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राजस्थान के लोक वाद्यों का वर्गीकरण: तत्, सुषिर, अवनद्ध एवं घन

Sudhir SirSudhir Sir (इतिहास विशेषज्ञ)
2 अक्टूबर 2026
अंतिम समीक्षा: 2 अक्टूबर 2026
8 मिनट पठन

कैसे बना: यह नोट सुयोग अकादमी के लेखक ने परीक्षा सिलेबस के अनुसार लिखा/संपादित किया है। अंतिम समीक्षा तिथि ऊपर है। त्रुटि दिखे तो संपर्क करें। टीम परिचय

स्रोत आधार: RPSC / RSMSSB कला-संस्कृति इकाई (लोक कला, मेले, किले)। सिलेबस विषय; कॉपीराइट सामग्री का पेस्ट नहीं।

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राजस्थान के लोक वाद्यों का वर्गीकरण: तत्, सुषिर, अवनद्ध एवं घन

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⚡ Quick Answer: भरतमुनि के नाट्यशास्त्र के अनुसार वाद्यों के चार वर्ग हैं, और राजस्थान के लोक वाद्य इन्हीं में बाँटे जाते हैं — (1) तत् वाद्य (तार वाले): सारंगी, रावणहत्था, कमायचा, इकतारा, तंदूरा, जंतर, भपंग, रबाब, चिकारा; (2) सुषिर वाद्य (फूँक से बजने वाले): अलगोजा, शहनाई, पूंगी (बीन), सतारा, मुरला, नड़, मशक, करणा, बांकिया, तुरही; (3) अवनद्ध वाद्य (चमड़े से मढ़े, थाप वाले): ढोल, नगाड़ा, चंग, डफ, ढोलक, मादल, डेरू, खंजरी, माटा, कुंडी, धौंसा; (4) घन वाद्य (धातु/ठोस, टकराकर): मंजीरा, झांझ, खड़ताल, करताल, घुँघरू, थाली, चिमटा, घंटा, श्रीमंडल, रमझोल।

1. वाद्य वर्गीकरण का आधार

भारतीय संगीत-शास्त्र में वाद्यों का वर्गीकरण ध्वनि उत्पन्न होने के तरीके पर आधारित है। यह वर्गीकरण सर्वप्रथम भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में मिलता है। पश्चिमी संगीत-विज्ञान का सैक्स-हॉर्नबोस्टेल वर्गीकरण भी लगभग इसी के समान है।

भारतीय वर्गध्वनि कैसे उत्पन्न होती हैपश्चिमी समकक्षराजस्थानी उदाहरण
तत्तारों के कंपन से (गज/अंगुली/मिज़राब)Chordophoneसारंगी, रावणहत्था, कमायचा, जंतर
सुषिरफूँक (वायु-स्तंभ) सेAerophoneअलगोजा, शहनाई, पूंगी, मशक
अवनद्धचमड़े की झिल्ली पर थाप/डंडे सेMembranophoneढोल, नगाड़ा, चंग, मादल
घनधातु/ठोस वस्तुओं के आपस में टकराने सेIdiophoneमंजीरा, खड़ताल, घुँघरू, थाली

प्रमुख वाद्यों (रावणहत्था, कमायचा, जंतर, भपंग, अलगोजा, चंग) का विस्तृत परिचय राजस्थान के लोक वाद्य में है। यह नोट सम्पूर्ण वर्गीकरण — प्रत्येक वर्ग के सभी प्रमुख वाद्य, उनकी बनावट, वादक समुदाय और क्षेत्र — पर केंद्रित है। वादकों के लिए लोक वाद्य एवं प्रमुख वादक देखें।

2. तत् वाद्य (तार वाद्य)

तत् वाद्यों को दो उपवर्गों में समझा जाता है — (क) गज (Bow) से बजने वाले और (ख) अंगुली/मिज़राब से छेड़कर बजने वाले।

वाद्यबजाने का तरीकाबनावट (संक्षेप में)वादक/क्षेत्र
सारंगीगजलकड़ी का खोखला ढाँचा, चमड़े से मढ़ा; आँत/स्टील के तार; गज में घोड़े की पूँछ के बाललंगा (सिंधी व गुजरातण सारंगी), जोगी (जोगिया सारंगी — भरथरी गायन), मिरासी
रावणहत्थागज (गज पर घुँघरू)नारियल के खोल पर चमड़ा, बाँस की डंडी, कई तारपाबूजी के भोपे — फड़ वाचन
कमायचागजगोल चमड़ा-मढ़ी तबली, आम/शीशम की लकड़ी; मुख्य व सहायक तारमांगणियार — जैसलमेर, बाड़मेर
चिकारागजछोटा सारंगीनुमा वाद्यअलवर-भरतपुर क्षेत्र
इकताराअंगुलीतुंबा व बाँस; एक तारनाथ, कालबेलिया, साधु-संत (साथ में करताल)
तंदूरा (चौतारा)अंगुलीचार तार; लकड़ी काकामड़ — रामदेवजी के भजन, तेरहताली
जंतरअंगुलीवीणा जैसा; दो तुंबे; बाँस की डंडी पर परदेगुर्जर भोपे — देवनारायणजी की फड़
भपंगतार को खींच-छेड़करतुंबी (लौकी) के नीचे चमड़ा; एक तारमेवात के जोगी — पंडून का कड़ा
रबाबमिज़राबचमड़ा-मढ़ा, कई तारभाट समुदाय (अलवर-टोंक क्षेत्र)
सुरिंदागजसारंगीनुमालंगा (सतारा के साथ)

3. सुषिर वाद्य (फूँक वाद्य)

वाद्यबनावटवादक/अवसर/क्षेत्र
अलगोजाबाँस की दो बाँसुरियाँ एक साथ मुँह में रखकरग्रामीण व आदिवासी — मीणा, भील, गुर्जर; मेलों व पशुचारण में
शहनाईलकड़ी की नली, आगे पीतल का फैला मुख; ‘पत्ती’ से ध्वनिमांगलिक अवसर — विवाह; नगाड़े के साथ
पूंगी (बीन)तुंबे में दो नलियाँकालबेलिया (सपेरे)
सतारादो बाँसुरियाँ — एक लंबी (स्थायी स्वर) व एक धुन वालीजैसलमेर-बाड़मेर — लंगा, मेघवाल, चरवाहे
मुरला / मुरलीतुंबे से जुड़ी नलियाँबाड़मेर-जैसलमेर — लंगा
नड़लंबी नली (कगर की लकड़ी)जैसलमेर — करणा भील प्रसिद्ध वादक
मशकबकरी की खाल का थैला + नलियाँ (बैगपाइप जैसा)भैरूजी के भोपे
करणापीतल का बहुत लंबा वाद्यविजय-उद्घोष, दरबार, मंदिर
बांकियापीतल का, मुड़ा हुआमांगलिक अवसर — सरगड़ा समुदाय
तुरही, सिंगा, शंख, नागफणीपीतल/सींग/शंखमंदिर, साधु, युद्ध-घोष

4. अवनद्ध वाद्य (ताल/थाप वाद्य)

वाद्यबनावटवादक/अवसर/क्षेत्र
ढोललोहे/लकड़ी का खोल, दोनों ओर चमड़ाढोली/दमामी; विवाह, उत्सव; जालौर के ढोल नृत्य में
नगाड़ाकटोरे जैसा धातु का खोल, ऊपर चमड़ा; डंडियों सेमंदिर, उत्सव, लोकनाट्य; बड़ा रूप — नौबत, धौंसा (युद्ध)
चंगलकड़ी का गोल घेरा, एक ओर चमड़ा (डफ जैसा)होली — शेखावाटी, बीकानेर; चंग नृत्य
डफचंग जैसा, बड़ाहोली व लोकगीत
ढोलकछोटा ढोललोकगीत, भजन, तालबंदी
मादलमिट्टी का खोल, दोनों ओर चमड़ाभील, गरासिया — गवरी नृत्य-नाट्य
डेरूडमरू का बड़ा रूपगोगाजी व भैरूजी के भोपे
खंजरीछोटी डफलीकामड़, नाथ, कालबेलिया
माटामिट्टी के दो बड़े पात्र, मुँह पर चमड़ापाबूजी के पवाड़े
कुंडीमिट्टी की छोटी कुंडी पर चमड़ामेवाड़ के आदिवासी क्षेत्र
तासाछोटा नगाड़ामुहर्रम — ताज़िया जुलूस

5. घन वाद्य (धातु/ठोस वाद्य)

वाद्यबनावटवादक/अवसर/क्षेत्र
मंजीरापीतल-कांसे की दो कटोरियाँभजन; तेरहताली में शरीर पर बँधे 13 मंजीरे (कामड़ स्त्रियाँ)
झांझमंजीरे का बड़ा रूपशेखावाटी, कच्छी घोड़ी, भजन मंडलियाँ
खड़ताललकड़ी की चार पट्टियाँ (दोनों हाथों में दो-दो)मांगणियार — पश्चिमी राजस्थान
करताललकड़ी की पट्टियों के बीच झाँझेंसाधु-संत — इकतारे के साथ
घुँघरूपीतल की छोटी घंटियाँनृत्य; रावणहत्थे के गज पर भी
रमझोलपैरों में बाँधी घुँघरुओं की चौड़ी पट्टीगैर व होली नृत्य
थालीकांसे की थालीभील, कालबेलिया; पुत्र-जन्म पर थाली बजाना
चिमटालोहे की दो पट्टियाँ, बीच में झाँझेंसाधु, कालबेलिया
घंटा, झालरधातुमंदिर आरती
श्रीमंडलझालरनुमा धातु पट्टियाँ, डंडे पर लटकीमांगलिक अवसर
मोरचंगलोहे का छोटा वाद्य, होंठों के बीच दबाकर अंगुली सेपशुचारक, बालक — (कुछ पुस्तकें इसे सुषिर में भी रखती हैं)

6. वाद्यों की निर्माण सामग्री — प्रकृति से संगीत

सामग्रीवाद्य
तुंबा/लौकीइकतारा, जंतर, भपंग, पूंगी, मुरला
नारियल का खोलरावणहत्था
बाँसअलगोजा, बाँसुरी, सतारा, रावणहत्थे की डंडी
पशु-चर्मढोल, नगाड़ा, चंग, मादल, भपंग, सारंगी, कमायचा
बकरी की खाल का थैलामशक
घोड़े की पूँछ के बालसारंगी, रावणहत्था, कमायचा के गज
मिट्टीमादल, माटा, कुंडी
पीतल-कांसामंजीरा, झांझ, करणा, बांकिया, थाली

7. लोकदेवता/परंपरा और उनसे जुड़े वाद्य

परंपरावाद्यवर्ग
पाबूजी की फड़रावणहत्था; माटातत्; अवनद्ध
देवनारायणजी की फड़जंतरतत्
रामदेवजी (कामड़)तंदूरा, मंजीरातत्; घन
गोगाजी, भैरूजी के भोपेडेरू; मशकअवनद्ध; सुषिर
मेवात के जोगीभपंगतत्
कालबेलियापूंगी, खंजरीसुषिर; अवनद्ध
भील-गरासिया (गवरी)मादल, थालीअवनद्ध; घन
मांगणियारकमायचा, खड़तालतत्; घन
लंगासिंधी सारंगी, सतारा, मुरलातत्; सुषिर

लोकदेवताओं के लिए पाबूजी, देवनारायणजी व रामदेवजी देखें।

📝 One-Liner Revision — वाद्य वर्गीकरण (22 प्रश्न)

  1. प्रश्न: वाद्यों का चार वर्गों में वर्गीकरण किस ग्रंथ में?
    उत्तर: भरतमुनि का नाट्यशास्त्र
  2. प्रश्न: तार वाले वाद्य किस वर्ग में?
    उत्तर: तत्
  3. प्रश्न: फूँक से बजने वाले वाद्य?
    उत्तर: सुषिर
  4. प्रश्न: चमड़े से मढ़े वाद्य?
    उत्तर: अवनद्ध
  5. प्रश्न: धातु के टकराने वाले वाद्य?
    उत्तर: घन
  6. प्रश्न: रावणहत्था किस वर्ग का?
    उत्तर: तत्
  7. प्रश्न: भपंग किस वर्ग का?
    उत्तर: तत्
  8. प्रश्न: मशक किस वर्ग का?
    उत्तर: सुषिर
  9. प्रश्न: मादल किस वर्ग का?
    उत्तर: अवनद्ध
  10. प्रश्न: खड़ताल किस वर्ग का?
    उत्तर: घन
  11. प्रश्न: माटा किस वर्ग का?
    उत्तर: अवनद्ध
  12. प्रश्न: सतारा किस वर्ग का?
    उत्तर: सुषिर
  13. प्रश्न: तंदूरा किस वर्ग का?
    उत्तर: तत्
  14. प्रश्न: डेरू किस वर्ग का?
    उत्तर: अवनद्ध
  15. प्रश्न: रावणहत्थे का खोल किससे?
    उत्तर: नारियल
  16. प्रश्न: मशक किससे बनती है?
    उत्तर: बकरी की खाल
  17. प्रश्न: तेरहताली में कितने मंजीरे?
    उत्तर: 13
  18. प्रश्न: मादल किस नृत्य-नाट्य में?
    उत्तर: गवरी (भील)
  19. प्रश्न: पूंगी किस समुदाय का वाद्य?
    उत्तर: कालबेलिया
  20. प्रश्न: मशक बजाने वाले?
    उत्तर: भैरूजी के भोपे
  21. प्रश्न: बांकिया किस अवसर पर?
    उत्तर: मांगलिक (विवाह)
  22. प्रश्न: Chordophone का भारतीय समकक्ष?
    उत्तर: तत् वाद्य

✅ मुख्य बिंदु (Key Points) — एक नज़र में

  • चार वर्ग — तत्, सुषिर, अवनद्ध, घन (भरतमुनि का नाट्यशास्त्र)।
  • तत् — सारंगी, रावणहत्था, कमायचा, जंतर, भपंग, तंदूरा, इकतारा।
  • सुषिर — अलगोजा, शहनाई, पूंगी, सतारा, नड़, मशक, करणा।
  • अवनद्ध — ढोल, नगाड़ा, चंग, मादल, डेरू, खंजरी, माटा।
  • घन — मंजीरा, झांझ, खड़ताल, करताल, घुँघरू, थाली, चिमटा।
  • पश्चिमी समकक्ष — Chordophone, Aerophone, Membranophone, Idiophone।

🎯 Exam Trap — इन गलतियों से बचें

  1. भपंग को अवनद्ध मानना — भपंग में चमड़ा होते हुए भी ध्वनि तार से निकलती है — तत् वाद्य।
  2. खड़ताल को अवनद्ध मानना — खड़ताल लकड़ी की पट्टियों के टकराने से — घन।
  3. मशक को अवनद्ध मानना (खाल के कारण) — ध्वनि फूँक से — सुषिर।
  4. माटा को घन मानना (मिट्टी के कारण) — मुँह पर चमड़ा मढ़ा होता है — अवनद्ध।

🧠 मेमोरी ट्रिक

“त-सु-अ-घ”: तार-सुर (फूँक)-आवरण (चमड़ा)-घात (टकराना)।

नियम: वाद्य की सामग्री नहीं, ध्वनि का स्रोत देखो — भपंग (तार), मशक (फूँक), माटा (चमड़ा)।

👨‍🏫 शिक्षक की परीक्षा टिप्पणी

वाद्य वर्गीकरण के प्रश्नों में परीक्षक जानबूझकर ऐसे वाद्य चुनते हैं जिनकी सामग्री भ्रम पैदा करे — भपंग (चमड़ा, पर तत्), मशक (खाल, पर सुषिर), माटा (मिट्टी, पर अवनद्ध)। एक ही नियम याद रखें — ‘ध्वनि कहाँ से निकल रही है?’ तार से = तत्, फूँक से = सुषिर, चमड़े पर थाप से = अवनद्ध, धातु/लकड़ी के टकराने से = घन। इस नियम से नया वाद्य भी सही वर्ग में रख सकेंगे।

📚 संबंधित नोट्स (आगे क्या पढ़ें?)

📖 प्रामाणिक संदर्भ एवं स्रोत

  • भरतमुनि — नाट्यशास्त्र (वाद्य अध्याय)।
  • राजस्थान संगीत नाटक अकादमी, जोधपुर — लोक वाद्य संग्रह व प्रकाशन।
  • रूपायन संस्थान — लोक वाद्य अध्ययन (कोमल कोठारी)।
  • RBSE — ‘राजस्थान का इतिहास एवं संस्कृति’।

Author Byline

लेखक: सुयोग अकादमी कला एवं संस्कृति संपादकीय टीम

तथ्य जाँच एवं संपादन: सुधीर ढाका (BSc-BEd), सुयोग अकादमी

विषय: राजस्थान के लोक वाद्यों का वर्गीकरण: तत्, सुषिर, अवनद्ध एवं घन

परीक्षा उपयोगिता: RAS/RTS, RPSC स्कूल व्याख्याता/वरिष्ठ अध्यापक (कला/इतिहास), Rajasthan CET, पटवारी, VDO, REET Mains, राजस्थान पुलिस एवं अन्य RSMSSB परीक्षाएँ

संपादकीय नोट: कुछ वाद्यों (जैसे मोरचंग) का वर्ग पुस्तकों में भिन्न मिलता है; ऐसे स्थानों पर दोनों मत दिए गए हैं। वर्गीकरण का मूल आधार ध्वनि-उत्पत्ति का तरीका है।

अंतिम समीक्षा: 2 अक्टूबर 2026

अंतिम संशोधन (Last Updated): 2 अक्टूबर 2026
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🎯 विगत वर्षों के प्रश्न (Interactive PYQs)

Q1. निम्न में से कौन-सा तत् वाद्य है?

सुयोग अभ्यास प्रश्न (RPSC/RSMSSB पैटर्न) 2026

Q2. मशक किस वर्ग का वाद्य है?

सुयोग अभ्यास प्रश्न (RPSC/RSMSSB पैटर्न) 2026

Q3. निम्न में से कौन-सा अवनद्ध वाद्य नहीं है?

सुयोग अभ्यास प्रश्न (RPSC/RSMSSB पैटर्न) 2026

Q4. वाद्यों का तत्-सुषिर-अवनद्ध-घन वर्गीकरण किस ग्रंथ में मिलता है?

सुयोग अभ्यास प्रश्न (RPSC/RSMSSB पैटर्न) 2026

Q5. रावणहत्थे का खोल किससे बनता है?

सुयोग अभ्यास प्रश्न (RPSC/RSMSSB पैटर्न) 2026

महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

भरतमुनि के नाट्यशास्त्र के अनुसार वाद्यों के चार वर्ग हैं — तत् (तार वाले), सुषिर (फूँक वाले), अवनद्ध (चमड़े से मढ़े) और घन (धातु/ठोस, टकराकर बजने वाले)।

भपंग तत् वाद्य है, क्योंकि इसमें ध्वनि तार से उत्पन्न होती है, भले ही इसमें चमड़ा लगा होता है।

मशक सुषिर वाद्य है; यह बकरी की खाल के थैले से बनी होती है और फूँक से बजाई जाती है। इसे भैरूजी के भोपे बजाते हैं।

खड़ताल घन वाद्य है, जो लकड़ी की पट्टियों को आपस में टकराकर बजाया जाता है; इसे मांगणियार बजाते हैं।

मादल भील और गरासिया समुदाय का अवनद्ध वाद्य है, जो गवरी नृत्य-नाट्य में बजाया जाता है।

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