सुयोग अकादमी (Suyog Academy)
suyogacademy.com — RPSC & RSMSSB फ्री GK नोट्स
राजस्थान इतिहास

राजस्थान में क्रांतिकारी आंदोलन — सेठी, बारहठ परिवार, खरवा, गोपा — RAS/CET

सुधीर ढाका (इतिहास, कला-संस्कृति, हिंदी व्याकरण, विज्ञान व प्रौद्योगिकी नोट्स लेखक)
प्रकाशित:
27 मिनट पठन

कैसे बना: यह नोट सुयोग अकादमी के लेखक ने परीक्षा सिलेबस के अनुसार लिखा/संपादित किया है। प्रकाशन तिथि ऊपर और अंतिम संशोधन तिथि लेख के अंत में दी गई है। त्रुटि दिखे तो संपर्क करें। टीम परिचय

स्रोत आधार: RPSC RAS / RSMSSB CET पाठ्यक्रम — राजस्थान इतिहास इकाई। पाठ्यपुस्तक पृष्ठ यहाँ नहीं चिपकाए गए।

शेयर करें:
🏛️राजस्थान इतिहासSUYOG ACADEMY
🏛️
सुयोग अकादमी • RPSC & RSMSSB100% नि:शुल्क

सुयोग AI गुरु

नोट्स के मुख्य बिंदु, मॉक MCQ या डाउट पूछें

संक्षिप्त उत्तर: राजस्थान में स्वतंत्रता संग्राम की क्रांतिकारी (सशस्त्र) धारा 20वीं सदी के पहले दो दशकों में सबसे सक्रिय रही। इसके चार स्तंभ थे — अर्जुनलाल सेठी (जयपुर; वर्धमान विद्यालय, 1907 — क्रांतिकारी प्रशिक्षण का केंद्र; शिष्यों के आरा (बिहार) महंत हत्याकांड में नाम आने पर बिना मुकदमे लंबी नज़रबंदी, वेल्लोर जेल), केसरी सिंह बारहठ (शाहपुरा; "चेतावनी रा चूंगट्या" के 13 सोरठे लिखकर 1903 में महाराणा फतेह सिंह को लॉर्ड कर्ज़न के दिल्ली दरबार में जाने से रोका; निमाज के प्यारेलाल साधु हत्याकांड में 20 वर्ष की सज़ा, हज़ारीबाग जेल), उनके पुत्र प्रताप सिंह बारहठ (23 दिसंबर 1912 का लॉर्ड हार्डिंग बम कांड/दिल्ली षड्यंत्र; बरेली जेल में 1918 में यातना से मृत्यु) और भाई जोरावर सिंह बारहठ (हार्डिंग बम कांड; आजीवन फरार), तथा राव गोपाल सिंह खरवा व विजय सिंह पथिक (भूपसिंह) — जिन्होंने रासबिहारी बोस की 21 फरवरी 1915 की सशस्त्र क्रांति योजना के तहत अजमेर-नसीराबाद में विद्रोह की तैयारी की; योजना विफल होने पर दोनों टॉडगढ़ में नज़रबंद हुए। दामोदरदास राठी (ब्यावर) इन्हें आर्थिक सहायता देते थे। बाद के दौर में सागरमल गोपा ("जैसलमेर का गुंडाराज"; 4 अप्रैल 1946 को जेल में जलाए जाने से मृत्यु) और बालमुकुंद बिस्सा (जोधपुर; 1942 भारत छोड़ो आंदोलन में जेल में अनशन के बाद मृत्यु) रियासती दमन के प्रतीक बने।


संक्षिप्त उत्तर

व्यक्ति

मुख्य पहचान

याद रखने योग्य संकेत

अर्जुनलाल सेठी

वर्धमान विद्यालय, जयपुर (1907)

आरा केस; वेल्लोर जेल; मृत्यु अजमेर 1941

केसरी सिंह बारहठ

"चेतावनी रा चूंगट्या" (1903)

शाहपुरा; प्यारेलाल साधु हत्याकांड; हज़ारीबाग जेल

प्रताप सिंह बारहठ

हार्डिंग बम कांड 1912; बनारस षड्यंत्र केस

बरेली जेल में 1918 में शहादत

जोरावर सिंह बारहठ

हार्डिंग बम कांड 1912 (प्रताप के साथ)

जीवनभर पकड़े नहीं गए; फरारी में मृत्यु

राव गोपाल सिंह खरवा

1915 सशस्त्र क्रांति योजना (राजस्थान)

रासबिहारी बोस; टॉडगढ़ नज़रबंदी

विजय सिंह पथिक

मूल नाम भूपसिंह; 1915 योजना में खरवा के साथ

टॉडगढ़ से फरार होकर नाम बदला; फिर बिजोलिया

दामोदरदास राठी

ब्यावर के सेठ, क्रांतिकारियों के आर्थिक सहायक

1915 योजना के सहयोगी

मोतीचंद, विष्णुदत्त

सेठी के वर्धमान विद्यालय से जुड़े युवक

महंत हत्याकांड में अभियुक्त

सागरमल गोपा

जैसलमेर; "जैसलमेर का गुंडाराज"

जेल में जलाए गए; मृत्यु 4 अप्रैल 1946

बालमुकुंद बिस्सा

जोधपुर; मारवाड़ लोक परिषद

1942 में जेल में अनशन; 19 जून 1942 मृत्यु


2. सिलेबस में यह टॉपिक क्यों महत्वपूर्ण है?

RAS प्रारंभिक व मुख्य परीक्षा, राजस्थान CET (12वीं व स्नातक स्तर), पटवारी, SI और REET में "राजस्थान में स्वतंत्रता आंदोलन" का एक निश्चित हिस्सा क्रांतिकारी आंदोलन से आता है। प्रश्न प्रायः चार रूपों में बनते हैं —

  • व्यक्ति → रचना/संस्था: "चेतावनी रा चूंगट्या" किसकी रचना है? वर्धमान विद्यालय किसने स्थापित किया?

  • व्यक्ति → जेल: हज़ारीबाग (केसरी सिंह), बरेली (प्रताप सिंह), वेल्लोर (सेठी), टॉडगढ़ (खरवा व पथिक)।

  • घटना → वर्ष: हार्डिंग बम कांड 1912, सशस्त्र क्रांति योजना 1915, प्रताप की मृत्यु 1918, गोपा की मृत्यु 1946, बिस्सा की मृत्यु 1942।

  • "असत्य कथन" वाले प्रश्न: बारहठ परिवार के तीन सदस्यों (केसरी, प्रताप, जोरावर) के आपसी संबंध, या दो अलग "बालमुकुंद" का भ्रम।

यह नोट केवल क्रांतिकारी धारा पर केंद्रित है। प्रजामंडलों की स्थापना-तिथियाँ और नेता के लिए प्रमुख प्रजामंडल: संस्थापक, नेता एवं वर्ष तथा किसान आंदोलनों के लिए बिजोलिया किसान आंदोलन देखें।


3. पृष्ठभूमि: राजस्थान में क्रांतिकारी धारा क्यों उभरी?

3.1 दोहरी गुलामी

1818 की संधियों के बाद राजपूताना की रियासतें ब्रिटिश सर्वोच्चता के अधीन आ गईं (विस्तार: ब्रिटिश सर्वोच्चता 1818–1947)। जनता पर एक ओर ब्रिटिश सत्ता और दूसरी ओर रियासती शासक व जागीरदार — दोनों का बोझ था। ब्रिटिश भारत की तरह यहाँ सभा, समाचार-पत्र और संगठन की स्वतंत्रता नहीं थी, इसलिए खुला राजनीतिक आंदोलन कठिन था और गुप्त, सशस्त्र मार्ग कुछ युवाओं को अधिक आकर्षक लगा।

3.2 राष्ट्रीय प्रभाव

  • बंग-भंग (1905) और स्वदेशी आंदोलन के बाद पूरे देश में क्रांतिकारी संगठनों का विस्तार हुआ।

  • बंगाल व पंजाब के क्रांतिकारियों — विशेषकर रासबिहारी बोस — से राजस्थान के क्रांतिकारियों का सीधा संपर्क बना।

  • प्रथम विश्वयुद्ध (1914–18) के समय ग़दर पार्टी व रासबिहारी बोस ने भारतीय सेना की छावनियों में एक साथ विद्रोह की योजना बनाई — इसकी राजस्थान शाखा खरवा-पथिक के नेतृत्व में थी।

3.3 राजस्थान की विशेषताएँ

  • यहाँ क्रांतिकारी आंदोलन का नेतृत्व कुछ चारण, राजपूत व जैन/वैश्य परिवारों ने किया — बारहठ (चारण), खरवा (राठौड़ ठिकानेदार), सेठी (जैन), राठी (माहेश्वरी सेठ)।

  • केंद्र थे — जयपुर (वर्धमान विद्यालय), अजमेर-ब्यावर-नसीराबाद (ब्रिटिश क्षेत्र अजमेर-मेरवाड़ा), शाहपुरा और कोटा।

  • संगठनों के रूप में वीर भारत सभा (केसरी सिंह बारहठ व गोपाल सिंह खरवा से जुड़ी) और अभिनव भारत की राजस्थान इकाई का उल्लेख मिलता है; इनके स्थापना-वर्ष पर पुस्तकें एकमत नहीं, सामान्यतः लगभग 1910 के आसपास बताया जाता है।

मूल सूत्र: बंग-भंग (1905) → वर्धमान विद्यालय (1907) → हार्डिंग बम (1912) → सशस्त्र क्रांति योजना (1915) → प्रताप की शहादत (1918)


4. अर्जुनलाल सेठी — "राजस्थान में क्रांतिकारी चेतना के अग्रदूत"

4.1 परिचय

बिंदु

तथ्य

जन्म

जयपुर, 1880 (प्रचलित तिथि 9 सितंबर 1880)

धर्म/परिवार

जैन परिवार

शिक्षा

स्नातक (B.A.) — अपने समय के जयपुर के गिने-चुने स्नातकों में

प्रमुख संस्था

वर्धमान विद्यालय, जयपुर (1907); इससे पहले जैन शिक्षा प्रचारक समिति (लगभग 1905–06)

प्रमुख केस

आरा (बिहार) महंत हत्याकांड — शिष्यों का नाम आया; सेठी पर षड्यंत्र का संदेह

जेल

पहले जयपुर में नज़रबंद, फिर वेल्लोर (मद्रास प्रेसीडेंसी) जेल; 1920 में रिहाई

मृत्यु

23 दिसंबर 1941, अजमेर

4.2 वर्धमान विद्यालय (1907)

सेठी ने जयपुर में वर्धमान विद्यालय खोला। ऊपर से यह एक सामान्य शिक्षा-संस्था थी, पर वास्तव में यहाँ युवाओं को राष्ट्रवाद, गुप्त संगठन और क्रांतिकारी कार्य का प्रशिक्षण दिया जाता था। इसी विद्यालय से जुड़े मोतीचंद, माणकचंद, जयचंद, विष्णुदत्त जैसे युवक बाद में क्रांतिकारी गतिविधियों में पकड़े गए। परीक्षा में "वर्धमान विद्यालय = सेठी = जयपुर = 1907" एक सीधा युग्म है।

4.3 आरा हत्याकांड और नज़रबंदी

क्रांतिकारी कार्यों के लिए धन जुटाने हेतु सेठी के शिष्यों पर बिहार के आरा में एक धनी महंत की हत्या का आरोप लगा (प्रचलित वर्ष 1913)। प्रचलित विवरणों में मोतीचंद को मृत्युदंड और विष्णुदत्त को लंबी कैद मिलने का उल्लेख है। सेठी के विरुद्ध प्रत्यक्ष प्रमाण न मिलने पर भी उन्हें बिना मुकदमे पहले जयपुर में नज़रबंद रखा गया, फिर वेल्लोर जेल भेजा गया। वहाँ उनके अनशन की चर्चा राष्ट्रीय स्तर पर हुई। लगभग 1920 में वे रिहा हुए।

स्रोत-भेद: कुछ पुस्तकें "निमाज हत्याकांड" और "आरा हत्याकांड" को एक साथ "सेठी-बारहठ षड्यंत्र" के रूप में लिखती हैं, क्योंकि दोनों में धन-संग्रह हेतु महंत/साधु की हत्या हुई और अभियुक्त एक ही क्रांतिकारी समूह से जुड़े थे। परीक्षा के लिए — आरा (बिहार) → सेठी के शिष्य; निमाज (मारवाड़) → प्यारेलाल साधु → केसरी सिंह बारहठ को सज़ा।

4.4 बाद का जीवन

  • रिहाई के बाद वे कांग्रेस के कार्यों में सक्रिय रहे और अजमेर उनका केंद्र बना।

  • एक प्रसिद्ध प्रसंग के अनुसार उन्हें जयपुर राज्य में ऊँचा पद देने का प्रस्ताव मिला, जिसे उन्होंने यह कहकर ठुकरा दिया कि यदि सेठी अंग्रेज़ों की नौकरी करेगा तो उन्हें देश से निकालेगा कौन — यह प्रसंग लोक-परंपरा व जीवनी-ग्रंथों में मिलता है।

  • कांग्रेस की आंतरिक गुटबाज़ी से निराश होकर वे अंतिम वर्षों में सार्वजनिक जीवन से अलग हो गए और अजमेर में साधारण जीवन बिताया।

  • मृत्यु 23 दिसंबर 1941, अजमेर। अनेक स्रोतों के अनुसार उनकी इच्छा के अनुसार उन्हें दफ़नाया गया — यह उनकी सर्वधर्म-समभाव की छवि से जुड़ा तथ्य है।

सेठी = "S-V-V": Sethi — Vardhaman (1907) — Vellore जेल


5. केसरी सिंह बारहठ — कवि-क्रांतिकारी

5.1 परिचय

बिंदु

तथ्य

जन्म

1872, देवपुरा गाँव — शाहपुरा रियासत (वर्तमान भीलवाड़ा क्षेत्र); प्रचलित तिथि 21 नवंबर 1872

जाति/परंपरा

चारण (बारहठ उपाधि — राजदरबार के कवि/चारण परिवार)

प्रसिद्ध रचना

"चेतावनी रा चूंगट्या" — 13 सोरठे (1903)

संगठन

वीर भारत सभा (गोपाल सिंह खरवा के साथ, लगभग 1910)

मुकदमा

प्यारेलाल साधु हत्याकांड (निमाज, मारवाड़) में दोषी — 20 वर्ष का कारावास

जेल

हज़ारीबाग केंद्रीय जेल (बिहार); लगभग 1919–20 में समय से पहले रिहाई

परिवार

पुत्र प्रताप सिंह बारहठ; छोटे भाई जोरावर सिंह बारहठ

मृत्यु

14 अगस्त 1941, कोटा

5.2 "चेतावनी रा चूंगट्या" (1903)

1903 में वायसराय लॉर्ड कर्ज़न ने एडवर्ड सप्तम के राज्याभिषेक के उपलक्ष्य में दिल्ली दरबार आयोजित किया। मेवाड़ के महाराणा फतेह सिंह भी वहाँ जाने के लिए निकले। केसरी सिंह बारहठ ने डिंगल भाषा में 13 सोरठे लिखे — "चेतावनी रा चूंगट्या" (चेतावनी की चुटकियाँ/चुभन) — जिनमें मेवाड़ के गौरवशाली अतीत, महाराणा प्रताप की परंपरा और अंग्रेज़ों के सामने झुकने की लज्जा याद दिलाई गई। परंपरा के अनुसार ये सोरठे रेल-यात्रा के दौरान ही महाराणा तक पहुँचाए गए (कुछ स्रोतों में इस कार्य में राव गोपाल सिंह खरवा की भूमिका बताई जाती है)। परिणाम — महाराणा दिल्ली तो पहुँचे पर दरबार में उपस्थित नहीं हुए और लौट आए। यही इस रचना का ऐतिहासिक महत्व है।

सावधानी: 1911 का दिल्ली दरबार (जॉर्ज पंचम, हार्डिंग) अलग है। "चेतावनी रा चूंगट्या" का संबंध 1903 — कर्ज़न — फतेह सिंह से है।

5.3 क्रांतिकारी गतिविधियाँ और प्यारेलाल साधु हत्याकांड

केसरी सिंह ने क्षत्रिय व चारण युवकों में राष्ट्रीय शिक्षा व चेतना के लिए योजनाएँ बनाईं और रासबिहारी बोस के क्रांतिकारी तंत्र से जुड़े। क्रांतिकारी धन-संग्रह के प्रयास में निमाज (मारवाड़/जोधपुर रियासत) के धनी साधु/महंत प्यारेलाल की हत्या हुई (प्रचलित वर्ष 1912)। केसरी सिंह को इस षड्यंत्र में दोषी ठहराकर 1914 में 20 वर्ष की सज़ा दी गई और हज़ारीबाग (बिहार) जेल भेजा गया। शाहपुरा रियासत ने उनकी जागीर व संपत्ति ज़ब्त कर ली। प्रथम विश्वयुद्ध के बाद लगभग 1919–20 में वे रिहा हुए।

5.4 बारहठ परिवार का बलिदान

एक ही परिवार से केसरी सिंह (जेल), पुत्र प्रताप सिंह (जेल में मृत्यु), भाई जोरावर सिंह (आजीवन फरारी) — इसलिए बारहठ परिवार को राजस्थान के सबसे बड़े "बलिदानी परिवार" के रूप में याद किया जाता है। शाहपुरा (भीलवाड़ा) में बारहठ परिवार की स्मृति में स्मारक/हवेली इस विरासत की पहचान है। रिहाई के बाद केसरी सिंह कोटा में रहे और वहीं 14 अगस्त 1941 को उनका निधन हुआ।

"चेतावनी" = 13 सोरठे = 1903 = फतेह सिंह = कर्ज़न दरबार; "हज़ारीबाग" = केसरी (H-K: Hazaribagh-Kesari)


6. प्रताप सिंह बारहठ — "माँ को रोने दो"

बिंदु

तथ्य

जन्म

1893, उदयपुर (प्रचलित तिथि 24 मई 1893)

पिता

केसरी सिंह बारहठ

गुरु/संपर्क

रासबिहारी बोस; चाचा जोरावर सिंह के साथ कार्य

प्रमुख घटना

लॉर्ड हार्डिंग पर बम — 23 दिसंबर 1912, चाँदनी चौक, दिल्ली (दिल्ली षड्यंत्र)

गिरफ्तारी

1915–16 के आसपास (प्रचलित विवरण: मारवाड़ के आशानाडा स्टेशन के पास)

सज़ा

बनारस षड्यंत्र केस — 5 वर्ष का कठोर कारावास

जेल व मृत्यु

बरेली केंद्रीय जेल; मई 1918 में यातनाओं से मृत्यु (तिथि पर स्रोत-भेद)

6.1 हार्डिंग बम कांड (1912)

राजधानी कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित होने के उपलक्ष्य में वायसराय लॉर्ड हार्डिंग का जुलूस 23 दिसंबर 1912 को दिल्ली के चाँदनी चौक से निकला। हाथी पर सवार वायसराय पर बम फेंका गया; हार्डिंग घायल हुए और उनका एक सेवक मारा गया। योजना रासबिहारी बोस की थी। राजस्थान की इतिहास-पुस्तकें इस घटना में प्रताप सिंह बारहठ और जोरावर सिंह बारहठ की प्रत्यक्ष भूमिका बताती हैं (एक प्रचलित विवरण में जोरावर सिंह ने बुर्क़ा पहनकर बम फेंका)। इस प्रकरण के मुकदमे को दिल्ली षड्यंत्र केस कहते हैं, जिसमें मास्टर अमीरचंद, अवध बिहारी, भाई बालमुकुंद और बसंत कुमार बिस्वास को फाँसी हुई।

6.2 बरेली जेल और शहादत

1915 की क्रांति योजना विफल होने के बाद प्रताप सिंह पकड़े गए और बनारस षड्यंत्र केस में 5 वर्ष की सज़ा पाकर बरेली जेल में रखे गए। पुलिस अधिकारी (प्रचलित नाम: क्लीवलैंड) ने साथियों के नाम बताने के बदले पिता की रिहाई और जागीर लौटाने का प्रलोभन दिया और कहा कि तुम्हारी माँ रोती है। प्रताप का प्रसिद्ध उत्तर —

"मेरी माँ रोती है तो रोने दो; मैं अपनी माँ को हँसाने के लिए हज़ारों माताओं को नहीं रुला सकता।"

लगातार यातनाओं के बाद मई 1918 में बरेली जेल में उनकी मृत्यु हुई (परीक्षा-पुस्तकों में प्रायः 24/27 मई 1918; कुछ स्रोतों में अन्य तिथि)। परीक्षा का सुरक्षित उत्तर — बरेली जेल, 1918। उस समय उनकी आयु लगभग 25 वर्ष थी।


7. जोरावर सिंह बारहठ — "जो कभी पकड़े नहीं गए"

  • संबंध: केसरी सिंह बारहठ के छोटे भाई, प्रताप सिंह के चाचा। जन्म 1883, उदयपुर (प्रचलित)।

  • हार्डिंग बम कांड (1912): प्रताप सिंह के साथ प्रमुख भूमिका; बम फेंकने वालों में उनका नाम लिया जाता है।

  • महंत हत्याकांड: सेठी-बारहठ समूह से जुड़े धन-संग्रह प्रकरणों (निमाज/आरा) में भी उनका नाम अभियुक्तों में आता है।

  • फरारी: अंग्रेज़ उन्हें कभी गिरफ्तार नहीं कर पाए। लगभग ढाई दशक से अधिक समय उन्होंने वेश व नाम बदलकर मालवा-हाड़ौती क्षेत्र में भूमिगत रहकर बिताया।

  • मृत्यु: 1939 में, फरारी की अवस्था में ही (स्थान के रूप में कोटा क्षेत्र का उल्लेख; विवरण में स्रोत-भेद)।

बारहठ परिवार

संबंध

नियति

केसरी सिंह

मुखिया (पिता/बड़े भाई)

हज़ारीबाग जेल; 1941 में कोटा में मृत्यु

प्रताप सिंह

केसरी सिंह के पुत्र

बरेली जेल में 1918 में शहादत

जोरावर सिंह

केसरी सिंह के छोटे भाई

आजीवन फरार; 1939 में मृत्यु

"K-P-J = जेल-मौत-फरार": Kesari जेल में, Pratap जेल में मौत, Jorawar फरार


8. राव गोपाल सिंह खरवा और 1915 की सशस्त्र क्रांति योजना

8.1 परिचय

खरवा अजमेर-मेरवाड़ा क्षेत्र का एक राठौड़ ठिकाना था। इसके ठाकुर राव गोपाल सिंह खरवा (जन्म 1873, प्रचलित) राजस्थान के उन गिने-चुने जागीरदारों में थे जिन्होंने खुलकर ब्रिटिश-विरोधी क्रांतिकारी मार्ग अपनाया। वे केसरी सिंह बारहठ के घनिष्ठ सहयोगी थे और वीर भारत सभा से जुड़े थे।

8.2 रासबिहारी बोस की योजना (21 फरवरी 1915)

  • प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान रासबिहारी बोस व ग़दर क्रांतिकारियों ने तय किया कि 21 फरवरी 1915 को लाहौर, फ़िरोज़पुर, मेरठ आदि छावनियों के साथ एक साथ विद्रोह होगा।

  • राजस्थान में इस योजना का दायित्व गोपाल सिंह खरवा और विजय सिंह पथिक (तब भूपसिंह) को मिला। लक्ष्य था — अजमेर और नसीराबाद छावनी पर अधिकार।

  • लगभग दो हज़ार सशस्त्र साथियों को खरवा क्षेत्र में तैयार रखने का उल्लेख मिलता है (संख्या अनुमानित)।

  • योजना का भेद खुल गया (एक मुखबिर/कृपाल सिंह प्रसंग पंजाब में चर्चित है) और विद्रोह से पहले ही पूरे देश में गिरफ्तारियाँ शुरू हो गईं।

8.3 टॉडगढ़ नज़रबंदी

अंग्रेज़ों ने खरवा को घेर लिया। गोपाल सिंह खरवा और भूपसिंह को टॉडगढ़ (अजमेर-मेरवाड़ा) में नज़रबंद किया गया। कुछ समय बाद दोनों वहाँ से निकल भागे। प्रचलित विवरणों के अनुसार गोपाल सिंह बाद में किशनगढ़ क्षेत्र (सलेमाबाद के पास) पकड़े गए और लंबे समय तक कैद/नज़रबंद रहे, जबकि भूपसिंह ने नाम बदलकर विजय सिंह पथिक रख लिया और मेवाड़ चले गए। गोपाल सिंह खरवा का निधन 1939 के आसपास हुआ (तिथि पर स्रोत-भेद)।

"खरवा-टॉडगढ़-1915": T = Todgarh = Twenty-one February 1915


9. विजय सिंह पथिक का क्रांतिकारी पक्ष

पथिक को परीक्षा में प्रायः बिजोलिया किसान आंदोलन के नेता के रूप में पूछा जाता है (देखें बिजोलिया किसान आंदोलन), पर उनका सार्वजनिक जीवन एक क्रांतिकारी के रूप में शुरू हुआ।

चरण

विवरण

मूल नाम व जन्म

भूपसिंह; जन्म 1882, गुठावली (बुलंदशहर, उत्तर प्रदेश) — प्रचलित

क्रांतिकारी संपर्क

रासबिहारी बोस व शचींद्र नाथ सान्याल के क्रांतिकारी दल से जुड़े

1915

गोपाल सिंह खरवा के साथ अजमेर-नसीराबाद विद्रोह की तैयारी

टॉडगढ़

नज़रबंदी से फरार; नया नाम "विजय सिंह पथिक"

1915–16

चित्तौड़ में विद्या प्रचारिणी सभा; साधु सीताराम दास के आग्रह पर बिजोलिया आंदोलन से जुड़े (1916)

1919

वर्धा में राजस्थान सेवा संघ (1920 में अजमेर स्थानांतरित)

पत्रकारिता

"राजस्थान केसरी" (वर्धा), "नवीन राजस्थान" (अजमेर) — विस्तार हेतु देखें समाचार-पत्र नोट

मृत्यु

28 मई 1954, अजमेर

महत्त्व: पथिक इस बात के उदाहरण हैं कि 1915 के बाद राजस्थान में क्रांतिकारी धारा कैसे जन-आंदोलन व किसान-संगठन में रूपांतरित हुई। राजस्थान के समाचार-पत्रों के लिए राजस्थान में समाचार-पत्र व पत्रकारिता का इतिहास देखें।


10. दामोदरदास राठी और अन्य सहयोगी

10.1 दामोदरदास राठी (ब्यावर)

  • ब्यावर के प्रसिद्ध माहेश्वरी उद्योगपति/सेठ; ब्यावर की कृष्णा मिल से उनका नाम जोड़ा जाता है।

  • क्रांतिकारियों को धन, आश्रय और संपर्क उपलब्ध कराया — विशेषकर खरवा, पथिक, केसरी सिंह और सेठी के समूह को।

  • 1915 की सशस्त्र क्रांति योजना के राजस्थान-सहयोगियों में उनका नाम लिया जाता है।

  • वे आर्य समाज व राष्ट्रीय शिक्षा के समर्थक भी थे। परीक्षा सूत्र — "राठी = ब्यावर = क्रांतिकारियों के फाइनेंसर"।

10.2 सेठी के शिष्य: मोतीचंद और विष्णुदत्त

मोतीचंद और विष्णुदत्त (साथ में माणकचंद, जयचंद) वर्धमान विद्यालय से जुड़े युवक थे। महंत हत्याकांड (आरा) में अभियुक्त बने। प्रचलित विवरणों के अनुसार मोतीचंद को फाँसी की सज़ा हुई और विष्णुदत्त को लंबा कारावास मिला। इन्हीं की गिरफ्तारी के आधार पर अंग्रेज़ों ने सेठी को षड्यंत्र का सूत्रधार मानकर नज़रबंद किया।

10.3 ज्वाला प्रसाद और भैरोंलाल

कुछ प्रतियोगी पुस्तकों में ज्वाला प्रसाद और भैरोंलाल के नाम भी राजस्थान (विशेषकर अजमेर क्षेत्र) के क्रांतिकारी सहयोगियों में गिनाए जाते हैं; ज्वाला प्रसाद (शर्मा) का संबंध 1930 के दशक में अजमेर के क्रांतिकारी दल से बताया जाता है। इनके विस्तृत विवरण पर मानक स्रोत एकमत नहीं, अतः इन्हें केवल क्रांतिकारी सहयोगी के रूप में याद रखें।


11. सागरमल गोपा — जैसलमेर का शहीद

बिंदु

तथ्य

जन्म

1900, जैसलमेर (प्रचलित तिथि 3 नवंबर 1900)

शासक (विरोध)

महारावल जवाहर सिंह के निरंकुश शासन का विरोध

प्रमुख पुस्तक

"जैसलमेर का गुंडाराज" (लगभग 1939–40)

अन्य रचनाएँ

"आज़ादी के दीवाने", "रघुनाथ सिंह का मुकदमा" (प्रचलित)

गिरफ्तारी

1941 — जैसलमेर लौटने पर; 6 वर्ष की सज़ा

मृत्यु

3 अप्रैल 1946 को जेल में मिट्टी का तेल डालकर जलाया गया; 4 अप्रैल 1946 को मृत्यु

जाँच

गोपाल स्वरूप पाठक आयोग — इसे आत्महत्या बताया, जिसे जनता ने स्वीकार नहीं किया

सागरमल गोपा ने जैसलमेर रियासत में नागरिक अधिकारों के दमन, बेगार और भ्रष्टाचार का पर्दाफ़ाश किया। रियासत से निष्कासन के बाद वे नागपुर आदि स्थानों से लेखन करते रहे। "जैसलमेर का गुंडाराज" पुस्तक ने महारावल के शासन को खुली चुनौती दी। 1941 में जैसलमेर लौटने पर उन्हें गिरफ्तार कर अमानवीय यातनाएँ दी गईं। जेल में थानेदार (प्रचलित नाम गुमानसिंह) द्वारा उन पर मिट्टी का तेल डालकर आग लगाने की घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया; नेहरू सहित राष्ट्रीय नेताओं ने इसकी निंदा की। गोपा की शहादत के बाद जैसलमेर में प्रजामंडल गतिविधियाँ तेज़ हुईं। जैसलमेर के इतिहास के लिए जैसलमेर भाटी राजवंश देखें।

नोट: गोपा क्रांतिकारी (बम/हथियार) धारा के नहीं, बल्कि रियासती अत्याचार के विरुद्ध लेखन-आधारित प्रतिरोध के शहीद थे; पर परीक्षा-पुस्तकों में वे "राजस्थान के प्रमुख शहीद/क्रांतिकारी" सूची में रखे जाते हैं।

"गोपा — गुंडाराज — 4/4/46": चार अप्रैल छियालीस


12. बालमुकुंद बिस्सा — 1942 का शहीद (जोधपुर)

  • क्षेत्र: मारवाड़ (जोधपुर रियासत); मारवाड़ लोक परिषद के कार्यकर्ता। जोधपुर में खादी भंडार चलाकर खादी व स्वदेशी का प्रचार करते थे। जन्म-स्थान के रूप में डीडवाना क्षेत्र के पीलवा गाँव का उल्लेख मिलता है; जन्म-वर्ष 1908 (प्रचलित)।

  • 1942: भारत छोड़ो आंदोलन के समय मारवाड़ लोक परिषद ने उत्तरदायी शासन की माँग तेज़ की। बिस्सा गिरफ्तार हुए (प्रचलित तिथि 9 जून 1942)।

  • अनशन व मृत्यु: जेल की अमानवीय परिस्थितियों के विरुद्ध भूख हड़ताल की; स्वास्थ्य बिगड़ने पर अस्पताल ले जाए गए और 19 जून 1942 को उनकी मृत्यु हुई।

  • प्रभाव: उनकी मृत्यु से जोधपुर में जनाक्रोश फैला और लोक परिषद का आंदोलन और तीव्र हुआ। विस्तार: मारवाड़ लोक परिषद व प्रजामंडल।

बड़ा Trap: भाई बालमुकुंद (पंजाब) दिल्ली षड्यंत्र केस (हार्डिंग बम, 1912) में 1915 में फाँसी पाने वाले क्रांतिकारी थे; बालमुकुंद बिस्सा जोधपुर के 1942 के शहीद। दोनों अलग व्यक्ति हैं।


13. 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन और राजस्थान

8 अगस्त 1942 को बंबई में "भारत छोड़ो" प्रस्ताव पारित होने के बाद राजस्थान की रियासतों में इसकी प्रतिक्रिया अलग-अलग रही। मुख्य बात — रियासतों में आंदोलन ने ब्रिटिश-विरोध के साथ उत्तरदायी शासन की माँग का रूप लिया।

क्षेत्र

1942 की प्रमुख गतिविधि

मुख्य नाम

जयपुर

प्रजामंडल ने प्रधानमंत्री मिर्ज़ा इस्माइल से समझौते (प्रचलित नाम "जेंटलमैन एग्रीमेंट") के कारण आंदोलन नहीं छेड़ा; असंतुष्ट कार्यकर्ताओं ने "आज़ाद मोर्चा" बनाया

हीरालाल शास्त्री; बाबा हरिश्चंद्र (आज़ाद मोर्चा)

मेवाड़

प्रजामंडल ने महाराणा को अंग्रेज़ों से संबंध तोड़ने का अल्टीमेटम दिया; बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियाँ; छात्र आंदोलन

माणिक्यलाल वर्मा

मारवाड़

लोक परिषद का उत्तरदायी शासन आंदोलन; जेल में बालमुकुंद बिस्सा की मृत्यु

जयनारायण व्यास, बालमुकुंद बिस्सा

कोटा

जनता ने कुछ दिनों के लिए नगर प्रशासन/कोतवाली पर नियंत्रण कर लिया — 1942 का सबसे उग्र रूप

प्रजामंडल कार्यकर्ता (पं. अभिन्न हरि आदि)

अजमेर-मेरवाड़ा

ब्रिटिश क्षेत्र होने से सीधे कांग्रेस के निर्देश पर आंदोलन; नेताओं की गिरफ्तारी

स्थानीय कांग्रेस नेता

भरतपुर, शाहपुरा, बांसवाड़ा, डूंगरपुर

हड़ताल, सभाएँ, गिरफ्तारियाँ

स्थानीय प्रजामंडल

रियासत-वार विस्तार: जयपुर प्रजामंडल, मेवाड़ प्रजामंडल, कोटा प्रजामंडल और 1942 का जन आंदोलन। महिलाओं की भूमिका के लिए स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं की भूमिका देखें।


14. व्यक्ति → घटना मिलान सारणी (Match the Following)

व्यक्ति

घटना/रचना

स्थान

वर्ष

अर्जुनलाल सेठी

वर्धमान विद्यालय

जयपुर

1907

केसरी सिंह बारहठ

चेतावनी रा चूंगट्या

मेवाड़ (फतेह सिंह)

1903

केसरी सिंह बारहठ

प्यारेलाल साधु हत्याकांड में सज़ा

निमाज (मारवाड़) / हज़ारीबाग जेल

1912 (घटना), 1914 (सज़ा)

प्रताप सिंह बारहठ

हार्डिंग बम कांड

चाँदनी चौक, दिल्ली

23 दिसंबर 1912

प्रताप सिंह बारहठ

जेल में शहादत

बरेली

1918

जोरावर सिंह बारहठ

हार्डिंग बम कांड; आजीवन फरारी

दिल्ली; मालवा-हाड़ौती

1912; मृत्यु 1939

गोपाल सिंह खरवा

सशस्त्र क्रांति योजना

अजमेर-नसीराबाद; टॉडगढ़

1915

विजय सिंह पथिक

सशस्त्र क्रांति योजना; नाम परिवर्तन

टॉडगढ़ → बिजोलिया

1915–16

दामोदरदास राठी

क्रांतिकारियों को आर्थिक सहायता

ब्यावर

1910–15 का दौर

सागरमल गोपा

"जैसलमेर का गुंडाराज"; जेल में मृत्यु

जैसलमेर

4 अप्रैल 1946

बालमुकुंद बिस्सा

भारत छोड़ो; जेल में अनशन

जोधपुर

19 जून 1942


15. जेल-सारणी: कौन, कहाँ बंद रहा?

जेल/स्थान

राज्य/क्षेत्र

क्रांतिकारी

हज़ारीबाग केंद्रीय जेल

बिहार (अब झारखंड)

केसरी सिंह बारहठ

बरेली केंद्रीय जेल

उत्तर प्रदेश

प्रताप सिंह बारहठ (यहीं मृत्यु)

वेल्लोर जेल

मद्रास प्रेसीडेंसी (तमिलनाडु)

अर्जुनलाल सेठी

टॉडगढ़

अजमेर-मेरवाड़ा

गोपाल सिंह खरवा, विजय सिंह पथिक

जैसलमेर जेल

जैसलमेर रियासत

सागरमल गोपा (यहीं मृत्यु)

जोधपुर जेल

जोधपुर रियासत

बालमुकुंद बिस्सा (अनशन के बाद मृत्यु)

"हज़ार केसर, बरेली प्रताप, वेल्लोर सेठ, टॉड खरवा-पथिक"


16. विस्तृत समयरेखा (Timeline)

वर्ष

घटना

1903

कर्ज़न का दिल्ली दरबार; "चेतावनी रा चूंगट्या"; महाराणा फतेह सिंह दरबार में अनुपस्थित

1905

बंग-भंग; देशभर में क्रांतिकारी चेतना

1907

जयपुर में वर्धमान विद्यालय (सेठी)

लगभग 1910

वीर भारत सभा / अभिनव भारत की राजस्थान इकाई का उल्लेख

1912

निमाज में प्यारेलाल साधु की हत्या (प्रचलित वर्ष); 23 दिसंबर — हार्डिंग बम कांड, दिल्ली

1913

आरा (बिहार) महंत हत्याकांड — सेठी के शिष्य अभियुक्त (प्रचलित वर्ष)

1914

केसरी सिंह को 20 वर्ष की सज़ा, हज़ारीबाग जेल; सेठी नज़रबंद

21 फरवरी 1915

रासबिहारी बोस की सशस्त्र क्रांति की निर्धारित तिथि; खरवा-पथिक की अजमेर योजना विफल

1915

खरवा व भूपसिंह टॉडगढ़ में नज़रबंद, फिर फरार; भूपसिंह → विजय सिंह पथिक

1916

पथिक बिजोलिया आंदोलन से जुड़े

1918

प्रताप सिंह बारहठ की बरेली जेल में मृत्यु

1919–20

केसरी सिंह व सेठी की रिहाई; राजस्थान सेवा संघ (वर्धा 1919, अजमेर 1920)

1939

जोरावर सिंह बारहठ की फरारी में मृत्यु; "जैसलमेर का गुंडाराज" का प्रकाशन (लगभग)

1941

केसरी सिंह (14 अगस्त, कोटा) व सेठी (23 दिसंबर, अजमेर) का निधन; सागरमल गोपा गिरफ्तार

1942

भारत छोड़ो आंदोलन; 19 जून — बालमुकुंद बिस्सा की मृत्यु; कोटा में जनता का अस्थायी नियंत्रण

1946

4 अप्रैल — सागरमल गोपा की जैसलमेर जेल में मृत्यु

1954

28 मई — विजय सिंह पथिक का अजमेर में निधन

समग्र प्रजामंडल समयरेखा के लिए प्रजामंडल आंदोलन Timeline देखें।


17. परीक्षा में पूछे जाने वाले तथ्य (One-liners)

  1. वर्धमान विद्यालय (जयपुर, 1907) के संस्थापक — अर्जुनलाल सेठी।

  2. अर्जुनलाल सेठी को नज़रबंदी में रखा गया — वेल्लोर जेल (मद्रास प्रेसीडेंसी)।

  3. "चेतावनी रा चूंगट्या" के रचयिता — केसरी सिंह बारहठ; कुल 13 सोरठे।

  4. "चेतावनी रा चूंगट्या" किसे संबोधित — मेवाड़ के महाराणा फतेह सिंह (1903 का दिल्ली दरबार)।

  5. केसरी सिंह बारहठ का संबंध — शाहपुरा रियासत (देवपुरा गाँव)।

  6. प्यारेलाल साधु हत्याकांड का स्थान — निमाज (मारवाड़)।

  7. केसरी सिंह बारहठ को सज़ा — 20 वर्ष; जेल — हज़ारीबाग (बिहार)।

  8. लॉर्ड हार्डिंग बम कांड — 23 दिसंबर 1912, चाँदनी चौक, दिल्ली।

  9. हार्डिंग बम कांड से जुड़े राजस्थानी — प्रताप सिंह बारहठ व जोरावर सिंह बारहठ।

  10. प्रताप सिंह बारहठ की मृत्यु — बरेली जेल, 1918।

  11. "मेरी माँ रोती है तो रोने दो..." — प्रताप सिंह बारहठ।

  12. जोरावर सिंह बारहठ — केसरी सिंह के छोटे भाई; कभी गिरफ्तार नहीं हुए।

  13. 1915 की सशस्त्र क्रांति योजना (राजस्थान) — गोपाल सिंह खरवा व भूपसिंह (पथिक)।

  14. सशस्त्र क्रांति की निर्धारित तिथि — 21 फरवरी 1915 (रासबिहारी बोस)।

  15. खरवा व पथिक की नज़रबंदी — टॉडगढ़।

  16. विजय सिंह पथिक का मूल नाम — भूपसिंह; जन्म — गुठावली, बुलंदशहर (उ.प्र.)।

  17. क्रांतिकारियों के आर्थिक सहायक, ब्यावर — दामोदरदास राठी।

  18. "जैसलमेर का गुंडाराज" के लेखक — सागरमल गोपा।

  19. सागरमल गोपा की मृत्यु — 4 अप्रैल 1946, जैसलमेर जेल (महारावल जवाहर सिंह का काल)।

  20. बालमुकुंद बिस्सा — जोधपुर; 1942 में जेल में अनशन; मृत्यु 19 जून 1942।

  21. 1942 में जयपुर प्रजामंडल से असंतुष्ट होकर बना संगठन — आज़ाद मोर्चा (बाबा हरिश्चंद्र)।


18. भ्रम व सावधानियाँ (Exam Traps)

Trap 1: 1903 बनाम 1911 का दिल्ली दरबार

"चेतावनी रा चूंगट्या" 1903 (कर्ज़न, एडवर्ड सप्तम) के दरबार से जुड़ा है। 1911 का दरबार जॉर्ज पंचम का था, जिसमें राजधानी दिल्ली ले जाने की घोषणा हुई। विकल्पों में "1911" रखकर फँसाया जाता है।

Trap 2: फतेह सिंह दिल्ली गए थे, पर दरबार में नहीं

"महाराणा दिल्ली नहीं गए" लिखना अशुद्ध है। सही कथन — वे दिल्ली पहुँचे पर दरबार में शामिल नहीं हुए और लौट आए।

Trap 3: हज़ारीबाग बनाम बरेली

पिता केसरी सिंह → हज़ारीबाग; पुत्र प्रताप सिंह → बरेली। इन्हें आपस में बदलकर विकल्प बनते हैं।

Trap 4: जोरावर सिंह — भाई, पुत्र नहीं

जोरावर सिंह केसरी सिंह के छोटे भाई थे, प्रताप सिंह के चाचा। प्रताप सिंह केसरी सिंह के पुत्र।

Trap 5: निमाज बनाम आरा

निमाज (मारवाड़) — प्यारेलाल साधु — केसरी सिंह को सज़ा। आरा (बिहार) — सेठी के शिष्य। कुछ पुस्तकें दोनों को एक ही "महंत हत्याकांड" के रूप में लिखती हैं; प्रश्न में स्थान देखकर उत्तर दें।

Trap 6: वर्धमान विद्यालय — जयपुर, अजमेर नहीं

सेठी का बाद का जीवन अजमेर में बीता, पर वर्धमान विद्यालय जयपुर (1907) में स्थापित हुआ था।

Trap 7: दो "बालमुकुंद"

भाई बालमुकुंद — दिल्ली षड्यंत्र केस (1912 बम), 1915 में फाँसी। बालमुकुंद बिस्सा — जोधपुर, 1942। अलग व्यक्ति।

Trap 8: 1941 में दो निधन

केसरी सिंह बारहठ (14 अगस्त 1941, कोटा) और अर्जुनलाल सेठी (23 दिसंबर 1941, अजमेर) — वर्ष समान, स्थान अलग।

Trap 9: पथिक का जन्म राजस्थान में नहीं

विजय सिंह पथिक का जन्म उत्तर प्रदेश (बुलंदशहर) में हुआ; कर्मभूमि राजस्थान रही।

Trap 10: सागरमल गोपा — जोधपुर नहीं, जैसलमेर

गोपा जैसलमेर के थे और जैसलमेर जेल में मरे; जोधपुर जेल में 1942 में बिस्सा की मृत्यु हुई। दोनों "जेल में मृत्यु" वाले प्रश्नों में भ्रम होता है।

Trap 11: 1915 योजना के नेता "पथिक" नाम से नहीं

1915 में वे भूपसिंह थे; टॉडगढ़ से भागने के बाद "विजय सिंह पथिक" बने। प्रश्न में "1915 में भूपसिंह" लिखा हो तो वही पथिक हैं।


19. इसे आसानी से याद कैसे रखें?

1. "B-B" और "S-J": Barhath = Bhilwara (शाहपुरा); Sethi = Jaipur (वर्धमान विद्यालय)

2. "3-13-20": 1903 में 13 सोरठे; बाद में 20 वर्ष की सज़ा — सब केसरी सिंह

3. "12-15-18" (प्रताप): 1912 बम → 1915 योजना → 1918 शहादत

4. "H-B-V-T" जेलें: Hazaribagh (केसरी), Bareilly (प्रताप), Vellore (सेठी), Todgarh (खरवा-पथिक)

5. "गोपा 46, बिस्सा 42": जैसलमेर का गुंडाराज 46 में ले गया; जोधपुर का अनशन 42 में

6. "राठी = रुपया": ब्यावर के दामोदरदास राठी — क्रांतिकारियों के कोषाध्यक्ष जैसे


20. संबंधित नोट्स


21. एक दिन पहले — 12 रेखाएँ

  1. सेठी — जयपुर, वर्धमान विद्यालय 1907, आरा केस, वेल्लोर जेल, मृत्यु अजमेर 23 दिसंबर 1941।

  2. केसरी सिंह — शाहपुरा (देवपुरा), चारण, "चेतावनी रा चूंगट्या" (13 सोरठे, 1903, फतेह सिंह)।

  3. केसरी सिंह — निमाज प्यारेलाल साधु हत्याकांड, 20 वर्ष, हज़ारीबाग; मृत्यु कोटा 14 अगस्त 1941।

  4. प्रताप सिंह — केसरी के पुत्र; हार्डिंग बम 23 दिसंबर 1912; बनारस षड्यंत्र; बरेली जेल, 1918।

  5. प्रताप का वाक्य — "माँ रोती है तो रोने दो..."।

  6. जोरावर सिंह — केसरी के छोटे भाई; हार्डिंग बम; आजीवन फरार; 1939 में मृत्यु।

  7. खरवा — अजमेर-मेरवाड़ा का ठिकाना; राव गोपाल सिंह; वीर भारत सभा।

  8. 21 फरवरी 1915 — रासबिहारी बोस की योजना; राजस्थान में लक्ष्य अजमेर-नसीराबाद।

  9. टॉडगढ़ — खरवा व भूपसिंह नज़रबंद; भूपसिंह → विजय सिंह पथिक → बिजोलिया।

  10. दामोदरदास राठी — ब्यावर, क्रांतिकारियों के आर्थिक सहायक।

  11. सागरमल गोपा — "जैसलमेर का गुंडाराज"; 4 अप्रैल 1946 जेल में मृत्यु; पाठक आयोग।

  12. बालमुकुंद बिस्सा — जोधपुर, लोक परिषद, 19 जून 1942; 1942 में कोटा में जनता का अस्थायी नियंत्रण, जयपुर में आज़ाद मोर्चा।


22. अभ्यास

नोट पढ़ने के बाद इस पेज के अंत में दिए 25 प्रश्नों का क्विज़ हल करें। जिन प्रश्नों में गलती हो, उनके लिए खंड 14 (व्यक्ति → घटना मिलान), खंड 15 (जेल-सारणी) और खंड 18 (Traps) दोबारा पढ़ें। वर्ष-आधारित प्रश्नों के लिए खंड 16 की समयरेखा को कम से कम दो बार लिखकर दोहराएँ।


23. निष्कर्ष: परीक्षा के लिए क्या याद रखें?

राजस्थान का क्रांतिकारी आंदोलन संख्या में छोटा पर त्याग में असाधारण था। अर्जुनलाल सेठी ने शिक्षा के माध्यम से क्रांतिकारी तैयार किए, केसरी सिंह बारहठ ने कविता से एक महाराणा को अंग्रेज़ी दरबार से लौटा दिया, प्रताप सिंह ने जेल में प्राण दिए पर साथियों के नाम नहीं बताए, जोरावर सिंह जीवनभर फरार रहे, और खरवा-पथिक ने 1915 में सशस्त्र विद्रोह का साहस किया। 1915 की विफलता के बाद यही ऊर्जा किसान आंदोलनों और प्रजामंडलों में बदली, जिसकी परिणति सागरमल गोपा और बालमुकुंद बिस्सा जैसे शहीदों में दिखी। परीक्षा के लिए तीन स्तंभ याद रखें — व्यक्ति → रचना/संस्था, व्यक्ति → जेल, और 1903–1912–1915–1918–1942–1946 की वर्ष-शृंखला।

1903 चेतावनी · 1907 वर्धमान · 1912 हार्डिंग बम · 1914 हज़ारीबाग · 21 फरवरी 1915 क्रांति योजना · 1918 प्रताप शहीद · 1941 केसरी व सेठी का निधन · 1942 बिस्सा · 1946 गोपा


अंतिम संशोधन (Last Updated):
RPSC / RSSB सिलेबस के अनुसार
इतिहास, कला-संस्कृति, हिंदी व्याकरण, विज्ञान व प्रौद्योगिकी नोट्स लेखकलेखक परिचय

इस टॉपिक का क्विज़ कहाँ दें?

“राजस्थान में क्रांतिकारी आंदोलन — सेठी, बारहठ परिवार, खरवा, गोपा — RAS/CET” पढ़ने के बाद इन क्विज़ से तुरंत दोहराएँ — गलत उत्तर वाले बिंदु नोट में दोबारा देखें।

पूरे सिलेबस का अभ्यास: राजस्थान CET 12वीं स्तर 2026 संपूर्ण टेस्ट सीरीज़ (All-in-One Mega Pack) — पहला टेस्ट फ्री आज़माएँ

तैयारी का स्व-मूल्यांकनफ्री डेमो उपलब्ध
राजस्थान CET 12वीं स्तर 2026 संपूर्ण टेस्ट सीरीज़ (All-in-One Mega Pack)
₹79

यह टॉपिक पढ़ लिया? अब असली परीक्षा जैसे मॉक टेस्ट में खुद को परखें

राजस्थान CET 12वीं स्तर 2026 संपूर्ण टेस्ट सीरीज़ (All-in-One Mega Pack)

  • नवीनतम परीक्षा पैटर्न, समय-सीमा और नेगेटिव मार्किंग के साथ
  • रैंक, कमजोर टॉपिक विश्लेषण और हर प्रश्न की हिंदी व्याख्या
  • वेबसाइट एवं एंड्रॉइड ऐप दोनों पर तुरंत एक्सेस
⚡ PhonePe · Google Pay · Paytm UPI द्वारा तुरंत सुरक्षित सक्रियण
आधिकारिक कम्युनिटी

राजस्थान CET 12वीं स्तर 2026 संपूर्ण टेस्ट सीरीज़ (All-in-One Mega Pack) — सुयोग अकादमी WhatsApp ग्रुप

डेली फ्री हस्तलिखित नोट्स, नए मॉक टेस्ट लिंक और टॉपर्स रणनीति सीधे WhatsApp पर प्राप्त करें।

व्हाट्सएप ग्रुप जॉइन करें

महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

अर्जुनलाल सेठी ने 1907 में जयपुर में वर्धमान विद्यालय स्थापित किया। ऊपर से यह शिक्षा-संस्था थी, पर यहाँ युवाओं को राष्ट्रवाद और क्रांतिकारी कार्य का प्रशिक्षण दिया जाता था; मोतीचंद, विष्णुदत्त जैसे युवक इसी से जुड़े थे।

यह केसरी सिंह बारहठ द्वारा डिंगल में रचे 13 सोरठे हैं, जो 1903 में मेवाड़ के महाराणा फतेह सिंह को लॉर्ड कर्ज़न के दिल्ली दरबार में जाने से रोकने के लिए लिखे गए। महाराणा दिल्ली पहुँचे पर दरबार में शामिल नहीं हुए।

निमाज (मारवाड़) के प्यारेलाल साधु हत्याकांड के षड्यंत्र में उन्हें 1914 में 20 वर्ष की सज़ा हुई और बिहार की हज़ारीबाग जेल भेजा गया। लगभग 1919–20 में वे समय से पहले रिहा हुए।

बनारस षड्यंत्र केस में सज़ा के बाद वे बरेली केंद्रीय जेल में रखे गए, जहाँ यातनाओं के कारण मई 1918 में उनकी मृत्यु हुई। सटीक तिथि पर स्रोतों में भेद है; परीक्षा का सुरक्षित उत्तर बरेली जेल, 1918 है।

23 दिसंबर 1912 को दिल्ली के चाँदनी चौक में वायसराय हार्डिंग पर बम फेंका गया। यह योजना रासबिहारी बोस की थी और राजस्थान की इतिहास-पुस्तकें इसमें प्रताप सिंह बारहठ और जोरावर सिंह बारहठ की प्रत्यक्ष भूमिका बताती हैं।

वे केसरी सिंह बारहठ के छोटे भाई और प्रताप सिंह के चाचा थे। हार्डिंग बम कांड में भूमिका के बाद अंग्रेज़ उन्हें कभी गिरफ्तार नहीं कर पाए; वे वेश व नाम बदलकर भूमिगत रहे और 1939 में फरारी की अवस्था में ही उनकी मृत्यु हुई।

रासबिहारी बोस ने 21 फरवरी 1915 को देशभर में एक साथ विद्रोह की योजना बनाई। राजस्थान में इसका दायित्व राव गोपाल सिंह खरवा और भूपसिंह (विजय सिंह पथिक) को था, जिनका लक्ष्य अजमेर व नसीराबाद छावनी पर अधिकार था। भेद खुलने पर दोनों टॉडगढ़ में नज़रबंद हुए।

उनका मूल नाम भूपसिंह था। 1915 की योजना विफल होने पर उन्हें टॉडगढ़ में नज़रबंद किया गया; वहाँ से भागने के बाद पहचान छिपाने के लिए उन्होंने 'विजय सिंह पथिक' नाम रखा और बाद में बिजोलिया किसान आंदोलन का नेतृत्व किया।

सागरमल गोपा जैसलमेर के स्वतंत्रता सेनानी थे जिन्होंने महारावल जवाहर सिंह के निरंकुश शासन के विरुद्ध 'जैसलमेर का गुंडाराज' पुस्तक लिखी। 1941 में गिरफ्तार हुए; 3 अप्रैल 1946 को जेल में उन पर मिट्टी का तेल डालकर आग लगाई गई और 4 अप्रैल 1946 को उनकी मृत्यु हुई। जाँच गोपाल स्वरूप पाठक आयोग ने की।

जोधपुर में मारवाड़ लोक परिषद के कार्यकर्ता बालमुकुंद बिस्सा की जेल में अनशन के बाद 19 जून 1942 को मृत्यु हुई; कोटा में जनता ने कुछ दिनों के लिए नगर प्रशासन पर नियंत्रण कर लिया; मेवाड़ प्रजामंडल ने महाराणा को अल्टीमेटम दिया; और जयपुर में प्रजामंडल से असंतुष्ट कार्यकर्ताओं ने बाबा हरिश्चंद्र के नेतृत्व में आज़ाद मोर्चा बनाया।

क्या आपको यह अध्ययन नोट्स पसंद आए? अपने दोस्तों के साथ अवश्य शेयर करें:

मुफ्त अध्ययन सामग्री और सिलेबस ट्रैकर के लिए विजिट करें: https://suyogacademy.com© 2026 Suyog Academy