राजस्थान में मराठा हस्तक्षेप, पिंडारी और 1817–18 की ब्रिटिश संधियाँ — RAS/CET
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स्रोत आधार: RPSC RAS / RSMSSB CET पाठ्यक्रम — राजस्थान इतिहास इकाई। पाठ्यपुस्तक पृष्ठ यहाँ नहीं चिपकाए गए।
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संक्षिप्त उत्तर: 1707 में औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद मुगल सत्ता कमज़ोर हुई और पेशवा बाजीराव प्रथम के समय मराठे उत्तर की ओर बढ़े। राजस्थान में मराठों का प्रवेश राजपूत राज्यों के उत्तराधिकार संघर्षों से हुआ — बूंदी (बुधसिंह बनाम दलेलसिंह; मराठों का पहला प्रवेश लगभग 1734), जयपुर (ईश्वरी सिंह बनाम माधोसिंह; बगरू का युद्ध 1748, ईश्वरी सिंह की आत्महत्या 1750) और मारवाड़ (रामसिंह बनाम बख़्तसिंह/विजयसिंह; जयप्पा सिंधिया की नागौर में हत्या 1755)। मराठों ने चौथ (राजस्व का 1/4) और सरदेशमुखी (अतिरिक्त 1/10) वसूले; होल्कर व सिंधिया प्रमुख थे। तुंगा (1787) में राजपूतों ने महादजी सिंधिया को रोका, पर पाटन व मेड़ता (1790) में डी बोइन ने उन्हें हराया। मराठों के बाद पिंडारियों (अमीर ख़ाँ, करीम ख़ाँ, चीतू) ने लूट मचाई; कृष्णा कुमारी विवाद (1810) ने अराजकता चरम पर पहुँचाई। लॉर्ड हेस्टिंग्स ने चार्ल्स मेटकाफ़ के माध्यम से 1817–18 में राजपूत राज्यों से संधियाँ कीं — परीक्षा-पुस्तकों के अनुसार सबसे पहले कोटा (1817) और सबसे अंत में सिरोही (1823)। संधियों से राज्य ब्रिटिश संरक्षण में आए, विदेश संबंध छिन गए और खिराज देना पड़ा। अजमेर 1818 में सिंधिया से अंग्रेज़ों को मिला और 1832 में अजमेर में राजपूताना का AGG नियुक्त हुआ (बाद में मुख्यालय माउंट आबू)।
संक्षिप्त उत्तर
| घटना | वर्ष | मुख्य व्यक्ति / परिणाम |
|---|---|---|
| औरंगज़ेब की मृत्यु | 1707 | मुगल पतन की शुरुआत |
| बूंदी में मराठों का प्रवेश | लगभग 1734 | बुधसिंह के पक्ष में होल्कर व सिंधिया; दलेलसिंह (जयसिंह-समर्थित) के विरुद्ध |
| हुरड़ा सम्मेलन | 1734 | मराठों के विरुद्ध राजपूत एकता का प्रयास; अध्यक्षता महाराणा जगतसिंह द्वितीय |
| सवाई जयसिंह की मृत्यु | 1743 | जयपुर में उत्तराधिकार संघर्ष |
| बगरू का युद्ध | 1748 | माधोसिंह + मराठे बनाम ईश्वरी सिंह |
| ईश्वरी सिंह की आत्महत्या | 1750 | मराठों की धन-माँग के दबाव में; माधोसिंह शासक |
| जयप्पा सिंधिया की हत्या | 1755 | नागौर; विजयसिंह के समय |
| तुंगा (लालसोट) का युद्ध | 1787 | जयपुर-जोधपुर ने महादजी सिंधिया को रोका |
| पाटन व मेड़ता के युद्ध | 1790 | डी बोइन (सिंधिया का सेनापति) विजयी |
| अलवर व भरतपुर से संधियाँ | 1803 | वेलेजली काल; सहायक संधि नीति |
| भरतपुर का घेरा | 1805 | लॉर्ड लेक असफल |
| कृष्णा कुमारी की मृत्यु | 1810 | मेवाड़; जयपुर-जोधपुर प्रतिद्वंद्विता, अमीर ख़ाँ का दबाव |
| अमीर ख़ाँ से संधि | 1817 | टोंक का नवाब मान्य |
| पहली संधि (परीक्षा-पुस्तकों के अनुसार) | 1817 | कोटा — झाला ज़ालिम सिंह (तिथि-क्रम में करौली व टोंक, नवंबर 1817, पहले) |
| अजमेर ब्रिटिश क्षेत्र | 1818 | दौलतराव सिंधिया से संधि द्वारा |
| अंतिम संधि | 1823 | सिरोही |
| AGG की नियुक्ति | 1832 | मुख्यालय अजमेर; बाद में माउंट आबू |
2. सिलेबस में यह टॉपिक क्यों महत्वपूर्ण है?
RAS और राजस्थान CET के "राजस्थान का इतिहास" खंड में आधुनिक काल का यह अध्याय सीधा पूछा जाता है — मराठा हस्तक्षेप के कारण, उत्तराधिकार संघर्ष, युद्ध-वर्ष, 1818 की संधियाँ और AGG। यह अध्याय मध्यकालीन रियासती इतिहास को 1857 की क्रांति और प्रजामंडल आंदोलनों से जोड़ता है: 1818 की संधियों से जो ब्रिटिश सर्वोच्चता आई, उसी के विरुद्ध आगे असंतोष पनपा। पृष्ठभूमि के लिए अखिल भारतीय संदर्भ — वेलेजली की सहायक संधि, तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध और लॉर्ड हेस्टिंग्स — कंपनी शासन का विस्तार और गवर्नर-जनरल नोट में विस्तार से हैं।
परीक्षा उपयोगिता: ★★★★★
- RPSC RAS प्रारंभिक व मुख्य — कारण, प्रभाव, संधियों की शर्तें, ब्रिटिश सर्वोच्चता
- राजस्थान CET (12वीं व स्नातक) — युद्ध-वर्ष, "सबसे पहले/अंत में संधि", AGG
- पटवारी, VDO — एक-पंक्ति तथ्य: बगरू, तुंगा, जयप्पा, कृष्णा कुमारी
- REET — राजस्थान का इतिहास (सामान्य अध्ययन) भाग
- राजस्थान SI — आधुनिक राजस्थान के तथ्य
प्रश्न कैसे आते हैं?
- "राजस्थान में मराठों का प्रवेश किस राज्य के उत्तराधिकार संघर्ष से हुआ?"
- युद्ध — वर्ष — पक्षों का मिलान (बगरू, तुंगा, पाटन, मेड़ता)
- "1818 की संधि करने वाला पहला/अंतिम राज्य"
- संधि की शर्तों पर कथन-आधारित प्रश्न
- पिंडारी नेता और टोंक राज्य की स्थापना
- AGG — वर्ष, मुख्यालय, प्रथम AGG
3. पृष्ठभूमि: मुगल पतन और मराठों का उत्तर की ओर बढ़ना
| कारक | विवरण |
|---|---|
| मुगल केंद्र का कमज़ोर होना | 1707 में औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद उत्तराधिकार युद्ध, अयोग्य उत्तराधिकारी और दरबारी गुटबंदी; राजपूत राज्यों पर मुगल नियंत्रण ढीला पड़ा |
| मराठा शक्ति का विस्तार | पेशवा बाजीराव प्रथम (1720–40) की उत्तर-विस्तार नीति; मालवा और गुजरात में मराठों का प्रभुत्व, जिससे राजस्थान की सीमा तक पहुँच |
| राजपूत राज्यों के आपसी झगड़े | उत्तराधिकार विवादों में दावेदार बाहरी सहायता के लिए मराठों को बुलाने लगे |
| धन की आवश्यकता | मराठों को अपनी सेनाओं के लिए धन चाहिए था; राजस्थान के राज्य चौथ और नज़राने का स्रोत बने |
| राजपूत एकता का अभाव | हुरड़ा सम्मेलन (1734) में संयुक्त मोर्चे का निर्णय हुआ, पर वह व्यवहार में लागू नहीं हो सका |
3.1 हुरड़ा सम्मेलन (1734)
मराठों के बढ़ते दबाव को रोकने के लिए जयपुर के सवाई जयसिंह की पहल पर राजपूत शासकों का सम्मेलन हुरड़ा (वर्तमान भीलवाड़ा ज़िला) में हुआ। इसकी अध्यक्षता मेवाड़ के महाराणा जगतसिंह द्वितीय ने की। वर्षा ऋतु के बाद संयुक्त सेना से मराठों का सामना करने का निर्णय हुआ, पर राजाओं की आपसी स्वार्थ-भावना के कारण यह योजना सफल नहीं हुई। स्वयं जयसिंह बाद में मराठों से समझौते की नीति पर चले।
4. मराठों के प्रारंभिक हस्तक्षेप
4.1 बूंदी उत्तराधिकार संघर्ष — पहला मराठा प्रवेश
| पक्ष | विवरण |
|---|---|
| बुधसिंह | बूंदी के हाड़ा शासक; सवाई जयसिंह से संबंध बिगड़ने पर राज्य से वंचित किए गए |
| दलेलसिंह | सवाई जयसिंह द्वारा बूंदी की गद्दी पर बैठाए गए; जयपुर के समर्थक |
| सवाई जयसिंह | बूंदी पर जयपुर का प्रभाव चाहते थे; इसलिए बुधसिंह को हटाकर दलेलसिंह का समर्थन किया |
| मराठों को निमंत्रण | बुधसिंह की कछवाही रानी ने बुधसिंह के वंश का अधिकार वापस पाने के लिए मराठा सरदारों (मल्हारराव होल्कर, राणोजी सिंधिया) को धन का वचन देकर बुलाया |
| परिणाम | मराठों ने बूंदी पर आक्रमण कर दलेलसिंह को हटाया (लगभग 1734); राजस्थान के आंतरिक मामलों में मराठा हस्तक्षेप का द्वार खुल गया |
ध्यान दें: अधिकांश पुस्तकें बूंदी को राजस्थान में मराठों के पहले प्रवेश का स्थान और वर्ष लगभग 1734 बताती हैं; कुछ पुस्तकों में घटनाक्रम के वर्ष एक-दो वर्ष आगे-पीछे मिलते हैं। परीक्षा में "बूंदी" उत्तर पक्का याद रखें।
4.2 जयपुर उत्तराधिकार संघर्ष — ईश्वरी सिंह बनाम माधोसिंह
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| विवाद की जड़ | सवाई जयसिंह का विवाह मेवाड़ की राजकुमारी से इस शर्त पर हुआ था कि उससे उत्पन्न पुत्र जयपुर का उत्तराधिकारी होगा; इस रानी से माधोसिंह उत्पन्न हुए, जबकि बड़े पुत्र ईश्वरी सिंह थे |
| 1743 | सवाई जयसिंह की मृत्यु; ईश्वरी सिंह गद्दी पर बैठे |
| माधोसिंह के समर्थक | मेवाड़ के महाराणा जगतसिंह द्वितीय और मराठा सरदार (विशेषकर मल्हारराव होल्कर) |
| राजमहल का युद्ध (1747) | ईश्वरी सिंह विजयी; इस विजय की स्मृति में जयपुर में ईसरलाट (सरगासूली) बनवाई |
| बगरू का युद्ध (1748) | माधोसिंह, मेवाड़ और मराठों की संयुक्त सेना से ईश्वरी सिंह पराजित; माधोसिंह को कुछ परगने देने पड़े |
| 1750 | मराठों की लगातार धन-माँग और दबाव से तंग आकर ईश्वरी सिंह ने आत्महत्या कर ली |
| परिणाम | माधोसिंह जयपुर के शासक बने; मराठों की माँगें फिर भी बनी रहीं और जयपुर में मराठों के प्रति आक्रोश बढ़ा |
जयपुर के कछवाहा शासकों का क्रमवार विवरण जयपुर रियासत के प्रमुख शासक नोट में है।
4.3 मारवाड़ उत्तराधिकार संघर्ष — जयप्पा सिंधिया की हत्या
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| विवाद | महाराजा अभयसिंह की मृत्यु के बाद उनके पुत्र रामसिंह और चाचा बख़्तसिंह (नागौर) में संघर्ष |
| बख़्तसिंह की विजय | बख़्तसिंह ने रामसिंह को हटाकर जोधपुर पर अधिकार किया; उनकी मृत्यु के बाद पुत्र विजयसिंह शासक बने |
| मराठों को बुलाना | रामसिंह ने गद्दी वापस पाने के लिए मराठा सरदार जयप्पा सिंधिया की सहायता ली |
| नागौर का घेरा | जयप्पा ने विजयसिंह को नागौर में घेर लिया |
| 1755 | नागौर में जयप्पा सिंधिया की हत्या कर दी गई (विजयसिंह की ओर से भेजे गए व्यक्तियों द्वारा) |
| परिणाम | मराठों और राठौड़ों में स्थायी शत्रुता; समझौते में मारवाड़ को धन देना पड़ा और अजमेर मराठों के प्रभाव में चला गया |
राठौड़ शासकों का पूरा क्रम मारवाड़ के प्रमुख शासक नोट में देखें।
5. चौथ और सरदेशमुखी
| कर | दर | स्वरूप |
|---|---|---|
| चौथ | राजस्व का 1/4 (25%) | मराठा आक्रमण और लूट से बचाव के बदले लिया जाने वाला कर; एक प्रकार का "सुरक्षा शुल्क" |
| सरदेशमुखी | राजस्व का 1/10 (10%) — अतिरिक्त | मराठा छत्रपति स्वयं को "सरदेशमुख" (प्रमुख देशमुख) मानकर यह वंशानुगत अधिकार के रूप में लेते थे |
| खंडनी / नज़राना | निश्चित नहीं | एकमुश्त राशि या युद्ध-व्यय के रूप में वसूली; राजस्थान में मराठे प्रायः यही बड़ी रकमें माँगते थे |
राजस्थान में मराठा वसूली नियमित प्रशासनिक कर न होकर सेना के बल पर की जाने वाली वसूली थी। भुगतान न होने पर गाँव लूटे जाते, फ़सलें नष्ट की जातीं और ज़मानत के रूप में परगने गिरवी रखवाए जाते।
6. राजस्थान में आने वाले प्रमुख मराठा सरदार
| घराना | प्रमुख सरदार | राजस्थान से संबंध |
|---|---|---|
| होल्कर (इंदौर) | मल्हारराव होल्कर | बूंदी (लगभग 1734) और जयपुर उत्तराधिकार में माधोसिंह का पक्ष; बगरू (1748) |
| होल्कर | यशवंतराव होल्कर | 19वीं सदी के आरंभ में राजस्थान में लूट; अंग्रेज़ों से संघर्ष में भरतपुर ने उसे शरण दी (1804–05) |
| सिंधिया (ग्वालियर) | राणोजी सिंधिया | बूंदी हस्तक्षेप में होल्कर के साथ |
| सिंधिया | जयप्पा सिंधिया | मारवाड़ में रामसिंह का पक्ष; 1755 में नागौर में हत्या |
| सिंधिया | महादजी सिंधिया | तुंगा (1787) में रुके; पाटन व मेड़ता (1790) में डी बोइन के नेतृत्व में विजय |
| सिंधिया | दौलतराव सिंधिया | 1818 में अंग्रेज़ों को अजमेर सौंपा |
7. महादजी सिंधिया और राजपूतों के युद्ध
| युद्ध | वर्ष | पक्ष | परिणाम |
|---|---|---|---|
| तुंगा (लालसोट) का युद्ध | 1787 | जयपुर के सवाई प्रतापसिंह + जोधपुर के विजयसिंह की राठौड़ सेना बनाम महादजी सिंधिया | राजपूतों की सफलता; महादजी को पीछे हटना पड़ा |
| पाटन का युद्ध | 1790 | महादजी की सेना (सेनापति डी बोइन) बनाम राजपूत (मुख्यतः जयपुर) सेनाएँ | मराठों की निर्णायक विजय |
| मेड़ता का युद्ध | 1790 | डी बोइन बनाम जोधपुर के विजयसिंह की राठौड़ सेना | राठौड़ पराजित; मारवाड़ को भारी धन देना पड़ा |
डी बोइन (Benoît de Boigne) फ्रांसीसी (सावॉय मूल का) सैन्य अधिकारी था, जिसने महादजी सिंधिया के लिए यूरोपीय ढंग से प्रशिक्षित पैदल सेना और तोपख़ाना तैयार किया। तुंगा में मिली राहत अस्थायी सिद्ध हुई; 1790 के बाद राजपूत राज्यों की सैन्य शक्ति टूट गई।
8. मराठा हस्तक्षेप का राजपूत राज्यों पर प्रभाव
| क्षेत्र | प्रभाव |
|---|---|
| आर्थिक | बार-बार की वसूली से राजकोष ख़ाली; राजाओं को साहूकारों से ऋण लेना और परगने गिरवी रखना पड़ा; खेती, व्यापार और उद्योग नष्ट |
| राजनीतिक | उत्तराधिकार में बाहरी शक्ति निर्णायक बनी; शासकों की प्रतिष्ठा और सत्ता घटी |
| सामंत-शासक संबंध | सामंत अलग-अलग दावेदारों का साथ देकर स्वयं शक्तिशाली हुए; आंतरिक कलह बढ़ी |
| सामाजिक | लूट और असुरक्षा से जनता का पलायन; गाँव उजड़े |
| क्षेत्रीय क्षति | अजमेर जैसे क्षेत्र मराठों के अधिकार में गए |
| दीर्घकालिक | मराठों के बाद पिंडारी आए; अंततः थके हुए राज्य ब्रिटिश संरक्षण स्वीकार करने को विवश हुए |
इतिहासकारों का दृष्टिकोण: राजस्थान के इतिहासकार प्रायः मानते हैं कि मराठे राजस्थान में साम्राज्य-निर्माता के रूप में नहीं, बल्कि धन-संग्रहकर्ता के रूप में आए। उन्होंने स्थायी प्रशासन नहीं दिया, इसलिए राजपूतों से उनका संबंध संघर्षपूर्ण रहा।
9. पिंडारी
पिंडारी अनियमित घुड़सवार लुटेरे थे, जो पहले मराठा सेनाओं (होल्कर, सिंधिया) के सहायक के रूप में लड़ते थे और वेतन के स्थान पर लूट का हिस्सा लेते थे। मराठा शक्ति कमज़ोर होने पर वे स्वतंत्र रूप से राजस्थान, मालवा और मध्य भारत में लूटपाट करने लगे।
| पिंडारी नेता | मुख्य तथ्य |
|---|---|
| अमीर ख़ाँ | यशवंतराव होल्कर से संबद्ध रहा; राजस्थान के राज्यों के झगड़ों में भाड़े पर हस्तक्षेप; कृष्णा कुमारी विवाद में भूमिका; 1817 में अंग्रेज़ों से संधि — टोंक का नवाब मान्य; टोंक रियासत का संस्थापक |
| करीम ख़ाँ | प्रमुख पिंडारी नेता; अंग्रेज़ी अभियान के बाद आत्मसमर्पण किया और उसे गोरखपुर क्षेत्र में जागीर देकर बसा दिया गया |
| चीतू | प्रमुख पिंडारी नेता; अंग्रेज़ों से बचकर जंगलों में भागा, जहाँ उसकी मृत्यु हुई (परंपरागत वर्णन — बाघ द्वारा मारा गया) |
लॉर्ड हेस्टिंग्स ने 1817–18 में बड़ा सैन्य अभियान चलाकर पिंडारियों का दमन किया। इसी के साथ तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध हुआ और मराठा शक्ति समाप्त हुई। टोंक के नवाबों का आगे का इतिहास टोंक रियासत का इतिहास नोट में है।
10. कृष्णा कुमारी विवाद (मेवाड़)
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| कृष्णा कुमारी | मेवाड़ के महाराणा भीमसिंह की पुत्री |
| पहला संबंध | विवाह-संबंध जोधपुर के महाराजा भीमसिंह से तय हुआ, पर विवाह से पहले उनकी मृत्यु हो गई |
| नया प्रस्ताव | संबंध जयपुर के जगतसिंह द्वितीय से तय किया गया |
| जोधपुर का दावा | जोधपुर के नए शासक मानसिंह ने कहा कि पूर्व सगाई के आधार पर कन्या जोधपुर की है |
| गींगोली का युद्ध | जयपुर और जोधपुर की सेनाएँ आमने-सामने; जयपुर की सेना ने मानसिंह को पराजित किया (प्रचलित वर्ष 1807) |
| अमीर ख़ाँ की भूमिका | संघर्ष में पक्ष बदलते हुए दोनों ओर से धन लिया और मेवाड़ पर दबाव डाला कि विवाद समाप्त करने के लिए कृष्णा कुमारी को या तो मानसिंह को ब्याहा जाए या उसकी मृत्यु हो |
| 1810 | दबाव में कृष्णा कुमारी को विष दिया गया और उसकी मृत्यु हुई; इसमें सरदार अजीतसिंह चूँडावत की भूमिका बताई जाती है |
| महत्व | राजपूत राज्यों की आपसी फूट, पिंडारियों के प्रभुत्व और मेवाड़ की असहायता का प्रतीक |
11. अंग्रेज़ों का आगमन: वेलेजली से लॉर्ड हेस्टिंग्स तक
11.1 वेलेजली और प्रारंभिक संधियाँ (1803)
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| नीति | लॉर्ड वेलेजली (1798–1805) की सहायक संधि — मराठों के विरुद्ध भारतीय राज्यों को अंग्रेज़ी संरक्षण में लाना |
| संदर्भ | द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध (1803–05) में सिंधिया-होल्कर के विरुद्ध राजस्थान के राज्यों का सहयोग लेना |
| अलवर | 1803 में संधि (महाराव राजा बख़्तावर सिंह); परीक्षाओं में इसे प्रायः राजस्थान की पहली रियासत बताया जाता है जिसने अंग्रेज़ों से संधि की |
| भरतपुर | 1803 में संधि (महाराजा रणजीत सिंह) |
| अन्य | जयपुर, जोधपुर आदि से भी इस दौर में संधि-प्रयास हुए, पर वे स्थायी नहीं रहे |
ध्यान दें: अलवर और भरतपुर दोनों की संधियाँ 1803 की हैं। अधिकांश परीक्षा-पुस्तकें अलवर को पहला बताती हैं, जबकि कुछ स्रोतों में भरतपुर की संधि की तिथि पहले मिलती है। इसलिए "1803 की पहली संधि" वाले प्रश्न में विकल्पों को ध्यान से पढ़ें।
11.2 भरतपुर का घेरा (1805)
भरतपुर के रणजीत सिंह ने अंग्रेज़ों से संधि के बावजूद उनके शत्रु यशवंतराव होल्कर को शरण दी। इस पर लॉर्ड लेक ने 1805 में भरतपुर के लोहागढ़ दुर्ग को घेरा और कई बार आक्रमण किए, पर दुर्ग नहीं जीत सका। अंततः संधि करनी पड़ी। यह घेरा अंग्रेज़ों की प्रसिद्ध असफलताओं में गिना जाता है; भरतपुर का दुर्ग बाद में 1826 में अंग्रेज़ों ने जीता।
11.3 अहस्तक्षेप का दौर (लगभग 1805–1813)
वेलेजली के बाद कॉर्नवालिस और जॉर्ज बार्लो के समय कंपनी ने अहस्तक्षेप की नीति अपनाई और राजस्थान के राज्यों से दूरी रखी। यही वह दौर है जब मराठे और पिंडारी (अमीर ख़ाँ) सबसे अधिक हावी रहे और कृष्णा कुमारी जैसी घटना हुई।
11.4 लॉर्ड हेस्टिंग्स (1813–1823) और सर्वोच्चता की नीति
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| नीति का नाम | अधीनस्थ पार्थक्य (Subordinate Isolation) / ब्रिटिश सर्वोच्चता (Paramountcy) |
| अर्थ | देशी राज्य अंग्रेज़ों के अधीन रहें और एक-दूसरे से अलग-थलग रहें; बाहरी संबंध केवल अंग्रेज़ों के माध्यम से |
| उद्देश्य | पिंडारियों और मराठों का अंत; मध्य भारत व राजपूताना में स्थायी शांति और ब्रिटिश प्रभुत्व |
| वार्ताकार | चार्ल्स मेटकाफ़ (दिल्ली का रेज़िडेंट) — राजपूत राज्यों से संधियों की बातचीत का दायित्व |
| परिणाम | 1817–18 में लगभग सभी राजपूत राज्य संधि द्वारा ब्रिटिश संरक्षण में आए |
12. 1817–18 की संधियाँ — राज्यवार तालिका
महत्वपूर्ण: संधियों की सटीक तिथियाँ और क्रम अलग-अलग पुस्तकों में भिन्न मिलते हैं। नीचे दिया क्रम परीक्षा-पुस्तकों में प्रचलित क्रम है। करौली और टोंक (अमीर ख़ाँ) के समझौतों की तिथियाँ कुछ पुस्तकों में कोटा से पहले मिलती हैं, फिर भी परीक्षा-पुस्तकों में राजपूत राज्यों के क्रम में जिन दो तथ्यों को सामान्यतः स्वीकार किया जाता है, वे हैं — सबसे पहले कोटा (1817) और सबसे अंत में सिरोही (1823)।
| क्र. | राज्य | वर्ष (प्रचलित माह) | शासक | टिप्पणी |
|---|---|---|---|---|
| 1 | कोटा | 1817 (दिसंबर) | महाराव उम्मेद सिंह | वास्तविक सत्ता फ़ौजदार/संरक्षक झाला ज़ालिम सिंह के हाथ में; प्रायः पहली संधि |
| 2 | करौली | 1817 | हरबख़्श पाल | कुछ पुस्तकों में इसकी तिथि कोटा से पहले मिलती है |
| 3 | टोंक | 1817 | अमीर ख़ाँ | पिंडारी नेता; इसी संधि से टोंक का नवाब मान्य; कुछ पुस्तकों में इसकी तिथि भी कोटा से पहले मिलती है |
| 4 | जोधपुर | 1818 (जनवरी) | मानसिंह | — |
| 5 | मेवाड़ (उदयपुर) | 1818 (जनवरी) | महाराणा भीमसिंह | — |
| 6 | बूंदी | 1818 (फ़रवरी) | विष्णु सिंह | — |
| 7 | बीकानेर | 1818 (मार्च) | सूरत सिंह | — |
| 8 | किशनगढ़ | 1818 (मार्च) | कल्याण सिंह | — |
| 9 | जयपुर | 1818 (अप्रैल) | जगतसिंह द्वितीय | — |
| 10 | प्रतापगढ़ | 1818 (अक्टूबर) | सामंत सिंह | — |
| 11 | डूंगरपुर | 1818 (दिसंबर) | जसवंत सिंह द्वितीय | — |
| 12 | जैसलमेर | 1818 (दिसंबर) | मूलराज द्वितीय | — |
| 13 | बांसवाड़ा | 1818 | — | माह और शासक के नाम पर स्रोतों में भिन्नता, इसलिए यहाँ नहीं दिए |
| 14 | सिरोही | 1823 | शिव सिंह | सबसे अंत में संधि करने वाली रियासत |
कोटा का विशेष प्रसंग: 1817 की संधि के साथ 1818 में जोड़ी गई पूरक धारा द्वारा कोटा राज्य का प्रशासन ज़ालिम सिंह और उसके वंशजों को वंशानुगत रूप से सौंपा गया। इससे महाराव और झाला वंश में तनाव बढ़ा, जिसका समाधान 1838 में कोटा से अलग करके झालावाड़ राज्य बनाकर किया गया। विस्तार के लिए कोटा के हाड़ा चौहान राजवंश नोट देखें।
13. संधियों की प्रमुख शर्तें
| शर्त | विवरण |
|---|---|
| ब्रिटिश संरक्षण | अंग्रेज़ राज्य की बाहरी आक्रमण से रक्षा करेंगे |
| विदेश संबंधों पर रोक | राज्य अंग्रेज़ों की अनुमति के बिना किसी अन्य राज्य से संधि, पत्र-व्यवहार या संबंध नहीं रखेगा; आपसी विवादों में अंग्रेज़ मध्यस्थ होंगे |
| खिराज (Tribute) | राज्य अंग्रेज़ों को निश्चित वार्षिक खिराज देगा; जो राशि पहले मराठों को जाती थी, वह प्रायः अब अंग्रेज़ों को मिलने लगी |
| ब्रिटिश सर्वोच्चता | राज्य अंग्रेज़ों की सर्वोच्चता स्वीकार करेगा और उनके अधीन सहयोग करेगा |
| सैनिक सहायता | आवश्यकता पड़ने पर राज्य अपनी सेना अंग्रेज़ों की सेवा में देगा |
| आंतरिक स्वायत्तता | लिखित रूप में शासक आंतरिक मामलों में स्वतंत्र रहेंगे — पर व्यवहार में रेज़िडेंट और पोलिटिकल एजेंट हस्तक्षेप करते रहे |
14. संधियों के परिणाम
| सकारात्मक (तात्कालिक) | नकारात्मक (दीर्घकालिक) |
|---|---|
| मराठों और पिंडारियों की लूट से मुक्ति | राज्यों की बाहरी संप्रभुता समाप्त; शासक अंग्रेज़ों पर निर्भर |
| राज्यों की सीमाएँ स्थिर हुईं | खिराज का स्थायी आर्थिक बोझ |
| शांति से खेती और व्यापार कुछ सुधरे | आंतरिक मामलों में ब्रिटिश अधिकारियों का बढ़ता हस्तक्षेप |
| सामंतों के विद्रोह पर शासकों को अंग्रेज़ी सहायता | शासक-सामंत संबंध बिगड़े; सामंत अंग्रेज़ों से असंतुष्ट हुए |
| — | शासक जनता से दूर हुए; यही असंतोष 1857 और आगे के आंदोलनों की पृष्ठभूमि बना |
15. अजमेर, AGG और ब्रिटिश प्रशासनिक ढाँचा
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| अजमेर ब्रिटिश क्षेत्र | 1818 में दौलतराव सिंधिया से हुई संधि द्वारा अजमेर अंग्रेज़ों को मिला; यह राजपूताना के बीच सीधा ब्रिटिश शासित क्षेत्र बना (बाद में अजमेर-मेरवाड़ा) |
| AGG का पद | 1832 में राजपूताना के लिए एजेंट टू द गवर्नर-जनरल (AGG) नियुक्त |
| मुख्यालय | प्रारंभ में अजमेर; बाद में माउंट आबू |
| प्रथम AGG | मिस्टर लॉकेट (Lockett) |
| भूमिका | सभी राजपूताना राज्यों से ब्रिटिश सरकार के संबंधों का समन्वय; पोलिटिकल एजेंटों पर नियंत्रण |
| पोलिटिकल एजेंट / रेज़िडेंट | बड़े राज्यों या राज्य-समूहों में नियुक्त ब्रिटिश अधिकारी; शासकों को "परामर्श" देते और व्यवहार में प्रशासन, उत्तराधिकार और सामंत-विवादों में निर्णायक बनते |
| नाबालिग शासक | शासक के नाबालिग होने पर अंग्रेज़ प्रायः रीजेंसी कौंसिल बनाकर प्रशासन अपने नियंत्रण में ले लेते |
यह ढाँचा स्वतंत्रता तक बना रहा। 1947 के बाद इन्हीं रियासतों और अजमेर-मेरवाड़ा को मिलाकर वर्तमान राजस्थान बना।
16. परीक्षा में कौन-सी गलतियाँ होती हैं? (Exam Trap)
Trap 1: मराठों का पहला प्रवेश — बूंदी, जयपुर नहीं
पहला मराठा हस्तक्षेप बूंदी उत्तराधिकार में (बुधसिंह की रानी का निमंत्रण, लगभग 1734)। जयपुर का ईश्वरी सिंह-माधोसिंह संघर्ष इसके बाद (1743 के पश्चात) आता है।
Trap 2: राजमहल बनाम बगरू
राजमहल (1747) — ईश्वरी सिंह जीते, ईसरलाट बनी। बगरू (1748) — ईश्वरी सिंह हारे (मराठे माधोसिंह के साथ)। दोनों को उलटकर विकल्प बनाए जाते हैं।
Trap 3: जयप्पा की हत्या — नागौर, जोधपुर नहीं
जयप्पा सिंधिया 1755 में नागौर के घेरे के दौरान मारा गया; उस समय मारवाड़ के शासक विजयसिंह थे, रामसिंह नहीं।
Trap 4: तुंगा में राजपूत जीते, पाटन-मेड़ता में हारे
तुंगा (1787) — महादजी रुके। पाटन और मेड़ता (दोनों 1790) — डी बोइन के कारण मराठा विजय।
Trap 5: चौथ 1/4, सरदेशमुखी 1/10
चौथ = 25%, सरदेशमुखी = 10% अतिरिक्त। विकल्पों में प्रायः ये दरें उलटकर दी जाती हैं।
Trap 6: अमीर ख़ाँ — मराठा नहीं, पिंडारी
अमीर ख़ाँ पिंडारी नेता था (होल्कर से संबद्ध), जो 1817 की संधि से टोंक का नवाब बना। "टोंक का संस्थापक" — अमीर ख़ाँ।
Trap 7: 1803 की संधि बनाम 1818 की संधियाँ
1803 — वेलेजली, सहायक संधि नीति (अलवर, भरतपुर)। 1817–18 — लॉर्ड हेस्टिंग्स, सर्वोच्चता/अधीनस्थ पार्थक्य, मेटकाफ़। "1818 की पहली संधि" में अलवर विकल्प प्रायः भ्रम के लिए रखा जाता है; उत्तर कोटा।
Trap 8: लॉर्ड लेक बनाम लॉर्ड हेस्टिंग्स
भरतपुर का असफल घेरा (1805) — लॉर्ड लेक (सेनापति)। 1818 की संधियाँ — लॉर्ड हेस्टिंग्स (गवर्नर-जनरल)। लॉर्ड हेस्टिंग्स को वारेन हेस्टिंग्स से न मिलाएँ।
Trap 9: अजमेर 1818, AGG 1832
अजमेर ब्रिटिश क्षेत्र — 1818 (सिंधिया से)। AGG — 1832 (अजमेर में)। माउंट आबू मुख्यालय बाद में बना, प्रारंभ में नहीं।
Trap 10: कोटा में संधि किसने की?
संधि महाराव उम्मेद सिंह के नाम हुई, पर वार्ता और वास्तविक सत्ता झाला ज़ालिम सिंह की थी। प्रश्न "किसके प्रभाव में" पूछे तो उत्तर ज़ालिम सिंह।
17. Most-Asked रिवीज़न तालिका (40 तथ्य)
| क्र. | प्रश्न-बिंदु | उत्तर |
|---|---|---|
| 1 | औरंगज़ेब की मृत्यु | 1707 |
| 2 | उत्तर-विस्तार नीति वाले पेशवा | बाजीराव प्रथम |
| 3 | राजस्थान में मराठों का पहला प्रवेश | बूंदी (लगभग 1734) |
| 4 | बूंदी के अपदस्थ शासक | बुधसिंह |
| 5 | जयसिंह द्वारा बूंदी की गद्दी पर बैठाए गए | दलेलसिंह |
| 6 | मराठों को बूंदी बुलाने वाली | बुधसिंह की कछवाही रानी |
| 7 | हुरड़ा सम्मेलन का स्थान | हुरड़ा (भीलवाड़ा) |
| 8 | हुरड़ा सम्मेलन की अध्यक्षता | महाराणा जगतसिंह द्वितीय |
| 9 | सवाई जयसिंह की मृत्यु | 1743 |
| 10 | जयपुर उत्तराधिकार के दावेदार | ईश्वरी सिंह बनाम माधोसिंह |
| 11 | माधोसिंह की माता | मेवाड़ की राजकुमारी |
| 12 | राजमहल का युद्ध | 1747 — ईश्वरी सिंह विजयी |
| 13 | ईसरलाट (सरगासूली) | ईश्वरी सिंह, जयपुर |
| 14 | बगरू का युद्ध | 1748 — ईश्वरी सिंह पराजित |
| 15 | ईश्वरी सिंह की आत्महत्या | 1750 |
| 16 | मारवाड़ उत्तराधिकार | रामसिंह बनाम बख़्तसिंह (फिर विजयसिंह) |
| 17 | रामसिंह के सहायक मराठा | जयप्पा सिंधिया |
| 18 | जयप्पा की हत्या | 1755, नागौर |
| 19 | चौथ | राजस्व का 1/4 |
| 20 | सरदेशमुखी | राजस्व का 1/10 |
| 21 | तुंगा (लालसोट) का युद्ध | 1787 — महादजी रुके |
| 22 | तुंगा में जयपुर शासक | सवाई प्रतापसिंह |
| 23 | पाटन का युद्ध | 1790 — मराठा विजय |
| 24 | मेड़ता का युद्ध | 1790 — राठौड़ पराजित |
| 25 | महादजी का फ्रांसीसी सेनापति | डी बोइन |
| 26 | टोंक का संस्थापक | अमीर ख़ाँ पिंडारी |
| 27 | अमीर ख़ाँ की अंग्रेज़ों से संधि | 1817 |
| 28 | अन्य पिंडारी नेता | करीम ख़ाँ, चीतू |
| 29 | कृष्णा कुमारी के पिता | महाराणा भीमसिंह (मेवाड़) |
| 30 | कृष्णा कुमारी की मृत्यु | 1810 (विष) |
| 31 | कृष्णा कुमारी के लिए प्रतिद्वंद्वी | जयपुर के जगतसिंह द्वितीय, जोधपुर के मानसिंह |
| 32 | सहायक संधि | लॉर्ड वेलेजली |
| 33 | 1803 में संधि करने वाले राज्य | अलवर, भरतपुर |
| 34 | भरतपुर का असफल घेरा | 1805 — लॉर्ड लेक |
| 35 | भरतपुर ने किसे शरण दी | यशवंतराव होल्कर |
| 36 | अधीनस्थ पार्थक्य / सर्वोच्चता नीति | लॉर्ड हेस्टिंग्स |
| 37 | 1818 की संधियों के वार्ताकार | चार्ल्स मेटकाफ़ |
| 38 | पहली संधि / अंतिम संधि | कोटा (1817, परीक्षा-पुस्तकों में) / सिरोही (1823) |
| 39 | अजमेर ब्रिटिश क्षेत्र | 1818 — सिंधिया से |
| 40 | AGG | 1832 — अजमेर; बाद में माउंट आबू |
18. परीक्षा में यह टॉपिक कैसे पूछा जाता है
नीचे दिए नमूना प्रश्न इस नोट के लिए बनाए गए अभ्यास-उदाहरण हैं, किसी विशेष पिछले पेपर के प्रश्न नहीं।
- सुमेलन: सूची-I (युद्ध/घटना) — बगरू, तुंगा, मेड़ता, नागौर; सूची-II — ईश्वरी सिंह की पराजय, महादजी को रोका गया, डी बोइन की विजय, जयप्पा की हत्या। संकेत: क्रम सीधा है।
- कालक्रम: (i) बगरू का युद्ध (ii) तुंगा का युद्ध (iii) जयप्पा की हत्या (iv) कृष्णा कुमारी की मृत्यु — सही क्रम: (i) 1748 → (iii) 1755 → (ii) 1787 → (iv) 1810।
- कथन-आधारित: "1. 1818 की संधियों से राजपूत राज्यों के विदेश संबंध अंग्रेज़ों के अधीन हो गए। 2. AGG का प्रारंभिक मुख्यालय माउंट आबू था।" — केवल कथन 1 सही।
- अभिकथन-कारण: A — राजपूत राज्यों ने 1817–18 में ब्रिटिश संरक्षण स्वीकार किया। R — मराठों और पिंडारियों की लूट से राज्य आर्थिक व सैन्य रूप से टूट चुके थे। — A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या।
- "पहला/अंतिम": "1817–18 की संधियों के क्रम में सबसे अंत में संधि करने वाली रियासत?" — सिरोही।
- व्यक्ति-पहचान: "किस पिंडारी नेता को अंग्रेज़ों ने नवाब के रूप में मान्यता दी?" — अमीर ख़ाँ (टोंक)।
19. इसे आसानी से याद कैसे रखें?
1. तीन उत्तराधिकार, तीन राज्य — "बू-ज-मा": बूंदी (लगभग 1734, पहला) → जयपुर (बगरू 1748, आत्महत्या 1750) → मारवाड़ (जयप्पा 1755)। क्रम भी यही है।
2. "राजमहल में राज, बगरू में बर्बादी": ईश्वरी सिंह राजमहल (1747) में जीते, बगरू (1748) में हारे।
3. "चौथ = चौथाई": चौथ में "चौथाई" (1/4) छिपा है; सरदेशमुखी उससे छोटा, राजस्व का दसवाँ हिस्सा — 1/10।
4. महादजी सूत्र — "87 में तुंगा रोका, 90 में डी बोइन ने ठोका": तुंगा 1787 (राजपूत), पाटन-मेड़ता 1790 (मराठा)।
5. संधियों का पहला-अंतिम — "को से सि": कोटा से शुरू, सिरोही पर ख़त्म (1817 → 1823)।
6. "18 में अजमेर, 32 में AGG": अजमेर 1818 सिंधिया से; AGG 1832 अजमेर में, बाद में आबू।
20. कथन अभ्यास
सवाई जयसिंह ने बुधसिंह को हटाकर दलेलसिंह को बूंदी की गद्दी पर बैठाया। — सही।
बगरू के युद्ध में ईश्वरी सिंह विजयी हुए। — गलत (बगरू 1748 में पराजित; राजमहल 1747 में विजयी)।
ईसरलाट का निर्माण ईश्वरी सिंह ने करवाया। — सही।
जयप्पा सिंधिया की हत्या जोधपुर दुर्ग में हुई। — गलत (नागौर, 1755)।
चौथ राजस्व का एक-चौथाई भाग था। — सही।
तुंगा के युद्ध में महादजी सिंधिया ने राजपूतों को निर्णायक रूप से हराया। — गलत (तुंगा 1787 में महादजी को पीछे हटना पड़ा)।
डी बोइन महादजी सिंधिया का सेनापति था। — सही।
टोंक रियासत की स्थापना अमीर ख़ाँ पिंडारी ने की। — सही।
कृष्णा कुमारी मारवाड़ की राजकुमारी थी। — गलत (मेवाड़ के महाराणा भीमसिंह की पुत्री)।
1805 में लॉर्ड लेक ने भरतपुर दुर्ग जीत लिया। — गलत (घेरा असफल रहा)।
1818 की संधियों के समय गवर्नर-जनरल लॉर्ड हेस्टिंग्स थे। — सही।
AGG का पद 1832 में सृजित हुआ और प्रारंभिक मुख्यालय अजमेर था। — सही।
21. एक दिन पहले — 14 रेखाएँ
- 1707 के बाद मुगल पतन; बाजीराव प्रथम के समय मराठे उत्तर की ओर
- पहला मराठा प्रवेश — बूंदी (लगभग 1734): बुधसिंह बनाम दलेलसिंह, जयसिंह दलेल के पक्ष में, कछवाही रानी ने मराठों को बुलाया
- हुरड़ा सम्मेलन 1734 — अध्यक्ष महाराणा जगतसिंह द्वितीय; योजना असफल
- जयपुर — ईश्वरी सिंह बनाम माधोसिंह; राजमहल 1747 (ईश्वरी जीते, ईसरलाट), बगरू 1748 (हारे), आत्महत्या 1750
- मारवाड़ — रामसिंह बनाम बख़्तसिंह/विजयसिंह; जयप्पा सिंधिया की नागौर में हत्या 1755
- चौथ 1/4, सरदेशमुखी 1/10
- होल्कर — मल्हारराव, यशवंतराव; सिंधिया — राणोजी, जयप्पा, महादजी, दौलतराव
- तुंगा 1787 — महादजी रुके; पाटन व मेड़ता 1790 — डी बोइन की विजय
- पिंडारी — अमीर ख़ाँ (टोंक, 1817 में नवाब मान्य), करीम ख़ाँ, चीतू
- कृष्णा कुमारी — मेवाड़, भीमसिंह की पुत्री; जयपुर-जोधपुर प्रतिद्वंद्विता; 1810 में विष
- 1803 — वेलेजली, अलवर व भरतपुर से संधि; 1805 — लॉर्ड लेक का भरतपुर घेरा असफल
- लॉर्ड हेस्टिंग्स — अधीनस्थ पार्थक्य/सर्वोच्चता; वार्ताकार चार्ल्स मेटकाफ़
- संधियाँ — पहली कोटा 1817 (ज़ालिम सिंह), अंतिम सिरोही 1823; शर्तें — संरक्षण, विदेश संबंधों पर रोक, खिराज
- अजमेर 1818 सिंधिया से; AGG 1832 अजमेर, बाद में माउंट आबू
22. अभ्यास
नोट पढ़ने के बाद इस पेज के अंत में दिए 25 प्रश्नों का क्विज़ हल करें। जिन प्रश्नों में गलती हो, उनके लिए खंड 4 (उत्तराधिकार संघर्ष) और खंड 7 (युद्ध-तालिका) दोहराएँ; संधियों के प्रश्नों में केवल पहला-अंतिम और शर्तें पक्की करें, क्योंकि बीच का क्रम पुस्तकों में भिन्न है। पूरे राजस्थान GK के मिश्रित अभ्यास के लिए राजस्थान CET स्नातक फ़ाइनल मेगा टेस्ट सीरीज़ 2026 हल करें।
23. निष्कर्ष: परीक्षा के लिए क्या याद रखें?
राजस्थान में मराठा हस्तक्षेप किसी बाहरी आक्रमण से कम और राजपूत राज्यों की आंतरिक फूट से अधिक संभव हुआ — बूंदी, जयपुर और मारवाड़ के उत्तराधिकार संघर्षों में दावेदारों ने स्वयं मराठों को बुलाया। चौथ, नज़राने और लूट ने राज्यों को आर्थिक रूप से खोखला किया, और मराठों के बाद पिंडारियों ने अराजकता को चरम पर पहुँचाया। इसी थकान का लाभ उठाकर लॉर्ड हेस्टिंग्स ने 1817–18 में संधियों द्वारा पूरे राजपूताना को ब्रिटिश सर्वोच्चता में ले लिया। परीक्षा के लिए तीन चीज़ें सबसे महत्वपूर्ण हैं — तीन उत्तराधिकार संघर्षों का क्रम, महादजी के युद्ध, और संधियों का पहला-अंतिम राज्य तथा उनकी शर्तें।
बूंदी ~1734 → बगरू 1748 → ईश्वरी सिंह 1750 → जयप्पा 1755 (नागौर) | तुंगा 1787 · पाटन-मेड़ता 1790 | कृष्णा कुमारी 1810 | कोटा 1817 पहली, सिरोही 1823 अंतिम | अजमेर 1818 · AGG 1832
इस टॉपिक का क्विज़ कहाँ दें?
“राजस्थान में मराठा हस्तक्षेप, पिंडारी और 1817–18 की ब्रिटिश संधियाँ — RAS/CET” पढ़ने के बाद इन क्विज़ से तुरंत दोहराएँ — गलत उत्तर वाले बिंदु नोट में दोबारा देखें।
- राजस्थान में मराठा हस्तक्षेप और 1818 की संधियाँ — अभ्यास क्विज़25 प्रश्नों से खुद को परखें
- वृहद राजस्थान का निर्माण — अभ्यास क्विज़अभ्यास शुरू करें
- टोंक रियासत का इतिहास — अभ्यास क्विज़20 प्रश्नों का क्विज़ दें
- तराइन के प्रथम एवं द्वितीय युद्ध (1191–1192) — अभ्यास क्विज़अपनी तैयारी जाँचें
पूरे सिलेबस का अभ्यास: हिंदी व्याकरण Mega टेस्ट सीरीज़ 2026 — पहला टेस्ट फ्री आज़माएँ

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महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)
सामान्यतः बूंदी को राजस्थान में मराठों के पहले प्रवेश का स्थान माना जाता है। बुधसिंह और सवाई जयसिंह-समर्थित दलेलसिंह के संघर्ष में बुधसिंह की कछवाही रानी ने मराठा सरदारों को बुलाया; यह घटना लगभग 1734 की मानी जाती है।
1734 में मराठों के बढ़ते दबाव के विरुद्ध राजपूत शासकों का संयुक्त मोर्चा बनाने के लिए सवाई जयसिंह की पहल पर हुरड़ा (भीलवाड़ा) में सम्मेलन हुआ। अध्यक्षता महाराणा जगतसिंह द्वितीय ने की, पर आपसी फूट के कारण योजना लागू नहीं हुई।
1743 में सवाई जयसिंह की मृत्यु के बाद ईश्वरी सिंह और माधोसिंह में उत्तराधिकार संघर्ष हुआ। माधोसिंह ने मेवाड़ और मराठों की सहायता ली; 1748 में बगरू में ईश्वरी सिंह हारे और 1750 में मराठों के दबाव में उन्होंने आत्महत्या कर ली।
मारवाड़ में रामसिंह के पक्ष में आए जयप्पा सिंधिया ने विजयसिंह को नागौर में घेरा, जहाँ 1755 में उसकी हत्या कर दी गई। इससे मराठों और राठौड़ों में स्थायी शत्रुता पैदा हुई।
चौथ राजस्व का 1/4 भाग था, जिसे मराठे आक्रमण न करने के बदले लेते थे। सरदेशमुखी इसके अतिरिक्त राजस्व का 1/10 भाग था, जिसे वे सरदेशमुख होने के वंशानुगत अधिकार के रूप में माँगते थे।
1787 में तुंगा (लालसोट) में जयपुर और जोधपुर की सेनाओं ने महादजी सिंधिया को पीछे हटने पर विवश किया। पर 1790 में पाटन और मेड़ता में महादजी के सेनापति डी बोइन ने राजपूतों को निर्णायक रूप से हराया।
अमीर ख़ाँ होल्कर से संबद्ध पिंडारी नेता था, जिसने राजस्थान के राज्यों के झगड़ों में भाड़े पर हस्तक्षेप किया और कृष्णा कुमारी विवाद में भी भूमिका निभाई। 1817 में अंग्रेज़ों से संधि कर वह टोंक का नवाब माना गया और टोंक रियासत का संस्थापक बना।
मेवाड़ के महाराणा भीमसिंह की पुत्री कृष्णा कुमारी के विवाह को लेकर जयपुर के जगतसिंह द्वितीय और जोधपुर के मानसिंह में संघर्ष हुआ। अमीर ख़ाँ के दबाव में 1810 में कृष्णा कुमारी को विष देकर विवाद समाप्त किया गया।
परीक्षा-पुस्तकों में सामान्यतः कोटा (1817) को पहला और सिरोही (1823) को अंतिम बताया जाता है। तिथि के अनुसार करौली व टोंक की संधियाँ (नवंबर 1817) कोटा (दिसंबर 1817) से पहले की हैं, इसलिए बीच के राज्यों का क्रम पुस्तकों में भिन्न मिलता है।
AGG (एजेंट टू द गवर्नर-जनरल) राजपूताना के राज्यों से ब्रिटिश संबंधों का प्रमुख अधिकारी था। यह पद 1832 में बना; मुख्यालय पहले अजमेर में था और बाद में माउंट आबू ले जाया गया।
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