बीकानेर के मुगलकालीन शासक — लूणकरण से अनूपसिंह, रायसिंह व जूनागढ़ — RAS/CET
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संक्षिप्त उत्तर: राव बीका के बाद बीकानेर के राठौड़ शासकों ने पहले संघर्ष और फिर मुगल सेवा से राज्य को मज़बूत किया। राव लूणकरण (1505–1526) दानशीलता के कारण "कलियुग का कर्ण" कहलाए और ढोसी के युद्ध (1526) में मारे गए। राव जैतसी ने 1534 में रातीघाटी के युद्ध में बाबर के पुत्र कामरान को हराया — इसका वर्णन बीठू सूजा के "राव जैतसी रो छंद" में है; 1541 में पहोबा (साहेबा) युद्ध में मालदेव से लड़ते हुए वे मारे गए। राव कल्याणमल ने शेरशाह की सहायता से राज्य वापस पाया और 1570 के नागौर दरबार में अकबर की अधीनता स्वीकार की; उनके पुत्र पृथ्वीराज राठौड़ (पीथल) ने "वेलि क्रिसन रुकमणी री" रची। महाराजा रायसिंह (1574–1612) — "राजपूताने का कर्ण" (मुंशी देवीप्रसाद), बीकानेर के पहले "महाराजा"; मंत्री कर्मचंद की देखरेख में जूनागढ़ दुर्ग (1589–1594) बनवाया और रायसिंह प्रशस्ति (रचयिता जइता) लगवाई। कर्णसिंह (1631–1669) — "जांगलधर बादशाह"; अनूपसिंह (1669–1698) — औरंगज़ेब से "माही मरातिब", अनूप संस्कृत पुस्तकालय व दक्षिण से पांडुलिपियों का संरक्षण। आगे सूरतसिंह (1805 भटनेर → हनुमानगढ़; 1818 ब्रिटिश संधि), सरदारसिंह (1857) और अंततः गंगासिंह (1887–1943)।
संक्षिप्त उत्तर
शासक | शासनकाल | सबसे महत्वपूर्ण तथ्य |
|---|---|---|
राव लूणकरण | 1505–1526 | "कलियुग का कर्ण"; ढोसी का युद्ध (1526) में मृत्यु |
राव जैतसी | 1526–1541 | रातीघाटी का युद्ध 1534 — कामरान पराजित; "राव जैतसी रो छंद" (बीठू सूजा) |
राव कल्याणमल | 1544–1574 (लगभग) | गिरी-सुमेल 1544 में शेरशाह के साथ; 1570 नागौर दरबार में अकबर की अधीनता |
पृथ्वीराज राठौड़ (पीथल) | — (कल्याणमल के पुत्र) | "वेलि क्रिसन रुकमणी री"; "डिंगल का होरेस" (तैस्सितोरी) |
महाराजा रायसिंह | 1574–1612 | "राजपूताने का कर्ण"; जूनागढ़ दुर्ग 1589–94; रायसिंह प्रशस्ति |
दलपतसिंह | 1612–1613 | जहाँगीर से अनबन; अल्पकालीन शासन |
सूरसिंह | 1613–1631 | जहाँगीर द्वारा मान्य; कर्मचंद के पुत्रों से प्रतिशोध |
महाराजा कर्णसिंह | 1631–1669 | "जांगलधर बादशाह"; "साहित्य कल्पद्रुम" |
महाराजा अनूपसिंह | 1669–1698 | "माही मरातिब" (औरंगज़ेब); अनूप संस्कृत पुस्तकालय |
सूरतसिंह | 1787–1828 | 1805 भटनेर विजय → हनुमानगढ़; 1818 ब्रिटिश संधि |
सरदारसिंह | 1851–1872 | 1857 में अंग्रेज़ों की सहायता; टीबी परगने के 41 गाँव |
गंगासिंह | 1887–1943 | गंगनहर (1927); अलग नोट देखें |
2. सिलेबस में यह टॉपिक क्यों महत्वपूर्ण है?
RAS और राजस्थान CET के "राजस्थान का इतिहास" खंड में बीकानेर राज्य के प्रश्न प्रायः उपाधियों ("कलियुग का कर्ण", "राजपूताने का कर्ण", "जांगलधर बादशाह", "माही मरातिब"), युद्धों (रातीघाटी, पहोबा), जूनागढ़ दुर्ग व रायसिंह प्रशस्ति और साहित्य (वेलि क्रिसन रुकमणी री, राव जैतसी रो छंद, अनूपसिंह के दरबारी विद्वान) से आते हैं। बीकानेर की स्थापना और राव बीका–करणी माता संबंध के लिए अलग नोट हैं; यह नोट लूणकरण से अनूपसिंह तक के मुगलकालीन शासकों पर केंद्रित है — यही वह काल है जिसमें बीकानेर एक छोटे मरुस्थलीय राज्य से मुगल साम्राज्य का विश्वसनीय सहयोगी बना।
परीक्षा उपयोगिता: ★★★★☆
RPSC RAS प्रारंभिक व मुख्य — मुगल-राजपूत संबंध, रायसिंह, अनूपसिंह की सांस्कृतिक देन
राजस्थान CET (12वीं व स्नातक) — उपाधि–शासक मिलान, युद्ध-वर्ष, ग्रंथ–रचनाकार
पटवारी, VDO — एक-पंक्ति तथ्य: रातीघाटी 1534, जूनागढ़ 1589–94, पीथल
REET — राजस्थान का इतिहास व साहित्य भाग
राजस्थान SI — दुर्ग, प्रशस्ति और शासक
प्रश्न कैसे आते हैं?
"'राजपूताने का कर्ण' किसे कहा जाता है?" — विकल्पों में लूणकरण और कर्णसिंह भ्रम के लिए
"रातीघाटी का युद्ध किनके बीच हुआ?"
"जूनागढ़ दुर्ग का निर्माण किसकी देखरेख में हुआ?"
ग्रंथ — रचनाकार मिलान (वेलि, राव जैतसी रो छंद, कर्णभूषण, संगीत अनूपांकुश)
"बीकानेर का कौन शासक सबसे पहले मुगल अधीनता में गया?"
"माही मरातिब की उपाधि किसने किसे दी?"
3. पृष्ठभूमि: राव बीका के बाद बीकानेर
राव जोधा के पुत्र राव बीका ने करणी माता के आशीर्वाद से जांगल प्रदेश में नया राज्य बनाया और 1488 में बीकानेर नगर बसाया — इसका विस्तृत विवरण राव बीका व करणी माता संबंध नोट में है, और पूरे वंश का क्रमवार परिचय बीकानेर राजवंश का इतिहास नोट में। बीका के बाद उनके पुत्र राव नरा थोड़े समय (लगभग 1504–1505) शासक रहे; उनकी मृत्यु के बाद छोटे भाई लूणकरण गद्दी पर बैठे।
इस काल की तीन बड़ी प्रवृत्तियाँ समझ लें:
पड़ोसी संघर्ष (1505–1544): नारनौल के मुस्लिम शासक, मुगल कामरान और मारवाड़ के राव मालदेव से युद्ध।
मुगल सहयोग (1570 के बाद): कल्याणमल से लेकर अनूपसिंह तक बीकानेर के शासक मुगल मनसबदार बने और गुजरात, काबुल, कंधार तथा दक्षिण में लड़े।
सांस्कृतिक उत्कर्ष: जूनागढ़ दुर्ग, रायसिंह प्रशस्ति, बीकानेर चित्रशैली, डिंगल व संस्कृत साहित्य, अनूप संस्कृत पुस्तकालय।
4. राव लूणकरण (1505–1526)
दानशीलता: अपनी उदारता के कारण चारण-कवियों ने उन्हें "कलियुग का कर्ण" कहा। परीक्षा-पुस्तकों में यह प्रशंसा प्रायः बीठू सूजा के "राव जैतसी रो छंद" से जोड़ी जाती है; जैन कवि जयसोम के "कर्मचंद्रवंशोत्कीर्तनक काव्यम्" में भी उनकी दानशीलता की प्रशंसा है।
विस्तार: ददरेवा (चौहानों से), फतेहपुर (कायमखानियों से) आदि क्षेत्रों पर अभियान; जैसलमेर पर भी आक्रमण किया।
लूणकरणसर: इनके नाम पर बसा कस्बा (बीकानेर ज़िला)।
मृत्यु — ढोसी का युद्ध (1526): नारनौल के शेख अबीमीरा के विरुद्ध ढोसी (नारनौल के पास) में लड़ते हुए मारे गए। यही वर्ष पानीपत के प्रथम युद्ध (1526) का भी है — यह संयोग याद रखने में मदद करता है।
लूणकरण = "कलियुग का कर्ण" (दान) | रायसिंह = "राजपूताने का कर्ण" (दान व वीरता) — दोनों "कर्ण", पर अलग शासक।
5. राव जैतसी और रातीघाटी का युद्ध (1534)
5.1 कामरान का आक्रमण
बाबर का पुत्र कामरान (हुमायूँ का भाई, लाहौर-काबुल क्षेत्र का शासक) अपने विस्तार के क्रम में पहले भटनेर (आज का हनुमानगढ़) जीतकर बीकानेर की ओर बढ़ा और राव बीका द्वारा बनवाए गए पुराने गढ़ पर अधिकार कर लिया। 1534 में राव जैतसी ने रात्रि में अचानक आक्रमण कर कामरान की सेना को पराजित किया — यही रातीघाटी का युद्ध है। कामरान को लौटना पड़ा।
बिंदु | तथ्य |
|---|---|
युद्ध | रातीघाटी का युद्ध |
वर्ष | 1534 |
पक्ष | राव जैतसी (बीकानेर) बनाम कामरान (बाबर का पुत्र) |
परिणाम | जैतसी विजयी; कामरान लौटा |
साहित्यिक स्रोत | "राव जैतसी रो छंद" — बीठू सूजा (डिंगल) |
विशेषता | किसी मुगल राजकुमार पर राजस्थान के एक राठौड़ शासक की स्पष्ट विजय |
"राव जैतसी रो छंद" चारण कवि बीठू सूजा की डिंगल रचना है। इसमें जैतसी की कामरान पर विजय का वीर-रसपूर्ण वर्णन है और यह बीकानेर के प्रारंभिक इतिहास का महत्वपूर्ण साहित्यिक स्रोत माना जाता है।
5.2 मालदेव से संघर्ष — पहोबा (साहेबा) का युद्ध
मारवाड़ के महत्वाकांक्षी शासक राव मालदेव ने बीकानेर पर आक्रमण किया। पहोबा (साहेबा) के युद्ध में जैतसी लड़ते हुए मारे गए और बीकानेर पर मालदेव का अधिकार हो गया। परीक्षा-पुस्तकों में इस युद्ध का वर्ष प्रायः 1541 दिया जाता है; कुछ स्रोतों में 1542 मिलता है। मालदेव के विस्तार का पूरा प्रसंग राव मालदेव व गिरी-सुमेल युद्ध नोट में है।
6. राव कल्याणमल — शेरशाह से अकबर तक
6.1 राज्य की पुनर्प्राप्ति
पिता की मृत्यु के बाद कल्याणमल ने सिरसा की ओर शरण ली और मालदेव के विरुद्ध शेरशाह सूरी से सहायता माँगी। 1544 के गिरी-सुमेल युद्ध में कल्याणमल (और मेड़ता के वीरमदेव) शेरशाह के पक्ष में थे। मालदेव की पराजय के बाद शेरशाह ने बीकानेर कल्याणमल को लौटा दिया। इसलिए कल्याणमल का शासन कुछ पुस्तकों में 1542 (गद्दी का दावा) और कुछ में 1544 (वास्तविक पुनर्प्राप्ति) से गिना जाता है।
6.2 नागौर दरबार (1570) — मुगल अधीनता
1570 में अकबर ने नागौर में दरबार लगाया। यहाँ राव कल्याणमल अपने पुत्रों रायसिंह व पृथ्वीराज के साथ उपस्थित हुए और अकबर की अधीनता स्वीकार की।
इस प्रकार कल्याणमल मुगल अधीनता स्वीकार करने वाले बीकानेर के पहले शासक माने जाते हैं।
इसी दरबार में जैसलमेर के रावल हरराय ने भी अधीनता स्वीकारी, जबकि मारवाड़ के राव चंद्रसेन आए पर अधीनता स्वीकार किए बिना लौट गए — देखें राव चंद्रसेन।
नागौर दरबार की स्मृति में अकबर ने वहाँ शुक्र तालाब बनवाया — यह परंपरागत विवरण परीक्षा-पुस्तकों में मिलता है।
1572 में अकबर ने रायसिंह को जोधपुर (मारवाड़) का प्रशासक नियुक्त किया — मारवाड़ उस समय खालसा था।
मुगल-राजपूत संबंधों का व्यापक संदर्भ मुगल-राजपूत संबंध व महाराणा प्रताप नोट में है।
7. पृथ्वीराज राठौड़ "पीथल"
पृथ्वीराज राठौड़ राव कल्याणमल के पुत्र और महाराजा रायसिंह के छोटे भाई थे। वे अकबर के दरबार में रहे, पर इतिहास में उन्हें मुख्यतः डिंगल के महान कवि और कृष्ण-भक्त के रूप में याद किया जाता है। अकबर ने उन्हें गागरोन की जागीर दी — परीक्षा-पुस्तकों में यह तथ्य मिलता है।
विषय | तथ्य |
|---|---|
प्रसिद्ध रचना | "वेलि क्रिसन रुकमणी री" — कृष्ण-रुक्मिणी विवाह, डिंगल भाषा |
वेलि की प्रशंसा | दुरसा आढ़ा ने इसे "पाँचवाँ वेद" और "उन्नीसवाँ पुराण" कहा |
कवि की उपाधि | "डिंगल का होरेस" — इतालवी विद्वान एल.पी. तैस्सितोरी |
अन्य रचनाएँ | "दसम भागवत रा दूहा", "गंगा लहरी" |
उपनाम | "पीथल" (महाराणा प्रताप = "पाथल") |
7.1 पीथल-पाथल प्रसंग (प्रताप को पत्र)
परंपरा के अनुसार अकबर ने दरबार में कहा कि महाराणा प्रताप ने अधीनता का संदेश भेजा है। पृथ्वीराज ने इस पर संदेह करते हुए प्रताप को दोहों में पत्र लिखा — क्या सचमुच "पाथल" झुक गया? प्रताप ने उत्तर में संघर्ष जारी रखने का संकल्प दोहराया। यह प्रसंग लोक-परंपरा और बाद के साहित्य में बहुत लोकप्रिय है (आधुनिक कवि कन्हैयालाल सेठिया की कविता "पीथल और पाथल" इसी पर है), पर समकालीन ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलते, इसलिए इतिहासकार इसे पूर्णतः प्रामाणिक नहीं मानते। परीक्षा में "पत्र किसने लिखा" पूछे तो उत्तर — पृथ्वीराज राठौड़ (बीकानेर)।
पीथल = पृथ्वीराज (बीकानेर, कवि) | पाथल = प्रताप (मेवाड़) — पृथ्वीराज चौहान से न मिलाएँ!
8. महाराजा रायसिंह (1574–1612)
रायसिंह बीकानेर के सबसे प्रतापी शासकों में से हैं। वे कल्याणमल के बड़े पुत्र थे और अकबर व जहाँगीर — दोनों के समय मुगल सेवा में रहे।
8.1 मुगल सेवा
अभियान / पद | विवरण |
|---|---|
जोधपुर का प्रशासक | 1572 — मारवाड़ खालसा होने पर अकबर ने नियुक्त किया |
गुजरात | मिर्ज़ा बंधुओं (मुहम्मद हुसैन मिर्ज़ा आदि) के विद्रोह के दमन में भाग |
मारवाड़ | राव चंद्रसेन के विरुद्ध (सिवाना क्षेत्र) मुगल अभियानों में |
काबुल, कंधार | उत्तर-पश्चिमी सीमा के अभियानों में मुगल सेना के साथ |
दक्षिण (Deccan) | अंतिम वर्षों में दक्षिण में नियुक्त; 1612 में बुरहानपुर में मृत्यु |
मनसब | कई पुस्तकों के अनुसार अकबर के समय 4000; जहाँगीर के समय वृद्धि |
रायसिंह "महाराजा" उपाधि का प्रयोग करने वाले बीकानेर के पहले शासक माने जाते हैं (इससे पहले "राव")।
मुगल परिवार से वैवाहिक संबंध — रायसिंह की पुत्री का विवाह शहज़ादे सलीम (जहाँगीर) से हुआ।
मुंशी देवीप्रसाद ने उन्हें "राजपूताने का कर्ण" कहा — दानशीलता के कारण।
8.2 साहित्य और संस्कृति
"रायसिंह महोत्सव" — वैद्यक (आयुर्वेद) से संबंधित ग्रंथ।
ज्योतिष ग्रंथ पर राजस्थानी टीका — परीक्षा-पुस्तकों में इसे "ज्योतिष रत्नाकर" और कहीं "ज्योतिष रत्नमाला" (बालबोधिनी टीका) नाम से लिखा गया है; दोनों का संबंध रायसिंह से ही है।
बीकानेर चित्रशैली का आरंभ इन्हीं के काल से माना जाता है (भागवत पुराण के चित्र) — विस्तार बीकानेर चित्रकला शैली नोट में।
8.3 मंत्री कर्मचंद
कर्मचंद बच्छावत (जैन, ओसवाल) रायसिंह के प्रधान मंत्री थे, जिनकी देखरेख में जूनागढ़ दुर्ग बना। बाद में कर्मचंद पर रायसिंह के स्थान पर उनके पुत्र दलपत को गद्दी दिलाने के षड्यंत्र का आरोप लगा और वे भागकर अकबर के दरबार (दिल्ली/आगरा) चले गए। जैन कवि जयसोम का संस्कृत ग्रंथ "कर्मचंद्रवंशोत्कीर्तनक काव्यम्" कर्मचंद के वंश और बीकानेर के इतिहास का महत्वपूर्ण स्रोत है।
9. जूनागढ़ दुर्ग और रायसिंह प्रशस्ति
बिंदु | तथ्य |
|---|---|
निर्माता | महाराजा रायसिंह |
निर्माण-काल | नींव 1589, पूर्ण 1594 |
देखरेख | मंत्री कर्मचंद |
पुराना नाम | चिंतामणि दुर्ग |
प्रकार | स्थल / धान्वन (मरुस्थलीय) दुर्ग — बीकानेर नगर के मध्य |
प्रशस्ति | रायसिंह प्रशस्ति (1594) — मुख्य द्वार सूरजपोल पर |
प्रशस्ति रचयिता | जइता (जैन मुनि) |
सूरजपोल की प्रतिमाएँ | चित्तौड़ के वीर जयमल व पत्ता की हाथी-सवार प्रतिमाएँ |
बाद के निर्माण | अनूपसिंह व बाद के शासकों ने महल जोड़े (अनूप महल आदि) |
रायसिंह प्रशस्ति संस्कृत में है और इसमें राव बीका से रायसिंह तक के शासकों की उपलब्धियाँ, रायसिंह के विजय-अभियान और दुर्ग-निर्माण का विवरण है। इसलिए यह बीकानेर के प्रारंभिक इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण अभिलेखीय स्रोत है। ध्यान दें — राव बीका का बनवाया पुराना किला अलग है; जूनागढ़ रायसिंह की देन है। दुर्गों के स्थापत्य व अन्य किलों से तुलना के लिए राजस्थान के प्रमुख किले नोट देखें।
"89 में नींव, 94 में पूर्ण — कर्मचंद की देखरेख, जइता की प्रशस्ति, सूरजपोल पर जयमल-पत्ता।"
10. दलपतसिंह और सूरसिंह (1612–1631)
दलपतसिंह (1612–1613): रायसिंह के बाद गद्दी पर बैठे, पर जहाँगीर का विश्वास नहीं जीत सके। जहाँगीर ने उनके भाई सूरसिंह का समर्थन किया; दलपत को पकड़कर दंडित किया गया और अल्पकाल में ही उनका शासन समाप्त हो गया।
सूरसिंह (1613–1631): जहाँगीर द्वारा मान्य शासक। रायसिंह-काल के षड्यंत्र का बदला लेने के लिए उन्होंने कर्मचंद के पुत्रों (भागचंद व लक्ष्मीचंद) को मरवाया। शाहजहाँ के समय भी मुगल सेवा जारी रही।
11. महाराजा कर्णसिंह (1631–1669)
11.1 राजनीतिक घटनाएँ
शाहजहाँ के समय दक्षिण के अभियानों में सेवा।
उत्तराधिकार युद्ध (1657–58): शाहजहाँ के पुत्रों — दारा, शुजा, औरंगज़ेब, मुराद — के संघर्ष में कर्णसिंह ने किसी पक्ष में खुलकर भाग नहीं लिया (वे दक्षिण में थे और तटस्थ रहे)। इससे औरंगज़ेब उनसे असंतुष्ट रहा। इसी युद्ध में मारवाड़ के जसवंतसिंह दारा के पक्ष से धरमत में लड़े — देखें जसवंत सिंह प्रथम व धरमत युद्ध।
अपने अंतिम वर्ष उन्होंने दक्षिण (औरंगाबाद क्षेत्र) में बिताए और वहीं 1669 में देहांत हुआ।
11.2 "जांगलधर बादशाह"
परंपरागत विवरण के अनुसार औरंगज़ेब हिंदू राजाओं को अटक पार ले जाकर धर्म-परिवर्तन कराना चाहता था; कर्णसिंह ने इस योजना को विफल किया और तब साथी राजपूत राजाओं ने उन्हें "जांगलधर बादशाह" कहा। इस कथा की ऐतिहासिक पुष्टि संदिग्ध है, पर उपाधि का संबंध कर्णसिंह से ही है — और इसके बाद बीकानेर के शासक "जांगलधर बादशाह" विरुद का प्रयोग करते रहे। (जांगल = बीकानेर-नागौर क्षेत्र का प्राचीन नाम।)
11.3 साहित्य
कर्णसिंह ने स्वयं "साहित्य कल्पद्रुम" ग्रंथ की रचना करवाई/की (परीक्षा-पुस्तकों में रचनाकार के रूप में कर्णसिंह का ही नाम)।
दरबारी विद्वान गंगानंद मैथिल — "कर्णभूषण" और "काव्य डाकिनी"।
12. महाराजा अनूपसिंह (1669–1698)
12.1 दक्षिण अभियान और "माही मरातिब"
कर्णसिंह के पुत्र अनूपसिंह औरंगज़ेब के समय दक्षिण भारत में लंबे समय तक नियुक्त रहे। बीजापुर व गोलकुंडा अभियानों में सेवा के बाद वे अदोनी (आदोनी) के किलेदार रहे। उनकी सेवाओं से प्रसन्न होकर औरंगज़ेब ने उन्हें "माही मरातिब" (मछली के प्रतीक वाला सम्मान-चिह्न, उच्च सैनिक प्रतिष्ठा का प्रतीक) प्रदान किया; कई पुस्तकें यह भी लिखती हैं कि औरंगज़ेब ने उन्हें "महाराजा" उपाधि दी। अनूपसिंह की मृत्यु 1698 में दक्षिण (अदोनी) में हुई।
12.2 पांडुलिपियों और मूर्तियों का संरक्षण
दक्षिण के युद्धों और अस्थिरता के बीच नष्ट होने के ख़तरे में पड़ी संस्कृत पांडुलिपियों को अनूपसिंह ने बड़ी संख्या में ख़रीदकर/एकत्र कर बीकानेर भिजवाया। इन्हीं से अनूप संस्कृत पुस्तकालय (आज लालगढ़ महल परिसर, बीकानेर में) बना, जो राजस्थान के सबसे समृद्ध पांडुलिपि-संग्रहों में गिना जाता है। परंपरा के अनुसार उन्होंने दक्षिण से अनेक देव-मूर्तियाँ भी बीकानेर लाकर सुरक्षित कीं।
12.3 स्वयं की रचनाएँ और दरबारी विद्वान
रचनाकार | ग्रंथ | विषय |
|---|---|---|
अनूपसिंह | अनूप विवेक | तंत्र |
अनूपसिंह | काम प्रबोध | कामशास्त्र |
अनूपसिंह | श्राद्ध प्रयोग चिंतामणि | धर्मशास्त्र (श्राद्ध) |
अनूपसिंह | गीत गोविंद पर "अनूपोदय" टीका | जयदेव के गीत गोविंद की व्याख्या |
भाव भट्ट | संगीत अनूपांकुश, अनूप संगीत रत्नाकर, अनूप संगीत विलास | संगीत |
मणिराम दीक्षित | अनूप व्यवहार सागर, अनूप विलास | धर्मशास्त्र / व्यवहार |
चित्रकला: अनूपसिंह का काल बीकानेर शैली का स्वर्णकाल माना जाता है; उस्ता चित्रकार (जैसे रुकनुद्दीन) सक्रिय रहे — देखें बीकानेर की उस्ता कला।
अनूपगढ़: उत्तर-पश्चिमी सीमा पर भाटियों से सुरक्षा हेतु अनूपगढ़ (श्रीगंगानगर क्षेत्र) का दुर्ग इन्हीं के नाम पर बना।
13. अनूपसिंह के बाद से गंगासिंह तक (संक्षेप)
शासक | काल | मुख्य तथ्य |
|---|---|---|
स्वरूपसिंह, सुजानसिंह | 1698–1735 (लगभग) | मुगल सत्ता के पतन का दौर |
जोरावरसिंह, गजसिंह | 1736–1787 (लगभग) | गजसिंह का लंबा शासन; पड़ोसी राज्यों से संघर्ष |
सूरतसिंह | 1787–1828 | 1805 में ज़ाबिता ख़ाँ भट्टी से भटनेर जीता — मंगलवार को विजय होने से नाम हनुमानगढ़; सूरतगढ़ बसाया; 1818 में अंग्रेज़ों से संधि |
रतनसिंह | 1828–1851 | ब्रिटिश संरक्षण का प्रारंभिक काल |
सरदारसिंह | 1851–1872 | 1857 में अंग्रेज़ों की सहायता हेतु स्वयं सेना लेकर गए; पुरस्कार में टीबी परगने के 41 गाँव |
डूंगरसिंह | 1872–1887 | प्रशासनिक सुधार |
गंगासिंह | 1887–1943 | गंगनहर (1927), आधुनिकीकरण — विस्तृत नोट अलग |
सादूलसिंह | 1943–1949 | 30 मार्च 1949 को वृहद राजस्थान में विलय |
महाराजा गंगासिंह का विस्तृत अध्ययन महाराजा गंगासिंह (बीकानेर) नोट में करें; 20वीं सदी के जन-आंदोलनों के लिए बीकानेर प्रजामंडल देखें।
14. शासक Timeline (लूणकरण से अनूपसिंह)
वर्ष | घटना |
|---|---|
1505 | लूणकरण गद्दी पर (राव नरा के बाद) |
1526 | ढोसी का युद्ध — लूणकरण की मृत्यु; जैतसी शासक |
1534 | रातीघाटी का युद्ध — जैतसी ने कामरान को हराया |
1541 (कुछ स्रोत 1542) | पहोबा (साहेबा) युद्ध — जैतसी मालदेव से लड़ते हुए मारे गए |
1544 | गिरी-सुमेल — शेरशाह की विजय; कल्याणमल को बीकानेर वापस |
1570 | नागौर दरबार — कल्याणमल ने अकबर की अधीनता स्वीकारी |
1572 | रायसिंह जोधपुर के प्रशासक नियुक्त |
1574 | रायसिंह बीकानेर के शासक |
1589 | जूनागढ़ दुर्ग की नींव |
1594 | जूनागढ़ पूर्ण; रायसिंह प्रशस्ति |
1612 | रायसिंह की बुरहानपुर में मृत्यु; दलपतसिंह शासक |
1613 | सूरसिंह शासक (जहाँगीर-समर्थित) |
1631 | कर्णसिंह शासक |
1657–58 | मुगल उत्तराधिकार युद्ध — कर्णसिंह तटस्थ |
1669 | कर्णसिंह की मृत्यु; अनूपसिंह शासक |
1698 | अनूपसिंह की अदोनी (दक्षिण) में मृत्यु |
तिथि-भिन्नता: कल्याणमल के आरोहण (1542/1544) और रायसिंह के आरोहण (अधिकांश पुस्तकों में 1574; कुछ में 1571) को लेकर पुस्तकों में अंतर है। परीक्षा के लिए रायसिंह 1574–1612 और पहोबा 1541 याद रखें।
15. उपाधियाँ — शासक — किसने दी
उपाधि / विरुद | शासक / व्यक्ति | किसने दी / किसने कहा |
|---|---|---|
कलियुग का कर्ण | राव लूणकरण | चारण-कवि (बीठू सूजा — "राव जैतसी रो छंद") |
राजपूताने का कर्ण | महाराजा रायसिंह | मुंशी देवीप्रसाद (इतिहासकार) |
महाराजा (बीकानेर में प्रथम प्रयोग) | महाराजा रायसिंह | मुगल सेवा के दौर में धारण |
जांगलधर बादशाह | महाराजा कर्णसिंह | परंपरा अनुसार साथी राजपूत राजा (अटक प्रसंग) |
माही मरातिब | महाराजा अनूपसिंह | औरंगज़ेब |
डिंगल का होरेस | पृथ्वीराज राठौड़ | एल.पी. तैस्सितोरी |
पाँचवाँ वेद / उन्नीसवाँ पुराण | "वेलि क्रिसन रुकमणी री" (ग्रंथ) | दुरसा आढ़ा |
सावधानी: "महाराजा" को लेकर दो कथन मिलते हैं — (1) रायसिंह बीकानेर के पहले शासक थे जिन्होंने "महाराजा" उपाधि प्रयोग की; (2) औरंगज़ेब ने अनूपसिंह को "महाराजा" व "माही मरातिब" दिया। प्रश्न "पहला" पूछे तो रायसिंह; "माही मरातिब" पूछे तो अनूपसिंह।
16. साहित्य, विद्वान व ग्रंथ — एक तालिका
ग्रंथ | रचनाकार | शासक / काल | भाषा / विषय |
|---|---|---|---|
राव जैतसी रो छंद | बीठू सूजा | राव जैतसी | डिंगल; रातीघाटी युद्ध |
वेलि क्रिसन रुकमणी री | पृथ्वीराज राठौड़ | कल्याणमल–रायसिंह काल | डिंगल; कृष्ण-रुक्मिणी |
दसम भागवत रा दूहा, गंगा लहरी | पृथ्वीराज राठौड़ | वही | भक्ति |
रायसिंह प्रशस्ति | जइता (जैन मुनि) | रायसिंह (1594) | संस्कृत अभिलेख |
कर्मचंद्रवंशोत्कीर्तनक काव्यम् | जयसोम | रायसिंह काल | संस्कृत; कर्मचंद वंश |
रायसिंह महोत्सव | रायसिंह | स्वयं | वैद्यक |
साहित्य कल्पद्रुम | कर्णसिंह | स्वयं | साहित्य |
कर्णभूषण, काव्य डाकिनी | गंगानंद मैथिल | कर्णसिंह | संस्कृत काव्यशास्त्र |
अनूप विवेक, काम प्रबोध, श्राद्ध प्रयोग चिंतामणि | अनूपसिंह | स्वयं | तंत्र, कामशास्त्र, धर्मशास्त्र |
संगीत अनूपांकुश, अनूप संगीत रत्नाकर | भाव भट्ट | अनूपसिंह | संगीत |
अनूप व्यवहार सागर, अनूप विलास | मणिराम दीक्षित | अनूपसिंह | धर्मशास्त्र |
राजस्थान के अन्य साहित्यकारों व इतिहासकारों के लिए राजस्थान के प्रमुख साहित्यकार व इतिहासकार नोट उपयोगी है।
17. Exam Trap Section (भ्रम व सावधानियाँ)
Trap 1: तीन "कर्ण" — लूणकरण, रायसिंह, कर्णसिंह
"कलियुग का कर्ण" — लूणकरण; "राजपूताने का कर्ण" — रायसिंह; कर्णसिंह का नाम "कर्ण" है पर उनकी उपाधि "जांगलधर बादशाह" है। विकल्पों में ये तीनों एक-दूसरे के स्थान पर रखे जाते हैं।
Trap 2: रातीघाटी — कामरान, हुमायूँ नहीं
1534 में जैतसी ने कामरान (बाबर का पुत्र, हुमायूँ का भाई) को हराया। हुमायूँ या बाबर विकल्प भ्रम के लिए आते हैं।
Trap 3: पहोबा में जैतसी हारे, गिरी-सुमेल में बीकानेर जीता
पहोबा/साहेबा (1541) — मालदेव विजयी, जैतसी मारे गए। गिरी-सुमेल (1544) — शेरशाह विजयी, कल्याणमल को राज्य वापस। दोनों में पक्ष उलट दिए जाते हैं।
Trap 4: पीथल ≠ पृथ्वीराज चौहान
"वेलि क्रिसन रुकमणी री" के रचयिता पृथ्वीराज राठौड़ (बीकानेर) हैं; "पृथ्वीराज रासो" चंदबरदाई की रचना है, जिसका नायक पृथ्वीराज चौहान है।
Trap 5: जूनागढ़ — रायसिंह, राव बीका नहीं
बीकानेर नगर राव बीका ने 1488 में बसाया, पर जूनागढ़ दुर्ग रायसिंह ने 1589–94 में बनवाया। (गुजरात का जूनागढ़ अलग है।)
Trap 6: रायसिंह प्रशस्ति — रचयिता जइता, निर्माता नहीं
प्रशस्ति रायसिंह की है (उनकी उपलब्धियों पर), पर रचयिता जइता; दुर्ग-निर्माण की देखरेख कर्मचंद ने की। "रचयिता" और "देखरेख" को मिलाया जाता है।
Trap 7: मुगल अधीनता — कल्याणमल पहले
बीकानेर का पहला शासक जिसने अकबर की अधीनता स्वीकार की — कल्याणमल (1570, नागौर)। रायसिंह इसके बाद मुगल सेवा में सबसे प्रमुख हुए।
Trap 8: माही मरातिब — अनूपसिंह, औरंगज़ेब से
"माही मरातिब" अकबर या जहाँगीर ने नहीं, औरंगज़ेब ने अनूपसिंह को दक्षिण की सेवाओं के लिए दिया।
Trap 9: भटनेर → हनुमानगढ़ — सूरतसिंह (1805)
कामरान ने भी भटनेर जीता था (1534 से पहले), पर हनुमानगढ़ नाम सूरतसिंह की 1805 की विजय से जुड़ा है।
18. परीक्षा में पूछे जाने वाले तथ्य (One-liners)
"कलियुग का कर्ण" — राव लूणकरण।
लूणकरण की मृत्यु — ढोसी का युद्ध (1526), नारनौल के शेख अबीमीरा से।
रातीघाटी का युद्ध (1534) — राव जैतसी बनाम कामरान; जैतसी विजयी।
"राव जैतसी रो छंद" — बीठू सूजा।
पहोबा/साहेबा युद्ध (1541) — मालदेव ने जैतसी को हराया।
गिरी-सुमेल (1544) में कल्याणमल शेरशाह के पक्ष में।
नागौर दरबार 1570 — कल्याणमल ने अकबर की अधीनता स्वीकारी।
1572 — रायसिंह जोधपुर के प्रशासक।
"वेलि क्रिसन रुकमणी री" — पृथ्वीराज राठौड़; "पाँचवाँ वेद" — दुरसा आढ़ा ने कहा।
"डिंगल का होरेस" — पृथ्वीराज राठौड़ (तैस्सितोरी)।
"राजपूताने का कर्ण" — रायसिंह (मुंशी देवीप्रसाद)।
बीकानेर में "महाराजा" उपाधि का पहला प्रयोग — रायसिंह।
जूनागढ़ दुर्ग — 1589–1594, रायसिंह; देखरेख मंत्री कर्मचंद; पुराना नाम चिंतामणि दुर्ग।
रायसिंह प्रशस्ति — रचयिता जइता; सूरजपोल पर।
सूरजपोल पर जयमल-पत्ता की हाथी-सवार प्रतिमाएँ।
"रायसिंह महोत्सव" — वैद्यक ग्रंथ, रायसिंह।
रायसिंह की मृत्यु — 1612, बुरहानपुर।
कर्मचंद के पुत्रों को मरवाने वाला शासक — सूरसिंह।
"जांगलधर बादशाह" — कर्णसिंह।
"साहित्य कल्पद्रुम" — कर्णसिंह; "कर्णभूषण", "काव्य डाकिनी" — गंगानंद मैथिल।
"माही मरातिब" — अनूपसिंह को औरंगज़ेब से।
अनूप संस्कृत पुस्तकालय — अनूपसिंह; आज लालगढ़ महल परिसर, बीकानेर।
"संगीत अनूपांकुश" — भाव भट्ट; "अनूप व्यवहार सागर" — मणिराम दीक्षित।
बीकानेर चित्रशैली का स्वर्णकाल — अनूपसिंह।
1805 भटनेर विजय, हनुमानगढ़ नाम — सूरतसिंह; 1818 ब्रिटिश संधि भी इन्हीं के समय।
1857 में टीबी परगने के 41 गाँव — सरदारसिंह।
19. इसे आसानी से याद कैसे रखें?
1. शासक क्रम — "लू-जै-क-रा-द-सू-क-अ": लूणकरण → जैतसी → कल्याणमल → रायसिंह → दलपत → सूरसिंह → कर्णसिंह → अनूपसिंह। वाक्य: "लू में जैसे कल राय दल सूरज की किरण अनूप"।
2. "रात में कामरान भागा": रातीघाटी — रात्रि-आक्रमण — कामरान पराजित (1534)।
3. "कलियुग में लूण, राजपूताने में राय": कलियुग का कर्ण = लूणकरण; राजपूताने का कर्ण = रायसिंह।
4. "जंगल का बादशाह कर्ण": जांगलधर बादशाह = कर्णसिंह।
5. "अनूप की मछली": माही = मछली → माही मरातिब = अनूपसिंह (औरंगज़ेब)।
6. "कर्मचंद ने गढ़ा, जइता ने पढ़ा": कर्मचंद — दुर्ग की देखरेख; जइता — प्रशस्ति की रचना।
20. कथन अभ्यास
राव लूणकरण को "राजपूताने का कर्ण" कहा जाता है। — गलत (लूणकरण "कलियुग का कर्ण"; "राजपूताने का कर्ण" रायसिंह)।
रातीघाटी के युद्ध में राव जैतसी ने कामरान को हराया। — सही (1534)।
पहोबा के युद्ध में राव जैतसी ने मालदेव को पराजित किया। — गलत (जैतसी मारे गए, मालदेव विजयी)।
1570 के नागौर दरबार में कल्याणमल ने अकबर की अधीनता स्वीकार की। — सही।
"वेलि क्रिसन रुकमणी री" के रचयिता पृथ्वीराज चौहान हैं। — गलत (पृथ्वीराज राठौड़, बीकानेर)।
जूनागढ़ दुर्ग का निर्माण मंत्री कर्मचंद की देखरेख में हुआ। — सही।
रायसिंह प्रशस्ति की रचना स्वयं रायसिंह ने की। — गलत (रचयिता जइता)।
"जांगलधर बादशाह" कर्णसिंह से संबंधित है। — सही।
अनूपसिंह को "माही मरातिब" अकबर ने दिया। — गलत (औरंगज़ेब ने)।
भटनेर का नाम हनुमानगढ़ सूरतसिंह की विजय (1805) के बाद पड़ा। — सही।
21. संबंधित नोट्स
बीकानेर राजवंश — राव बीका से गंगासिंह — पूरे वंश का सार
राव बीका व करणी माता — बीकानेर की स्थापना
महाराजा गंगासिंह — आधुनिक बीकानेर
राजस्थान के प्रमुख किले — जूनागढ़ सहित
मारवाड़ शासक Timeline — समकालीन जोधपुर
22. एक दिन पहले — 12 रेखाएँ
लूणकरण (1505–26) — कलियुग का कर्ण; ढोसी 1526 में मृत्यु
जैतसी — रातीघाटी 1534, कामरान पराजित; राव जैतसी रो छंद — बीठू सूजा
पहोबा/साहेबा 1541 — मालदेव ने जैतसी को मारा
कल्याणमल — गिरी-सुमेल 1544 में शेरशाह के साथ; नागौर दरबार 1570 में अकबर की अधीनता
पृथ्वीराज राठौड़ (पीथल) — वेलि क्रिसन रुकमणी री; डिंगल का होरेस; प्रताप को पत्र (परंपरा)
रायसिंह (1574–1612) — राजपूताने का कर्ण; पहला "महाराजा"; 1572 जोधपुर प्रशासक
जूनागढ़ 1589–94 — कर्मचंद की देखरेख; रायसिंह प्रशस्ति — जइता; सूरजपोल पर जयमल-पत्ता
रायसिंह महोत्सव (वैद्यक); मृत्यु 1612 बुरहानपुर
दलपत (1612–13) → सूरसिंह (1613–31), कर्मचंद के पुत्रों से प्रतिशोध
कर्णसिंह (1631–69) — जांगलधर बादशाह; साहित्य कल्पद्रुम; गंगानंद मैथिल
अनूपसिंह (1669–98) — माही मरातिब (औरंगज़ेब); अनूप संस्कृत पुस्तकालय; भाव भट्ट, मणिराम दीक्षित
सूरतसिंह — 1805 हनुमानगढ़, 1818 संधि; सरदारसिंह — 1857, टीबी के 41 गाँव; आगे गंगासिंह
23. अभ्यास
नोट पढ़ने के बाद इस पेज के अंत में दिए 25 प्रश्नों का क्विज़ हल करें। उपाधि वाले प्रश्नों में गलती हो तो खंड 15 की तालिका और Trap 1 दोहराएँ; ग्रंथ–रचनाकार के प्रश्नों के लिए खंड 16 की तालिका पक्की करें। पूरे राजस्थान GK के मिश्रित अभ्यास के लिए राजस्थान CET स्नातक फ़ाइनल मेगा टेस्ट सीरीज़ 2026 हल करें।
24. निष्कर्ष: परीक्षा के लिए क्या याद रखें?
बीकानेर के मुगलकालीन शासकों की कहानी संघर्ष से सहयोग की यात्रा है — लूणकरण और जैतसी ने पड़ोसियों और कामरान से लोहा लिया, जैतसी मालदेव के हाथों मारे गए, और कल्याणमल ने शेरशाह व फिर अकबर के सहारे राज्य बचाया। रायसिंह से अनूपसिंह तक बीकानेर के शासक मुगल साम्राज्य के प्रमुख मनसबदार रहे और इसी सेवा से मिली समृद्धि ने जूनागढ़ दुर्ग, रायसिंह प्रशस्ति, बीकानेर चित्रशैली और अनूप संस्कृत पुस्तकालय को जन्म दिया। परीक्षा के लिए तीन चीज़ें सबसे महत्वपूर्ण हैं — उपाधियों का सही मिलान, रातीघाटी-पहोबा-नागौर के वर्ष, और जूनागढ़-प्रशस्ति-साहित्य के रचनाकार।
ढोसी 1526 → रातीघाटी 1534 → पहोबा 1541 → गिरी-सुमेल 1544 → नागौर 1570 | जूनागढ़ 1589–94 | कलियुग का कर्ण = लूणकरण · राजपूताने का कर्ण = रायसिंह · जांगलधर बादशाह = कर्णसिंह · माही मरातिब = अनूपसिंह
इस टॉपिक का क्विज़ कहाँ दें?
“बीकानेर के मुगलकालीन शासक — लूणकरण से अनूपसिंह, रायसिंह व जूनागढ़ — RAS/CET” पढ़ने के बाद इन क्विज़ से तुरंत दोहराएँ — गलत उत्तर वाले बिंदु नोट में दोबारा देखें।
- बीकानेर के मुगलकालीन शासक — लूणकरण से अनूपसिंह — अभ्यास क्विज़25 प्रश्नों से खुद को परखें
- महाराजा गंगा सिंह (बीकानेर) — अभ्यास क्विज़अभ्यास शुरू करें
- राव बीका और करणी माता — अभ्यास क्विज़20 प्रश्नों का क्विज़ दें
- राजस्थान के प्रमुख शासक — अभ्यास क्विज़अपनी तैयारी जाँचें
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महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)
दानशीलता के कारण राव लूणकरण (1505–1526) को 'कलियुग का कर्ण' कहा जाता है। महाराजा रायसिंह (1574–1612) को इतिहासकार मुंशी देवीप्रसाद ने 'राजपूताने का कर्ण' कहा। दोनों अलग शासक हैं; परीक्षा में इन्हें प्रायः उलटकर पूछा जाता है।
रातीघाटी का युद्ध 1534 में बीकानेर के राव जैतसी और बाबर के पुत्र कामरान के बीच हुआ। जैतसी ने रात्रि-आक्रमण कर कामरान को पराजित किया। इसका वर्णन बीठू सूजा की डिंगल रचना 'राव जैतसी रो छंद' में है।
मारवाड़ के राव मालदेव ने बीकानेर पर आक्रमण किया और पहोबा (साहेबा) के युद्ध में जैतसी लड़ते हुए मारे गए। परीक्षा-पुस्तकों में इसका वर्ष प्रायः 1541 दिया जाता है; कुछ स्रोतों में 1542 मिलता है।
राव कल्याणमल ने 1570 में अकबर के नागौर दरबार में अपने पुत्रों रायसिंह और पृथ्वीराज के साथ उपस्थित होकर मुगल अधीनता स्वीकार की। इससे पहले 1544 में गिरी-सुमेल युद्ध में वे शेरशाह के पक्ष में थे और शेरशाह ने उन्हें बीकानेर लौटाया था।
पृथ्वीराज राठौड़ राव कल्याणमल के पुत्र और रायसिंह के छोटे भाई थे, जो अकबर के दरबार में रहे। उन्होंने डिंगल में 'वेलि क्रिसन रुकमणी री' रची, जिसे दुरसा आढ़ा ने 'पाँचवाँ वेद' और 'उन्नीसवाँ पुराण' कहा; तैस्सितोरी ने उन्हें 'डिंगल का होरेस' कहा। प्रताप को लिखे पत्र का प्रसंग लोक-परंपरा का है, समकालीन प्रमाण नहीं मिलते।
बीकानेर का जूनागढ़ दुर्ग महाराजा रायसिंह ने बनवाया। इसकी नींव 1589 में रखी गई और यह 1594 में पूर्ण हुआ। निर्माण की देखरेख मंत्री कर्मचंद ने की। इसका पुराना नाम चिंतामणि दुर्ग है।
रायसिंह प्रशस्ति (1594) की रचना जैन मुनि जइता ने की। यह जूनागढ़ दुर्ग के मुख्य द्वार सूरजपोल पर है और इसमें राव बीका से रायसिंह तक के शासकों की उपलब्धियाँ वर्णित हैं।
'जांगलधर बादशाह' बीकानेर के महाराजा कर्णसिंह (1631–1669) से संबंधित है। परंपरा के अनुसार औरंगज़ेब की धर्म-परिवर्तन योजना विफल करने पर साथी राजपूत राजाओं ने उन्हें यह उपाधि दी; इस कथा की ऐतिहासिक पुष्टि संदिग्ध है, पर परीक्षा का उत्तर कर्णसिंह ही है।
औरंगज़ेब ने महाराजा अनूपसिंह (1669–1698) को दक्षिण भारत (बीजापुर-गोलकुंडा अभियान, अदोनी) में की गई सेवाओं के लिए 'माही मरातिब' का सम्मान दिया। कई पुस्तकों के अनुसार उन्हें 'महाराजा' उपाधि भी औरंगज़ेब ने दी, यद्यपि बीकानेर में 'महाराजा' का पहला प्रयोग रायसिंह ने किया था।
अनूपसिंह ने दक्षिण से संस्कृत पांडुलिपियाँ एकत्र कर बीकानेर भिजवाईं, जिनसे अनूप संस्कृत पुस्तकालय बना। उन्होंने स्वयं अनूप विवेक, काम प्रबोध, श्राद्ध प्रयोग चिंतामणि और गीत गोविंद पर अनूपोदय टीका लिखी; भाव भट्ट (संगीत अनूपांकुश) और मणिराम दीक्षित (अनूप व्यवहार सागर) उनके दरबारी विद्वान थे। उनका काल बीकानेर चित्रशैली का स्वर्णकाल माना जाता है।
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