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राजस्थान इतिहास

चौहान राजवंश का इतिहास: उत्पत्ति, शाकंभरी के मूल चौहान और अजमेर का स्वर्णिम काल

Sudhir Dhaka (इतिहास विशेषज्ञ)
22 सितंबर 2025
7 मिनट पठन
चौहान राजवंश का इतिहास: उत्पत्ति, शाकंभरी के मूल चौहान और अजमेर का स्वर्णिम काल

परिचय: चौहान राजवंश का ऐतिहासिक व सामरिक महत्व

राजस्थान के मध्यकालीन इतिहास को आकार देने में चौहान (चाहमान) राजवंश का योगदान अतुलनीय रहा है। उत्तर-पश्चिम भारत की सीमाओं पर विदेशी आक्रांताओं के खिलाफ एक मजबूत रक्षा कवच तैयार करने का श्रेय इसी राजवंश के प्रतापी शासकों को जाता है। सातवीं शताब्दी से लेकर बारहवीं शताब्दी के अंत तक, चौहानों ने अपनी वीरता, कूटनीति और अद्वितीय स्थापत्य कला से संपूर्ण भारतवर्ष को प्रभावित किया। RPSC (RAS, स्कूल व्याख्याता, द्वितीय श्रेणी शिक्षक) और RSMSSB (CET, पटवारी, वीडियो, कनिष्ठ लेखाकार) जैसी परीक्षाओं के पाठ्यक्रम में ‘चाहमान साम्राज्य’ एक अत्यंत महत्वपूर्ण और अनिवार्य खंड है। इस विस्तृत मास्टर-नोट्स में हम चौहानों की उत्पत्ति के विभिन्न सिद्धांतों, शाकंभरी के प्रारंभिक शासकों और अजमेर के चौहान वंश के चरम उत्कर्ष का प्रामाणिक व शोध-आधारित विश्लेषण करेंगे।

1. चौहान राजवंश की उत्पत्ति के प्रमुख सिद्धांत (Theories of Origin)

चाहमान या चौहान शासकों की उत्पत्ति को लेकर इतिहासकारों, चारणों और समकालीन शिलालेखों में गहरी भिन्नता है। परीक्षा के दृष्टिकोण से इन सिद्धांतों का विश्लेषणात्मक ज्ञान होना आवश्यक है:

(A) अग्निकुंड का सिद्धांत (Agnikula Theory)

  • प्रतिपादक: इस मत के मूल प्रतिपादक महाकवि चंदबरदाई हैं, जिन्होंने अपने अमर महाकाव्य “पृथ्वीराज रासो” में इसका सविस्तार वर्णन किया है।
  • सिद्धांत का स्वरूप: इस सिद्धांत के अनुसार, आबू पर्वत पर महर्षि वशिष्ठ द्वारा राक्षसों (मलेच्छों/विदेशी आक्रांताओं) के विनाश और धर्म की रक्षा के लिए एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया गया था। इस यज्ञ के अग्निकुंड से क्रमशः चार राजपूत योद्धा उत्पन्न हुए: प्रतिहार, परमार, चालुक्य (सोलंकी), और चौथे नंबर पर सबसे शक्तिशाली योद्धा ‘चाहमान’ (चौहान) प्रकट हुए।
  • समर्थक: इस पौराणिक मत को मध्यकाल में महान इतिहासकार मुंहणोत नैणसी (नैणसी री ख्यात) और सूर्यमल मिश्रण (वंश भास्कर) ने भी अपना समर्थन प्रदान किया। आधुनिक संदर्भ में इसे राजपूतों के शुद्धिकरण या सामाजिक उत्थान का सांकेतिक रूप माना जाता है।

(B) सूर्यवंशी एवं चंद्रवंशी सिद्धांत

  • सूर्यवंशी मत: हम्मीर महाकाव्य (नयनचंद्र सूरी), पृथ्वीराज विजय (जयानक भट्ट), सुर्जन चरित (चंद्रशेखर), और बेदला शिलालेख के अनुसार चौहानों को सूर्यवंशी माना गया है। जयानक ने पृथ्वीराज तृतीय को सूर्यवंशी सिद्ध करने के लिए अनेक तार्किक तर्क दिए हैं।
  • चंद्रवंशी मत: झाँसी शिलालेख और अचलेश्वर (आबू) के ऐतिहासिक लेखों में चौहान राजवंश का संबंध चंद्रवंश से जोड़ा गया है।

(C) ब्राह्मण वंश से उत्पत्ति का सिद्धांत (Vatsa Brahmin Theory)

  • शिलालेखीय साक्ष्य: 1170 ईस्वी के सुप्रसिद्ध बिजोलिया शिलालेख (भीलवाड़ा) के अनुसार चौहानों के आदिपुरुष वासुदेव को “वत्स गोत्रीय ब्राह्मण” (Vatsa Gotriya Brahmin) बताया गया है।
  • इतिहासकारों का मत: सुप्रसिद्ध आधुनिक इतिहासकार डॉ. दशरथ शर्मा (अपनी पुस्तक ‘अर्ली चौहान डायनेस्टीज’ में) और डॉ. डी.आर. भंडारकर इस मत के सबसे प्रबल समर्थक हैं। वे चाहमानों के प्रारंभिक काल को पुरोहित वर्ग से जोड़ते हैं।

(D) विदेशी उत्पत्ति का सिद्धांत

  • प्रतिपादक: कर्नल जेम्स टॉड, विलियम क्रुक और वी.ए. स्मिथ जैसे ब्रिटिश इतिहासकारों के अनुसार चौहान मूल रूप से मध्य एशिया की शक, सीथियन या हुण जातियों की संतान थे, जिन्हें यज्ञ के माध्यम से पवित्र कर भारतीय समाज में क्षत्रिय का दर्जा दिया गया।

2. शाकंभरी (सांभर) के मूल चौहान: आदिपुरुष वासुदेव से नव-प्रारंभ

चौहानों का मूल निवास स्थान सांभर झील के आसपास का क्षेत्र माना जाता है, जिसे प्राचीन काल में ‘सपादलक्ष’ (सवा लाख गांवों का समूह) और इसकी राजधानी को ‘अहिच्छत्रपुर’ (वर्तमान नागौर) कहा जाता था।

वासुदेव चौहान (551 ई.)

  • साम्राज्य की स्थापना: 551 ईस्वी में वासुदेव चौहान ने सपादलक्ष में चाहमान साम्राज्य की स्वतंत्र नींव रखी। इसी कारण वासुदेव को चौहान वंश का ‘मूल पुरुष’, ‘आदिपुरुष’ या ‘संस्थापक’ कहा जाता है।
  • सांभर झील का निर्माण: बिजोलिया शिलालेख के अनुसार, सांभर झील के प्राकृतिक स्वरूप को विस्तृत और निर्मित कराने का श्रेय वासुदेव चौहान को ही जाता है। उन्होंने इस क्षेत्र में अपनी कुलदेवी शाकंभरी माता के मंदिर का निर्माण करवाया, जिससे इस शाखा का नाम शाकंभरी के चौहान पड़ा।

प्रारंभिक प्रतापी शासक (सल्तनत पूर्व काल)

  1. गुवक प्रथम: ये प्रारंभ में प्रतिहारों के सामंत थे, परंतु इन्होंने सीकर में चौहानों के इष्टदेव हर्षनाथ (महादेव) के भव्य मंदिर का निर्माण करवाकर अपनी स्वतंत्र सत्ता का आभास कराया।
  2. चंदनराज: इनकी रानी रुद्राणी (आत्मप्रभा) योग क्रिया में अत्यंत निपुण थीं। वे प्रतिदिन पुष्कर झील में शिव आराधना के लिए 1000 दीपक प्रज्वलित करती थीं, जो तत्कालीन धार्मिक चेतना का अनूठा उदाहरण है।
  3. विग्रहराज द्वितीय: इन्होंने गुजरात के चालुक्य शासक मूलराज प्रथम को पराजित कर भड़ौच (गुजरात) में अपनी कुलदेवी आशापुरा माता के मंदिर का निर्माण करवाया। इनके काल का ‘हर्षनाथ शिलालेख’ (973 ई.) चौहानों की वंशावली का महत्वपूर्ण स्रोत है।

3. अजमेर के चौहान राजवंश का इतिहास: साम्राज्य विस्तार और स्वर्णकाल

बारहवीं शताब्दी के प्रारंभ में चौहानों ने सांभर से निकलकर अपनी शक्ति का केंद्र अजमेर को बनाया, जहाँ से इस वंश ने संपूर्ण उत्तर भारत की राजनीति को नियंत्रित किया।

(A) अजयराज चौहान (1105–1133 ई.): अजमेर के संस्थापक

अजयराज चौहान शाकंभरी शाखा के एक दूरदर्शी और पराक्रमी शासक थे। उनका काल चौहान साम्राज्य के निर्माण का काल माना जाता है।

  • अजमेर की स्थापना (1113 ई.): अजयराज ने 1113 ईस्वी में अजयमेरु (वर्तमान अजमेर) शहर बसाया और सामरिक दृष्टि से अत्यंत सुरक्षित बीठली पहाड़ी पर ‘अजयमेरु दुर्ग’ (तारागढ़ दुर्ग) का निर्माण कर उसे अपनी स्थायी राजधानी बनाया।
  • मुद्रा प्रणाली: इन्होंने चांदी और तांबे के सिक्के चलाए, जिन्हें ‘अजयप्रिय रूपक’ कहा जाता है। इन सिक्कों पर उनकी परम विदुषी रानी ‘सोमलेखा’ (या सोमलदेवी) का नाम अंकित था, जो राजस्थान के इतिहास में किसी रानी द्वारा सिक्का जारी करने का पहला प्रामाणिक प्रमाण है।
  • धार्मिक दृष्टिकोण: वे परम शैव भक्त थे, परंतु जैन धर्म के प्रति अत्यंत उदार थे। उन्होंने अजमेर में पार्श्वनाथ मंदिर के लिए स्वर्ण कलश दान किया था।

(B) अर्णोराज / आनाजी (1133–1153 ई.): तुर्कों पर विजय

अजयराज के पुत्र अर्णोराज चौहान साम्राज्य के एक पराक्रमी योद्धा थे। उन्हें जनमानस में आदरपूर्वक ‘आनाजी’ कहा जाता है।

  • आनासागर झील का निर्माण: अर्णोराज के समय अजमेर पर तुर्कों (गजनी के मुस्लिम आक्रांताओं) का भयंकर आक्रमण हुआ। अर्णोराज ने तुर्कों को चारों ओर से घेरकर उनका सामूहिक संहार किया। युद्ध के बाद खून से सनी धरती को साफ करने और अजमेर वासियों की जल आवश्यकता को पूरा करने के लिए उन्होंने चंद्रा नदी के जल को रोककर ‘आनासागर झील’ का निर्माण करवाया।
  • धार्मिक कार्य: इन्होंने पुष्कर में प्रसिद्ध ‘वराह मंदिर’ (भगवान विष्णु के अवतार) का निर्माण करवाया, जिसे बाद में जहांगीर ने खंडित करवाकर पानी में फेंकवा दिया था।
  • संघर्ष व अंत: चालुक्य शासक कुमारपाल के साथ इनका लंबा संघर्ष हुआ। अंततः, इनके स्वयं के पुत्र जगदेव ने सत्ता के लालच में इनकी हत्या कर दी, जिसके कारण जगदेव को चौहान वंश का ‘पितृहन्ता’ कहा जाता है।

(C) विग्रहराज चतुर्थ / बीसलदेव (1153–1163 ई.): चौहानों का स्वर्णकाल

जगदेव को हटाकर उनके छोटे भाई विग्रहराज चतुर्थ अजमेर के शासक बने। इनका शासनकाल चौहान साम्राज्य का “सांस्कृतिक और राजनीतिक स्वर्णकाल” (Golden Age) माना जाता है। इन्हें जनमानस में ‘बीसलदेव’ और उनकी विद्वता के कारण ‘कवि बांधव’ या ‘कटि बांधव’ की उपाधि दी गई थी।

  • दिल्ली पर अधिकार: विग्रहराज चतुर्थ उत्तर भारत के पहले चौहान शासक थे जिन्होंने तोमर राजाओं को पराजित कर दिल्ली (ढिल्लिका) पर पूर्ण अधिकार किया। इसकी पुष्टि दिल्ली के ‘शिवालिक स्तंभ अभिलेख’ से होती है।
  • साहित्यिक अवदान (‘हरिकेली’ नाटक): वे उच्च कोटि के नाटककार थे। उन्होंने स्वयं संस्कृत भाषा में ‘हरिकेली नाटक’ की रचना की, जिसकी कुछ पंक्तियाँ आज भी अजमेर में मौजूद ढाई दिन के झोंपड़े और इंग्लैंड के ब्रिस्टल शहर में राजा राममोहन राय के स्मारक पर उत्कीर्ण हैं। उनके दरबारी कवि सोमदेव ने सुप्रसिद्ध प्रेम-ग्रंथ ‘ललित विग्रहराज’ की रचना की थी। नरपति नाल्ह ने ‘बीसलदेव रासो’ की रचना की।
  • स्थापत्य और निर्माण: उन्होंने अजमेर में एक भव्य संस्कृत पाठशाला (सरस्वती कंठाभरण विद्यालय) का निर्माण करवाया, जिसे बाद में मोहम्मद गौरी के सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक ने तुड़वाकर राजस्थान की पहली मस्जिद ‘ढाई दिन का झोंपड़ा’ में बदल दिया। इसके अतिरिक्त उन्होंने टोंक जिले में बीसलपुर बांध और बीसलपुर शहर की स्थापना की।
  • इतिहासकारों की प्रशंसा: प्रसिद्ध ब्रिटिश विद्वान किल्हॉर्न ने विग्रहराज चतुर्थ की प्रशंसा करते हुए लिखा था कि “वह उन गिने-चुने हिंदू शासकों में से एक थे जो कालिदास और भवभूति की होड़ कर सकते थे।”

(D) पृथ्वीराज चौहान तृतीय (1177–1192 ई.): अंतिम प्रतापी हिंदू सम्राट

विग्रहराज के बाद अल्पकाल के लिए पृथ्वीराज द्वितीय और सोमेश्वर शासक बने। तत्पश्चात, सोमेश्वर और कर्पूरी देवी के पुत्र पृथ्वीराज चौहान तृतीय मात्र 11 वर्ष की आयु में अजमेर के शासक बने। इन्हें इतिहास में ‘राय पिथौरा’ (युद्ध में पीठ न दिखाने वाला) और ‘दलपुंगल’ (विश्व विजेता) की उपाधियों से जाना जाता है।

प्रारंभिक कठिनाइयाँ और दमन नीति

अल्पायु होने के कारण प्रारंभिक शासन व्यवस्था उनकी माता रानी कर्पूरी देवी और कुशल मुख्यमंत्री कदम्बवास (कैमास) तथा सेनापति भुवनमल्ल ने संभाली। 1178 ई. में सत्ता पूरी तरह हाथ में लेते ही पृथ्वीराज ने आक्रामक नीति अपनाई:

  1. नागार्जुन का दमन: अपने चचेरे भाई नागार्जुन के विद्रोह को गुड़गांव के निकट बेरहमी से कुचल दिया।
  2. भदानक जाति का अंत: अलवर, भरतपुर और मथुरा के क्षेत्र में आतंक मचाने वाली सतलज मूल की ‘भदानक’ जाति का 1182 ई. में पूर्ण सफाया किया।
  3. महौबा का युद्ध (तुुमूल का युद्ध – 1182 ई.): चंदेल शासक परमर्दिदेव को पराजित किया। इस युद्ध में परमर्दिदेव के दो अत्यंत वीर सेनापति आल्हा और ऊदल अपनी मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए, जिनकी वीरता आज भी लोकगीतों में अमर है।
  4. चालुक्य संघर्ष: गुजरात के चालुक्य शासक भीमदेव द्वितीय के प्रधानमंत्री जगद्देव प्रतिहार के साथ संघर्ष के बाद दोनों राज्यों के मध्य संधि हुई।

तराइन के ऐतिहासिक युद्ध और दिल्ली सल्तनत का उदय

पृथ्वीराज तृतीय का सबसे बड़ा ऐतिहासिक महत्व मोहम्मद गौरी के मुस्लिम आक्रमणों को रोकने के संघर्ष में है।

  • तराइन का प्रथम युद्ध (1191 ई.): वर्तमान हरियाणा के करनाल जिले में स्थित तराइन के मैदान में गौरी और पृथ्वीराज की सेनाओं के मध्य भयंकर युद्ध हुआ। इस युद्ध में पृथ्वीराज के दिल्ली गवर्नर गोविंदराज [रणथंभौर का चौहान वंश] ने मोहम्मद गौरी को बुरी तरह घायल कर दिया। सुल्तान की सेना मैदान छोड़कर भाग गई। पृथ्वीराज की यह एक ऐतिहासिक और गौरवशाली विजय थी।
  • तराइन का द्वितीय युद्ध (1192 ई.): अपनी हार का बदला लेने के लिए मोहम्मद गौरी अगले ही वर्ष 1,20,000 की अनुशासित घुड़सवार सेना के साथ पुनः तराइन के मैदान में आया। पृथ्वीराज कूटनीतिक धोखे का शिकार हुए। गौरी ने सुबह के समय जब राजपूत सेना नित्य कर्मों में व्यस्त थी, अचानक छद्म आक्रमण कर दिया। इस युद्ध में राजपूत सेना पराजित हुई, गोविंदराज मारे गए और पृथ्वीराज तृतीय को सिरसा (हरियाणा) के निकट बंदी बना लिया गया।

حسن نظامی के ‘ताजुल मासिर’ के अनुसार पृथ्वीराज ने कुछ समय गौरी के अधीन अजमेर में शासन किया था, जबकि चंदबरदाई के ‘पृथ्वीराज रासो’ के अनुसार उन्हें गजनी ले जाया गया, जहाँ पृथ्वीराज ने अपनी शब्दभेदी बाण विद्या से गौरी का वध कर दिया (“चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमान…”)। तराइन का द्वितीय युद्ध भारत में मुस्लिम साम्राज्य/दिल्ली सल्तनत की स्थापना का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ।

  • सांस्कृतिक अवदान: पृथ्वीराज कला और साहित्य के महान संरक्षक थे। उनके दरबार में जयानक (पृथ्वीराज विजय के लेखक), चंदबरदाई (पृथ्वीराज रासो के रचयिता), विद्यापति गौड़, वागीश्वर, जनार्दन और विश्वरूप जैसे महान विद्वान निवास करते थे। उन्होंने अजमेर में एक पृथक कला और साहित्य विभाग की स्थापना की थी, जिसके प्रथम अध्यक्ष पद्मनाभ थे। इन्हीं के समय सुप्रसिद्ध सूफी संत ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती भारत (अजमेर) आए थे।

📊 संपूर्ण अध्याय का विश्लेषणात्मक मैट्रिक्स (Quick Revision Chart)

शासक (Ruler)ऐतिहासिक कालखंडसबसे बड़ी सैन्य/राजनीतिक विजयसांस्कृतिक/वास्तुकला धरोहरपरीक्षा उपयोगी विशिष्ट तथ्य (E-E-A-T Focus)
वासुदेव चौहान551 ई.सपादलक्ष में साम्राज्य की स्थापनाशाकंभरी माता मंदिर (सांभर)चौहान वंश के आदिपुरुष; बिजोलिया शिलालेख के अनुसार सांभर झील के निर्माता।
गुवक प्रथम10वीं सदी (प्रारंभ)प्रतिहारों की अधीनता से मुक्ति का प्रयासहर्षनाथ भैरव मंदिर (सीकर)सीकर में चौहानों के इष्टदेव हर्षनाथ के भव्य मंदिर की नींव रखी।
अजयराज चौहान1105–1133 ई.मालवा के परमारों पर विजयअजयमेरु दुर्ग (तारागढ़)1113 ई. में अजमेर शहर बसाया; रानी सोमलेखा के नाम के चांदी के सिक्के चलाए।
अर्णोराज (आनाजी)1133–1153 ई.गजनी के तुर्क आक्रांताओं का संहारआनासागर झील, पुष्कर का वराह मंदिरअपने ही पुत्र जगदेव (पितृहंता) द्वारा सत्ता संघर्ष में मारे गए।
विग्रहराज चतुर्थ1153–1163 ई.तोमरों को हराकर दिल्ली पर अधिकारसंस्कृत पाठशाला (वर्तमान ढाई दिन का झोंपड़ा), बीसलपुर बांधचौहानों का स्वर्णकाल; ‘हरिकेली’ संस्कृत नाटक के रचयिता; उपाधि- ‘कवि बांधव’।
पृथ्वीराज तृतीय1177–1192 ई.महौबा विजय (1182), तराइन का प्रथम युद्ध (1191)कला एवं साहित्य विभाग (अजमेर)अंतिम प्रतापी हिंदू सम्राट; उपाधि- ‘राय पिथौरा’ / ‘दलपुंगल’; तराइन द्वितीय युद्ध में पराजय।

📝 स्व-मूल्यांकन टेस्ट (Exam-Targeted MCQs Quiz)

प्रश्न 1: बिजोलिया शिलालेख (1170 ई.) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों में से कौन सा सत्य है?

  1. यह शिलालेख चौहानों को वत्स गोत्रीय ब्राह्मण सिद्ध करता है।
  2. इसके अनुसार सांभर झील का निर्माण वासुदेव चौहान द्वारा करवाया गया था।विकल्प: (A) केवल 1 (B) केवल 2 (C) 1 और 2 दोनों (D) दोनों असत्य।
  • सटीक उत्तर: (C) — यह शिलालेख भीलवाड़ा के पार्श्वनाथ मंदिर से प्राप्त हुआ है जो चौहानों की प्राचीनता और वंशावली का सबसे प्रामाणिक स्रोत है।

प्रश्न 2: राजस्थान के इतिहास में वह कौन सी प्रथम रानी थी जिन्होंने अपने नाम के सिक्के जारी किए थे और वे किस चौहान शासक की पत्नी थीं?

  • उत्तर: रानी सोमलेखा (सोमलदेवी)। वे अजमेर के संस्थापक राजा अजयराज चौहान की परम विदुषी पत्नी थीं। इनके चांदी व तांबे के सिक्कों को ‘अजयप्रिय रूपक’ कहा जाता था।

प्रश्न 3: “कवि बांधव” के नाम से किस चाहमान शासक को जाना जाता है और ब्रिटिश विद्वान किल्हॉर्न ने उनकी तुलना किन संस्कृत महाकवियों से की थी?

  • उत्तर: विग्रहराज चतुर्थ (बीसलदेव) को उनकी साहित्यिक विद्वता के कारण ‘कवि बांधव’ कहा जाता है। इतिहासकार किल्हॉर्न ने उनकी तुलना महान संस्कृत नाटककार कालिदास और भवभूति से की थी।

प्रश्न 4: तराइन का द्वितीय युद्ध (1192 ईस्वी) भारतीय इतिहास का एक निर्णायक मोड़ क्यों माना जाता है?

  • उत्तर: क्योंकि इस युद्ध में पृथ्वीराज चौहान तृतीय की पराजय के साथ ही भारत में राजपूत सर्वोच्चता का अंत हुआ और उत्तर भारत में स्थायी रूप से मुस्लिम साम्राज्य तथा दिल्ली सल्तनत के उदय का मार्ग प्रशस्त हुआ।

📚 प्रामाणिक संदर्भ एवं स्रोत (References & E-E-A-T Seal)

  • डॉ. दशरथ शर्मा, “अर्ली चौहान डायनेस्टीज” (Early Chauhan Dynasties – प्रामाणिक संदर्भ ग्रंथ)
  • राजस्थान राज्य पाठ्यपुस्तक मंडल, कक्षा 9 व 10 (राजस्थान का इतिहास एवं संस्कृति)
  • जयानक कृत ‘पृथ्वीराज विजय’ एवं चंदबरदाई कृत ‘पृथ्वीराज रासो’ के मूल ऐतिहासिक पाठ।
  • RPSC RAS एवं स्कूल व्याख्याता भर्ती परीक्षाओं के विगत 15 वर्षों के हल प्रश्नपत्रों का प्रामाणिक समावेश।
  • तथ्य जाँच एवं संकलन: सुयोग अकादमी संपादकीय टीम (सुधीर ढाका – BSc-BEd, योगेश जांगिड़)।

📚 चौहान राजवंश: संपूर्ण अध्याय क्रमानुसार पढ़ें

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महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

चौहान वंश की उत्पत्ति अग्निवंशी राजपूतों से मानी जाती है। इसका प्रारंभ लगभग 7वीं–8वीं शताब्दी में हुआ और यह राजस्थान के प्रमुख राजवंशों में से एक बना।

चौहान वंश के सबसे प्रसिद्ध शासक पृथ्वीराज चौहान थे, जिन्होंने दिल्ली और अजमेर पर शासन किया और मुहम्मद गौरी के विरुद्ध युद्ध लड़े।

चौहान वंश का मुख्य शासन क्षेत्र अजमेर, दिल्ली, रणथंभौर, जालौर और आसपास के राजस्थान क्षेत्र थे।

दोनों के बीच तराइन के प्रथम (1191) और द्वितीय (1192) युद्ध हुए, जिनमें पहले में पृथ्वीराज की विजय और दूसरे में गौरी की विजय हुई।

आंतरिक संघर्ष, सामंतों की असंगठित शक्ति और मुहम्मद गौरी के आक्रमण चौहान वंश के पतन के प्रमुख कारण बने।

चौहान वंश की प्रमुख शाखाओं में अजमेर-Delhi चौहान, रणथंभौर चौहान, जालौर के सोनगरा चौहान आदि शामिल हैं।

चौहान वंश ने राजस्थान में राजनीतिक शक्ति, किले निर्माण और वीरता की परंपरा को मजबूत किया और मध्यकालीन इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

चौहान वंश की प्रारंभिक राजधानी अजमेर थी, बाद में दिल्ली भी महत्वपूर्ण केंद्र बना, लेकिन आक्रमणों के कारण उनकी सत्ता कमजोर हो गई।

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