गरासिया जनजाति की संस्कृति: नृत्य, मेले एवं परंपराएँ
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स्रोत आधार: RPSC / RSMSSB कला-संस्कृति इकाई (लोक कला, मेले, किले)। सिलेबस विषय; कॉपीराइट सामग्री का पेस्ट नहीं।
गरासिया जनजाति की संस्कृति: नृत्य, मेले एवं परंपराएँ
सुयोग AI गुरु
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⚡ Quick Answer: गरासिया जनजाति (जनगणना 2011 — 3,14,194) मुख्यतः सिरोही (आबूरोड, पिंडवाड़ा), उदयपुर (गोगुंदा, कोटड़ा, झाड़ोल, खेरवाड़ा) और पाली (बाली) में रहती है। इनकी उत्पत्ति चौहान राजपूतों और भीलों के मेल से मानी जाती है। घर ‘घेर’, गाँव ‘फलिया’; 5-6 घरों का समूह ‘फला’ और 4-6 फलों से ‘पाल’। विवाह के तीन रूप — मोर बंधिया, पहरावना, ताणना (वधू-मूल्य ‘दापा’)। प्रमुख नृत्य — वालर (गरासियों का घूमर), गैर, मोरिया, गौर, कूद; सबसे बड़ा मेला — मनखां रो मेलो (सियावा, सिरोही); अन्य — कोटेश्वर (अंबाजी), चेतर-विचितर (देवला), गोगुंदा का गणगौर मेला। सामूहिक खेती ‘हारी-भावरी’ और अनाज-भंडार ‘सोहरी’ इनकी विशिष्ट पहचान हैं।
1. गरासिया जनजाति — परिचय
“गरासिया जनजाति कहाँ पाई जाती है” और “वालर नृत्य किस जनजाति का है” — दोनों प्रश्नों का उत्तर गरासिया जनजाति से जुड़ा है। अरावली की दक्षिणी पहाड़ियों — माउंट आबू के आसपास — बसे गरासिया अपनी रंगीन वेशभूषा, चाँदी के भारी आभूषणों, सामूहिक नृत्यों और प्रेम-विवाह की स्वतंत्र परंपरा के लिए प्रसिद्ध हैं। परंपरा के अनुसार गरासिया अपना मूल गोगुंदा (देवला) क्षेत्र से जोड़ते हैं और स्वयं को चौहान राजपूतों के वंशज मानते हैं; मानवशास्त्रीय दृष्टि से इनमें राजपूत और भील — दोनों समुदायों के तत्व मिलते हैं।
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| जनसंख्या (2011) | 3,14,194 (कुल ST का 3.41%) |
| मुख्य क्षेत्र | सिरोही (आबूरोड, पिंडवाड़ा), उदयपुर (गोगुंदा, कोटड़ा, झाड़ोल, खेरवाड़ा), पाली (बाली) |
| उत्पत्ति | चौहान राजपूत + भील मिश्रित मूल (परंपरा) |
| उप-समूह | राजपूत गरासिया, भोपा गरासिया, भील गरासिया, गमेती गरासिया |
| सामाजिक स्तर | मोटी न्यात, नेनकी न्यात, निचली न्यात |
| घर / गाँव | घेर / फलिया |
| बस्ती-संरचना | 5-6 घर = फला; 4-6 फला = पाल |
| मुखिया | पटेल |
| परिवार | एकल परिवार; पिता प्रमुख; बहुपत्नी प्रथा व नाता प्रचलित |
जनजातीय संस्कृति का समग्र परिचय: राजस्थान की जनजातीय संस्कृति — Master Guide
2. विवाह-प्रथाएँ
| प्रथा | अर्थ |
|---|---|
| मोर बंधिया | मौर (सेहरा) बाँधकर, फेरों के साथ होने वाला विवाह |
| पहरावना | नाममात्र की रस्मों वाला विवाह |
| ताणना | वर-पक्ष द्वारा वधू-मूल्य (दापा) देकर होने वाला विवाह |
| दापा | वधू-मूल्य — परंपरागत रूप से 12 बछड़े और 12 कपड़ों के थान जैसे रूप में |
| प्रेम-विवाह | मेलों में युवक-युवती स्वयं जीवनसाथी चुनते हैं; सामाजिक स्वीकृति |
| नाता / विधवा-विवाह | प्रचलित |
मेलों की भूमिका: मनखां रो मेलो जैसे बड़े मेलों में युवक-युवतियों द्वारा जीवनसाथी चुनने की परंपरा गरासिया समाज की विशिष्ट पहचान है।
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3. गरासियों के नृत्य
| नृत्य | विशेषता |
|---|---|
| वालर | गरासियों का ‘घूमर’ — स्त्री-पुरुषों के दो घेरे; बिना वाद्य; धीमी लय |
| गैर | होली के आसपास पुरुषों का डंडा-नृत्य |
| मोरिया | विवाह के अवसर पर पुरुषों का नृत्य |
| गौर | गणगौर के अवसर पर नृत्य |
| कूद | स्त्री-पुरुषों का सामूहिक नृत्य; तालियों से लय |
| लूर | स्त्रियों का नृत्य — सामाजिक-विवाह संबंधी अवसरों पर |
वालर पर विस्तृत लेख: वालर नृत्य — गरासिया
4. मेले एवं त्योहार
| मेला/पर्व | स्थान | विशेष |
|---|---|---|
| मनखां रो मेलो (सियावा का मेला) | सियावा, आबूरोड (सिरोही) | गरासियों का सबसे बड़ा मेला; वैशाख शुक्ल पक्ष; जीवनसाथी-चयन |
| कोटेश्वर मेला | अंबाजी (गुजरात सीमा) | गरासिया व भील |
| चेतर-विचितर मेला | देवला क्षेत्र | गरासिया-भील; बड़े जनजातीय मेलों में एक |
| गणगौर मेला | गोगुंदा (उदयपुर) | गौर नृत्य |
| नक्की झील (माउंट आबू) | वैशाख | पूर्वजों की अस्थियों का विसर्जन; बाद में गीत-नृत्य |
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5. धर्म एवं आस्था
- देवी-देवता: शिव, भैरव, दुर्गा, भवानी माता, देवनारायण।
- स्थानीय देवता: भाखर बावजी (पहाड़ के देवता), घोड़ा बावजी।
- तीर्थ: माउंट आबू की नक्की झील — मृत पूर्वजों की अस्थियों का विसर्जन।
- प्रकृति-पूजा: पहाड़, वृक्ष, जल-स्रोत पूज्य।
देवनारायण जी: देवनारायण जी | नक्की झील: नक्की झील
6. अर्थव्यवस्था — हारी-भावरी एवं सोहरी
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| हारी-भावरी | सामूहिक कृषि — परिवार मिलकर एक-दूसरे के खेत जोतते-बोते हैं |
| सोहरी / कोठी | अनाज-भंडारण की पात्र/कोठी |
| मुख्य फसलें | मक्का, गेहूँ, दालें |
| सहायक | पशुपालन, वन-उपज, मज़दूरी |
7. वेशभूषा, आभूषण एवं गोदना
- स्त्रियाँ: चटक रंग का घाघरा, ओढ़नी, कुर्ती; चाँदी के भारी आभूषण, बाँहों भर चूड़ियाँ, गले में मनकों-सिक्कों की मालाएँ।
- पुरुष: धोती, कमीज़, साफा।
- गोदना: स्त्रियाँ माथे और ठोड़ी पर गोदना गुदवाती हैं।
- विस्तार: जनजातीय वेशभूषा एवं आभूषण
गरासिया समाज की विशेषताएँ — विस्तार से
- स्त्री-स्वतंत्रता: मेलों में जीवनसाथी स्वयं चुनने की स्वतंत्रता; विधवा-विवाह और नाता की सामाजिक स्वीकृति।
- न्यात-व्यवस्था: मोटी न्यात, नेनकी न्यात और निचली न्यात — समाज के भीतर सामाजिक स्तर।
- बस्ती का स्वरूप: पहाड़ों की ढलानों पर बिखरे घर; प्रायः एक गोत्र के परिवार एक बस्ती में।
- सामूहिकता: हारी-भावरी (सामूहिक खेती), सामूहिक नृत्य और सामूहिक मेले — गरासिया संस्कृति का मूल स्वर।
- पूर्वज-स्मृति: नक्की झील में अस्थि-विसर्जन के बाद गीत-नृत्य — मृत्यु को भी जीवन-उत्सव से जोड़ने की परंपरा।
📊 प्रश्न-पैटर्न विश्लेषण — यह विषय परीक्षा में कैसे पूछा जाता है?
| प्रश्न का प्रकार | उदाहरण | हल करने की कुंजी |
|---|---|---|
| नृत्य | वालर किस जनजाति का? | गरासिया |
| मेला | गरासियों का सबसे बड़ा मेला? | मनखां रो मेलो (सियावा, सिरोही) |
| शब्दावली | सामूहिक खेती / अनाज-भंडार? | हारी-भावरी / सोहरी |
| विवाह | वधू-मूल्य वाला विवाह? | ताणना |
गरासिया जनजाति — अध्ययन-सूत्र
- क्षेत्र: सिरोही (आबूरोड, पिंडवाड़ा), उदयपुर (गोगुंदा, कोटड़ा), पाली (बाली)।
- बस्ती: घेर → फला (5-6 घर) → पाल (4-6 फला); गाँव — फलिया।
- विवाह: मोर बंधिया, पहरावना, ताणना; दापा।
- नृत्य-मेले: वालर, मोरिया, गौर, कूद; मनखां रो मेलो, कोटेश्वर, चेतर-विचितर।
- कृषि: हारी-भावरी, सोहरी।
- आस्था: शिव, भैरव, भाखर बावजी, घोड़ा बावजी; नक्की झील (माउंट आबू) में पूर्वजों की अस्थियों का विसर्जन।
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गरासिया जनजाति कहाँ पाई जाती है?
गरासिया जनजाति मुख्यतः सिरोही (आबूरोड, पिंडवाड़ा), उदयपुर (गोगुंदा, कोटड़ा, झाड़ोल, खेरवाड़ा) और पाली (बाली) में पाई जाती है।
वालर नृत्य किस जनजाति का है?
वालर गरासिया जनजाति का प्रमुख नृत्य है, जिसे गरासियों का घूमर भी कहा जाता है।
गरासियों का सबसे बड़ा मेला कौन-सा है?
सिरोही के आबूरोड क्षेत्र में सियावा का ‘मनखां रो मेलो’ गरासियों का सबसे बड़ा मेला है।
हारी-भावरी क्या है?
हारी-भावरी गरासिया जनजाति में प्रचलित सामूहिक कृषि की परंपरा है।
गरासियों के विवाह के प्रकार कौन-से हैं?
गरासियों में मोर बंधिया, पहरावना और ताणना — तीन प्रकार के विवाह प्रचलित हैं; ताणना में वधू-मूल्य (दापा) दिया जाता है।
📝 One-Liner Revision (15 प्रश्न)
- गरासिया जनसंख्या (2011) — 3,14,194
- मुख्य जिले — सिरोही, उदयपुर, पाली
- उत्पत्ति — चौहान राजपूत + भील
- घर — घेर; गाँव — फलिया
- 5-6 घर — फला; 4-6 फला — पाल
- मुखिया — पटेल
- विवाह के प्रकार — मोर बंधिया, पहरावना, ताणना
- वधू-मूल्य — दापा
- सामूहिक कृषि — हारी-भावरी
- अनाज-भंडार — सोहरी/कोठी
- गरासियों का घूमर — वालर
- विवाह का पुरुष नृत्य — मोरिया
- सबसे बड़ा मेला — मनखां रो मेलो (सियावा)
- अस्थि-विसर्जन तीर्थ — नक्की झील
- पहाड़ के देवता — भाखर बावजी
✅ मुख्य बिंदु (Key Points)
- सिरोही-उदयपुर-पाली; राजपूत-भील मिश्रित मूल।
- घेर-फलिया-फला-पाल; पटेल; मोटी/नेनकी/निचली न्यात।
- मोर बंधिया, पहरावना, ताणना; दापा; प्रेम-विवाह।
- वालर, गैर, मोरिया, गौर, कूद; मनखां रो मेलो; हारी-भावरी, सोहरी।
🎯 Exam Trap — इन गलतियों से बचें
- वालर गरासिया का, गवरी भील का — नामों में भ्रम।
- हारी-भावरी (सामूहिक खेती) गरासियों की; भीलों की स्थानांतरित खेती वालरा।
- मनखां रो मेलो सिरोही में; सीताबाड़ी (बारां) सहरियों का।
🧠 मेमोरी ट्रिक
“घेर में गरासिया, हारी-भावरी से खेती, वालर में नाचे, मनखां में जीवनसाथी”।
👨🏫 शिक्षक की परीक्षा टिप्पणी
गरासिया पर प्रश्न ‘वालर’, ‘हारी-भावरी’, ‘विवाह के तीन प्रकार’ और ‘मनखां रो मेलो’ पर केंद्रित रहते हैं। भील और गरासिया की शब्दावली (पाल, फला, दापा) में समानता है — इसलिए अंतर वाले बिंदु (घेर, फलिया, वालर, हारी-भावरी) अलग से याद करें।
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📖 प्रामाणिक संदर्भ एवं स्रोत
- जनगणना 2011 — गरासिया (3,14,194)।
- RajRAS — ‘Rajasthan Tribes’: गरासिया — क्षेत्र, घेर-फलिया-फला-पाल, उप-समूह, विवाह (मोर बंधिया, पहरावना, ताणना, दापा), न्यात, मेले, नृत्य, देवता, हारी-भावरी, सोहरी।
- भारतकोश (bharatdiscovery.org) — गरासिया जनजाति; सियावा/मनखां रो मेलो।
- Utsav portal, भारत सरकार — माउंट आबू ग्रीष्म महोत्सव (गरासियों का नक्की झील पर अस्थि-विसर्जन)।

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सुयोग अभ्यास प्रश्न (RPSC/RSMSSB पैटर्न) 2026Q2. गरासियों में सामूहिक कृषि को क्या कहते हैं?
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सुयोग अभ्यास प्रश्न (RPSC/RSMSSB पैटर्न) 2026महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)
गरासिया स्वयं को चौहान राजपूतों के वंशज मानते हैं; मानवशास्त्रीय दृष्टि से इनमें राजपूत और भील — दोनों समुदायों के तत्व मिलते हैं।
गरासियों के घर को ‘घेर’ और गाँव को ‘फलिया’ कहा जाता है।
सिरोही जिले के आबूरोड क्षेत्र में सियावा का ‘मनखां रो मेलो’ गरासियों का सबसे बड़ा मेला है।
गरासिया जनजाति में सामूहिक रूप से की जाने वाली खेती को हारी-भावरी कहते हैं।
गरासिया जनजाति के लोग माउंट आबू की नक्की झील में पूर्वजों की अस्थियों का विसर्जन करते हैं।
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