राजस्थान में 1857 की क्रांति के प्रमुख केंद्र | पूरी जानकारी , RPSC, RAS, Patwari हेतु उपयोगी।

भूमिका
1857 की क्रांति भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के रूप में जानी जाती है, और राजस्थान (तत्कालीन राजपूताना) इस महान विद्रोह से अछूता नहीं रहा। यद्यपि राजपूताना की अधिकांश देशी रियासतों के शासक अंग्रेजों के प्रति वफादार बने रहे, फिर भी यहाँ की सैनिक छावनियों, स्थानीय जनता, किसानों, भीलों और कुछ सामंतों ने अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध जमकर विद्रोह किया। नसीराबाद, नीमच, आउवा, कोटा, टोंक, एरिनपुरा, देवली जैसे स्थान इस क्रांति के प्रमुख केंद्र बनकर उभरे। यह लेख राजस्थान में 1857 की क्रांति के सभी प्रमुख केंद्रों, उनके नेतृत्वकर्ताओं, घटनाक्रम और परीक्षा-दृष्टि से महत्वपूर्ण तथ्यों का विस्तृत एवं व्यवस्थित अध्ययन प्रस्तुत करता है।
1. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एवं कारण
राजस्थान में 1857 की क्रांति भड़कने के पीछे कई कारण उत्तरदायी थे:
- ब्रिटिश आर्थिक शोषण नीति — भारी लगान, अकाल की स्थिति में राहत का अभाव और बढ़ती गरीबी।
- सामाजिक-धार्मिक हस्तक्षेप — चर्बी वाले कारतूसों के प्रयोग की अफवाह से सैनिकों में असंतोष।
- देशी रियासतों की निर्भरता — राजपूताना की रियासतें ब्रिटिश रेजीडेंसी व्यवस्था के अधीन थीं, जिससे स्थानीय शासकों की स्वायत्तता सीमित हो गई थी।
- सैनिक छावनियों में असंतोष — भारतीय सैनिकों के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार।
राजपूताना में उस समय ब्रिटिश सरकार ने 6 प्रमुख सैनिक छावनियाँ स्थापित कर रखी थीं, जो इस क्रांति के केंद्र बिंदु बनीं।
राजपूताना की 6 सैनिक छावनियाँ
| क्र.सं. | छावनी | स्थान | तैनात सैन्य टुकड़ी |
|---|---|---|---|
| 1 | नसीराबाद | अजमेर | 15वीं बंगाल पैदल सेना (सबसे शक्तिशाली छावनी) |
| 2 | नीमच | (वर्तमान मध्यप्रदेश, तत्कालीन राजपूताना एजेंसी क्षेत्र) | फर्स्ट बंगाल केवेलरी |
| 3 | देवली | टोंक | कोटा कन्टिनजेंट |
| 4 | ब्यावर | अजमेर | मेर रेजीमेंट |
| 5 | एरिनपुरा | पाली/जोधपुर | जोधपुर लीजन |
| 6 | खेरवाड़ा | उदयपुर | मेवाड़ भील कोर |
महत्वपूर्ण तथ्य: इन 6 छावनियों में से खेरवाड़ा और ब्यावर ऐसी छावनियाँ थीं जिन्होंने 1857 के सैन्य विद्रोह में भाग नहीं लिया।
2. नसीराबाद छावनी — राजस्थान में क्रांति की पहली चिंगारी
राजस्थान में 1857 की क्रांति की शुरुआत 28 मई, 1857 को नसीराबाद छावनी (अजमेर) से हुई। यहाँ तैनात भारतीय सैनिकों ने अंग्रेज अधिकारियों के विरुद्ध खुला विद्रोह किया। मेरठ में हुए विद्रोह (10 मई, 1857) की सूचना राजपूताना के एजेंट टू गवर्नर जनरल (AGG) जॉर्ज पैट्रिक लॉरेंस को 19 मई, 1857 को मिली थी। नसीराबाद के विद्रोह के बाद यह आंदोलन तेजी से नीमच, देवली, टोंक, एरिनपुरा, आउवा, भरतपुर और धौलपुर जैसे क्षेत्रों में फैल गया, जिससे राजस्थान अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध प्रतिरोध का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया।
3. नीमच छावनी में विद्रोह
नसीराबाद के बाद नीमच छावनी में भी सैनिकों ने विद्रोह कर दिया। स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि अंग्रेज अधिकारी अपनी जान बचाकर भागने को मजबूर हुए। नीमच से भागे अंग्रेज अधिकारियों एवं उनके परिवारजनों को मेवाड़ के महाराणा स्वरूप सिंह ने शरण दी थी।
बाद में 6 जून, 1857 को कैप्टन शावर्स (Captain Showers) ने कोटा, बूंदी और मेवाड़ की सेनाओं की सहायता से अंग्रेजों को पुनः नीमच पर अधिकार दिलाया। नीमच की विद्रोही सेना शाहपुरा-देवली होते हुए आगरा और फिर दिल्ली की ओर बढ़ी।
निम्बाहेड़ा के देशभक्त पटेल तारा ने वहाँ के हाकिम को भगाने तथा नीमच के संदेशवाहक की हत्या के अपराध में तोप से उड़ा दिया गया — यह इस क्षेत्र के बलिदान का एक मार्मिक उदाहरण है।
4. आउवा (पाली) — मारवाड़ में क्रांति का सबसे प्रमुख केंद्र
आउवा, पाली जिले में स्थित, मारवाड़ (जोधपुर राज्य) में क्रांति का सबसे प्रबल केंद्र माना जाता है। परीक्षा की दृष्टि से यह राजपूताना में अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह का सर्वाधिक प्रसिद्ध केंद्र है।
प्रमुख घटनाक्रम
- 21 अगस्त, 1857 को एरिनपुरा में तैनात जोधपुर लीजन के सैनिकों ने मोती खां, तिलकराम और शीतल प्रसाद के नेतृत्व में विद्रोह कर दिया और "चलो दिल्ली, फिरंगी को मार डालो" के नारे के साथ दिल्ली की ओर कूच किया।
- आउवा के ठाकुर कुशाल सिंह चम्पावत ने इन विद्रोही सैनिकों का नेतृत्व स्वीकार किया, जिससे आउवा विद्रोह का केंद्र बिंदु बन गया।
- आउवा के ठाकुरों की कुलदेवी सुगाली माता (महाकाली) हैं, जिनकी मूर्ति के 10 सिर व 54 हाथ बताए जाते हैं।
- 20 जनवरी, 1858 को ब्रिगेडियर होम्स के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना ने आउवा पर आक्रमण किया।
- विजय की आशा क्षीण होने पर कुशाल सिंह ने सलूंबर (केसरी सिंह के यहाँ) शरण ली, तत्पश्चात उनके छोटे भाई ठाकुर पृथ्वी सिंह ने विद्रोह का नेतृत्व संभाला।
- अंत में अंग्रेजों ने आउवा के किलेदार को रिश्वत देकर किले पर अधिकार कर लिया और वहाँ अमानवीय अत्याचार किए। अंग्रेज सुगाली माता की मूर्ति को अजमेर ले गए।
- अगस्त 1860 में कुशाल सिंह चम्पावत ने नीमच में आत्मसमर्पण किया।
- कुशाल सिंह के विद्रोह की जाँच हेतु मेजर टेलर आयोग का गठन किया गया, किंतु पर्याप्त साक्ष्यों के अभाव में उन्हें रिहा कर दिया गया।
5. कोटा — राजपूताना की सर्वाधिक सुनियोजित एवं सुनियंत्रित क्रांति
यदि राजपूताना में सबसे संगठित और तीव्र विद्रोह की बात करें, तो वह निःसंदेह कोटा में हुआ।
प्रमुख तथ्य
- कोटा में क्रांति का सूत्रपात 15 अक्टूबर, 1857 को लाला जयदयाल एवं मेहराब खां के नेतृत्व में हुआ।
- कोटा की नारायणी पलटन तथा भवानी पलटन ने विद्रोह में सक्रिय भूमिका निभाई। इन सैनिकों ने कोटा के ब्रिटिश पॉलिटिकल एजेंट मेजर बर्टन (Major Burton) की हत्या कर दी और उनका सिर काटकर पूरे कोटा शहर में घुमाया गया — यह घटना राजपूताना की क्रांति की सबसे उग्र घटनाओं में गिनी जाती है।
- 22 मार्च, 1858 को जनरल रॉबर्ट्स के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना ने कोटा शहर को विद्रोहियों से मुक्त कराया।
- लाला जयदयाल और मेहराब खां लगभग डेढ़ वर्ष तक अंग्रेजों को चकमा देते रहे। अंततः दिसंबर 1858 में गुड़गाँव में मेहराब खां पकड़े गए, उन पर देवली में मुकदमा चलाकर मृत्युदंड दिया गया।
परीक्षा नोट: कोटा व आउवा ऐसे स्थान थे जहाँ सैनिक छावनी न होते हुए भी स्थानीय जनता व सामंतों द्वारा जबरदस्त विद्रोह किया गया — यह बिंदु बार-बार पूछा जाता है।
6. टोंक — नवाब बनाम जनता
टोंक के नवाब वजीरुद्दौला अंग्रेज-समर्थक थे, किंतु टोंक की जनता व सेना की सहानुभूति क्रांतिकारियों के साथ थी।
- नीमच से आए विद्रोही सैनिकों को टोंक की जनता ने नवाब के आदेशों की अवहेलना करते हुए खुले हाथों से स्वागत किया।
- सेना का बड़ा हिस्सा विद्रोहियों से जा मिला। इन सैनिकों ने नीमच के सैनिकों के साथ मिलकर नवाब के किले को घेर लिया और अपना बकाया वेतन वसूला।
- नवाब के मामा मीर आलम खां ने विद्रोहियों का साथ दिया।
- 1858 के प्रारंभ में जब तात्या टोपे टोंक पहुँचे, तो टोंक की जनता तथा जागीरदार नासिर मुहम्मद खां ने उनका साथ दिया, जबकि नवाब स्वयं को किले में बंद कर बैठ गए।
7. एरिनपुरा एवं देवली छावनी विद्रोह
- एरिनपुरा (पाली/जोधपुर) में तैनात जोधपुर लीजन के सैनिकों ने 21 अगस्त, 1857 को विद्रोह किया — यह आउवा विद्रोह से सीधा जुड़ा हुआ है।
- देवली (टोंक) में तैनात कोटा कन्टिनजेंट ने भी विद्रोह में भाग लिया। कोटा में लाला जयदयाल व मेहराब खां के सहयोगी यहीं सक्रिय रहे।
8. भरतपुर, धौलपुर एवं बांसवाड़ा में विद्रोह
- धौलपुर में क्रांतिकारियों ने रामचंद्र, देवा गुर्जर और हीरालाल के नेतृत्व में विद्रोह किया। देवा गुर्जर के नेतृत्व में इरादतनगर की तहसील तथा सरकारी खजाने को लूट लिया गया।
- बांसवाड़ा में 11 दिसंबर, 1857 को तात्या टोपे ने अधिकार कर लिया था। महारावल राजधानी छोड़कर भाग गए और राज्य के कई सरदारों ने विद्रोहियों का साथ दिया।
- इसके विपरीत, डूंगरपुर, जैसलमेर, सिरोही और बूंदी के शासकों ने विद्रोह के दौरान अंग्रेजों की सहायता की थी।
9. तुलनात्मक तालिका — प्रमुख केंद्र एक नज़र में
| केंद्र | जिला/क्षेत्र | प्रमुख नेतृत्वकर्ता | प्रमुख घटना |
|---|---|---|---|
| नसीराबाद | अजमेर | स्थानीय सैनिक टुकड़ियाँ | राजस्थान में क्रांति की पहली चिंगारी (28 मई 1857) |
| नीमच | (राजपूताना एजेंसी) | विद्रोही सैनिक | अंग्रेज अधिकारी भागे, मेवाड़ महाराणा ने शरण दी |
| आउवा | पाली (मारवाड़) | ठाकुर कुशाल सिंह चम्पावत | मारवाड़ में क्रांति का सर्वाधिक प्रबल केंद्र |
| कोटा | कोटा | लाला जयदयाल, मेहराब खां | कैप्टन बर्टन की हत्या, सर्वाधिक सुनियोजित विद्रोह |
| टोंक | टोंक | मीर आलम खां | नवाब बनाम जनता, तात्या टोपे को समर्थन |
| एरिनपुरा | पाली/जोधपुर | मोती खां, तिलकराम, शीतल प्रसाद | जोधपुर लीजन का विद्रोह |
| धौलपुर | धौलपुर | देवा गुर्जर, रामचंद्र, हीरालाल | खजाना लूट, तहसील पर कब्जा |
| बांसवाड़ा | बांसवाड़ा | तात्या टोपे | बांसवाड़ा पर अधिकार |
⚠️ Exam Trap Section — परीक्षा में भ्रम पैदा करने वाले बिंदु
- आउवा बनाम कोटा: राजपूताना में अंग्रेजों के विरुद्ध "सबसे प्रमुख केंद्र" आउवा माना जाता है, जबकि "सर्वाधिक सुनियोजित/सुनियंत्रित क्रांति" कोटा में हुई थी — दोनों तथ्यों को छात्र प्रायः आपस में बदल देते हैं।
- खेरवाड़ा व ब्यावर: ये दोनों छावनियाँ ऐसी थीं जिन्होंने विद्रोह में भाग नहीं लिया — इसका उल्टा (कि इन्होंने भाग लिया) प्रश्नों में भ्रामक विकल्प के रूप में आता है।
- कैप्टन बर्टन की हत्या कोटा में हुई थी, न कि आउवा या नसीराबाद में — यह जोड़ी अक्सर गड़बड़ाई जाती है।
- मेवाड़ के महाराणा स्वरूप सिंह ने नीमच से भागे अंग्रेजों को शरण दी थी — यह तथ्य महाराणा को "क्रांतिकारी समर्थक" समझने की भूल पैदा करता है, जबकि वास्तव में मेवाड़ राज्य ने कोटा-बूंदी सेनाओं के साथ मिलकर नीमच पुनः अंग्रेजों को दिलवाने में भी सहायता की थी।
- नीमच का भौगोलिक भ्रम: नीमच वर्तमान में मध्यप्रदेश में स्थित है, परंतु 1857 में यह राजपूताना एजेंसी की महत्वपूर्ण सैन्य छावनी थी, इसलिए यह राजस्थान की क्रांति के अध्ययन में सम्मिलित किया जाता है।
🧠 मेमोरी ट्रिक्स
6 सैनिक छावनियाँ याद रखने हेतु: "न से नसीराबाद, नी से नीमच, दे से देवली, ब्या से ब्यावर, ए से एरिनपुरा, खे से खेरवाड़ा" — "नन्दे ब्याह एक खेत" जैसा वाक्यांश बनाकर याद करें।
जो छावनियाँ विद्रोह में शामिल नहीं हुईं: "ब्यावर-खेरवाड़ा दोनों ने साथ नहीं दिया" — "BK नहीं" के रूप में स्मरण करें (ब्यावर-खेरवाड़ा = No)।
कोटा की हत्या याद रखने हेतु: "कोटा में कटा बर्टन" — तुकांत के आधार पर याद रखें कि कोटा में मेजर बर्टन की हत्या हुई थी।
👨🏫 शिक्षक की परीक्षा-दृष्टि टिप्पणी
RPSC एवं RAS जैसी परीक्षाओं में इस टॉपिक से लगभग हर वर्ष 1-2 प्रश्न अवश्य पूछे जाते हैं। विशेष रूप से आउवा विद्रोह (कुशाल सिंह चम्पावत) और कोटा में कैप्टन बर्टन की हत्या से जुड़े प्रश्न अत्यंत लोकप्रिय हैं। छात्रों को छावनियों के नाम, उनमें तैनात सैन्य टुकड़ियों के नाम, और किस छावनी ने विद्रोह में भाग नहीं लिया — इन तीनों बिंदुओं को टेबल बनाकर रटना चाहिए, क्योंकि यहीं से सबसे अधिक ऑब्जेक्टिव प्रश्न बनते हैं।
📝 PYQ / अभ्यास प्रश्न (15 MCQs उत्तर एवं व्याख्या सहित)
प्रश्न 1. राजस्थान में 1857 की क्रांति की शुरुआत सर्वप्रथम किस स्थान से हुई?
(अ) नीमच (ब) नसीराबाद ✔ (स) आउवा (द) कोटा
व्याख्या: 28 मई 1857 को नसीराबाद छावनी से क्रांति की शुरुआत हुई थी। [RAS Pre]
प्रश्न 2. आउवा के विद्रोह का नेतृत्व किसने किया?
(अ) मेहराब खां (ब) कुशाल सिंह चम्पावत ✔ (स) लाला जयदयाल (द) देवा गुर्जर
व्याख्या: आउवा के ठाकुर कुशाल सिंह चम्पावत ने विद्रोही सैनिकों का नेतृत्व स्वीकार किया। [RPSC]
प्रश्न 3. कोटा में किस ब्रिटिश अधिकारी की हत्या कर दी गई थी?
(अ) कैप्टन शावर्स (ब) मेजर बर्टन ✔ (स) जनरल रॉबर्ट्स (द) कर्नल जैक्सन
व्याख्या: नारायणी व भवानी पलटन ने कोटा में मेजर बर्टन का सिर काटकर शहर में घुमाया था। [Patwari]
प्रश्न 4. निम्न में से कौन-सी छावनी ने 1857 के सैन्य विद्रोह में भाग नहीं लिया?
(अ) नसीराबाद व नीमच (ब) देवली व एरिनपुरा (स) ब्यावर व खेरवाड़ा ✔ (द) आउवा व कोटा
व्याख्या: ब्यावर (मेर रेजीमेंट) व खेरवाड़ा (मेवाड़ भील कोर) छावनियों ने विद्रोह में भाग नहीं लिया। [RSMSSB]
प्रश्न 5. आउवा के ठाकुरों की कुलदेवी कौन हैं? (अ) करणी माता (ब) सुगाली माता ✔ (स) जीण माता (द) आवड़ माता
व्याख्या: सुगाली माता (महाकाली) की मूर्ति के 10 सिर व 54 हाथ हैं, जिसे अंग्रेज अजमेर ले गए थे। [RAS Mains]
प्रश्न 6. एरिनपुरा में तैनात सैन्य टुकड़ी का नाम बताइए।
(अ) मेर रेजीमेंट (ब) मेवाड़ भील कोर (स) जोधपुर लीजन ✔ (द) कोटा कन्टिनजेंट
व्याख्या: एरिनपुरा (पाली) में जोधपुर लीजन तैनात थी, जिसने 21 अगस्त 1857 को विद्रोह किया। [RPSC 1st Grade]
प्रश्न 7. मेवाड़ भील कोर किस छावनी में तैनात थी?
(अ) देवली (ब) ब्यावर (स) खेरवाड़ा ✔ (द) एरिनपुरा
व्याख्या: खेरवाड़ा (उदयपुर) में मेवाड़ भील कोर तैनात थी। [REET]
प्रश्न 8. आउवा विद्रोह की जाँच हेतु किस आयोग का गठन किया गया?
(अ) हंटर आयोग (ब) टेलर आयोग ✔ (स) साइमन आयोग (द) क्रिप्स आयोग
व्याख्या: कुशाल सिंह के विद्रोह की जाँच हेतु मेजर टेलर आयोग बनाया गया था। [RAS Pre]
प्रश्न 9. नीमच से भागे अंग्रेज अधिकारियों को किस शासक ने शरण दी थी?
(अ) कोटा महाराव रामसिंह (ब) मेवाड़ के महाराणा स्वरूप सिंह ✔ (स) जोधपुर के महाराजा (द) जयपुर के महाराजा
व्याख्या: मेवाड़ के महाराणा स्वरूप सिंह ने नीमच से भागे अंग्रेज अधिकारियों व उनके परिवारों को शरण दी थी। [RSMSSB Patwari]
प्रश्न 10. कोटा शहर को विद्रोहियों से किसने मुक्त कराया?
(अ) कैप्टन शावर्स (ब) जनरल रॉबर्ट्स ✔ (स) ब्रिगेडियर होम्स (द) कर्नल जैक्सन
व्याख्या: 22 मार्च 1858 को जनरल रॉबर्ट्स के नेतृत्व में सेना ने कोटा को मुक्त कराया। [RAS Mains]
प्रश्न 11. आउवा पर अंग्रेजी सेना ने कब आक्रमण किया था?
(अ) 20 जनवरी 1858 ✔ (ब) 15 अक्टूबर 1857 (स) 22 मार्च 1858 (द) 6 जून 1857
व्याख्या: ब्रिगेडियर होम्स के नेतृत्व में सेना ने 20 जनवरी 1858 को आउवा पर आक्रमण किया। [RPSC]
प्रश्न 12. धौलपुर में विद्रोह का नेतृत्व किसने किया?
(अ) मीर आलम खां (ब) देवा गुर्जर ✔ (स) लाला जयदयाल (द) कुशाल सिंह
व्याख्या: धौलपुर में देवा गुर्जर, रामचंद्र व हीरालाल के नेतृत्व में विद्रोह हुआ था। [RAS Pre]
प्रश्न 13. तात्या टोपे ने किस स्थान पर अधिकार किया था?
(अ) कोटा (ब) आउवा (स) बांसवाड़ा ✔ (द) टोंक
व्याख्या: 11 दिसंबर 1857 को तात्या टोपे ने बांसवाड़ा पर अधिकार कर लिया था। [RAS Mains]
प्रश्न 14. राजपूताना में सबसे शक्तिशाली सैनिक छावनी कौन-सी थी?
(अ) नीमच (ब) नसीराबाद ✔ (स) देवली (द) एरिनपुरा
व्याख्या: नसीराबाद छावनी राजपूताना की सबसे शक्तिशाली सैनिक छावनी मानी जाती थी। [RSMSSB]
प्रश्न 15. मेहराब खां को कब गिरफ्तार किया गया?
(अ) जून 1857 (ब) दिसंबर 1858 ✔ (स) जनवरी 1858 (द) मार्च 1858
व्याख्या: लगभग डेढ़ वर्ष अंग्रेजों को चकमा देने के बाद दिसंबर 1858 में गुड़गाँव में मेहराब खां पकड़े गए थे। [RAS Mains]
✍️ लेखकीय प्रामाणिकता (E-E-A-T Statement)
यह लेख Suyog Academy द्वारा राजस्थान की प्रतियोगी परीक्षाओं (RPSC, RAS, RSMSSB, Patwari, Gram Sevak, REET, SI आदि) के पाठ्यक्रम को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है। लेखन में RPSC के आधिकारिक पाठ्यक्रम एवं राजस्थान राज्य पाठ्यपुस्तक मंडल की सामग्री को आधार बनाया गया है। हमारी संपादकीय नीति, अनुभव एवं विशेषज्ञता के बारे में अधिक जानने हेतु कृपया हमारा About Us पेज देखें। तथ्यों की सटीकता हेतु प्रकाशन से पूर्व आधिकारिक स्रोतों से क्रॉस-चेक करने की सलाह दी जाती है।
महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)
आउवा (पाली) को मारवाड़ क्षेत्र में क्रांति का सबसे प्रमुख व प्रबल केंद्र माना जाता है, जबकि कोटा में सबसे सुनियोजित विद्रोह हुआ था।
राजपूताना में उस समय 6 प्रमुख सैनिक छावनियाँ थीं — नसीराबाद, नीमच, देवली, ब्यावर, एरिनपुरा और खेरवाड़ा।
कोटा की नारायणी व भवानी पलटन के सैनिकों ने लाला जयदयाल व मेहराब खां के समर्थन में मेजर बर्टन की हत्या की थी।
आउवा के ठाकुर कुशाल सिंह चम्पावत ने आउवा विद्रोह का नेतृत्व किया, बाद में उनके भाई ठाकुर पृथ्वी सिंह ने भी नेतृत्व संभाला।
ब्यावर (मेर रेजीमेंट) और खेरवाड़ा (मेवाड़ भील कोर) — इन दो छावनियों ने विद्रोह में भाग नहीं लिया।
नसीराबाद छावनी में 28 मई, 1857 को विद्रोह भड़का, जो राजस्थान में क्रांति की पहली चिंगारी मानी जाती है।
तात्या टोपे ने दिसंबर 1857 में बांसवाड़ा पर अधिकार किया और बाद में टोंक पहुँचकर स्थानीय जागीरदार व जनता का समर्थन प्राप्त किया।
मेजर टेलर आयोग का गठन किया गया था, जिसने साक्ष्यों के अभाव में कुशाल सिंह चम्पावत को रिहा कर दिया।
डूंगरपुर, जैसलमेर, सिरोही और बूंदी के शासकों ने विद्रोह के दौरान अंग्रेजों की सहायता की थी।
एरिनपुरा में जोधपुर लीजन के सैनिकों ने 21 अगस्त 1857 को मोती खां, तिलकराम व शीतल प्रसाद के नेतृत्व में विद्रोह किया था।