राजस्थान की वन संपदा: वनों के प्रकार, ISFR वनावरण व लघु वन उपज — RAS/CET
कैसे बना: यह नोट सुयोग अकादमी के लेखक ने परीक्षा सिलेबस के अनुसार लिखा/संपादित किया है। प्रकाशन तिथि ऊपर और अंतिम संशोधन तिथि लेख के अंत में दी गई है। त्रुटि दिखे तो संपर्क करें। टीम परिचय
स्रोत आधार: RPSC RAS / RSMSSB CET पाठ्यक्रम — राजस्थान भूगोल इकाई। आधिकारिक सिलेबस से विषय-सूची; पुस्तक का शब्दशः पाठ नहीं।
सुयोग AI गुरु
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संक्षिप्त उत्तर: राजस्थान क्षेत्रफल में देश का सबसे बड़ा राज्य (लगभग 3.42 लाख वर्ग किमी) है, पर वन संपदा में यह सबसे निर्धन राज्यों में गिना जाता है। वन विभाग के रिकॉर्ड में दर्ज अभिलिखित वन क्षेत्र (Recorded Forest Area) राज्य के भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 9.5–9.6% है, जबकि उपग्रह से मापा गया वास्तविक वनावरण (Forest Cover) भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI, देहरादून) की ISFR 2021/2023 के अनुसार लगभग 4.8–4.9% ही है। वैधानिक रूप से वन तीन वर्गों में हैं — रक्षित (Protected, लगभग 56%), आरक्षित (Reserved, लगभग 37%) और अवर्गीकृत (Unclassed, लगभग 7%)। Champion & Seth वर्गीकरण के आधार पर यहाँ उष्णकटिबंधीय शुष्क पतझड़ वन (सबसे अधिक; धोकड़ा प्रधान), उष्णकटिबंधीय कांटेदार/मरुस्थलीय वन (पश्चिम; खेजड़ी, रोहिड़ा, कैर, फोग) और उपोष्ण पर्वतीय वन (केवल माउंट आबू) मिलते हैं। सागवान दक्षिण में — बांसवाड़ा, डूंगरपुर, उदयपुर, प्रतापगढ़। ISFR के अनुसार वनावरण क्षेत्रफल में उदयपुर सबसे आगे और चूरू सबसे पीछे बताया जाता है। राज्य वृक्ष खेजड़ी व राज्य पुष्प रोहिड़ा (दोनों 1983)। राज्य की पहली राज्य वन नीति 2010 में आई; 1730 का खेजड़ली बलिदान वन-संरक्षण का सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है।
संक्षिप्त उत्तर
बिंदु | तथ्य | परीक्षा-टिप्पणी |
|---|---|---|
राज्य का भौगोलिक क्षेत्र | लगभग 3,42,239 वर्ग किमी (देश का ~10.4%) | क्षेत्रफल में प्रथम |
अभिलिखित वन क्षेत्र (RFA) | भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 9.5–9.6% (~32.8 हज़ार वर्ग किमी) | यह "रिकॉर्ड" है, वास्तविक वृक्ष-आच्छादन नहीं |
वनावरण (Forest Cover) | ISFR के अनुसार लगभग 16.5–16.7 हज़ार वर्ग किमी ≈ 4.8–4.9% | देश के कुल वनावरण का लगभग 2.3% |
वैधानिक वर्ग (क्षेत्रफल क्रम) | रक्षित (~56%) > आरक्षित (~37%) > अवर्गीकृत (~7%) | सबसे अधिक "रक्षित", "आरक्षित" नहीं |
सर्वाधिक वन प्रकार | उष्णकटिबंधीय शुष्क पतझड़ वन | मानसूनी वन भी कहते हैं |
सर्वाधिक पाया जाने वाला वृक्ष | धोकड़ा (Anogeissus pendula) | खेजड़ी नहीं! |
सागवान | बांसवाड़ा (सर्वाधिक), डूंगरपुर, उदयपुर, प्रतापगढ़, चित्तौड़गढ़, बारां | दक्षिणी राजस्थान |
उपोष्ण पर्वतीय वन | माउंट आबू (सिरोही) | राज्य का एकमात्र |
वनावरण — सर्वाधिक ज़िला | उदयपुर (क्षेत्रफल में; प्रतिशत में भी शीर्ष ज़िलों में) | ISFR 2021 आधारित |
वनावरण — न्यूनतम ज़िला | चूरू (क्षेत्रफल); प्रतिशत में जोधपुर/चूरू (स्रोत अनुसार) | हेज के साथ याद करें |
राज्य वृक्ष / राज्य पुष्प | खेजड़ी / रोहिड़ा (दोनों 1983) | रोहिड़ा = "मारवाड़ टीक" |
राज्य वन नीति | पहली — 2010 | लक्ष्य: 20% क्षेत्र वन/वृक्ष आच्छादन |
खेजड़ली बलिदान | 1730 ई. (वि.सं. 1787), जोधपुर; अमृता देवी सहित 363 लोग | बिश्नोई समाज |
2. सिलेबस में यह टॉपिक क्यों महत्वपूर्ण है?
RAS प्रारंभिक व मुख्य परीक्षा के "राजस्थान का भूगोल" खंड में प्राकृतिक वनस्पति, वन एवं वन्यजीव संरक्षण स्पष्ट रूप से शामिल है। राजस्थान CET, पटवारी, VDO, REET व SI जैसी परीक्षाओं में इस विषय से सामान्यतः 1–3 प्रश्न बनते हैं। प्रश्न प्रायः इन रूपों में आते हैं:
आँकड़ा-आधारित: ISFR के अनुसार राज्य का वनावरण कितने प्रतिशत; सर्वाधिक/न्यूनतम वनावरण वाला ज़िला।
वर्गीकरण: आरक्षित, रक्षित, अवर्गीकृत वन में अंतर और क्षेत्रफल-क्रम।
प्रजाति-क्षेत्र मिलान: सागवान–बांसवाड़ा, धोकड़ा–अरावली, फोग–जैसलमेर, बांस–बांसवाड़ा/उदयपुर।
लघु वन उपज: खैर से कत्था, तेंदू पत्ता से बीड़ी, महुआ, गोंद, खस।
नीति/कार्यक्रम: राज्य वन नीति 2010, वन महोत्सव, संयुक्त वन प्रबंध, अरावली ग्रीन वॉल।
यह नोट वन संपदा, वनावरण के आँकड़ों और वन-प्रबंधन पर केंद्रित है। वनस्पति पेटियों (वर्षा के अनुसार पश्चिम से पूर्व वनस्पति परिवर्तन) का विस्तृत विवरण राजस्थान की प्राकृतिक वनस्पति पेटियाँ में है; खेजड़ी के विस्तृत अध्ययन के लिए खेजड़ी: राजस्थान का राज्य वृक्ष देखें।
3. मूल अवधारणाएँ: अभिलिखित वन क्षेत्र बनाम वनावरण
परीक्षा में सबसे बड़ा भ्रम इन दो शब्दों से होता है। दोनों अलग-अलग चीज़ें मापते हैं, इसलिए दोनों के प्रतिशत अलग आते हैं।
आधार | अभिलिखित वन क्षेत्र (Recorded Forest Area) | वनावरण (Forest Cover) |
|---|---|---|
अर्थ | सरकारी अभिलेखों में "वन" के रूप में दर्ज भूमि | उपग्रह चित्रों से मापी गई वह भूमि जिस पर वास्तव में वृक्ष-छत्र (canopy) है |
आधार | कानूनी/प्रशासनिक (वन अधिनियम के तहत अधिसूचना) | भौतिक/तकनीकी (Remote Sensing) |
न्यूनतम मानदंड | कोई छत्र-घनत्व शर्त नहीं | 1 हेक्टेयर या अधिक क्षेत्र, छत्र-घनत्व 10% से अधिक — स्वामित्व कोई भी हो |
राजस्थान में | लगभग 9.5–9.6% | लगभग 4.8–4.9% |
क्यों अंतर? | अनेक दर्ज वन-भूमियाँ खाली, झाड़ीदार या क्षरित हैं | खेत, ओरण या निजी भूमि पर सघन पेड़ भी गिने जाते हैं |
3.1 ISFR में वनावरण के घनत्व-वर्ग
वर्ग | छत्र-घनत्व (Canopy Density) | राजस्थान में स्थिति |
|---|---|---|
अति सघन वन (Very Dense Forest, VDF) | 70% या अधिक | बहुत कम — लगभग 100 वर्ग किमी से भी कम |
मध्यम सघन वन (Moderately Dense Forest, MDF) | 40% से 70% | वनावरण का लगभग एक-चौथाई |
खुला वन (Open Forest, OF) | 10% से 40% | राज्य के वनावरण का सबसे बड़ा भाग (लगभग तीन-चौथाई) |
झाड़ी (Scrub) | 10% से कम (क्षरित वन भूमि) | वनावरण में नहीं गिनी जाती; राजस्थान में काफ़ी विस्तृत |
वृक्षावरण (Tree Cover): ISFR अलग से "वृक्षावरण" भी आँकती है — 1 हेक्टेयर से छोटे टुकड़ों में, खेतों की मेड़ों, गाँवों व सड़कों के किनारे लगे पेड़। राजस्थान में खेतों में खड़ी खेजड़ी जैसी कृषि-वानिकी (Agro-forestry) के कारण वृक्षावरण का योगदान उल्लेखनीय है, इसलिए "वनावरण + वृक्षावरण" का प्रतिशत केवल वनावरण से कुछ अधिक आता है।
RFA = रिकॉर्ड (कागज़) ≈ 9.6% | Forest Cover = उपग्रह (ज़मीन पर पेड़) ≈ 4.9% — "कागज़ पर दुगुना"
4. वैधानिक वर्गीकरण — आरक्षित, रक्षित व अवर्गीकृत वन
प्रशासनिक दृष्टि से राजस्थान के वन राजस्थान वन अधिनियम, 1953 (जो भारतीय वन अधिनियम, 1927 के प्रतिरूप पर बना) के तहत तीन वर्गों में बँटे हैं। प्रतिशत ISFR/वन विभाग के आँकड़ों से लिए गए अनुमान हैं; वर्ष के अनुसार थोड़ा बदलते हैं।
वर्ग | अर्थ / नियम | अभिलिखित वन क्षेत्र में हिस्सा (लगभग) | याद रखने योग्य |
|---|---|---|---|
रक्षित वन (Protected Forest) | चराई, लकड़ी बीनना आदि अधिकार सामान्यतः अनुमत, जब तक विशेष रूप से निषिद्ध न हों | ~55–56% | सबसे अधिक क्षेत्र |
आरक्षित वन (Reserved Forest) | सबसे कड़ा संरक्षण — सभी गतिविधियाँ निषिद्ध, जब तक विशेष अनुमति न हो | ~37% | दूसरे स्थान पर |
अवर्गीकृत वन (Unclassed Forest) | जिनका वर्गीकरण अभी नहीं हुआ; प्रायः पंचायत/राजस्व नियंत्रण | ~7% | सबसे कम |
आरक्षित वनों में "सब कुछ मना, जब तक अनुमति न हो"; रक्षित में "सब कुछ अनुमत, जब तक मना न हो" — यही मूल अंतर है।
राज्य के अधिकांश सघन वन (दक्षिण-पूर्व व दक्षिण) तथा अभयारण्यों के कोर क्षेत्र प्रायः आरक्षित वन श्रेणी में आते हैं।
42वें संविधान संशोधन (1976) से "वन" और "वन्यजीव संरक्षण" राज्य सूची से समवर्ती सूची में आए।
संरक्षित क्षेत्र (Protected Areas) — राष्ट्रीय उद्यान, अभयारण्य, कंज़र्वेशन रिज़र्व — वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत अलग श्रेणी हैं। इनके लिए देखें: राजस्थान के वन्यजीव अभयारण्य व टाइगर रिज़र्व और राजस्थान के Conservation Reserve व आखेट निषिद्ध क्षेत्र।
क्रम याद: "र-आ-अ" — रक्षित > आरक्षित > अवर्गीकृत (56 : 37 : 7)
5. ISFR के अनुसार राजस्थान का वनावरण
भारत वन स्थिति रिपोर्ट (India State of Forest Report — ISFR) पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अधीन भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI), देहरादून द्वारा हर दो वर्ष में जारी की जाती है (पहली रिपोर्ट 1987)। हाल की रिपोर्टें ISFR 2021 (जनवरी 2022 में जारी) और ISFR 2023 (दिसंबर 2024 में जारी) हैं।
सूचक | राजस्थान (लगभग) | टिप्पणी |
|---|---|---|
वनावरण (Forest Cover) | ~16.5–16.7 हज़ार वर्ग किमी | ISFR 2021 में लगभग 16,655 वर्ग किमी; 2023 में भी इसी स्तर के आसपास |
भौगोलिक क्षेत्र का प्रतिशत | ~4.8–4.9% | राष्ट्रीय औसत लगभग 21–22% से बहुत कम |
देश के कुल वनावरण में हिस्सा | ~2.3% | क्षेत्रफल 10.4% पर वन केवल ~2.3% |
सबसे बड़ा घनत्व-वर्ग | खुला वन (Open Forest) | अति सघन वन नगण्य |
रुझान | वनावरण लगभग स्थिर/हल्की वृद्धि | ISFR 2023 में "वन + वृक्षावरण" में वृद्धि वाले अग्रणी राज्यों में राजस्थान का उल्लेख हुआ |
सावधानी: ISFR के आँकड़े हर संस्करण में बदलते हैं। परीक्षा में प्रायः "लगभग 4.8–5%" या "5% से कम" वाला विकल्प सही होता है; जिस संस्करण का प्रश्न हो, उसी का आँकड़ा देखें।
राष्ट्रीय वन नीति 1988 का लक्ष्य देश के 33% क्षेत्र (पहाड़ी क्षेत्रों में 66%) को वनाच्छादित करना है; राजस्थान इससे बहुत पीछे है — कारण: शुष्क जलवायु, कम वर्षा (देखें राजस्थान में वर्षा का क्षेत्रीय वितरण), रेतीली मिट्टी और मरुस्थल का बड़ा विस्तार।
6. ज़िलेवार वनावरण — सर्वाधिक व न्यूनतम
ISFR ज़िलेवार वनावरण भी देती है। नीचे दिए क्रम ISFR 2021 आधारित परीक्षा-पुस्तकों के अनुसार हैं। ध्यान दें — 2023 के बाद ज़िलों के पुनर्गठन (वर्तमान में 41 ज़िले, 7 संभाग; जैसे उदयपुर से सलूंबर अलग) से ज़िलेवार आँकड़ों का क्रम बदल सकता है, इसलिए नवीनतम संस्करण का संदर्भ देखें।
मापदंड | सर्वाधिक | न्यूनतम | टिप्पणी |
|---|---|---|---|
वनावरण क्षेत्रफल (वर्ग किमी) | उदयपुर | चूरू | उदयपुर के बाद अलवर, प्रतापगढ़, बारां, चित्तौड़गढ़ जैसे ज़िले ऊपर आते हैं |
ज़िले के क्षेत्रफल में वनावरण % | उदयपुर (प्रतापगढ़ बहुत निकट) | जोधपुर / चूरू (स्रोत अनुसार भिन्न) | प्रतिशत व क्षेत्रफल के प्रश्न अलग पढ़ें |
दक्षिणी व दक्षिण-पूर्वी ज़िले (उदयपुर, प्रतापगढ़, सिरोही, बांसवाड़ा, डूंगरपुर, चित्तौड़गढ़, बारां, झालावाड़, करौली, सवाई माधोपुर) में वन अधिक हैं — यहाँ वर्षा 60–100 सेमी या अधिक होती है।
पश्चिमी व उत्तर-पश्चिमी ज़िले (चूरू, जोधपुर, जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर, हनुमानगढ़, श्रीगंगानगर) में वनावरण अत्यल्प है।
जैसलमेर का प्रतिशत बहुत कम है, पर ज़िला अत्यंत विशाल होने से उसका कुल वनावरण क्षेत्रफल चूरू से अधिक बैठता है — "प्रतिशत न्यूनतम" और "क्षेत्रफल न्यूनतम" अलग प्रश्न हैं।
"उदय (उदयपुर) में सबसे हरा, चूरू में सबसे सूखा"
7. वनों के प्रकार (Champion & Seth आधार)
एच.जी. चैंपियन और एस.के. सेठ का वर्गीकरण (1968) भारत के वनों को 16 मुख्य प्रकार-समूहों में बाँटता है। राजस्थान में इनमें से मुख्यतः तीन समूह प्रासंगिक हैं। राज्य-स्तरीय परीक्षा-पुस्तकें इन्हें वर्षा के आधार पर निम्न रूप में पढ़ाती हैं:
वन प्रकार | क्षेत्र | वर्षा (लगभग) | प्रमुख प्रजातियाँ |
|---|---|---|---|
उष्णकटिबंधीय कांटेदार / मरुस्थलीय वन (Tropical Thorn) | पश्चिमी राजस्थान — जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर, जोधपुर, चूरू, नागौर, श्रीगंगानगर | 50 सेमी से कम | खेजड़ी, रोहिड़ा, बबूल, कुमट, कैर, बेर, फोग, जाल (पीलू), थोर, आक; सेवण-धामण घास |
उष्णकटिबंधीय शुष्क पतझड़ वन (Tropical Dry Deciduous) | अरावली, पूर्वी व दक्षिण-पूर्वी राजस्थान, हाड़ौती | 50–110 सेमी | धोकड़ा (सर्वाधिक), सालर, खैर, ढाक, तेंदू, महुआ, बांस, सागवान (दक्षिण) |
उपोष्ण पर्वतीय वन (Subtropical Hill/Broadleaved) | केवल माउंट आबू (सिरोही) | 150 सेमी के आसपास (राज्य में सर्वाधिक वर्षा वाला क्षेत्र) | आम, जामुन, बांस, सिरस, बरगद आदि; सदाबहार व अर्ध-सदाबहार प्रकृति |
7.1 उष्णकटिबंधीय कांटेदार वन
पत्तियाँ छोटी, मोटी या कांटों में बदली हुई; जड़ें गहरी — ये मरुद्भिद (Xerophytes) हैं।
इंदिरा गांधी नहर क्षेत्र में नहर-किनारे व आश्रय-पट्टी (Shelter Belt) वृक्षारोपण से इस क्षेत्र में वृक्ष बढ़े हैं।
7.2 उष्णकटिबंधीय शुष्क पतझड़ वन
राज्य के वन क्षेत्र का सबसे बड़ा भाग इसी प्रकार का है; इन्हें मानसूनी वन भी कहते हैं।
ग्रीष्म ऋतु (मार्च–मई) में अधिकांश वृक्ष पत्तियाँ गिरा देते हैं — जल-हानि कम करने के लिए।
Champion & Seth में Anogeissus pendula (धोकड़ा) वन एक विशिष्ट उप-प्रकार है, जिसका सबसे बड़ा विस्तार राजस्थान की अरावली में है।
7.3 उपोष्ण पर्वतीय वन — माउंट आबू
अरावली के सर्वोच्च भाग (गुरु शिखर, 1722 मीटर) के आसपास अधिक ऊँचाई, कम तापमान और अधिक वर्षा के कारण यहाँ सदाबहार व अर्ध-सदाबहार प्रजातियाँ मिलती हैं।
यह राजस्थान का एकमात्र उपोष्ण पर्वतीय वन क्षेत्र है; माउंट आबू वन्यजीव अभयारण्य इसी का भाग है।
3 प्रकार: "कांटा-पतझड़-पर्वत" — पश्चिम में कांटे, बीच-पूर्व में पतझड़, आबू पर पर्वतीय
8. शुष्क पतझड़ वनों के उप-प्रकार
उप-प्रकार | प्रमुख क्षेत्र / ज़िले | विशेषता |
|---|---|---|
शुष्क सागवान वन (Teak) | बांसवाड़ा (सर्वाधिक), डूंगरपुर, उदयपुर, प्रतापगढ़, चित्तौड़गढ़, बारां, झालावाड़ | राज्य के सबसे दक्षिणी भाग; 75–110 सेमी वर्षा; इमारती लकड़ी; सागवान राजस्थान में अपनी प्राकृतिक सीमा के उत्तरी छोर पर है |
सालर वन | उदयपुर, राजसमंद, चित्तौड़गढ़, सिरोही, पाली, अजमेर, अलवर, जयपुर — अरावली की ढलानें | सालर (Boswellia serrata) की लकड़ी पैकिंग/पेटियाँ बनाने में; गोंद (लोबान जैसा) भी |
बांस वन | बांसवाड़ा, उदयपुर, चित्तौड़गढ़, सिरोही, बारां, कोटा, डूंगरपुर | आदिवासी आजीविका — टोकरी, चटाई, झोपड़ी; "बांसवाड़ा" नाम बांस की अधिकता से जोड़ा जाता है |
धोकड़ा वन | अरावली क्षेत्र — अजमेर, अलवर, जयपुर, राजसमंद, उदयपुर, सवाई माधोपुर, करौली, कोटा, बूंदी, टोंक | राज्य में सर्वाधिक; ईंधन व चारा; कठोर व सूखा-सहिष्णु |
पलाश / ढाक वन | अलवर, अजमेर, राजसमंद, उदयपुर, चित्तौड़गढ़, कोटा, सिरोही, बूंदी | मार्च–अप्रैल में लाल-नारंगी फूल — "जंगल की ज्वाला (Flame of the Forest)"; पत्तों से पत्तल-दोने |
हाड़ौती (कोटा-बूंदी-बारां-झालावाड़) के वन मुकुंदरा हिल्स जैसे संरक्षित क्षेत्रों से जुड़े हैं; विवरण के लिए राजस्थान के राष्ट्रीय उद्यान देखें।
पलाश को राज्य पुष्प समझना आम भूल है — राज्य पुष्प रोहिड़ा है।
9. प्रमुख वृक्ष प्रजातियाँ — क्षेत्र व उपयोग
वृक्ष (वैज्ञानिक नाम) | प्रमुख क्षेत्र | उपयोग / विशेष तथ्य |
|---|---|---|
धोकड़ा (Anogeissus pendula) | अरावली, पूर्वी व दक्षिण-पूर्वी राजस्थान | राज्य में सर्वाधिक पाया जाने वाला वृक्ष; ईंधन, चारा, कोयला; गोंद |
सागवान (Tectona grandis) | बांसवाड़ा, डूंगरपुर, उदयपुर, प्रतापगढ़ | उत्तम इमारती लकड़ी, फर्नीचर |
सालर (Boswellia serrata) | अरावली ढलानें | पैकिंग पेटियाँ, गोंद/राल |
बांस (Dendrocalamus strictus) | बांसवाड़ा, उदयपुर, सिरोही, बारां | टोकरी, चटाई, कागज़-लुगदी, झोपड़ी |
खैर (Acacia catechu) | उदयपुर, चित्तौड़गढ़, झालावाड़, बूंदी, कोटा, सवाई माधोपुर | छाल/लकड़ी से कत्था; कथौड़ी जनजाति कत्था निर्माण से जुड़ी |
ढाक/पलाश (Butea monosperma) | दक्षिण व दक्षिण-पूर्व | पत्तल-दोने, प्राकृतिक रंग; लाख कीट का पोषक |
तेंदू (Diospyros melanoxylon) | उदयपुर, चित्तौड़गढ़, प्रतापगढ़, बारां, झालावाड़, कोटा, बूंदी | पत्तों से बीड़ी; "टिमरू" भी कहते हैं |
महुआ (Madhuca longifolia) | डूंगरपुर, बांसवाड़ा, उदयपुर, प्रतापगढ़, चित्तौड़गढ़ | फूल खाद्य व पेय में, बीज से तेल; "आदिवासियों का कल्पवृक्ष" |
खेजड़ी (Prosopis cineraria) | पश्चिमी व मध्य राजस्थान — शेखावाटी, नागौर, जोधपुर | राज्य वृक्ष (1983); फली "सांगरी", पत्तियाँ "लूंग" (चारा); "थार का कल्पवृक्ष" |
रोहिड़ा (Tecomella undulata) | पश्चिमी राजस्थान — जोधपुर, बाड़मेर, जैसलमेर, नागौर | राज्य पुष्प (1983); इमारती लकड़ी — "मारवाड़ टीक/मरुस्थल का सागवान" |
कैर (Capparis decidua) | पश्चिमी व मध्य राजस्थान | कच्चे फल से सब्ज़ी/अचार ("कैर-सांगरी") |
फोग (Calligonum polygonoides) | जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर — बालुका स्तूप | टीलों का स्थिरीकरण; ईंधन; फूल "फोगला" (रायता) |
कुमट (Acacia senegal) | जोधपुर, बाड़मेर, नागौर, पाली | उत्तम गोंद; बीज (कुमटिया) "पंचकूटा" में |
खेजड़ी के विस्तृत अध्ययन (सांगरी, लूंग, खेजड़ी के रोग, सांस्कृतिक महत्व) के लिए खेजड़ी: राजस्थान का राज्य वृक्ष पढ़ें।
10. लघु वन उपज (Minor Forest Produce)
लकड़ी के अलावा वनों से मिलने वाले उत्पाद — पत्ते, गोंद, फल-फूल, घास, शहद आदि — लघु वन उपज (MFP) या गैर-काष्ठ वन उपज (NTFP) कहलाते हैं। दक्षिणी राजस्थान की जनजातियों (भील, मीणा, गरासिया, सहरिया, कथौड़ी) की आजीविका में इनका बड़ा योगदान है।
उपज | स्रोत वृक्ष/पौधा | प्रमुख क्षेत्र | उपयोग |
|---|---|---|---|
तेंदू पत्ता | तेंदू | उदयपुर, चित्तौड़गढ़, प्रतापगढ़, बारां, झालावाड़, कोटा | बीड़ी; व्यापार का राजकीय नियंत्रण — राजस्थान तेंदू पत्ता (व्यापार विनियमन) अधिनियम, 1974 |
कत्था | खैर | उदयपुर, चित्तौड़गढ़, झालावाड़, बूंदी | पान, रंगाई, औषधि; कथौड़ी जनजाति |
गोंद | कुमट, खेजड़ी, बबूल, धोकड़ा (धावड़ा), सालर | पश्चिमी व अरावली क्षेत्र | खाद्य (लड्डू), औषधि, उद्योग |
बांस | बांस | बांसवाड़ा, उदयपुर, सिरोही, बारां | टोकरी, चटाई, हस्तशिल्प |
महुआ | महुआ | डूंगरपुर, बांसवाड़ा, उदयपुर | फूल — खाद्य व पेय; बीज — तेल (डोलमा) |
खस | खस घास | भरतपुर, सवाई माधोपुर, टोंक, करौली | इत्र, शरबत, कूलर की टाटियाँ |
आंवल/आवरा छाल | आंवल झाड़ी | जोधपुर, पाली, सिरोही | चमड़ा पकाने (टैनिंग) में |
केंद्र की प्रधानमंत्री वन धन योजना (2018) लघु वन उपज के मूल्य-संवर्धन हेतु "वन धन केंद्रों" को बढ़ावा देती है।
जनजातियों के सामाजिक-आर्थिक संदर्भ के लिए देखें: राजस्थान की 4 प्रमुख जनजातियाँ व TSP।
"तेंदू-बीड़ी, खैर-कत्था, कुमट-गोंद, महुआ-फूल, खस-इत्र, आंवल-चमड़ा"
11. सामुदायिक वन-संरक्षण की परंपरा
11.1 खेजड़ली बलिदान (1730)
जोधपुर के निकट खेजड़ली गाँव में 1730 ई. (वि.सं. 1787, भाद्रपद शुक्ल दशमी) को महाराजा अभयसिंह के समय महल-निर्माण हेतु खेजड़ी काटने आए दल का बिश्नोई समाज ने विरोध किया। अमृता देवी बिश्नोई और उनकी तीन पुत्रियों सहित 363 लोगों ने वृक्षों से लिपटकर प्राण दिए। इसे वृक्ष-संरक्षण का विश्व का सबसे प्रसिद्ध प्रारंभिक उदाहरण माना जाता है; 1973 के उत्तराखंड के चिपको आंदोलन को इसी परंपरा से जोड़ा जाता है। विस्तार के लिए बिश्नोई पंथ व खेजड़ली के 363 बलिदानी देखें।
बिश्नोई पंथ के प्रवर्तक गुरु जांभोजी के 29 नियमों में हरे वृक्ष न काटने और जीव-दया का निर्देश है।
11.2 ओरण, देवबनी व गोचर
ओरण — देवी-देवताओं के नाम पर छोड़ी गई सामुदायिक वन-भूमि, जहाँ पेड़ काटना वर्जित माना जाता है; पश्चिमी राजस्थान (जैसलमेर, बाड़मेर, जोधपुर) में व्यापक। ये पवित्र उपवन (Sacred Groves) का राजस्थानी रूप हैं।
देवबनी / बणी — मंदिरों से जुड़े वन-खंड; गोचर — गाँव की सामूहिक चरागाह भूमि।
ये क्षेत्र गोडावण, चिंकारा जैसे वन्यजीवों के आवास भी हैं — देखें गोडावण (Great Indian Bustard)। हाल के वर्षों में ओरण-भूमि पर सौर/पवन परियोजनाओं के विस्तार को लेकर संरक्षण की चिंता उठी है।
12. वन नीति व कानून
नीति / कानून | वर्ष | मुख्य बिंदु |
|---|---|---|
भारतीय वन अधिनियम | 1927 | आरक्षित, ग्राम व रक्षित वनों की कानूनी व्यवस्था |
प्रथम राष्ट्रीय वन नीति | 1952 | देश के एक-तिहाई क्षेत्र पर वन का लक्ष्य |
राजस्थान वन अधिनियम | 1953 | राज्य में वनों के वर्गीकरण, अपराध व दंड का आधार |
वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम | 1972 | राष्ट्रीय उद्यान, अभयारण्य; बाद में कंज़र्वेशन/कम्युनिटी रिज़र्व |
42वाँ संविधान संशोधन | 1976 | वन व वन्यजीव संरक्षण समवर्ती सूची में |
वन (संरक्षण) अधिनियम | 1980 | वन भूमि के गैर-वन उपयोग पर केंद्र की पूर्व-अनुमति; 2023 के संशोधन के बाद नाम "वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम" |
राष्ट्रीय वन नीति | 1988 | 33% क्षेत्र पर वन (पहाड़ों में 66%); पारिस्थितिक संतुलन व जन-भागीदारी पर ज़ोर |
राजस्थान राज्य वन नीति | 2010 | राज्य की पहली वन नीति; दीर्घकाल में 20% क्षेत्र को वन/वृक्षावरण में लाने का लक्ष्य; जन-भागीदारी, चरागाह विकास, जैव-विविधता |
प्रतिकरात्मक वनरोपण निधि (CAMPA) अधिनियम | 2016 | वन भूमि के उपयोग के बदले वनरोपण निधि |
राज्य वन नीति 2010 ही परीक्षा में "राजस्थान की पहली वन नीति" के रूप में पूछी जाती है।
2023 में राज्य सरकार द्वारा नई वन नीति को स्वीकृति दिए जाने की सूचनाएँ आईं; इसके प्रावधान व वर्तमान स्थिति राज्य सरकार की आधिकारिक अधिसूचना से जाँचकर ही उत्तर दें। जब तक प्रश्न में वर्ष न दिया हो, "पहली राज्य वन नीति = 2010" ही सुरक्षित उत्तर है।
13. वन विकास कार्यक्रम, योजनाएँ व संस्थान
कार्यक्रम / संस्थान | वर्ष / स्थान | मुख्य तथ्य |
|---|---|---|
वन महोत्सव | 1950 से (राष्ट्रीय) | के.एम. मुंशी द्वारा प्रारंभ; प्रतिवर्ष जुलाई के प्रथम सप्ताह के आसपास वृक्षारोपण अभियान |
सामाजिक वानिकी (Social Forestry) | 1976 के राष्ट्रीय कृषि आयोग की सिफ़ारिश के बाद; राज्य में 1980 के दशक से | सड़क, नहर, रेल-किनारे, पंचायत भूमि पर वृक्षारोपण; ईंधन-चारे की स्थानीय पूर्ति |
संयुक्त वन प्रबंध (Joint Forest Management) | राष्ट्रीय दिशानिर्देश 1990; राजस्थान में 1991 के आसपास से | ग्राम वन सुरक्षा एवं प्रबंध समितियाँ (VFPMC); वन-संरक्षण में ग्रामीणों की भागीदारी, उपज में हिस्सा |
मरु विकास कार्यक्रम (DDP) | 1977–78 | मरुस्थलीकरण रोकना — वृक्षारोपण, चरागाह, टीला स्थिरीकरण |
अरावली ग्रीन वॉल परियोजना | 2023 में घोषित; 2025 में औपचारिक शुरुआत | गुजरात, राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली — अरावली के चारों ओर लगभग 5 किमी चौड़ी हरित पट्टी; क्षरित भूमि का पुनर्स्थापन |
घर-घर औषधि योजना | 2021 (राजस्थान) | परिवारों को तुलसी, अश्वगंधा, गिलोय, कालमेघ के पौधे |
शुष्क वन अनुसंधान संस्थान (AFRI) | जोधपुर, 1988 (ICFRE) | शुष्क क्षेत्र वानिकी अनुसंधान |
केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (CAZRI) | जोधपुर, 1959 (ICAR) | मरुस्थल प्रबंधन, आश्रय-पट्टियाँ, टीला स्थिरीकरण |
अरावली ग्रीन वॉल का विचार अफ्रीका की "Great Green Wall" से प्रेरित है; उद्देश्य थार मरुस्थल के पूर्व की ओर प्रसार को रोकना और अरावली की क्षरित भूमि को हरा करना है। अरावली के भू-आकृतिक परिचय के लिए अरावली की चोटियाँ, दर्रे व विभाग देखें।
14. वनों से जुड़ी प्रमुख समस्याएँ
समस्या | कारण / स्वरूप | प्रभाव |
|---|---|---|
मरुस्थलीकरण (Desertification) | वनावरण की कमी, अति-चराई, वायु अपरदन, जल-अभाव | ISRO के मरुस्थलीकरण एटलस के अनुसार देश में सर्वाधिक क्षरित/मरुस्थलीकरण-प्रभावित क्षेत्र राजस्थान में — राज्य का आधे से अधिक भाग |
अरावली में खनन | मार्बल, ग्रेनाइट, पत्थर, अवैध खनन | पहाड़ियों का कटाव, वन-क्षति, थार के पूर्व-प्रसार का ख़तरा; अरावली की परिभाषा व खनन पर न्यायिक-नीतिगत बहस हाल में चर्चा में |
अतिक्रमण | कृषि, आवास, ओरण-गोचर पर कब्ज़ा | वन व सामुदायिक भूमि का घटना |
अति-चराई | राज्य में पशुधन की विशाल संख्या | पुनर्जनन रुकना, मृदा अपरदन (देखें राजस्थान में मृदा अपरदन) |
आक्रामक प्रजाति | विलायती बबूल (Prosopis juliflora) | देशी वनस्पति व घास-भूमि का ह्रास |
विकास परियोजनाएँ | सड़क, सौर-पवन पार्क, विद्युत लाइनें | ओरण व गोडावण आवास पर दबाव |
समाधान की दिशा: संयुक्त वन प्रबंध का विस्तार, ओरण-गोचर का कानूनी संरक्षण, चरागाह विकास, स्थानीय प्रजातियों (खेजड़ी, रोहिड़ा, कुमट, धोकड़ा) का रोपण, खनन का कड़ा नियमन, कृषि-वानिकी तथा जल-संचयन के साथ वनीकरण। मृदा संदर्भ के लिए राजस्थान की मिट्टी के प्रकार उपयोगी है।
15. कालक्रम एक नज़र में
वर्ष | घटना |
|---|---|
1730 | खेजड़ली बलिदान — अमृता देवी सहित 363 बिश्नोई (जोधपुर) |
1950 | वन महोत्सव प्रारंभ (के.एम. मुंशी) |
1952 | प्रथम राष्ट्रीय वन नीति |
1953 | राजस्थान वन अधिनियम |
1972 | वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम |
1974 | राजस्थान तेंदू पत्ता (व्यापार विनियमन) अधिनियम |
1976 | 42वाँ संशोधन — वन समवर्ती सूची में |
1980 | वन (संरक्षण) अधिनियम |
1983 | खेजड़ी राज्य वृक्ष, रोहिड़ा राज्य पुष्प घोषित |
1988 | राष्ट्रीय वन नीति; AFRI जोधपुर |
1990–91 | संयुक्त वन प्रबंध — राष्ट्रीय दिशानिर्देश; राजस्थान में प्रारंभ |
2010 | राजस्थान राज्य वन नीति व राज्य पर्यावरण नीति |
2021 | घर-घर औषधि योजना; ISFR 2021 (जनवरी 2022 में जारी) |
2023 | वन (संरक्षण एवं संवर्धन) संशोधन; अरावली ग्रीन वॉल की घोषणा |
2024 | ISFR 2023 जारी (दिसंबर) |
16. भ्रम व सावधानियाँ (Exam Traps)
भ्रम | सही तथ्य |
|---|---|
राज्य में सर्वाधिक पाया जाने वाला वृक्ष खेजड़ी है | नहीं — धोकड़ा सर्वाधिक; खेजड़ी राज्य वृक्ष है |
राज्य पुष्प पलाश/ढाक है | नहीं — राज्य पुष्प रोहिड़ा; पलाश "जंगल की ज्वाला" |
रोहिड़ा = सागवान | रोहिड़ा को "मारवाड़ टीक" कहते हैं, पर असली सागवान (Tectona grandis) दक्षिण में |
आरक्षित वन सबसे अधिक हैं | नहीं — रक्षित वन सबसे अधिक (~56%), आरक्षित ~37% |
राज्य का वन लगभग 9.6% है | यह अभिलिखित वन क्षेत्र है; ISFR का वनावरण ~4.8–4.9% |
ISFR राज्य वन विभाग जारी करता है | नहीं — भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI), देहरादून; द्विवार्षिक |
सबसे कम वनावरण (क्षेत्रफल) जैसलमेर में | ISFR 2021 आधारित पुस्तकों में चूरू; जैसलमेर का प्रतिशत कम, क्षेत्रफल नहीं |
पहली राज्य वन नीति 2023 | पहली 2010; 2023 की नीति की स्थिति आधिकारिक स्रोत से जाँचें |
कत्था तेंदू से | कत्था खैर से; तेंदू पत्ते से बीड़ी |
17. परीक्षा में पूछे जाने वाले तथ्य (One-Liners)
राजस्थान का वनावरण (ISFR के अनुसार) — भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 4.8–4.9%।
अभिलिखित वन क्षेत्र — लगभग 9.5–9.6%।
वनावरण में सर्वाधिक ज़िला — उदयपुर; न्यूनतम (क्षेत्रफल) — चूरू।
वैधानिक वर्गों में सर्वाधिक — रक्षित वन।
राज्य का सर्वाधिक वन प्रकार — उष्णकटिबंधीय शुष्क पतझड़ वन।
राज्य में सर्वाधिक पाया जाने वाला वृक्ष — धोकड़ा।
सागवान सर्वाधिक — बांसवाड़ा।
उपोष्ण पर्वतीय वन — केवल माउंट आबू।
राज्य वृक्ष — खेजड़ी (1983); राज्य पुष्प — रोहिड़ा (1983)।
"मारवाड़ टीक" — रोहिड़ा।
"जंगल की ज्वाला" — ढाक/पलाश।
कत्था — खैर से; कथौड़ी जनजाति।
बालुका स्तूप स्थिर करने वाली झाड़ी — फोग।
पहली राज्य वन नीति — 2010।
खेजड़ली बलिदान — 1730, 363 लोग, अमृता देवी बिश्नोई।
18. इसे आसानी से याद कैसे रखें?
वन प्रकार: "कां-प-प" — कांटेदार (पश्चिम), पतझड़ (पूर्व/दक्षिण), पर्वतीय (आबू)
लघु उपज: "तेंदू ने बीड़ी पी, खैर ने कत्था खाया, कुमट ने गोंद दिया"
प्रतीक 1983: "खेजड़ी खड़ी, रोहिड़ा खिला" — वृक्ष व पुष्प एक ही वर्ष
आँकड़े: "9.6 कागज़ पर, 4.9 ज़मीन पर" | वर्ग: "र-आ-अ = 56-37-7"
19. संबंधित नोट्स
राजस्थान की प्राकृतिक वनस्पति पेटियाँ — वर्षा आधारित वनस्पति पेटियाँ
खेजड़ी: राजस्थान का राज्य वृक्ष — राज्य वृक्ष का विस्तृत अध्ययन
राजस्थान के वन्यजीव अभयारण्य व टाइगर रिज़र्व — संरक्षित क्षेत्र
राजस्थान के राष्ट्रीय उद्यान — रणथंभौर, केवलादेव, मुकुंदरा हिल्स आदि
राजस्थान के Conservation Reserve व आखेट निषिद्ध क्षेत्र — सामुदायिक संरक्षण क्षेत्र
बिश्नोई पंथ व खेजड़ली के 363 बलिदानी — खेजड़ली आंदोलन
राजस्थान में मृदा अपरदन — वन-हानि और अपरदन का संबंध
थार मरुस्थल — मरुस्थलीय पर्यावरण
20. एक दिन पहले — 12 रेखाएँ
क्षेत्रफल 3.42 लाख वर्ग किमी; वनावरण ~4.8–4.9% (ISFR); RFA ~9.6%
ISFR — FSI देहरादून, द्विवार्षिक; 2021 व 2023 संस्करण
रक्षित ~56% > आरक्षित ~37% > अवर्गीकृत ~7%
उदयपुर सर्वाधिक; चूरू न्यूनतम (क्षेत्रफल)
तीन प्रकार — कांटेदार (पश्चिम), शुष्क पतझड़ (सर्वाधिक), उपोष्ण पर्वतीय (आबू)
धोकड़ा सर्वाधिक वृक्ष; सागवान — बांसवाड़ा, डूंगरपुर, उदयपुर, प्रतापगढ़
सालर — पेटियाँ; खैर — कत्था; तेंदू — बीड़ी; महुआ — आदिवासी कल्पवृक्ष
खेजड़ी राज्य वृक्ष, रोहिड़ा राज्य पुष्प — 1983
राजस्थान वन अधिनियम 1953; राज्य वन नीति 2010
वन महोत्सव 1950; JFM 1990–91; DDP 1977–78
अरावली ग्रीन वॉल — 4 राज्य, ~5 किमी हरित पट्टी
खेजड़ली 1730 — 363 बलिदानी, अमृता देवी
21. अभ्यास
नोट पढ़ने के बाद इस पेज के अंत में दिए 25 प्रश्नों का क्विज़ हल करें। जिन प्रश्नों में गलती हो, उनके लिए खंड 3–6 (वनावरण के आँकड़े व ज़िले), खंड 7–9 (वन प्रकार व प्रजातियाँ) और खंड 16 (भ्रम) दोहराएँ। ISFR के आँकड़ों को दशमलव तक रटने की बजाय उनका स्तर (लगभग 5%), RFA से अंतर और सर्वाधिक/न्यूनतम ज़िले पक्के करें। मानचित्र अभ्यास के लिए राजस्थान के Wildlife Map Based Questions भी हल करें।
22. निष्कर्ष: परीक्षा के लिए क्या याद रखें?
राजस्थान की वन संपदा मात्रा में भले सीमित हो, पर विविधता और उपयोगिता में अत्यंत समृद्ध है — पश्चिम की कांटेदार मरुद्भिद वनस्पति पशुपालन और मरु-जीवन का आधार है, अरावली व हाड़ौती के शुष्क पतझड़ वन ईंधन, चारा, गोंद व तेंदू पत्ता देते हैं, दक्षिण के सागवान-बांस वन जनजातीय आजीविका का स्तंभ हैं, और आबू के पर्वतीय वन राज्य का अनूठा पारिस्थितिक द्वीप हैं। ISFR के अनुसार लगभग 5% वनावरण बताता है कि लक्ष्य (राज्य नीति में 20%, राष्ट्रीय नीति में 33%) अभी बहुत दूर है। खेजड़ली और ओरण जैसी सामुदायिक परंपराएँ दिखाती हैं कि राजस्थान में वन-संरक्षण का समाधान जन-भागीदारी से ही निकलेगा। परीक्षा के लिए तीन बातें सबसे महत्वपूर्ण हैं — वनावरण बनाम RFA के प्रतिशत, वनों के तीन प्रकार व उनकी प्रजातियाँ, और सर्वाधिक/न्यूनतम वाले ज़िले व वृक्ष।
वनावरण ~4.9% (ISFR) | RFA ~9.6% | रक्षित > आरक्षित > अवर्गीकृत | धोकड़ा सर्वाधिक | सागवान–बांसवाड़ा | आबू–उपोष्ण | उदयपुर अधिकतम, चूरू न्यूनतम | खेजड़ी-रोहिड़ा 1983 | वन नीति 2010
इस टॉपिक का क्विज़ कहाँ दें?
“राजस्थान की वन संपदा: वनों के प्रकार, ISFR वनावरण व लघु वन उपज — RAS/CET” पढ़ने के बाद इन क्विज़ से तुरंत दोहराएँ — गलत उत्तर वाले बिंदु नोट में दोबारा देखें।
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महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)
भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI), देहरादून की ISFR 2021 व 2023 के अनुसार राजस्थान का वनावरण लगभग 16.5–16.7 हज़ार वर्ग किमी है, जो राज्य के भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 4.8–4.9% है। यह आँकड़ा हर संस्करण में थोड़ा बदलता है।
अभिलिखित वन क्षेत्र (RFA) वह भूमि है जो सरकारी अभिलेखों में वन के रूप में दर्ज है — राजस्थान में लगभग 9.5–9.6%। वनावरण उपग्रह से मापी गई वह भूमि है जिस पर 1 हेक्टेयर या अधिक क्षेत्र में 10% से अधिक वृक्ष-छत्र है — राजस्थान में लगभग 4.8–4.9%।
अभिलिखित वन क्षेत्र में रक्षित वन लगभग 56%, आरक्षित वन लगभग 37% और अवर्गीकृत वन लगभग 7% हैं। अतः सर्वाधिक क्षेत्र रक्षित वनों का है। प्रतिशत वर्ष के अनुसार थोड़ा बदलते हैं।
मुख्यतः तीन — पश्चिम में उष्णकटिबंधीय कांटेदार/मरुस्थलीय वन, अरावली व पूर्वी-दक्षिणी भाग में उष्णकटिबंधीय शुष्क पतझड़ वन (सर्वाधिक) और माउंट आबू में उपोष्ण पर्वतीय वन।
धोकड़ा (Anogeissus pendula) राजस्थान में सर्वाधिक पाया जाने वाला वृक्ष है, जो मुख्यतः अरावली और पूर्वी-दक्षिण-पूर्वी राजस्थान के शुष्क पतझड़ वनों में मिलता है। खेजड़ी राज्य वृक्ष है, सर्वाधिक पाया जाने वाला नहीं।
सागवान के वन दक्षिणी राजस्थान में — बांसवाड़ा (सर्वाधिक), डूंगरपुर, उदयपुर, प्रतापगढ़, चित्तौड़गढ़, बारां व झालावाड़ में मिलते हैं, जहाँ वर्षा लगभग 75–110 सेमी होती है।
ISFR 2021 आधारित परीक्षा-पुस्तकों के अनुसार वनावरण क्षेत्रफल में उदयपुर सर्वाधिक और चूरू न्यूनतम है। प्रतिशत के आधार पर न्यूनतम ज़िला स्रोत अनुसार जोधपुर या चूरू बताया जाता है; ज़िला पुनर्गठन के बाद क्रम बदल सकता है।
तेंदू पत्ता (बीड़ी), खैर से कत्था, कुमट-खेजड़ी-बबूल-धोकड़ा का गोंद, बांस, महुआ के फूल व बीज, खस घास (इत्र), आंवल की छाल (चमड़ा पकाने में) आदि राजस्थान की प्रमुख लघु वन उपज हैं।
राजस्थान की पहली राज्य वन नीति 2010 में आई, जिसमें दीर्घकाल में राज्य के 20% क्षेत्र को वन/वृक्षावरण में लाने का लक्ष्य रखा गया। 2023 में नई नीति को स्वीकृति की सूचनाएँ आईं, जिसकी स्थिति आधिकारिक स्रोत से जाँचनी चाहिए।
यह केंद्र सरकार की परियोजना है, जिसकी घोषणा 2023 में हुई और औपचारिक शुरुआत 2025 में। इसके तहत गुजरात, राजस्थान, हरियाणा व दिल्ली में अरावली के चारों ओर लगभग 5 किमी चौड़ी हरित पट्टी विकसित कर क्षरित भूमि का पुनर्स्थापन और मरुस्थल के प्रसार को रोकना लक्ष्य है।
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