुसार
| भोपा/वाचक | संबंधित लोकदेवता/परंपरा | वाद्य/रूप | टिप्पणी |
|---|---|---|---|
| नायक/आयड़ भोपे | पाबूजी | रावणहत्था | भोपा-भोपी जोड़ी में फड़ वाचन |
| थोरी/नायक | पाबूजी के पवाड़े | माठ | फड़ के बिना वीर-गाथा गायन |
| गुर्जर भोपे | देवनारायण जी (बगड़ावत गाथा) | जंतर | सबसे लंबी गाथा |
| कामड़ | रामदेवजी | रावणहत्था; भजन में तंदूरा | कामड़ स्त्रियाँ तेरहताली करती हैं |
| भांड भोपे | रामदला-कृष्णदला | बिना वाद्य | हाड़ौती |
| घोड़ला | तेजाजी | — | जिन पर ‘भाव’ आने की लोक-मान्यता; सर्पदंश का ‘उपचार’ |
| गोगाजी के भोपे | गोगाजी | डेरू | सर्प-दंश संबंधी लोक-अनुष्ठान |
| पाट भोपा | गवरी (भील) | मांदल, थाली | 40 दिन के गवरी अनुष्ठान का प्रमुख |
| कावड़िया भाट | कावड़ (राम-कथा आदि) | — | कावड़ के कपाट खोलते हुए कथा |
गवरी व पाट भोपा: गवरी लोकनाट्य | तेरहताली: तेरहताली नृत्य
5. लोकगाथा-गायन के वाद्य
| वाद्य | प्रकार | बनावट | संबंधित गाथा/गायक |
|---|---|---|---|
| रावणहत्था | तत् (गज से बजने वाला) | आधे नारियल की कटोरी पर खाल, बाँस की डंडी, तार; घोड़े के बालों का गज | पाबूजी व रामदेवजी की फड़ |
| जंतर | तत् | वीणा जैसा; दो तुंबे; गले में लटकाकर | देवनारायण की फड़ (गुर्जर भोपे) |
| माठ | अवनद्ध | मिट्टी के बड़े पात्र के मुँह पर खाल | पाबूजी के पवाड़े |
| डेरू | अवनद्ध | डमरू का बड़ा रूप | गोगाजी व भैरूजी के भोपे |
| सारंगी | तत् | गज से बजने वाला | जोगी — भरथरी-गोपीचंद की गाथा |
| कमायचा | तत् | बड़ा गोल तुंबा, गज से | मांगणियार — लोकगाथा व लोकगीत |
वाद्यों का पूरा वर्गीकरण: राजस्थान के लोक वाद्यों का वर्गीकरण | वादक: लोक वाद्य एवं प्रमुख वादक
6. राजस्थान की प्रमुख लोकगाथाएँ
6.1 लोकदेवताओं से जुड़ी गाथाएँ
| गाथा | नायक | गायक/माध्यम | विशेष |
|---|---|---|---|
| पाबूजी री पड़ / पवाड़े | पाबूजी | नायक भोपे (फड़), थोरी (माठ) | ग्रंथ ‘पाबू प्रकाश’ — आशिया मोडजी |
| बगड़ावत (बगड़ावत भारत) | 24 बगड़ावत भाई व देवनारायण | गुर्जर भोपे (जंतर) | राजस्थान की सबसे लंबी लोकगाथा |
| रामदेवजी के भजन/ब्यावले | रामदेवजी | कामड़, जम्मा जागरण | ‘चौबीस बाणियाँ’ — रामदेवजी की रचना |
| तेजा टेर | तेजाजी | किसान (खेत में बुवाई पर) | कृषि से जुड़ी गाथा |
| गोगाजी री गाथा | गोगाजी | गोगाजी के भोपे (डेरू) | गोगा नवमी पर |
6.2 प्रेम एवं वीर लोकगाथाएँ
| गाथा | क्षेत्र/गायक | विशेष |
|---|---|---|
| ढोला-मारू | मारवाड़; ढाढ़ी | ‘ढोला मारू रा दूहा’ — कुशललाभ (16वीं सदी) से संबद्ध |
| मूमल-महेंद्र | जैसलमेर (लोद्रवा) | प्रेम-कथा; ‘मूमल’ लोकगीत भी |
| निहालदे-सुल्तान | शेखावाटी/मारवाड़ | प्रेम-गाथा; अलीबख्शी ख्याल का विषय भी |
| जेठवा-ऊजली | पश्चिमी राजस्थान | विरह-गाथा |
| बीजा-सोरठ | मारवाड़ | प्रेम-गाथा |
| भरथरी-गोपीचंद | जोगी (सारंगी) | वैराग्य-गाथा, नाथ परंपरा |
| आल्हा-ऊदल | पूर्वी राजस्थान | वीर-गाथा; बुंदेलखंड से साझा |
| अमरसिंह राठौड़ | मारवाड़-बीकानेर | वीर-गाथा; रम्मत का भी विषय |
लोक गायन शैलियों (मांड, पावड़ा आदि) के लिए राजस्थान के प्रमुख लोक गायन और गायक जातियों के लिए लोक गायक-गायिकाएँ देखें।
7. लोकगाथा गाने वाली जातियाँ/समुदाय
| समुदाय | परंपरा |
|---|---|
| भोपे (नायक, गुर्जर, कामड़, भांड) | लोकदेवताओं की फड़ वाचन |
| चारण | डिंगल में वीर-काव्य; देवियों के गीत ‘चिरजा’ |
| भाट / राव | वंशावली लेखन व गायन; कावड़िया भाट — कावड़ वाचन |
| ढाढ़ी | ढोला-मारू व वीर-गाथाएँ |
| मांगणियार (कमायचा) व लंगा (सारंगी) | पश्चिमी राजस्थान के पेशेवर लोकगायक |
| जोगी | भरथरी, गोपीचंद की गाथा — सारंगी के साथ |
| मिरासी | वंश-प्रशंसा व लोकगीत |
8. कावड़ — चलता-फिरता मंदिर
- कावड़ लकड़ी का बना छोटा मंदिरनुमा बक्सा है जिसके कई कपाट (दरवाज़े) होते हैं; हर कपाट पर कथा के चित्र।
- निर्माण-केंद्र — बस्सी (चित्तौड़गढ़); बनाने वाली जाति — खेरादी; प्रसिद्ध कलाकार — मांगीलाल मिस्त्री।
- कावड़िया भाट कपाट एक-एक कर खोलते हुए राम-कथा, कृष्ण-कथा व लोकदेवताओं की कथा सुनाते हैं।
- फड़ (कपड़ा) बनाम कावड़ (लकड़ी) — दोनों ‘चित्र + कथा’ परंपरा, पर माध्यम अलग।
राज्य के अन्य हस्तशिल्प: राजस्थान के प्रमुख हस्तशिल्प
9. शाहपुरा का जोशी परिवार एवं फड़ का संरक्षण
- फड़ चित्रण का पारंपरिक केंद्र — शाहपुरा (भीलवाड़ा); चितेरे — जोशी परिवार।
- श्रीलाल जोशी (1931–2018) — पद्मश्री 2006; 1960 में ‘जोशी कला कुंज’ (अब ‘चित्रशाला’) की स्थापना कर परिवार से बाहर के कलाकारों को भी प्रशिक्षण दिया।
- अन्य प्रमुख नाम — शांतिलाल जोशी, कल्याण जोशी; नई पीढ़ी आधुनिक विषयों (स्वच्छता, साक्षरता, बालिका शिक्षा) पर भी फड़ बनाती है।
- 1992 — देवनारायण की फड़ पर भारत सरकार ने डाक टिकट जारी किया।
- फड़ कलाकारों पर नए सम्मान/पुरस्कार करेंट अफेयर्स में आते रहते हैं — डेली करेंट अफेयर्स पढ़ते रहें।
10. जागरण व अन्य मौखिक परंपराएँ
| परंपरा | संबंध |
|---|---|
| जम्मा | रामदेवजी का रात्रि जागरण |
| रातीजगा | स्त्रियों द्वारा देवी-देवताओं का रात्रि जागरण (विवाह, जन्म आदि पर) |
| चिरजा | देवियों की स्तुति के गीत |
| हरजस | भक्ति-भजन (मृत्यु-शोक के समय भी) |
| तेजा टेर | बुवाई के समय तेजाजी का गीत |
11. सांस्कृतिक महत्व एवं चुनौतियाँ
- मौखिक इतिहास: लोकगाथाएँ स्थानीय इतिहास (जैसे बगड़ावत-राण भिणाय संघर्ष, पाबूजी-जींदराव) की स्मृति सँभालती हैं।
- बहु-कला संगम: चित्रकला (फड़), संगीत (रावणहत्था-जंतर), नृत्य और नाट्य एक साथ।
- चुनौतियाँ: भोपों की नई पीढ़ी का पलायन, पारिश्रमिक में कमी, मनोरंजन के आधुनिक साधन।
- संरक्षण: राजस्थान संगीत नाटक अकादमी, पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र (उदयपुर), भारतीय लोक कला मंडल (उदयपुर) द्वारा दस्तावेज़ीकरण; पर्यटन आयोजनों में रावणहत्था वादकों की प्रस्तुति।
📝 One-Liner Revision (15 प्रश्न)
- सबसे लोकप्रिय फड़ — पाबूजी की
- सबसे लंबी फड़ — देवनारायण जी की
- देवनारायण की फड़ का वाद्य — जंतर
- पाबूजी की फड़ का वाद्य — रावणहत्था
- पाबूजी के पवाड़ों का वाद्य — माठ
- बिना वाद्य बाँची जाने वाली फड़ — रामदला-कृष्णदला
- जिस फड़ का वाचन नहीं होता — भैंसासुर की फड़
- भैंसासुर की फड़ किस जाति से जुड़ी — बावरी
- फड़ चित्रण का केंद्र — शाहपुरा (भीलवाड़ा)
- श्रीलाल जोशी को पद्मश्री — 2006
- देवनारायण फड़ पर डाक टिकट — 1992
- पुरानी फड़ का विसर्जन — पुष्कर
- कावड़ निर्माण केंद्र — बस्सी (चित्तौड़गढ़)
- राजस्थान की सबसे लंबी लोकगाथा — बगड़ावत
- देवियों के गीत — चिरजा
✅ मुख्य बिंदु (Key Points)
- लोकगाथा = गाई जाने वाली कथा; फड़ = कपड़े पर चित्रित कथा; भोपा = गाने वाला पुजारी।
- फड़–भोपा–वाद्य: पाबू–नायक–रावणहत्था; देवनारायण–गुर्जर–जंतर; रामदेव–कामड़; रामदला-कृष्णदला–भांड–बिना वाद्य; भैंसासुर–बावरी–वाचन नहीं।
- शाहपुरा का जोशी परिवार; श्रीलाल जोशी (पद्मश्री 2006); 1992 डाक टिकट।
- कावड़ — बस्सी, खेरादी, कावड़िया भाट।
🎯 Exam Trap — इन गलतियों से बचें
- जंतर पाबूजी से नहीं, देवनारायण से जुड़ा है; पाबूजी का वाद्य रावणहत्था।
- माठ पाबूजी के पवाड़ों का वाद्य है, फड़ का नहीं — ‘फड़’ और ‘पवाड़े’ अलग माध्यम।
- शाहपुरा (भीलवाड़ा) फड़ का केंद्र है; जयपुर का शाहपुरा भी है — विकल्प में जिला देखें।
- कावड़ बस्सी (चित्तौड़गढ़) की है, बस्सी (जयपुर) की नहीं।
🧠 मेमोरी ट्रिक
“देव का जंतर, पाबू का रावण” → देवनारायण–जंतर, पाबूजी–रावणहत्था।
“भैंसा बोलता नहीं” → भैंसासुर की फड़ का वाचन नहीं।
“माठ में पवाड़ा, डेरू में गोगा”।
👨🏫 शिक्षक की परीक्षा टिप्पणी
इस विषय में ‘फड़–भोपा–वाद्य’ त्रिकोण (भाग 3 व 4) सबसे अधिक पूछा जाता है — RAS प्रारंभिक, द्वितीय श्रेणी शिक्षक और CET तीनों में। फड़ चित्रकला की तकनीक (रंग, रेखा, शैली) के प्रश्न चित्रकला खंड से आते हैं, इसलिए दोनों लेख साथ पढ़ें। मुख्य परीक्षा में ‘फड़ — चित्र, संगीत और नाट्य का संगम’ विषय पर भाग 2 का चरणबद्ध विवरण आदर्श उत्तर का ढाँचा है।
✍️ अभ्यास करें — क्विज़ व टेस्ट सीरीज़
लोकगाथा, फड़ एवं भोपे व राजस्थान की अन्य लोक-कलाओं पर अपनी तैयारी जाँचने के लिए नीचे दिए अभ्यास सेट हल करें:
- राजस्थान लोकदेवता अभ्यास क्विज़
- राजस्थान कला एवं संस्कृति प्रश्नोत्तरी
- राजस्थान लोककला एवं संस्कृति अभ्यास
- RPSC RAS Prelims 2026 टेस्ट सीरीज़
- RPSC द्वितीय श्रेणी वरिष्ठ अध्यापक 2026 टेस्ट सीरीज़
- RPSC प्रथम श्रेणी व्याख्याता 2026 टेस्ट सीरीज़
- Rajasthan CET (स्नातक) फाइनल मेगा टेस्ट सीरीज़
- राजस्थान पटवारी 2026 टेस्ट सीरीज़
पूरी कला एवं संस्कृति इकाई के नोट्स: राजस्थान कला एवं संस्कृति — सभी नोट्स | परीक्षा में आने वाले नए सांस्कृतिक तथ्य (पुरस्कार, महोत्सव, GI टैग): करेंट अफेयर्स
📚 संबंधित नोट्स (आगे क्या पढ़ें?)
- लोकदेवता एवं लोकदेवियाँ — Master Guide
- लोकदेवताओं का तुलनात्मक अध्ययन — जन्मस्थान, मेला, वाहन, प्रतीक
- पंचपीर एवं अन्य लोकदेवताओं में अंतर
- राजस्थान की प्रमुख लोकदेवियाँ एवं कुलदेवियाँ
- फड़ चित्रकला
- पाबूजी
- देवनारायण जी
- रामदेवजी
- गवरी लोकनाट्य
- राजस्थान चित्रकला के प्रमुख चित्रकार
📖 प्रामाणिक संदर्भ एवं स्रोत
- माध्यमिक शिक्षा बोर्ड राजस्थान (RBSE) — ‘राजस्थान का इतिहास एवं संस्कृति’ (फड़, लोकगाथाएँ)।
- पद्म पुरस्कार 2006 — गृह मंत्रालय, भारत सरकार (श्रीलाल जोशी, फड़ चित्रकला)।
- भारतीय डाक — 1992 का देवनारायण फड़ डाक टिकट।
- राजस्थान संगीत नाटक अकादमी, जोधपुर एवं भारतीय लोक कला मंडल, उदयपुर — लोकगाथा दस्तावेज़ीकरण।

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🎯 विगत वर्षों के प्रश्न (Interactive PYQs)
Q1. ‘जंतर’ वाद्य का प्रयोग किस लोकदेवता की फड़ के वाचन में होता है?
सुयोग अभ्यास प्रश्न (RPSC/RSMSSB पैटर्न) 2026Q2. किस फड़ का वाचन बिना किसी वाद्य के किया जाता है?
सुयोग अभ्यास प्रश्न (RPSC/RSMSSB पैटर्न) 2026Q3. पाबूजी के ‘पवाड़े’ किस वाद्य के साथ गाए जाते हैं?
सुयोग अभ्यास प्रश्न (RPSC/RSMSSB पैटर्न) 2026Q4. कावड़ कला का प्रमुख केंद्र है —
सुयोग अभ्यास प्रश्न (RPSC/RSMSSB पैटर्न) 2026Q5. देवनारायण जी की फड़ पर भारत सरकार ने डाक टिकट कब जारी किया?
सुयोग अभ्यास प्रश्न (RPSC/RSMSSB पैटर्न) 2026महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)
पाबूजी की फड़ नायक भोपे रावणहत्था के साथ बाँचते हैं, जबकि देवनारायण जी की फड़ गुर्जर भोपे जंतर वाद्य के साथ बाँचते हैं।
भैंसासुर की फड़ का वाचन नहीं होता, केवल पूजा की जाती है। यह बावरी जाति से जुड़ी है।
देवनारायण जी की फड़ सबसे लंबी है और उससे जुड़ी बगड़ावत गाथा (बगड़ावत भारत) राजस्थान की सबसे लंबी लोकगाथा मानी जाती है।
फड़ चित्रण का प्रमुख केंद्र शाहपुरा (भीलवाड़ा) है, जहाँ जोशी परिवार पीढ़ियों से फड़ बनाता है। श्रीलाल जोशी को 2006 में पद्मश्री मिला।
कावड़ लकड़ी का बना चित्रित कपाटों वाला चलता-फिरता मंदिर है। इसका निर्माण बस्सी (चित्तौड़गढ़) की खेरादी जाति करती है और कावड़िया भाट कपाट खोलते हुए कथा सुनाते हैं।
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