राजस्थान के रीति-रिवाज, संस्कार एवं सामाजिक प्रथाएँ — RAS/CET
कैसे बना: यह नोट सुयोग अकादमी के लेखक ने परीक्षा सिलेबस के अनुसार लिखा/संपादित किया है। प्रकाशन तिथि ऊपर और अंतिम संशोधन तिथि लेख के अंत में दी गई है। त्रुटि दिखे तो संपर्क करें। टीम परिचय
स्रोत आधार: RPSC / RSMSSB कला-संस्कृति इकाई (लोक कला, मेले, किले)। सिलेबस विषय; कॉपीराइट सामग्री का पेस्ट नहीं।
सुयोग AI गुरु
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संक्षिप्त उत्तर: राजस्थान के लोकजीवन में जन्म से मृत्यु तक हर पड़ाव पर विशिष्ट रीति-रिवाज हैं, जिनका आधार हिंदू परंपरा के 16 संस्कार (गर्भाधान से अंत्येष्टि तक) हैं। जन्म से जुड़े रिवाज — आठवाँ पूजन (गर्भ के सात माह पूरे होने पर), जलवा/कुआँ पूजन (प्रसव के बाद प्रसूता द्वारा पनघट की पूजा), जड़ूला (पहला मुंडन) और ढूंढ (शिशु की पहली होली)। विवाह में सगाई, टीका, लगन (पीली चिट्ठी), पीठी, बान, बिंदोली, सामेला (बारात का स्वागत), तोरण मारना, हथलेवा, फेरे, कांकण डोरा, जुआ-जुई, बढार (दूसरे दिन का भोज) और मायरा/भात (ननिहाल की भेंट) प्रमुख हैं; बाल विवाह के बाद वधू को ससुराल भेजना मुकलावा/गौना कहलाता है। मृत्यु से जुड़े शब्द — बैकुंठी (अर्थी), आधेटा, फूल चुनना, सांतरवाड़ा, पगड़ी रस्म और मौसर/नुक्ता (मृत्युभोज)। सती, कन्या वध, डाकन, समाधि, त्याग, दास प्रथा पर 19वीं सदी में ब्रिटिश दबाव से रियासतों ने रोक लगाई; वाल्टरकृत राजपूत हितकारिणी सभा (1889) ने विवाह-खर्च व आयु पर नियम बनाए। आज राजस्थान सती निवारण अधिनियम 1987 और राजस्थान डायन-प्रताड़ना निवारण अधिनियम 2015 लागू हैं।
संक्षिप्त उत्तर
जीवन-पड़ाव | प्रमुख रीति-रिवाज | सबसे ज़्यादा पूछा जाने वाला तथ्य |
|---|---|---|
जन्म से पूर्व व जन्म | आठवाँ पूजन, छठी, जामणा, जलवा/कुआँ पूजन, सूरज पूजा | आठवाँ पूजन = गर्भ के 7 माह पूरे होने पर; जलवा = प्रसव के बाद पनघट पूजन |
बाल्यावस्था | जड़ूला (मुंडन), ढूंढ (पहली होली) | जड़ूला = पहली बार बाल उतारना |
विवाह से पूर्व | सगाई, टीका, लगन, पीठी, बान, कांकण डोरा, मेहंदी, बिंदोली, मायरा | लगन = पीली चिट्ठी; मायरा = ननिहाल की भेंट |
विवाह का दिन | निकासी, सामेला, तोरण, हथलेवा, फेरे, कुंवर कलेवा | सामेला = बारात का स्वागत; तोरण मारना = वर द्वारा |
विवाह के बाद | जुआ-जुई, बढार, पहरावणी, ओलंदी, मुकलावा/गौना | बढार = विवाह के दूसरे दिन का भोज |
मृत्यु | बैकुंठी, बखेर, आधेटा, फूल चुनना, सांतरवाड़ा, बारहवाँ, पगड़ी रस्म, मौसर | मौसर/नुक्ता/औसर = मृत्युभोज |
सामाजिक प्रथाएँ | नाता, झगड़ा, डावरिया, त्याग, पर्दा, बेगार | डावरिया = दहेज में दासियाँ भेजना |
कुप्रथाएँ व कानून | सती, कन्या वध, डाकन, समाधि, बाल विवाह, दहेज, मौसर | सती पर सर्वप्रथम रोक — बूंदी (1822) |
2. सिलेबस में यह टॉपिक क्यों महत्वपूर्ण है?
RAS, राजस्थान CET, पटवारी, VDO और REET में "राजस्थान की कला एवं संस्कृति" के अंतर्गत रीति-रिवाज और सामाजिक प्रथाएँ एक स्थायी इकाई है। प्रश्न सामान्यतः तीन रूपों में आते हैं:
शब्द→अर्थ मिलान — "बढार किसे कहते हैं?", "आधेटा का संबंध किससे है?" जैसे सीधे प्रश्न। इसके लिए खंड 11 की तालिका सबसे उपयोगी है।
क्रम व वर्गीकरण — कौन-सा रिवाज जन्म का, कौन विवाह का और कौन मृत्यु का है; विवाह की रस्मों का सही क्रम।
कुप्रथा + सुधार — किस रियासत ने किस वर्ष किस प्रथा पर पहले रोक लगाई; वाल्टरकृत सभा; सती निवारण व डायन-प्रताड़ना कानून। यह भाग इतिहास (ब्रिटिश काल) से भी जुड़ता है।
इस नोट का फोकस "रिवाज का नाम → उसका अर्थ व अवसर" है। लोकगीतों, वेशभूषा और जनजातीय रिवाजों के विस्तार के लिए खंड 16 के संबंधित नोट्स देखें।
3. पृष्ठभूमि: 16 संस्कार
"संस्कार" का अर्थ है व्यक्ति के जीवन को शुद्ध और सुसंस्कृत करने वाले धार्मिक-सामाजिक कृत्य। गृह्यसूत्रों व स्मृतियों में संस्कारों की संख्या अलग-अलग मिलती है, पर परीक्षा में 16 संस्कार (षोडश संस्कार) की सूची मानक है। राजस्थान के लोक-रिवाज इन्हीं संस्कारों के स्थानीय रूप हैं — जैसे चूड़ाकर्म का लोक-रूप जड़ूला और पाणिग्रहण का लोक-रूप हथलेवा।
क्रम | संस्कार | अर्थ / अवसर | राजस्थानी लोक-रूप / संबंध |
|---|---|---|---|
1 | गर्भाधान | संतान-प्राप्ति हेतु प्रथम संस्कार | — |
2 | पुंसवन | गर्भ के तीसरे माह के आसपास, स्वस्थ संतान की कामना | — |
3 | सीमंतोन्नयन | गर्भवती स्त्री की रक्षा व प्रसन्नता हेतु (गर्भ के उत्तरार्ध में) | आठवाँ पूजन से तुलनीय |
4 | जातकर्म | जन्म के समय का संस्कार | जन्म पर थाली बजाना, जामणा |
5 | नामकरण | शिशु का नाम रखना | छठी / दसोठन के आसपास |
6 | निष्क्रमण | शिशु को पहली बार घर से बाहर ले जाना, सूर्य-दर्शन | सूरज पूजा |
7 | अन्नप्राशन | पहली बार अन्न खिलाना (लगभग छठे माह) | — |
8 | चूड़ाकर्म (मुंडन) | पहली बार सिर के बाल उतारना | जड़ूला |
9 | कर्णवेध | कान छेदना | — |
10 | विद्यारंभ | अक्षर-ज्ञान आरंभ | — |
11 | उपनयन | यज्ञोपवीत (जनेऊ) धारण, गुरु के पास जाना | जनेऊ संस्कार |
12 | वेदारंभ | वेद-अध्ययन आरंभ | — |
13 | केशांत (गोदान) | युवावस्था में प्रथम क्षौर | — |
14 | समावर्तन | शिक्षा पूर्ण कर गुरुकुल से घर लौटना | — |
15 | विवाह | गृहस्थ आश्रम में प्रवेश | हथलेवा, फेरे, तोरण आदि |
16 | अंत्येष्टि | अंतिम संस्कार | बैकुंठी, आधेटा, फूल चुनना, बारहवाँ |
ध्यान दें: कुछ सूचियों में विद्यारंभ या कर्णवेध के स्थान पर अन्य संस्कार गिने जाते हैं। परीक्षा के लिए याद रखें — पहला गर्भाधान, अंतिम अंत्येष्टि, और विवाह 15वाँ।
4. जन्म संबंधी रीति-रिवाज
4.1 जन्म से पूर्व
आठवाँ पूजन: स्त्री के गर्भ के सात माह पूरे होने पर (आठवें माह में) इष्टदेव की पूजा और प्रीतिभोज। उद्देश्य — गर्भवती और गर्भस्थ शिशु की मंगलकामना। यह जन्म से पहले का रिवाज है — इसे जन्म के बाद वाले रिवाजों से न मिलाएँ।
4.2 जन्म के समय व तुरंत बाद
थाली बजाना / सूचना: पुत्र-जन्म पर काँसे की थाली बजाकर सूचना देने की लोक-परंपरा रही है (यह स्वयं लैंगिक भेदभाव का उदाहरण भी है)।
जामणा: शिशु-जन्म पर ननिहाल पक्ष (प्रसूता के पीहर) से आने वाली भेंट — वस्त्र, आभूषण, मिठाई आदि।
छठी: जन्म के छठे दिन की पूजा (विधाता/षष्ठी पूजन); कई परिवारों में इसी के आसपास नामकरण।
सूरज पूजा: प्रसूता द्वारा शिशु के साथ सूर्य की पूजा — निष्क्रमण संस्कार का लोक-रूप।
जलवा पूजन / कुआँ पूजन / पनघट पूजन: प्रसव के कुछ समय बाद (कई क्षेत्रों में लगभग सवा माह पर) प्रसूता सज-धज कर महिलाओं के साथ गीत गाती हुई कुएँ या पनघट पर जाकर जल की पूजा करती है। पुस्तकों में यह तीनों नाम एक ही रस्म के लिए प्रयुक्त होते हैं। इसके बाद प्रसूता घरेलू कार्य, विशेषकर पानी भरना, पुनः आरंभ करती है।
4.3 बाल्यावस्था
जड़ूला: बालक के पहली बार बाल उतारने (मुंडन) की रस्म — सामान्यतः दो-तीन वर्ष की आयु में, किसी कुलदेवता/लोकदेवता के स्थान पर। यह चूड़ाकर्म संस्कार का राजस्थानी रूप है।
ढूंढ: शिशु के जन्म के बाद पहली होली पर होने वाली रस्म। फाल्गुन में होली के अवसर पर परिजन व गाँव के लोग डंडे बजाते, गीत गाते हुए शिशु को "ढूंढते" हैं; ननिहाल से कपड़े-मिठाई आती है और बच्चे की मंगलकामना की जाती है।
जन्म-क्रम याद रखें: आठवाँ (पहले) → जामणा, छठी (जन्म पर) → जलवा/कुआँ पूजन (प्रसूता) → जड़ूला (मुंडन) → ढूंढ (पहली होली)
5. विवाह संबंधी रीति-रिवाज
राजस्थान में विवाह सबसे विस्तृत रस्मों वाला संस्कार है। नीचे रस्में लगभग उसी क्रम में दी गई हैं जिसमें वे सामान्यतः होती हैं; जाति व क्षेत्र के अनुसार क्रम व नाम में थोड़ा अंतर संभव है।
5.1 विवाह से पूर्व की रस्में
रस्म | अर्थ | किस पक्ष से |
|---|---|---|
सगाई (मंगनी) | वर-वधू का संबंध पक्का करना; वधू पक्ष वर के घर जाकर नारियल, रुपया आदि देता है | वधू पक्ष |
टीका | सगाई/लगन के अवसर पर वर के माथे पर तिलक कर भेंट (वस्त्र, आभूषण, नकद) देना | वधू पक्ष |
लगन (लग्न पत्रिका) | विवाह की तिथि-मुहूर्त निश्चित कर वधू पक्ष द्वारा वर पक्ष को भेजा जाने वाला पत्र — "पीली चिट्ठी" | वधू पक्ष → वर पक्ष |
कुंकुम पत्री | संबंधियों को विवाह का निमंत्रण-पत्र (पहला निमंत्रण प्रायः गणेश जी को) | दोनों पक्ष |
बान बैठना | लगन के बाद, विवाह से कुछ दिन पहले वर/वधू को चौकी पर बैठाकर मांगलिक कार्यों की शुरुआत | दोनों पक्ष (अपने-अपने घर) |
पीठी | बान के दिनों में वर/वधू को हल्दी-आटे/बेसन के उबटन (पीठी) का लेप | दोनों पक्ष |
कांकण डोरा | विवाह से पूर्व वर व वधू के दाहिने हाथ में बाँधा जाने वाला मांगलिक धागा (मौली); विवाह के बाद खोला जाता है | दोनों पक्ष |
चाक पूजन | महिलाएँ गीत गाती कुम्हार के घर जाकर चाक की पूजा करती हैं और मांगलिक कलश/बर्तन लाती हैं | दोनों पक्ष |
मेहंदी, रातीजगा | मेहंदी लगाना; रात्रि-जागरण में देवी-देवताओं के गीत | दोनों पक्ष |
मायरा / भात | पुत्र या पुत्री के विवाह पर ननिहाल पक्ष (मामा) द्वारा दी जाने वाली भेंट — वस्त्र, आभूषण, नकद। माँ अपने पीहर जाकर "भात न्यौतती" है | माँ का पीहर (ननिहाल) |
बिंदोली / बंदोली | विवाह से पहले वर (कई जातियों में वधू भी) को घोड़ी पर बैठाकर गाँव/मोहल्ले में शोभायात्रा | दोनों पक्ष |
मायरा की लोक-प्रसिद्धि: "नरसी जी का मायरा" राजस्थान व गुजरात में प्रसिद्ध लोक-आख्यान है, जिसमें भक्त नरसी मेहता की ओर से भगवान कृष्ण द्वारा भात भरने की कथा गाई जाती है।
5.2 विवाह के दिन की रस्में
निकासी: वर का बारात के साथ वधू के गाँव के लिए प्रस्थान। सिर पर मोड़/सेहरा, हाथ में तलवार/कटार। (कुछ पुस्तकें बिंदोली और निकासी को साथ-साथ लिखती हैं; अंतर यह है कि बिंदोली शोभायात्रा है और निकासी बारात का रवाना होना।)
सामेला (मधुपर्क): बारात के वधू के गाँव पहुँचने पर वधू पक्ष द्वारा बारात का स्वागत। वधू का पिता संबंधियों सहित आगे जाकर वर पक्ष से मिलता है।
तोरण मारना: वधू के घर के मुख्य द्वार पर लटके लकड़ी के तोरण (प्रायः चिड़िया/मोर की आकृति) को वर घोड़ी पर बैठे-बैठे तलवार या नीम की टहनी से छूता है। इसके बाद वधू की माँ आरती उतारती है।
हथलेवा (पाणिग्रहण): वर-वधू के हाथ मिलाना — वधू की मेहंदी लगी हथेली वर की हथेली पर रखी जाती है। यही पाणिग्रहण संस्कार का लोक-नाम है।
फेरे (सप्तपदी/भाँवर): अग्नि के चारों ओर वर-वधू के फेरे; इसके बाद विवाह पूर्ण माना जाता है।
कुंवर कलेवा: विवाह के अवसर पर वधू पक्ष द्वारा वर और उसके साथियों को कराया जाने वाला कलेवा (जलपान/भोजन)।
5.3 विवाह के बाद की रस्में
जुआ-जुई: विवाह के बाद वर-वधू द्वारा खेला जाने वाला खेल — दूध/पानी भरी परात में अंगूठी या कौड़ी ढूँढना; इसी समय एक-दूसरे का कांकण डोरा खोला जाता है। लोक-मान्यता है कि जो जीतता है, गृहस्थी में उसका पलड़ा भारी रहता है।
बढार: विवाह के दूसरे दिन वधू पक्ष द्वारा बारात को दिया जाने वाला सामूहिक भोज।
बरी-पड़ला: वर पक्ष द्वारा वधू के लिए लाए गए आभूषण (बरी) और वस्त्र (पड़ला) — बारात के साथ वधू के घर पहुँचाए जाते हैं।
पहरावणी (रंगबरी): बारात की विदाई के समय वधू पक्ष द्वारा बारातियों को दी जाने वाली भेंट (वस्त्र, नकद)।
ओलंदी: विदा होकर ससुराल जाती वधू के साथ जाने वाला उसका कोई निकट संबंधी (प्रायः छोटा भाई या छोटी बहन)।
मुकलावा / गौना: जहाँ विवाह कम आयु में हो जाता था, वहाँ वधू को तत्काल ससुराल नहीं भेजा जाता; वयस्क होने पर वधू को ससुराल भेजने की रस्म मुकलावा या गौना कहलाती है। इसका सीधा संबंध बाल विवाह से है।
रोड़ी पूजन: कई जातियों में मांगलिक अवसरों पर घर के बाहर के घूरे/कूड़े के ढेर (रोड़ी) की भी पूजा की जाती है — यह लोक-मान्यता दर्शाती है कि घर से जुड़ा हर स्थान पूज्य है। इस रस्म के समय (विवाह से पूर्व या बाद, अथवा जन्म पर) के बारे में पुस्तकों में भिन्नता है, इसलिए परीक्षा में इसे केवल "लोक-रस्म" के रूप में पहचानें।
विवाह-क्रम: सगाई → टीका → लगन (पीली चिट्ठी) → बान-पीठी → कांकण डोरा → मायरा → बिंदोली → निकासी → सामेला → तोरण → हथलेवा → फेरे → जुआ-जुई → बढार → पहरावणी → (वर्षों बाद) मुकलावा
6. मृत्यु संबंधी रीति-रिवाज
शब्द | अर्थ | समय |
|---|---|---|
बैकुंठी | शव को श्मशान ले जाने के लिए बाँस से बनी अर्थी | मृत्यु के दिन |
कांधिया | अर्थी को कंधा देने वाले व्यक्ति | शवयात्रा |
बखेर | धनी या वृद्ध व्यक्ति की शवयात्रा में अर्थी पर से पैसे/अनाज उछालना | शवयात्रा |
आधेटा | घर और श्मशान के बीच आधे रास्ते (प्रायः चौराहे) पर अर्थी रोककर दिशा बदलना व पिंडदान | शवयात्रा |
लांपा | मुखाग्नि देना | दाह-संस्कार |
फूल चुनना | दाह के तीसरे दिन अस्थियाँ एकत्र करना (जिन्हें बाद में गंगा/पुष्कर आदि में प्रवाहित करते हैं) | तीसरा दिन |
सांतरवाड़ा | दाह-संस्कार के बाद स्नान कर संबंधियों द्वारा शोक-संतप्त परिवार के पास बैठकर संवेदना प्रकट करना; यह शोक-बैठक सामान्यतः बारहवें दिन तक चलती है | मृत्यु के बाद 12 दिन तक |
बारहवाँ (द्वादशा) | मृत्यु के 12वें दिन का कर्मकांड; कहीं-कहीं तेरहवाँ | 12वाँ / 13वाँ दिन |
पगड़ी रस्म | बारहवें दिन मृतक के ज्येष्ठ पुत्र को पगड़ी बाँधकर परिवार का मुखिया (उत्तराधिकारी) घोषित करना | 12वाँ दिन |
मौसर / नुक्ता / औसर | मृत्यु के बाद (प्रायः 12वें दिन) दिया जाने वाला मृत्युभोज | 12वाँ दिन के आसपास |
जौसर | व्यक्ति द्वारा जीवित रहते स्वयं का मृत्युभोज करवाना | जीवनकाल में |
मौसर एक कुप्रथा क्यों? मृत्युभोज के भारी खर्च के लिए गरीब परिवार साहूकारों से कर्ज लेते थे और पीढ़ियों तक कर्ज में डूबे रहते थे। इसीलिए 19वीं सदी के सुधारों (वाल्टरकृत सभा) से लेकर स्वतंत्र भारत के कानून तक मौसर पर नियंत्रण का प्रयास हुआ। समाज-सुधार आंदोलनों और कई जाति-पंचायतों ने भी मौसर का विरोध किया।
मृत्यु-क्रम: बैकुंठी → बखेर → आधेटा → लांपा → फूल चुनना (3रा दिन) → सांतरवाड़ा (12 दिन) → बारहवाँ + पगड़ी → मौसर
7. प्रमुख सामाजिक प्रथाएँ
7.1 नाता प्रथा और झगड़ा
नाता प्रथा राजस्थान की कुछ जातियों व जनजातियों में प्रचलित वह प्रथा है जिसमें विवाहित स्त्री (या विधवा) अपने पति को छोड़कर किसी अन्य पुरुष के साथ "नाता" करके रह सकती है। एक ओर इसे स्त्री को पुनर्विवाह जैसा अवसर देने वाली प्रथा माना जाता है, दूसरी ओर इसके दुरुपयोग — बच्चों का परित्याग, लेन-देन — की आलोचना होती है।
झगड़ा: नाता होने पर नया पति, पहले पति या उसके परिवार को जो हर्जाना/राशि देता है, उसे "झगड़ा" कहते हैं। यह राशि प्रायः जाति-पंचायत तय करती है। परीक्षा में "झगड़ा" शब्द का संबंध नाता प्रथा से ही जोड़ें।
7.2 डावरिया प्रथा
सामंती युग में राजा-महाराजा और जागीरदार अपनी पुत्री के विवाह में दहेज के साथ कुँवारी कन्याएँ (दासियाँ) भी भेजते थे — इसे डावरिया प्रथा कहते हैं। यह दास प्रथा का ही एक रूप थी।
7.3 त्याग प्रथा
राजपूतों के विवाह में चारण, भाट, ढोली आदि याचक वधू पक्ष से मुँहमाँगी दान-राशि ("त्याग") माँगते थे। इतनी बड़ी राशि जुटाना कठिन होने से कन्या-जन्म को बोझ माना जाने लगा — इसलिए इतिहासकार त्याग प्रथा को कन्या वध के कारणों में गिनते हैं। परीक्षा-पुस्तकों के अनुसार जोधपुर में महाराजा मानसिंह के समय 1841 में ब्रिटिश प्रयासों से त्याग पर नियम बनाकर रोक लगाई गई।
7.4 पर्दा प्रथा
सामंती व उच्च वर्गों में स्त्रियों का घूँघट/पर्दे में रहना। इससे स्त्री-शिक्षा और सार्वजनिक जीवन में भागीदारी बाधित हुई। स्वतंत्रता आंदोलन और प्रजामंडल काल में कई महिलाओं ने पर्दा छोड़कर सभाओं में भाग लिया — विस्तार हेतु स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं की भूमिका देखें।
7.5 बेगार प्रथा
जागीरदारों व राज्य द्वारा किसानों, कारीगरों और निम्न वर्गों से बिना पारिश्रमिक श्रम करवाना। बेगार और लाग-बाग का विरोध राजस्थान के किसान आंदोलनों — विशेषकर बिजोलिया किसान आंदोलन — का प्रमुख मुद्दा था। स्वतंत्र भारत में बंधुआ मजदूरी प्रथा (उन्मूलन) अधिनियम 1976 ने इसे दंडनीय बनाया।
8. प्रमुख कुप्रथाएँ
8.1 सती प्रथा
पति की मृत्यु पर पत्नी का उसकी चिता के साथ जल जाना। दो रूप — सहमरण (पति की चिता के साथ ही) और अनुमरण (पति की मृत्यु कहीं और होने पर उसकी पगड़ी/खड़ाऊँ आदि के साथ बाद में)। राजस्थान में सर्वप्रथम बूंदी राज्य ने 1822 में सती पर रोक लगाई (परीक्षा-पुस्तकों में यही मानक उत्तर)। ब्रिटिश भारत में लॉर्ड विलियम बैंटिक ने 1829 में सती को अवैध घोषित किया; इसके बाद रियासतों पर दबाव बढ़ा और जयपुर (1846) सहित अन्य राज्यों ने रोक लगाई; मेवाड़ में रोक 1860 के दशक के आरंभ में (प्रायः 1861) मानी जाती है।
सती ≠ जौहर: जौहर युद्ध-काल में दुर्ग की स्त्रियों का शत्रु से सम्मान-रक्षा हेतु सामूहिक अग्नि-प्रवेश है, जबकि सती पति की मृत्यु से जुड़ी है। जौहर व साकों के लिए राजस्थान के प्रमुख साके व जौहर देखें।
स्वतंत्र भारत: सितंबर 1987 में देवराला (दिवराला, सीकर) के रूपकंवर सती कांड के बाद राजस्थान सरकार ने राजस्थान सती (निवारण) अध्यादेश/अधिनियम, 1987 लागू किया। केंद्र ने सती (निवारण) आयोग अधिनियम, 1987 बनाया (1988 में प्रभावी)। इनमें सती का महिमामंडन (glorification) भी दंडनीय है।
8.2 कन्या वध
कन्या-जन्म के तुरंत बाद उसकी हत्या — कारण: त्याग प्रथा, दहेज, विवाह-खर्च, "योग्य वर" न मिलने का भय। परीक्षा-पुस्तकों के अनुसार सर्वप्रथम कोटा राज्य (1833) ने रोक लगाई; मेवाड़ (उदयपुर) में महाराणा स्वरूप सिंह के समय 1844 में रोक लगी। आधुनिक रूप — कन्या भ्रूण हत्या — पर PCPNDT अधिनियम (1994) लागू है।
8.3 डाकन (डायन) प्रथा
किसी स्त्री को "डाकन" (जादू-टोने से हानि करने वाली) घोषित कर उसे प्रताड़ित करना, यहाँ तक कि मार डालना। यह मुख्यतः दक्षिणी राजस्थान के भील व मीणा बहुल क्षेत्रों में अधिक प्रचलित रही। मेवाड़ में महाराणा स्वरूप सिंह के समय 1853 में इस पर रोक लगाई गई — इसमें खेरवाड़ा स्थित मेवाड़ भील कोर के ब्रिटिश अधिकारी की पहल मानी जाती है। आज राजस्थान डायन-प्रताड़ना निवारण अधिनियम, 2015 (Rajasthan Prevention of Witch-Hunting Act) लागू है — अधिनियम 2015 का है; कुछ स्रोत इसके प्रभावी होने/अधिसूचना को 2016 से जोड़ते हैं।
8.4 समाधि प्रथा
किसी व्यक्ति (प्रायः साधु) द्वारा जीवित ही जल या भूमि में समाधि ले लेना। परीक्षा-पुस्तकों के अनुसार जयपुर राज्य ने 1844 में इस पर रोक लगाई।
8.5 दास प्रथा / मानव व्यापार
स्त्री-पुरुषों का क्रय-विक्रय और उन्हें दास बनाकर रखना (डावरिया इसी का रूप)। पुस्तकों के अनुसार कोटा (1831) ने मानव व्यापार पर सर्वप्रथम रोक लगाई; जयपुर (1847) में भी रोक लगी।
8.6 बाल विवाह
राजस्थान में आखा तीज (अक्षय तृतीया — वैशाख शुक्ल तृतीया) को "अबूझ सावा" (बिना मुहूर्त देखे शुभ दिन) माने जाने से इस दिन बड़ी संख्या में, सामूहिक रूप से बाल विवाह होते रहे हैं। इसी कारण आखा तीज से पहले प्रशासन विशेष निगरानी करता है। बाल विवाह के बाद ही मुकलावा/गौना की आवश्यकता पड़ती है।
शारदा अधिनियम (बाल विवाह निरोधक अधिनियम), 1929 — अजमेर के हरबिलास शारदा के प्रयास से पारित (1930 से प्रभावी)।
बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 — लड़की 18, लड़का 21 वर्ष न्यूनतम आयु; बाल विवाह कराने वाले भी दंडनीय।
8.7 दहेज प्रथा
विवाह में वधू पक्ष से धन-वस्तुओं की माँग। दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961 के तहत दहेज लेना-देना दंडनीय है। दहेज और त्याग, दोनों ने ऐतिहासिक रूप से कन्या-जन्म को "बोझ" बनाया।
8.8 मौसर (मृत्युभोज)
खंड 6 में वर्णित। राज्य ने स्वतंत्रता के बाद राजस्थान मृत्युभोज निवारण अधिनियम (सामान्यतः 1960 का बताया जाता है) बनाया, जिसमें मृत्युभोज आयोजित करना/उसमें सहयोग दंडनीय है। फिर भी सामाजिक दबाव के कारण यह प्रथा पूरी तरह समाप्त नहीं हुई।
9. ब्रिटिश काल में सुधार व प्रतिबंध
1818 की संधियों के बाद रियासतों पर ब्रिटिश सर्वोच्चता स्थापित हुई। पॉलिटिकल एजेंटों और AGG के दबाव में शासकों ने कई कुप्रथाओं पर रोक के आदेश जारी किए। प्रशासनिक पृष्ठभूमि के लिए ब्रिटिश सर्वोच्चता, AGG, मेयो कॉलेज व नरेंद्र मंडल देखें।
कुप्रथा | सर्वप्रथम / प्रमुख रोक | वर्ष (परीक्षा-पुस्तकों के अनुसार) |
|---|---|---|
सती प्रथा | बूंदी (सर्वप्रथम); बाद में जयपुर, मेवाड़ आदि | 1822 (बूंदी); 1846 (जयपुर) |
मानव व्यापार / दास प्रथा | कोटा (सर्वप्रथम); जयपुर | 1831 (कोटा); 1847 (जयपुर) |
कन्या वध | कोटा (सर्वप्रथम); मेवाड़ | 1833 (कोटा); 1844 (मेवाड़) |
त्याग प्रथा | जोधपुर (महाराजा मानसिंह) | 1841 |
समाधि प्रथा | जयपुर | 1844 |
डाकन प्रथा | मेवाड़ (महाराणा स्वरूप सिंह) | 1853 |
बाल विवाह | शारदा अधिनियम (ब्रिटिश भारत, अजमेर के हरबिलास शारदा) | 1929 |
नोट: कुछ वर्षों में पुस्तकों के बीच एक-दो वर्ष का अंतर मिलता है; ऊपर दिए वर्ष परीक्षा में सबसे अधिक स्वीकृत हैं। "सर्वप्रथम" वाले तीन जोड़े पक्के याद रखें — सती–बूंदी, कन्या वध–कोटा, डाकन–मेवाड़।
9.1 वाल्टरकृत राजपूत हितकारिणी सभा (1889)
राजपूताना के AGG कर्नल सी.के.एम. वाल्टर की पहल पर 1889 में अजमेर में यह सभा बनी। इसके प्रमुख निर्णय:
विवाह की न्यूनतम आयु — प्रचलित पुस्तकों के अनुसार लड़की 14 वर्ष, लड़का 18 वर्ष।
विवाह-खर्च को जागीर की आय के अनुपात में सीमित करना; त्याग और याचकों की माँग पर नियंत्रण।
बहुविवाह पर अंकुश (पहली पत्नी के रहते दूसरा विवाह सीमित)।
मौसर (मृत्युभोज) के खर्च पर नियंत्रण।
यह सभा 19वीं सदी के अंत में राजपूत समाज के भीतर सुधार का सबसे संगठित प्रयास मानी जाती है। आगे चलकर आर्य समाज, विभिन्न जातीय सुधार सभाओं तथा मीणा सुधार आंदोलन जैसे आंदोलनों ने सामाजिक सुधार को आगे बढ़ाया।
10. स्वतंत्रता के बाद के कानून
कानून | वर्ष | किस प्रथा के विरुद्ध |
|---|---|---|
राजस्थान मृत्युभोज निवारण अधिनियम | 1960 (सामान्यतः बताया जाने वाला वर्ष) | मौसर / नुक्ता |
दहेज प्रतिषेध अधिनियम (केंद्रीय) | 1961 | दहेज |
बंधुआ मजदूरी प्रथा (उन्मूलन) अधिनियम (केंद्रीय) | 1976 | बेगार / बंधुआ श्रम |
राजस्थान सती (निवारण) अधिनियम | 1987 | सती व उसका महिमामंडन |
सती (निवारण) आयोग अधिनियम (केंद्रीय) | 1987 (1988 से प्रभावी) | सती |
PCPNDT अधिनियम (केंद्रीय) | 1994 | कन्या भ्रूण हत्या |
बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम (केंद्रीय) | 2006 | बाल विवाह |
राजस्थान डायन-प्रताड़ना निवारण अधिनियम | 2015 | डाकन प्रथा |
सावधानी: राज्य-स्तरीय कानूनों के प्रश्नों में "राजस्थान" शब्द देखें — सती (1987) और डायन-प्रताड़ना (2015) राज्य के कानून हैं; दहेज (1961) और बाल विवाह (2006) केंद्रीय।
11. शब्द → अर्थ मिलान तालिका
यह तालिका परीक्षा के लिए सबसे उपयोगी है — "सुमेलित कीजिए" प्रकार के प्रश्न सीधे यहीं से बनते हैं।
शब्द | अर्थ | अवसर |
|---|---|---|
आठवाँ पूजन | गर्भ के 7 माह पूरे होने पर इष्टदेव पूजा व भोज | जन्म से पूर्व |
जामणा | शिशु-जन्म पर ननिहाल से आई भेंट | जन्म |
जलवा / कुआँ पूजन | प्रसूता द्वारा पनघट/कुएँ की पूजा | जन्म के बाद |
जड़ूला | पहला मुंडन | बाल्यावस्था |
ढूंढ | शिशु की पहली होली की रस्म | होली |
सगाई | संबंध पक्का करना | विवाह-पूर्व |
लगन | विवाह तिथि का पत्र — पीली चिट्ठी | विवाह-पूर्व |
पीठी | हल्दी-बेसन का उबटन | विवाह-पूर्व |
बान | चौकी पर बैठाकर मांगलिक कार्य आरंभ | विवाह-पूर्व |
कांकण डोरा | दाहिने हाथ में बँधा मांगलिक धागा | विवाह-पूर्व |
मायरा / भात | ननिहाल (मामा) की ओर से भेंट | संतान के विवाह पर |
बिंदोली | विवाह-पूर्व वर/वधू की शोभायात्रा | विवाह-पूर्व |
निकासी | बारात का प्रस्थान | विवाह-दिवस |
सामेला | वधू पक्ष द्वारा बारात का स्वागत | विवाह-दिवस |
तोरण मारना | वर द्वारा द्वार के तोरण को छूना | विवाह-दिवस |
हथलेवा | पाणिग्रहण | विवाह-दिवस |
कुंवर कलेवा | वधू पक्ष द्वारा वर व साथियों को जलपान/भोजन | विवाह |
जुआ-जुई | परात में अंगूठी ढूँढने का खेल; कांकण खोलना | विवाह-पश्चात |
बढार | विवाह के दूसरे दिन का भोज | विवाह-पश्चात |
बरी-पड़ला | वर पक्ष के आभूषण (बरी) व वस्त्र (पड़ला) | विवाह |
पहरावणी | बारात की विदाई पर भेंट | विवाह-पश्चात |
ओलंदी | वधू के साथ ससुराल जाने वाला संबंधी | विदाई |
मुकलावा / गौना | वयस्क होने पर वधू को ससुराल भेजना | बाल विवाह के बाद |
बैकुंठी | अर्थी | मृत्यु |
बखेर | अर्थी पर पैसे उछालना | शवयात्रा |
आधेटा | आधे रास्ते पर दिशा-परिवर्तन/पिंडदान | शवयात्रा |
फूल चुनना | तीसरे दिन अस्थियाँ एकत्र करना | मृत्यु के बाद |
सांतरवाड़ा | 12 दिन तक संवेदना-बैठक | मृत्यु के बाद |
पगड़ी रस्म | ज्येष्ठ पुत्र को उत्तराधिकार | 12वाँ दिन |
मौसर / नुक्ता / औसर | मृत्युभोज | मृत्यु के बाद |
जौसर | जीवित रहते मृत्युभोज | जीवनकाल |
झगड़ा | नाता में नए पति द्वारा दी जाने वाली हर्जाना-राशि | नाता प्रथा |
डावरिया | दहेज में कन्याएँ (दासियाँ) भेजना | सामंती विवाह |
त्याग | चारण-भाटों को विवाह पर दी जाने वाली राशि | राजपूत विवाह |
12. सुधारों की समयरेखा
वर्ष | घटना |
|---|---|
1822 | बूंदी में सती पर रोक (राजस्थान में सर्वप्रथम) |
1829 | लॉर्ड बैंटिक द्वारा ब्रिटिश भारत में सती अवैध |
1831 | कोटा में मानव व्यापार पर रोक |
1833 | कोटा में कन्या वध पर रोक |
1841 | जोधपुर में त्याग प्रथा पर रोक |
1844 | जयपुर में समाधि प्रथा पर रोक; मेवाड़ में कन्या वध पर रोक |
1846 | जयपुर में सती पर रोक |
1847 | जयपुर में मानव व्यापार पर रोक |
1853 | मेवाड़ में डाकन प्रथा पर रोक |
1889 | वाल्टरकृत राजपूत हितकारिणी सभा |
1929 | शारदा अधिनियम (बाल विवाह निरोध) |
1987 | देवराला सती कांड; राजस्थान सती (निवारण) अधिनियम |
2006 | बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम |
2015 | राजस्थान डायन-प्रताड़ना निवारण अधिनियम |
13. भ्रम व सावधानियाँ (Exam Trap Section)
Trap 1: मायरा बनाम मुकलावा
मायरा/भात = संतान के विवाह पर ननिहाल (मामा) की भेंट। मुकलावा/गौना = बाल विवाह के बाद वधू को ससुराल भेजना। दोनों विवाह से जुड़े हैं पर एक "भेंट" है, दूसरा "विदाई"।
Trap 2: आठवाँ पूजन बनाम जलवा पूजन
आठवाँ पूजन जन्म से पहले (गर्भ के 7 माह पूरे होने पर) होता है; जलवा/कुआँ पूजन जन्म के बाद प्रसूता करती है। "आठवाँ" का अर्थ आठवाँ दिन नहीं, गर्भ का आठवाँ माह है।
Trap 3: जामणा बनाम मायरा
दोनों ननिहाल से आते हैं — जामणा शिशु-जन्म पर, मायरा संतान के विवाह पर।
Trap 4: सामेला बनाम बढार
सामेला = बारात के आगमन पर स्वागत; बढार = विवाह के दूसरे दिन का भोज। दोनों वधू पक्ष करता है।
Trap 5: मौसर बनाम जौसर
मौसर = मृत्यु के बाद का भोज; जौसर = व्यक्ति के जीवित रहते किया गया मृत्युभोज।
Trap 6: आधेटा बनाम सांतरवाड़ा
आधेटा शवयात्रा के दौरान (आधे रास्ते) होता है; सांतरवाड़ा दाह के बाद 12 दिन की संवेदना-बैठक है।
Trap 7: सती बनाम जौहर
सती का कारण पति की मृत्यु; जौहर का कारण युद्ध में पराजय की आशंका व सम्मान-रक्षा। जौहर सामूहिक होता है।
Trap 8: "सर्वप्रथम" रियासतें
सती — बूंदी; कन्या वध व मानव व्यापार — कोटा; डाकन — मेवाड़; समाधि — जयपुर; त्याग — जोधपुर। बूंदी और कोटा (दोनों हाड़ौती) को आपस में न मिलाएँ।
Trap 9: झगड़ा बनाम त्याग
झगड़ा = नाता प्रथा की हर्जाना-राशि; त्याग = राजपूत विवाह में चारण-भाटों को दी जाने वाली राशि।
Trap 10: तोरण कौन मारता है?
तोरण वर मारता है, वधू के घर के द्वार पर। वधू पक्ष केवल तोरण बाँधता है।
Trap 11: डाकन कानून का वर्ष
ऐतिहासिक रोक 1853 (मेवाड़) और आधुनिक कानून 2015 — दोनों वर्ष अलग प्रश्नों में पूछे जा सकते हैं।
14. परीक्षा में पूछे जाने वाले तथ्य (One-liners)
16 संस्कारों में प्रथम — गर्भाधान; अंतिम — अंत्येष्टि।
जड़ूला — चूड़ाकर्म (मुंडन) का राजस्थानी रूप।
हथलेवा — पाणिग्रहण संस्कार का लोक-नाम।
लगन को "पीली चिट्ठी" कहते हैं; यह वधू पक्ष भेजता है।
सामेला — बारात का स्वागत (मधुपर्क)।
बढार — विवाह के दूसरे दिन का भोज।
ढूंढ — शिशु की पहली होली।
बैकुंठी — अर्थी; फूल चुनना — तीसरे दिन अस्थि-संचय।
पगड़ी रस्म — 12वें दिन ज्येष्ठ पुत्र को उत्तराधिकार।
आखा तीज (वैशाख शुक्ल तृतीया) — "अबूझ सावा", सामूहिक बाल विवाह के लिए कुख्यात।
डावरिया — दहेज में दासियाँ भेजना।
झगड़ा — नाता प्रथा से संबंधित राशि।
राजस्थान में सती पर सर्वप्रथम रोक — बूंदी, 1822।
कन्या वध पर सर्वप्रथम रोक — कोटा, 1833।
डाकन प्रथा पर रोक — मेवाड़, 1853।
वाल्टरकृत राजपूत हितकारिणी सभा — 1889, AGG कर्नल वाल्टर।
शारदा अधिनियम (1929) — हरबिलास शारदा, अजमेर।
रूपकंवर सती कांड — देवराला (सीकर), 1987।
राजस्थान डायन-प्रताड़ना निवारण अधिनियम — 2015।
15. इसे आसानी से याद कैसे रखें?
"आठ-जल-जड़-ढूंढ" — जन्म के चार पड़ाव: आठवाँ पूजन → जलवा → जड़ूला → ढूंढ
"सामने स्वागत, बाद में बढार" — सा-मेला = सामने जाकर स्वागत; बढार = बाद (दूसरे दिन) का भोज
"मामा का मायरा, मुकलावे में विदाई" — मायरा ननिहाल की भेंट; मुकलावा वधू की विदाई
"बूंदी-सती, कोटा-कन्या, मेवाड़-डाकन" — "सर्वप्रथम" के तीन जोड़े
"मौ-सर = मौत के बाद; जौ-सर = जीते जी"
16. संबंधित नोट्स
17. एक दिन पहले — रिवीज़न सूची
16 संस्कार: पहला गर्भाधान, 15वाँ विवाह, अंतिम अंत्येष्टि; जड़ूला = चूड़ाकर्म; हथलेवा = पाणिग्रहण।
जन्म: आठवाँ (गर्भ 7 माह पूरे), जामणा (ननिहाल), छठी, जलवा/कुआँ पूजन, जड़ूला, ढूंढ (पहली होली)।
विवाह-पूर्व: सगाई, टीका, लगन (पीली चिट्ठी), बान, पीठी, कांकण डोरा, चाक पूजन, मायरा, बिंदोली।
विवाह-दिवस व बाद: निकासी, सामेला, तोरण, हथलेवा, फेरे, कुंवर कलेवा, जुआ-जुई, बढार, बरी-पड़ला, पहरावणी, ओलंदी, मुकलावा।
मृत्यु: बैकुंठी, बखेर, आधेटा, लांपा, फूल चुनना, सांतरवाड़ा, बारहवाँ, पगड़ी, मौसर, जौसर।
प्रथाएँ: नाता + झगड़ा, डावरिया, त्याग, पर्दा, बेगार।
रोक: बूंदी-सती 1822, कोटा-दास 1831, कोटा-कन्या वध 1833, जोधपुर-त्याग 1841, जयपुर-समाधि 1844, मेवाड़-डाकन 1853; वाल्टर सभा 1889।
कानून: मृत्युभोज 1960, दहेज 1961, सती 1987, बाल विवाह 2006, डायन-प्रताड़ना 2015।
18. अभ्यास
नोट पढ़ने के बाद इस पेज के अंत में दिए 25 प्रश्नों का क्विज़ हल करें। गलत उत्तरों के लिए खंड 11 (शब्द → अर्थ मिलान), खंड 9 (ब्रिटिश काल की रोक) और खंड 13 (भ्रम व सावधानियाँ) दोहराएँ। विवाह की रस्मों का क्रम खंड 5 के अंत में दिए क्रम-सूत्र से याद करें।
19. निष्कर्ष: परीक्षा के लिए क्या याद रखें?
राजस्थान के रीति-रिवाज केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि सामूहिक जीवन की व्यवस्था हैं — जामणा और मायरा में ननिहाल की भूमिका, सामेला और बढार में अतिथि-सत्कार, सांतरवाड़ा में शोक की साझेदारी। पर इसी परंपरा में सती, कन्या वध, डाकन, त्याग, मौसर और बाल विवाह जैसी कुप्रथाएँ भी पनपीं, जिनके विरुद्ध 19वीं सदी की रियासती रोक, वाल्टरकृत सभा, समाज-सुधार आंदोलनों और स्वतंत्र भारत के कानूनों ने लंबा संघर्ष किया। परीक्षा के लिए तीन बातें सबसे महत्वपूर्ण हैं — शब्द का सही अर्थ, रस्म का सही अवसर/क्रम और रोक का सही राज्य व वर्ष।
आठवाँ–गर्भ | जलवा–पनघट | जड़ूला–मुंडन | ढूंढ–पहली होली | लगन–पीली चिट्ठी | सामेला–स्वागत | बढार–दूसरे दिन भोज | मायरा–ननिहाल | मुकलावा–गौना | आधेटा–आधा रास्ता | मौसर–मृत्युभोज | बूंदी–सती 1822
इस टॉपिक का क्विज़ कहाँ दें?
“राजस्थान के रीति-रिवाज, संस्कार एवं सामाजिक प्रथाएँ — RAS/CET” पढ़ने के बाद इन क्विज़ से तुरंत दोहराएँ — गलत उत्तर वाले बिंदु नोट में दोबारा देखें।
- राजस्थान के रीति-रिवाज एवं सामाजिक प्रथाएँ — अभ्यास क्विज़25 प्रश्नों से खुद को परखें
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महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)
आठवाँ पूजन जन्म से पहले होता है — स्त्री के गर्भ के सात माह पूरे होने पर (आठवें माह में) इष्टदेव की पूजा और प्रीतिभोज। जलवा पूजन (कुआँ/पनघट पूजन) जन्म के बाद प्रसूता द्वारा कुएँ या पनघट की पूजा है।
बालक के पहली बार बाल उतारने (मुंडन) की रस्म को जड़ूला कहते हैं। यह 16 संस्कारों में चूड़ाकर्म का राजस्थानी लोक-रूप है और प्रायः किसी कुलदेवता या लोकदेवता के स्थान पर किया जाता है।
सामेला बारात के वधू के गाँव पहुँचने पर वधू पक्ष द्वारा किया जाने वाला स्वागत (मधुपर्क) है, जबकि बढार विवाह के दूसरे दिन वधू पक्ष द्वारा बारात को दिया जाने वाला सामूहिक भोज है।
पुत्र या पुत्री के विवाह पर ननिहाल पक्ष (मामा) द्वारा दी जाने वाली भेंट — वस्त्र, आभूषण व नकद — को मायरा या भात कहते हैं। 'नरसी जी का मायरा' इससे जुड़ा प्रसिद्ध लोक-आख्यान है।
बाल विवाह के बाद वधू को तुरंत ससुराल नहीं भेजा जाता था; वयस्क होने पर उसे ससुराल भेजने की रस्म को मुकलावा या गौना कहते हैं।
आधेटा शवयात्रा में घर और श्मशान के बीच आधे रास्ते पर अर्थी रोककर दिशा बदलने व पिंडदान की रस्म है। सांतरवाड़ा दाह-संस्कार के बाद संबंधियों द्वारा शोक-संतप्त परिवार के पास बैठकर संवेदना प्रकट करना है, जो सामान्यतः 12 दिन तक चलता है।
मौसर (नुक्ता/औसर) मृत्यु के बाद दिया जाने वाला मृत्युभोज है, जबकि जौसर में व्यक्ति अपने जीवित रहते ही स्वयं का मृत्युभोज करवाता है।
नाता प्रथा में विवाहित स्त्री पति को छोड़कर अन्य पुरुष के साथ रह सकती है। ऐसे में नया पति पहले पति या उसके परिवार को जो हर्जाना-राशि देता है, उसे झगड़ा कहते हैं।
परीक्षा-पुस्तकों के अनुसार सती पर सर्वप्रथम रोक बूंदी (1822), कन्या वध पर कोटा (1833) और डाकन प्रथा पर मेवाड़ (1853, महाराणा स्वरूप सिंह) में लगी।
AGG कर्नल वाल्टर की पहल पर 1889 में अजमेर में बनी इस सभा ने राजपूतों में विवाह की न्यूनतम आयु (लड़की 14, लड़का 18 वर्ष), विवाह-खर्च, त्याग, बहुविवाह और मौसर पर नियंत्रण के नियम बनाए।
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