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राजस्थान इतिहास

राजस्थान के प्रमुख प्रजामंडल: संस्थापक, नेता एवं वर्ष

Sudhir Sir (इतिहास विशेषज्ञ)
16 सितंबर 2026
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राजस्थान के प्रमुख प्रजामंडल: संस्थापक, नेता एवं वर्ष

सुयोग AI गुरु

नोट्स के मुख्य बिंदु, मॉक MCQ या डाउट पूछें

राजस्थान के प्रमुख प्रजामंडल रियासतकालीन राजस्थान में राजनीतिक जागृति, नागरिक अधिकारों और उत्तरदायी शासन की मांग से जुड़े जनसंगठनों का महत्वपूर्ण अध्याय हैं। जयपुर प्रजामंडल से शुरू हुई यह राजनीतिक चेतना आगे चलकर मेवाड़, मारवाड़, बीकानेर, भरतपुर, अलवर, कोटा, सिरोही, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, जैसलमेर, प्रतापगढ़ और झालावाड़ सहित अनेक रियासतों तक पहुंची।

प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रजामंडल का स्थापना वर्ष, संस्थापक, प्रमुख नेता, प्रथम अध्यक्ष, संबंधित रियासत और विशेष घटना से सीधे प्रश्न पूछे जाते हैं। राजस्थान CET, RPSC RAS, RSSB, REET, पटवारी, ग्राम विकास अधिकारी, पुलिस और अन्य राजस्थान की परीक्षाओं के लिए यह टॉपिक विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।

राजस्थान के प्रजामंडल आंदोलन का संक्षिप्त उत्तर

एक नजर में: राजस्थान में प्रजामंडल आंदोलन का उद्देश्य रियासतों में जनता के राजनीतिक और नागरिक अधिकारों की मांग करना तथा उत्तरदायी शासन की स्थापना के लिए जनमत तैयार करना था। सामान्य परीक्षा-क्रम में जयपुर और बूंदी के प्रजामंडल 1931, मारवाड़ और हाड़ौती 1934, बीकानेर और धौलपुर 1936, मेवाड़ सहित कई रियासतों में 1938, कोटा-सिरोही-किशनगढ़ आदि में 1939 और बाद के वर्षों में दक्षिणी एवं पश्चिमी राजस्थान की रियासतों में प्रजामंडल गठित हुए।

प्रजामंडल केवल एक संगठन का नाम नहीं था। अलग-अलग रियासतों में इनके नाम, संगठनात्मक स्वरूप और सक्रियता अलग रही। कहीं इसे प्रजामंडल, कहीं प्रजा परिषद और कहीं लोक परिषद जैसे नामों से भी जाना गया। इसलिए परीक्षा में केवल वर्ष याद करना पर्याप्त नहीं है। संबंधित रियासत और प्रमुख नेता को भी साथ में याद करना चाहिए।

प्रजामंडल क्या था?

ब्रिटिश काल में राजस्थान का बड़ा हिस्सा सीधे ब्रिटिश शासन के अधीन नहीं था। यहां अनेक देशी रियासतें थीं, जिनमें महाराजा, महाराणा, महाराव या अन्य शासक शासन करते थे। इन रियासतों की राजनीतिक व्यवस्था ब्रिटिश साम्राज्य से जुड़ी हुई थी, लेकिन जनता को आधुनिक प्रतिनिधि शासन और व्यापक राजनीतिक अधिकार सीमित रूप में प्राप्त थे।

बीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक में राष्ट्रीय आंदोलन का प्रभाव राजस्थान की रियासतों में भी बढ़ने लगा। शिक्षा, समाचार पत्रों, सामाजिक सुधार आंदोलनों, किसान आंदोलनों और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़े राजनीतिक वातावरण ने रियासतों की जनता में राजनीतिक चेतना को मजबूत किया। इसी वातावरण में अलग-अलग रियासतों में ऐसे संगठन बने जिन्होंने जनता की समस्याओं को राजनीतिक रूप से उठाना शुरू किया। इन्हें सामान्यतः प्रजामंडल कहा गया।

इन संगठनों की प्रमुख मांगों में नागरिक स्वतंत्रता, प्रेस और सभा की स्वतंत्रता, बेगार तथा अन्य दमनकारी प्रथाओं का विरोध, प्रशासन में जनता की भागीदारी और उत्तरदायी शासन की स्थापना शामिल थी। कई क्षेत्रों में किसान आंदोलनों और प्रजामंडल आंदोलनों के बीच भी संपर्क दिखाई देता है।

राजस्थान के किसान आंदोलनों की पृष्ठभूमि समझने के लिए राजस्थान के प्रमुख किसान आंदोलन भी पढ़ें। इससे बिजोलिया, बेगूं, शेखावाटी और अन्य आंदोलनों का राजनीतिक जागरण से संबंध समझने में मदद मिलेगी।

राजस्थान के प्रमुख प्रजामंडल: स्थापना वर्ष और प्रमुख नेता

नीचे दी गई सूची परीक्षा की तैयारी के लिए सबसे उपयोगी कालक्रम में है। कुछ संगठनों के मामले में प्रारंभिक गठन, पुनर्गठन और बाद में सक्रिय राजनीतिक संगठन बनने के वर्ष अलग-अलग मिलते हैं। इसलिए तालिका में जहां आवश्यक है, वहां विशेष टिप्पणी दी गई है।

क्रमप्रजामंडल / संगठनप्रमुख वर्षप्रमुख संस्थापक / नेतापरीक्षा उपयोगी तथ्य
1जयपुर प्रजामंडल1931कर्पूरचंद पाटनी; बाद में जमनालाल बजाज और हीरालाल शास्त्रीराजस्थान का प्रथम प्रजामंडल
2बूंदी प्रजामंडल1931कांतिलाल, नित्यानंदबाद में बूंदी राज्य लोक परिषद की सक्रियता
3मारवाड़ प्रजामंडल1934जयनारायण व्यास, भंवरलाल सर्राफजयनारायण व्यास प्रमुख राजनीतिक नेता
4हाड़ौती प्रजामंडल1934पं. नयनूराम शर्माआगे चलकर कोटा के राजनीतिक आंदोलन से जुड़ा
5बीकानेर प्रजामंडल1936मघाराम वैद्य, रघुवर दयाल गोयलबाद में बीकानेर राज्य प्रजा परिषद
6धौलपुर प्रजामंडल1936कृष्णदत्त पालीवाल, ज्वाला प्रसाद जिज्ञासुतसीमो कांड से संबंधित
7मेवाड़ प्रजामंडल1938माणिक्यलाल वर्मा, बलवंत सिंह मेहता, भूरालाल बया24 अप्रैल 1938 को गठन
8शाहपुरा प्रजामंडल1938लादूराम व्यास, रमेशचंद्र ओझा आदिउत्तरदायी शासन की दिशा में प्रारंभिक सफलता
9अलवर प्रजामंडल1938पं. हरिनारायण शर्मा आदि1942 के आंदोलन के संदर्भ में महत्वपूर्ण
10भरतपुर प्रजामंडल1938किशनलाल जोशी, गोपीलाल यादव, मास्टर आदित्येंद्र, जुगलकिशोर चतुर्वेदीरेवाड़ी से जुड़ी स्थापना का उल्लेख मिलता है
11करौली प्रजामंडल1939त्रिलोकचंद माथुर, ओंकार सिंह सहित राजनीतिक कार्यकर्ताराजस्थान जिला गजेटियर अप्रैल 1939 का गठन बताता है
12कोटा प्रजामंडल1939नयनूराम शर्मा, अभिन्न हरि, तनसुखलाल मित्तलप्रथम अधिवेशन मांगरोल
13सिरोही प्रजामंडल1939गोकुलभाई भट्टगोकुलभाई भट्ट प्रमुख नेता
14किशनगढ़ प्रजामंडल1939कांतिलाल चौथानी, जमाल शाह1939 का गठन
15कुशलगढ़ प्रजामंडल1942भंवरलाल निगम आदिबांसवाड़ा क्षेत्र के ठिकाने से संबंधित
16बांसवाड़ा प्रजामंडल1943भूपेंद्रनाथ त्रिवेदी आदिआदिवासी क्षेत्र में राजनीतिक जागरण
17डूंगरपुर प्रजामंडल1944भोगीलाल पंड्या, हरिदेव जोशी आदिवागड़ क्षेत्र का महत्वपूर्ण आंदोलन
18जैसलमेर प्रजामंडल1945मीठालाल व्यासजोधपुर से संगठनात्मक गतिविधियों का संबंध
19प्रतापगढ़ प्रजामंडल1945-46अमृतलाल पायक आदिजनजागरण और हरिजन सेवा से जुड़ा राजनीतिक कार्य
20झालावाड़ प्रजामंडल1946मांगीलाल भव्यअंतिम दौर के प्रजामंडलों में महत्वपूर्ण

महत्वपूर्ण: प्रतियोगी परीक्षाओं की पुस्तकों में कुछ संगठनों के वर्ष या संस्थापकों के नाम में छोटे अंतर मिल सकते हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि किसी स्रोत ने प्रारंभिक संगठन की स्थापना को आधार बनाया है, जबकि दूसरे ने पुनर्गठन, पंजीकरण या सक्रिय राजनीतिक संगठन के गठन को। उदाहरण के लिए करौली के लिए राजस्थान सरकार के जिला गजेटियर में अप्रैल 1939 में प्रजामंडल बनने का उल्लेख है। इसलिए करौली को 1939 के साथ पढ़ना अधिक सुरक्षित है।

1. जयपुर प्रजामंडल

जयपुर प्रजामंडल राजस्थान के इतिहास में पहला प्रमुख प्रजामंडल माना जाता है। इसकी स्थापना 1931 में कर्पूरचंद पाटनी से जोड़ी जाती है। शुरुआती संगठन अपेक्षाकृत सीमित सक्रियता वाला था। बाद में जमनालाल बजाज और हीरालाल शास्त्री जैसे नेताओं के प्रयासों से जयपुर राज्य में राजनीतिक गतिविधियों को नई दिशा मिली।

जयपुर की राजनीतिक जागृति की पृष्ठभूमि केवल प्रजामंडल तक सीमित नहीं थी। अर्जुनलाल सेठी जैसे राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओं ने भी जयपुर में राष्ट्रीय चेतना के विकास में योगदान दिया। जमनालाल बजाज का जयपुर से संबंध और उनका राजनीतिक प्रभाव आगे चलकर प्रजामंडल आंदोलन के लिए महत्वपूर्ण रहा।

1936-37 के आसपास जयपुर प्रजामंडल के पुनर्गठन का उल्लेख मिलता है। इस चरण में हीरालाल शास्त्री और चिरंजीलाल मिश्र सहित कई कार्यकर्ता संगठन से जुड़े। 1938 में जयपुर प्रजामंडल का राजनीतिक प्रभाव अधिक स्पष्ट दिखाई देता है।

1939 में जमनालाल बजाज की गिरफ्तारी से जुड़ा आंदोलन जयपुर प्रजामंडल के संघर्ष का महत्वपूर्ण चरण था। बाद में राज्य सरकार और प्रजामंडल के बीच समझौते से नागरिक अधिकारों से संबंधित कुछ मांगों को स्वीकार किया गया।

1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के समय जयपुर की राजनीति में एक अलग स्थिति बनी। हीरालाल शास्त्री और जयपुर राज्य के प्रधानमंत्री मिर्जा इस्माइल के बीच समझौते के कारण प्रजामंडल के मुख्य संगठन ने आंदोलन से दूरी रखी, जबकि प्रजामंडल के एक वर्ग ने आजाद मोर्चा बनाकर आंदोलन चलाया। यह तथ्य परीक्षा में अक्सर पूछा जाता है।

जयपुर प्रजामंडल का अध्ययन करते समय तीन नाम विशेष रूप से याद रखें: कर्पूरचंद पाटनी, जमनालाल बजाज और हीरालाल शास्त्री

2. बूंदी प्रजामंडल

बूंदी में प्रजामंडल की स्थापना 1931 से जोड़ी जाती है और कांतिलाल प्रमुख नाम हैं। नित्यानंद भी संगठन के सक्रिय कार्यकर्ताओं में रहे। बूंदी क्षेत्र में राजनीतिक चेतना को किसान आंदोलनों और सामाजिक सुधार आंदोलनों से भी बल मिला।

बाद के चरण में ऋषिदत्त मेहता का नाम विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है। 1944 में बूंदी राज्य लोक परिषद की गतिविधियां सामने आईं। इसलिए परीक्षा में 1931 = बूंदी प्रजामंडल और 1944 = बूंदी राज्य लोक परिषद के बीच अंतर रखना उपयोगी है।

बूंदी और हाड़ौती क्षेत्र का इतिहास पढ़ते समय इसे अलग-अलग घटनाओं के रूप में याद करने के बजाय एक क्रम में पढ़ना बेहतर है: प्रारंभिक जनजागरण, प्रजामंडल, किसान प्रश्न और बाद की उत्तरदायी शासन की मांग।

3. मारवाड़ प्रजामंडल

मारवाड़ अर्थात जोधपुर रियासत में राजनीतिक जागृति का विकास 1930 के दशक में तेजी से हुआ। 1934 में मारवाड़ प्रजामंडल से जयनारायण व्यास और भंवरलाल सर्राफ के नाम जुड़े मिलते हैं। भंवरलाल सर्राफ को संगठन के प्रारंभिक अध्यक्ष के रूप में और जयनारायण व्यास को प्रमुख राजनीतिक नेता के रूप में याद किया जाता है।

जयनारायण व्यास आगे चलकर राजस्थान के प्रमुख राजनीतिक नेताओं में शामिल हुए और उन्हें शेर-ए-राजस्थान के नाम से भी जाना गया। मारवाड़ में राजनीतिक संघर्ष केवल प्रजामंडल तक सीमित नहीं रहा। मारवाड़ सेवा संघ, मारवाड़ हितकारिणी सभा, मारवाड़ यूथ लीग और बाद में मारवाड़ लोक परिषद जैसे संगठनों ने भी राजनीतिक वातावरण तैयार किया।

1938 में मारवाड़ लोक परिषद का गठन भी महत्वपूर्ण घटना थी। इसलिए परीक्षा में यदि प्रश्न पूछा जाए कि 1934 में कौन-सा संगठन और 1938 में कौन-सा संगठन सक्रिय हुआ, तो दोनों को अलग रखना चाहिए।

मारवाड़ के प्रजामंडल आंदोलन को राजस्थान के अन्य आंदोलनों की तरह उत्तरदायी शासन, नागरिक अधिकार और प्रशासन में जनता की भागीदारी की मांग से जोड़कर समझना चाहिए।

4. हाड़ौती प्रजामंडल और कोटा प्रजामंडल

हाड़ौती क्षेत्र में पं. नयनूराम शर्मा प्रमुख राजनीतिक कार्यकर्ता थे। हाड़ौती प्रजामंडल की स्थापना 1934 से जोड़ी जाती है। इस संगठन की गतिविधियां बेगार और जनता की समस्याओं से जुड़े आंदोलनों से संबंधित थीं।

बाद में कोटा राज्य में नयनूराम शर्मा, अभिन्न हरि और तनसुखलाल मित्तल जैसे नेताओं के नेतृत्व में कोटा प्रजामंडल की गतिविधियां सामने आईं। इसके प्रथम अधिवेशन का संबंध मांगरोल से बताया जाता है। 1940 में कोटा में दूसरा महत्वपूर्ण अधिवेशन हुआ।

इसलिए परीक्षा के लिए याद रखने का सरल तरीका है:

  • 1934 → हाड़ौती प्रजामंडल → नयनूराम शर्मा
  • 1939 → कोटा प्रजामंडल → नयनूराम शर्मा, अभिन्न हरि आदि
  • प्रथम अधिवेशन → मांगरोल

हाड़ौती के इतिहास को विस्तार से पढ़ने के लिए Suyog Academy राजस्थान इतिहास नोट्स श्रेणी उपयोगी है।

5. बीकानेर प्रजामंडल और राज्य प्रजा परिषद

बीकानेर में राजनीतिक संगठन की कहानी थोड़ी अलग है। बीकानेर प्रजामंडल का गठन 1936 में हुआ। मघाराम वैद्य का नाम इसके साथ प्रमुख रूप से जुड़ा है। रघुवर दयाल गोयल बाद के चरण में बीकानेर की राजनीतिक गतिविधियों में अत्यंत महत्वपूर्ण बने।

उपलब्ध इतिहास स्रोतों के अनुसार बीकानेर प्रजामंडल की स्थापना राजस्थान के बाहर कलकत्ता में होने का उल्लेख मिलता है। 1942 में रघुवर दयाल गोयल ने बीकानेर राज्य प्रजा परिषद की स्थापना की। इसका उद्देश्य महाराजा की सत्ता के अंतर्गत उत्तरदायी शासन की स्थापना करना था।

बीकानेर में 1942 का झंडा सत्याग्रह, राजनीतिक बंदियों की गिरफ्तारी और बाद के शासन सुधार आंदोलन इस राजनीतिक संघर्ष के महत्वपूर्ण चरण रहे। बीकानेर के आंदोलन में प्रजा परिषद शब्द का प्रयोग इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि हर जगह संगठन का नाम केवल प्रजामंडल नहीं रहा।

6. धौलपुर प्रजामंडल

धौलपुर प्रजामंडल का गठन 1936 में कृष्णदत्त पालीवाल और ज्वाला प्रसाद जिज्ञासु जैसे नेताओं से जोड़ा जाता है। कृष्णदत्त पालीवाल इसके प्रारंभिक प्रमुख अध्यक्षों में रहे।

धौलपुर में राजनीतिक जागृति के विकास में आर्य समाज और सामाजिक सुधार गतिविधियों का भी प्रभाव था। ज्वाला प्रसाद जिज्ञासु ने हिंदी और सामाजिक चेतना के क्षेत्र में भी काम किया।

धौलपुर प्रजामंडल का संघर्ष आगे चलकर तसीमो कांड के संदर्भ में महत्वपूर्ण हो जाता है। 1947 में तसीमो में प्रजामंडल से जुड़ी सभा पर पुलिस कार्रवाई हुई और पंचम सिंह तथा छत्तर सिंह की मृत्यु हुई। यह घटना धौलपुर के राजनीतिक आंदोलन में एक महत्वपूर्ण और दुखद पड़ाव थी।

7. मेवाड़ प्रजामंडल

मेवाड़ प्रजामंडल की स्थापना 24 अप्रैल 1938 को हुई। माणिक्यलाल वर्मा इसका सबसे प्रमुख नाम हैं। संगठन में बलवंत सिंह मेहता और भूरालाल बया भी महत्वपूर्ण पदों पर रहे।

माणिक्यलाल वर्मा पहले से ही बिजोलिया किसान आंदोलन और जनजागरण की गतिविधियों से जुड़े हुए थे। उन्होंने मेवाड़ की राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था की आलोचना करते हुए जनता में राजनीतिक चेतना फैलाने का प्रयास किया।

मेवाड़ प्रजामंडल की स्थापना उदयपुर में हुई और आगे चलकर संगठन ने रियासत में नागरिक अधिकारों और उत्तरदायी शासन की मांग को मजबूत किया। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान प्रजामंडल ने राज्य सरकार पर दबाव बनाया कि वह अंग्रेजी सत्ता से संबंध समाप्त करे। इसके बाद दमन और गिरफ्तारियों का दौर चला।

मेवाड़ के राजनीतिक आंदोलन में सराड़ा किला भी महत्वपूर्ण संदर्भ है, जिसे राजनीतिक बंदियों के कारण मेवाड़ का काला पानी कहा जाता है। 1945 में उदयपुर में अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद का अधिवेशन भी हुआ, जिसकी अध्यक्षता जवाहरलाल नेहरू ने की थी।

मेवाड़ प्रजामंडल के लिए परीक्षा में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य हैं: 24 अप्रैल 1938, माणिक्यलाल वर्मा, बलवंत सिंह मेहता और मेवाड़ का राजनीतिक जनजागरण।

मेवाड़ प्रजामंडल को राजस्थान के किसान आंदोलनों से जोड़कर पढ़ने के लिए राजस्थान के किसान आंदोलन वाला नोट भी देखें।

8. शाहपुरा प्रजामंडल

शाहपुरा प्रजामंडल का गठन 1938 में हुआ। माणिक्यलाल वर्मा का शाहपुरा की राजनीतिक गतिविधियों पर प्रभाव रहा। लादूराम व्यास और रमेशचंद्र ओझा सहित कई स्थानीय कार्यकर्ता इससे जुड़े।

शाहपुरा को राजस्थान के प्रजामंडल आंदोलन में विशेष स्थान इसलिए दिया जाता है क्योंकि यहां उत्तरदायी शासन की दिशा में अपेक्षाकृत जल्दी राजनीतिक परिवर्तन हुआ। गोकुललाल असावा का नाम भी बाद के लोकप्रिय शासन से जुड़े संदर्भों में महत्वपूर्ण है।

1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान शाहपुरा प्रजामंडल ने अंग्रेजों के साथ संबंध समाप्त करने की मांग की। इसके कारण कई कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया।

Exam Trap: शाहपुरा को केवल 1938 के प्रजामंडल के रूप में याद न करें। इसे उत्तरदायी शासन की प्रारंभिक सफलता से भी जोड़कर याद करें।

9. अलवर प्रजामंडल

अलवर प्रजामंडल की स्थापना 1938 में हुई। पं. हरिनारायण शर्मा इसके प्रमुख नेताओं में रहे। कुंजबिहारी मोदी और अन्य राजनीतिक कार्यकर्ता भी इससे जुड़े। 1939 में संगठन के पंजीकरण और उसके बाद की गतिविधियों का उल्लेख मिलता है।

अलवर प्रजामंडल का राजनीतिक इतिहास विशेष रूप से 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के संदर्भ में पढ़ा जाता है। जयपुर की तरह अलवर में भी प्रजामंडल की राजनीतिक रणनीति अन्य रियासतों से पूरी तरह समान नहीं थी। इसलिए परीक्षा में किसी कथन को पढ़ते समय यह देखना जरूरी है कि प्रश्न संगठन की स्थापना पूछ रहा है या 1942 के आंदोलन में उसकी भूमिका।

अलवर प्रजामंडल का प्रथम अधिवेशन 1944 में हुआ और भवानीशंकर शर्मा का नाम अध्यक्ष के रूप में मिलता है।

10. भरतपुर प्रजामंडल

भरतपुर प्रजामंडल का गठन 1938 में हुआ। इसके साथ किशनलाल जोशी, गोपीलाल यादव, मास्टर आदित्येंद्र और जुगलकिशोर चतुर्वेदी जैसे नाम जुड़े हैं। इसकी स्थापना रेवाड़ी में होने का उल्लेख विभिन्न इतिहास स्रोतों में मिलता है।

भरतपुर का आंदोलन पूर्वी राजस्थान की राजनीतिक गतिविधियों से जुड़ा हुआ था। 1939 में प्रजामंडल की मान्यता को लेकर सत्याग्रह हुआ और कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी हुई। बाद में समझौते के बाद संगठन का नाम प्रजा परिषद के रूप में भी सामने आया।

जुगलकिशोर चतुर्वेदी को राजस्थान का नेहरू कहा जाता है। भरतपुर के प्रजामंडल आंदोलन में राजनीतिक सम्मेलन, सत्याग्रह और प्रेस की भूमिका महत्वपूर्ण रही।

11. करौली प्रजामंडल

करौली के मामले में स्थापना वर्ष को लेकर अध्ययन सामग्री में अंतर मिलता है। कुछ परीक्षा नोट्स 1938 लिखते हैं, जबकि राजस्थान सरकार के करौली जिला गजेटियर में अप्रैल 1939 में प्रजामंडल बनने का उल्लेख है। इसलिए तथ्यात्मक रूप से अधिक सावधानी बरतते हुए करौली प्रजामंडल को 1939 के साथ पढ़ना उचित है।

त्रिलोकचंद माथुर करौली के राजनीतिक जागरण से जुड़े प्रमुख नाम थे। गजेटियर में ओंकार सिंह का भी महत्वपूर्ण उल्लेख मिलता है। करौली में पहले राज्य सेवक संघ और कांग्रेस से संबंधित गतिविधियां विकसित हुईं और उसके बाद प्रजामंडल राजनीतिक मंच के रूप में सामने आया।

1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान करौली में भी राजनीतिक गतिविधियां तेज हुईं। 1946 में उत्तरदायी शासन की मांग अधिक स्पष्ट रूप से सामने आई।

परीक्षा के लिए सुरक्षित तथ्य: करौली प्रजामंडल → 1939 → त्रिलोकचंद माथुर/ओंकार सिंह से संबंधित राजनीतिक गतिविधियां।

12. सिरोही प्रजामंडल

सिरोही प्रजामंडल का गठन 1939 के आसपास सक्रिय राजनीतिक संगठन के रूप में हुआ। गोकुलभाई भट्ट इसका सबसे प्रमुख नाम हैं। उन्हें राजस्थान के राजनीतिक इतिहास में राजस्थान का गांधी भी कहा जाता है।

सिरोही के आंदोलन का उद्देश्य नागरिक अधिकारों और उत्तरदायी शासन की दिशा में राजनीतिक दबाव बनाना था। गोकुलभाई भट्ट का योगदान स्वतंत्रता आंदोलन और बाद में राजस्थान के एकीकरण से जुड़े राजनीतिक इतिहास में भी महत्वपूर्ण है।

सिरोही को याद रखने की सरल जोड़ी है: 1939 → सिरोही → गोकुलभाई भट्ट

13. किशनगढ़ प्रजामंडल

किशनगढ़ प्रजामंडल 1939 में गठित प्रमुख संगठनों में शामिल था। कांतिलाल चौथानी और जमाल शाह के नाम इसके साथ जुड़े मिलते हैं। किशनगढ़ की राजनीतिक गतिविधियां अजमेर और आसपास के राष्ट्रीय आंदोलन के वातावरण से भी प्रभावित थीं।

परीक्षा में किशनगढ़ प्रजामंडल का प्रश्न सामान्यतः स्थापना वर्ष और संस्थापक के मिलान से पूछा जा सकता है। इसलिए इसे 1939 वाले समूह के साथ याद करना उपयोगी है।

14. कुशलगढ़ प्रजामंडल

कुशलगढ़ बांसवाड़ा क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण ठिकाना था। यहां प्रजामंडल गतिविधियां 1940 के दशक में तेज हुईं। परीक्षा पुस्तकों में कुशलगढ़ प्रजामंडल को सामान्यतः 1942 से जोड़ा जाता है। भंवरलाल निगम का नाम प्रमुख रूप से मिलता है।

कुशलगढ़ का आंदोलन दक्षिणी राजस्थान में राजनीतिक जागरण के विस्तार को दिखाता है। यहां की गतिविधियों को बांसवाड़ा, डूंगरपुर और आदिवासी क्षेत्र में चल रहे सामाजिक-राजनीतिक आंदोलनों के व्यापक संदर्भ में पढ़ना चाहिए।

15. बांसवाड़ा प्रजामंडल

बांसवाड़ा प्रजामंडल का गठन 1943 के आसपास हुआ। भूपेंद्रनाथ त्रिवेदी प्रमुख नेताओं में रहे। दक्षिणी राजस्थान में राजनीतिक चेतना के प्रसार में इस संगठन का महत्व था।

बांसवाड़ा क्षेत्र में प्रजामंडल आंदोलन को आदिवासी समाज, सामाजिक सुधार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के प्रश्नों के साथ पढ़ना चाहिए। इस क्षेत्र की राजनीति में स्थानीय जनसमुदायों की भागीदारी बढ़ती गई और रियासती शासन की नीतियों पर सवाल उठे।

16. डूंगरपुर प्रजामंडल

डूंगरपुर प्रजामंडल का गठन 1944 में हुआ। भोगीलाल पंड्या इसका सबसे प्रसिद्ध नाम हैं और उन्हें वागड़ का गांधी कहा जाता है। हरिदेव जोशी और अन्य कार्यकर्ता भी इस क्षेत्र के राजनीतिक आंदोलन से जुड़े।

डूंगरपुर का प्रजामंडल आंदोलन दक्षिणी राजस्थान के सामाजिक और आदिवासी आंदोलनों से गहराई से जुड़ा हुआ था। शिक्षा, सामाजिक सुधार और राजनीतिक जागरूकता इसके महत्वपूर्ण पहलू थे।

रास्तापाल की घटना और नानाभाई खांट तथा सेंगाभाई जैसे नाम डूंगरपुर के व्यापक जनआंदोलन को समझने के लिए महत्वपूर्ण हैं। इसलिए डूंगरपुर प्रजामंडल को केवल एक संगठन के रूप में नहीं, बल्कि वागड़ क्षेत्र के जनजागरण के हिस्से के रूप में पढ़ना चाहिए।

17. जैसलमेर प्रजामंडल

जैसलमेर प्रजामंडल का गठन 1945 के आसपास हुआ। मीठालाल व्यास इसका प्रमुख नाम हैं। संगठनात्मक गतिविधियों का संबंध जोधपुर से भी रहा।

जैसलमेर के राजनीतिक संघर्ष का एक महत्वपूर्ण नाम सागरमल गोपा है। उन्होंने जैसलमेर रियासत की दमनकारी व्यवस्था के विरुद्ध आवाज उठाई और उनके बलिदान ने इस क्षेत्र के स्वतंत्रता आंदोलन को विशेष पहचान दी।

इसलिए परीक्षा में यदि जैसलमेर प्रजामंडल पूछा जाए तो मीठालाल व्यास और यदि जैसलमेर के जनसंघर्ष का प्रमुख शहीद पूछा जाए तो सागरमल गोपा को याद रखना चाहिए।

18. प्रतापगढ़ प्रजामंडल

प्रतापगढ़ में राजनीतिक जागरण की जड़ें प्रजामंडल से पहले की सामाजिक और स्वदेशी गतिविधियों तक जाती हैं। अमृतलाल पायक ने सामाजिक सुधार और जनजागरण के क्षेत्र में काम किया। बाद के चरण में उन्होंने प्रजामंडल की स्थापना और राजनीतिक गतिविधियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

प्रतापगढ़ प्रजामंडल को सामान्यतः 1945-46 के दौर से जोड़ा जाता है। कुछ स्रोत 1945 और कुछ 1946 का उल्लेख करते हैं। इसलिए प्रश्न में यदि केवल वर्ष पूछा जाए तो परीक्षा के आधिकारिक स्रोत या निर्धारित पुस्तक के अनुसार उत्तर देना चाहिए।

अमृतलाल पायक को याद रखने के लिए प्रतापगढ़, जनजागरण और हरिजन सेवा से जुड़ी गतिविधियों को साथ पढ़ना उपयोगी है।

19. झालावाड़ प्रजामंडल

झालावाड़ प्रजामंडल को सामान्यतः 1946 के साथ जोड़ा जाता है और मांगीलाल भव्य प्रमुख नाम हैं। यह प्रजामंडल आंदोलन के अंतिम चरण में सामने आया।

झालावाड़ में भी राजनीतिक जागरण का लक्ष्य जनता की भागीदारी और उत्तरदायी शासन की दिशा में परिवर्तन था। 1940 के दशक के मध्य तक भारत की स्वतंत्रता का प्रश्न निर्णायक रूप ले चुका था। इसी कारण रियासतों में भी जनता की राजनीतिक भागीदारी और भविष्य की शासन व्यवस्था को लेकर दबाव बढ़ गया था।

प्रजामंडल स्थापना वर्ष याद करने की आसान ट्रिक

पूरी सूची को अलग-अलग याद करने के बजाय वर्ष के समूहों में याद करना अधिक आसान है:

1931: जयपुर, बूंदी

1934: मारवाड़, हाड़ौती

1936: बीकानेर, धौलपुर

1938: मेवाड़, शाहपुरा, अलवर, भरतपुर तथा अन्य प्रमुख रियासतों में राजनीतिक संगठन

1939: कोटा, सिरोही, किशनगढ़ और करौली का सक्रिय गठन/संगठनात्मक चरण

1942: कुशलगढ़

1943: बांसवाड़ा

1944: डूंगरपुर

1945: जैसलमेर और प्रतापगढ़ से जुड़े संगठनात्मक चरण

1946: झालावाड़

ध्यान रखें कि यह ट्रिक परीक्षा की तैयारी के लिए है। किसी विशेष परीक्षा में यदि आयोग द्वारा निर्धारित पुस्तक में किसी संगठन की प्रारंभिक स्थापना और पुनर्गठन का अलग वर्ष दिया गया हो, तो प्रश्न की भाषा के अनुसार उत्तर देना चाहिए।

प्रजामंडल आंदोलन और राजस्थान के किसान आंदोलन का संबंध

राजस्थान के किसान आंदोलनों और प्रजामंडल आंदोलनों को पूरी तरह अलग-अलग विषय मानना सही नहीं होगा। दोनों ने अलग-अलग स्तर पर जनता को राजनीतिक रूप से जागरूक किया। किसान आंदोलनों में लगान, बेगार, जागीरदारों की नीतियां, चराई और कृषि संबंधी समस्याएं प्रमुख थीं। प्रजामंडल आंदोलनों में नागरिक अधिकार, प्रतिनिधित्व और उत्तरदायी शासन जैसे राजनीतिक प्रश्न प्रमुख बने।

बिजोलिया आंदोलन ने मेवाड़ सहित राजस्थान के कई क्षेत्रों में किसान चेतना को मजबूत किया। बिजोलिया से जुड़े कार्यकर्ताओं और नेताओं का प्रभाव आगे के राजनीतिक आंदोलनों पर भी पड़ा। माणिक्यलाल वर्मा इसका महत्वपूर्ण उदाहरण हैं।

इसी तरह शेखावाटी, बेगूं, मारवाड़ और अन्य क्षेत्रों के आंदोलनों ने रियासती जनता में यह भावना मजबूत की कि प्रशासन केवल शासक और जागीरदारों का विषय नहीं है, बल्कि जनता की भी उसमें भागीदारी होनी चाहिए।

प्रजामंडल आंदोलन की प्रमुख मांगें

  • उत्तरदायी शासन की स्थापना।
  • प्रशासन में जनता की भागीदारी।
  • नागरिक अधिकारों की रक्षा।
  • सभा और संगठन की स्वतंत्रता।
  • प्रेस और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता।
  • बेगार और दमनकारी प्रथाओं का विरोध।
  • राजस्व और प्रशासनिक नीतियों में सुधार।
  • राजनीतिक बंदियों की रिहाई।
  • जनप्रतिनिधि संस्थाओं की स्थापना।
  • रियासती शासन में जनता की आवाज को स्थान देना।

अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद और राजस्थान

रियासतों के राजनीतिक आंदोलनों को व्यापक राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ने में अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद की महत्वपूर्ण भूमिका थी। इसका उद्देश्य देशी रियासतों में जनता के राजनीतिक अधिकारों और उत्तरदायी शासन की मांग को राष्ट्रीय स्तर पर समर्थन देना था। राजस्थान के कई प्रजामंडल इसी व्यापक राजनीतिक वातावरण से प्रभावित हुए।

रियासतों के स्थानीय संगठनों और राष्ट्रीय आंदोलन के बीच संबंध हर राज्य में समान नहीं था। कुछ रियासतों में कांग्रेस से जुड़े कार्यकर्ता सक्रिय थे, जबकि कुछ स्थानों पर स्थानीय परिस्थितियों के कारण रणनीति अलग रही। यही कारण है कि जयपुर, मेवाड़, बीकानेर, भरतपुर और अन्य रियासतों के आंदोलनों का घटनाक्रम एक जैसा नहीं था।

भारत छोड़ो आंदोलन और प्रजामंडल

1942 में भारत छोड़ो आंदोलन शुरू होने के बाद राजस्थान की रियासतों में भी राजनीतिक गतिविधियां तेज हुईं। हालांकि सभी प्रजामंडलों ने एक जैसी रणनीति नहीं अपनाई। जयपुर में मुख्य प्रजामंडल और आजाद मोर्चे के बीच रणनीतिक अंतर दिखाई दिया। मेवाड़ में प्रजामंडल ने राज्य पर अंग्रेजों से संबंध तोड़ने के लिए दबाव बनाया। बीकानेर में झंडा सत्याग्रह और राजनीतिक बंदियों से जुड़े घटनाक्रम महत्वपूर्ण रहे।

इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि प्रजामंडल आंदोलन एक समान और एक ही दिन चलने वाला आंदोलन नहीं था। यह अलग-अलग रियासतों में स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार विकसित हुआ व्यापक राजनीतिक जनजागरण था।

प्रजामंडल आंदोलन का राजस्थान के एकीकरण में योगदान

1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद देशी रियासतों का भविष्य सबसे बड़ा राजनीतिक प्रश्न बन गया। राजस्थान की रियासतों के एकीकरण में सरदार वल्लभभाई पटेल और वी.पी. मेनन की भूमिका के साथ-साथ स्थानीय राजनीतिक कार्यकर्ताओं का योगदान भी महत्वपूर्ण था।

प्रजामंडल आंदोलनों ने रियासतों की जनता में राजनीतिक प्रतिनिधित्व और उत्तरदायी शासन की मांग को पहले ही मजबूत कर दिया था। इसलिए स्वतंत्रता के बाद जब रियासतों को संघों और अंततः राजस्थान में शामिल किया गया, तब जनता के प्रतिनिधित्व और लोकतांत्रिक शासन का प्रश्न पहले से राजनीतिक विमर्श का हिस्सा था।

जयपुर के हीरालाल शास्त्री बाद में राजस्थान के पहले मुख्यमंत्री बने। यह प्रजामंडल आंदोलन से जुड़े राजनीतिक नेतृत्व के स्वतंत्र राजस्थान के शासन में आने का महत्वपूर्ण उदाहरण है।

राजस्थान के आधुनिक इतिहास की अन्य घटनाओं के लिए Suyog Academy Rajasthan History Notes देखें।

प्रमुख प्रजामंडल: संस्थापक और नेता कैसे याद करें?

प्रजामंडलयाद रखने वाला प्रमुख नामवर्ष
जयपुरकर्पूरचंद पाटनी / जमनालाल बजाज1931
बूंदीकांतिलाल1931
मारवाड़जयनारायण व्यास1934
हाड़ौतीनयनूराम शर्मा1934
बीकानेरमघाराम वैद्य1936
धौलपुरकृष्णदत्त पालीवाल1936
मेवाड़माणिक्यलाल वर्मा1938
शाहपुरालादूराम व्यास / रमेशचंद्र ओझा1938
अलवरहरिनारायण शर्मा1938
भरतपुरगोपीलाल यादव / जुगलकिशोर चतुर्वेदी1938
कोटानयनूराम शर्मा / अभिन्न हरि1939
सिरोहीगोकुलभाई भट्ट1939
किशनगढ़कांतिलाल चौथानी / जमाल शाह1939
करौलीत्रिलोकचंद माथुर1939
कुशलगढ़भंवरलाल निगम1942
बांसवाड़ाभूपेंद्रनाथ त्रिवेदी1943
डूंगरपुरभोगीलाल पंड्या1944
जैसलमेरमीठालाल व्यास1945
प्रतापगढ़अमृतलाल पायक1945-46
झालावाड़मांगीलाल भव्य1946

Exam Trap: प्रजामंडल से जुड़े भ्रमित करने वाले तथ्य

  1. जयपुर प्रथम प्रजामंडल: सामान्य परीक्षा उत्तर 1931 और कर्पूरचंद पाटनी से जुड़ा है। बाद का पुनर्गठन जमनालाल बजाज और हीरालाल शास्त्री से संबंधित है।
  2. मेवाड़: 24 अप्रैल 1938 को प्रजामंडल गठन का तथ्य विशेष रूप से याद रखें। माणिक्यलाल वर्मा इसका प्रमुख नाम हैं।
  3. मारवाड़: जयनारायण व्यास को 1934 के प्रजामंडल से जोड़ें, जबकि बाद में मारवाड़ लोक परिषद का अलग संगठनात्मक चरण सामने आया।
  4. हाड़ौती और कोटा: 1934 के हाड़ौती प्रजामंडल और बाद के कोटा प्रजामंडल को एक ही घटना न समझें।
  5. बीकानेर: 1936 का प्रजामंडल और 1942 की राज्य प्रजा परिषद को अलग-अलग रखें।
  6. करौली: अध्ययन सामग्री में 1938 और 1939 दोनों मिल सकते हैं। राजस्थान सरकार के जिला गजेटियर के अनुसार अप्रैल 1939 में प्रजामंडल का गठन हुआ।
  7. धौलपुर: कृष्णदत्त पालीवाल को प्रमुख नेता और 1936 को स्थापना वर्ष के रूप में याद करें।
  8. सिरोही: गोकुलभाई भट्ट सबसे महत्वपूर्ण नाम है।
  9. डूंगरपुर: भोगीलाल पंड्या को वागड़ के राजनीतिक जनजागरण से जोड़ें।
  10. झालावाड़: 1946 और मांगीलाल भव्य को अंतिम चरण के प्रजामंडल आंदोलन से जोड़कर पढ़ें।

प्रजामंडल आंदोलन की परीक्षा के लिए अंतिम रिवीजन

यदि परीक्षा से पहले आपके पास केवल कुछ मिनट हैं, तो सबसे पहले ये जोड़ियां याद करें:

  • जयपुर → 1931 → कर्पूरचंद पाटनी
  • बूंदी → 1931 → कांतिलाल
  • मारवाड़ → 1934 → जयनारायण व्यास
  • हाड़ौती → 1934 → नयनूराम शर्मा
  • बीकानेर → 1936 → मघाराम वैद्य
  • धौलपुर → 1936 → कृष्णदत्त पालीवाल
  • मेवाड़ → 1938 → माणिक्यलाल वर्मा
  • शाहपुरा → 1938 → लादूराम व्यास / रमेशचंद्र ओझा
  • अलवर → 1938 → हरिनारायण शर्मा
  • भरतपुर → 1938 → गोपीलाल यादव / जुगलकिशोर चतुर्वेदी
  • कोटा → 1939 → नयनूराम शर्मा
  • सिरोही → 1939 → गोकुलभाई भट्ट
  • किशनगढ़ → 1939 → कांतिलाल चौथानी
  • करौली → 1939 → त्रिलोकचंद माथुर
  • कुशलगढ़ → 1942 → भंवरलाल निगम
  • बांसवाड़ा → 1943 → भूपेंद्रनाथ त्रिवेदी
  • डूंगरपुर → 1944 → भोगीलाल पंड्या
  • जैसलमेर → 1945 → मीठालाल व्यास
  • प्रतापगढ़ → 1945-46 → अमृतलाल पायक
  • झालावाड़ → 1946 → मांगीलाल भव्य

निष्कर्ष

राजस्थान के प्रजामंडल आंदोलन को केवल संस्थापक और वर्ष की सूची के रूप में याद करने के बजाय इसे रियासतकालीन राजनीतिक जागरण की प्रक्रिया के रूप में समझना अधिक उपयोगी है। 1931 में जयपुर और बूंदी से शुरू हुआ संगठनात्मक विस्तार अगले डेढ़ दशक में राजस्थान की लगभग सभी प्रमुख रियासतों तक पहुंचा। इस दौरान माणिक्यलाल वर्मा, जयनारायण व्यास, हीरालाल शास्त्री, गोकुलभाई भट्ट, भोगीलाल पंड्या, जमनालाल बजाज, नयनूराम शर्मा और अनेक स्थानीय कार्यकर्ताओं ने जनता की राजनीतिक मांगों को सामने रखा।

इन आंदोलनों ने नागरिक अधिकार, उत्तरदायी शासन और जनप्रतिनिधित्व के प्रश्न को रियासतों की राजनीति का हिस्सा बनाया। स्वतंत्रता के बाद राजस्थान के एकीकरण और लोकतांत्रिक शासन की स्थापना के वातावरण को समझने में प्रजामंडल आंदोलन इसलिए बहुत महत्वपूर्ण है।

राजस्थान इतिहास की तैयारी: प्रजामंडल के साथ किसान आंदोलन, 1857 की क्रांति, सामाजिक-सुधार आंदोलन और राजस्थान के एकीकरण को क्रम से पढ़ें। इससे अलग-अलग तथ्य रटने के बजाय घटनाओं के बीच संबंध समझने में मदद मिलेगी।

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अंतिम संशोधन (Last Updated): 16 सितंबर 2026
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परीक्षा 23 Oct 2026 · 3 फ्री डेमो

🎯 विगत वर्षों के प्रश्न (Interactive PYQs)

Q1. राजस्थान का प्रथम प्रजामंडल कौन सा था?

Rajasthan Competitive Exams Practice

Q2. मेवाड़ प्रजामंडल की स्थापना किस वर्ष हुई थी?

RPSC/RSSB Practice

Q3. मारवाड़ प्रजामंडल से निम्न में से कौन प्रमुख रूप से संबंधित थे?

Rajasthan CET Practice

Q4. हाड़ौती प्रजामंडल के प्रमुख नेता कौन थे?

RPSC Practice

Q5. बीकानेर प्रजामंडल की स्थापना किस वर्ष मानी जाती है?

RSSB Practice

Q6. सिरोही प्रजामंडल के प्रमुख नेता कौन थे?

Rajasthan CET Practice

Q7. डूंगरपुर प्रजामंडल से किस नेता का नाम प्रमुख रूप से जुड़ा है?

RPSC Practice

Q8. जैसलमेर प्रजामंडल के प्रमुख नेता कौन थे?

RSSB Practice

Q9. झालावाड़ प्रजामंडल से किस नेता का नाम प्रमुख रूप से जुड़ा है?

Rajasthan CET Practice

Q10. करौली प्रजामंडल के गठन के लिए राजस्थान सरकार के जिला गजेटियर में कौन सा वर्ष दिया गया है?

RPSC/RSSB Practice

महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

जयपुर प्रजामंडल को राजस्थान का प्रथम प्रजामंडल माना जाता है। इसकी स्थापना 1931 में कर्पूरचंद पाटनी से जोड़ी जाती है।

जयपुर प्रजामंडल की प्रारंभिक स्थापना 1931 में हुई थी। बाद में 1936-37 के आसपास इसका पुनर्गठन हुआ और जमनालाल बजाज तथा हीरालाल शास्त्री की भूमिका महत्वपूर्ण रही।

मेवाड़ प्रजामंडल की स्थापना 24 अप्रैल 1938 को हुई थी। माणिक्यलाल वर्मा इसके प्रमुख नेताओं में थे।

मारवाड़ प्रजामंडल से जयनारायण व्यास और भंवरलाल सर्राफ प्रमुख रूप से जुड़े थे।

कोटा प्रजामंडल से पं. नयनूराम शर्मा, अभिन्न हरि और तनसुखलाल मित्तल प्रमुख रूप से जुड़े थे।

सिरोही प्रजामंडल के प्रमुख नेता गोकुलभाई भट्ट थे।

डूंगरपुर प्रजामंडल के प्रमुख नेता भोगीलाल पंड्या थे, जिन्हें वागड़ का गांधी कहा जाता है।

बीकानेर प्रजामंडल से मघाराम वैद्य और बाद के राजनीतिक चरण में रघुवर दयाल गोयल प्रमुख रूप से जुड़े थे।

राजस्थान सरकार के करौली जिला गजेटियर के अनुसार करौली प्रजामंडल अप्रैल 1939 में गठित हुआ था। त्रिलोकचंद माथुर और ओंकार सिंह इसके राजनीतिक आंदोलन से जुड़े प्रमुख नाम हैं।

प्रजामंडल आंदोलनों का व्यापक उद्देश्य नागरिक अधिकारों, राजनीतिक भागीदारी, प्रशासनिक सुधार और रियासतों में उत्तरदायी शासन की मांग को आगे बढ़ाना था।

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