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राजस्थान की जनजातीय वेशभूषा एवं आभूषण

Sudhir SirSudhir Sir (इतिहास विशेषज्ञ)
2 अक्टूबर 2026
अंतिम समीक्षा: 2 अक्टूबर 2026
9 मिनट पठन

कैसे बना: यह नोट सुयोग अकादमी के लेखक ने परीक्षा सिलेबस के अनुसार लिखा/संपादित किया है। अंतिम समीक्षा तिथि ऊपर है। त्रुटि दिखे तो संपर्क करें। टीम परिचय

स्रोत आधार: RPSC / RSMSSB कला-संस्कृति इकाई (लोक कला, मेले, किले)। सिलेबस विषय; कॉपीराइट सामग्री का पेस्ट नहीं।

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राजस्थान की जनजातीय वेशभूषा एवं आभूषण

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⚡ Quick Answer: राजस्थान की जनजातियों की वेशभूषा सरल, श्रम-अनुकूल और प्रतीकों से भरी है। भील स्त्रियाँ — नांदणा (नीला छपा प्राचीनतम वस्त्र), कछाबू (घुटनों तक घाघरा), लूगड़ा (सफेद ज़मीन पर लाल बूटे), विवाह पर सिंदूरी (लाल साड़ी), जामसाई (फूलदार साड़ी) और दुल्हन का पिरिया (पीला लहंगा); भील पुरुष — ढेपाड़ा (तंग धोती), खोयतू (लंगोटी), सिर पर पोतिया। कथौड़ी स्त्रियाँ — फड़का (मराठी ढंग की साड़ी); सहरिया स्त्रियाँ — रेजा (विवाहिताओं का वस्त्र), रेनसाई (काली ज़मीन पर लाल-भूरी बूटियों का लहंगा); कंजर — खूसनी (तंग पायजामा)। आभूषणों में चाँदी, पीतल, लाख, कौड़ी, मनके, बाँह भर चूड़ियाँ और गोदना (टैटू) प्रमुख हैं।

1. जनजातीय वेशभूषा — परिचय

दक्षिणी राजस्थान (उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़, सिरोही), दक्षिण-पूर्वी हाड़ौती (बारां — सहरिया) और पूर्वी राजस्थान (मीणा) की जनजातियों की वेशभूषा वन-पहाड़ी जीवन, खेती और श्रम के अनुकूल है। “भील जनजाति की वेशभूषा क्या है” और “नांदणा किसका वस्त्र है” जैसे प्रश्न परीक्षा में बार-बार आते हैं, क्योंकि इन वस्त्रों के नाम सामान्य राजस्थानी वस्त्रों से बिल्कुल अलग हैं। इस लेख में हर जनजाति की वेशभूषा और आभूषण अलग-अलग दिए गए हैं।

राजस्थान की जनजातियों का भौगोलिक-सामाजिक परिचय: राजस्थान की जनजातियाँ — भील, मीणा, गरासिया, सहरिया

2. भील जनजाति की वेशभूषा

2.1 भील स्त्रियाँ

वस्त्रपहचानअवसर
नांदणा (नांदड़ा)नीले रंग का छपा हुआ वस्त्र — भील स्त्रियों का प्राचीनतम वस्त्रदैनिक/पारंपरिक
कछाबू (कछावू)घुटनों तक का घाघरादैनिक — काम-काज में सुविधाजनक
लूगड़ासफेद ज़मीन पर लाल बूटों वाली ओढ़नीदैनिक
सिंदूरीलाल रंग की साड़ीविवाह
जामसाईफूल-पत्तियों वाली साड़ीविवाह
पिरियापीले रंग का लहंगाभील दुल्हन

2.2 भील पुरुष

वस्त्रपहचान
ढेपाड़ाघुटनों तक की तंग धोती
खोयतूलंगोटी
पोतिया (पोत्या)सिर पर पगड़ी के स्थान पर बाँधा जाने वाला सादा, प्रायः सफेद कपड़ा
बंडी/अंगरखीऊपरी वस्त्र

ट्रिक: “नांदणा नीला, कछाबू छोटा, पिरिया पीला, सिंदूरी लाल” (स्त्री); “ढेपाड़ा-खोयतू-पोतिया” (पुरुष)।

3. अन्य जनजातियों की वेशभूषा

जनजातिक्षेत्रवेशभूषा की पहचान
कथौड़ीउदयपुर (कोटड़ा, झाड़ोल)स्त्रियाँ — फड़का (मराठी ढंग से पहनी जाने वाली साड़ी); मूलतः महाराष्ट्र से आगमन
सहरियाबारां (शाहबाद, किशनगंज)स्त्रियाँ — रेजा (विवाहिताओं का वस्त्र), रेनसाई (काली ज़मीन पर लाल-भूरी बूटियों का लहंगा)
मीणापूर्वी राजस्थान (जयपुर, दौसा, सवाई माधोपुर, करौली), दक्षिणस्त्रियाँ — लूगड़ी, कुर्ती-कांचली, घाघरा; पुरुष — धोती, कुर्ता, साफा
गरासियासिरोही (आबूरोड, पिंडवाड़ा), उदयपुर, पालीस्त्रियाँ — चटक रंग का घाघरा, ओढ़नी, कुर्ती; पुरुष — धोती, कमीज़, साफा
डामोरडूंगरपुर (सीमलवाड़ा), बांसवाड़ापुरुष भी स्त्रियों की तरह आभूषण पहनने के लिए प्रसिद्ध
कंजरहाड़ौती, मेवाड़ (अर्ध-घुमंतू)खूसनी — तंग पायजामा

ओढ़नियों के भांत: ज्वार भांत (ज्वार के दाने जैसी बूटियाँ), केरी भांत (कैरी/आम की आकृति), लहर भांत, तारा भांत — ये छपाई-भांत विशेषकर आदिवासी स्त्रियों की ओढ़नियों में लोकप्रिय हैं।

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4. जनजातीय आभूषण

समुदायप्रमुख आभूषण/विशेषता
भीलबाँह भर लाख/पीतल/प्लास्टिक की चूड़ियाँ, हँसली, चाँदी के कड़े, पैरों में कड़ले; कौड़ी व मनकों की मालाएँ
गरासियाचाँदी के भारी आभूषण, बाँहों भर चूड़ियाँ, गले में मनकों-सिक्कों की मालाएँ
आदिवासी दुल्हन (उदयपुर क्षेत्र)पाट का चूड़ा (बरपोई) — चाँदी की बेल वाला लाख का चूड़ा
अविवाहित आदिवासी कन्याएँ (उदयपुर क्षेत्र)वन्य चूड़ा
डामोर पुरुषकान, गले, हाथ में आभूषण — स्त्रियों जैसे
मीणाबोरला, हँसली, चाँदी के कड़े, पायजेब

लाख चूड़े के प्रकार: महिलाओं के प्रमुख आभूषण — नाम एवं उपयोग | अंग-वार सभी आभूषण: पारंपरिक आभूषण — अंग, नाम एवं विशेषताएँ

5. गोदना (टैटू) — शरीर पर स्थायी आभूषण

  • जनजातीय व घुमंतू समुदायों (भील, मीणा, गरासिया, बंजारा) की स्त्रियों में हाथों, बाँहों, ठोड़ी और माथे पर गोदना गुदवाने की परंपरा।
  • आकृतियाँ — बिंदु, फूल, पक्षी, देवी-देवताओं के प्रतीक, नाम।
  • मान्यता — गोदना ‘मृत्यु के बाद भी साथ जाने वाला आभूषण’; सौंदर्य, पहचान और नज़र से रक्षा का प्रतीक।

6. घुमंतू एवं पशुपालक समुदायों की वेशभूषा

समुदायवेशभूषा/आभूषण
कालबेलियास्त्रियाँ — काले घाघरे-ओढ़नी पर रंगीन कशीदा, काँच, कौड़ियाँ; नृत्य के समय घूमने वाला घेरदार घाघरा
बंजाराचटक रंग, शीशे-कौड़ी-सिक्कों की कढ़ाई, भारी चूड़ियाँ
रेबारी/राइकापुरुष — सफेद अंगरखी-धोती, लाल/रंगीन साफा; स्त्रियाँ — गहरे रंग की ओढ़नी
गाड़िया लोहारस्त्रियाँ — गहरे रंग के घाघरे, चाँदी-पीतल के आभूषण

कालबेलिया नृत्य: कालबेलिया नृत्य | गरासियों का वालर नृत्य: वालर नृत्य

7. जनजातीय वेशभूषा की प्रमुख विशेषताएँ

  1. श्रम-अनुकूल: घुटनों तक घाघरा (कछाबू), तंग धोती (ढेपाड़ा) — खेत और जंगल में काम के लिए।
  2. प्रतीकात्मक रंग: विवाह में लाल (सिंदूरी) व पीला (पिरिया)।
  3. स्थानीय सामग्री: कौड़ी, मनके, लाख, पीतल, चाँदी।
  4. सामूहिक पहचान: हर जनजाति की अलग बँधाई, रंग और आभूषण।
  5. बदलाव: शिक्षा व शहरीकरण से पारंपरिक वस्त्र अब मुख्यतः उत्सव-मेलों (बेणेश्वर, गवरी) में दिखते हैं।

जनजातीय मेले-उत्सव: बेणेश्वर मेला | गवरी लोकनाट्य

8. संरक्षण के प्रयास

  • माणिक्यलाल वर्मा आदिम जाति शोध संस्थान (उदयपुर) जनजातीय वस्त्र-आभूषणों का दस्तावेज़ीकरण करता है।
  • शिल्पग्राम (उदयपुर) और बेणेश्वर जैसे मेलों में जनजातीय वेशभूषा व आभूषणों का प्रदर्शन होता है।
  • जनजातीय हस्तशिल्प (कौड़ी-मनके, लाख, चाँदी) को स्वयं-सहायता समूहों के माध्यम से बाज़ार दिया जा रहा है।

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भील जनजाति की वेशभूषा क्या है?

भील स्त्रियाँ नांदणा, कछाबू (घुटनों तक घाघरा), लूगड़ा, विवाह में सिंदूरी व जामसाई और दुल्हन पिरिया (पीला लहंगा) पहनती हैं; भील पुरुष ढेपाड़ा (तंग धोती), खोयतू (लंगोटी) और सिर पर पोतिया पहनते हैं।

नांदणा क्या है?

नांदणा भील स्त्रियों का नीले रंग का छपा हुआ प्राचीनतम वस्त्र है।

फड़का किस जनजाति की स्त्रियाँ पहनती हैं?

फड़का कथौड़ी जनजाति की स्त्रियाँ पहनती हैं; यह मराठी ढंग से पहनी जाने वाली साड़ी है।

सहरिया स्त्रियों की वेशभूषा क्या है?

सहरिया विवाहित स्त्रियाँ ‘रेजा’ पहनती हैं और ‘रेनसाई’ काली ज़मीन पर लाल-भूरी बूटियों वाला लहंगा है।

किस जनजाति के पुरुष भी स्त्रियों की तरह आभूषण पहनते हैं?

डामोर जनजाति के पुरुष स्त्रियों की तरह आभूषण पहनने के लिए जाने जाते हैं।

📝 One-Liner Revision (15 प्रश्न)

  1. भील स्त्रियों का प्राचीनतम नीला वस्त्र — नांदणा
  2. घुटनों तक का घाघरा — कछाबू
  3. सफेद ज़मीन पर लाल बूटों वाली ओढ़नी — लूगड़ा
  4. विवाह की लाल साड़ी — सिंदूरी
  5. विवाह की फूलदार साड़ी — जामसाई
  6. भील दुल्हन का पीला लहंगा — पिरिया
  7. भील पुरुषों की तंग धोती — ढेपाड़ा
  8. भील पुरुषों की लंगोटी — खोयतू
  9. पगड़ी के स्थान पर सिर-वस्त्र — पोतिया
  10. कथौड़ी स्त्रियों की साड़ी — फड़का
  11. सहरिया विवाहिताओं का वस्त्र — रेजा
  12. सहरिया का छपा लहंगा — रेनसाई
  13. कंजर समुदाय का तंग पायजामा — खूसनी
  14. आदिवासी दुल्हन का चूड़ा — पाट का चूड़ा (बरपोई)
  15. पुरुष भी आभूषण पहनने वाली जनजाति — डामोर

✅ मुख्य बिंदु (Key Points)

  • भील स्त्री: नांदणा, कछाबू, लूगड़ा, सिंदूरी, जामसाई, पिरिया।
  • भील पुरुष: ढेपाड़ा, खोयतू, पोतिया।
  • कथौड़ी — फड़का; सहरिया — रेजा, रेनसाई; कंजर — खूसनी।
  • आभूषण: चाँदी-पीतल-लाख-कौड़ी; डामोर पुरुष भी आभूषण; गोदना।

🎯 Exam Trap — इन गलतियों से बचें

  • पिरिया पीला लहंगा, सिंदूरी लाल साड़ी — दोनों विवाह के, रंग न उलटें।
  • फड़का कथौड़ी का, सहरिया का नहीं।
  • पोतिया (जनजातीय सिर-वस्त्र) ≠ पोमचा (प्रसूता की ओढ़नी)।
  • रेनसाई (सहरिया) और जामसाई (भील) — दोनों ‘साई’; जनजाति से अंतर करें।

🧠 मेमोरी ट्रिक

“कथौड़ी का फड़का, सहरिया का रेजा, कंजर की खूसनी”।

“जाम-भील, रेन-सहरिया” → जामसाई भील, रेनसाई सहरिया।

👨‍🏫 शिक्षक की परीक्षा टिप्पणी

जनजातीय वेशभूषा राजस्थान GK का सबसे ‘ट्रिकी’ हिस्सा है क्योंकि नाम मिलते-जुलते हैं। तालिका 2 और 3 को जनजाति-वार अलग पन्ने पर लिखकर याद करें। भूगोल के ‘जनजातियाँ’ अध्याय (क्षेत्र, जनसंख्या) के साथ पढ़ने से कथन-आधारित प्रश्न आसानी से हल होते हैं।

✍️ अभ्यास करें — क्विज़ व टेस्ट सीरीज़

जनजातीय वेशभूषा एवं आभूषण व राजस्थान की अन्य लोक-कलाओं पर अपनी तैयारी जाँचने के लिए नीचे दिए अभ्यास सेट हल करें:

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📖 प्रामाणिक संदर्भ एवं स्रोत

  • RajRAS — ‘राजस्थानी वेशभूषा व आभूषण’ (भील, सहरिया, कथौड़ी, कंजर वस्त्र)।
  • माणिक्यलाल वर्मा आदिम जाति शोध संस्थान, उदयपुर — राजस्थान की जनजातियाँ।
  • जनजाति क्षेत्रीय विकास विभाग, राजस्थान सरकार।
  • माध्यमिक शिक्षा बोर्ड राजस्थान (RBSE) — ‘राजस्थान का इतिहास एवं संस्कृति’।

Author Byline

लेखक: सुयोग अकादमी कला एवं संस्कृति संपादकीय टीम

तथ्य जाँच एवं संपादन: सुधीर ढाका (BSc-BEd), सुयोग अकादमी

विषय: राजस्थान की जनजातीय वेशभूषा एवं आभूषण

परीक्षा उपयोगिता: RAS/RTS, RPSC स्कूल व्याख्याता/वरिष्ठ अध्यापक, Rajasthan CET, पटवारी, VDO, REET Mains, राजस्थान पुलिस, LDC एवं अन्य RSMSSB परीक्षाएँ

संपादकीय नोट: जनजातीय वस्त्रों के नाम व वर्तनी में क्षेत्रीय भिन्नता है (कछाबू/कछावू, पोतिया/पोत्या)। आधुनिक समय में पारंपरिक वेशभूषा मुख्यतः उत्सवों तक सीमित हो रही है; यहाँ पारंपरिक स्वरूप दिया गया है।

अंतिम समीक्षा: 2 अक्टूबर 2026

अंतिम संशोधन (Last Updated): 2 अक्टूबर 2026
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Sudhir Sirइतिहास विशेषज्ञलेखक परिचय
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🎯 विगत वर्षों के प्रश्न (Interactive PYQs)

Q1. भील दुल्हन द्वारा पहना जाने वाला पीला लहंगा कहलाता है —

सुयोग अभ्यास प्रश्न (RPSC/RSMSSB पैटर्न) 2026

Q2. ‘फड़का’ किस जनजाति की स्त्रियों का वस्त्र है?

सुयोग अभ्यास प्रश्न (RPSC/RSMSSB पैटर्न) 2026

Q3. भील पुरुषों की तंग धोती को क्या कहते हैं?

सुयोग अभ्यास प्रश्न (RPSC/RSMSSB पैटर्न) 2026

Q4. सहरिया विवाहित स्त्रियों का वस्त्र कहलाता है —

सुयोग अभ्यास प्रश्न (RPSC/RSMSSB पैटर्न) 2026

Q5. किस जनजाति के पुरुष भी स्त्रियों की तरह आभूषण पहनने के लिए जाने जाते हैं?

सुयोग अभ्यास प्रश्न (RPSC/RSMSSB पैटर्न) 2026

महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

भील स्त्रियों का प्राचीनतम वस्त्र नांदणा है, जो नीले रंग का छपा हुआ वस्त्र होता है।

भील पुरुष ढेपाड़ा (घुटनों तक तंग धोती), खोयतू (लंगोटी) पहनते हैं और सिर पर पगड़ी के स्थान पर पोतिया बाँधते हैं।

पिरिया भील दुल्हन द्वारा विवाह में पहना जाने वाला पीले रंग का लहंगा है।

फड़का कथौड़ी जनजाति की स्त्रियों द्वारा मराठी ढंग से पहनी जाने वाली साड़ी है।

रेनसाई सहरिया जनजाति की स्त्रियों का काली ज़मीन पर लाल-भूरी बूटियों वाला लहंगा है।

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