वागड़ की रियासतें — डूंगरपुर, बांसवाड़ा व प्रतापगढ़ का इतिहास — RAS/CET
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संक्षिप्त उत्तर: दक्षिणी राजस्थान का वागड़ (प्राचीन वाग्वर) क्षेत्र मुख्यतः आज के डूंगरपुर व बांसवाड़ा जिलों से बनता है; इससे सटा प्रतापगढ़ का भू-भाग कांठल कहलाता है। गुहिलों से पहले यहाँ वागड़ के परमारों (राजधानी अर्थूणा) का शासन था। 12वीं सदी के उत्तरार्ध में मेवाड़ के गुहिल शासक सामंत सिंह ने मेवाड़ खोने के बाद वागड़ जाकर यहाँ गुहिल शाखा की नींव रखी। परंपरा के अनुसार रावल वीरसिंह देव ने डूंगरिया भील को पराजित कर डूंगरपुर बसाया (वर्ष पर मतभेद — 1282 व 1358 दोनों मिलते हैं)। रावल उदयसिंह खानवा (1527) में राणा सांगा की ओर से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए; इसके बाद वागड़ दो भागों में बँटा — पृथ्वीराज → डूंगरपुर और जगमाल → बांसवाड़ा। बांसवाड़ा को "सौ द्वीपों का शहर" कहा जाता है (माही नदी के टापू)। प्रतापगढ़ के शासक राणा कुंभा के भाई क्षेमकर्ण के वंशज (सिसोदिया) थे; सूरजमल ने देवलिया को केंद्र बनाया और महारावत प्रतापसिंह ने नया नगर प्रतापगढ़ बसाया (सामान्यतः 1699)। प्रतापगढ़ का सिक्का "सालिमशाही" तथा हस्तकला थेवा प्रसिद्ध हैं। तीनों ने 1818 में अंग्रेज़ों से संधि की। स्वतंत्रता आंदोलन में भोगीलाल पंड्या ("वागड़ का गांधी"), रास्तापाल कांड (19 जून 1947, कालीबाई), बांसवाड़ा में भूपेंद्रनाथ त्रिवेदी उल्लेखनीय हैं। तीनों रियासतें 25 मार्च 1948 को राजस्थान संघ (दूसरा चरण) में मिलीं।
संक्षिप्त उत्तर
बिंदु | तथ्य | याद रखने योग्य संकेत |
|---|---|---|
वागड़ क्षेत्र | डूंगरपुर + बांसवाड़ा (प्राचीन नाम वाग्वर) | बोली — वागड़ी; प्रमुख नदी — माही |
गुहिलों से पहले | वागड़ के परमार | राजधानी अर्थूणा (बांसवाड़ा) |
वागड़ में गुहिल शाखा | सामंत सिंह (12वीं सदी उत्तरार्ध) | मेवाड़ खोकर वागड़ गए |
डूंगरपुर नगर | रावल वीरसिंह देव | डूंगरिया भील के नाम पर; वर्ष 1282/1358 (मतभेद) |
खानवा 1527 | रावल उदयसिंह की वीरगति | सांगा की ओर से लड़े |
वागड़ का विभाजन | उदयसिंह के पुत्रों में | पृथ्वीराज — डूंगरपुर; जगमाल — बांसवाड़ा |
बांसवाड़ा | संस्थापक — जगमाल सिंह | "सौ द्वीपों का शहर"; माही बजाज सागर |
प्रतापगढ़ (कांठल) | क्षेमकर्ण (कुंभा के भाई) के वंशज | पुरानी राजधानी देवलिया; सूरजमल |
प्रतापगढ़ नगर | महारावत प्रतापसिंह | सामान्यतः 1699 (कुछ स्रोतों में 1698) |
सिक्का | सालिमशाही (प्रतापगढ़) | महारावत सालिम सिंह के नाम पर |
ब्रिटिश संधि | तीनों — 1818 | प्रतापगढ़ (अक्टूबर), डूंगरपुर (दिसंबर) |
"वागड़ का गांधी" | भोगीलाल पंड्या | डूंगरपुर प्रजामंडल 1944 |
रास्तापाल कांड | 19 जून 1947 (डूंगरपुर) | कालीबाई, नानाभाई खांट, सेंगाभाई |
विलय | राजस्थान संघ — 25 मार्च 1948 | एकीकरण का दूसरा चरण; राजधानी कोटा |
2. सिलेबस में यह टॉपिक क्यों महत्वपूर्ण है?
RAS, राजस्थान CET और पटवारी/VDO के इतिहास खंड में "राजस्थान के प्रमुख राजवंश" के अंतर्गत मेवाड़, मारवाड़, आमेर और हाड़ौती के बाद सबसे अधिक प्रश्न दक्षिणी राजस्थान की गुहिल-सिसोदिया शाखाओं से बनते हैं। प्रश्न प्रायः चार प्रकार के होते हैं:
स्थापना/संस्थापक: डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़ नगर किसने बसाए और किसके नाम पर नाम पड़ा।
संबंध-आधारित: खानवा 1527 और वागड़ के विभाजन का संबंध; क्षेमकर्ण-कुंभा संबंध।
संस्कृति/स्थापत्य: गैप सागर, उदय विलास, जूना महल, थेवा कला, सालिमशाही सिक्का।
आधुनिक इतिहास: भगत आंदोलन, प्रजामंडल (भोगीलाल पंड्या, रास्तापाल), राजस्थान संघ में विलय।
यह नोट तीनों रियासतों को एक साथ, तुलनात्मक रूप में प्रस्तुत करता है। मेवाड़ के मुख्य गुहिल वंश के लिए गुहिल वंश — बप्पा रावल से सिसोदिया वंश देखें।
3. वागड़ क्षेत्र — नाम, भूगोल और पूर्व इतिहास
3.1 नाम और सीमा
प्राचीन अभिलेखों और ग्रंथों में इस क्षेत्र का नाम वाग्वर मिलता है, जो आगे चलकर वागड़ हुआ। परीक्षा की दृष्टि से वागड़ = डूंगरपुर व बांसवाड़ा। इस क्षेत्र की बोली वागड़ी है, जो गुजराती से प्रभावित मानी जाती है (बोलियों के विस्तार के लिए राजस्थान की प्रमुख बोलियाँ)। वागड़ के पूर्व/उत्तर-पूर्व में स्थित प्रतापगढ़ का पहाड़ी-वनाच्छादित भू-भाग कांठल कहलाता है।
3.2 भौगोलिक विशेषताएँ
माही नदी — मध्य प्रदेश से आकर बांसवाड़ा में प्रवेश करती है; डूंगरपुर-बांसवाड़ा की सीमा बनाती हुई गुजरात जाती है। इसे "वागड़ की गंगा" और "कांठल की गंगा" कहा जाता है।
सोम, माही और जाखम का संगम बेणेश्वर (डूंगरपुर) — "वागड़ का पुष्कर/कुंभ"; यहाँ संत मावजी से जुड़ा प्रसिद्ध मेला लगता है।
पहाड़ी, वन्य और आदिवासी-बहुल क्षेत्र — भील जनजाति की प्रधानता। इसलिए डूंगरपुर व बांसवाड़ा दोनों के नामकरण की परंपराएँ भील मुखियाओं से जुड़ी हैं।
3.3 गुहिलों से पहले — वागड़ के परमार
10वीं–12वीं सदी में वागड़ पर परमारों की एक शाखा का शासन था, जो मालवा के परमारों से संबद्ध मानी जाती है। इनकी राजधानी अर्थूणा (उत्थूणक), बांसवाड़ा थी, जहाँ के शिव व जैन मंदिरों के अवशेष आज भी प्रसिद्ध हैं। परमारों के पतन के बाद वागड़ में गुहिलों का प्रवेश हुआ। विस्तार: परमार वंश — आबू व वागड़ शाखा।
4. सामंत सिंह और वागड़ में गुहिल शाखा की स्थापना
सामंत सिंह 12वीं सदी के उत्तरार्ध में मेवाड़ के गुहिल शासक थे। इसी काल में नाडोल/जालोर के चौहान कीतू (कीर्तिपाल) ने मेवाड़ पर आक्रमण कर उन्हें पराजित किया। मेवाड़ हाथ से निकलने पर सामंत सिंह दक्षिण की ओर वागड़ चले गए और वहाँ अपना राज्य स्थापित किया। परंपरा में उनकी आरंभिक राजधानी बड़ौदा (वटपद्रक), डूंगरपुर क्षेत्र में बताई जाती है। उधर मेवाड़ को उनके भाई कुमारसिंह ने पुनः प्राप्त किया।
वर्ष-सावधानी: सामंत सिंह के वागड़ जाने का वर्ष पुस्तकों में लगभग 1171–1178 ई. के बीच अलग-अलग दिया गया है। परीक्षा में "12वीं सदी (उत्तरार्ध)" और "सामंत सिंह" — यही जोड़ी पर्याप्त है।
4.1 क्यों महत्वपूर्ण?
डूंगरपुर और बांसवाड़ा के शासक इसी शाखा से निकले — इसलिए वे गुहिल वंश की वागड़ शाखा कहलाते हैं; उपाधि "रावल / महारावल"।
मेवाड़ के मुख्य वंश में "रावल" शाखा का अंत रतनसिंह (1303) के साथ हुआ और "राणा" (सिसोदिया) शाखा आगे बढ़ी; जबकि वागड़ में "रावल" उपाधि जारी रही।
प्रतापगढ़ की शाखा अलग है — वह 15वीं सदी में सिसोदिया राणा मोकल के पुत्र क्षेमकर्ण से निकली (खंड 8)।
5. डूंगरपुर राज्य — स्थापना, शासक और स्थापत्य
5.1 डूंगरपुर नगर की स्थापना
परंपरा के अनुसार वागड़ के गुहिल शासक रावल वीरसिंह देव ने इस क्षेत्र के भील मुखिया डूंगरिया (डूंगर भील) को पराजित कर उसकी पाल/बस्ती के स्थान पर नगर बसाया, जिसका नाम डूंगरपुर पड़ा। "डूंगर" का अर्थ पहाड़ी भी है, इसलिए इसे "पहाड़ों की नगरी" भी कहते हैं।
मतभेद: स्थापना-वर्ष कुछ पुस्तकों में 1282 ई. तथा कई प्रतियोगी-परीक्षा पुस्तकों में 1358 ई. दिया गया है; कुछ में संस्थापक के रूप में "रावल डूंगरसिंह" का नाम भी मिलता है। परीक्षा में सर्वाधिक प्रचलित उत्तर — रावल वीरसिंह देव, डूंगरिया भील के नाम पर। विकल्पों में जो वर्ष दिया हो, उसे इन्हीं दोनों में से पहचानें।
5.2 प्रमुख शासक (परीक्षा-उपयोगी)
शासक | काल (लगभग) | प्रमुख तथ्य |
|---|---|---|
सामंत सिंह | 12वीं सदी उत्तरार्ध | वागड़ में गुहिल शाखा का संस्थापक |
रावल वीरसिंह देव | 13वीं–14वीं सदी | डूंगरपुर नगर; जूना महल की नींव (परंपरा) |
महारावल गोपीनाथ (गैपा रावल) | 15वीं सदी | गैप सागर झील का निर्माण |
रावल उदयसिंह (प्रथम) | 16वीं सदी आरंभ – 1527 | खानवा में सांगा की ओर से वीरगति; उसके बाद राज्य-विभाजन |
रावल पृथ्वीराज | 1527 के बाद | विभाजन के बाद डूंगरपुर के शासक |
रावल आसकरण | 16वीं सदी उत्तरार्ध | अकबर के समय मुगल अधीनता स्वीकार (1570 का दशक) |
महारावल जसवंत सिंह द्वितीय | 19वीं सदी आरंभ | 1818 की ब्रिटिश संधि |
महारावल उदयसिंह द्वितीय | 19वीं सदी उत्तरार्ध | उदय विलास महल |
महारावल लक्ष्मण सिंह | 20वीं सदी (अंतिम शासक) | प्रजामंडल-दमन, रास्तापाल कांड का काल; 1948 विलय |
5.3 स्थापत्य व सांस्कृतिक धरोहर
गैप सागर झील — 15वीं सदी में महारावल गोपीनाथ (लोक में "गैपा रावल") द्वारा निर्मित; नाम भी उन्हीं से। झील के बीच बादल महल और तट पर श्रीनाथजी का मंदिर स्थित है।
उदय विलास महल — गैप सागर के किनारे, महारावल उदयसिंह द्वितीय (19वीं सदी) द्वारा; राजपूत शैली व सुंदर झरोखे, स्थानीय नीले-भूरे पारेवा पत्थर का प्रयोग।
जूना महल — डूंगरपुर का पुराना (13वीं सदी से विकसित) बहुमंजिला, दुर्ग-जैसा महल; भीतर भित्ति-चित्र, काँच व मीनाकारी का काम प्रसिद्ध।
देव सोमनाथ मंदिर — सोम नदी के तट पर, प्राचीन शिव मंदिर।
बेणेश्वर धाम — सोम-माही-जाखम संगम; माघ पूर्णिमा का मेला; संत मावजी से संबद्ध।
ट्रिक: "गोपीनाथ → गैप सागर; उदयसिंह द्वितीय → उदय विलास; जूना = पुराना = वीरसिंह काल।"
6. खानवा (1527) और वागड़ का विभाजन
17 मार्च 1527 को खानवा (भरतपुर) में राणा सांगा और बाबर के बीच युद्ध हुआ। सांगा के साथ आए अनेक राजपूत शासकों में वागड़ के रावल उदयसिंह भी थे, जो इस युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए (युद्ध के विस्तार के लिए महाराणा सांगा के प्रमुख युद्ध)।
6.1 विभाजन
उदयसिंह की मृत्यु के बाद उनके दो पुत्रों में उत्तराधिकार का विवाद हुआ और वागड़ राज्य दो भागों में बँट गया:
पुत्र | प्राप्त भाग | टिप्पणी |
|---|---|---|
पृथ्वीराज | डूंगरपुर (पश्चिमी भाग) | मूल गद्दी व राजधानी डूंगरपुर |
जगमाल सिंह | बांसवाड़ा (पूर्वी भाग) | नई रियासत बांसवाड़ा की स्थापना |
सामान्यतः माही नदी को दोनों राज्यों की प्राकृतिक सीमा माना गया। विभाजन का औपचारिक वर्ष पुस्तकों में 1527 के बाद के कुछ वर्षों (लगभग 1529–1530) के रूप में मिलता है; इस बीच दोनों भाइयों में संघर्ष हुआ और बाहरी मध्यस्थता से बँटवारा तय हुआ — मध्यस्थ के नाम पर स्रोतों में भिन्नता है, इसलिए यहाँ नहीं दिया गया।
एक लाइन: खानवा 1527 → उदयसिंह की वीरगति → पृथ्वीराज (डूंगरपुर) + जगमाल (बांसवाड़ा); सीमा — माही।
7. बांसवाड़ा राज्य
7.1 स्थापना और नामकरण
महारावल जगमाल सिंह बांसवाड़ा रियासत के संस्थापक माने जाते हैं। नामकरण के बारे में दो प्रचलित मत हैं:
यहाँ बाँस के घने वन थे — "बाँसों का वाड़ा"।
स्थानीय भील मुखिया बासना/बांसिया भील को पराजित कर उसके नाम पर — यह परंपरा डूंगरपुर (डूंगरिया भील) के समान है।
परीक्षा में दोनों मत स्वीकार्य हैं; प्रश्न प्रायः संस्थापक (जगमाल) पर ही आता है।
7.2 "सौ द्वीपों का शहर" और माही
माही नदी में अनेक छोटे-बड़े टापू (द्वीप) होने के कारण बांसवाड़ा को "सौ द्वीपों का शहर" (City of Hundred Islands) कहा जाता है।
माही बजाज सागर बाँध — बोरखेड़ा (बांसवाड़ा) के पास; राजस्थान-गुजरात की संयुक्त परियोजना (माही बजाज सागर परियोजना)।
माही की विशेषता — कर्क रेखा को दो बार काटती है (माही नदी — उद्गम, बाँध व सहायक)।
7.3 बांसवाड़ा की प्रमुख धरोहर
आनंद सागर (बाई तालाब) — परंपरा के अनुसार जगमाल की रानी लांछी बाई द्वारा बनवाया गया।
अर्थूणा — वागड़ के परमारों की राजधानी; मंदिर-समूह (खंड 3.3)।
त्रिपुरा सुंदरी मंदिर — तलवाड़ा के पास, शक्तिपीठ के रूप में प्रसिद्ध।
मानगढ़ धाम — बांसवाड़ा जिले की पहाड़ी; 17 नवंबर 1913 का भील नरसंहार (खंड 11)।
कुशलगढ़ — बांसवाड़ा क्षेत्र का एक प्रमुख ठिकाना (चीफ़शिप), जो 1948 में राजस्थान संघ में अलग इकाई के रूप में शामिल हुआ।
7.4 बांसवाड़ा के प्रमुख शासक
शासक | तथ्य |
|---|---|
जगमाल सिंह | संस्थापक; उदयसिंह (खानवा वीर) के पुत्र |
प्रतापसिंह | अकबर के समय मुगल अधीनता (1570 का दशक) — डूंगरपुर के आसकरण के साथ |
चंद्रवीर सिंह | अंतिम शासक; राजस्थान संघ के विलय-पत्र पर हस्ताक्षर करते समय कहा — "मैं अपने डेथ वारंट पर हस्ताक्षर कर रहा हूँ" |
8. प्रतापगढ़ (देवलिया) राज्य — सिसोदियों की कांठल शाखा
8.1 क्षेमकर्ण — शाखा के मूल पुरुष
क्षेमकर्ण (खेमकरण) मेवाड़ के राणा मोकल के पुत्र और राणा कुंभा के भाई थे। कुंभा से अनबन के कारण वे मेवाड़ से बाहर रहे। इस प्रकार प्रतापगढ़ के शासक सिसोदिया थे — वागड़ के डूंगरपुर-बांसवाड़ा (सामंत सिंह की रावल शाखा) से अलग।
8.2 सूरजमल और देवलिया
क्षेमकर्ण के पुत्र सूरजमल का राणा रायमल के समय मेवाड़ के राजकुमारों (विशेषकर पृथ्वीराज) से संघर्ष हुआ। अंततः सूरजमल ने मेवाड़ के दक्षिण-पूर्व में कांठल क्षेत्र में अपना स्वतंत्र राज्य बनाया और देवलिया (देवगढ़) को केंद्र/राजधानी बनाया। इसलिए अंग्रेज़ी व पुराने अभिलेखों में यह राज्य "देवलिया-प्रतापगढ़" भी कहलाता है।
8.3 महारावत प्रतापसिंह और प्रतापगढ़ नगर
महारावत प्रतापसिंह ने देवलिया के निकट नया नगर बसाया, जो उनके नाम पर प्रतापगढ़ कहलाया और आगे राजधानी बना। सर्वाधिक प्रचलित वर्ष 1699 ई. है; कुछ पुस्तकों में 1698 मिलता है। शासकों की उपाधि "महारावत" थी।
8.4 सालिमशाही सिक्का
18वीं सदी के उत्तरार्ध में महारावत सालिम सिंह के समय प्रतापगढ़ की टकसाल से चाँदी का रुपया ढाला गया, जो "सालिमशाही" कहलाया। यह मुगल बादशाह (शाह आलम द्वितीय) के नाम-अनुमति से ढाला गया था और मालवा-वागड़ क्षेत्र में खूब प्रचलित रहा। बाँसवाड़ा राज्य में भी यह सिक्का चलता था। (वर्ष पर स्रोत भिन्न हैं, इसलिए यहाँ "18वीं सदी उत्तरार्ध" ही लिखें।)
8.5 थेवा कला
प्रतापगढ़ की विश्वप्रसिद्ध थेवा कला — रंगीन काँच (बेल्जियम ग्लास) पर सोने की बारीक पत्ती से कलाकृति उकेरने की विधि; इसे राजसोनी परिवार पीढ़ियों से करता आया है और परंपरा नाथूजी सोनी से जोड़ी जाती है। इसे भौगोलिक संकेतक (GI) भी मिला है। विस्तार: प्रतापगढ़ की थेवा कला।
8.6 अन्य तथ्य
1818 में संधि करने वाले प्रतापगढ़ के शासक सामंत सिंह थे — 12वीं सदी के वागड़ वाले सामंत सिंह से भ्रमित न हों (खंड 16)।
स्वतंत्र भारत में प्रतापगढ़ पहले चित्तौड़गढ़/उदयपुर-बांसवाड़ा क्षेत्रों में बँटा रहा; 26 जनवरी 2008 को यह राजस्थान का 33वाँ जिला बना।
सीतामाता वन्यजीव अभयारण्य (उड़न गिलहरी के लिए प्रसिद्ध) प्रतापगढ़ जिले में है।
9. तीनों रियासतों की तुलना — एक नज़र में
आधार | डूंगरपुर | बांसवाड़ा | प्रतापगढ़ |
|---|---|---|---|
वंश-शाखा | गुहिल (सामंत सिंह की वागड़ शाखा) | गुहिल (डूंगरपुर से निकली) | सिसोदिया (क्षेमकर्ण शाखा) |
संस्थापक | रावल वीरसिंह देव (नगर) | जगमाल सिंह | सूरजमल (देवलिया); प्रतापसिंह (नगर) |
नामकरण | डूंगरिया भील | बाँस वन / बांसिया भील | महारावत प्रतापसिंह |
शासक उपाधि | महारावल | महारावल | महारावत |
क्षेत्र-नाम | वागड़ | वागड़ | कांठल |
प्रमुख धरोहर | गैप सागर, उदय विलास, जूना महल | आनंद सागर, अर्थूणा, त्रिपुरा सुंदरी | थेवा कला, सालिमशाही सिक्का |
ब्रिटिश संधि | 1818 (दिसंबर) | 1818 | 1818 (अक्टूबर) |
प्रजामंडल | 1944 — भोगीलाल पंड्या | 1943 — भूपेंद्रनाथ त्रिवेदी | 1945 — अमृतलाल पायक |
विलय | राजस्थान संघ, 25 मार्च 1948 | राजस्थान संघ, 25 मार्च 1948 | राजस्थान संघ, 25 मार्च 1948 |
10. मुगल, मराठा और ब्रिटिश काल
10.1 मुगल संबंध
अकबर के समय, लगभग 1570 के दशक में, डूंगरपुर के रावल आसकरण और बांसवाड़ा के रावल प्रतापसिंह ने मुगल अधीनता स्वीकार की। यह वही काल है जब मेवाड़ में महाराणा प्रताप संघर्ष कर रहे थे — अर्थात वागड़ की शाखाओं ने मेवाड़ की नीति से अलग राह अपनाई। मेवाड़ और मुगलों के बीच "सैंडविच" की तरह स्थित होने के कारण इन राज्यों पर दोनों का दबाव रहता था (संदर्भ: मुगल-राजपूत संबंध व महाराणा प्रताप)।
10.2 मराठा दबाव
18वीं सदी में मुगल शक्ति क्षीण होने पर मालवा से सटे ये राज्य मराठों (होल्कर, सिंधिया, धार के पवार) के आक्रमण और खिराज/चौथ की माँग से त्रस्त रहे। पिंडारी लूटमार ने स्थिति और बिगाड़ी।
10.3 1818 की संधियाँ
लॉर्ड हेस्टिंग्स की अधीनस्थ पार्थक्य (Subordinate Isolation) नीति के तहत तीनों राज्यों ने 1818 में ईस्ट इंडिया कंपनी से संधि की:
रियासत | संधि | शासक |
|---|---|---|
प्रतापगढ़ | 1818 (अक्टूबर) | सामंत सिंह |
डूंगरपुर | 1818 (दिसंबर) | जसवंत सिंह द्वितीय |
बांसवाड़ा | 1818 | माह व शासक के नाम पर स्रोतों में भिन्नता |
संधि के बाद मराठों को दिया जाने वाला खिराज कंपनी को मिलने लगा, बाहरी सुरक्षा कंपनी के हाथ आई और आंतरिक मामलों में पॉलिटिकल एजेंट का हस्तक्षेप बढ़ा। विस्तार: मराठा हस्तक्षेप और 1818 की संधियाँ।
10.4 भील असंतोष और मेवाड़ भील कोर
ब्रिटिश-रियासती नियंत्रण, वन-अधिकारों पर रोक और बेगार से वागड़-मेवाड़ के भीलों में असंतोष बढ़ा। भील उपद्रवों को नियंत्रित करने के लिए अंग्रेज़ों ने 1841 में खेरवाड़ा (उदयपुर, डूंगरपुर सीमा के पास) में मेवाड़ भील कोर का गठन किया। 1857 में इस क्षेत्र से तात्या टोपे भी गुज़रे थे।
11. भगत आंदोलन — गोविंद गुरु और मानगढ़
वागड़ का आधुनिक इतिहास भील सुधार आंदोलन के बिना अधूरा है:
गोविंद गुरु — जन्म 1858, बांसिया (बेड़सा) गाँव, डूंगरपुर; बंजारा परिवार से।
संप सभा (1883) — भीलों में शराब-त्याग, स्वच्छता, शिक्षा और बेगार-विरोध के लिए संगठन; अनुयायी "भगत" कहलाए — इसीलिए भगत आंदोलन।
मानगढ़ पहाड़ी (बांसवाड़ा) — मार्गशीर्ष पूर्णिमा, 17 नवंबर 1913 को सभा पर अंग्रेज़ी व रियासती सेना की गोलीबारी; सैकड़ों भील मारे गए — इसे "राजस्थान का जलियाँवाला बाग" कहा जाता है (जलियाँवाला से भी पहले)।
गोविंद गुरु के सहयोगी — पूंजा धीरजी (पूंजा पारगी)।
विस्तार: गोविंद गुरु व मानगढ़ हत्याकांड तथा राजस्थान के जनजातीय आंदोलन।
12. प्रजामंडल आंदोलन — डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़
12.1 डूंगरपुर
भोगीलाल पंड्या — "वागड़ का गांधी"; भीलों में शिक्षा व जागृति के अग्रणी।
वागड़ में शिक्षा-प्रसार हेतु सेवा संघ (डूंगरपुर सेवा संघ / वागड़ सेवा संघ) की स्थापना — सामान्यतः 1938; इसके माध्यम से भील क्षेत्रों में अनेक पाठशालाएँ खोली गईं।
डूंगरपुर प्रजामंडल — 1944 (सामान्यतः 1 अगस्त 1944), संस्थापक-अध्यक्ष भोगीलाल पंड्या; सहयोगी गौरीशंकर उपाध्याय, हरिदेव जोशी आदि।
रियासत ने इन पाठशालाओं को बंद कराने का अभियान चलाया — पूनावाड़ा (मई 1947) में शिक्षक को पीटा गया।
12.2 रास्तापाल कांड (19 जून 1947)
डूंगरपुर के रास्तापाल गाँव में सेवा संघ की पाठशाला बंद कराने पुलिस पहुँची। पाठशाला के संचालक नानाभाई खांट ने विरोध किया, उन्हें पीटा गया और उनकी मृत्यु हो गई। शिक्षक सेंगाभाई को ट्रक से बाँधकर घसीटा जा रहा था, तब 12–13 वर्ष की भील बालिका कालीबाई ने हँसिए से रस्सी काट दी; पुलिस की गोली से वह घायल हुई और 20 जून 1947 को उसकी मृत्यु हो गई। कालीबाई वागड़ की बलिदानी बालिका के रूप में स्मरण की जाती है; डूंगरपुर में उसकी स्मृति में स्मारक/योजनाएँ हैं।
12.3 बांसवाड़ा
बांसवाड़ा प्रजामंडल — 1943, भूपेंद्रनाथ त्रिवेदी के नेतृत्व में (सहयोगियों के नाम पुस्तकों में भिन्न मिलते हैं)।
प्रजामंडल ने उत्तरदायी शासन की माँग उठाई; 1948 में रियासत राजस्थान संघ में विलीन हुई।
12.4 प्रतापगढ़
प्रतापगढ़ प्रजामंडल — 1945, अमृतलाल पायक (सहयोगी चुन्नीलाल प्रभाकर)। कुछ पुस्तकों में वर्ष/सहयोगियों में थोड़ा अंतर है; परीक्षा में "1945 — अमृतलाल पायक" याद रखें।
प्रजामंडल | वर्ष | संस्थापक/प्रमुख नेता |
|---|---|---|
बांसवाड़ा | 1943 | भूपेंद्रनाथ त्रिवेदी |
डूंगरपुर | 1944 | भोगीलाल पंड्या |
प्रतापगढ़ | 1945 | अमृतलाल पायक |
क्रम-ट्रिक: "बा-डू-प्र = 43-44-45" — बांसवाड़ा, डूंगरपुर, प्रतापगढ़ लगातार तीन वर्ष।
अन्य प्रजामंडलों के साथ तुलना: राजस्थान के प्रमुख प्रजामंडल — संस्थापक, नेता, वर्ष।
13. विलय — राजस्थान संघ (25 मार्च 1948)
एकीकरण के दूसरे चरण में 25 मार्च 1948 को राजस्थान संघ (पूर्व राजस्थान) बना, जिसमें डूंगरपुर, बांसवाड़ा और प्रतापगढ़ तीनों शामिल हुए।
बिंदु | तथ्य |
|---|---|
शामिल इकाइयाँ | 9 रियासतें — कोटा, बूंदी, झालावाड़, टोंक, किशनगढ़, शाहपुरा, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़ + कुशलगढ़ ठिकाना |
राजधानी | कोटा |
राजप्रमुख | कोटा के महाराव भीमसिंह |
प्रधानमंत्री | गोकुललाल असावा (शाहपुरा) |
उद्घाटन | एन.वी. गाडगिल |
चर्चित कथन | बांसवाड़ा के चंद्रवीर सिंह — "डेथ वारंट" |
कुछ ही सप्ताह बाद 18 अप्रैल 1948 को उदयपुर (मेवाड़) के मिलने से यह संयुक्त राजस्थान बना। अतः "वागड़ की रियासतें किस चरण में मिलीं?" — उत्तर दूसरा चरण, राजस्थान संघ; "संयुक्त राजस्थान" (तीसरा चरण) विकल्प में भ्रम के लिए दिया जाता है। विस्तार: राजस्थान संघ का निर्माण व संयुक्त राजस्थान का निर्माण।
14. विस्तृत समयरेखा (Timeline)
वर्ष/काल | घटना |
|---|---|
10वीं–12वीं सदी | वागड़ के परमार; राजधानी अर्थूणा |
12वीं सदी उत्तरार्ध (लगभग 1171–78) | सामंत सिंह कीतू चौहान से पराजित होकर वागड़ गए; गुहिल शाखा |
1282 / 1358 (मतभेद) | रावल वीरसिंह देव द्वारा डूंगरपुर नगर |
15वीं सदी | महारावल गोपीनाथ — गैप सागर; मेवाड़ में क्षेमकर्ण (कुंभा के भाई) |
15वीं सदी अंत / 16वीं आरंभ | सूरजमल — देवलिया (कांठल) में राज्य |
17 मार्च 1527 | खानवा — रावल उदयसिंह की वीरगति |
1527 के बाद (लगभग 1529–30) | वागड़ विभाजन — डूंगरपुर (पृथ्वीराज), बांसवाड़ा (जगमाल) |
1570 का दशक | आसकरण (डूंगरपुर) व प्रतापसिंह (बांसवाड़ा) — मुगल अधीनता |
1699 (कुछ में 1698) | महारावत प्रतापसिंह — प्रतापगढ़ नगर |
18वीं सदी उत्तरार्ध | सालिम सिंह — सालिमशाही सिक्का; मराठा दबाव |
1818 | प्रतापगढ़ (अक्टूबर), डूंगरपुर (दिसंबर), बांसवाड़ा — ब्रिटिश संधियाँ |
1841 | खेरवाड़ा में मेवाड़ भील कोर |
1883 | गोविंद गुरु — संप सभा |
17 नवंबर 1913 | मानगढ़ नरसंहार (बांसवाड़ा) |
1938 | भोगीलाल पंड्या — सेवा संघ |
1943 / 1944 / 1945 | बांसवाड़ा / डूंगरपुर / प्रतापगढ़ प्रजामंडल |
19 जून 1947 | रास्तापाल कांड — नानाभाई खांट, कालीबाई |
25 मार्च 1948 | राजस्थान संघ में विलय |
26 जनवरी 2008 | प्रतापगढ़ — राजस्थान का 33वाँ जिला |
15. परीक्षा में पूछे जाने वाले तथ्य (One-liners)
वागड़ क्षेत्र — डूंगरपुर व बांसवाड़ा; प्राचीन नाम वाग्वर।
प्रतापगढ़ का भू-भाग — कांठल; माही — "कांठल की गंगा" व "वागड़ की गंगा"।
वागड़ में गुहिल शाखा का संस्थापक — सामंत सिंह।
सामंत सिंह को मेवाड़ से बेदखल करने वाला — कीतू (कीर्तिपाल) चौहान।
मेवाड़ को पुनः प्राप्त करने वाला — कुमारसिंह।
डूंगरपुर का नाम — डूंगरिया भील के नाम पर; संस्थापक — रावल वीरसिंह देव।
गैप सागर — महारावल गोपीनाथ; उदय विलास महल — महारावल उदयसिंह द्वितीय।
खानवा (1527) में वीरगति पाने वाले वागड़ शासक — रावल उदयसिंह।
बांसवाड़ा के संस्थापक — जगमाल सिंह; "सौ द्वीपों का शहर" — बांसवाड़ा।
आनंद सागर (बाई तालाब) — रानी लांछी बाई।
वागड़ के परमारों की राजधानी — अर्थूणा।
प्रतापगढ़ के शासक किसके वंशज — क्षेमकर्ण (राणा कुंभा के भाई)।
प्रतापगढ़ की पुरानी राजधानी — देवलिया।
प्रतापगढ़ नगर — महारावत प्रतापसिंह (1699)।
सालिमशाही सिक्का — प्रतापगढ़।
थेवा कला — प्रतापगढ़ (राजसोनी परिवार)।
"वागड़ का गांधी" — भोगीलाल पंड्या।
रास्तापाल कांड — 19 जून 1947, डूंगरपुर; कालीबाई।
मानगढ़ धाम — बांसवाड़ा; 17 नवंबर 1913।
"मैं अपने डेथ वारंट पर हस्ताक्षर कर रहा हूँ" — बांसवाड़ा के चंद्रवीर सिंह।
16. भ्रम व सावधानियाँ (Exam Traps)
Trap 1: दो "सामंत सिंह"
12वीं सदी का सामंत सिंह — मेवाड़ का गुहिल शासक जो वागड़ गया। 1818 में संधि करने वाला सामंत सिंह — प्रतापगढ़ का शासक। प्रश्न का काल देखकर उत्तर दें।
Trap 2: दो "उदयसिंह"
डूंगरपुर/वागड़ के रावल उदयसिंह (प्रथम) खानवा 1527 में मारे गए। महाराणा उदयसिंह मेवाड़ के शासक (उदयपुर के संस्थापक) थे। डूंगरपुर के महारावल उदयसिंह द्वितीय (19वीं सदी) ने उदय विलास महल बनवाया।
Trap 3: दो "पृथ्वीराज"
डूंगरपुर का रावल पृथ्वीराज (विभाजन के बाद शासक) बनाम मेवाड़ का कुंवर पृथ्वीराज ("उड़ना राजकुमार"), जिसका संघर्ष सूरजमल (प्रतापगढ़) से हुआ था।
Trap 4: प्रतापगढ़ — गुहिल रावल शाखा नहीं
प्रतापगढ़ के शासक सामंत सिंह (12वीं सदी) के वंशज नहीं, बल्कि सिसोदिया क्षेमकर्ण के वंशज थे; उपाधि "महारावत" — डूंगरपुर/बांसवाड़ा की "महारावल" से भिन्न।
Trap 5: राजस्थान संघ बनाम संयुक्त राजस्थान
तीनों रियासतें 25 मार्च 1948 (राजस्थान संघ) में मिलीं, न कि 18 अप्रैल 1948 (संयुक्त राजस्थान) में। ध्यान दें — 18 अप्रैल वाला चरण उदयपुर के जुड़ने से बना।
Trap 6: "सौ द्वीपों का शहर" — बांसवाड़ा, उदयपुर नहीं
उदयपुर "झीलों की नगरी" है; "सौ द्वीपों का शहर" बांसवाड़ा।
Trap 7: प्रजामंडल वर्ष
बांसवाड़ा 1943 → डूंगरपुर 1944 → प्रतापगढ़ 1945। डूंगरपुर में सेवा संघ (1938) और प्रजामंडल (1944) को एक न मानें।
Trap 8: मानगढ़ — बांसवाड़ा जिले में
गोविंद गुरु का जन्म डूंगरपुर (बांसिया) में, पर मानगढ़ पहाड़ी बांसवाड़ा में (राजस्थान-गुजरात सीमा)।
Trap 9: डूंगरपुर स्थापना-वर्ष
1282 और 1358 दोनों छपते हैं। यदि दोनों विकल्प में हों तो प्रश्न में उल्लिखित संदर्भ/पुस्तक-परंपरा देखें; संस्थापक "रावल वीरसिंह देव" अधिक स्थिर उत्तर है।
17. इसे आसानी से याद कैसे रखें?
"सामंत गया वागड़, उदय गिरा खानवा, दो बेटे — पृथ्वी (डूंगर) और जगमाल (बाँस)"
"भील से नाम" — डूंगरिया → डूंगरपुर; बांसिया → बांसवाड़ा।
"क्षेम-सूरज-प्रताप-सालिम" — प्रतापगढ़ के चार नाम क्रम में: शाखा-मूल, देवलिया, नगर, सिक्का।
"रावल-रावल-रावत" — डूंगरपुर, बांसवाड़ा = महारावल; प्रतापगढ़ = महारावत।
"बा-डू-प्र 43-44-45; रास्तापाल 47; संघ 48"
18. कथन अभ्यास
कथन: बांसवाड़ा राज्य की स्थापना खानवा युद्ध से पहले हुई थी। — असत्य (खानवा 1527 के बाद विभाजन से)।
कथन: प्रतापगढ़ के शासक राणा कुंभा के भाई क्षेमकर्ण के वंशज थे। — सत्य।
कथन: रास्तापाल कांड बांसवाड़ा रियासत में हुआ। — असत्य (डूंगरपुर)।
कथन: सालिमशाही सिक्का प्रतापगढ़ से संबंधित है। — सत्य।
कथन: वागड़ की तीनों रियासतें संयुक्त राजस्थान (18 अप्रैल 1948) में मिलीं। — असत्य (राजस्थान संघ, 25 मार्च 1948)।
19. संबंधित नोट्स
20. एक दिन पहले — 12 रेखाएँ
वागड़ = डूंगरपुर + बांसवाड़ा (वाग्वर); कांठल = प्रतापगढ़।
परमार (अर्थूणा) → 12वीं सदी में सामंत सिंह (गुहिल) वागड़ में।
वीरसिंह देव — डूंगरपुर, डूंगरिया भील (1282/1358)।
गोपीनाथ — गैप सागर; उदयसिंह द्वितीय — उदय विलास; जूना महल — भित्ति-चित्र।
रावल उदयसिंह — खानवा 1527 में वीरगति।
पृथ्वीराज — डूंगरपुर; जगमाल — बांसवाड़ा; सीमा माही।
बांसवाड़ा — सौ द्वीपों का शहर; आनंद सागर (लांछी बाई); मानगढ़।
प्रतापगढ़ — क्षेमकर्ण → सूरजमल (देवलिया) → प्रतापसिंह (1699)।
सालिमशाही सिक्का; थेवा कला; महारावत उपाधि।
1818 संधियाँ — प्रतापगढ़ (अक्टूबर), डूंगरपुर (दिसंबर), बांसवाड़ा।
प्रजामंडल — बांसवाड़ा 1943 (त्रिवेदी), डूंगरपुर 1944 (पंड्या), प्रतापगढ़ 1945 (पायक); रास्तापाल 19 जून 1947।
राजस्थान संघ — 25 मार्च 1948; चंद्रवीर सिंह "डेथ वारंट"।
21. अभ्यास
नोट पढ़ने के बाद इस पेज के अंत में दिए 25 प्रश्नों का क्विज़ हल करें। जिन प्रश्नों में गलती हो, उनके लिए खंड 9 (तुलना तालिका), खंड 12 (प्रजामंडल) और खंड 16 (भ्रम व सावधानियाँ) दोबारा पढ़ें। वर्ष-आधारित प्रश्नों के लिए खंड 14 की समयरेखा को दो बार लिखकर दोहराएँ।
22. निष्कर्ष: परीक्षा के लिए क्या याद रखें?
वागड़ और कांठल की रियासतें मेवाड़ के राजवंश की दो अलग शाखाओं की कहानी हैं — एक ओर सामंत सिंह से निकली गुहिल "रावल" शाखा, जो खानवा के बाद डूंगरपुर और बांसवाड़ा में बँटी; दूसरी ओर क्षेमकर्ण से निकली सिसोदिया "रावत" शाखा, जिसने देवलिया-प्रतापगढ़ को केंद्र बनाया। भील-बहुल इस क्षेत्र का आधुनिक इतिहास गोविंद गुरु के भगत आंदोलन, भोगीलाल पंड्या के शिक्षा-आंदोलन और कालीबाई के बलिदान से चमकता है। परीक्षा के लिए तीन स्तंभ याद रखें — स्थापना (सामंत सिंह, वीरसिंह, जगमाल, प्रतापसिंह), धरोहर (गैप सागर, सौ द्वीप, थेवा, सालिमशाही) और आधुनिक काल (1818, प्रजामंडल 43-44-45, राजस्थान संघ 1948)।
12वीं सदी सामंत सिंह · 1282/1358 डूंगरपुर · 1527 खानवा · लगभग 1530 बांसवाड़ा · 1699 प्रतापगढ़ · 1818 संधियाँ · 1913 मानगढ़ · 1944 डूंगरपुर प्रजामंडल · 1947 रास्तापाल · 1948 राजस्थान संघ
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महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)
परीक्षा की दृष्टि से वागड़ क्षेत्र मुख्यतः डूंगरपुर और बांसवाड़ा जिलों से बनता है। इसका प्राचीन नाम वाग्वर था और यहाँ की बोली वागड़ी है। इससे सटा प्रतापगढ़ का भू-भाग कांठल कहलाता है।
मेवाड़ के गुहिल शासक सामंत सिंह ने 12वीं सदी के उत्तरार्ध में कीतू (कीर्तिपाल) चौहान से पराजित होकर मेवाड़ खोने के बाद वागड़ जाकर गुहिल शाखा की नींव रखी। वर्ष पुस्तकों में लगभग 1171–1178 के बीच अलग-अलग मिलता है।
परंपरा के अनुसार रावल वीरसिंह देव ने भील मुखिया डूंगरिया को पराजित कर डूंगरपुर बसाया और नगर का नाम उसी के नाम पर पड़ा। स्थापना-वर्ष पर मतभेद है — कुछ पुस्तकों में 1282 और कई प्रतियोगी पुस्तकों में 1358 मिलता है।
रावल उदयसिंह 1527 के खानवा युद्ध में राणा सांगा की ओर से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। इसके बाद उनके पुत्रों में राज्य बँटा — पृथ्वीराज को डूंगरपुर और जगमाल सिंह को बांसवाड़ा मिला; माही नदी को सामान्यतः सीमा माना गया।
माही नदी और उसके जलक्षेत्र में अनेक छोटे-बड़े टापू होने के कारण बांसवाड़ा को 'सौ द्वीपों का शहर' कहा जाता है। इसके संस्थापक महारावल जगमाल सिंह माने जाते हैं।
प्रतापगढ़ के शासक सिसोदिया थे और राणा मोकल के पुत्र तथा राणा कुंभा के भाई क्षेमकर्ण के वंशज थे। क्षेमकर्ण के पुत्र सूरजमल ने देवलिया को केंद्र बनाया और बाद में महारावत प्रतापसिंह ने प्रतापगढ़ नगर (सामान्यतः 1699) बसाया।
सालिमशाही चाँदी का रुपया प्रतापगढ़ रियासत का था, जो 18वीं सदी के उत्तरार्ध में महारावत सालिम सिंह के समय मुगल बादशाह की अनुमति से ढाला गया और मालवा-वागड़ क्षेत्र में प्रचलित रहा।
भोगीलाल पंड्या को 'वागड़ का गांधी' कहा जाता है। उन्होंने भील क्षेत्रों में शिक्षा के लिए सेवा संघ (सामान्यतः 1938) चलाया और 1944 में डूंगरपुर प्रजामंडल की स्थापना की।
19 जून 1947 को डूंगरपुर रियासत के रास्तापाल गाँव में सेवा संघ की पाठशाला बंद कराने आई पुलिस ने संचालक नानाभाई खांट को पीटा जिससे उनकी मृत्यु हुई। शिक्षक सेंगाभाई को ट्रक से बाँधकर घसीटते समय भील बालिका कालीबाई ने रस्सी काटी; गोली लगने से 20 जून 1947 को उसकी मृत्यु हो गई।
तीनों रियासतें एकीकरण के दूसरे चरण में 25 मार्च 1948 को बने राजस्थान संघ (पूर्व राजस्थान) में शामिल हुईं, जिसकी राजधानी कोटा थी। बांसवाड़ा के महारावल चंद्रवीर सिंह ने हस्ताक्षर करते समय इसे अपना 'डेथ वारंट' कहा था।
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