राजस्थान में परमार वंश — आबू, जालौर, किराडू, वागड़ व मालवा संबंध — RAS/CET
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स्रोत आधार: RPSC RAS / RSMSSB CET पाठ्यक्रम — राजस्थान इतिहास इकाई। पाठ्यपुस्तक पृष्ठ यहाँ नहीं चिपकाए गए।
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संक्षिप्त उत्तर: परमार (शाब्दिक अर्थ — "शत्रु को मारने वाला") राजस्थान के प्रमुख राजपूत वंशों में से एक हैं। अग्निकुल सिद्धांत के अनुसार इनकी उत्पत्ति आबू पर्वत (अर्बुदाचल) पर वशिष्ठ ऋषि के यज्ञ-कुंड से मानी जाती है — यह कथा पद्मगुप्त के नवसाहसांकचरित और किराडू अभिलेख जैसे स्रोतों में मिलती है; पृथ्वीराज रासो चार अग्निकुल वंश गिनाता है — परमार, प्रतिहार, चालुक्य (सोलंकी) और चौहान। राजस्थान में परमारों की मुख्य शाखाएँ थीं — आबू/चंद्रावती (धूमराज, धरणीवराह, धंधुक, धारावर्ष, सोमसिंह), जालौर, किराडू (बाड़मेर; किराडू मंदिर — "राजस्थान का खजुराहो") और वागड़ (अर्थूणा, बांसवाड़ा)। मालवा के परमार — मुंज (आहड़ पर आक्रमण) और भोज (चित्तौड़ में त्रिभुवन नारायण/समिद्धेश्वर मंदिर) — का भी राजस्थान से सीधा संबंध रहा। आबू परमार धंधुक के समय भीमदेव प्रथम सोलंकी के दंडनायक विमल शाह ने 1031 ई. में विमलवसही (आदिनाथ, दिलवाड़ा) बनवाया, और परमार सोमसिंह के समय वस्तुपाल-तेजपाल ने 1230 ई. में लूणवसही (नेमिनाथ) बनवाया। परमारों के व्यापक प्रसार पर कहावत है — "पृथ्वी परमारां तणी"। 12वीं–14वीं सदी में चौहानों (कीर्तिपाल, देवड़ा), गुहिलों (सामंतसिंह), सोलंकियों और दिल्ली सल्तनत से संघर्ष में इनकी शक्ति समाप्त हुई।
संक्षिप्त उत्तर
बिंदु | तथ्य | याद रखने योग्य संकेत |
|---|---|---|
नाम का अर्थ | परमार = "पर (शत्रु) + मार (मारने वाला)" | शत्रुहंता |
उत्पत्ति मत | अग्निकुल — आबू पर वशिष्ठ के यज्ञ-कुंड से | नवसाहसांकचरित, किराडू अभिलेख, पृथ्वीराज रासो |
चार अग्निकुल (रासो) | परमार, प्रतिहार, चालुक्य (सोलंकी), चौहान | "प-प्र-चा-चौ" |
प्रसार की कहावत | "पृथ्वी परमारां तणी" | पूरी धरती परमारों की |
आबू शाखा की राजधानी | चंद्रावती (आबू रोड के पास, सिरोही) | अचलगढ़ भी परमारों से जुड़ा |
आबू शाखा — आदिपुरुष | धूमराज (अभिलेखों में वर्णित) | वंशक्रम उत्पलराज से अधिक स्पष्ट |
धरणीवराह | सोलंकी मूलराज से पराजित; हथूंडी के राठौड़ धवल की शरण | हस्तिकुंडी (हथूंडी) अभिलेख 997 ई. |
धंधुक | भीमदेव प्रथम सोलंकी से विद्रोह; भोज के पास चित्तौड़ गए | विमल शाह — आबू का दंडनायक |
विमलवसही | 1031 ई., आदिनाथ, विमल शाह | दिलवाड़ा का सबसे पुराना मंदिर |
धारावर्ष | आबू का सबसे प्रसिद्ध परमार (लगभग 1163–1219) | अचलेश्वर के पास "एक बाण से तीन भैंसे" वाली मूर्ति |
प्रह्लादन | धारावर्ष का भाई; विद्वान | "पार्थ-पराक्रम-व्यायोग"; प्रह्लादनपुर (पालनपुर) |
लूणवसही | 1230 ई., नेमिनाथ, वस्तुपाल-तेजपाल | परमार सोमसिंह का काल; शिल्पी शोभनदेव |
किराडू | बाड़मेर; सोमेश्वर मंदिर; किराडू अभिलेख (1161 ई.) | "राजस्थान का खजुराहो" |
वागड़ शाखा | राजधानी अर्थूणा (बांसवाड़ा); संस्थापक डंबरसिंह | मंडलेश्वर शिव मंदिर (1080 ई.) |
मालवा — मुंज | आहड़ (आघाट) को नष्ट किया | उपाधियाँ — अमोघवर्ष, पृथ्वीवल्लभ, श्रीवल्लभ |
मालवा — भोज | चित्तौड़ में त्रिभुवन नारायण (समिद्धेश्वर) मंदिर | मोकल ने 1428 में जीर्णोद्धार कराया |
आबू पर अंत | देवड़ा चौहान लुंभा (लगभग 1311 ई.) | आगे सिरोही रियासत |
2. सिलेबस में यह टॉपिक क्यों महत्वपूर्ण है?
परीक्षा उपयोगिता: ★★★★☆
RAS प्रारंभिक व मुख्य परीक्षा, राजस्थान CET और पटवारी/VDO जैसी परीक्षाओं में "राजस्थान के प्रमुख राजवंश" खंड से परमारों पर सीधे प्रश्न कम, पर परोक्ष प्रश्न बहुत अधिक आते हैं — जैसे "विमलवसही का निर्माण किसके समय हुआ?", "किराडू किस जिले में है?", "'राजस्थान का खजुराहो' किसे कहते हैं?", "अर्थूणा के मंदिर किस वंश ने बनवाए?", "चित्तौड़ का समिद्धेश्वर मंदिर मूलतः किसने बनवाया?"। ये सभी प्रश्न परमार वंश की समझ से ही हल होते हैं।
प्रश्न कैसे आते हैं?
स्थापत्य-आधारित: दिलवाड़ा (विमलवसही, लूणवसही), किराडू, अर्थूणा, अचलगढ़/अचलेश्वर।
उत्पत्ति-आधारित: अग्निकुल सिद्धांत, चार अग्निकुल वंश, स्रोत ग्रंथ।
शासक-स्थान मिलान: धारावर्ष–आबू, डंबरसिंह–वागड़, भोज–मालवा/चित्तौड़, धंधुक–आबू।
कथन-आधारित: "निम्न में से कौन-सा कथन सही नहीं है" — जैसे विमलवसही को वस्तुपाल से जोड़ देना।
चौहान, प्रतिहार और गुहिल वंशों की तुलना के लिए प्रतिहार vs चौहान vs गुहिल — 3 राजवंश तुलना नोट देखें; यह नोट केवल परमार वंश की राजस्थान से जुड़ी शाखाओं पर केंद्रित है और खंड 12 में चारों की तुलना जोड़ता है।
3. उत्पत्ति: अग्निकुल सिद्धांत और आबू
3.1 नाम और अग्निकुल कथा
"परमार" शब्द को सामान्यतः "पर" (शत्रु) और "मार" (मारने वाला) से जोड़ा जाता है — अर्थात शत्रुओं का संहार करने वाला। संस्कृत अभिलेखों में यही नाम "प्रमार" या "परमार" रूप में मिलता है; बाद की राजस्थानी परंपरा में इन्हें "पंवार/पँवार" भी कहा गया।
अग्निकुल कथा का सार यह है कि आबू पर्वत पर ऋषि वशिष्ठ की कामधेनु (नंदिनी) गाय को विश्वामित्र ने छीन लिया। वशिष्ठ ने अग्निकुंड में यज्ञ किया, जिससे एक वीर पुरुष प्रकट हुआ। उसने विश्वामित्र से गाय वापस छीन लाई; प्रसन्न होकर वशिष्ठ ने उसे "परमार" (शत्रु को मारने वाला) नाम दिया। यही कथा मालवा परमार राजा सिंधुराज के दरबारी कवि पद्मगुप्त (परिमल) के ग्रंथ नवसाहसांकचरित में मिलती है, और राजस्थान के परमार अभिलेखों (जैसे किराडू अभिलेख) में भी परमारों का संबंध आबू के वशिष्ठ-यज्ञ से जोड़ा गया है।
बाद में चंदबरदाई के पृथ्वीराज रासो ने इस कथा को विस्तार देकर चार अग्निकुल वंश बताए — परमार, प्रतिहार (पड़िहार), चालुक्य (सोलंकी) और चौहान। ध्यान दें — परमारों के लिए अग्निकुल कथा रासो से पुरानी है (नवसाहसांकचरित 11वीं सदी का), जबकि "चार अग्निकुल" वाली सूची रासो की देन है।
3.2 उत्पत्ति पर इतिहासकारों के मत
मत | मुख्य तर्क | परीक्षा-दृष्टि |
|---|---|---|
अग्निकुल (परंपरागत) | आबू पर वशिष्ठ के यज्ञ से उत्पत्ति; नवसाहसांकचरित, अभिलेख, रासो | सबसे अधिक पूछा जाने वाला |
प्रतीकात्मक व्याख्या | यज्ञ द्वारा शुद्धिकरण/क्षत्रिय-धर्म में दीक्षा का प्रतीक — कई आधुनिक इतिहासकार | वर्णनात्मक प्रश्नों में उपयोगी |
विदेशी उत्पत्ति | कुछ औपनिवेशिक लेखकों ने अग्निकुल वंशों को बाहर से आए समूहों से जोड़ा | ओझा आदि भारतीय इतिहासकारों ने इसका खंडन किया |
परीक्षा के लिए सुरक्षित उत्तर: परमारों का मूल स्थान आबू (अर्बुदाचल) माना जाता है, और उत्पत्ति का परंपरागत मत अग्निकुल है। गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने अग्निकुल कथा को कवि-कल्पना माना था — "ओझा के अनुसार" वाले प्रश्नों में यह ध्यान रखें।
3.3 "पृथ्वी परमारां तणी" और "नवकोटि मारवाड़"
परमारों के विशाल प्रसार को दर्शाने वाली प्रसिद्ध राजस्थानी उक्ति है — "पृथ्वी परमारां तणी" (पृथ्वी परमारों की है)। इस दोहे के अलग-अलग पाठ मिलते हैं; एक प्रचलित पाठ में आगे परमारों के दो प्रमुख केंद्रों — आबू और उज्जैन/धार (मालवा) — का उल्लेख आता है। परीक्षा में प्रायः केवल पहला चरण पूछा जाता है।
इसी से जुड़ी एक परंपरा "नवकोटि मारवाड़" की है — कहा जाता है कि आबू के परमार धरणीवराह ने अपना राज्य नौ भाइयों में बाँटा, जिससे नौ कोट (दुर्ग-केंद्र) बने। प्रचलित सूचियों में मंडोर, साँभर/अजमेर, पूगल, लोद्रवा, धाट (अमरकोट), पारकर, आबू, जालौर और किराडू जैसे नाम आते हैं, पर अलग-अलग स्रोतों में नाम बदलते हैं। इसे ऐतिहासिक तथ्य नहीं, बल्कि ख्यात/छप्पय परंपरा के रूप में पढ़ें।
याद रखें: अग्निकुल = आबू + वशिष्ठ। परमार कथा का सबसे पुराना साहित्यिक स्रोत = नवसाहसांकचरित (पद्मगुप्त)। चार अग्निकुल सूची = पृथ्वीराज रासो।
4. आबू (चंद्रावती) के परमार
राजस्थान में परमारों की सबसे महत्त्वपूर्ण शाखा आबू के परमारों की थी। इनकी राजधानी चंद्रावती थी, जो वर्तमान आबू रोड (सिरोही जिला) के पास स्थित एक समृद्ध व्यापारिक नगर थी; आज वहाँ केवल खंडहर शेष हैं। आबू पर्वत पर अचलगढ़ दुर्ग भी परमारों से जुड़ा है, जिसका बाद में महाराणा कुंभा ने पुनर्निर्माण कराया। आबू क्षेत्र के बाद के इतिहास (देवड़ा चौहान) के लिए सिरोही रियासत — देवड़ा चौहान से विलय नोट देखें।
4.1 धूमराज और आरंभिक वंशक्रम
आबू के परमार अभिलेखों में वंश के आदिपुरुष के रूप में धूमराज का नाम आता है। उनके बाद का प्रामाणिक वंशक्रम लगभग 10वीं सदी के उत्पलराज से अधिक स्पष्ट होता है। आबू के परमार प्रायः शक्तिशाली पड़ोसियों — पहले प्रतिहारों और बाद में गुजरात के चौलुक्यों (सोलंकियों) — के सामंत या प्रतिद्वंद्वी के रूप में रहे।
4.2 धरणीवराह — सोलंकी मूलराज से संघर्ष
धरणीवराह (10वीं सदी का उत्तरार्ध) आबू के प्रारंभिक प्रतापी परमार माने जाते हैं। गुजरात के चौलुक्य वंश के संस्थापक मूलराज प्रथम ने उन पर आक्रमण किया। पराजित धरणीवराह ने हस्तिकुंडी (हथूंडी, पाली क्षेत्र) के राष्ट्रकूट/राठौड़ शासक धवल के यहाँ शरण ली — यह विवरण हस्तिकुंडी (बीजापुर) अभिलेख (997 ई.) में मिलता है। यही अभिलेख यह भी बताता है कि धवल ने मालवा के मुंज द्वारा आहड़ नष्ट किए जाने पर मेवाड़ की सेना को शरण दी थी। "नवकोटि मारवाड़" की परंपरा भी धरणीवराह से ही जोड़ी जाती है।
4.3 धंधुक, भीमदेव प्रथम और विमल शाह
धंधुक (11वीं सदी का पूर्वार्ध) के समय आबू, गुजरात के चौलुक्य शासक भीमदेव प्रथम के अधीन सामंत-राज्य था। धंधुक ने भीमदेव की अधीनता से मुक्त होने का प्रयास किया; भीमदेव के दबाव में वह आबू छोड़कर मालवा के परमार राजा भोज की शरण में गया, जो उस समय चित्तौड़ में थे। भीमदेव ने आबू पर अपने दंडनायक (प्रशासक) विमल शाह को नियुक्त किया। विमल शाह ने बाद में धंधुक और भीमदेव के बीच मेल कराया, और धंधुक पुनः सामंत के रूप में आबू लौटे।
इसी काल में जैन श्रावक (पोरवाड़) विमल शाह ने 1031 ई. (वि.सं. 1088) में आबू (देलवाड़ा/दिलवाड़ा) में प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ (ऋषभदेव) का मंदिर बनवाया, जो विमलवसही कहलाता है। ध्यान दें — मंदिर का निर्माता विमल शाह था, शासनाधिकार भीमदेव प्रथम सोलंकी का था और स्थानीय सामंत परमार धंधुक था। प्रश्नों में यही "त्रिकोण" भ्रम पैदा करता है।
4.4 पूर्णपाल और वसंतगढ़
धंधुक के बाद पूर्णपाल का नाम वसंतगढ़ (सिरोही) अभिलेख (1042 ई.) से जाना जाता है। इस अभिलेख में उनकी बहन लाहिनी द्वारा वसंतगढ़ में बावड़ी (लाहिनी वापी) के जीर्णोद्धार का उल्लेख माना जाता है। वसंतगढ़ (प्राचीन वटपुर/वसिष्ठपुर) परमार काल का प्रमुख केंद्र था।
4.5 धारावर्ष — आबू का सबसे प्रसिद्ध परमार
धारावर्ष (शासन लगभग 1163–1219 ई.; कुछ स्रोतों में तिथियाँ थोड़ी भिन्न) आबू परमारों में सबसे लंबे और यशस्वी शासन के लिए प्रसिद्ध हैं। वे यशोधवल के पुत्र थे और गुजरात के चौलुक्यों के सामंत रहे। उनके प्रमुख तथ्य —
मुहम्मद गोरी के विरुद्ध: 1178 ई. में गुजरात की चौलुक्य सेना (बालक शासक मूलराज द्वितीय, राजमाता नायिकी देवी) ने आबू के पास कासहृद (कायंद्रा) में गोरी को पराजित किया; परंपरा व अभिलेखीय संकेतों के अनुसार धारावर्ष इस अभियान में चौलुक्य पक्ष में थे।
कुतुबुद्दीन ऐबक के विरुद्ध (1197 ई.): ऐबक के गुजरात अभियान के समय आबू क्षेत्र में चौलुक्य-परमार सेना पराजित हुई; फ़ारसी विवरणों में आबू के पास हुए इस युद्ध का उल्लेख है।
अचलेश्वर की मूर्ति: अचलगढ़ स्थित अचलेश्वर महादेव मंदिर के पास मंदाकिनी कुंड पर धनुर्धारी धारावर्ष की प्रतिमा और तीन भैंसों (महिषों) की प्रतिमाएँ हैं — लोककथा है कि उन्होंने एक ही बाण से तीन भैंसों को भेद दिया था। यह उनकी धनुर्विद्या का प्रतीक माना जाता है।
भाई प्रह्लादन (प्रह्लादनदेव): विद्वान, कवि और योद्धा; संस्कृत नाटक "पार्थ-पराक्रम-व्यायोग" के रचयिता। प्रह्लादनपुर (वर्तमान पालनपुर, गुजरात) की स्थापना उन्हीं से जोड़ी जाती है।
4.6 सोमसिंह और लूणवसही (1230 ई.)
धारावर्ष के पुत्र सोमसिंह के शासनकाल में गुजरात के वाघेला शासक वीरधवल के मंत्री बंधु वस्तुपाल और तेजपाल ने 1230 ई. (वि.सं. 1287) में दिलवाड़ा में 22वें तीर्थंकर नेमिनाथ का मंदिर बनवाया, जो लूणवसही (लूणिगवसही) कहलाता है। इसके शिल्पी शोभनदेव माने जाते हैं। मंदिर का नाम लूणिग/लूणसिंह की स्मृति से जोड़ा जाता है — कुछ स्रोत इसे तेजपाल के दिवंगत पुत्र, तो कुछ वस्तुपाल-तेजपाल के दिवंगत भाई का नाम बताते हैं; परीक्षा में प्रायः केवल "वस्तुपाल-तेजपाल, 1230, नेमिनाथ" पूछा जाता है। मंदिर में तेजपाल की दो पत्नियों से जोड़े जाने वाले "देवरानी-जेठानी के गोखले (आले)" प्रसिद्ध हैं। अभिलेखों के अनुसार परमार शासक सोमसिंह ने मंदिर की व्यवस्था हेतु भूमि/गाँव का दान भी दिया।
4.7 आबू परमारों का अंत
13वीं सदी के अंत तक चौलुक्य-वाघेला शक्ति कमजोर हुई और आबू के परमार भी दुर्बल हो गए। देवड़ा चौहान शाखा के राव लुंभा ने लगभग 1311 ई. (कुछ स्रोतों में 14वीं सदी का आरंभ) में आबू और चंद्रावती पर अधिकार कर लिया। यहीं से आगे सिरोही राज्य का इतिहास शुरू होता है।
आबू परमार शासक | समय (लगभग) | मुख्य तथ्य |
|---|---|---|
धूमराज | परंपरागत आदिपुरुष | अभिलेखों में वंश-प्रवर्तक |
उत्पलराज | 10वीं सदी | प्रामाणिक वंशक्रम का आरंभ |
धरणीवराह | 10वीं सदी उत्तरार्ध | मूलराज से पराजित; हथूंडी के धवल की शरण; नवकोटि परंपरा |
धंधुक | 11वीं सदी पूर्वार्ध | भीमदेव प्रथम से विद्रोह; भोज की शरण (चित्तौड़); विमलवसही 1031 |
पूर्णपाल | 1040 के दशक | वसंतगढ़ अभिलेख 1042 |
यशोधवल | 12वीं सदी मध्य | चौलुक्य कुमारपाल के सामंत; धारावर्ष के पिता |
धारावर्ष | लगभग 1163–1219 | सबसे प्रसिद्ध; कासहृद (1178); अचलेश्वर मूर्ति; भाई प्रह्लादन |
सोमसिंह | 13वीं सदी पूर्वार्ध | लूणवसही 1230 (वस्तुपाल-तेजपाल) |
अंत | लगभग 1311 | देवड़ा चौहान लुंभा ने आबू-चंद्रावती ली |
5. दिलवाड़ा के जैन मंदिर — परमार काल से संबंध
माउंट आबू (सिरोही) के दिलवाड़ा (देलवाड़ा) जैन मंदिर सफेद संगमरमर पर अत्यंत बारीक नक्काशी के लिए विश्व-प्रसिद्ध हैं। इनमें से दो सबसे प्रसिद्ध मंदिर परमार शासकों के काल में बने, यद्यपि निर्माता गुजरात के मंत्री/दंडनायक थे। संपूर्ण मंदिर-सूची और शैली के लिए राजस्थान के प्रमुख मंदिर और मंदिर स्थापत्य शैलियाँ: नागर शैली नोट देखें; आबू के भूगोल के लिए नक्की झील: माउंट आबू।
मंदिर | तीर्थंकर | निर्माता | वर्ष | उस समय आबू का परमार शासक / अधिपति |
|---|---|---|---|---|
विमलवसही | आदिनाथ (ऋषभदेव) — प्रथम | विमल शाह (भीमदेव प्रथम का दंडनायक) | 1031 ई. | धंधुक / अधिपति भीमदेव प्रथम सोलंकी |
लूणवसही | नेमिनाथ — 22वें | वस्तुपाल-तेजपाल (वाघेला वीरधवल के मंत्री) | 1230 ई. | सोमसिंह / अधिपति वाघेला-चौलुक्य |
पित्तलहर | आदिनाथ (पीतल/पंचधातु की मूर्ति) | भीमाशाह (परंपरा अनुसार) | 15वीं सदी | परमार काल के बाद |
पार्श्वनाथ (खरतरवसही) | पार्श्वनाथ | परंपरा अनुसार मंडलिक व अन्य | 15वीं सदी | परमार काल के बाद |
विमल = पहला मंदिर = पहला तीर्थंकर (आदिनाथ) = 1031। वस्तु-तेज = लूण = नेमि (22) = 1230।
6. जालौर के परमार
जालौर (प्राचीन जाबालिपुर) और उसका दुर्ग — सुवर्णगिरि/सोनगिरि — आरंभ में परमारों के अधिकार में था। परंपरा और अधिकांश परीक्षा-पुस्तकों के अनुसार जालौर दुर्ग का प्रारंभिक निर्माण परमारों ने (लगभग 10वीं सदी) कराया। जालौर के एक परमार अभिलेख में वाक्पतिराज से आरंभ होने वाली वंशावली (चंदन, देवराज, अपराजित, विज्जल, धारावर्ष, वीसल आदि) मिलती है — यह धारावर्ष आबू वाले धारावर्ष से अलग है।
12वीं सदी के उत्तरार्ध में नाडोल चौहान शाखा के कीर्तिपाल ने जालौर परमारों से छीन लिया और वहाँ सोनगरा चौहान शाखा की नींव रखी (सोनगिरि से "सोनगरा")। आगे कान्हड़देव और 1311 के जालौर साके का इतिहास जालौर सोनगरा चौहान व सिवाना साका नोट में है; नाडोल शाखा के लिए नाडोल चौहान वंश।
जालौर दुर्ग: बनवाया परमारों ने → छीना कीर्तिपाल (नाडोल चौहान) ने → प्रसिद्ध हुआ सोनगरा कान्हड़देव से।
7. किराडू के परमार और किराडू मंदिर
किराडू (प्राचीन किरातकूप) वर्तमान बाड़मेर जिले में हाथमा गाँव के पास स्थित है। यहाँ परमारों की एक शाखा शासन करती थी, जो प्रायः गुजरात के चौलुक्यों (विशेषकर कुमारपाल) की सामंत थी।
7.1 किराडू अभिलेख (1161 ई.)
किराडू के परमार शासक सोमेश्वर के समय का किराडू अभिलेख (1161 ई., वि.सं. 1218) परमार इतिहास का प्रमुख स्रोत है। इसमें परमारों की उत्पत्ति आबू पर वशिष्ठ के यज्ञ से बताई गई है और परमार वंशावली तथा चौलुक्य अधिपति से संबंध का वर्णन है। इसलिए अग्निकुल मत के अभिलेखीय प्रमाण के रूप में किराडू अभिलेख का नाम प्रायः पूछा जाता है।
7.2 किराडू मंदिर — "राजस्थान का खजुराहो"
किराडू में लगभग 11वीं–12वीं सदी के पाँच मंदिरों का समूह है; इनमें सोमेश्वर (शिव) मंदिर सबसे बड़ा व प्रसिद्ध है। एक मंदिर विष्णु को समर्पित है और शेष अधिकांश शैव हैं।
स्थापत्य शैली — मारु-गुर्जर (सोलंकी) शैली की नागर परंपरा।
बाहरी दीवारों पर सजीव मूर्तिकला (देवता, नर्तकियाँ, युद्ध-दृश्य, कुछ शृंगारिक मूर्तियाँ) के कारण इसे "राजस्थान का खजुराहो" कहा जाता है।
सावधानी — "राजस्थान का खजुराहो" उपनाम कुछ पुस्तकों में जगत (उदयपुर) के अंबिका मंदिर के लिए "मेवाड़ का खजुराहो" और भंड देवरा (रामगढ़, बारां) के लिए "हाड़ौती/राजस्थान का मिनी खजुराहो" के रूप में भी मिलता है। सामान्य परीक्षा उत्तर: राजस्थान का खजुराहो = किराडू (बाड़मेर)।
8. वागड़ (अर्थूणा) के परमार
दक्षिणी राजस्थान का वागड़ क्षेत्र — आज के डूंगरपुर और बांसवाड़ा जिले — 10वीं से 12वीं सदी तक परमारों की एक शाखा के अधीन रहा। यह शाखा मालवा के परमार कुल से निकली थी; इसका संस्थापक डंबरसिंह माना जाता है (मालवा परमार राजपरिवार का सदस्य — उनका सटीक संबंध अलग-अलग पुस्तकों में भिन्न बताया गया है)। वागड़ परमार प्रायः मालवा के परमार राजाओं के सामंत के रूप में रहे।
8.1 अर्थूणा — राजधानी और मंदिर-नगर
वागड़ परमारों की राजधानी अर्थूणा (प्राचीन उत्थूणक) थी, जो वर्तमान बांसवाड़ा जिले में है।
शासक चामुंडराज ने 1080 ई. (वि.सं. 1136) में अपने पिता मंडलीक की स्मृति में मंडलेश्वर शिव मंदिर बनवाया — इसका वर्णन अर्थूणा अभिलेख (1080 ई.) में है।
अर्थूणा में शैव, वैष्णव और जैन मंदिरों के अवशेष मिलते हैं; मूर्तिकला की दृष्टि से यह दक्षिण राजस्थान का महत्त्वपूर्ण स्थल है और आज यहाँ अनेक मंदिर खंडहर अवस्था में हैं।
वागड़ परमार काल का एक अन्य केंद्र पाणाहेड़ा (बांसवाड़ा) भी माना जाता है, जहाँ परमारकालीन मंदिर व अभिलेख मिले हैं।
8.2 वागड़ में परमार शासन का अंत
12वीं सदी के उत्तरार्ध में मेवाड़ से निकले गुहिल सामंतसिंह ने (मेवाड़ पर नाडोल चौहान कीर्तिपाल का दबाव पड़ने के बाद) वागड़ में अपनी सत्ता स्थापित की; इससे वागड़ में परमार प्रभुत्व समाप्त होने लगा। आगे यहीं से डूंगरपुर (रावल डूंगरसिंह, 14वीं सदी) और बांसवाड़ा (जगमाल, 16वीं सदी) के गुहिल-वंशी राज्य बने — विस्तार वागड़ की रियासतें — डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़ नोट में।
9. मालवा के परमार और राजस्थान
मालवा के परमार (राजधानी पहले उज्जैन, फिर धार) राजस्थान के बाहर का राज्य था, पर मेवाड़, चित्तौड़, वागड़ और हाड़ौती क्षेत्र पर उनका सीधा प्रभाव रहा। वंश का प्रारंभिक संस्थापक उपेंद्र (कृष्णराज) माना जाता है; सीयक द्वितीय (हर्ष) के समय (10वीं सदी) मालवा परमार स्वतंत्र शक्ति बने।
9.1 वाक्पति मुंज (लगभग 973–995 ई.)
उपाधियाँ — अमोघवर्ष, पृथ्वीवल्लभ, श्रीवल्लभ; कवि-संरक्षक — उनके दरबार में पद्मगुप्त (परिमल), धनंजय (दशरूपक), धनिक, हलायुध जैसे विद्वान थे।
राजस्थान से संबंध: मुंज ने मेवाड़ की तत्कालीन राजधानी आघाट (आहड़) पर आक्रमण कर उसे नष्ट किया — यह गुहिल शासक शक्तिकुमार के समय की घटना मानी जाती है। हस्तिकुंडी अभिलेख के अनुसार राठौड़ धवल ने मेवाड़ की सेना को शरण दी। इसके बाद चित्तौड़ और आसपास का क्षेत्र कुछ समय मालवा परमारों के प्रभाव में रहा।
मुंज ने नाडोल/आबू क्षेत्र व गुर्जर क्षेत्र पर भी अभियान किए; अंततः कल्याणी के चालुक्य तैलप द्वितीय के विरुद्ध अभियान में बंदी बनाकर मार दिए गए।
धार में मुंज सागर तालाब उन्हीं के नाम से जुड़ा है।
9.2 राजा भोज (लगभग 1010–1055 ई.)
मुंज के भतीजे और सिंधुराज के पुत्र; परमार वंश के सबसे प्रसिद्ध शासक। राजधानी धार।
विद्वान-राजा — समरांगणसूत्रधार (स्थापत्य), सरस्वतीकंठाभरण (काव्यशास्त्र/व्याकरण), राजमार्तंड (योगसूत्र टीका), युक्तिकल्पतरु आदि ग्रंथ उनसे जोड़े जाते हैं। धार की भोजशाला (सरस्वती सदन), भोपाल का भोजताल और भोजपुर का शिव मंदिर उनसे संबंधित हैं (ये मध्य प्रदेश में हैं)।
राजस्थान से संबंध — चित्तौड़: भोज के समय चित्तौड़ दुर्ग परमारों के अधिकार में था। उन्होंने चित्तौड़ में त्रिभुवन नारायण नामक शिव मंदिर बनवाया, जिसे समिद्धेश्वर मंदिर कहा जाता है। मेवाड़ के महाराणा मोकल ने 1428 ई. में इसका जीर्णोद्धार कराया, इसलिए इसे "मोकलजी का मंदिर" भी कहते हैं। (इसी मंदिर के समिद्धेश्वर अभिलेख, 1428 से मोकल के बारे में जानकारी मिलती है।)
आबू से संबंध: सोलंकी भीमदेव प्रथम से भागकर आबू के परमार धंधुक ने चित्तौड़ में भोज की शरण ली थी।
भोज के अंतिम वर्षों में गुजरात के भीमदेव प्रथम और कलचुरि लक्ष्मीकर्ण के संयुक्त आक्रमण से मालवा को भारी क्षति हुई; लगभग 1055 ई. में भोज की मृत्यु हुई।
मेवाड़-चित्तौड़ के गुहिल इतिहास के लिए गुहिल वंश — बप्पा रावल से सिसोदिया और मोकल के लिए राणा मोकल व कुंभा का उदय नोट देखें। आहड़ के पुरातात्त्विक महत्व के लिए आहड़ सभ्यता।
9.3 मालवा परमारों का अंत
भोज के बाद मालवा परमार क्रमशः कमजोर हुए; उदयादित्य ने कुछ समय शक्ति पुनर्स्थापित की। अंततः अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति ऐन-उल-मुल्क मुल्तानी ने लगभग 1305 ई. में मालवा जीत लिया और परमार सत्ता समाप्त हो गई।
10. परमारों का पतन — किससे संघर्ष?
राजस्थान की परमार शाखाएँ किसी एक युद्ध से नहीं, बल्कि चारों ओर के शक्तिशाली वंशों के दबाव से धीरे-धीरे समाप्त हुईं। यह खंड "किस शाखा को किसने समाप्त किया" का सीधा उत्तर देता है।
परमार शाखा | प्रमुख प्रतिद्वंद्वी | परिणाम |
|---|---|---|
आबू/चंद्रावती | गुजरात के चौलुक्य (मूलराज, भीमदेव प्रथम) — फिर दिल्ली सल्तनत के आक्रमण | लंबे समय तक चौलुक्य सामंत; लगभग 1311 में देवड़ा चौहान लुंभा ने अधिकार किया |
जालौर | नाडोल के चौहान | 12वीं सदी के उत्तरार्ध में कीर्तिपाल ने जालौर लिया → सोनगरा चौहान |
किराडू | चौलुक्य अधिपत्य; पड़ोसी भाटी/चौहान; बाद में तुर्क आक्रमण | 12वीं–13वीं सदी के बाद महत्त्व समाप्त |
वागड़ (अर्थूणा) | मेवाड़ के गुहिल; गुजरात के चौलुक्य | गुहिल सामंतसिंह के बाद गुहिल-वंशी सत्ता (डूंगरपुर/बांसवाड़ा) |
मालवा (धार) | कल्याणी चालुक्य, गुजरात चौलुक्य, कलचुरि, दिल्ली सल्तनत | लगभग 1305 में खिलजी सेना ने जीता |
निष्कर्ष-वाक्य: परमारों के पतन में चौहान (कीर्तिपाल, देवड़ा लुंभा), गुहिल (सामंतसिंह; पहले मुंज–आहड़ संघर्ष), सोलंकी/चौलुक्य (मूलराज, भीमदेव, कुमारपाल) और अंततः दिल्ली सल्तनत — चारों की भूमिका रही।
11. शाखा-वार सारणी — एक नज़र में
शाखा | वर्तमान जिला/क्षेत्र | राजधानी/केंद्र | प्रमुख शासक | प्रमुख स्थापत्य/स्रोत |
|---|---|---|---|---|
आबू | सिरोही | चंद्रावती; अचलगढ़ | धूमराज, धरणीवराह, धंधुक, धारावर्ष, सोमसिंह | विमलवसही, लूणवसही, अचलेश्वर क्षेत्र, वसंतगढ़ अभिलेख |
जालौर | जालौर | जाबालिपुर, सोनगिरि | वाक्पतिराज से वीसल तक | जालौर दुर्ग (प्रारंभिक निर्माण) |
किराडू | बाड़मेर | किरातकूप | सोमेश्वर | किराडू मंदिर, किराडू अभिलेख 1161 |
वागड़ | बांसवाड़ा-डूंगरपुर | अर्थूणा (उत्थूणक) | डंबरसिंह, मंडलीक, चामुंडराज | मंडलेश्वर मंदिर, अर्थूणा अभिलेख 1080 |
मालवा (राजस्थान से संबंध) | मध्य प्रदेश (धार, उज्जैन) | धार | मुंज, भोज | चित्तौड़ का त्रिभुवन नारायण/समिद्धेश्वर मंदिर; आहड़ पर आक्रमण |
12. परमार बनाम प्रतिहार, चौहान और गुहिल — तुलना
तीन बड़े वंशों की विस्तृत तुलना प्रतिहार vs चौहान vs गुहिल — 3 राजवंश तुलना नोट में है; नीचे की तालिका उसमें परमारों को जोड़ती है।
आधार | परमार | प्रतिहार | चौहान | गुहिल |
|---|---|---|---|---|
उत्पत्ति मत | अग्निकुल (आबू) | अग्निकुल (रासो); गुर्जर/लक्ष्मण-वंशी मत | अग्निकुल (रासो); सूर्यवंशी (पृथ्वीराज विजय), ब्राह्मण मत | सूर्यवंशी; ब्राह्मण मत (कुछ अभिलेख) |
राजस्थान में मुख्य केंद्र | आबू, जालौर, किराडू, वागड़ | मंडोर, भीनमाल | शाकंभरी, अजमेर, रणथंभौर, जालौर, नाडोल | नागदा, आहड़, चित्तौड़ |
प्रसिद्ध शासक | धारावर्ष; (मालवा) मुंज, भोज | नागभट्ट प्रथम, मिहिरभोज | अजयराज, विग्रहराज चतुर्थ, पृथ्वीराज तृतीय | बप्पा रावल, जैत्रसिंह, कुंभा |
प्रसिद्ध स्थापत्य | दिलवाड़ा (परमार काल), किराडू, अर्थूणा | ओसियाँ के मंदिर (प्रतिहार काल) | अढ़ाई दिन का झोंपड़ा (मूल संस्कृत पाठशाला), तारागढ़ | एकलिंगजी, विजय स्तंभ, कुंभलगढ़ |
पारस्परिक संबंध | मुंज ने आहड़ (गुहिल) नष्ट किया; चौहानों ने जालौर व आबू लिए | अरबों को रोका; बाद में चौहान-गुहिल उनके सामंत रहे | परमारों से जालौर/आबू लिए | सामंतसिंह ने वागड़ में सत्ता बनाई |
अन्य राजवंशों का सार राजस्थान के प्रमुख राजवंश और प्रतिहारों के लिए गुर्जर-प्रतिहार — मण्डोर व भीनमाल शाखा नोट में देखें।
13. समयरेखा (Timeline)
वर्ष (लगभग) | घटना |
|---|---|
10वीं सदी | आबू में उत्पलराज; वागड़ में डंबरसिंह के वंशज; जालौर दुर्ग का प्रारंभिक निर्माण (परंपरा) |
10वीं सदी उत्तरार्ध | मुंज (973–995) द्वारा आहड़ पर आक्रमण; धरणीवराह की मूलराज से पराजय |
997 ई. | हस्तिकुंडी (हथूंडी) अभिलेख — धवल द्वारा धरणीवराह व मेवाड़ सेना को शरण |
1010–1055 | राजा भोज; चित्तौड़ में त्रिभुवन नारायण (समिद्धेश्वर) मंदिर |
1031 ई. | विमल शाह द्वारा विमलवसही (आदिनाथ) — धंधुक / भीमदेव प्रथम का काल |
1042 ई. | वसंतगढ़ अभिलेख — पूर्णपाल |
1080 ई. | अर्थूणा अभिलेख; चामुंडराज द्वारा मंडलेश्वर शिव मंदिर |
1161 ई. | किराडू अभिलेख — सोमेश्वर परमार; अग्निकुल उत्पत्ति का उल्लेख |
लगभग 1163–1219 | आबू में धारावर्ष का शासन |
1178 ई. | कासहृद (आबू के पास) में गोरी की पराजय — चौलुक्य पक्ष में धारावर्ष |
12वीं सदी उत्तरार्ध | कीर्तिपाल चौहान ने जालौर लिया; गुहिल सामंतसिंह वागड़ में |
1197 ई. | आबू के पास ऐबक से चौलुक्य-परमार सेना की पराजय |
1230 ई. | वस्तुपाल-तेजपाल द्वारा लूणवसही (नेमिनाथ) — सोमसिंह का काल |
लगभग 1305 | खिलजी सेना द्वारा मालवा विजय |
लगभग 1311 | देवड़ा चौहान लुंभा का आबू-चंद्रावती पर अधिकार |
1428 ई. | मोकल द्वारा चित्तौड़ के समिद्धेश्वर मंदिर का जीर्णोद्धार |
14. परीक्षा में पूछे जाने वाले तथ्य (One-liners)
परमारों का मूल स्थान — आबू (अर्बुदाचल)।
अग्निकुल कथा का प्राचीन साहित्यिक स्रोत — पद्मगुप्त का नवसाहसांकचरित।
चार अग्निकुल वंश गिनाने वाला ग्रंथ — पृथ्वीराज रासो (चंदबरदाई)।
आबू परमारों की राजधानी — चंद्रावती।
धरणीवराह ने शरण ली — हथूंडी के राठौड़ धवल के यहाँ (हस्तिकुंडी अभिलेख 997)।
विमलवसही — 1031, विमल शाह, आदिनाथ; अधिपति भीमदेव प्रथम, सामंत धंधुक।
लूणवसही — 1230, वस्तुपाल-तेजपाल, नेमिनाथ; परमार सोमसिंह।
धारावर्ष की "एक बाण, तीन भैंसे" प्रतिमा — अचलेश्वर महादेव (अचलगढ़) के पास मंदाकिनी कुंड।
"पार्थ-पराक्रम-व्यायोग" — प्रह्लादन (धारावर्ष के भाई)।
किराडू — बाड़मेर; प्राचीन नाम किरातकूप; सोमेश्वर मंदिर; "राजस्थान का खजुराहो"।
किराडू अभिलेख — 1161 ई., परमार सोमेश्वर।
वागड़ परमारों की राजधानी — अर्थूणा (बांसवाड़ा); संस्थापक — डंबरसिंह।
जालौर दुर्ग का प्रारंभिक निर्माण — परमार; परमारों से जालौर लिया — कीर्तिपाल चौहान।
आहड़ (आघाट) को नष्ट करने वाला — मालवा का मुंज।
चित्तौड़ का त्रिभुवन नारायण (समिद्धेश्वर) मंदिर — राजा भोज; जीर्णोद्धार — मोकल (1428)।
आबू से परमारों को हटाने वाला — देवड़ा चौहान लुंभा (लगभग 1311)।
15. भ्रम व सावधानियाँ (Exam Traps)
Trap 1: विमलवसही का निर्माता "परमार राजा" नहीं
विमलवसही विमल शाह ने बनवाया — जो सोलंकी भीमदेव प्रथम के दंडनायक थे। परमार धंधुक उस समय आबू के सामंत थे। विकल्पों में "धंधुक ने विमलवसही बनवाया" मिले तो वह गलत है।
Trap 2: विमलवसही बनाम लूणवसही
विमलवसही = आदिनाथ, 1031, विमल शाह; लूणवसही = नेमिनाथ, 1230, वस्तुपाल-तेजपाल। दोनों के बीच लगभग 200 वर्ष का अंतर है; जोड़ी बदलकर प्रश्न बनाए जाते हैं।
Trap 3: वस्तुपाल-तेजपाल परमारों के मंत्री नहीं
वे गुजरात के वाघेला वीरधवल (धोलका) के मंत्री थे; परमार सोमसिंह केवल उस समय आबू के शासक थे।
Trap 4: दो "धारावर्ष"
आबू का प्रसिद्ध धारावर्ष (12वीं–13वीं सदी) अलग है; जालौर परमार वंशावली में भी एक धारावर्ष का नाम मिलता है। "अचलेश्वर की मूर्ति" और "प्रह्लादन के भाई" वाले तथ्य आबू के धारावर्ष से संबंधित हैं।
Trap 5: भोज — मालवा के परमार, न कि प्रतिहार मिहिरभोज
मिहिरभोज गुर्जर-प्रतिहार (9वीं सदी, कन्नौज) थे, जबकि चित्तौड़ का समिद्धेश्वर मंदिर बनवाने वाले परमार भोज (11वीं सदी, धार) थे। नाम-साम्य से भ्रम होता है।
Trap 6: समिद्धेश्वर मंदिर — निर्माता भोज, जीर्णोद्धारक मोकल
"मोकलजी का मंदिर" नाम के कारण कई विद्यार्थी मोकल को निर्माता मान लेते हैं। मूल निर्माण — भोज (त्रिभुवन नारायण); जीर्णोद्धार — मोकल, 1428। (कुछ पुस्तकें मूल निर्माण को भोज के बजाय सामान्य रूप से "परमार काल" कहती हैं; उत्तर में भोज ही चुनें।)
Trap 7: "राजस्थान का खजुराहो" — किराडू; अन्य "खजुराहो" उपनाम अलग
किराडू (बाड़मेर) = राजस्थान का खजुराहो; जगत का अंबिका मंदिर = मेवाड़ का खजुराहो; भंड देवरा (बारां) = हाड़ौती का खजुराहो। प्रश्न का शब्द ध्यान से पढ़ें।
Trap 8: अर्थूणा बांसवाड़ा में, डूंगरपुर में नहीं
वागड़ क्षेत्र में दोनों जिले हैं, पर अर्थूणा बांसवाड़ा जिले में है। डूंगरपुर का प्रसिद्ध प्राचीन स्थल देव सोमनाथ है — वह अलग प्रश्न है।
Trap 9: अग्निकुल सूची — गुहिल और राठौड़ इसमें नहीं
चार अग्निकुल = परमार, प्रतिहार, चालुक्य, चौहान। गुहिल, राठौड़, कछवाहा, भाटी इस सूची में नहीं हैं।
16. इसे आसानी से याद कैसे रखें?
चार अग्निकुल — "पप्पू चाचा चौहान": प(परमार)-प(प्रतिहार)-चा(चालुक्य)-चौ(चौहान)।
आबू क्रम — "धू-ध-धं-धा-सो": धूमराज → धरणीवराह → धंधुक → धारावर्ष → सोमसिंह।
मालवा का राजस्थान-संबंध — "मुंज ने आहड़ तोड़ा, भोज ने चित्तौड़ जोड़ा (मंदिर)"।
तिथियाँ — 997 हथूंडी · 1031 विमल · 1042 वसंतगढ़ · 1080 अर्थूणा · 1161 किराडू · 1230 लूण · 1311 लुंभा · 1428 मोकल।
17. कथन अभ्यास
परमारों की अग्निकुल उत्पत्ति आबू पर्वत पर वशिष्ठ के यज्ञ से मानी जाती है। — सही।
विमलवसही का निर्माण वस्तुपाल-तेजपाल ने करवाया। — गलत (विमल शाह, 1031)।
लूणवसही नेमिनाथ को समर्पित है। — सही।
किराडू मंदिर जैसलमेर जिले में हैं। — गलत (बाड़मेर)।
अर्थूणा वागड़ के परमारों की राजधानी थी। — सही।
चित्तौड़ का समिद्धेश्वर मंदिर मूलतः महाराणा कुंभा ने बनवाया। — गलत (भोज; जीर्णोद्धार मोकल)।
जालौर परमारों से कीर्तिपाल चौहान ने छीना। — सही।
आबू के परमार प्रायः गुजरात के चौलुक्यों के सामंत रहे। — सही।
18. संबंधित नोट्स
19. एक दिन पहले — 12 रेखाएँ
परमार = शत्रुहंता; अग्निकुल; आबू; वशिष्ठ-विश्वामित्र कथा
स्रोत — नवसाहसांकचरित (पद्मगुप्त), किराडू अभिलेख 1161, पृथ्वीराज रासो
चार अग्निकुल — परमार, प्रतिहार, चालुक्य, चौहान
"पृथ्वी परमारां तणी"; नवकोटि मारवाड़ — धरणीवराह (परंपरा)
आबू — चंद्रावती; धूमराज, धरणीवराह (हथूंडी 997), धंधुक, पूर्णपाल (वसंतगढ़ 1042)
विमलवसही 1031 — विमल शाह, आदिनाथ, भीमदेव प्रथम
धारावर्ष ~1163–1219; अचलेश्वर मूर्ति; भाई प्रह्लादन (पार्थ-पराक्रम-व्यायोग)
सोमसिंह — लूणवसही 1230, वस्तुपाल-तेजपाल, नेमिनाथ, शोभनदेव
जालौर — दुर्ग परमारों का; कीर्तिपाल चौहान ने लिया
किराडू (बाड़मेर) — सोमेश्वर मंदिर; राजस्थान का खजुराहो
वागड़ — डंबरसिंह; अर्थूणा (बांसवाड़ा); मंडलेश्वर मंदिर 1080 (चामुंडराज)
मालवा — मुंज ने आहड़ नष्ट किया; भोज — चित्तौड़ का त्रिभुवन नारायण/समिद्धेश्वर (मोकल 1428 जीर्णोद्धार)
20. अभ्यास
नोट पढ़ने के बाद इस पेज के अंत में दिए 25 प्रश्नों का क्विज़ हल करें। जिन प्रश्नों में गलती हो, उनके लिए खंड 4 (आबू के परमार), खंड 5 (दिलवाड़ा तालिका) और खंड 15 (Exam Traps) दोबारा पढ़ें। स्थान-आधारित प्रश्नों के लिए खंड 11 की शाखा-वार सारणी को बिना देखे लिखने का अभ्यास करें।
21. निष्कर्ष: परीक्षा के लिए क्या याद रखें?
परमार राजस्थान के उन वंशों में हैं जिनकी राजनीतिक शक्ति भले सीमित रही, पर सांस्कृतिक विरासत असाधारण है। आबू इनकी उत्पत्ति-भूमि भी है और कर्मभूमि भी — दिलवाड़ा के विमलवसही और लूणवसही इन्हीं के काल की देन हैं। किराडू और अर्थूणा के मंदिर पश्चिमी व दक्षिणी राजस्थान में परमार कला के प्रमाण हैं, जबकि मालवा के मुंज और भोज ने मेवाड़-चित्तौड़ की राजनीति और स्थापत्य को सीधे प्रभावित किया। चौलुक्यों, चौहानों, गुहिलों और अंततः दिल्ली सल्तनत के दबाव में ये शाखाएँ 14वीं सदी के आरंभ तक समाप्त हो गईं। परीक्षा के लिए तीन स्तंभ याद रखें — उत्पत्ति (अग्निकुल–आबू), शाखाएँ (आबू, जालौर, किराडू, वागड़) और स्थापत्य (विमलवसही 1031, लूणवसही 1230, किराडू, अर्थूणा, समिद्धेश्वर)।
अग्निकुल–आबू · चंद्रावती · धरणीवराह 997 · विमलवसही 1031 · अर्थूणा 1080 · किराडू 1161 · धारावर्ष · लूणवसही 1230 · लुंभा 1311 · मुंज–आहड़ · भोज–चित्तौड़
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“राजस्थान में परमार वंश — आबू, जालौर, किराडू, वागड़ व मालवा संबंध — RAS/CET” पढ़ने के बाद इन क्विज़ से तुरंत दोहराएँ — गलत उत्तर वाले बिंदु नोट में दोबारा देखें।
- राजस्थान में परमार वंश — अभ्यास क्विज़25 प्रश्नों से खुद को परखें
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महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)
अग्निकुल सिद्धांत के अनुसार आबू पर्वत पर ऋषि वशिष्ठ के यज्ञ-कुंड से एक वीर पुरुष उत्पन्न हुआ, जिसने विश्वामित्र से वशिष्ठ की कामधेनु वापस लाई; उसे "परमार" (शत्रु को मारने वाला) कहा गया। यह कथा पद्मगुप्त के नवसाहसांकचरित और किराडू अभिलेख जैसे स्रोतों में मिलती है।
चंदबरदाई के पृथ्वीराज रासो के अनुसार चार अग्निकुल वंश हैं — परमार, प्रतिहार (पड़िहार), चालुक्य (सोलंकी) और चौहान। गुहिल, राठौड़, कछवाहा या भाटी इस सूची में नहीं हैं।
इसका अर्थ है "पृथ्वी परमारों की है"। यह राजस्थानी उक्ति परमारों के व्यापक प्रसार को दर्शाती है; इसके प्रचलित पाठ में आगे आबू और उज्जैन/धार जैसे केंद्रों का उल्लेख आता है, पर पाठ अलग-अलग मिलते हैं।
आबू के परमारों की राजधानी चंद्रावती थी, जो वर्तमान सिरोही जिले में आबू रोड के पास स्थित थी। आबू पर्वत का अचलगढ़ दुर्ग भी परमारों से जुड़ा है, जिसका बाद में राणा कुंभा ने पुनर्निर्माण कराया।
विमलवसही (आदिनाथ मंदिर, दिलवाड़ा) गुजरात के सोलंकी शासक भीमदेव प्रथम के दंडनायक विमल शाह ने 1031 ई. में बनवाया। उस समय आबू का स्थानीय परमार सामंत धंधुक था।
लूणवसही (नेमिनाथ मंदिर) 1230 ई. में आबू के परमार शासक सोमसिंह के समय वाघेला वीरधवल के मंत्री वस्तुपाल-तेजपाल ने बनवाया। इसके शिल्पी शोभनदेव माने जाते हैं।
धारावर्ष (लगभग 1163–1219) आबू के सबसे प्रसिद्ध परमार शासक थे। वे चौलुक्यों के सामंत रहे और 1178 में कासहृद में गोरी के विरुद्ध चौलुक्य पक्ष में माने जाते हैं। अचलेश्वर महादेव के पास मंदाकिनी कुंड पर उनकी "एक बाण से तीन भैंसे" वाली प्रतिमा प्रसिद्ध है; उनके भाई प्रह्लादन ने "पार्थ-पराक्रम-व्यायोग" लिखा।
किराडू (प्राचीन किरातकूप) बाड़मेर जिले में है। यहाँ के मंदिर समूह में सोमेश्वर मंदिर प्रमुख है। उत्कृष्ट मूर्तिकला के कारण किराडू को "राजस्थान का खजुराहो" कहा जाता है। यहाँ का किराडू अभिलेख (1161 ई.) परमार सोमेश्वर के समय का है।
वागड़ के परमारों की राजधानी अर्थूणा (प्राचीन उत्थूणक, बांसवाड़ा) थी। इस शाखा का संस्थापक डंबरसिंह माना जाता है। शासक चामुंडराज ने 1080 ई. में अपने पिता मंडलीक की स्मृति में मंडलेश्वर शिव मंदिर बनवाया।
भोज के समय चित्तौड़ दुर्ग परमारों के अधिकार में था। उन्होंने वहाँ त्रिभुवन नारायण (समिद्धेश्वर) शिव मंदिर बनवाया, जिसका जीर्णोद्धार 1428 में महाराणा मोकल ने कराया। आबू के परमार धंधुक ने भीमदेव प्रथम से बचकर चित्तौड़ में भोज की शरण ली थी।
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