दल-बदल विरोधी कानून: दसवीं अनुसूची, अयोग्यता एवं अध्यक्ष की भूमिका
कैसे बना: यह नोट सुयोग अकादमी के लेखक ने परीक्षा सिलेबस के अनुसार लिखा/संपादित किया है। अंतिम समीक्षा तिथि ऊपर है। त्रुटि दिखे तो संपर्क करें। टीम परिचय
स्रोत आधार: राजस्थान प्रतियोगी परीक्षाओं का संबंधित आधिकारिक पाठ्यक्रम। शब्दशः पुस्तक पाठ नहीं।
दल-बदल विरोधी कानून: दसवीं अनुसूची, अयोग्यता एवं अध्यक्ष की भूमिका
सुयोग AI गुरु
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⚡ Quick Answer: दल-बदल विरोधी कानून 1985 में 52वें संविधान संशोधन से दसवीं अनुसूची के रूप में जोड़ा गया। अयोग्यता के आधार — (1) दल का सदस्य स्वेच्छा से दल छोड़ दे या पूर्व अनुमति के बिना व्हिप के विरुद्ध मतदान करे/अनुपस्थित रहे (दल 15 दिन में क्षमा न करे); (2) निर्दलीय सदस्य किसी दल में शामिल हो; (3) मनोनीत सदस्य 6 माह बाद किसी दल में शामिल हो। अपवाद — दल के 2/3 विधायकों की सहमति से विलय; 1/3 ‘विभाजन’ वाला अपवाद 91वें संशोधन (2003) ने हटा दिया। अयोग्यता पर निर्णय अध्यक्ष/सभापति करते हैं, जो किहोतो होलोहन (1992) के अनुसार न्यायिक पुनरावलोकन के अधीन है; 2020 में न्यायालय ने सामान्यतः 3 माह में निर्णय की बात कही।
🕒 करेंट अपडेट (अक्टूबर 2026 तक): जुलाई 2025 में सर्वोच्च न्यायालय ने तेलंगाना विधानसभा के अध्यक्ष को दल-बदल याचिकाओं पर तीन माह में निर्णय लेने का निर्देश दिया और अध्यक्ष की देरी पर संसद को कानून में सुधार पर विचार करने की टिप्पणी की (रिपोर्टों के अनुसार)। इससे पहले शिवसेना मामले — सुभाष देसाई (मई 2023) — में संविधान पीठ ने ‘विधायक दल’ के बजाय ‘राजनीतिक दल’ के व्हिप को निर्णायक माना। संविधान संशोधन व न्यायिक व्याख्याएँ बदलती रहती हैं — परीक्षा से पहले करेंट अफेयर्स से मिलाएँ।
📌 दल-बदल विरोधी कानून — एक दृष्टि — एक नज़र में
- आधार: दसवीं अनुसूची — 52वाँ संशोधन, 1985
- संशोधन: 91वाँ (2003) — विभाजन अपवाद हटाया
- निर्णायक: अध्यक्ष/सभापति — न्यायिक पुनरावलोकन के अधीन
- एकमात्र अपवाद: 2/3 सदस्यों का विलय
- मुख्य निर्णय: किहोतो होलोहन (1992)
- लागू: संसद व राज्य विधानमंडल दोनों
1. पृष्ठभूमि — ‘आया राम, गया राम’
1967 के आम चुनावों के बाद भारत में दल-बदल की बाढ़ आ गई — अनेक राज्यों में सरकारें बार-बार गिरीं। हरियाणा के विधायक गया लाल ने 1967 में एक पखवाड़े के भीतर तीन बार दल बदला (परीक्षा-पुस्तकों के अनुसार), जिससे “आया राम, गया राम” मुहावरा प्रसिद्ध हुआ। 1968 में वाई.बी. चव्हाण समिति ने इस पर विचार किया, पर कानून 1985 में बना — राजीव गांधी सरकार के 52वें संविधान संशोधन द्वारा अनु. 101, 102, 190 व 191 में परिवर्तन कर दसवीं अनुसूची जोड़ी गई। उद्देश्य — राजनीतिक स्थिरता, जनादेश का सम्मान और पद/धन के लोभ में दल-बदल रोकना। संविधान की अनुसूचियाँ संविधान के भाग, अनुच्छेद और अनुसूचियाँ: संपूर्ण सूची में और 52वाँ संशोधन संविधान संशोधन प्रक्रिया: अनुच्छेद 368 में देखें।
2. अयोग्यता के आधार (पैरा 2)
| सदस्य की श्रेणी | अयोग्यता कब |
|---|---|
| राजनीतिक दल का सदस्य | (a) स्वेच्छा से दल की सदस्यता छोड़ दे; (b) दल के निर्देश (व्हिप) के विरुद्ध, पूर्व अनुमति के बिना सदन में मतदान करे या मतदान से अनुपस्थित रहे — और दल 15 दिन में उसे क्षमा न करे |
| निर्दलीय सदस्य | निर्वाचन के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल हो |
| मनोनीत सदस्य | सदन में स्थान ग्रहण करने के 6 माह बाद किसी दल में शामिल हो (6 माह के भीतर दल चुन सकता है) |
‘स्वेच्छा से सदस्यता छोड़ना’ की व्याख्या व्यापक है — सर्वोच्च न्यायालय ने रवि नाइक (1994) में कहा कि औपचारिक त्यागपत्र न देने पर भी सदस्य का आचरण (जैसे विरोधी दल का सार्वजनिक समर्थन) इसका प्रमाण हो सकता है। व्हिप केवल सदन में मतदान पर लागू होता है, सदन के बाहर के भाषणों पर नहीं।
🎯 दल-बदल कानून — अभ्यास
दसवीं अनुसूची, 52वाँ व 91वाँ संशोधन RAS, CET, व्याख्याता व पटवारी परीक्षाओं में नियमित पूछे जाते हैं:
- RPSC RAS Prelims 2026 टेस्ट सीरीज़
- Rajasthan CET (स्नातक) फाइनल मेगा टेस्ट सीरीज़
- RPSC प्रथम श्रेणी व्याख्याता 2026 टेस्ट सीरीज़
- राजस्थान पटवारी 2026 टेस्ट सीरीज़
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3. अपवाद — विलय (पैरा 4)
- यदि किसी मूल राजनीतिक दल का दूसरे दल में विलय हो और विधायक दल के कम-से-कम दो-तिहाई सदस्य उस विलय से सहमत हों — तो न विलय के साथ जाने वाले अयोग्य होंगे, न अलग रहने वाले।
- ‘विभाजन’ का अपवाद समाप्त: मूल कानून (पैरा 3) में विधायक दल के एक-तिहाई सदस्यों के अलग होने को ‘विभाजन’ मानकर छूट थी — इसके दुरुपयोग के कारण 91वें संशोधन (2003) ने इसे हटा दिया।
- पीठासीन अधिकारी की छूट (पैरा 5): अध्यक्ष/उपाध्यक्ष/सभापति/उपसभापति पद पर चुने जाने पर दल छोड़ने वाला अयोग्य नहीं; पद छोड़ने के बाद पुनः दल में लौट सकता है।
4. निर्णय कौन करता है — पैरा 6 व 7
- अयोग्यता का प्रश्न सदन के अध्यक्ष/सभापति तय करते हैं (पैरा 6); अध्यक्ष स्वयं के विरुद्ध प्रश्न पर सदन द्वारा चुना सदस्य निर्णय करता है।
- पैरा 7 ने न्यायालयों का क्षेत्राधिकार वर्जित किया था।
- किहोतो होलोहन बनाम ज़ाचिल्हू (1992): दसवीं अनुसूची संवैधानिक रूप से वैध, पर पैरा 7 अमान्य (राज्यों के अनुसमर्थन के अभाव में); अध्यक्ष न्यायाधिकरण की तरह कार्य करता है और उसका निर्णय न्यायिक पुनरावलोकन के अधीन — पर निर्णय से पहले हस्तक्षेप नहीं (quia timet कार्रवाई नहीं)।
- अध्यक्ष स्वतः संज्ञान नहीं लेता — किसी सदस्य की लिखित याचिका पर ही कार्यवाही।
- कीशम मेघचंद्र सिंह (2020): अध्यक्ष को ‘उचित समय’ — सामान्यतः 3 माह — में निर्णय करना चाहिए; संसद स्वतंत्र न्यायाधिकरण पर विचार करे।
- सुभाष देसाई (2023): व्हिप नियुक्त करने का अधिकार राजनीतिक दल का, केवल विधायक दल का नहीं; अध्यक्ष ‘असली दल’ का निर्धारण करते समय केवल विधायकों की संख्या नहीं देख सकता।
लोकसभा अध्यक्ष की अन्य शक्तियाँ लोकसभा अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष में और राज्यसभा सभापति की राज्यसभा के सभापति, उपसभापति व विशेष शक्तियाँ में।
5. 91वें संशोधन (2003) के अन्य प्रावधान
| प्रावधान | अनुच्छेद |
|---|---|
| केंद्रीय मंत्रिपरिषद का आकार लोकसभा के 15% तक | 75(1A) |
| राज्य मंत्रिपरिषद का आकार विधानसभा के 15% तक (न्यूनतम 12) | 164(1A) |
| दल-बदल से अयोग्य सदस्य पुनर्निर्वाचन तक मंत्री नहीं | 75(1B), 164(1B) |
| अयोग्य सदस्य ‘लाभकारी राजनीतिक पद’ धारण नहीं करेगा | 361B |
| एक-तिहाई विभाजन अपवाद समाप्त | दसवीं अनुसूची, पैरा 3 का लोप |
मंत्रिपरिषद की संरचना केंद्रीय मंत्रिपरिषद एवं मंत्रिमंडल में देखें।
6. आलोचना व सुधार-सुझाव
| समस्या | सुझाव |
|---|---|
| अध्यक्ष की निष्पक्षता पर प्रश्न — वह सत्तारूढ़ दल से होता है | दिनेश गोस्वामी समिति (1990) — निर्णय राष्ट्रपति/राज्यपाल द्वारा निर्वाचन आयोग की सलाह पर |
| निर्णय में अनिश्चितकालीन देरी | निश्चित समय-सीमा; स्वतंत्र न्यायाधिकरण (सर्वोच्च न्यायालय का सुझाव, 2020) |
| व्हिप से सांसद की स्वतंत्र अभिव्यक्ति पर रोक — हर मतदान पर दल-अनुशासन | व्हिप केवल विश्वास/अविश्वास प्रस्ताव व धन विधेयक तक सीमित हो — विधि आयोग (170वाँ प्रतिवेदन, 1999) व NCRWC (2002) |
| सामूहिक दल-बदल व त्यागपत्र देकर उपचुनाव — कानून से बचने के मार्ग | त्यागपत्र देने वाले पर निश्चित अवधि तक चुनाव/पद पर रोक का सुझाव (परीक्षा-पुस्तकों के अनुसार) |
| ‘विलय’ अपवाद का दुरुपयोग | विलय अपवाद हटाने का सुझाव |
राज्य स्तर पर दल-बदल के मामलों में विधानसभा अध्यक्ष की भूमिका राजस्थान विधानसभा: संरचना, शक्तियाँ एवं कार्य में देखें।
संबंधित: भारतीय संसद: लोकसभा व राज्यसभा की तुलना | लोकसभा अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष | केंद्रीय मंत्रिपरिषद एवं मंत्रिमंडल | संविधान संशोधन प्रक्रिया: अनुच्छेद 368
📊 प्रश्न-पैटर्न विश्लेषण — किस प्रकार के प्रश्न आते हैं?
| प्रश्न का प्रकार | उदाहरण | हल करने की कुंजी |
|---|---|---|
| पृष्ठभूमि | 1967, 1985 | खंड 1 |
| अयोग्यता के आधार | 3 श्रेणियाँ | खंड 2 |
| विलय अपवाद | 2/3 | खंड 3 |
| निर्णय व न्यायालय | किहोतो | खंड 4 |
| सुधार | गोस्वामी समिति | खंड 6 |
🔎 लोग यह भी पूछते हैं (People Also Ask)
दल-बदल विरोधी कानून क्या है?
संविधान की दसवीं अनुसूची (52वाँ संशोधन, 1985) जिसके तहत दल छोड़ने, व्हिप तोड़ने या निर्दलीय के दल में शामिल होने पर सांसद/विधायक सदन की सदस्यता से अयोग्य हो जाता है।
दल-बदल पर अयोग्यता का निर्णय कौन करता है?
संबंधित सदन का अध्यक्ष या सभापति — उनका निर्णय किहोतो होलोहन (1992) के बाद न्यायिक पुनरावलोकन के अधीन है।
दल-बदल कानून में क्या अपवाद है?
यदि मूल दल का विलय हो और विधायक दल के कम-से-कम दो-तिहाई सदस्य सहमत हों तो अयोग्यता नहीं; 1/3 विभाजन वाला अपवाद 2003 में हटा दिया गया।
91वें संविधान संशोधन ने क्या बदला?
दल-बदल में ‘विभाजन’ अपवाद हटाया, मंत्रिपरिषद का आकार 15% तक सीमित किया और दल-बदल से अयोग्य सदस्य को पुनर्निर्वाचन तक मंत्री/लाभकारी राजनीतिक पद से वंचित किया।
क्या मनोनीत सदस्य दल में शामिल हो सकता है?
हाँ, सदन में स्थान ग्रहण करने के 6 माह के भीतर; उसके बाद शामिल होने पर अयोग्य।
📝 अभ्यास MCQ (10 प्रश्न, उत्तर-व्याख्या सहित)
दल-बदल विरोधी कानून (दसवीं अनुसूची) किस संशोधन से जोड़ा गया?
(A) 42वाँ (1976) (B) 61वाँ (1988) (C) 91वाँ (2003) (D) 52वाँ (1985)
✅ उत्तर: (D) 52वाँ (1985) — राजीव गांधी सरकार।
91वें संशोधन (2003) ने दसवीं अनुसूची से कौन-सा अपवाद हटाया?
(A) मनोनीत सदस्यों का प्रावधान (B) एक-तिहाई सदस्यों का ‘विभाजन’ (C) दो-तिहाई का ‘विलय’ (D) अध्यक्ष का निर्णय
✅ उत्तर: (B) एक-तिहाई सदस्यों का ‘विभाजन’ — अब केवल 2/3 विलय का अपवाद।
दल-बदल पर अयोग्यता का निर्णय कौन करता है?
(A) राष्ट्रपति (B) निर्वाचन आयोग (C) सर्वोच्च न्यायालय (D) सदन का अध्यक्ष/सभापति
✅ उत्तर: (D) सदन का अध्यक्ष/सभापति — पर निर्णय न्यायिक पुनरावलोकन के अधीन।
अध्यक्ष के निर्णय को न्यायिक पुनरावलोकन के अधीन घोषित करने वाला निर्णय —
(A) केशवानंद भारती (B) एस.आर. बोम्मई (C) मिनर्वा मिल्स (D) किहोतो होलोहन (1992)
✅ उत्तर: (D) किहोतो होलोहन (1992) — अनुच्छेद 7 (दसवीं अनुसूची) अमान्य।
मनोनीत सदस्य किसी राजनीतिक दल में शामिल हो तो अयोग्य होगा, यदि —
(A) 1 वर्ष बाद (B) कभी नहीं (C) सदन में स्थान ग्रहण करने के 6 माह बाद शामिल हो (D) किसी भी समय शामिल हो
✅ उत्तर: (C) सदन में स्थान ग्रहण करने के 6 माह बाद शामिल हो — 6 माह के भीतर दल चुन सकता है।
निर्दलीय निर्वाचित सदस्य किसी दल में शामिल हो तो —
(A) अयोग्य नहीं होता (B) अध्यक्ष की अनुमति से शामिल हो सकता है (C) अयोग्य हो जाता है (D) 6 माह में शामिल हो सकता है
✅ उत्तर: (C) अयोग्य हो जाता है — दसवीं अनुसूची, पैरा 2(2)।
दल-बदल से अयोग्य सदस्य मंत्री या लाभकारी राजनीतिक पद धारण नहीं कर सकता — किस संशोधन से?
(A) 73वाँ (B) 91वाँ (2003) (C) 52वाँ (D) 97वाँ
✅ उत्तर: (B) 91वाँ (2003) — अनु. 75(1B), 164(1B), 361B।
दल के व्हिप के विरुद्ध मतदान करने पर दल कितने दिनों में क्षमा (condone) कर सकता है?
(A) 15 दिन (B) 30 दिन (C) 7 दिन (D) 6 माह
✅ उत्तर: (A) 15 दिन — पूर्व अनुमति या 15 दिन में क्षमा।
सर्वोच्च न्यायालय ने अयोग्यता याचिकाओं पर अध्यक्ष द्वारा ‘उचित समय’ (सामान्यतः 3 माह) में निर्णय की बात किस मामले में कही?
(A) कीशम मेघचंद्र सिंह (2020) (B) किहोतो होलोहन (C) रवि नाइक (D) राजेंद्र सिंह राणा
✅ उत्तर: (A) कीशम मेघचंद्र सिंह (2020) — मणिपुर मंत्री का मामला।
दल-बदल कानून में सुधार हेतु 1990 में गठित समिति —
(A) इंद्रजीत गुप्ता समिति (B) सरकारिया आयोग (C) दिनेश गोस्वामी समिति (D) तारकुंडे समिति
✅ उत्तर: (C) दिनेश गोस्वामी समिति — निर्णय राष्ट्रपति/राज्यपाल द्वारा निर्वाचन आयोग की सलाह पर करने का सुझाव।
⚡ One-Liner Revision (Key Facts)
- दसवीं अनुसूची — 52वाँ संशोधन, 1985
- विभाजन अपवाद हटा — 91वाँ, 2003
- विलय अपवाद — 2/3
- व्हिप उल्लंघन पर क्षमा — 15 दिन
- मनोनीत सदस्य — 6 माह
- न्यायिक पुनरावलोकन — किहोतो होलोहन 1992
- ‘आया राम गया राम’ — हरियाणा, 1967
- सुधार समिति — दिनेश गोस्वामी, 1990
✅ परीक्षा हेतु मुख्य बिंदु (Key Points)
- दसवीं अनुसूची संसद व विधानमंडल दोनों पर लागू।
- अध्यक्ष स्वतः संज्ञान नहीं लेता — याचिका आवश्यक।
- व्हिप केवल सदन के भीतर मतदान पर लागू।
- पीठासीन अधिकारी बनने पर दल छोड़ना अयोग्यता नहीं।
- अयोग्य सदस्य पुनर्निर्वाचन तक मंत्री नहीं।
🎯 Exam Trap — इन गलतियों से बचें
- दसवीं अनुसूची 52वें से — 42वें या 61वें से नहीं।
- 91वें ने विभाजन हटाया, विलय नहीं।
- निर्णायक निर्वाचन आयोग नहीं — अध्यक्ष/सभापति।
- अनु. 102 व 191 की सामान्य अयोग्यता पर निर्णय राष्ट्रपति/राज्यपाल का — दल-बदल पर नहीं।
🧠 याद रखने की ट्रिक (Memory Tricks)
- “52 में आया, 91 में सुधरा” — 1985 और 2003।
- “विभाजन 1/3 — गया; विलय 2/3 — बचा”।
- श्रेणी — “दल वाला छोड़े तो, निर्दलीय जुड़े तो, मनोनीत 6 माह बाद जुड़े तो — अयोग्य”।
- “व्हिप तोड़ा — 15 दिन माफ़ी की खिड़की”।
- निर्णय — “कि-री-की-सु” (किहोतो 92, रवि नाइक 94, कीशम 2020, सुभाष देसाई 2023)।
👨🏫 शिक्षक की परीक्षा टिप्पणी
इस विषय में तीन संख्याएँ — 2/3 (विलय), 15 दिन (क्षमा), 6 माह (मनोनीत) — और दो संशोधन (52, 91) याद हैं तो आधे प्रश्न हल। शेष के लिए खंड 4 के चार निर्णय क्रम से लिखिए।
✍️ अभ्यास करें — टेस्ट सीरीज़, क्विज़ व करेंट अफेयर्स
दल-बदल विरोधी कानून: दसवीं अनुसूची, अयोग्यता एवं अध्यक्ष की भूमिका पर अपनी तैयारी परखने के लिए:
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📖 प्रामाणिक संदर्भ एवं स्रोत
- भारत का संविधान — दसवीं अनुसूची; अनु. 75(1B), 102(2), 164(1B), 191(2), 361B।
- संविधान (52वाँ संशोधन) अधिनियम 1985; (91वाँ संशोधन) अधिनियम 2003।
- किहोतो होलोहन (1992), रवि नाइक (1994), कीशम मेघचंद्र सिंह (2020), सुभाष देसाई (2023)।
- विधि आयोग — 170वाँ प्रतिवेदन (1999); दिनेश गोस्वामी समिति (1990)।

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Q1. दल-बदल विरोधी कानून (दसवीं अनुसूची) किस संशोधन से जोड़ा गया?
सुयोग अभ्यास प्रश्न (RPSC/RSMSSB पैटर्न) 2026Q2. 91वें संशोधन (2003) ने दसवीं अनुसूची से कौन-सा अपवाद हटाया?
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सुयोग अभ्यास प्रश्न (RPSC/RSMSSB पैटर्न) 2026महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)
52वाँ संशोधन, 1985।
2/3 सदस्य।
अध्यक्ष/सभापति।
91वाँ, 2003।
किहोतो होलोहन 1992।
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