मांडणा, सांझी, गोदना व राजस्थान का लोक चित्रांकन — RAS/CET
कैसे बना: यह नोट सुयोग अकादमी के लेखक ने परीक्षा सिलेबस के अनुसार लिखा/संपादित किया है। प्रकाशन तिथि ऊपर और अंतिम संशोधन तिथि लेख के अंत में दी गई है। त्रुटि दिखे तो संपर्क करें। टीम परिचय
स्रोत आधार: RPSC / RSMSSB कला-संस्कृति इकाई (लोक कला, मेले, किले)। सिलेबस विषय; कॉपीराइट सामग्री का पेस्ट नहीं।
सुयोग AI गुरु
नोट्स के मुख्य बिंदु, मॉक MCQ या डाउट पूछें
संक्षिप्त उत्तर: राजस्थान की लोक चित्रांकन कलाएँ वे घरेलू व अनुष्ठानिक चित्र-परंपराएँ हैं जिन्हें प्रायः स्त्रियाँ और लोक-कलाकार त्योहार, संस्कार और पूजा के अवसर पर बनाते हैं। मांडणा — गोबर से लिपे आँगन, देहरी व दीवार पर खड़िया/चूना (सफेद) और गेरू (लाल) से बने ज्यामितीय अलंकरण; मुख्य अवसर दीपावली; प्रमुख आकृतियाँ स्वस्तिक, लक्ष्मी के पगल्या, चौक, मोर, बीजणी। सांझी — श्राद्ध पक्ष (भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या) में कुंवारी कन्याएँ दीवार पर गोबर से बनाकर पूजती हैं; उदयपुर का मछंदरनाथ मंदिर सांझी के लिए प्रसिद्ध। गोदना — सुई व काले/हरे रंग से शरीर पर स्थायी आकृतियाँ, विशेषकर भील, मीणा, गरासिया, सहरिया आदि जनजातियों में। मेहंदी — हाथ-पैर का अलंकरण; सोजत (पाली) की मेहंदी GI टैग प्राप्त। थापा — हल्दी/कुमकुम/मेहंदी से हथेली की छाप; पाने — कागज़ पर बने देवी-देवताओं के पूज्य चित्र; आला-गीला / आरायश — गीले चूने के प्लास्टर पर बना फ्रेस्को, जिसका सबसे बड़ा खुला संग्रह शेखावाटी की हवेलियाँ हैं। भराड़ी — भील समाज में कन्या के विवाह पर दीवार पर बना लोकदेवी का चित्र। फड़ (शाहपुरा), कावड़ (बस्सी) और पिछवाई (नाथद्वारा) चल/पट-चित्र परंपराएँ हैं।
संक्षिप्त उत्तर
लोक चित्रांकन | सतह / माध्यम | एक-पंक्ति पहचान |
|---|---|---|
मांडणा | भूमि व भित्ति; खड़िया-गेरू | दीपावली पर स्त्रियों द्वारा; स्वस्तिक, पगल्या, चौक |
सांझी | दीवार; गोबर, फूल-पत्ती | श्राद्ध पक्ष; कुंवारी कन्याएँ; मछंदरनाथ मंदिर (उदयपुर) |
गोदना | मानव शरीर (त्वचा) | सुई से स्थायी आकृति; जनजातीय समाज में अधिक |
मेहंदी | हाथ-पैर | सोजत (पाली) — GI टैग; तीज, गणगौर, विवाह |
थापा | दीवार / द्वार | हल्दी-कुमकुम-मेहंदी से हथेली की छाप; शुभ अवसर |
पाने | कागज़ | देवी-देवताओं के पूज्य चित्र; त्योहार पर स्थापना |
आला-गीला (आरायश) | गीला चूना-प्लास्टर | फ्रेस्को; जयपुर व शेखावाटी की हवेलियाँ |
कोहबर | दीवार (विवाह-कक्ष) | विवाह के अवसर पर वर-वधू से जुड़ा भित्ति-चित्र |
भराड़ी | दीवार | भील समाज — कन्या-विवाह पर लोकदेवी का चित्र |
देवरा / थान चित्र | थान की दीवार | घोड़े पर सवार लोकदेवता के चित्र |
फड़ | कपड़ा (पट) | शाहपुरा (भीलवाड़ा); पाबूजी-देवनारायण; भोपे |
कावड़ | लकड़ी (चल मंदिर) | बस्सी (चित्तौड़गढ़); कावड़िया भाट |
पिछवाई | कपड़ा | नाथद्वारा; श्रीनाथजी की मूर्ति के पीछे |
2. सिलेबस में यह टॉपिक क्यों महत्वपूर्ण है?
RAS, राजस्थान CET (12वीं व स्नातक), पटवारी, VDO, REET और SI के "राजस्थान की कला एवं संस्कृति" खंड में चित्रकला का प्रश्न लगभग तय रहता है। दरबारी शैलियों (मेवाड़, मारवाड़, बूंदी, किशनगढ़ आदि) के बाद प्रश्न-निर्माता लोक चित्रांकन — मांडणा, सांझी, फड़, कावड़, पाने, गोदना, मेहंदी, आला-गीला — से परिभाषा, अवसर और माध्यम आधारित प्रश्न बनाते हैं। यह नोट दरबारी शैलियों पर नहीं, बल्कि घर-आँगन, शरीर और दीवार पर बनने वाली लोक-कलाओं पर केंद्रित है; शैलियों के लिए राजस्थान की चित्रकला शैलियाँ नोट देखें।
परीक्षा उपयोगिता: ★★★★☆
RPSC RAS प्रारंभिक — "कौन सा सुमेलित नहीं है" (कला–अवसर–माध्यम), मांडणा/सांझी की परिभाषा
राजस्थान CET — एक-पंक्ति तथ्य: "श्राद्ध पक्ष में कन्याएँ क्या बनाती हैं?", "आरायश किसे कहते हैं?"
पटवारी, VDO, कांस्टेबल — स्थान आधारित: सोजत–मेहंदी, शाहपुरा–फड़, बस्सी–कावड़, नाथद्वारा–पिछवाई
REET (स्तर-1/2) — लोक संस्कृति व बच्चों की कला-शिक्षा के संदर्भ में मांडणा, सांझी
प्रश्न कैसे आते हैं?
चार रूप सबसे आम हैं — (1) परिभाषा → नाम: "कागज़ पर बने देवी-देवताओं के चित्र कहलाते हैं?" (पाने); (2) अवसर → कला: "पितृपक्ष में कुंवारी कन्याओं द्वारा बनाया जाने वाला चित्र" (सांझी); (3) पर्याय: "आला-गीला का अन्य नाम" (आरायश/फ्रेस्को); और (4) भ्रम-आधारित: मांडणा व सांझी, फड़ व पिछवाई, या कावड़ व फड़ को आपस में उलझाना।
3. पृष्ठभूमि: लोक चित्रांकन क्या है?
लोक चित्रांकन (Folk Painting / Ritual Art) वह चित्र-परंपरा है जो राजदरबार की नहीं, बल्कि जनसामान्य की है। इसके चित्रकार प्रायः प्रशिक्षित दरबारी चितेरे नहीं, बल्कि घर की स्त्रियाँ, कन्याएँ, भोपे, जोशी, भाट या जनजातीय समुदाय होते हैं। इन चित्रों का उद्देश्य सौंदर्य से अधिक मंगल-कामना, देव-आह्वान, रक्षा और संस्कार की पूर्ति है। सामग्री भी स्थानीय और सस्ती होती है — गोबर, मिट्टी, खड़िया, चूना, गेरू, हल्दी, कुमकुम, काजल, मेहंदी, फूल-पत्ती।
सरलता के लिए इन्हें सतह (surface) के आधार पर पाँच समूहों में बाँटा जा सकता है:
समूह | सतह | उदाहरण |
|---|---|---|
भूमि अलंकरण | आँगन, चौक, देहरी | मांडणा (भूमि पर), चौक |
भित्ति अलंकरण | घर/मंदिर/हवेली की दीवार | सांझी, थापा, कोहबर, भराड़ी, देवरा-चित्र, आला-गीला (फ्रेस्को) |
देह अलंकरण | मानव शरीर | गोदना (स्थायी), मेहंदी (अस्थायी) |
पट / कागज़ चित्र | कपड़ा, कागज़ | फड़, पिछवाई, पाने |
काष्ठ / चल चित्र | लकड़ी की संरचना | कावड़ |
दरबारी चित्रकला (लघुचित्र) और लोक चित्रांकन का अंतर समझना ज़रूरी है — लघुचित्र कागज़/वसली पर बारीक तूलिका से, राजाश्रय में बनते थे; लोक चित्रांकन सार्वजनिक या घरेलू सतह पर, अवसर विशेष के लिए बनता है और अनेक बार (जैसे मांडणा, सांझी, मेहंदी) अस्थायी होता है।
याद रखें: लोक चित्रांकन = अवसर + स्थानीय सामग्री + लोक-आस्था। "कब बनता है" और "किस पर बनता है" — परीक्षा में यही दो सवाल पूछे जाते हैं।
4. मांडणा — राजस्थान का भूमि-भित्ति अलंकरण
बिंदु | तथ्य |
|---|---|
शब्द-अर्थ | "मंडन" (सजाना/अलंकृत करना) से — अर्थात अलंकरण |
प्रकार | भूमि अलंकरण व भित्ति अलंकरण — दोनों; आँगन, चौक, देहरी, चबूतरा, दीवार |
सतह की तैयारी | पहले गोबर (या गोबर-मिट्टी) से लिपाई; सूखने पर चित्रण |
मुख्य रंग | खड़िया / चूना (सफेद) और गेरू (लाल); कहीं-कहीं हिरमिच (लाल मिट्टी) |
उपकरण | उंगलियाँ, रुई का फाहा, बालों या खजूर/दातुन जैसी टहनी से बनी कूंची |
कौन बनाता है | मुख्यतः घर की स्त्रियाँ; ज्ञान माँ से बेटी को मौखिक-व्यावहारिक रूप में |
मुख्य अवसर | दीपावली (सर्वाधिक); साथ ही होली, गणगौर, तीज, विवाह, जन्म, अन्य त्योहार |
प्रमुख आकृतियाँ | स्वस्तिक (सातिया), लक्ष्मी के पगल्या (पद-चिह्न), चौक, मोर, बीजणी (पंखा), कलश, दीपक, फूल-बेल, ज्यामितीय जाल |
उद्देश्य | देवी-देवताओं (विशेषकर लक्ष्मी) का स्वागत, घर की मंगल-कामना, बुरी शक्तियों से रक्षा |
क्षेत्र | पूरे राजस्थान में; हाड़ौती व पूर्वी राजस्थान (सवाई माधोपुर, टोंक, बूंदी, कोटा क्षेत्र) के मांडणे विशेष रूप से उल्लेखित; मध्य प्रदेश (मालवा) में भी |
4.1 मांडणा कैसे बनता है?
त्योहार से पहले घर की सफाई के बाद आँगन और दीवार को गोबर से लीपा जाता है। गोबर की हरी-भूरी पृष्ठभूमि पर पहले गेरू का लाल आधार (या गेरू की लिपाई) किया जाता है, फिर खड़िया/चूने की सफेद रेखाओं से आकृति उभारी जाती है। रेखाएँ प्रायः मुक्त हस्त (freehand) से खींची जाती हैं — कोई स्टेंसिल या साँचा नहीं। आकृतियाँ सममित (symmetrical) और ज्यामितीय होती हैं: वर्ग, वृत्त, त्रिभुज, षट्कोण और उनके भीतर बेल-बूटे।
4.2 प्रमुख आकृतियाँ और उनका अर्थ
आकृति | अर्थ / उपयोग |
|---|---|
स्वस्तिक (सातिया) | मंगल, शुभ-आरंभ; लगभग हर मांडणे का केंद्रीय चिह्न |
पगल्या (पगलिया) | लक्ष्मी जी के पद-चिह्न — दीपावली पर द्वार से भीतर की ओर, देवी के गृह-प्रवेश का संकेत |
चौक | वर्गाकार/आयताकार ज्यामितीय रचना; पूजा-स्थल या उत्सव का केंद्र |
मोर | राजस्थान का प्रिय पक्षी; सौंदर्य, वर्षा और उल्लास का प्रतीक |
बीजणी (पंखा) | गृहस्थी, शीतलता; दीवार व भूमि दोनों पर |
कलश / दीपक | समृद्धि व प्रकाश — दीपावली के मांडणों में विशेष |
फूल-बेल, पत्तियाँ | उर्वरता और निरंतरता; किनारी (बॉर्डर) में |
मांडणा केवल सजावट नहीं, बल्कि लोक-ज्ञान की लिपि है — कौन सी आकृति किस त्योहार पर बनेगी, यह परंपरा से तय होता है। उदाहरणार्थ दीपावली पर लक्ष्मी के पगल्या और दीपक, विवाह पर चौक और कलश प्रमुख रहते हैं। शहरीकरण के साथ पक्के फर्श पर गोबर-लिपाई घटी है, इसलिए आज पेंट और स्टिकर वाले "मांडणे" भी दिखते हैं; पर परीक्षा में पारंपरिक माध्यम — गोबर, खड़िया, गेरू — ही पूछा जाता है।
ट्रिक: "मांडणा = माँ + आँगन + दीपावली" — स्त्रियाँ, आँगन/दीवार, गेरू-खड़िया, लक्ष्मी के पगल्या।
5. सांझी — श्राद्ध पक्ष की कन्या-कला
बिंदु | तथ्य |
|---|---|
अवसर | श्राद्ध पक्ष / पितृपक्ष — भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या (लगभग 16 दिन) |
कौन बनाती हैं | कुंवारी कन्याएँ (अविवाहित बालिकाएँ) |
सतह व सामग्री | घर की दीवार; मुख्यतः गोबर, साथ में फूल-पत्ती, रंगीन कागज़, पन्नी, कौड़ी आदि से सजावट |
समय | संध्या (साँझ) के समय पूजन — इसी से नाम "सांझी" से जोड़ा जाता है |
पूज्य रूप | सांझी को देवी/पार्वती के रूप में पूजने की लोक-मान्यता |
उद्देश्य | कन्याओं द्वारा मनोवांछित/अच्छे वर की कामना |
विधि | प्रतिदिन नई आकृति; संध्या को पूजन व सांझी के लोकगीत; पक्ष के अंत में बड़ी सांझी (कई पुस्तकों में "कोट" या "किला कोट") और फिर विसर्जन |
प्रसिद्ध स्थल | उदयपुर का मछंदरनाथ मंदिर — सांझी के लिए प्रसिद्ध (परीक्षा-पुस्तकों का मानक तथ्य) |
मंदिर-परंपरा | वैष्णव (कृष्ण) मंदिरों में फूलों/रंगों की सांझी; नाथद्वारा में केले के पत्तों की सांझी का उल्लेख मिलता है |
अन्य क्षेत्र | मालवा (मध्य प्रदेश) में "संजा" नाम से; ब्रज क्षेत्र में भी प्रसिद्ध |
5.1 घरेलू सांझी और मंदिर सांझी
घरेलू सांझी लोक-अनुष्ठान है — गाँव की कन्याएँ दीवार पर गोबर से चाँद-सूरज, तारे, पंखा, चौपड़, पशु-पक्षी, गाड़ी आदि बनाकर उन्हें फूल-पत्तियों से सजाती हैं। हर शाम सखियाँ मिलकर सांझी के गीत गाती हैं और प्रसाद बाँटती हैं। मंदिर सांझी अधिक कलात्मक होती है — वैष्णव मंदिरों में राधा-कृष्ण की लीलाओं को फूलों, रंगीन चूर्ण या पत्तों से बनाया जाता है। परीक्षा-पुस्तकों में उदयपुर के मछंदरनाथ मंदिर की सांझी को प्रसिद्ध बताया जाता है और नाथद्वारा में केले के पत्तों की सांझी का उल्लेख मिलता है; मंदिर विशेष की परंपराएँ समय के साथ बदल सकती हैं, इसलिए उत्तर देते समय पुस्तक में दिए युग्म पर ही टिकें।
5.2 सांझी का सामाजिक अर्थ
बालिका-समूह की कला: सांझी लड़कियों को सामूहिक रूप से रचना, गीत और अनुष्ठान से जोड़ती है।
पितृपक्ष से जुड़ाव: जिस पक्ष में घर में पितरों का श्राद्ध होता है, उसी पक्ष में कन्याएँ सांझी बनाती हैं — एक ही समय में स्मृति और मंगल-कामना।
अस्थायी कला: पक्ष समाप्ति पर सांझी हटा दी जाती है — मांडणे की तरह यह भी "बनाने-मिटाने" वाली परंपरा है।
ट्रिक: "सांझ + श्राद्ध + सखी" — सांझी साँझ को, श्राद्ध पक्ष में, कुंवारी सखियाँ (कन्याएँ), गोबर से।
6. गोदना — शरीर पर स्थायी लोक चित्र
बिंदु | तथ्य |
|---|---|
अर्थ | सुई से त्वचा में रंग भरकर स्थायी आकृति बनाना — आधुनिक भाषा में टैटू (Tattoo); "गुदना" भी कहते हैं |
सामग्री | सुई (या सुइयों का गुच्छा); काजल/दीपक की कालिख, कोयले या वनस्पति से बना काला-हरा-नीला रंग |
समुदाय | भील, मीणा, गरासिया, सहरिया आदि जनजातियाँ तथा अनेक ग्रामीण व घुमंतू समुदाय; स्त्रियों में अधिक प्रचलन |
अंग | हाथ, कलाई, बाँह, ठोड़ी, माथा, पैर |
आकृतियाँ | फूल-पत्ती, बिंदु-रेखाएँ, मोर, बिच्छू, देवी-देवता, स्वस्तिक, अपना या पति का नाम |
लोक-मान्यता | सौंदर्य, पहचान, बुरी नज़र से रक्षा; लोक-विश्वास कि गोदना मृत्यु के बाद भी साथ जाता है (इसे "अमिट गहना" कहा जाता है) |
स्वरूप | स्थायी — मेहंदी के विपरीत, जो अस्थायी है |
जनजातीय समाज में गोदना आभूषण का विकल्प भी माना गया — जिसे न चुराया जा सकता है, न उतारा जा सकता है। कई जनजातियों में विशिष्ट आकृतियाँ समुदाय या कुल की पहचान का काम भी करती थीं। आज मशीन वाले टैटू ने पारंपरिक गोदने का स्थान बड़े हिस्से में ले लिया है, पर ग्रामीण मेलों में गोदना गोदने वाले आज भी मिल जाते हैं। जनजातियों की अन्य कला-परंपराओं के लिए राजस्थान की जनजातीय कला एवं हस्तशिल्प नोट देखें।
भ्रम: गोदना = स्थायी (सुई + रंग), मेहंदी = अस्थायी (पत्तियों का लेप)। दोनों "देह अलंकरण" हैं, पर परीक्षा में "स्थायी" शब्द आए तो उत्तर गोदना।
7. मेहंदी — सोजत और देह अलंकरण
बिंदु | तथ्य |
|---|---|
पौधा | मेहंदी (हिना; वैज्ञानिक नाम Lawsonia inermis) — पत्तियों का चूर्ण/लेप |
सबसे प्रसिद्ध केंद्र | सोजत (पाली जिला) — "मेहंदी नगरी" |
GI टैग | "सोजत मेहंदी" को भौगोलिक संकेतक (GI) प्राप्त — परीक्षा-पुस्तकों में इसका पंजीकरण 2021 के आसपास बताया जाता है |
अवसर | तीज, गणगौर, करवा चौथ, विवाह (मेहंदी की रस्म), दीपावली व अन्य त्योहार |
कौन लगाता है | मुख्यतः स्त्रियाँ व कन्याएँ; विवाह में दूल्हे को भी शगुन की मेहंदी |
आकृतियाँ | बेल-बूटे, फूल, मोर, कलश, डोली, बिंदु-जाल; हथेली के बीच गोल "टिकी" |
स्वरूप | अस्थायी — कुछ दिनों में रंग उतर जाता है |
राजस्थान में मेहंदी सौभाग्य का प्रतीक है — "मेहंदी का रंग जितना गहरा, उतना प्यार/सौभाग्य" जैसी लोकोक्तियाँ प्रचलित हैं। सोजत क्षेत्र की शुष्क जलवायु और मिट्टी में उगने वाली मेहंदी की पत्तियों में रंग देने वाले तत्व (लॉसोन) की अच्छी मात्रा मानी जाती है, जिससे इसकी अलग पहचान बनी। राजस्थान के अन्य GI उत्पादों की सूची के लिए राजस्थान के GI Tagged Products नोट देखें; तीज और गणगौर पर मेहंदी की परंपरा के लिए तीज पर्व और गणगौर पर्व नोट उपयोगी हैं।
ट्रिक: "सो-जत में मेहंदी सोहे" — सोजत (पाली) = मेहंदी = GI। सोजत को जोधपुर या जालौर से न जोड़ें।
8. थापा — हाथ के छाप
थापा (हाथा/हथेली की छाप) सबसे सरल लोक चित्रांकन है — हल्दी, कुमकुम (रोली), मेहंदी, गेरू या चावल के घोल में हथेली डुबोकर दीवार या द्वार पर छाप लगाई जाती है। यह मंगल-चिह्न है और विवाह, जन्म, गृह-प्रवेश, त्योहार या मनौती पूरी होने पर लगाया जाता है।
विवाह में: वधू या घर की स्त्रियाँ द्वार के पास हल्दी/कुमकुम के थापे लगाती हैं — शुभ आगमन और घर में मंगल का संकेत।
पूजा व मनौती में: लोकदेवी-देवता के स्थान पर मनौती पूरी होने पर हाथ की छाप लगाने की परंपरा मिलती है।
मांडणे से अंतर: मांडणा रेखाओं से बनी रचना है; थापा केवल हथेली की छाप — इसमें आकृति खींची नहीं जाती।
ध्यान रहे, कई दुर्गों के द्वारों पर दिखने वाले सती के हाथों के छापे (सती स्मृति-चिह्न) ऐतिहासिक स्मारक हैं; वे इस घरेलू मंगल-थापे से भिन्न संदर्भ रखते हैं।
9. पाने — कागज़ पर देव-चित्र
बिंदु | तथ्य |
|---|---|
परिभाषा | कागज़ पर बने देवी-देवताओं के चित्र, जिन्हें त्योहार/पूजा पर घर में स्थापित कर पूजा जाता है |
उदाहरण | दीपावली पर लक्ष्मी जी का पाना; गणेश, कृष्ण, हनुमान, लोकदेवताओं (जैसे रामदेवजी) के पाने |
प्रसिद्ध | नाथद्वारा के श्रीनाथजी के पाने — सबसे कलात्मक माने जाते हैं |
स्वरूप | छोटे आकार के, सस्ते, सुलभ; हर वर्ष नया पाना लाने की परंपरा भी |
पहचान-कुंजी | "कागज़ + देवी-देवता + पूजा" = पाने |
पाने लोक और दरबारी कला के बीच की कड़ी हैं — इन्हें प्रायः चितेरे (पेशेवर लोक-चित्रकार) बनाते और मेलों/बाज़ारों में बेचते थे; बाद में छापे (प्रिंट) वाले पाने आम हो गए। नाथद्वारा में पिछवाई और पाने — दोनों परंपराएँ श्रीनाथजी की भक्ति से जुड़ी हैं, पर पिछवाई कपड़े पर और पाना कागज़ पर बनता है।
ट्रिक: "पाना = पन्ना (कागज़)" — कागज़ के पन्ने पर देवता = पाना।
10. भित्ति चित्र: आला-गीला (आरायश) और शेखावाटी
बिंदु | तथ्य |
|---|---|
आला-गीला | गीले (ताज़ा) चूने के प्लास्टर पर रंग भरकर बनाया गया भित्ति चित्र — फ्रेस्को (Fresco Buono) |
अन्य नाम | आरायश (फ़ारसी मूल का शब्द, अर्थ — सजावट/अलंकरण) |
तकनीक का गुण | रंग प्लास्टर के साथ सूखकर उसी का भाग बन जाते हैं — इसलिए अधिक टिकाऊ |
प्रभाव | मुगल प्रभाव से राजस्थान में लोकप्रिय; जयपुर (ढूंढाड़) शैली में विशेष उपयोग |
सबसे बड़ा संग्रह | शेखावाटी (झुंझुनूं, सीकर, चूरू) की हवेलियाँ — "खुली कला दीर्घा" (Open Air Art Gallery) |
प्रमुख कस्बे | नवलगढ़, मंडावा, फतेहपुर, रामगढ़ (शेखावाटी), मुकुंदगढ़, बिसाऊ, लक्ष्मणगढ़ आदि |
विषय | देवी-देवता, कृष्ण-लीला, रामायण, लोकगाथाएँ (ढोला-मारू), शिकार, तथा अंग्रेज़ी प्रभाव से रेलगाड़ी, मोटरकार, अंग्रेज़ अफ़सर |
संरक्षक | मुख्यतः मारवाड़ी व्यापारी (सेठ) — 18वीं–20वीं सदी के प्रारंभ तक |
10.1 आला-गीला क्यों विशेष है?
साधारण भित्ति चित्र सूखी दीवार पर बनाए जाते हैं, जिनका रंग समय के साथ झड़ सकता है। आला-गीला में दीवार पर चूने (और बारीक पत्थर-चूर्ण) का प्लास्टर लगाकर, उसके गीले रहते ही खनिज रंग भरे जाते हैं। चूने की रासायनिक क्रिया से रंग प्लास्टर में "बँध" जाते हैं। यही कारण है कि शेखावाटी और जयपुर क्षेत्र के कई चित्र लगभग दो सदियों बाद भी पहचाने जा सकते हैं। बूंदी की चित्रशाला के भित्ति चित्र भी राजस्थान की भित्ति-परंपरा के प्रसिद्ध उदाहरण हैं — विस्तार बूंदी चित्रकला व चित्रशाला नोट में।
शेखावाटी हवेलियों के स्थापत्य, कस्बों और चित्र-विषयों का विस्तृत विवरण शेखावाटी की हवेलियाँ: भित्तिचित्र और राजस्थान की हवेलियाँ नोट्स में है; जयपुर शैली के लिए जयपुर चित्रकला शैली देखें।
याद रखें: आला-गीला = आरायश = फ्रेस्को = गीले चूने पर चित्र। "गीला" शब्द ही तकनीक बता देता है।
11. संस्कार व लोकदेवता से जुड़े भित्ति चित्र: कोहबर, भराड़ी, देवरा
11.1 कोहबर
कोहबर विवाह से जुड़ा भित्ति चित्र है — विवाह के अवसर पर वर-वधू के कक्ष (कोहबर-घर) या घर की दीवार पर मंगल-चिह्न, देवी-देवता, बेल-बूटे, पशु-पक्षी और उर्वरता के प्रतीक बनाए जाते हैं। राजस्थान की लोक-कला सूचियों में "कोहबर" का उल्लेख मिलता है, यद्यपि यह परंपरा मिथिला (बिहार) क्षेत्र में अधिक प्रसिद्ध है। परीक्षा के लिए पहचान-कुंजी: "विवाह + वर-वधू का कक्ष + भित्ति चित्र"।
11.2 भराड़ी — भील समाज का वैवाहिक भित्ति चित्र
बिंदु | तथ्य |
|---|---|
समुदाय | भील जनजाति (दक्षिणी राजस्थान — बाँसवाड़ा, डूंगरपुर, उदयपुर क्षेत्र) |
अवसर | कन्या (लड़की) के विवाह पर |
सतह | घर की दीवार (भीत) |
विषय | "भराड़ी" नामक लोकदेवी का चित्र — वैवाहिक जीवन में सुख-समृद्धि की कामना |
पहचान-कुंजी | "भील + विवाह + दीवार पर देवी" = भराड़ी |
भराड़ी इस बात का उदाहरण है कि जनजातीय समाज में चित्रकला संस्कार का अनिवार्य अंग है, न कि केवल सजावट। भील संस्कृति के अन्य पक्षों — नृत्य, त्योहार, सामाजिक परंपराएँ — के लिए भील जनजाति की संस्कृति नोट देखें।
11.3 देवरा / थान चित्र और पथवारी
देवरा / थान चित्र: लोकदेवताओं के थान (चबूतरे) या देवरे की दीवारों पर चूने-गेरू से घोड़े पर सवार लोकदेवता (जैसे रामदेवजी, पाबूजी, तेजाजी, गोगाजी), उनके प्रतीक-चिह्न और ध्वजाएँ चित्रित की जाती हैं। ये चित्र भक्तों द्वारा मनौती या मेले के अवसर पर नए बनाए/रंगे जाते हैं।
पथवारी: गाँव के बाहर रास्ते के किनारे "पथवारी" (मार्ग की रक्षक लोकदेवी) का स्थान, जिसे चित्रित/अलंकृत किया जाता है; तीर्थयात्रा पर जाने से पहले या लौटने पर स्त्रियाँ इसकी पूजा करती हैं। (क्षेत्रानुसार विवरण में अंतर मिलता है।)
लोकदेवताओं की गाथाओं और भोपों की परंपरा के लिए लोकदेवता एवं लोकगाथाएँ: फड़, भोपे एवं लोक परंपरा नोट देखें।
12. पट व चल-चित्र परंपरा: फड़, कावड़, पिछवाई (संक्षेप)
ये तीनों लोक-कलाएँ इस साइट पर अलग विस्तृत नोट्स में हैं; यहाँ केवल तुलना के लिए मुख्य बिंदु दिए गए हैं।
कला | माध्यम | केंद्र | विषय / उपयोग | कलाकार / वाचक |
|---|---|---|---|---|
फड़ | लंबा कपड़ा (पट) | शाहपुरा (भीलवाड़ा) | लोकदेवताओं की गाथा — पाबूजी, देवनारायण जी (सबसे लंबी फड़ देवनारायण जी की) | चित्रकार: शाहपुरा के जोशी परिवार; वाचन: भोपे (पाबूजी — रावणहत्था, देवनारायण — जंतर) |
कावड़ | लकड़ी का कई कपाटों वाला चल मंदिर | बस्सी (चित्तौड़गढ़) | राम, कृष्ण आदि की कथाएँ; कपाट खोलते हुए कथा | निर्माण: खेरादी (खैरादी) समुदाय; वाचन: कावड़िया भाट |
पिछवाई | कपड़ा | नाथद्वारा (राजसमंद) | श्रीनाथजी की प्रतिमा के पीछे टाँगा जाने वाला चित्र; कृष्ण-लीला, ऋतु-उत्सव | वल्लभ संप्रदाय से जुड़े नाथद्वारा के चित्रकार |
विस्तार के लिए देखें: फड़ चित्रकला — पाबूजी व देवनारायण, कावड़ कला: बस्सी (चित्तौड़गढ़) और नाथद्वारा की पिछवाई चित्रकला।
ट्रिक: "फड़ फैलती है, कावड़ खुलती है, पिछवाई पीछे टँगती है" — फड़ = कपड़ा फैलाकर गाथा, कावड़ = लकड़ी के कपाट खोलकर कथा, पिछवाई = श्रीनाथजी के पीछे।
13. मास्टर तुलना तालिका: कला–माध्यम–अवसर–क्षेत्र/समुदाय
कला | माध्यम / सामग्री | अवसर | क्षेत्र / समुदाय | स्थायी / अस्थायी |
|---|---|---|---|---|
मांडणा | गोबर-लिपी भूमि/दीवार; खड़िया, गेरू | दीपावली, त्योहार, विवाह | पूरा राजस्थान; हाड़ौती-पूर्वी क्षेत्र विशेष; घर की स्त्रियाँ | अस्थायी (फिर-फिर बनता) |
सांझी | दीवार; गोबर, फूल-पत्ती | श्राद्ध पक्ष | कुंवारी कन्याएँ; मछंदरनाथ मंदिर (उदयपुर), नाथद्वारा | अस्थायी |
गोदना | त्वचा; सुई, काजल/कालिख | जीवन में कभी भी; सौंदर्य-पहचान | भील, मीणा, गरासिया, सहरिया आदि | स्थायी |
मेहंदी | हाथ-पैर; मेहंदी लेप | तीज, गणगौर, विवाह | सर्वत्र; केंद्र सोजत (पाली) | अस्थायी |
थापा | दीवार/द्वार; हल्दी, कुमकुम, मेहंदी | विवाह, जन्म, मनौती | ग्रामीण-नगरीय घर | अर्ध-स्थायी |
पाने | कागज़ | दीपावली व अन्य त्योहार | नाथद्वारा (श्रीनाथजी के पाने) व अन्य | हर वर्ष नया |
आला-गीला (आरायश) | गीला चूना-प्लास्टर; खनिज रंग | भवन-निर्माण के समय | जयपुर, शेखावाटी हवेलियाँ | स्थायी |
कोहबर | दीवार | विवाह | विवाह-कक्ष; (मिथिला में अधिक प्रसिद्ध) | अर्ध-स्थायी |
भराड़ी | दीवार | कन्या-विवाह | भील जनजाति | अर्ध-स्थायी |
देवरा/थान चित्र | थान की दीवार; चूना-गेरू | मेला, मनौती | लोकदेवताओं के थान — सर्वत्र | समय-समय पर नवीनीकरण |
फड़ | कपड़ा | भोपों द्वारा रात्रि वाचन | शाहपुरा (भीलवाड़ा) | स्थायी (पट) |
कावड़ | लकड़ी | कावड़िया भाट का कथा-वाचन | बस्सी (चित्तौड़गढ़) | स्थायी |
पिछवाई | कपड़ा | ऋतु व उत्सव अनुसार बदलती | नाथद्वारा (राजसमंद) | स्थायी |
14. मांडणा के भारतीय समकक्ष (भूमि अलंकरण)
भूमि अलंकरण पूरे भारत की परंपरा है; अलग-अलग राज्यों में इसके नाम अलग हैं। "निम्न में से कौन सा युग्म सही नहीं है" वाले प्रश्नों के लिए यह तालिका उपयोगी है:
भूमि अलंकरण का नाम | राज्य / क्षेत्र |
|---|---|
मांडणा | राजस्थान (और मध्य प्रदेश का मालवा) |
रंगोली | महाराष्ट्र, गुजरात व अन्य |
अल्पना | पश्चिम बंगाल |
कोलम | तमिलनाडु |
मुग्गु | आंध्र प्रदेश, तेलंगाना |
ऐपण | उत्तराखंड (कुमाऊँ) |
अरिपन | बिहार (मिथिला) |
चौक पूरना | उत्तर प्रदेश |
ट्रिक: "मांड-राज, अल्प-बंग, कोल-तमिल, ऐपण-पहाड़" — मांडणा राजस्थान, अल्पना बंगाल, कोलम तमिलनाडु, ऐपण उत्तराखंड।
15. भ्रम व सावधानियाँ (Exam Trap Section)
भ्रम | सही तथ्य |
|---|---|
मांडणा और सांझी एक ही हैं | नहीं। मांडणा — स्त्रियाँ, मुख्यतः दीपावली, भूमि+दीवार, खड़िया-गेरू। सांझी — कुंवारी कन्याएँ, श्राद्ध पक्ष, दीवार, गोबर-फूल। |
सांझी नवरात्रि में बनती है | नहीं। सांझी श्राद्ध पक्ष (पितृपक्ष) में बनती है; नवरात्रि उसके बाद आश्विन शुक्ल पक्ष में आती है। |
आला-गीला और आरायश अलग तकनीकें हैं | नहीं। दोनों एक ही — गीले चूने पर फ्रेस्को। "आरायश" उसका फ़ारसी मूल का नाम है। |
पाने कपड़े पर बनते हैं | नहीं। पाने कागज़ पर बनते हैं; कपड़े पर फड़ और पिछवाई बनती हैं। |
फड़ नाथद्वारा की कला है | नहीं। फड़ — शाहपुरा (भीलवाड़ा); नाथद्वारा — पिछवाई (और श्रीनाथजी के पाने)। |
कावड़ कपड़े पर बनी कथा है | नहीं। कावड़ लकड़ी का चल मंदिर है, जिसके कपाट खोलकर कथा कही जाती है — बस्सी (चित्तौड़गढ़)। |
गोदना अस्थायी होता है | नहीं। गोदना स्थायी है; अस्थायी देह-अलंकरण मेहंदी है। |
सोजत जोधपुर जिले में है | नहीं। सोजत पाली जिले में है — "मेहंदी नगरी"। |
भराड़ी मीणा समाज की कला है | परीक्षा-पुस्तकों के अनुसार भराड़ी भील जनजाति से जुड़ी है — कन्या-विवाह पर दीवार पर देवी का चित्र। |
थापा और मांडणा एक हैं | नहीं। थापा केवल हथेली की छाप है; मांडणा रेखाओं से खींची गई रचना। |
शेखावाटी के भित्ति चित्र राजाओं ने बनवाए | मुख्यतः नहीं। शेखावाटी की हवेलियाँ और उनके भित्ति चित्र मुख्यतः मारवाड़ी व्यापारियों (सेठों) ने बनवाए। |
16. परीक्षा में पूछे जाने वाले तथ्य (One-liners)
राजस्थान का प्रमुख भूमि अलंकरण — मांडणा।
मांडणा के दो पारंपरिक रंग — खड़िया/चूना (सफेद) और गेरू (लाल)।
मांडणे से पहले सतह की लिपाई — गोबर से।
दीपावली पर लक्ष्मी के पद-चिह्नों वाला मांडणा — पगल्या।
मांडणा मुख्यतः कौन बनाता है — घर की स्त्रियाँ।
श्राद्ध पक्ष में कुंवारी कन्याओं द्वारा दीवार पर बनाया जाने वाला चित्र — सांझी।
सांझी के लिए प्रसिद्ध मंदिर — मछंदरनाथ मंदिर, उदयपुर।
केले के पत्तों की सांझी का उल्लेख — नाथद्वारा।
मालवा (मध्य प्रदेश) में सांझी का नाम — संजा।
शरीर पर सुई से बनी स्थायी आकृति — गोदना।
मेहंदी नगरी — सोजत (पाली); "सोजत मेहंदी" को GI टैग।
हल्दी-कुमकुम से हथेली की छाप — थापा।
कागज़ पर बने देवी-देवताओं के पूज्य चित्र — पाने।
सबसे कलात्मक पाने — नाथद्वारा के श्रीनाथजी के पाने।
गीले चूने के प्लास्टर पर चित्रण — आला-गीला (आरायश / फ्रेस्को)।
"खुली कला दीर्घा" (Open Air Art Gallery) — शेखावाटी।
भील समाज में कन्या-विवाह पर दीवार पर बना देवी-चित्र — भराड़ी।
विवाह के समय वर-वधू के कक्ष का भित्ति चित्र — कोहबर।
फड़ चित्रण का केंद्र — शाहपुरा (भीलवाड़ा), जोशी परिवार।
कावड़ का केंद्र — बस्सी (चित्तौड़गढ़); निर्माता खेरादी; वाचक कावड़िया भाट।
श्रीनाथजी की प्रतिमा के पीछे टाँगा जाने वाला चित्र — पिछवाई (नाथद्वारा)।
बंगाल का भूमि अलंकरण — अल्पना; तमिलनाडु का — कोलम; उत्तराखंड का — ऐपण।
17. इसे आसानी से याद कैसे रखें?
"मां-सां-गो-मे-था-पा" — मांडणा (भूमि), सांझी (श्राद्ध), गोदना (स्थायी), मेहंदी (सोजत), थापा (हथेली), पाने (कागज़)।
"दीप पर मांडणा, पितर पर सांझी" — दीपावली = मांडणा; पितृपक्ष = सांझी।
"गीला = आला = आरायश = शेखावाटी" — गीले प्लास्टर का फ्रेस्को, सबसे बड़ा संग्रह शेखावाटी में।
"भील की बेटी, भीत पर भराड़ी" — भील + कन्या-विवाह + दीवार = भराड़ी।
"शाह की फड़, बस्सी की कावड़, नाथ की पिछवाई" — शाहपुरा, बस्सी, नाथद्वारा।
18. संबंधित नोट्स
राजस्थान की चित्रकला शैलियाँ — दरबारी लघुचित्र शैलियों का ढाँचा
फड़ चित्रकला — पाबूजी व देवनारायण — शाहपुरा, जोशी परिवार, भोपे
कावड़ कला: बस्सी (चित्तौड़गढ़) — चल मंदिर व कावड़िया भाट
नाथद्वारा की पिछवाई चित्रकला — श्रीनाथजी व वल्लभ संप्रदाय
शेखावाटी की हवेलियाँ: भित्तिचित्र — आला-गीला का सबसे बड़ा संग्रह
राजस्थान के GI Tagged Products — सोजत मेहंदी सहित
राजस्थान की जनजातीय कला एवं हस्तशिल्प — गोदना व जनजातीय कला
राजस्थान के रीति-रिवाज, संस्कार व सामाजिक प्रथाएँ — विवाह-संस्कार, जहाँ थापा, मेहंदी, कोहबर बनते हैं
राजस्थान चित्रकला के 100 महत्वपूर्ण तथ्य — त्वरित रिवीज़न
19. एक दिन पहले — रिवीज़न सूची
मांडणा — गोबर-लिपाई, खड़िया-गेरू, स्त्रियाँ, दीपावली; स्वस्तिक, पगल्या, चौक, मोर, बीजणी; हाड़ौती-पूर्वी राजस्थान विशेष।
सांझी — श्राद्ध पक्ष (भाद्रपद पूर्णिमा–आश्विन अमावस्या), कुंवारी कन्याएँ, गोबर-फूल, साँझ को पूजा, अच्छे वर की कामना; मछंदरनाथ मंदिर (उदयपुर); नाथद्वारा — केले के पत्तों की सांझी; मालवा — संजा।
गोदना — सुई + काजल/कालिख, स्थायी, जनजातियाँ (भील, मीणा, गरासिया, सहरिया), "अमिट गहना"।
मेहंदी — सोजत (पाली), GI, अस्थायी; तीज-गणगौर-विवाह।
थापा — हथेली की छाप; पाने — कागज़ पर देवता, श्रीनाथजी के पाने।
आला-गीला = आरायश = फ्रेस्को; जयपुर व शेखावाटी; शेखावाटी = Open Air Art Gallery; मारवाड़ी सेठ संरक्षक।
कोहबर — विवाह-कक्ष; भराड़ी — भील, कन्या-विवाह, दीवार पर देवी; देवरा — घोड़े पर सवार लोकदेवता; पथवारी — मार्ग की देवी।
फड़ — शाहपुरा, जोशी, कपड़ा; कावड़ — बस्सी, खेरादी, लकड़ी; पिछवाई — नाथद्वारा, कपड़ा।
समकक्ष — रंगोली (महाराष्ट्र/गुजरात), अल्पना (बंगाल), कोलम (तमिलनाडु), ऐपण (उत्तराखंड), अरिपन (बिहार), चौक पूरना (उ.प्र.)।
20. अभ्यास
नोट पढ़ने के बाद इस पेज के अंत में दिए 25 प्रश्नों का क्विज़ हल करें। जिन प्रश्नों में गलती हो, उनके लिए खंड 13 (मास्टर तुलना तालिका), खंड 15 (भ्रम व सावधानियाँ) और खंड 16 (One-liners) दोहराएँ। ध्यान रखें कि अधिकांश प्रश्न अवसर (दीपावली/श्राद्ध पक्ष/विवाह) और माध्यम (भूमि/दीवार/शरीर/कागज़/कपड़ा/लकड़ी) पर टिके होते हैं।
21. निष्कर्ष: परीक्षा के लिए क्या याद रखें?
राजस्थान का लोक चित्रांकन दरबारों से बाहर, घर-आँगन, दीवार, देह और देवस्थान पर जीवित परंपरा है। मांडणा दीपावली पर लक्ष्मी का स्वागत करता है, सांझी पितृपक्ष में कन्याओं की मंगल-कामना है, गोदना और मेहंदी देह को अलंकृत करते हैं, थापा और पाने घर को पवित्र करते हैं, भराड़ी व कोहबर विवाह-संस्कार का हिस्सा हैं, और आला-गीला ने शेखावाटी को खुली कला दीर्घा बना दिया। परीक्षा के लिए तीन चीज़ें पक्की रखें — अवसर, माध्यम और मिलते-जुलते नामों के भ्रम।
मांडणा–दीपावली–गेरू-खड़िया | सांझी–श्राद्ध–कन्याएँ–मछंदरनाथ | गोदना–स्थायी | मेहंदी–सोजत–GI | थापा–हथेली | पाने–कागज़ | आला-गीला–आरायश–शेखावाटी | भराड़ी–भील विवाह | फड़–शाहपुरा | कावड़–बस्सी | पिछवाई–नाथद्वारा
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“मांडणा, सांझी, गोदना व राजस्थान का लोक चित्रांकन — RAS/CET” पढ़ने के बाद इन क्विज़ से तुरंत दोहराएँ — गलत उत्तर वाले बिंदु नोट में दोबारा देखें।
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महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)
मांडणा राजस्थान का भूमि व भित्ति अलंकरण है, जिसे घर की स्त्रियाँ गोबर से लिपे आँगन, देहरी और दीवार पर खड़िया/चूना (सफेद) और गेरू (लाल) से बनाती हैं। इसका सबसे प्रमुख अवसर दीपावली है; होली, गणगौर, तीज और विवाह पर भी मांडणे बनते हैं।
स्वस्तिक (सातिया), लक्ष्मी के पगल्या (पद-चिह्न), चौक, मोर, बीजणी (पंखा), कलश, दीपक और फूल-बेल मांडणे की प्रमुख आकृतियाँ हैं। दीपावली पर पगल्या और दीपक विशेष रूप से बनाए जाते हैं।
सांझी श्राद्ध पक्ष (भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या) में कुंवारी कन्याएँ घर की दीवार पर गोबर से बनाती हैं और फूल-पत्तियों से सजाकर संध्या को पूजती हैं। इसे अच्छे वर की कामना से जोड़ा जाता है।
परीक्षा-पुस्तकों के अनुसार उदयपुर का मछंदरनाथ मंदिर सांझी के लिए प्रसिद्ध है। नाथद्वारा में केले के पत्तों की सांझी का उल्लेख भी मिलता है।
मांडणा मुख्यतः स्त्रियाँ दीपावली व अन्य त्योहारों पर भूमि और दीवार पर खड़िया-गेरू से बनाती हैं, जबकि सांझी कुंवारी कन्याएँ केवल श्राद्ध पक्ष में दीवार पर गोबर व फूल-पत्ती से बनाती हैं।
गोदना सुई और काजल/कालिख जैसे रंग से त्वचा पर बनाई गई स्थायी आकृति है, जिसे आज टैटू कहा जाता है। राजस्थान में यह भील, मीणा, गरासिया, सहरिया आदि जनजातियों और ग्रामीण स्त्रियों में अधिक प्रचलित रहा है।
पाली जिले का सोजत 'मेहंदी नगरी' कहलाता है और 'सोजत मेहंदी' को GI टैग प्राप्त है। मेहंदी तीज, गणगौर, करवा चौथ और विवाह पर लगाई जाती है।
कागज़ पर बने देवी-देवताओं के चित्र, जिन्हें त्योहार या पूजा पर घर में स्थापित कर पूजा जाता है, पाने कहलाते हैं। नाथद्वारा के श्रीनाथजी के पाने सबसे कलात्मक माने जाते हैं।
आला-गीला गीले चूने के प्लास्टर पर रंग भरकर बनाया गया भित्ति चित्र (फ्रेस्को) है; इसका दूसरा नाम आरायश है। जयपुर क्षेत्र और शेखावाटी की हवेलियों में इसके सर्वाधिक उदाहरण मिलते हैं।
भराड़ी भील जनजाति से जुड़ा भित्ति चित्र है, जो कन्या के विवाह पर घर की दीवार पर बनाया जाता है। इसमें भराड़ी नामक लोकदेवी का चित्र वैवाहिक सुख-समृद्धि की कामना से बनाया जाता है।
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