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राजस्थान इतिहास

महाराणा सांगा (संग्राम सिंह प्रथम) का इतिहास: दिग्विजय, बयाना व खानवा का युद्ध और राजपूती शौर्य का चरमोत्कर्ष

Sudhir Dhaka (इतिहास विशेषज्ञ)
27 अक्टूबर 2025
7 मिनट पठन
महाराणा सांगा (संग्राम सिंह प्रथम) का इतिहास: दिग्विजय, बयाना व खानवा का युद्ध और राजपूती शौर्य का चरमोत्कर्ष

परिचय: महाराणा सांगा का ऐतिहासिक महत्व व परीक्षा उपयोगी प्रासंगिकता

राजस्थान के इतिहास में ‘हिंदू पतराय’ या ‘हिन्दूपात’ (Protector of Hindus) के नाम से सुप्रसिद्ध महाराणा संग्राम सिंह प्रथम (महाराणा सांगा) राजपूती शौर्य, कूटनीति और मातृभूमि की संप्रभुता के शिखर पुरुष हैं। वे मेवाड़ [ मेंवाड़ राजवंश का इतिहास ] के उन महानतम शासकों में से थे जिन्होंने उत्तर भारत के बिखरते राजनीतिक परिदृश्य में समस्त राजपूत राजाओं को एक ध्वज के नीचे लाकर खड़ा कर दिया था। प्रसिद्ध ब्रिटिश इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड ने सांगा के अदम्य साहस और युद्धों में क्षत-विक्षत हुए शरीर को देखकर उन्हें “सैनिकों का भग्नावशेष” (A Ruin of a Soldier) की संज्ञा दी थी, क्योंकि उनके शरीर पर 80 छोटे-बड़े घाव थे और उन्होंने अपनी एक आंख, एक हाथ और एक पैर युद्धभूमि में गंवा दिया था। RPSC (RAS, स्कूल व्याख्याता, सब-इंस्पेक्टर) और RSMSSB (CET, पटवारी, पुलिस भर्ती) के सामान्य ज्ञान पाठ्यक्रम में महाराणा सांगा का कालखंड सबसे महत्वपूर्ण है। इस लेख में हम सांगा के प्रारंभिक जीवन, उनके प्रमुख सैन्य अभियानों और भारत की दिशा बदलने वाले खानवा के युद्ध का प्रामाणिक विश्लेषण करेंगे।

1. प्रारंभिक जीवन, भाइयों का संघर्ष और राज्याभिषेक (1509 ई.)

महाराणा सांगा राजा रायमल के सबसे छोटे पुत्र थे। उनके बड़े भाई पृथ्वीराज सिसोदिया (‘उड़ना राजकुमार’) और जयमल सत्ता के प्रबल दावेदार थे, जिसके कारण भाइयों में आपस में भयंकर उत्तराधिकार का संघर्ष हुआ।

  • ज्योतिष की भविष्यवाणी और भाइयों का खूनी संघर्ष: सारणेश्वर महादेव मंदिर के पास एक चारण जाति की ज्योतिषी ने सांगा के हाथ की रेखाएं देखकर भविष्यवाणी की कि मेवाड़ के भावी राजा संग्राम सिंह ही बनेंगे। इस बात से क्रुद्ध होकर पृथ्वीराज ने सांगा पर तलवार से हमला कर दिया, जिससे सांगा की एक आंख स्थायी रूप से क्षतिग्रस्त हो गई।
  • अज्ञातवास और रक्षक: भाइयों के कोप से बचने के लिए सांगा को मेवाड़ छोड़ना पड़ा। शुरुआती दिनों में उन्हें मारवाड़ के राठौड़ चंदा जैतमालोत ने शरण दी। बाद में वे अजमेर के निकट श्रीनगर के जागीरदार करमचंद पवार (Karamchand Pawar) के पास अज्ञातवास में रहे।
  • राज्याभिषेक: जब पृथ्वीराज सिसोदिया और जयमल दोनों की आपसी संघर्षों और अन्य कारणों से मृत्यु हो गई, तब वृद्ध राजा रायमल ने सांगा को वापस बुलाया। 24 मई 1509 ईस्वी को महाराणा संग्राम सिंह का मेवाड़ के सिंहासन पर राज्याभिषेक हुआ। राजा बनते ही सांगा ने करमचंद पवार को कृतज्ञता प्रकट करते हुए ‘राव’ की उपाधि दी।

2. सुल्तानों के विरुद्ध सैन्य अभियान: दिल्ली, मालवा और गुजरात विजय

महाराणा सांगा ने गद्दी संभालते ही अपनी सैन्य सीमाओं को सुदृढ़ किया और तत्कालीन भारत की तीन प्रमुख मुस्लिम शक्तियों — दिल्ली सल्तनत, मालवा और गुजरात — को लगातार युद्धों में पराजित कर अपनी धाक जमाई।

(A) दिल्ली सल्तनत से संघर्ष: खातौली और धौलपुर का युद्ध

दिल्ली के लोदी वंश का सुल्तान इब्राहिम लोदी मेवाड़ की बढ़ती शक्ति से भयभीत था। दोनों के मध्य दो ऐतिहासिक युद्ध लड़े गए:

  1. खातौली का युद्ध (1517 ई. – कोटा): इब्राहिम लोदी की शाही सेना को सांगा ने खातौली के मैदान में बुरी तरह परास्त किया। इसी युद्ध में एक तीर लगने से सांगा ने अपना एक पैर गंवा दिया और तलवार के घाव से उनका बायां हाथ भी कट गया। सुल्तान का पुत्र इस युद्ध में बंदी बना लिया गया।
  2. धौलपुर का युद्ध (1518 ई.): अपनी हार का बदला लेने के लिए लोदी ने मियां माखन के नेतृत्व में पुनः विशाल सेना भेजी, परंतु धौलपुर (बाड़ी) के युद्ध में सांगा की सेना ने सुल्तान की सेना को गाजर-मूली की तरह काट दिया। इस विजय से सांगा की सीमाएं दिल्ली के निकट तक पहुँच गईं।

(B) मालवा से संघर्ष: गागरोन का युद्ध (1519 ई.)

मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी द्वितीय ने चंदेरी के राजपूत जागीरदार मेदिनी राय पर अत्याचार किए, तो मेदिनी राय ने महाराणा सांगा की शरण ली। सांगा ने शरणागत की रक्षा का धर्म निभाया।

  • युद्ध का परिणाम: 1519 ई. में झालावाड़ के निकट गागरोन का युद्ध लड़ा गया। सांगा ने महमूद खिलजी द्वितीय को करारी शिकस्त दी और उसे बंदी बनाकर चित्तौड़गढ़ ले आए।
  • राजपूती उदारता: सांगा ने सुल्तान को 6 महीने तक ससम्मान बंदी गृह में रखा और बाद में उसका आधा राज्य तथा रत्नजड़ित मुकुट लेकर उसे सहर्ष मुक्त कर दिया। इस अद्भुत उदारता की प्रशंसा इतिहासकार अबुल फजल ने भी की है।

(C) गुजरात से संघर्ष: ईडर का उत्तराधिकार मामला

गुजरात के सुल्तान मुजफ्फर शाह के साथ सांगा का विवाद ईडर रियासत के उत्तराधिकार को लेकर हुआ। सांगा ने ईडर के सिंहासन पर अपने समर्थक रायमल को बैठाया, जबकि गुजरात का सुल्तान भारमल का समर्थन कर रहा था। सांगा ने अपनी सेना भेजकर मुजफ्फर शाह की सेना को न केवल खदेड़ा, बल्कि अहमदनगर के किले को लूटकर सुल्तान के अहंकार को चकनाचूर कर दिया।

3. मुगल आक्रांता बाबर से महासंग्राम: बयाना का युद्ध (फरवरी 1527 ई.)

1526 ई. में पानीपत के प्रथम युद्ध में इब्राहिम लोदी को हराकर जहीरुद्दीन मोहम्मद बाबर ने दिल्ली में मुगल साम्राज्य की नींव रखी। उत्तर भारत पर एकछत्र राज करने के लिए बाबर और सांगा का टकराना अपरिहार्य था।

बयाना का युद्ध (16 फरवरी 1527 ई. – भरतपुर)

खानवा के मुख्य युद्ध से ठीक एक महीने पहले भरतपुर के बयाना नामक स्थान पर दोनों सेनाओं का आमना-सामना हुआ।

  • सांगा की अंतिम ऐतिहासिक विजय: महाराणा सांगा की कुशल राजपूत सेना ने बाबर के साले और मुख्य सेनापति मेहदी ख्वाजा की मुगल सेना को चारों तरफ से घेरकर रोंद डाला। मुगलों के पैर उखड़ गए और वे मैदान छोड़कर भाग खड़े हुए।
  • मुगल सेना में भय का माहौल: बयाना के युद्ध में राजपूतों के अदम्य साहस को देखकर मुगल सैनिक इस कदर डर गए कि उन्होंने सांगा के खिलाफ दोबारा युद्ध लड़ने से मना कर दिया। इसी समय काबुल के एक ज्योतिषी मोहम्मद शरीफ ने भविष्यवाणी कर दी कि शहंशाह बाबर इस बार युद्ध हार जाएंगे क्योंकि मंगल का तारा पूर्व में है। इस भविष्यवाणी से मुगल सेना का मनोबल शून्य हो गया।

4. खानवा का युद्ध (17 मार्च 1527 ई.): कूटनीति, जिहाद और परिणाम

बयाना की हार से तिलमिलाए बाबर ने अपनी सेना में जोश भरने के लिए कूटनीति और धर्म का सहारा लिया। उसने खानवा (रूपवास तहसील, भरतपुर) के मैदान में अपनी सेना को पुनर्गठित किया।

बाबर की युद्ध रणनीतियाँ

  1. जिहाद की घोषणा: बाबर ने इस युद्ध को साधारण लड़ाई न बताकर ‘जिहाद’ (Holy War / धर्मयुद्ध) घोषित किया।
  2. शराबबंदी की कसम: उसने जीवनभर शराब न पीने की कसम खाई और सोने-चांदी के कीमती सुरापात्रों को सैनिकों के सामने तुड़वा दिया।
  3. तमगा टैक्स की समाप्ति: उसने मुस्लिम व्यापारियों से लिया जाने वाला ‘तमगा’ (व्यापारिक कर) हमेशा के लिए समाप्त करने की घोषणा की। इन कदमों से मुगल सेना में धार्मिक उन्माद फैल गया और वे मरने-मारने को तैयार हो गए।

सांगा की ‘पाती पेरणवन’ (Pati Peravan) प्रथा

महाराणा सांगा ने विदेशी आक्रांता बाबर को भारत से बाहर खदेड़ने के लिए प्राचीन राजपूती परंपरा ‘पाती पेरणवन’ को पुनर्जीवित किया। उन्होंने भारत के सभी राजाओं, रावों और राणाओं को युद्ध का निमंत्रण भेजा। सांगा के एक आह्वान पर इतिहास का सबसे बड़ा राजपूत संघ बना, जिसमें निम्नलिखित महानायकों ने भाग लिया:

  • मारवाड़: राव गांगा के पुत्र कुंवर मालदेव (4000 सैनिकों के साथ)
  • बीकानेर: राव जैतसी के पुत्र कुंवर कल्याणमल
  • आमेर (जयपुर): कछवाहा राजा पृथ्वीराज कछवाहा
  • चंदेरी: मेदिनी राय
  • मेवात: हसन खाँ मेवाती (एकमात्र मुस्लिम सेनापति जो देश के लिए लड़ा)
  • दिल्ली से निर्वासित: इब्राहिम लोदी का भाई महमूद लोदी
  • सिरोही: अखैराज देवड़ा (‘उड़ना अखैराज’)
  • वागड़ (डूंगरपुर): रावल उदयसिंह
  • साझड़ी: झाला अज्जा और झाला सज्जा
  • रायसेन: सिलहदी तंवर (जिन्होंने बाद में विश्वासघात किया)

युद्ध का टर्निंग पॉइंट और सांगा का घायल होना

17 मार्च 1527 ईस्वी को सुबह 9 बजे खानवा का महासंग्राम शुरू हुआ। राजपूतों के पारंपरिक प्रहारों के सामने शुरुआत में मुगल सेना लड़खड़ाने लगी। परंतु बाबर के पास दो अचूक हथियार थे: तोपखाना (Artillery – जिसका नेतृत्व उस्ताद अली और मुस्तफा कर रहे थे) और तुलगुमा युद्ध पद्धति (जिसके तहत सेना को सुरक्षित रिजर्व रखकर पीछे से अचानक घेरा जाता था)। राजपूतों के पास तोपों का कोई जवाब नहीं था।

  • सिलहदी तंवर का विश्वासघात: युद्ध के ऐन वक्त पर रायसेन के शासक सिलहदी तंवर और नागौर के खानजादा ने विश्वासघात किया और वे अपनी सेना सहित बाबर के शिविर में जा मिले, जिससे राजपूत सेना की कूटनीतिक कमान ढह गई।
  • झाला अज्जा का बलिदान: इसी बीच हाथी पर सवार महाराणा सांगा के सिर में एक घातक तीर लगा, जिससे वे अचेत (बेहोश) हो गए। सांगा को बेहोश देखकर सेना का मनोबल न टूटे, इसलिए सादड़ी के झाला अज्जा (Jhala Ajja) ने सांगा के शाही छत्र और मुकुट को धारण किया और युद्ध का नेतृत्व करते हुए वीरगति पाई। मालदेव और पृथ्वीराज कछवाहा अचेत महाराणा सांगा को युद्धभूमि से सुरक्षित बाहर निकालकर बसवा (दौसा) ले आए। इस युद्ध को जीतकर बाबर ने ‘गाजी’ (infidels का संहारक) की उपाधि धारण की।

5. महाराणा सांगा का अंतिम समय और मांडलगढ़ में छतरी (1528 ई.)

जब बसवा (दौसा) में महाराणा सांगा को होश आया, तो उन्होंने सबसे पहले अपनी सेना और युद्ध के परिणाम के बारे में पूछा। खानवा की हार की बात सुनकर सांगा अत्यंत दुखी हुए।

  • प्रतिज्ञा: उन्होंने प्रतिज्ञा की कि जब तक मैं बाबर को पराजित नहीं कर दूँगा, तब तक न तो चित्तौड़गढ़ की धरती पर पैर रखूँगा और न ही अपने सिर पर पगड़ी बाँधूँगा। वे अपने सिर पर हमेशा एक साफा लपेटकर रहने लगे।
  • विष दिए जाने की घटना: 1528 ई. में जब बाबर ने चंदेरी के मेदिनी राय पर आक्रमण किया, तो सांगा पुनः सेना लेकर बाबर से युद्ध करने के लिए इरीच (कालपी, मध्य प्रदेश) पहुँचे। सांगा के सामंत भली-भांति जानते थे कि मेवाड़ की सेना अब दोबारा मुगलों के तोपखाने का सामना करने की स्थिति में नहीं है। सांगा को युद्ध से रोकने के लिए उनके अपने ही कुछ स्वार्थी सामंतों ने उन्हें भोजन में धीमा विष (Poison) दे दिया।
  • मृत्यु व समाधि स्थल: विष के प्रभाव के कारण 30 जनवरी 1528 ईस्वी को बसवा या कालपी के निकट इस महान हिंदू सम्राट का प्राणांत हो गया। महाराणा सांगा के पार्थिव शरीर को मेवाड़ के मांडलगढ़ (भीलवाड़ा) लाया गया, जहाँ पूरे राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया। मांडलगढ़ में आज भी महाराणा सांगा की 8 खंभों की भव्य ऐतिहासिक छतरी (Cenotaph) बनी हुई है, जो उनकी अमर वीरता की साक्षी है।

📊 महाराणा सांगा के इतिहास का विश्लेषणात्मक वैचारिक मैट्रिक्स

ऐतिहासिक मोड़ / युद्धसंबद्ध तिथि व वर्षप्रमुख प्रतिद्वंद्वीपरीक्षा उपयोगी विशिष्ट परिणाम / साक्ष्य
राज्याभिषेक24 मई 1509 ई.भाइयों का संघर्षश्रीनगर (अजमेर) के करमचंद पवार ने सांगा की रक्षा की; रायमल के बाद राजा बने।
खातौली का युद्ध1517 ई.इब्राहिम लोदी (दिल्ली)कोटा जिले में युद्ध; सांगा ने लोदी को हराया; अपना बायां हाथ और एक पैर गंवाया।
गागरोन का युद्ध1519 ई.महमूद खिलजी II (मालवा)झालावाड़ में युद्ध; सांगा विजयी; सुल्तान को बंदी बनाया, फिर उदारतापूर्वक छोड़ा।
बयाना का युद्ध16 फरवरी 1527मेहदी ख्वाजा (मुगल सेना)भरतपुर में युद्ध; सांगा की अंतिम शानदार विजय; मुगल सेना का मनोबल टूटा।
खानवा का युद्ध17 मार्च 1527जहीरुद्दीन बाबरभारत का ऐतिहासिक युद्ध; बाबर ने तोपखाने व तुलगुमा से जीत दर्ज की; ‘गाजी’ की उपाधि ली।
महाप्रयाण (मृत्यु)30 जनवरी 1528 ई.सामंतों का विश्वासघातकालपी में विष दिया गया; मांडलगढ़ (भीलवाड़ा) में 8 खंभों की छतरी स्थित है।

📝 स्व-मूल्यांकन टेस्ट (Exam-Targeted Practice Quiz)

प्रश्न 1: महाराणा सांगा द्वारा खानवा के युद्ध में अपनाई गई प्राचीन ‘पाती पेरणवन’ प्रथा का वास्तविक अर्थ क्या था?

  • उत्तर: ‘पाती पेरणवन’ का अर्थ है “पत्र भेजकर सभी को युद्ध के लिए आमंत्रित करना।” विदेशी आक्रांता बाबर के विरुद्ध देश की रक्षा के लिए सांगा ने राजस्थान और भारत के समस्त राजपूत शासकों, रावों और मुस्लिम मेवात प्रमुखों को पत्र लिखकर एक संयुक्त राष्ट्रीय सैन्य संघ का निर्माण किया था।

प्रश्न 2: खानवा के युद्ध (1527 ईस्वी) में महाराणा सांगा के घायल होने पर उनके राजकीय प्रतीक (छत्र और मुकुट) धारण कर युद्ध का नेतृत्व किसने संभाला था?

  • उत्तर: सादड़ी (मेवाड़) के महान सेनापति झाला अज्जा (Jhala Ajja) ने। उन्होंने सांगा के बेहोश होने पर अपनी जान की परवाह न करते हुए शाही मुकुट पहना ताकि राजपूत सेना को लगे कि महाराणा अभी भी युद्ध मैदान में डटे हुए हैं।

प्रश्न 3: इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड ने महाराणा सांगा को “सैनिकों का भग्नावशेष” क्यों कहा था?

  • उत्तर: क्योंकि सांगा का संपूर्ण जीवन युद्धों में बीता था। निरंतर युद्ध लड़ने के कारण उनके शरीर पर 80 छोटे-बड़े घाव थे, उनका एक पैर कट चुका था, एक हाथ युद्ध में अलग हो गया था और एक आंख भाइयों के आपसी संघर्ष में चली गई थी। इस अपंगता के बावजूद वे शेर की तरह लड़ते थे।

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📚 प्रामाणिक संदर्भ एवं स्रोत 

  • कविराजा श्यामलदास कृत “वीर विनोद” (मेवाड़ इतिहास का महाग्रंथ)
  • डॉ. गौरीशंकर हीराचंद ओझा, “उदयपुर राज्य का इतिहास” (प्रामाणिक संदर्भ)
  • राजस्थान राज्य पाठ्यपुस्तक मंडल, कक्षा 10 (राजस्थान का इतिहास, कला एवं संस्कृति)
  • RPSC RAS एवं राजस्थान लोक सेवा आयोग की विभिन्न शिक्षक भर्ती परीक्षाओं के पिछले 15 वर्षों के हल प्रश्नपत्रों का विश्लेषणात्मक संकलन।
  • तथ्य जाँच एवं संकलन: सुयोग अकादमी संपादकीय टीम (सुधीर ढाका – BSc-BEd, योगेश जांगिड़)।

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महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

महाराणा सांगा (राणा संग्राम सिंह) मेवाड़ के शक्तिशाली शासक थे, जिन्होंने 16वीं शताब्दी में राजपूतों का नेतृत्व किया और कई युद्धों में विजय प्राप्त की।

महाराणा सांगा और बाबर के बीच 1527 ई. में खानवा का युद्ध हुआ था, जिसमें अंततः बाबर की विजय हुई।

खानवा का युद्ध 17 मार्च 1527 ई. में आगरा के पास खानवा नामक स्थान पर लड़ा गया था।

महाराणा सांगा सिसोदिया वंश के शासक थे, जो मेवाड़ (उदयपुर) के प्रमुख राजवंशों में से एक था।

उन्होंने विभिन्न राजपूत राज्यों को एकजुट किया, दिल्ली सल्तनत और मुगलों के खिलाफ युद्ध लड़े और राजपूत शक्ति को चरम पर पहुँचाया।

इतिहास के अनुसार, महाराणा सांगा के शरीर पर लगभग 80 से अधिक घाव थे, जिससे उनकी वीरता का पता चलता है।

खानवा युद्ध के बाद उनकी स्थिति कमजोर हो गई और 1528 ई. में उनकी मृत्यु हो गई। कुछ स्रोतों के अनुसार उन्हें विष दिया गया था।

महाराणा सांगा को राजपूत एकता और वीरता का प्रतीक माना जाता है, जिन्होंने मुगलों के विरुद्ध मजबूत प्रतिरोध किया।

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