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राजस्थान की जनजातीय कला एवं हस्तशिल्प

Sudhir SirSudhir Sir (इतिहास विशेषज्ञ)
3 अक्टूबर 2026
अंतिम समीक्षा: 3 अक्टूबर 2026
8 मिनट पठन

कैसे बना: यह नोट सुयोग अकादमी के लेखक ने परीक्षा सिलेबस के अनुसार लिखा/संपादित किया है। अंतिम समीक्षा तिथि ऊपर है। त्रुटि दिखे तो संपर्क करें। टीम परिचय

स्रोत आधार: RPSC / RSMSSB कला-संस्कृति इकाई (लोक कला, मेले, किले)। सिलेबस विषय; कॉपीराइट सामग्री का पेस्ट नहीं।

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राजस्थान की जनजातीय कला एवं हस्तशिल्प

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⚡ Quick Answer: राजस्थान की जनजातीय कला जीवन से जुड़ी, उपयोगी और प्रतीकात्मक है। प्रमुख कलाएँ — गोदना (शरीर पर स्थायी चित्र; मीणा, भील, गरासिया, कथौड़ी), चाँदी-पीतल-लाख के आभूषण (गरासिया, सहरिया, डामोर; आदिवासी दुल्हन का पाट का चूड़ा), मांडणा व भित्ति-चित्रण, गवरी के मुखौटे व वेशभूषा, बाँस-टोकरी, मिट्टी के बर्तन (कंजर, सहरिया, भील), तीर-कमान निर्माण (भील) और लोक-वाद्य — मांदल, थाली, ढोल, नगाड़ा, मटकी। राजसमंद के मोलेला की मृण्मूर्ति (टेराकोटा) पट्टिकाएँ — लोकदेवताओं के फलक — ग्रामीण-जनजातीय आस्था से जुड़ी प्रसिद्ध कला है।

1. जनजातीय कला — परिचय

जनजातीय समाज में कला ‘सजावट’ के लिए नहीं, बल्कि जीवन, आस्था और पहचान के लिए होती है — शरीर पर गोदना, दीवार पर देवी का चित्र, बाँस की टोकरी, मिट्टी का घड़ा, नृत्य के मुखौटे। “राजस्थान की जनजातीय कला कौन-सी है” — इस प्रश्न का उत्तर इन्हीं दैनिक-धार्मिक कलाओं में है। ये कलाएँ स्थानीय सामग्री (मिट्टी, बाँस, लाख, चाँदी, कौड़ी, मनके) से बनती हैं और पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक रूप से सिखाई जाती हैं।

जनजातीय संस्कृति का समग्र परिचय: राजस्थान की जनजातीय संस्कृति — Master Guide | राज्य के सभी हस्तशिल्प: राजस्थान के प्रमुख हस्तशिल्प

2. गोदना — शरीर पर स्थायी कला

पक्षविवरण
क्या हैसुई और प्राकृतिक रंग से त्वचा पर स्थायी चित्र/आकृतियाँ
प्रमुख समुदायमीणा (विशेष रूप से प्रसिद्ध), भील, गरासिया, कथौड़ी, बंजारा
स्थानहाथ, बाँह, ठोड़ी, माथा (गरासिया स्त्रियाँ — माथा व ठोड़ी)
आकृतियाँबिंदु, फूल-पत्ती, पक्षी, देव-प्रतीक, नाम
मान्यतासौंदर्य, पहचान, नज़र से रक्षा; ‘मृत्यु के बाद भी साथ जाने वाला आभूषण’

3. जनजातीय आभूषण-कला

  • चाँदी के भारी आभूषण: गरासिया, सहरिया, डामोर, मीणा स्त्रियाँ — हँसली, कड़े, पायजेब, गले में सिक्कों-मनकों की मालाएँ।
  • बाँह भर चूड़ियाँ: भील व गरासिया स्त्रियाँ — लाख, पीतल, प्लास्टिक।
  • पाट का चूड़ा (बरपोई): उदयपुर क्षेत्र की आदिवासी दुल्हनों का चाँदी की बेल वाला लाख का चूड़ा; अविवाहित कन्याओं का वन्य चूड़ा।
  • कौड़ी व मनके: मालाएँ, कमरबंद, नृत्य-वेशभूषा की सजावट।
  • डामोर पुरुष: स्त्रियों की तरह आभूषण पहनने के लिए प्रसिद्ध।
  • कंजर समुदाय: बारीक आभूषण, मिट्टी के बर्तन और टोकरियाँ बनाने में कुशल।

आभूषणों पर विस्तार: जनजातीय वेशभूषा एवं आभूषण | महिलाओं के प्रमुख आभूषण — नाम एवं उपयोग

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‘गोदना किस जनजाति में प्रसिद्ध’, ‘मोलेला किस कला का केंद्र’, ‘पाट का चूड़ा किसका’ — ऐसे प्रश्न CET, पटवारी, VDO व RAS में आते हैं। मॉक टेस्ट से अभ्यास करें:

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4. भित्ति-चित्र, मांडणा एवं धार्मिक कला

  • मांडणा: घर के आँगन-दीवारों पर खड़िया, गेरू से बनाए जाने वाले शुभ चित्र — पूर्वी राजस्थान (सवाई माधोपुर-करौली) की मीणा स्त्रियों की मांडणा-कला विशेष रूप से प्रसिद्ध।
  • भराड़ी: परीक्षा-पुस्तकों के अनुसार भील विवाह के अवसर पर घर की दीवार पर कुल-देवी का चित्र।
  • मोलेला मृण्मूर्ति (राजसमंद): कुम्हारों द्वारा बनाई जाने वाली टेराकोटा पट्टिकाएँ, जिन पर देवनारायण, धर्मराज, नागदेव आदि लोकदेवता अंकित होते हैं; दक्षिणी राजस्थान व गुजरात के ग्रामीण-जनजातीय श्रद्धालु इन्हें अपने देवरों में स्थापित करते हैं।
  • गवरी के मुखौटे व वेशभूषा: भील कलाकार देवी-देवताओं, राक्षसों और पशुओं के पात्रों हेतु स्वयं मुखौटे-वेशभूषा तैयार करते हैं।

गवरी: गवरी लोकनाट्य | लोकदेवता: देवनारायण जी

5. दैनिक उपयोग के शिल्प

शिल्पसमुदायविवरण
बाँस की टोकरी, सूप, चटाईभील, सहरिया, कंजरवन से प्राप्त बाँस से
मिट्टी के बर्तनकंजर व ग्रामीण समुदायघड़े, दीये, खाना पकाने के पात्र
तीर-कमानभीलबाँस व लकड़ी से — परंपरागत शिकार व आत्म-रक्षा
महुआ आधारित उत्पादभील, डामोरमहुआ के फूल-बीज से भोजन व तेल
कत्थाकथौड़ीपरंपरागत रूप से खैर वृक्ष से कत्था बनाने से नाम जोड़ा जाता है

6. जनजातीय लोक-वाद्य

वाद्यप्रकारप्रयोग
मांदलअवनद्ध (मिट्टी का ढोल)गवरी (भील), गरासिया नृत्य
थालीघनगवरी, लोकगीत
ढोल, नगाड़ाअवनद्धहोली, गैर, स्वांग
मटकीघन/अवनद्धसहरिया स्वांग

लोक वाद्यों का वर्गीकरण: तत्, सुषिर, अवनद्ध, घन

7. संरक्षण एवं बाज़ार

  • शिल्पग्राम (उदयपुर): पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र का ग्रामीण-जनजातीय कला परिसर; दिसंबर का शिल्पग्राम उत्सव।
  • स्वयं-सहायता समूह: जनजातीय स्त्रियों के आभूषण, बाँस व महुआ उत्पादों को बाज़ार।
  • TRIFED (केंद्र सरकार): ‘ट्राइब्स इंडिया’ के माध्यम से जनजातीय उत्पादों का विपणन।
  • माणिक्यलाल वर्मा आदिम जाति शोध संस्थान, उदयपुर: जनजातीय कला का दस्तावेज़ीकरण व संग्रहालय।

जनजातीय कला का महत्व

  1. पहचान: गोदना, आभूषण और वेशभूषा से जनजाति व क्षेत्र की पहचान।
  2. आस्था: मुखौटे, देव-फलक और भित्ति-चित्र धार्मिक अनुष्ठानों का हिस्सा।
  3. आजीविका: बाँस, मिट्टी, लाख और आभूषण शिल्प से आय।
  4. पर्यावरण-अनुकूलता: स्थानीय, प्राकृतिक सामग्री का उपयोग।
  5. ज्ञान-परंपरा: मौखिक रूप से पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित कौशल।

📊 प्रश्न-पैटर्न विश्लेषण — यह विषय परीक्षा में कैसे पूछा जाता है?

प्रश्न का प्रकारउदाहरणहल करने की कुंजी
समुदाय–कलागोदना के लिए प्रसिद्ध जनजाति?मीणा
स्थान–कलाटेराकोटा देव-फलक कहाँ?मोलेला (राजसमंद)
आभूषणआदिवासी दुल्हन का चूड़ा?पाट का चूड़ा (बरपोई)
वाद्यगवरी के वाद्य?मांदल, थाली

जनजातीय कला — अध्ययन-सूत्र

  1. शरीर-कला: गोदना — मीणा (विशेष), भील, गरासिया, कथौड़ी।
  2. आभूषण: चाँदी-पीतल-लाख; पाट का चूड़ा (दुल्हन), वन्य चूड़ा (अविवाहित); डामोर पुरुष भी आभूषण पहनते हैं।
  3. धार्मिक कला: मोलेला के देव-फलक, गवरी के मुखौटे, मांडणा।
  4. दैनिक शिल्प: बाँस, मिट्टी, तीर-कमान।
  5. वाद्य: मांदल, थाली, ढोल, नगाड़ा, मटकी।
  6. संरक्षण: शिल्पग्राम (उदयपुर), माणिक्यलाल वर्मा आदिम जाति शोध संस्थान, स्वयं-सहायता समूह और ट्राइब्स इंडिया (TRIFED) के माध्यम से जनजातीय उत्पादों को बाज़ार व पहचान।

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राजस्थान की जनजातीय कला कौन-सी है?

गोदना, चाँदी-लाख-पीतल के आभूषण, मांडणा व भित्ति-चित्रण, गवरी के मुखौटे, बाँस-टोकरी, मिट्टी के बर्तन, तीर-कमान और मांदल-थाली जैसे लोक-वाद्य राजस्थान की प्रमुख जनजातीय कलाएँ हैं।

गोदना किस जनजाति में सबसे प्रसिद्ध है?

गोदना के लिए मीणा जनजाति विशेष रूप से प्रसिद्ध है; भील, गरासिया और कथौड़ी में भी यह परंपरा है।

मोलेला किस कला के लिए प्रसिद्ध है?

राजसमंद जिले का मोलेला गाँव लोकदेवताओं की टेराकोटा (मृण्मूर्ति) पट्टिकाओं के लिए प्रसिद्ध है, जिन्हें ग्रामीण-जनजातीय श्रद्धालु अपने देवरों में स्थापित करते हैं।

पाट का चूड़ा क्या है?

पाट का चूड़ा (बरपोई) उदयपुर क्षेत्र की आदिवासी दुल्हनों द्वारा पहना जाने वाला चाँदी की बेल वाला लाख का चूड़ा है।

मांदल क्या है?

मांदल मिट्टी से बना अवनद्ध वाद्य (ढोल) है, जो भीलों की गवरी और गरासियों के नृत्यों में बजाया जाता है।

📝 One-Liner Revision (12 प्रश्न)

  1. गोदना के लिए प्रसिद्ध — मीणा
  2. गरासिया स्त्रियाँ गोदना — माथा व ठोड़ी
  3. आदिवासी दुल्हन का चूड़ा — पाट का चूड़ा (बरपोई)
  4. अविवाहित आदिवासी कन्याओं का चूड़ा — वन्य चूड़ा
  5. पुरुष भी आभूषण पहनते — डामोर
  6. टेराकोटा पट्टिकाएँ — मोलेला (राजसमंद)
  7. गवरी के मुखौटे — भील
  8. तीर-कमान निर्माण — भील
  9. कत्था से नाम-संबंध — कथौड़ी
  10. गवरी का प्रमुख वाद्य — मांदल, थाली
  11. सहरिया स्वांग का वाद्य — ढोल, नगाड़ी, मटकी
  12. जनजातीय शोध संस्थान — माणिक्यलाल वर्मा (उदयपुर)

✅ मुख्य बिंदु (Key Points)

  • गोदना, आभूषण, मांडणा, मुखौटे, बाँस-मिट्टी शिल्प, तीर-कमान, लोक-वाद्य।
  • मीणा — गोदना; डामोर — पुरुष आभूषण; भील — तीर-कमान, गवरी मुखौटे।
  • मोलेला टेराकोटा; पाट का चूड़ा; शिल्पग्राम; ट्राइब्स इंडिया।

🎯 Exam Trap — इन गलतियों से बचें

  • मोलेला (राजसमंद) टेराकोटा का केंद्र है; यह जनजाति नहीं, कुम्हार समुदाय की कला है जिसका उपयोग जनजातीय श्रद्धालु करते हैं।
  • मध्य प्रदेश की ‘भील चित्रकला’ (जैसे भूरी बाई) को राजस्थान की जनजातीय कला के रूप में न चुनें।
  • पाट का चूड़ा (दुल्हन) और वन्य चूड़ा (अविवाहित) — उल्टा न करें।

🧠 मेमोरी ट्रिक

“मीणा का गोदना, डामोर का गहना, भील का कमान, मोलेला का देव-फलक”।

👨‍🏫 शिक्षक की परीक्षा टिप्पणी

जनजातीय कला पर प्रश्न प्रायः ‘समुदाय–कला’ मिलान होते हैं। हस्तशिल्प अध्याय (मोलेला, थेवा, लाख) और जनजातीय संस्कृति अध्याय को साथ पढ़ने से कथन-आधारित प्रश्न आसानी से हल होते हैं।

✍️ अभ्यास करें — क्विज़ व टेस्ट सीरीज़

जनजातीय कला एवं हस्तशिल्प व राजस्थान की अन्य लोक-कलाओं पर अपनी तैयारी जाँचने के लिए नीचे दिए अभ्यास सेट हल करें:

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📖 प्रामाणिक संदर्भ एवं स्रोत

  • RajRAS — ‘Rajasthan Tribes’ (मीणा — गोदना; कथौड़ी — गोदना; कंजर — आभूषण, बर्तन, टोकरियाँ; सहरिया-डामोर — चाँदी के आभूषण)।
  • RajRAS — ‘राजस्थानी वेशभूषा व आभूषण’ (पाट का चूड़ा — बरपोई; वन्य चूड़ा)।
  • पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, उदयपुर — शिल्पग्राम।
  • TRIFED, जनजातीय कार्य मंत्रालय, भारत सरकार — ट्राइब्स इंडिया।

Author Byline

लेखक: सुयोग अकादमी कला एवं संस्कृति संपादकीय टीम

तथ्य जाँच एवं संपादन: सुधीर ढाका (BSc-BEd), सुयोग अकादमी

विषय: राजस्थान की जनजातीय कला एवं हस्तशिल्प

परीक्षा उपयोगिता: RAS/RTS, RPSC स्कूल व्याख्याता/वरिष्ठ अध्यापक, Rajasthan CET, पटवारी, VDO, REET Mains, राजस्थान पुलिस, LDC एवं अन्य RSMSSB परीक्षाएँ

संपादकीय नोट: ‘भराड़ी’ व कथौड़ी-कत्था संबंध परीक्षा-पुस्तकों/परंपरा पर आधारित हैं। मोलेला टेराकोटा कुम्हार समुदाय की कला है, जिसे यहाँ जनजातीय-ग्रामीण आस्था से जुड़ाव के कारण शामिल किया गया है।

अंतिम समीक्षा: 2 अक्टूबर 2026

अंतिम संशोधन (Last Updated): 3 अक्टूबर 2026
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🎯 विगत वर्षों के प्रश्न (Interactive PYQs)

Q1. गोदना के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध जनजाति है —

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Q2. मोलेला गाँव किस कला के लिए प्रसिद्ध है?

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Q3. आदिवासी दुल्हन का चाँदी की बेल वाला लाख का चूड़ा कहलाता है —

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Q4. मांदल किस प्रकार का वाद्य है?

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Q5. किस जनजाति के पुरुष भी आभूषण पहनने के लिए प्रसिद्ध हैं?

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महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

गोदना, चाँदी-लाख-पीतल के आभूषण, मांडणा व भित्ति-चित्रण, गवरी के मुखौटे, बाँस-टोकरी, मिट्टी के बर्तन, तीर-कमान और लोक-वाद्य राजस्थान की प्रमुख जनजातीय कलाएँ हैं।

डामोर जनजाति के पुरुष स्त्रियों की तरह आभूषण पहनने के लिए प्रसिद्ध हैं।

मोलेला की टेराकोटा पट्टिकाओं पर देवनारायण, धर्मराज, नागदेव जैसे लोकदेवता अंकित होते हैं।

भीलों की गवरी में मुख्यतः मांदल और थाली बजाई जाती है।

कंजर समुदाय बारीक आभूषण, मिट्टी के बर्तन और टोकरियाँ बनाने में कुशल है।

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