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सर्वोच्च न्यायालय का अधिकार क्षेत्र: मूल, अपीलीय एवं सलाहकारी क्षेत्राधिकार

योगेश जांगिड़योगेश जांगिड़ (सॉफ्टवेयर इंजीनियर और लेखक)
17 अक्टूबर 2026
अंतिम समीक्षा: 17 अक्टूबर 2026
17 मिनट पठन

कैसे बना: यह नोट सुयोग अकादमी के लेखक ने परीक्षा सिलेबस के अनुसार लिखा/संपादित किया है। अंतिम समीक्षा तिथि ऊपर है। त्रुटि दिखे तो संपर्क करें। टीम परिचय

स्रोत आधार: भारत का संविधान (मूल पाठ व नवीनतम संशोधन), RPSC RAS, UPSC CSE एवं राष्ट्रीय प्रतियोगी परीक्षाओं का आधिकारिक पाठ्यक्रम। शब्दशः पुस्तक पाठ नहीं।

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सर्वोच्च न्यायालय का अधिकार क्षेत्र: मूल, अपीलीय एवं सलाहकारी क्षेत्राधिकार

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नोट्स के मुख्य बिंदु, मॉक MCQ या डाउट पूछें

⚡ Quick Answer: सर्वोच्च न्यायालय का अधिकार क्षेत्र (अनु. 129–143) सात भागों में समझा जाता है — (1) मूल क्षेत्राधिकार (अनु. 131): केंद्र–राज्य व अंतर्राज्यीय विवाद, केवल सर्वोच्च न्यायालय में (अनन्य); (2) रिट क्षेत्राधिकार (अनु. 32): मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन हेतु — उच्च न्यायालय (अनु. 226) के साथ समवर्ती; (3) अपीलीय क्षेत्राधिकार: संवैधानिक (132), सिविल (133), आपराधिक (134) मामले तथा विशेष अनुमति याचिका (अनु. 136); (4) सलाहकारी क्षेत्राधिकार (अनु. 143): राष्ट्रपति को परामर्श — बाध्यकारी नहीं; (5) अभिलेख न्यायालय (अनु. 129) व अवमानना हेतु दंड; (6) पुनर्विलोकन (अनु. 137) व क्यूरेटिव याचिका; (7) पूर्ण न्याय (अनु. 142)। राष्ट्रपति-निर्वाचन विवाद (अनु. 71) भी केवल सर्वोच्च न्यायालय सुनता है।

🕒 करेंट अपडेट (अक्टूबर 2026 तक): तमिलनाडु राज्यपाल मामले (अप्रैल 2025) में विधेयकों पर स्वीकृति हेतु समय-सीमा तय किए जाने के बाद राष्ट्रपति ने मई 2025 में अनु. 143 के अंतर्गत 14 प्रश्नों का संदर्भ भेजा। 20 नवंबर 2025 को 5-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने परामर्श दिया कि राज्यपाल/राष्ट्रपति पर न्यायालय निश्चित समय-सीमा नहीं थोप सकते और ‘मानी गई स्वीकृति (deemed assent)’ संभव नहीं, पर लंबी, अस्पष्टीकृत निष्क्रियता पर सीमित न्यायिक समीक्षा हो सकती है। यह परामर्श अनु. 143 के व्यवहार का नवीनतम उदाहरण है। संविधान संशोधन व न्यायिक व्याख्याएँ बदलती रहती हैं — परीक्षा से पहले करेंट अफेयर्स से मिलाएँ।

📌 सर्वोच्च न्यायालय का अधिकार क्षेत्र — एक नज़र में

  1. मूल (अनन्य): अनु. 131 — केंद्र-राज्य/राज्य-राज्य विवाद
  2. रिट: अनु. 32 — मौलिक अधिकार (HC के साथ समवर्ती)
  3. अपीलीय: अनु. 132 (संवैधानिक), 133 (सिविल), 134 (आपराधिक)
  4. विशेष अनुमति: अनु. 136 — सैन्य न्यायाधिकरण को छोड़कर
  5. सलाहकारी: अनु. 143 — परामर्श राष्ट्रपति पर बाध्यकारी नहीं
  6. अभिलेख न्यायालय: अनु. 129 — अवमानना हेतु दंड
  7. पुनर्विलोकन: अनु. 137; क्यूरेटिव — रूपा हुर्रा (2002)
  8. पूर्ण न्याय: अनु. 142

1. अधिकार क्षेत्र का वर्गीकरण

भारत का सर्वोच्च न्यायालय विश्व के सबसे शक्तिशाली शीर्ष न्यायालयों में गिना जाता है — यह एक साथ संघीय न्यायालय (केंद्र–राज्य विवाद), संवैधानिक न्यायालय (संविधान का अंतिम निर्वचन), अपील का अंतिम न्यायालय, मौलिक अधिकारों का संरक्षक और राष्ट्रपति का सलाहकार है। इसके क्षेत्राधिकार का आधार संविधान, संसद की विधियाँ (अनु. 138, 139) और स्वयं न्यायालय के नियम (अनु. 145) हैं।

क्षेत्राधिकारअनुच्छेदप्रकृति
मूल (Original)131अनन्य — केवल SC
रिट (Writ)32मूल, किंतु HC के साथ समवर्ती
अपीलीय (Appellate)132, 133, 134, 134AHC के प्रमाणपत्र/विधि के अनुसार
विशेष अनुमति (SLP)136विवेकाधीन, व्यापकतम
सलाहकारी (Advisory)143राष्ट्रपति द्वारा संदर्भ
अभिलेख न्यायालय129अवमानना हेतु दंड
पुनर्विलोकन (Review)137अपने निर्णयों की समीक्षा
अन्य71, 139A, 142, 317राष्ट्रपति चुनाव, अंतरण, पूर्ण न्याय, UPSC सदस्य जाँच

2. मूल क्षेत्राधिकार (अनु. 131)

संघीय विवादों को सीधे और केवल सर्वोच्च न्यायालय सुनता है — इसे अनन्य मूल क्षेत्राधिकार कहते हैं। विवाद निम्न पक्षों के बीच होना चाहिए —

  1. भारत सरकार और एक या अधिक राज्यों के बीच;
  2. एक ओर भारत सरकार व कोई राज्य/राज्य और दूसरी ओर एक या अधिक अन्य राज्यों के बीच;
  3. दो या अधिक राज्यों के बीच।

शर्त: विवाद में ऐसा विधि या तथ्य का प्रश्न हो जिस पर किसी विधिक अधिकार का अस्तित्व या विस्तार निर्भर हो। निजी व्यक्ति अनु. 131 के अंतर्गत वाद नहीं ला सकता।

अनु. 131 के बाहर (अपवाद)

  • संविधान-पूर्व की संधि, करार, सनद आदि से उत्पन्न विवाद (अनु. 131 का परंतुक) — इन पर अनु. 143(2) में परामर्श।
  • अंतरराज्यीय जल विवाद — अनु. 262 के अंतर्गत संसद ने SC का क्षेत्राधिकार वर्जित किया (अंतरराज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956)।
  • वित्त आयोग को सौंपे मामले (अनु. 280)।
  • केंद्र–राज्य के बीच कुछ व्यय व पेंशन का समायोजन (अनु. 290)।
  • केंद्र द्वारा राज्य के विरुद्ध क्षतिपूर्ति का सामान्य वाणिज्यिक दावा।
उदाहरणवर्षविषय
पश्चिम बंगाल बनाम भारत संघ1962कोयला क्षेत्र अधिग्रहण — प्रारंभिक प्रमुख वाद
राजस्थान राज्य बनाम भारत संघ1977राज्य विधानसभाएँ भंग करने की केंद्र की सलाह (अनु. 356) — याचिका खारिज
केरल बनाम भारत संघ2023–24राज्य की उधार सीमा — संविधान पीठ को संदर्भित
पश्चिम बंगाल बनाम भारत संघ2024CBI जाँच हेतु सामान्य सहमति वापसी — वाद सुनवाई योग्य माना

केंद्र–राज्य विवादों की पृष्ठभूमि केंद्र–राज्य संबंध व जल विवाद अंतरराज्यीय परिषद व अंतरराज्यीय विवाद में देखें।

3. रिट क्षेत्राधिकार (अनु. 32) — मूल किंतु समवर्ती

मौलिक अधिकारों के उल्लंघन पर कोई भी व्यक्ति सीधे सर्वोच्च न्यायालय जा सकता है — अनु. 32 स्वयं एक मौलिक अधिकार है, जिसे डॉ. अंबेडकर ने संविधान का ‘हृदय और आत्मा’ कहा। सर्वोच्च न्यायालय पाँच रिट जारी करता है — बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, उत्प्रेषण, अधिकार-पृच्छा।

आधारसर्वोच्च न्यायालय (अनु. 32)उच्च न्यायालय (अनु. 226)
उद्देश्यकेवल मौलिक अधिकारमौलिक अधिकार + ‘अन्य किसी प्रयोजन’ (विधिक अधिकार)
प्रकृतिमौलिक अधिकार — अस्वीकार नहीं कर सकताविवेकाधीन
निलंबनआपातकाल में अनु. 359 सेआपातकाल में भी समाप्त नहीं
क्षेत्रसंपूर्ण भारतराज्य/अधिकार-क्षेत्र तक

पाँचों रिट का विस्तृत अध्ययन संवैधानिक उपचार का अधिकार: अनु. 32 व पाँच रिट में करें।

🎯 सर्वोच्च न्यायालय का अधिकार क्षेत्र — अभ्यास

अनु. 131 के अपवाद, अनु. 136 की SLP और अनु. 143 के संदर्भ RAS, CET व व्याख्याता परीक्षाओं के स्थायी प्रश्न हैं:

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4. अपीलीय क्षेत्राधिकार (अनु. 132–134A)

सर्वोच्च न्यायालय देश का अंतिम अपीलीय न्यायालय है। उच्च न्यायालयों के निर्णयों के विरुद्ध अपील चार श्रेणियों में होती है —

प्रकारअनुच्छेदशर्त
संवैधानिक मामले132उच्च न्यायालय प्रमाणित करे कि मामले में संविधान के निर्वचन का सारवान विधिक प्रश्न है (सिविल, आपराधिक या अन्य — किसी भी कार्यवाही में)
सिविल मामले133HC प्रमाणित करे कि (i) सामान्य महत्व का सारवान विधिक प्रश्न है और (ii) उसका निर्णय SC द्वारा आवश्यक है — 30वें संशोधन (1972) ने ₹20,000 मूल्य की शर्त हटाई
आपराधिक मामले — बिना प्रमाणपत्र134(1)(a),(b)HC ने (a) दोषमुक्ति को पलटकर मृत्युदंड दिया, या (b) अधीनस्थ न्यायालय से मामला अपने पास मँगाकर दोषसिद्ध कर मृत्युदंड दिया
आपराधिक मामले — प्रमाणपत्र सहित134(1)(c)HC प्रमाणित करे कि मामला SC में अपील योग्य है
प्रमाणपत्र की प्रक्रिया134A44वाँ संशोधन (1978) — HC निर्णय के तुरंत बाद स्वयं या मौखिक आवेदन पर प्रमाणपत्र देगा

विस्तार: संसद ने सर्वोच्च न्यायालय (आपराधिक अपीलीय क्षेत्राधिकार विस्तार) अधिनियम, 1970 से अनु. 134(1)(a),(b) की स्थितियों में आजीवन कारावास या 10 वर्ष से अधिक के दंड पर भी अपील का अधिकार दिया।

5. विशेष अनुमति याचिका — अनु. 136

अनु. 136 सर्वोच्च न्यायालय को व्यापकतम और विवेकाधीन अपीलीय शक्ति देता है — वह भारत के किसी भी न्यायालय या न्यायाधिकरण के किसी भी निर्णय, डिक्री, दंडादेश या आदेश के विरुद्ध अपील की विशेष अनुमति दे सकता है।

  • अपवाद: सशस्त्र बलों से संबंधित विधि के अंतर्गत गठित सैन्य न्यायाधिकरण / कोर्ट मार्शल (अनु. 136(2))।
  • किसी भी मामले में: संवैधानिक, सिविल, आपराधिक, आयकर, श्रम, राजस्व आदि।
  • अंतिम आदेश आवश्यक नहीं: अंतरिम आदेश के विरुद्ध भी।
  • अधिकार नहीं, विशेषाधिकार: याचिकाकर्ता का अधिकार नहीं — न्यायालय का विवेक; सामान्यतः केवल गंभीर अन्याय या सारवान विधिक प्रश्न पर।

व्यवहार: सर्वोच्च न्यायालय में दायर अधिकांश मामले SLP होते हैं — इससे लंबित मामलों की संख्या बढ़ती है; इसलिए सीमित SLP व ‘संवैधानिक न्यायालय’ की भूमिका पर बहस चलती है।

6. सलाहकारी क्षेत्राधिकार (अनु. 143)

आधारअनु. 143(1)अनु. 143(2)
विषयविधि या तथ्य का कोई प्रश्न जो सार्वजनिक महत्व का हो (उत्पन्न हुआ हो या संभावित)संविधान-पूर्व की संधि, करार, सनद आदि से उत्पन्न विवाद (अनु. 131 के परंतुक से बाहर)
SC का दायित्वराय दे सकता है — मना भी कर सकता है (‘may’)राय देनी ही होगी (‘shall’)
बाध्यताराष्ट्रपति पर बाध्यकारी नहींराष्ट्रपति पर बाध्यकारी नहीं

अनु. 145(3) के अनुसार संदर्भ की सुनवाई कम से कम 5 न्यायाधीशों की पीठ करती है और राय खुले न्यायालय में दी जाती है। परामर्श राष्ट्रपति पर बाध्यकारी नहीं, पर उसमें दिया गया विधिक मत भविष्य के लिए अत्यधिक प्रभावी होता है।

प्रमुख संदर्भवर्षविषय
दिल्ली विधि अधिनियम (In re Delhi Laws Act)1951प्रथम संदर्भ — प्रत्यायोजित विधान
केरल शिक्षा विधेयक1958अल्पसंख्यक शैक्षिक अधिकार (अनु. 30)
बेरुबारी संघ1960भू-भाग का हस्तांतरण — संविधान संशोधन आवश्यक
केशव सिंह (विशेष संदर्भ सं. 1)1964–65विधायिका के विशेषाधिकार बनाम न्यायालय
राष्ट्रपति निर्वाचन1974विधानसभा भंग होने पर भी चुनाव संभव
कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण1991–92कर्नाटक का अध्यादेश असंवैधानिक
राम जन्मभूमि1993–94SC ने राय देने से मना किया (इस्माइल फ़ारूक़ी, 1994)
तृतीय न्यायाधीश मामला1998कॉलेजियम = CJI + 4
प्राकृतिक संसाधन आवंटन (2G)2012नीलामी एकमात्र संवैधानिक तरीका नहीं
विधेयकों पर स्वीकृति की समय-सीमा2025न्यायिक समय-सीमा व ‘deemed assent’ नहीं

7. अभिलेख न्यायालय (अनु. 129) एवं अवमानना

सर्वोच्च न्यायालय अभिलेख न्यायालय (Court of Record) है — (i) इसके निर्णय व कार्यवाहियाँ स्थायी अभिलेख के रूप में रखी जाती हैं और किसी भी न्यायालय में साक्ष्य-मूल्य रखती हैं, उन पर प्रश्न नहीं उठाया जा सकता; (ii) इसे स्वयं की अवमानना पर दंड देने की शक्ति है। (उच्च न्यायालय के लिए — अनु. 215।)

अवमाननाअर्थ
सिविल अवमाननान्यायालय के निर्णय, डिक्री, आदेश, रिट का जानबूझकर उल्लंघन या दिए गए वचन का भंग
आपराधिक अवमाननाऐसा प्रकाशन/कृत्य जो (i) न्यायालय को बदनाम करे या उसका प्राधिकार घटाए, (ii) न्यायिक कार्यवाही में हस्तक्षेप करे, (iii) न्याय-प्रशासन में बाधा डाले
दंड (न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971)6 माह तक साधारण कारावास या ₹2,000 तक जुर्माना या दोनों

अपवाद (अवमानना नहीं): निर्दोष प्रकाशन, न्यायिक कार्यवाही की उचित व सही रिपोर्टिंग, निर्णय की उचित आलोचना, सत्य (2006 के संशोधन से — लोकहित में व सद्भावपूर्ण)। प्रशांत भूषण मामला (2020) में ₹1 का प्रतीकात्मक जुर्माना चर्चित रहा।

8. पुनर्विलोकन, क्यूरेटिव याचिका एवं अन्य शक्तियाँ

  • पुनर्विलोकन (अनु. 137): सर्वोच्च न्यायालय अपने ही निर्णय/आदेश की समीक्षा कर सकता है — ‘अभिलेख पर स्पष्ट त्रुटि’ जैसे सीमित आधारों पर; सामान्यतः वही पीठ, चैंबर में।
  • क्यूरेटिव याचिका: पुनर्विलोकन याचिका खारिज होने के बाद भी गंभीर न्याय-भंग रोकने हेतु — रूपा अशोक हुर्रा बनाम अशोक हुर्रा (2002) में विकसित; वरिष्ठ अधिवक्ता का प्रमाणन आवश्यक; तीन वरिष्ठतम न्यायाधीशों व निर्णय देने वाले न्यायाधीशों के समक्ष।
  • अनु. 139A: 42वें संशोधन (1976) — एक से अधिक HC में लंबित समान विधिक प्रश्न वाले मामले SC अपने पास मँगा सकता है; एक HC से दूसरे HC में मामले अंतरित कर सकता है।
  • अनु. 141: सर्वोच्च न्यायालय द्वारा घोषित विधि भारत के सभी न्यायालयों पर बाध्यकारी (स्वयं SC पर नहीं — वह अपने निर्णय पलट सकता है)।
  • अनु. 142 — पूर्ण न्याय: किसी भी लंबित मामले में ‘पूर्ण न्याय’ हेतु आवश्यक डिक्री/आदेश — जैसे भोपाल गैस त्रासदी समझौता (1989), अयोध्या निर्णय में मस्जिद हेतु 5 एकड़ भूमि (2019), शिल्पा शैलेश (2023) — विवाह के असाध्य विघटन पर सीधे तलाक।
  • अनु. 144: भारत के सभी सिविल व न्यायिक प्राधिकारी सर्वोच्च न्यायालय की सहायता में कार्य करेंगे।
  • अनु. 71: राष्ट्रपति व उपराष्ट्रपति के निर्वाचन विवाद — मूल व अनन्य; अनु. 317: UPSC/राज्य लोक सेवा आयोग के सदस्यों को कदाचार पर हटाने से पहले जाँच (राय राष्ट्रपति पर बाध्यकारी)।

न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति का विश्लेषण न्यायिक पुनरावलोकन, न्यायिक सक्रियता व जनहित याचिका में देखें।

संबंधित: सर्वोच्च न्यायालय: गठन व न्यायाधीशों की नियुक्ति | न्यायिक पुनरावलोकन, सक्रियता व PIL | संवैधानिक उपचार: अनु. 32 व पाँच रिट | उच्च न्यायालय: अनुच्छेद 214–231

📊 प्रश्न-पैटर्न विश्लेषण — किस प्रकार के प्रश्न आते हैं?

प्रश्न का प्रकारउदाहरणहल करने की कुंजी
अनुच्छेद-मिलान131, 136, 143, 129खंड 1 व 2
अपवादजल विवाद, सैन्य न्यायाधिकरणखंड 2 व 5
तुलनाअनु. 32 बनाम 226खंड 3
संदर्भप्रथम संदर्भ, राय से इनकारखंड 6
अवधारणाअभिलेख न्यायालय, क्यूरेटिवखंड 7 व 8

🔎 लोग यह भी पूछते हैं (People Also Ask)

सर्वोच्च न्यायालय का मूल क्षेत्राधिकार क्या है?

अनु. 131 के अंतर्गत केंद्र और राज्यों के बीच या दो या अधिक राज्यों के बीच विधिक अधिकार संबंधी विवाद सीधे और केवल सर्वोच्च न्यायालय सुनता है।

विशेष अनुमति याचिका (SLP) क्या है?

अनु. 136 के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय भारत के किसी भी न्यायालय/न्यायाधिकरण के निर्णय के विरुद्ध अपील की विवेकाधीन अनुमति दे सकता है — सैन्य न्यायाधिकरण को छोड़कर।

क्या सर्वोच्च न्यायालय की सलाह राष्ट्रपति पर बाध्यकारी है?

नहीं — अनु. 143 के अंतर्गत दी गई राय राष्ट्रपति पर बाध्यकारी नहीं; अनु. 143(1) में न्यायालय राय देने से मना भी कर सकता है।

अभिलेख न्यायालय का क्या अर्थ है?

जिसके निर्णय स्थायी अभिलेख व साक्ष्य के रूप में मान्य हों और जिसे अपनी अवमानना पर दंड देने की शक्ति हो — सर्वोच्च न्यायालय (अनु. 129) व उच्च न्यायालय (अनु. 215)।

क्यूरेटिव याचिका क्या है?

पुनर्विलोकन याचिका खारिज होने के बाद गंभीर अन्याय रोकने का अंतिम उपाय — रूपा अशोक हुर्रा मामले (2002) में विकसित।

📝 अभ्यास MCQ (10 प्रश्न, उत्तर-व्याख्या सहित)

  1. केंद्र और राज्यों के बीच विवाद सर्वोच्च न्यायालय के किस क्षेत्राधिकार में आते हैं?

    (A) अपीलीय (B) सलाहकारी (C) मूल (अनु. 131) (D) रिट

    ✅ उत्तर: (C) मूल (अनु. 131) — अनन्य मूल क्षेत्राधिकार।

  2. सर्वोच्च न्यायालय के सलाहकारी क्षेत्राधिकार का प्रावधान किस अनुच्छेद में है?

    (A) अनु. 143 (B) अनु. 136 (C) अनु. 141 (D) अनु. 129

    ✅ उत्तर: (A) अनु. 143 — राय राष्ट्रपति पर बाध्यकारी नहीं।

  3. विशेष अनुमति याचिका (SLP) किसके निर्णय के विरुद्ध स्वीकार नहीं की जा सकती?

    (A) उच्च न्यायालय (B) आयकर न्यायाधिकरण (C) जिला न्यायालय (D) सैन्य न्यायाधिकरण

    ✅ उत्तर: (D) सैन्य न्यायाधिकरण — अनु. 136(2)।

  4. सर्वोच्च न्यायालय ‘अभिलेख न्यायालय’ है — किस अनुच्छेद के अनुसार?

    (A) अनु. 215 (B) अनु. 129 (C) अनु. 141 (D) अनु. 137

    ✅ उत्तर: (B) अनु. 129 — उच्च न्यायालय हेतु — अनु. 215।

  5. निम्न में से कौन-सा विवाद अनु. 131 के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय के मूल क्षेत्राधिकार से बाहर है?

    (A) केंद्र बनाम राज्य (B) राज्य बनाम राज्य (C) अंतरराज्यीय नदी जल विवाद (D) केंद्र व राज्य बनाम अन्य राज्य

    ✅ उत्तर: (C) अंतरराज्यीय नदी जल विवाद — अनु. 262 — संसद ने SC का क्षेत्राधिकार वर्जित किया।

  6. ‘क्यूरेटिव याचिका’ की अवधारणा किस मामले में विकसित हुई?

    (A) रूपा अशोक हुर्रा (2002) (B) मेनका गांधी (1978) (C) एस.पी. गुप्ता (1981) (D) इंदिरा साहनी (1992)

    ✅ उत्तर: (A) रूपा अशोक हुर्रा (2002) — पुनर्विलोकन के बाद अंतिम उपाय।

  7. राम जन्मभूमि संदर्भ (1993) पर सर्वोच्च न्यायालय ने —

    (A) राय दी (B) राय देने से इनकार किया (C) मामला उच्च न्यायालय को भेजा (D) संसद को भेजा

    ✅ उत्तर: (B) राय देने से इनकार किया — अनु. 143(1) में SC राय देने हेतु बाध्य नहीं — इस्माइल फ़ारूक़ी (1994)।

  8. सिविल अपीलों हेतु ₹20,000 मूल्य की शर्त किस संशोधन से हटाई गई?

    (A) 42वाँ (B) 44वाँ (C) 30वाँ (D) 24वाँ

    ✅ उत्तर: (C) 30वाँ — 1972 — अब ‘सामान्य महत्व का सारवान विधिक प्रश्न’।

  9. ‘पूर्ण न्याय’ हेतु आदेश देने की शक्ति —

    (A) अनु. 142 (B) अनु. 141 (C) अनु. 139A (D) अनु. 144

    ✅ उत्तर: (A) अनु. 142 — जैसे शिल्पा शैलेश (2023)।

  10. राष्ट्रपति के निर्वाचन संबंधी विवादों का निर्णय कौन करता है?

    (A) निर्वाचन आयोग (B) संसद (C) दिल्ली उच्च न्यायालय (D) सर्वोच्च न्यायालय

    ✅ उत्तर: (D) सर्वोच्च न्यायालय — अनु. 71 — अनन्य क्षेत्राधिकार।

⚡ One-Liner Revision (Key Facts)

  1. मूल (अनन्य) क्षेत्राधिकार — अनु. 131
  2. रिट क्षेत्राधिकार — अनु. 32
  3. संवैधानिक/सिविल/आपराधिक अपील — 132/133/134
  4. विशेष अनुमति याचिका — अनु. 136
  5. पुनर्विलोकन — अनु. 137
  6. SC की विधि बाध्यकारी — अनु. 141
  7. पूर्ण न्याय — अनु. 142
  8. सलाहकारी — अनु. 143
  9. प्रथम संदर्भ — दिल्ली विधि अधिनियम, 1951
  10. अवमानना दंड — 6 माह / ₹2,000

✅ परीक्षा हेतु मुख्य बिंदु (Key Points)

  • अनु. 131 में निजी व्यक्ति पक्षकार नहीं हो सकता।
  • अनु. 32 मूल क्षेत्राधिकार है पर अनन्य नहीं — HC के साथ समवर्ती।
  • अनु. 143(1) में राय देना वैकल्पिक, 143(2) में अनिवार्य; दोनों में राय बाध्यकारी नहीं।
  • अनु. 141 की विधि सभी न्यायालयों पर बाध्य — SC स्वयं पर नहीं।
  • SLP अधिकार नहीं, न्यायालय का विवेक।

🎯 Exam Trap — इन गलतियों से बचें

  • अनु. 32 का क्षेत्राधिकार अनन्य नहीं — अनन्य केवल अनु. 131 (और 71)।
  • अनु. 143 की राय राष्ट्रपति पर बाध्यकारी नहीं।
  • अनु. 136 से सैन्य न्यायाधिकरण बाहर, अन्य सभी न्यायाधिकरण भीतर।
  • अंतरराज्यीय जल विवाद — अनु. 262, अनु. 131 नहीं।
  • अभिलेख न्यायालय: SC — 129, HC — 215।

🧠 याद रखने की ट्रिक (Memory Tricks)

  • “131 संघ, 132 संविधान, 133 सिविल, 134 क्रिमिनल, 136 स्पेशल” — क्रम से।
  • “143 — सलाह दो, मानो न मानो” — बाध्यकारी नहीं।
  • “129 अभिलेख, 137 पुनर्विलोकन, 142 पूर्ण न्याय”।
  • अनु. 143 — “(1) में ‘मे’ (may), (2) में ‘शैल’ (shall)”।
  • अवमानना — “6 महीने, 2 हज़ार”।

👨‍🏫 शिक्षक की परीक्षा टिप्पणी

अधिकार क्षेत्र के प्रश्न ‘अनुच्छेद-मिलान’ और ‘अपवाद’ से बनते हैं — खंड 1 की तालिका को कंठस्थ करें और अनु. 131 के बाहर के मामलों (जल विवाद, संविधान-पूर्व संधि, वित्त आयोग) की सूची याद रखें। 2025 का राष्ट्रपति संदर्भ RAS मुख्य परीक्षा व साक्षात्कार दोनों के लिए महत्वपूर्ण है।

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सर्वोच्च न्यायालय का अधिकार क्षेत्र: मूल, अपीलीय एवं सलाहकारी क्षेत्राधिकार पर अपनी तैयारी परखने के लिए:

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📖 प्रामाणिक संदर्भ एवं स्रोत

  • भारत का संविधान — अनु. 32, 71, 129–145, 262, 317।
  • न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971; सर्वोच्च न्यायालय (आपराधिक अपीलीय क्षेत्राधिकार विस्तार) अधिनियम, 1970।
  • रूपा अशोक हुर्रा (2002), इस्माइल फ़ारूक़ी (1994), In re Delhi Laws Act (1951), शिल्पा शैलेश (2023)।
  • राष्ट्रपति का संदर्भ (अनु. 143) — विधेयकों पर स्वीकृति, परामर्श 20 नवंबर 2025 (sci.gov.in)।

Author Byline

लेखक: सुयोग अकादमी राजव्यवस्था संपादकीय टीम

तथ्य जाँच एवं संपादन: सुधीर ढाका (BSc-BEd), सुयोग अकादमी

विषय: सर्वोच्च न्यायालय का अधिकार क्षेत्र: मूल, अपीलीय एवं सलाहकारी क्षेत्राधिकार

स्रोत-आधार: भारत का संविधान (विधि एवं न्याय मंत्रालय का नवीनतम द्विभाषी संस्करण), संविधान सभा की कार्यवाही (Constituent Assembly Debates), सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख निर्णय तथा मानक पाठ्य-सामग्री।

परीक्षा उपयोगिता: RAS/RTS, UPSC प्रारंभिक, Rajasthan CET, REET मुख्य, RPSC द्वितीय/प्रथम श्रेणी, पटवारी, पुलिस एवं अन्य प्रतियोगी परीक्षाएँ

संपादकीय नोट: अनु. 143 के संदर्भों की सूची प्रतिनिधिक है, संपूर्ण नहीं; 2025 के परामर्श का सार उपलब्ध आधिकारिक सारांशों के अनुसार।

अंतिम समीक्षा: 17 अक्टूबर 2026

अंतिम संशोधन (Last Updated): 17 अक्टूबर 2026
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🎯 विगत वर्षों के प्रश्न (Interactive PYQs)

Q1. केंद्र और राज्यों के बीच विवाद सर्वोच्च न्यायालय के किस क्षेत्राधिकार में आते हैं?

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Q2. सर्वोच्च न्यायालय के सलाहकारी क्षेत्राधिकार का प्रावधान किस अनुच्छेद में है?

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Q3. विशेष अनुमति याचिका (SLP) किसके निर्णय के विरुद्ध स्वीकार नहीं की जा सकती?

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Q4. सर्वोच्च न्यायालय ‘अभिलेख न्यायालय’ है — किस अनुच्छेद के अनुसार?

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Q5. निम्न में से कौन-सा विवाद अनु. 131 के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय के मूल क्षेत्राधिकार से बाहर है?

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महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

अनु. 131।

अनु. 136।

अनु. 143 — राय बाध्यकारी नहीं।

अनु. 129।

अनु. 142।

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