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राजस्थान इतिहास

मेवाड़ प्रजामंडल आंदोलन: स्थापना, नेता, सत्याग्रह, घटनाक्रम एवं परिणाम

Sudhir Sir (इतिहास विशेषज्ञ)
14 सितंबर 2026
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मेवाड़ प्रजामंडल आंदोलन: स्थापना, नेता, सत्याग्रह, घटनाक्रम एवं परिणाम

सुयोग AI गुरु

नोट्स के मुख्य बिंदु, मॉक MCQ या डाउट पूछें

मेवाड़ प्रजामंडल आंदोलन राजस्थान के रियासती काल के सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक आंदोलनों में से एक था। इसकी औपचारिक स्थापना 24 अप्रैल 1938 को उदयपुर में हुई। इसके गठन में माणिक्यलाल वर्मा की प्रमुख भूमिका थी, जबकि बलवंत सिंह मेहता को अध्यक्ष बनाया गया। आंदोलन का उद्देश्य केवल किसी एक कर या प्रशासनिक समस्या का विरोध करना नहीं था, बल्कि मेवाड़ की जनता के लिए उत्तरदायी शासन, नागरिक अधिकार, राजनीतिक भागीदारी और शोषणकारी प्रथाओं में सुधार की मांग को संगठित रूप देना था।

Quick Answer

मेवाड़ प्रजामंडल की स्थापना कब हुई? 24 अप्रैल 1938 को।

स्थापना का प्रमुख श्रेय किसे दिया जाता है? माणिक्यलाल वर्मा को।

प्रथम अध्यक्ष कौन थे? बलवंत सिंह मेहता।

उपाध्यक्ष कौन थे? भूरेलाल बया।

मेवाड़ प्रजामंडल के प्रमुख नेता कौन थे? माणिक्यलाल वर्मा, बलवंत सिंह मेहता, भूरेलाल बया, रमेशचंद्र व्यास सहित अनेक कार्यकर्ता।

1938 के सत्याग्रह के प्रथम सत्याग्रही कौन माने जाते हैं? रमेशचंद्र व्यास।

प्रथम अधिवेशन कब हुआ? 25–26 नवंबर 1941 को उदयपुर में।

प्रथम अधिवेशन की अध्यक्षता किसने की? माणिक्यलाल वर्मा ने।

प्रमुख मांग क्या थी? मेवाड़ में उत्तरदायी शासन और जनता की राजनीतिक भागीदारी।

विषय-सूची

मेवाड़ प्रजामंडल आंदोलन की पृष्ठभूमि

मेवाड़ प्रजामंडल आंदोलन को समझने के लिए केवल 1938 की घटना को देखना पर्याप्त नहीं है। इसके पीछे मेवाड़ में कई दशकों से विकसित हो रही सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक चेतना थी। किसानों, आम जनता और सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच यह भावना मजबूत हो रही थी कि रियासत के प्रशासन में जनता की आवाज को स्थान मिलना चाहिए। इसी वातावरण ने आगे चलकर संगठित राजनीतिक संस्था के निर्माण की जमीन तैयार की।

मेवाड़ क्षेत्र में किसानों के प्रश्नों को लेकर पहले से ही संघर्ष चल रहे थे। बिजोलिया किसान आंदोलन ने मेवाड़ की ग्रामीण जनता के बीच संगठन और अधिकारों की चेतना को मजबूत किया। इसी प्रकार बेगूं किसान आंदोलन ने लगान, लाग-बाग और प्रशासनिक दबाव जैसे मुद्दों को सामने रखा।

इन किसान आंदोलनों और सामाजिक जागृति ने यह स्पष्ट किया कि मेवाड़ में जनसमस्याएं केवल आर्थिक नहीं थीं। जनता प्रशासन में प्रतिनिधित्व, न्यायपूर्ण व्यवस्था और अधिकारों की मांग भी करने लगी थी। इसलिए 1930 के दशक के उत्तरार्ध तक मेवाड़ में राजनीतिक संगठन की आवश्यकता अधिक स्पष्ट हो चुकी थी।

इसी व्यापक राजनीतिक वातावरण में माणिक्यलाल वर्मा जैसे कार्यकर्ता सामने आए। वर्मा पहले से ही किसान प्रश्नों और जनसंगठन से जुड़े हुए थे। उनके अनुभव ने उन्हें यह समझने में मदद की कि अलग-अलग स्थानीय समस्याओं को एक व्यापक राजनीतिक मंच से जोड़ना आवश्यक है।

1938 में भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के प्रभाव और देशी रियासतों में बढ़ती राजनीतिक जागृति के बीच मेवाड़ में प्रजामंडल की स्थापना हुई। यह आंदोलन रियासत के भीतर जनता के अधिकारों और उत्तरदायी शासन की मांग को संगठित रूप देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम था।

राजस्थान के व्यापक इतिहास को समझने के लिए Suyog Academy का राजस्थान इतिहास नोट्स संग्रह भी उपयोगी है, जहां मेवाड़, किसान आंदोलन, जनजातीय आंदोलन और प्रजामंडल से जुड़े विषय अलग-अलग अध्ययन किए जा सकते हैं।

प्रजामंडल का अर्थ और उद्देश्य

‘प्रजामंडल’ शब्द का सामान्य अर्थ ऐसी राजनीतिक संस्था से है जो किसी देशी रियासत में जनता के अधिकारों और राजनीतिक भागीदारी के लिए कार्य करे। ब्रिटिश भारत में राष्ट्रीय आंदोलन के समानांतर देशी रियासतों में भी राजनीतिक जागृति बढ़ रही थी। रियासतों के नागरिक चाहते थे कि शासन केवल शासक और उसके अधिकारियों तक सीमित न रहे, बल्कि जनता की समस्याओं और प्रतिनिधित्व को भी महत्व मिले।

मेवाड़ प्रजामंडल का आंदोलन इसी राजनीतिक चेतना का हिस्सा था। इसका लक्ष्य तत्कालीन मेवाड़ में जनता की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाना और उत्तरदायी शासन की दिशा में परिवर्तन लाना था। आंदोलन के दौरान प्रशासनिक दमन, बेगार और जनता से संबंधित अन्य समस्याएं भी उठाई गईं।

मेवाड़ प्रजामंडल के प्रमुख उद्देश्य

  • मेवाड़ में उत्तरदायी शासन की स्थापना।

  • जनता को शासन व्यवस्था में प्रतिनिधित्व दिलाना।

  • नागरिक अधिकारों और राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए संघर्ष।

  • बेगार जैसी शोषणकारी प्रथाओं का विरोध।

  • किसानों और सामान्य जनता की समस्याओं को राजनीतिक मंच देना।

  • जनता में राजनीतिक एवं सामाजिक जागृति पैदा करना।

  • दमनकारी प्रशासनिक नीतियों का शांतिपूर्ण विरोध।

  • रियासत और जनता के बीच अधिक उत्तरदायी प्रशासन की मांग।

इसलिए मेवाड़ प्रजामंडल को केवल एक राजनीतिक संगठन के रूप में देखना अधूरा होगा। यह किसान, सामाजिक और राजनीतिक चेतना के बीच विकसित हुआ एक ऐसा मंच था जिसने आगे चलकर उत्तरदायी शासन की मांग को मजबूत किया।

मेवाड़ प्रजामंडल की स्थापना 1938

मेवाड़ प्रजामंडल की स्थापना 24 अप्रैल 1938 को उदयपुर में हुई। इसकी स्थापना का प्रमुख श्रेय माणिक्यलाल वर्मा को दिया जाता है। संगठन के गठन में बलवंत सिंह मेहता और अन्य कार्यकर्ताओं का भी महत्वपूर्ण सहयोग रहा।

स्थापना के समय बलवंत सिंह मेहता को अध्यक्ष, भूरेलाल बया को उपाध्यक्ष और माणिक्यलाल वर्मा को महामंत्री बनाया गया। इस पद-विन्यास से स्पष्ट है कि वर्मा आंदोलन के संगठनात्मक संचालन में केंद्रीय भूमिका में थे, जबकि बलवंत सिंह मेहता संस्था के अध्यक्ष थे।

तथ्य

जानकारी

संगठन

मेवाड़ प्रजामंडल

स्थापना

24 अप्रैल 1938

स्थान

उदयपुर, मेवाड़

प्रमुख संस्थापक व्यक्तित्व

माणिक्यलाल वर्मा

प्रथम अध्यक्ष

बलवंत सिंह मेहता

उपाध्यक्ष

भूरेलाल बया

महामंत्री

माणिक्यलाल वर्मा

Exam Trap: परीक्षा में कई बार पूछा जाता है कि मेवाड़ प्रजामंडल की स्थापना का श्रेय किसे दिया जाता है और प्रथम अध्यक्ष कौन थे। दोनों के उत्तर अलग हैं। स्थापना का प्रमुख श्रेय माणिक्यलाल वर्मा को और प्रथम अध्यक्ष बलवंत सिंह मेहता थे।

राजस्थान CET के आधिकारिक प्रश्नपत्र से जुड़े उपलब्ध प्रश्न-स्रोत में भी 1938 में मेवाड़ प्रजामंडल की स्थापना के समय अध्यक्ष के रूप में बलवंत सिंह मेहता का उत्तर दिया गया है।

मेवाड़ प्रजामंडल के प्रमुख नेता और कार्यकर्ता

1. माणिक्यलाल वर्मा

माणिक्यलाल वर्मा मेवाड़ प्रजामंडल आंदोलन के सबसे प्रमुख नेताओं में थे। उनका राजनीतिक जीवन किसान और जनआंदोलनों से जुड़ा हुआ था। बिजोलिया आंदोलन के अनुभव ने उन्हें ग्रामीण समस्याओं और जनता के संगठन की वास्तविक परिस्थितियों से परिचित कराया। इसी अनुभव के आधार पर उन्होंने मेवाड़ में व्यापक राजनीतिक संगठन बनाने की दिशा में काम किया।

1938 में प्रजामंडल की स्थापना के बाद राज्य सरकार के दमन के कारण उन्हें मेवाड़ से बाहर जाना पड़ा। उन्होंने अजमेर से संगठन की गतिविधियों को जारी रखा। इस अवधि में मेवाड़ की प्रशासनिक स्थिति पर आलोचनात्मक सामग्री भी प्रकाशित की गई।

वर्मा की भूमिका केवल संगठन बनाने तक सीमित नहीं रही। 1938 के सत्याग्रह, 1941 के प्रथम अधिवेशन और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान भी वे प्रमुख नेतृत्वकारी भूमिका में रहे।

2. बलवंत सिंह मेहता

बलवंत सिंह मेहता मेवाड़ प्रजामंडल के प्रथम अध्यक्ष थे। संगठन की स्थापना में उनका महत्वपूर्ण सहयोग था। परीक्षा की दृष्टि से माणिक्यलाल वर्मा और बलवंत सिंह मेहता के बीच भूमिका को अलग-अलग याद रखना चाहिए।

3. भूरेलाल बया

भूरेलाल बया को संगठन में उपाध्यक्ष बनाया गया था। आंदोलन के दमन के दौरान उन्हें भी राज्य सरकार की कार्रवाई का सामना करना पड़ा। सराड़ा किले में नजरबंदी का उल्लेख मेवाड़ प्रजामंडल के दमनात्मक इतिहास में विशेष रूप से किया जाता है।

4. रमेशचंद्र व्यास

1938 के सत्याग्रह में रमेशचंद्र व्यास को प्रथम सत्याग्रही के रूप में याद किया जाता है। यह तथ्य RPSC, CET और अन्य राजस्थान GK परीक्षाओं के लिए महत्वपूर्ण है।

आंदोलन में इन नेताओं के अतिरिक्त कई स्थानीय कार्यकर्ताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों ने योगदान दिया। इसलिए मेवाड़ प्रजामंडल को केवल एक व्यक्ति का आंदोलन मानना सही नहीं होगा।

राज्य सरकार का विरोध और प्रजामंडल पर प्रतिबंध

मेवाड़ की तत्कालीन रियासती सरकार ने प्रजामंडल की गतिविधियों को अपने लिए राजनीतिक चुनौती के रूप में देखा। संगठन के गठन और तेजी से बढ़ती जनसक्रियता के बाद राज्य सरकार ने इसे गैर-कानूनी घोषित किया और प्रमुख नेताओं पर कार्रवाई शुरू की। उपलब्ध स्रोतों में प्रतिबंध की सटीक तिथि को लेकर अलग-अलग विवरण मिलते हैं, इसलिए परीक्षा के लिए सबसे सुरक्षित तथ्य यह है कि 1938 में स्थापना के तुरंत बाद मेवाड़ प्रजामंडल पर प्रतिबंध लगाया गया और माणिक्यलाल वर्मा को मेवाड़ से निष्कासित किया गया।

राज्य की कार्रवाई के कारण संगठन के लिए खुले तौर पर काम करना कठिन हो गया। माणिक्यलाल वर्मा ने मेवाड़ से बाहर रहकर गतिविधियां जारी रखीं। अजमेर संगठन के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया।

इस समय आंदोलन का स्वरूप अधिक संघर्षपूर्ण हो गया। संगठन ने प्रतिबंध हटाने, नेताओं को वापस आने देने और जनता को राजनीतिक गतिविधियों की स्वतंत्रता देने की मांग की।

प्रजामंडल के कार्यकर्ताओं पर दमन के बावजूद संगठन समाप्त नहीं हुआ। इसके विपरीत, दमन ने आंदोलन को अधिक व्यापक राजनीतिक मुद्दे में बदलने में भूमिका निभाई।

1938 का मेवाड़ प्रजामंडल सत्याग्रह

प्रजामंडल पर प्रतिबंध के बाद आंदोलनकारियों ने सत्याग्रह का रास्ता अपनाया। 4 अक्टूबर 1938, विजयादशमी के दिन सत्याग्रह शुरू करने का उल्लेख प्रमुख ऐतिहासिक स्रोतों में मिलता है। रमेशचंद्र व्यास को इस सत्याग्रह का प्रथम सत्याग्रही माना जाता है।

सत्याग्रह की मुख्य मांगों में प्रजामंडल को वैध राजनीतिक संस्था के रूप में मान्यता देना और माणिक्यलाल वर्मा को मेवाड़ वापस आने की अनुमति देना शामिल था। आंदोलन का तरीका मुख्यतः अहिंसक राजनीतिक प्रतिरोध पर आधारित था।

राज्य सरकार ने सत्याग्रहियों पर कार्रवाई की। अनेक कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया और कई लोगों को मेवाड़ से बाहर कर दिया गया। माणिक्यलाल वर्मा को भी राज्य में प्रवेश के बाद गिरफ्तार किया गया और उनके साथ कठोर व्यवहार किया गया। इस घटना की गांधीजी ने अपने पत्र हरिजन में आलोचना की थी।

आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी भी सामने आई। वर्मा परिवार की महिलाओं और अन्य महिला कार्यकर्ताओं ने आंदोलन में भाग लिया और उन्हें भी सरकारी दमन का सामना करना पड़ा। यह तथ्य बताता है कि मेवाड़ प्रजामंडल धीरे-धीरे परिवारों और सामाजिक समूहों तक पहुंच चुका था।

सत्याग्रह का महत्व

1938 का सत्याग्रह महत्वपूर्ण इसलिए था क्योंकि इससे प्रजामंडल की मांगें केवल संगठन के अंदर सीमित नहीं रहीं। जनता के राजनीतिक अधिकार और उत्तरदायी शासन का प्रश्न सार्वजनिक बहस का हिस्सा बना।

बाद के वर्षों में आंदोलन को वैधानिक राजनीतिक गतिविधि का अवसर मिला और 1941 में इसका पहला बड़ा अधिवेशन आयोजित किया गया। इस प्रकार 1938 का संघर्ष 1941 की राजनीतिक सक्रियता के लिए महत्वपूर्ण आधार बना।

माणिक्यलाल वर्मा की भूमिका

मेवाड़ प्रजामंडल के इतिहास में माणिक्यलाल वर्मा का स्थान केंद्रीय है। उन्हें केवल प्रजामंडल के संस्थापक व्यक्तित्व के रूप में याद करना पर्याप्त नहीं है। उनके राजनीतिक कार्य की जड़ें मेवाड़ के किसान आंदोलनों में थीं।

बिजोलिया आंदोलन के अनुभव से वर्मा ने समझा कि यदि किसानों और आम जनता की समस्याओं को केवल स्थानीय स्तर पर उठाया जाए तो राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था पर सीमित प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए व्यापक राजनीतिक संगठन आवश्यक था।

1938 में प्रजामंडल की स्थापना के बाद जब राज्य सरकार ने संगठन को गैर-कानूनी घोषित किया और उन्हें मेवाड़ से निष्कासित किया, तब उन्होंने अजमेर से गतिविधियां जारी रखीं। यह संगठनात्मक दृढ़ता आंदोलन के लिए महत्वपूर्ण थी।

वर्मा ने मेवाड़ के शासन और जनता की समस्याओं को व्यापक राजनीतिक चर्चा में लाने का प्रयास किया। बाद में वे प्रजामंडल के प्रथम अधिवेशन के अध्यक्ष बने और उत्तरदायी शासन की मांग को अधिक स्पष्ट रूप से सामने रखा।

1942 में उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन की राजनीतिक पृष्ठभूमि में मेवाड़ की रियासती सरकार से ब्रिटिश सरकार के साथ संबंध समाप्त करने और उत्तरदायी शासन की दिशा में आगे बढ़ने की मांग की। इस कारण मेवाड़ में आंदोलन और दमन का एक नया चरण शुरू हुआ।

मेवाड़ प्रजामंडल आंदोलन में महिलाओं की भूमिका

मेवाड़ प्रजामंडल आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी राजस्थान के रियासती आंदोलनों के सामाजिक इतिहास का महत्वपूर्ण पक्ष है। आंदोलन के दमन के दौरान माणिक्यलाल वर्मा के परिवार की महिलाओं सहित अन्य महिलाओं ने भी राजनीतिक गतिविधियों में भाग लिया।

नारायणी देवी वर्मा और अन्य महिला कार्यकर्ताओं की भागीदारी से स्पष्ट होता है कि यह आंदोलन केवल पुरुष राजनीतिक कार्यकर्ताओं तक सीमित नहीं रहा था। जब सरकार ने राजनीतिक गतिविधियों को दबाने का प्रयास किया, तब महिलाओं ने भी गिरफ्तारियों और निष्कासन जैसी कार्रवाइयों का सामना किया।

यह भागीदारी राजस्थान के स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं की बढ़ती राजनीतिक चेतना को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। आंदोलन के साथ सामाजिक सुधार, शिक्षा, सेवा और जनजागृति के मुद्दे भी जुड़े।

मेवाड़ प्रजामंडल के सामाजिक और जनसेवा संबंधी कार्य

प्रजामंडल की गतिविधियां केवल राजनीतिक मांगों तक सीमित नहीं थीं। संगठन से जुड़े कार्यकर्ताओं ने सामाजिक सुधार और जनसेवा के कार्यों पर भी ध्यान दिया। इससे संगठन की जनता के बीच स्वीकार्यता बढ़ी।

बेगार और शोषणकारी प्रथाओं का विरोध

मेवाड़ में बेगार जैसी प्रथाएं आम जनता के लिए गंभीर समस्या थीं। प्रजामंडल ने इन्हें राजनीतिक प्रश्न बनाया। बेगार के विरोध ने आंदोलन को किसानों और ग्रामीण जनता से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इस संदर्भ में किसान आंदोलनों और प्रजामंडल आंदोलन को अलग-अलग अध्यायों के रूप में पढ़ने के बजाय एक क्रम में समझना अधिक उपयोगी है। राजस्थान के किसान आंदोलनों की Timeline में बिजोलिया से लेकर अन्य किसान संघर्षों तक का क्रम दिया गया है।

हरिजन सेवा

मेवाड़ प्रजामंडल के प्रथम अधिवेशन के दौरान सामाजिक सेवा के प्रश्नों पर भी ध्यान दिया गया। उपलब्ध विवरणों के अनुसार हरिजन सेवा के लिए मेवाड़ हरिजन सेवक संघ की स्थापना से संबंधित गतिविधियां हुईं। बाद में इसके कार्य से जुड़े दायित्वों में मोहनलाल सुखाड़िया सहित अन्य कार्यकर्ताओं की भूमिका सामने आई।

आदिवासी समाज से जुड़ाव

मेवाड़ क्षेत्र में भील और अन्य आदिवासी समुदायों की बड़ी आबादी थी। इसलिए राजनीतिक जागृति को सामाजिक सेवा से जोड़ना आंदोलन के लिए स्वाभाविक था। बलवंत सिंह मेहता को भील-मीणा और आदिवासी सेवा से संबंधित कार्यों से जोड़े जाने का उल्लेख मिलता है।

राजस्थान के जनजातीय आंदोलनों को समझने के लिए राजस्थान के जनजातीय आंदोलन: संपूर्ण इतिहास भी पढ़ें। इससे मेवाड़ की राजनीतिक जागृति और जनजातीय समाज के आंदोलनों के बीच संबंध समझने में मदद मिलती है।

1941 का प्रथम अधिवेशन: आंदोलन का नया चरण

मेवाड़ प्रजामंडल के इतिहास में 25–26 नवंबर 1941 महत्वपूर्ण तारीख है। इन दिनों उदयपुर में प्रजामंडल का प्रथम अधिवेशन आयोजित हुआ। इसकी अध्यक्षता माणिक्यलाल वर्मा ने की। अधिवेशन में राष्ट्रीय आंदोलन के प्रमुख नेताओं की उपस्थिति ने मेवाड़ प्रजामंडल को व्यापक राजनीतिक संदर्भ प्रदान किया।

अधिवेशन से जुड़े विवरणों में आचार्य जे.बी. कृपलानी और विजयलक्ष्मी पंडित की भागीदारी का उल्लेख मिलता है। विजयलक्ष्मी पंडित ने खादी प्रदर्शनी का उद्घाटन किया।

इस अधिवेशन में सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक मुद्दा था मेवाड़ में उत्तरदायी शासन की स्थापना। प्रजामंडल का उद्देश्य अब केवल प्रतिबंध हटवाने तक सीमित नहीं था। संगठन जनता की प्रतिनिधि भागीदारी वाले शासन की दिशा में स्पष्ट राजनीतिक मांग रख रहा था।

प्रथम अधिवेशन

तथ्य

तिथि

25–26 नवंबर 1941

स्थान

उदयपुर

अध्यक्ष

माणिक्यलाल वर्मा

प्रमुख राष्ट्रीय नेता

जे.बी. कृपलानी, विजयलक्ष्मी पंडित

मुख्य राजनीतिक मुद्दा

उत्तरदायी शासन

Exam Fact: मेवाड़ प्रजामंडल की स्थापना के समय अध्यक्ष बलवंत सिंह मेहता थे, जबकि 1941 के प्रथम अधिवेशन की अध्यक्षता माणिक्यलाल वर्मा ने की। यही अंतर परीक्षा में बार-बार भ्रम पैदा करता है।

भारत छोड़ो आंदोलन और मेवाड़ प्रजामंडल

1942 में भारत छोड़ो आंदोलन शुरू होने के बाद मेवाड़ प्रजामंडल की गतिविधियों ने नया राजनीतिक रूप लिया। 8 अगस्त 1942 को बंबई में कांग्रेस के ऐतिहासिक अधिवेशन में भारत छोड़ो आंदोलन का प्रस्ताव पारित हुआ। माणिक्यलाल वर्मा भी इस राजनीतिक प्रक्रिया से जुड़े हुए थे।

मेवाड़ लौटने के बाद प्रजामंडल ने रियासती शासन पर राजनीतिक दबाव बढ़ाया। 20 अगस्त 1942 को माणिक्यलाल वर्मा की ओर से महाराणा से ब्रिटिश सरकार के साथ संबंध समाप्त करने और उत्तरदायी शासन की दिशा में आगे बढ़ने की मांग की गई। इसके बाद सरकार ने आंदोलनकारियों पर कार्रवाई तेज कर दी।

21 अगस्त 1942 को माणिक्यलाल वर्मा की गिरफ्तारी का उल्लेख मिलता है। इसके बाद उदयपुर में हड़ताल और आंदोलन की गतिविधियां तेज हुईं। आंदोलन का प्रभाव उदयपुर के साथ-साथ नाथद्वारा, चित्तौड़ और भीलवाड़ा जैसे क्षेत्रों में भी दिखाई दिया।

मेवाड़ सरकार ने आंदोलन को नियंत्रित करने के लिए प्रजामंडल की गतिविधियों पर फिर प्रतिबंध लगाया और बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया। इस दौर में छात्रों और सामान्य जनता की भागीदारी भी बढ़ी।

इस चरण से यह स्पष्ट होता है कि मेवाड़ प्रजामंडल आंदोलन अब केवल रियासत के भीतर सुधार की मांग नहीं कर रहा था। यह भारत के व्यापक स्वतंत्रता आंदोलन से भी जुड़ चुका था।

1942 के आंदोलन के प्रमुख केंद्र

  • उदयपुर

  • नाथद्वारा

  • चित्तौड़

  • भीलवाड़ा

इसलिए परीक्षा में यदि प्रश्न पूछा जाए कि 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान मेवाड़ प्रजामंडल की गतिविधियां किन क्षेत्रों में दिखाई दीं, तो उदयपुर के साथ नाथद्वारा, चित्तौड़ और भीलवाड़ा को याद रखना उपयोगी है।

उत्तरदायी शासन की मांग क्यों महत्वपूर्ण थी?

रियासती राजस्थान में उस समय शासन की प्रकृति ब्रिटिश भारत के प्रांतों से अलग थी। देशी रियासतों में शासक की सत्ता बहुत महत्वपूर्ण थी और जनता की राजनीतिक भागीदारी सीमित थी। इसलिए प्रजामंडल आंदोलनों का एक प्रमुख लक्ष्य था कि शासन को जनता के प्रति अधिक उत्तरदायी बनाया जाए।

मेवाड़ प्रजामंडल ने भी इसी दिशा में राजनीतिक मांग उठाई। उत्तरदायी शासन का अर्थ था कि प्रशासनिक व्यवस्था में जनता के प्रतिनिधियों की भूमिका बढ़े, निर्णय प्रक्रिया अधिक जवाबदेह हो और शासन जनता की समस्याओं को सुनने के लिए बाध्य हो।

यह मांग धीरे-धीरे राजस्थान की रियासतों के राजनीतिक आंदोलनों की मुख्य मांग बन गई। इसी राजनीतिक प्रक्रिया ने आगे चलकर राजस्थान के एकीकरण और लोकतांत्रिक शासन की स्थापना के वातावरण को मजबूत किया।

राजस्थान के एकीकरण की बाद की प्रक्रिया समझने के लिए राजस्थान का एकीकरण: 7 चरणों की पूरी कहानी भी पढ़ें।

मेवाड़ प्रजामंडल आंदोलन Timeline

वर्ष / तिथि

घटना

महत्व

24 अप्रैल 1938

मेवाड़ प्रजामंडल की स्थापना

संगठित राजनीतिक आंदोलन की शुरुआत

1938

प्रजामंडल पर राज्य सरकार की कार्रवाई

नेताओं पर प्रतिबंध, निष्कासन और दमन

4 अक्टूबर 1938

सत्याग्रह का प्रारंभ

प्रजामंडल की वैधता और राजनीतिक अधिकारों की मांग

1938–39

सत्याग्रह और गिरफ्तारियां

आंदोलन का विस्तार और सरकारी दमन

1939

माणिक्यलाल वर्मा के साथ कठोर सरकारी कार्रवाई

आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान मिला

22 फरवरी 1941

प्रजामंडल से प्रतिबंध हटाने की प्रक्रिया

संगठन की खुली राजनीतिक गतिविधियों का रास्ता खुला

25–26 नवंबर 1941

प्रथम अधिवेशन

उत्तरदायी शासन की मांग को स्पष्ट राजनीतिक रूप मिला

8 अगस्त 1942

भारत छोड़ो आंदोलन की राष्ट्रीय पृष्ठभूमि

मेवाड़ आंदोलन का राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ाव

20 अगस्त 1942

महाराणा से ब्रिटिश संबंध समाप्त करने की मांग

रियासती शासन पर राजनीतिक दबाव

21 अगस्त 1942

माणिक्यलाल वर्मा की गिरफ्तारी

सरकारी दमन का नया चरण

1942

उदयपुर सहित विभिन्न क्षेत्रों में आंदोलन

जनभागीदारी का विस्तार

Timeline Trick: 1938 = स्थापना और सत्याग्रह → 1941 = प्रथम अधिवेशन → 1942 = भारत छोड़ो आंदोलन से जुड़ाव।

मेवाड़ प्रजामंडल आंदोलन का ऐतिहासिक महत्व

1. मेवाड़ में राजनीतिक संगठन को मजबूती

प्रजामंडल ने स्थानीय समस्याओं को संगठित राजनीतिक मांगों में बदलने का काम किया। इससे जनता को यह अनुभव हुआ कि सामूहिक संगठन के माध्यम से प्रशासन पर दबाव बनाया जा सकता है।

2. उत्तरदायी शासन की मांग

आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक योगदान उत्तरदायी शासन की मांग को स्पष्ट रूप से सामने लाना था। यह मांग आगे चलकर राजस्थान की रियासतों में लोकतांत्रिक राजनीतिक परिवर्तन की आधारभूमि बनी।

3. किसान और राजनीतिक आंदोलनों के बीच संबंध

मेवाड़ के किसान आंदोलनों ने जनता में संगठन की चेतना विकसित की थी। प्रजामंडल ने उस चेतना को व्यापक राजनीतिक अधिकारों से जोड़ा। इस कारण बिजोलिया और बेगूं जैसे किसान आंदोलनों की पृष्ठभूमि को मेवाड़ प्रजामंडल के विकास से जोड़कर पढ़ना उपयोगी है।

4. राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन से संबंध

1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में मेवाड़ प्रजामंडल की सक्रियता ने इसे राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ दिया। इस समय आंदोलन का लक्ष्य केवल स्थानीय सुधार नहीं रहा, बल्कि ब्रिटिश प्रभाव और रियासती शासन की राजनीतिक संरचना पर भी प्रश्न उठाया गया।

5. सामाजिक जागृति

हरिजन सेवा, आदिवासी समाज से जुड़ाव, खादी और जनसेवा जैसे कार्यों ने आंदोलन को व्यापक सामाजिक आधार दिया।

6. महिला भागीदारी

महिलाओं की सक्रियता ने यह दिखाया कि रियासती राजनीतिक आंदोलन धीरे-धीरे परिवार और समाज के व्यापक वर्गों तक पहुंच चुका था।

मेवाड़ प्रजामंडल और किसान आंदोलनों का संबंध

मेवाड़ के राजनीतिक इतिहास में किसान आंदोलनों और प्रजामंडल आंदोलन को अलग-अलग समझना जरूरी है, लेकिन इनके बीच संबंध भी उतना ही महत्वपूर्ण है। किसान आंदोलनों ने आर्थिक और सामाजिक समस्याओं को सामने रखा, जबकि प्रजामंडल ने इन्हें व्यापक राजनीतिक अधिकारों और उत्तरदायी शासन की मांग से जोड़ने का प्रयास किया।

पहलू

किसान आंदोलन

मेवाड़ प्रजामंडल

मुख्य आधार

किसान और ग्रामीण समाज

व्यापक जनता और राजनीतिक कार्यकर्ता

मुख्य मुद्दे

लगान, लाग-बाग, बेगार, कर

उत्तरदायी शासन, राजनीतिक अधिकार, नागरिक भागीदारी

महत्वपूर्ण क्षेत्र

बिजोलिया, बेगूं आदि

उदयपुर और मेवाड़ के विभिन्न क्षेत्र

प्रमुख व्यक्तित्व

विजय सिंह पथिक, रामनारायण चौधरी आदि

माणिक्यलाल वर्मा, बलवंत सिंह मेहता, भूरेलाल बया आदि

व्यापक परिणाम

किसान चेतना और संगठन

राजनीतिक जागृति और उत्तरदायी शासन की मांग

इस संबंध को याद रखने का सरल तरीका है: किसान आंदोलन ने आर्थिक-सामाजिक चेतना को मजबूत किया और प्रजामंडल ने उसे व्यापक राजनीतिक अधिकारों के प्रश्न से जोड़ा।

RPSC, RAS, CET, REET और राजस्थान GK के लिए महत्वपूर्ण तथ्य

One-Liner Facts

  • मेवाड़ प्रजामंडल की स्थापना 24 अप्रैल 1938 को हुई।

  • स्थापना का प्रमुख श्रेय माणिक्यलाल वर्मा को दिया जाता है।

  • प्रथम अध्यक्ष बलवंत सिंह मेहता थे।

  • उपाध्यक्ष भूरेलाल बया थे।

  • माणिक्यलाल वर्मा संगठन के महामंत्री रहे।

  • 1938 में प्रजामंडल को मेवाड़ सरकार की ओर से प्रतिबंध और दमन का सामना करना पड़ा।

  • माणिक्यलाल वर्मा ने मेवाड़ से बाहर रहकर भी संगठन की गतिविधियां जारी रखीं।

  • 4 अक्टूबर 1938 को सत्याग्रह शुरू होने का उल्लेख मिलता है।

  • रमेशचंद्र व्यास को प्रथम सत्याग्रही माना जाता है।

  • सरकार ने आंदोलनकारियों को गिरफ्तार और निष्कासित किया।

  • माणिक्यलाल वर्मा के साथ सरकारी कठोरता की गांधीजी ने आलोचना की।

  • 1941 में प्रजामंडल पर से प्रतिबंध हटने के बाद संगठन ने खुली गतिविधियां तेज कीं।

  • 25–26 नवंबर 1941 को प्रथम अधिवेशन हुआ।

  • प्रथम अधिवेशन की अध्यक्षता माणिक्यलाल वर्मा ने की।

  • आचार्य जे.बी. कृपलानी और विजयलक्ष्मी पंडित अधिवेशन से जुड़े प्रमुख राष्ट्रीय व्यक्तित्व थे।

  • अधिवेशन में उत्तरदायी शासन की मांग प्रमुख थी।

  • 1942 में मेवाड़ प्रजामंडल भारत छोड़ो आंदोलन से जुड़ा।

  • 20 अगस्त 1942 को ब्रिटिश सरकार से संबंध समाप्त करने की मांग की गई।

  • 21 अगस्त 1942 को माणिक्यलाल वर्मा की गिरफ्तारी का उल्लेख मिलता है।

  • 1942 में उदयपुर, नाथद्वारा, चित्तौड़ और भीलवाड़ा आंदोलन के महत्वपूर्ण केंद्र बने।

Exam Trap: तीन बातें अलग-अलग याद रखें

प्रश्न

उत्तर

मेवाड़ प्रजामंडल की स्थापना का प्रमुख श्रेय

माणिक्यलाल वर्मा

स्थापना के समय प्रथम अध्यक्ष

बलवंत सिंह मेहता

1941 के प्रथम अधिवेशन के अध्यक्ष

माणिक्यलाल वर्मा

मेवाड़ प्रजामंडल आंदोलन को 5 चरणों में समझें

  1. पृष्ठभूमि: किसान आंदोलनों और सामाजिक-राजनीतिक जागृति का विकास।

  2. स्थापना: 24 अप्रैल 1938 को मेवाड़ प्रजामंडल का गठन।

  3. दमन और सत्याग्रह: सरकारी प्रतिबंध, निष्कासन, गिरफ्तारियां और 1938 का सत्याग्रह।

  4. राजनीतिक विस्तार: 1941 का प्रथम अधिवेशन और उत्तरदायी शासन की स्पष्ट मांग।

  5. राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ाव: 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भागीदारी और सरकारी दमन।

मेवाड़ प्रजामंडल आंदोलन का संक्षिप्त निष्कर्ष

मेवाड़ प्रजामंडल आंदोलन ने मेवाड़ की जनता की आर्थिक और सामाजिक समस्याओं को व्यापक राजनीतिक अधिकारों के प्रश्न से जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य किया। 24 अप्रैल 1938 को इसकी स्थापना के साथ मेवाड़ में संगठित राजनीतिक आंदोलन को नया रूप मिला। माणिक्यलाल वर्मा इसके प्रमुख संगठनकर्ता और राजनीतिक नेता बने, जबकि बलवंत सिंह मेहता इसके प्रथम अध्यक्ष रहे।

1938 के सरकारी प्रतिबंध और सत्याग्रह ने आंदोलन की संघर्षशीलता को सामने रखा। 1941 के प्रथम अधिवेशन ने उत्तरदायी शासन की मांग को स्पष्ट राजनीतिक लक्ष्य बनाया। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के साथ जुड़कर मेवाड़ प्रजामंडल ने राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन और रियासती जनता के अधिकारों के बीच संबंध को और मजबूत किया।

राजस्थान के आधुनिक इतिहास में इसका महत्व इसलिए है क्योंकि यह आंदोलन किसान चेतना, सामाजिक जागृति, नागरिक अधिकार और उत्तरदायी शासन की मांग के बीच विकसित हुआ। आगे चलकर यही राजनीतिक चेतना राजस्थान की रियासतों में लोकतांत्रिक परिवर्तन और एकीकरण की प्रक्रिया के लिए महत्वपूर्ण आधार बनी।

मेवाड़ प्रजामंडल आंदोलन: महत्वपूर्ण FAQs

मेवाड़ प्रजामंडल की स्थापना कब हुई?

मेवाड़ प्रजामंडल की स्थापना 24 अप्रैल 1938 को उदयपुर में हुई।

मेवाड़ प्रजामंडल की स्थापना का श्रेय किसे दिया जाता है?

मेवाड़ प्रजामंडल की स्थापना का प्रमुख श्रेय माणिक्यलाल वर्मा को दिया जाता है।

मेवाड़ प्रजामंडल के प्रथम अध्यक्ष कौन थे?

बलवंत सिंह मेहता मेवाड़ प्रजामंडल के प्रथम अध्यक्ष थे।

मेवाड़ प्रजामंडल के प्रथम अधिवेशन की अध्यक्षता किसने की?

25–26 नवंबर 1941 को हुए प्रथम अधिवेशन की अध्यक्षता माणिक्यलाल वर्मा ने की।

मेवाड़ प्रजामंडल का प्रथम सत्याग्रही कौन था?

रमेशचंद्र व्यास को 1938 के मेवाड़ प्रजामंडल सत्याग्रह का प्रथम सत्याग्रही माना जाता है।

मेवाड़ प्रजामंडल का मुख्य उद्देश्य क्या था?

मुख्य उद्देश्य मेवाड़ में उत्तरदायी शासन, जनता की राजनीतिक भागीदारी और नागरिक अधिकारों की स्थापना के लिए संघर्ष करना था।

माणिक्यलाल वर्मा को मेवाड़ से क्यों निष्कासित किया गया?

प्रजामंडल की राजनीतिक गतिविधियों और राज्य सरकार के विरोध के कारण उन्हें मेवाड़ से निष्कासित किया गया और उन्होंने अजमेर से संगठन की गतिविधियां जारी रखीं।

1941 के मेवाड़ प्रजामंडल अधिवेशन में कौन-कौन से राष्ट्रीय नेता जुड़े थे?

आचार्य जे.बी. कृपलानी और विजयलक्ष्मी पंडित जैसे राष्ट्रीय नेताओं की भागीदारी का उल्लेख मिलता है।

1942 में मेवाड़ प्रजामंडल का भारत छोड़ो आंदोलन से क्या संबंध था?

1942 में मेवाड़ प्रजामंडल ने भारत छोड़ो आंदोलन की राजनीतिक पृष्ठभूमि में सक्रिय भूमिका निभाई और महाराणा से ब्रिटिश सरकार के साथ संबंध समाप्त करने तथा उत्तरदायी शासन की दिशा में आगे बढ़ने की मांग की।

मेवाड़ प्रजामंडल आंदोलन का सबसे बड़ा राजनीतिक योगदान क्या था?

इसका प्रमुख राजनीतिक योगदान मेवाड़ में उत्तरदायी शासन और जनता की राजनीतिक भागीदारी की मांग को संगठित एवं व्यापक रूप देना था।

संबंधित राजस्थान इतिहास नोट्स

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अंतिम संशोधन: सितंबर 2026

अंतिम संशोधन (Last Updated): 14 सितंबर 2026
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🎯 विगत वर्षों के प्रश्न (Interactive PYQs)

Q1. 1938 में मेवाड़ प्रजामंडल की स्थापना के समय इसके प्रथम अध्यक्ष कौन थे?

Rajasthan CET Senior Secondary 2023

Q2. मेवाड़ राज्य प्रजामंडल की स्थापना कब हुई थी?

RSMSSB Lab Assistant 2016

Q3. मेवाड़ प्रजामंडल की स्थापना का प्रमुख श्रेय किसे दिया जाता है?

Rajasthan Police 2022

Q4. मेवाड़ प्रजामंडल का प्रथम अधिवेशन किस वर्ष हुआ?

Rajasthan GK 2024

Q5. मेवाड़ प्रजामंडल के प्रथम अधिवेशन की अध्यक्षता किसने की?

RPSC 2024

Q6. 1938 के मेवाड़ प्रजामंडल सत्याग्रह का प्रथम सत्याग्रही कौन माना जाता है?

Rajasthan CET 2024

Q7. मेवाड़ प्रजामंडल का सत्याग्रह 1938 में किस दिन शुरू हुआ था?

Rajasthan History GK 2025

Q8. 1942 में मेवाड़ प्रजामंडल किस राष्ट्रीय आंदोलन से सक्रिय रूप से जुड़ा?

Rajasthan CET 2025

Q9. मेवाड़ प्रजामंडल के प्रथम अधिवेशन में प्रमुख राजनीतिक मांग क्या थी?

RPSC 2025

Q10. मेवाड़ प्रजामंडल की स्थापना के समय माणिक्यलाल वर्मा का प्रमुख पद क्या था?

Rajasthan GK 2025

महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

मेवाड़ प्रजामंडल की स्थापना 24 अप्रैल 1938 को उदयपुर में हुई।

मेवाड़ प्रजामंडल की स्थापना का प्रमुख श्रेय माणिक्यलाल वर्मा को दिया जाता है।

बलवंत सिंह मेहता मेवाड़ प्रजामंडल के प्रथम अध्यक्ष थे।

भूरेलाल बया को मेवाड़ प्रजामंडल का उपाध्यक्ष बनाया गया था।

रमेशचंद्र व्यास को 1938 के मेवाड़ प्रजामंडल सत्याग्रह का प्रथम सत्याग्रही माना जाता है।

मेवाड़ प्रजामंडल का प्रथम अधिवेशन 25–26 नवंबर 1941 को उदयपुर में हुआ।

प्रथम अधिवेशन की अध्यक्षता माणिक्यलाल वर्मा ने की।

मुख्य उद्देश्य मेवाड़ में उत्तरदायी शासन, जनता की राजनीतिक भागीदारी और नागरिक अधिकारों की स्थापना के लिए संघर्ष करना था।

1942 में मेवाड़ प्रजामंडल भारत छोड़ो आंदोलन से सक्रिय रूप से जुड़ा।

इसका प्रमुख योगदान मेवाड़ में उत्तरदायी शासन और जनता की राजनीतिक भागीदारी की मांग को संगठित राजनीतिक आंदोलन में बदलना था।

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