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विश्नोई सम्प्रदाय : गुरु जांभोजी, 29 नियम, खेजड़ली बलिदान एवं पर्यावरण संरक्षण

Sudhir Dhaka (इतिहास विशेषज्ञ)
16 अगस्त 2026
7 मिनट पठन
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विश्नोई सम्प्रदाय : गुरु जांभोजी, 29 नियम, खेजड़ली बलिदान एवं पर्यावरण संरक्षण

Quick Answer Box

विश्नोई सम्प्रदाय राजस्थान का एक प्रमुख धार्मिक-सामाजिक एवं पर्यावरण संरक्षण केंद्रित सम्प्रदाय है, जिसकी स्थापना गुरु जांभोजी (जंभेश्वर) ने की थी। गुरु जांभोजी ने 1482 ई. में राजस्थान के सम्भराथल में विश्नोई पंथ का प्रवर्तन किया और अनुयायियों के लिए 29 नियमों की आचार-संहिता निर्धारित की।

विश्नोई शब्द को सामान्यतः 'बीस + नौ' अर्थात 20 + 9 = 29 से जोड़ा जाता है। इस सम्प्रदाय की मूल भावना जीव-दया, अहिंसा, पर्यावरण संरक्षण, वृक्षों की रक्षा, स्वच्छता, सदाचार तथा सामाजिक समरसता है।

विश्नोई इतिहास की सबसे प्रसिद्ध घटना 1730 ई. का खेजड़ली बलिदान है, जब अमृता देवी के नेतृत्व में विश्नोई समुदाय के लोगों ने खेजड़ी वृक्षों की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया। राजस्थान सरकार के सांस्कृतिक स्रोत के अनुसार इस घटना में अमृता देवी और उनकी तीन पुत्रियों सहित समुदाय के अनेक लोगों ने वृक्षों की रक्षा के लिए बलिदान दिया।

परीक्षा के लिए याद रखें:
जांभोजी → सम्भराथल → 1482 ई. → 29 नियम → जीव-दया/पर्यावरण संरक्षण → खेजड़ली → 1730 ई. → अमृता देवी

1. विश्नोई सम्प्रदाय का परिचय

राजस्थान की धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपरा में संतों और सम्प्रदायों का विशेष स्थान है। मध्यकालीन राजस्थान में अनेक संतों ने धार्मिक आडंबरों, सामाजिक कुरीतियों और हिंसा का विरोध करते हुए मानवता, नैतिकता तथा ईश्वर-भक्ति का संदेश दिया। इसी परंपरा में गुरु जांभोजी द्वारा स्थापित विश्नोई सम्प्रदाय का विशेष महत्व है।

विश्नोई सम्प्रदाय की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें धर्म और पर्यावरण संरक्षण को अलग-अलग नहीं माना गया। वृक्ष, वन्यजीव, जल, स्वच्छता और जीव-जगत की रक्षा को धार्मिक आचरण का हिस्सा बनाया गया।

गुरु जांभोजी के उपदेशों में मनुष्य और प्रकृति के बीच संतुलन पर विशेष बल मिलता है। उनके 29 नियमों में धार्मिक आचरण के साथ-साथ पशु-पक्षियों की रक्षा, हरे वृक्षों को न काटना, स्वच्छता, नशामुक्ति तथा अहिंसा जैसे व्यावहारिक सिद्धांत शामिल हैं। राजस्थान सरकार के स्रोत भी जांभोजी को पर्यावरण संरक्षण का प्रणेता तथा अहिंसा का समर्थक बताते हैं।

2. गुरु जांभोजी : जीवन परिचय

विश्नोई सम्प्रदाय के संस्थापक गुरु जांभोजी, जिन्हें जंभेश्वर जी के नाम से भी जाना जाता है, राजस्थान के प्रमुख संत, समाज सुधारक और पर्यावरण संरक्षण के अग्रदूत माने जाते हैं।

उनका जन्म 1451 ई. में नागौर क्षेत्र के पीपासर गांव में हुआ माना जाता है। राजस्थान के उच्च शिक्षा विभाग के एक प्रकाशित अध्ययन में उनका जन्म 1451 ई. में पीपासर में होना बताया गया है।

उनके पिता का नाम लोहटजी पंवार और माता का नाम हांसा देवी बताया जाता है।

जांभोजी का प्रारंभिक जीवन राजस्थान के ग्रामीण एवं पशुपालक परिवेश से जुड़ा रहा। प्रकृति और पशुओं के साथ उनका निकट संबंध उनके विचारों के विकास में महत्वपूर्ण माना जाता है।

उन्होंने समाज में प्रचलित अनेक कुरीतियों, धार्मिक आडंबरों, हिंसा तथा अनैतिक व्यवहार का विरोध किया और सरल जीवन, शुद्ध आचरण तथा ईश्वर-भक्ति पर बल दिया।

जांभोजी की प्रमुख विशेषताएँ

विशेषताविवरण
नामगुरु जांभोजी / जंभेश्वर
जन्म1451 ई.
जन्म स्थानपीपासर, नागौर क्षेत्र
पितालोहटजी पंवार
माताहांसा देवी
प्रमुख कार्यक्षेत्रसम्भराथल एवं राजस्थान का मरुक्षेत्र
सम्प्रदायविश्नोई सम्प्रदाय
पंथ का प्रवर्तन1482 ई.
प्रमुख सिद्धांत29 नियम
प्रमुख संदेशजीव-दया, अहिंसा एवं पर्यावरण संरक्षण
प्रमुख ग्रंथ/वाणीसबदवाणी/जम्भवाणी
निर्वाण1536 ई., लालासर
समाधि/प्रमुख तीर्थमुकाम

जांभोजी का निर्वाण वि.सं. 1593 (1536 ई.) में लालासर में हुआ। बाद में उनके पार्थिव शरीर को तालवा ले जाकर समाधिस्थ किया गया और वर्तमान में यह स्थान मुकाम के नाम से प्रसिद्ध है।

3. विश्नोई सम्प्रदाय की स्थापना

गुरु जांभोजी ने अपने धार्मिक एवं सामाजिक विचारों को व्यवस्थित रूप देने के लिए एक आचार-संहिता बनाई। कार्तिक बदी अष्टमी, वि.सं. 1542 (1482 ई.) को सम्भराथल में विश्नोई पंथ का प्रवर्तन किया गया। राजस्थान सरकार के कला एवं संस्कृति स्रोत में यही तिथि दी गई है।

सम्भराथल का महत्व

सम्भराथल विश्नोई सम्प्रदाय के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। यहीं गुरु जांभोजी ने अपने उपदेशों को संगठित रूप दिया और अनुयायियों के लिए 29 नियमों की आचार-संहिता निर्धारित की।

प्रारंभ में विभिन्न सामाजिक समूहों के लोगों ने इस पंथ को स्वीकार किया। इससे स्पष्ट होता है कि विश्नोई सम्प्रदाय केवल किसी एक जाति तक सीमित धार्मिक आंदोलन नहीं था, बल्कि इसका आधार आचार, नैतिकता और जीव-दया था।

4. 'विश्नोई' शब्द का अर्थ

विश्नोई सम्प्रदाय का नाम इसकी 29 आचार-संहिता से जोड़ा जाता है।

बीस + नौ = विश्नोई/बिश्नोई

अर्थात् 20 + 9 = 29

इन 29 नियमों में धार्मिक अनुशासन के साथ-साथ सामाजिक एवं पर्यावरणीय दायित्वों को शामिल किया गया है।

इसी कारण विश्नोई सम्प्रदाय को राजस्थान की उन धार्मिक परंपराओं में विशेष स्थान प्राप्त है जिनमें पर्यावरण संरक्षण को धार्मिक कर्तव्य का रूप दिया गया।

5. विश्नोई सम्प्रदाय के 29 नियम

गुरु जांभोजी ने अनुयायियों के जीवन को व्यवस्थित करने के लिए 29 नियम निर्धारित किए। विभिन्न स्रोतों में इनके शब्दांकन में मामूली अंतर मिल सकता है, लेकिन इनका मूल भाव धार्मिक अनुशासन, स्वच्छता, अहिंसा, जीव-दया और प्रकृति संरक्षण है।

राजस्थान सरकार के स्रोत में इन नियमों में प्रसूता स्त्री के लिए विश्राम, रजस्वला स्त्री के लिए पृथकता, स्नान, शील, संतोष, पवित्रता, संध्या-वंदना, आरती, हवन तथा पानी, ईंधन और दूध को छानकर उपयोग करने जैसे नियमों का उल्लेख है। इसी सूची में तंबाकू, मांस और मदिरा से परहेज तथा नीले वस्त्र के प्रयोग से बचने का भी उल्लेख मिलता है।

29 नियम : परीक्षा उपयोगी रूप में

क्रमनियम/आचरणमुख्य भाव
1प्रसूता स्त्री को 30 दिन तक घरेलू कार्य से विश्राममातृ एवं शिशु स्वास्थ्य
2रजस्वला स्त्री को 5 दिन गृहकार्य से पृथक रखनाशारीरिक स्वच्छता
3प्रतिदिन प्रातः स्नान करनास्वच्छता
4शीलव्रत/मर्यादा का पालनसदाचार
5संतोष धारण करनामानसिक अनुशासन
6बाहरी एवं आंतरिक पवित्रताशारीरिक व मानसिक शुद्धता
7प्रातः एवं सायं संध्या-वंदनाधार्मिक अनुशासन
8आरती एवं हरिगुण-गानईश्वर-भक्ति
9सर्वहित के लिए हवनलोककल्याण
10पानी, ईंधन एवं दूध छानकर उपयोगजीव-सुरक्षा
11क्षमा एवं सहनशीलतानैतिकता
12दया एवं करुणाजीव-दया
13चोरी से बचनासामाजिक नैतिकता
14निंदा से बचनासद्व्यवहार
15झूठ से बचनासत्यनिष्ठा
16विवाद एवं अनावश्यक संघर्ष से बचनासामाजिक शांति
17ईश्वर-भक्तिआध्यात्मिक अनुशासन
18जीवों के प्रति दयाअहिंसा
19पशुओं की रक्षाजैव संरक्षण
20हरे वृक्षों की रक्षावन संरक्षण
21वन्यजीवों की रक्षाजैव विविधता संरक्षण
22बैल आदि उपयोगी पशुओं को अनावश्यक रूप से नष्ट न करनापशु संरक्षण
23नशीले पदार्थों से दूरीनशामुक्ति
24तंबाकू का त्यागस्वास्थ्य एवं अनुशासन
25अफीम आदि नशीले पदार्थों से बचनानशामुक्ति
26सामाजिक एवं धार्मिक शुचितासदाचार
27जीव हत्या से बचनाअहिंसा
28मांस एवं मदिरा का सेवन न करनाशाकाहार एवं संयम
29नीले वस्त्र का प्रयोग न करनापर्यावरणीय/परंपरागत अनुशासन

नोट: 29 नियमों की विस्तृत शब्दावली अलग-अलग परंपरागत एवं आधुनिक स्रोतों में थोड़े भिन्न रूप में प्रस्तुत हो सकती है। परीक्षा में मूल अवधारणाओं—जीव-दया, अहिंसा, स्वच्छता, नशामुक्ति, हरे वृक्षों की रक्षा और धार्मिक अनुशासन—पर विशेष ध्यान दें।

6. विश्नोई सम्प्रदाय के प्रमुख सिद्धांत

6.1 जीव-दया

विश्नोई दर्शन का सबसे महत्वपूर्ण आधार जीव-दया है।

गुरु जांभोजी के अनुसार मनुष्य केवल अपने जीवन और सुविधा के लिए प्रकृति का उपयोग नहीं कर सकता। पशु-पक्षियों और अन्य जीवों के प्रति करुणा रखना आवश्यक है।

यही कारण है कि विश्नोई समुदाय में वन्यजीव संरक्षण की मजबूत परंपरा विकसित हुई।

6.2 अहिंसा

अहिंसा विश्नोई जीवन-दर्शन का महत्वपूर्ण आधार है।

वन्यजीवों की हत्या, अनावश्यक हिंसा तथा प्रकृति के विनाश का विरोध किया जाता है।

राजस्थान के सरकारी स्रोत जांभोजी को अहिंसा का प्रबल समर्थक बताते हैं।

6.3 वृक्ष संरक्षण

विश्नोई समुदाय की पहचान वृक्ष संरक्षण से गहराई से जुड़ी हुई है।

विशेष रूप से खेजड़ी वृक्ष मरुस्थलीय राजस्थान में अत्यंत महत्वपूर्ण है। खेजड़ी कम पानी वाले वातावरण में भी जीवित रहती है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था तथा पारिस्थितिकी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

विश्नोई समुदाय ने इसे केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं बल्कि संरक्षण योग्य जीवित धरोहर के रूप में देखा।

6.4 वन्यजीव संरक्षण

विश्नोई समुदाय वन्यजीवों के प्रति अत्यंत संवेदनशील रहा है।

राजस्थान के जिला गजेटियर के अनुसार विश्नोई समुदाय शाकाहारी होने तथा वन्यजीवों के शिकार का समर्थन न करने के लिए जाना जाता है।

आज भी राजस्थान में विश्नोई क्षेत्रों को वन्यजीवों के अपेक्षाकृत सुरक्षित आवास के रूप में देखा जाता है।

7. खेजड़ली बलिदान : विश्नोई इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटना

राजस्थान के इतिहास में खेजड़ली बलिदान पर्यावरण संरक्षण की सबसे प्रसिद्ध घटनाओं में से एक है।

वर्ष — 1730 ई.

जोधपुर क्षेत्र के खेजड़ली गांव में खेजड़ी वृक्षों को काटने का प्रयास किया गया। विश्नोई समुदाय ने इसका विरोध किया।

इस आंदोलन का नेतृत्व अमृता देवी विश्नोई ने किया।

उन्होंने वृक्षों को बचाने के लिए उन्हें अपने शरीर से आलिंगन कर लिया और वृक्षों की रक्षा करते हुए बलिदान दिया। उनके साथ उनकी तीन पुत्रियों ने भी बलिदान दिया। राजस्थान सरकार के सांस्कृतिक प्रकाशन के अनुसार 1730 ई. में खेजड़ली गांव में अमृता देवी और उनकी तीन पुत्रियों सहित विश्नोई समुदाय के अनेक लोगों ने खेजड़ी वृक्षों की रक्षा के लिए प्राण न्यौछावर किए।

यह घटना इस बात का उदाहरण बन गई कि विश्नोई समुदाय के लिए पर्यावरण संरक्षण केवल विचार नहीं बल्कि जीवन-मरण का धार्मिक कर्तव्य था।

खेजड़ली बलिदान का महत्व

  1. वृक्ष संरक्षण की ऐतिहासिक मिसाल।

  2. विश्नोई समुदाय की पर्यावरणीय चेतना का प्रतीक।

  3. अहिंसा एवं प्रकृति-प्रेम का उदाहरण।

  4. आधुनिक पर्यावरण आंदोलनों के लिए प्रेरणा।

  5. राजस्थान की लोक-स्मृति में महत्वपूर्ण स्थान।

8. अमृता देवी विश्नोई

अमृता देवी विश्नोई खेजड़ली बलिदान की सबसे प्रसिद्ध व्यक्तित्व हैं।

उनका नाम भारत के पर्यावरण संरक्षण इतिहास में विशेष सम्मान से लिया जाता है।

उनके साथ उनकी तीन पुत्रियों—आसु, रत्नी और भागू—के बलिदान का भी उल्लेख मिलता है। खेजड़ी वृक्षों को बचाने के लिए दिया गया यह बलिदान विश्नोई समुदाय की धार्मिक प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

खेजड़ली की घटना बाद में पर्यावरण संरक्षण के आंदोलनों के लिए प्रेरणास्रोत बनी। राजस्थान सरकार के एक प्रकाशन में इसे 1970 के दशक के चिपको आंदोलन की प्रेरणा से भी जोड़ा गया है।

9. विश्नोई सम्प्रदाय और पर्यावरण संरक्षण

विश्नोई दर्शन आधुनिक पर्यावरण विज्ञान की भाषा में भले ही प्रस्तुत नहीं हुआ था, लेकिन इसमें कई ऐसे सिद्धांत मिलते हैं जो आज के सतत विकास और जैव विविधता संरक्षण की अवधारणाओं से मेल खाते हैं।

प्रमुख पर्यावरणीय विचार

जल संरक्षण
जल को छानकर उपयोग करने का नियम छोटे जीवों की रक्षा के साथ-साथ जल के प्रति सावधानी का संदेश देता है।

वन संरक्षण
हरे वृक्षों को काटने का विरोध वृक्षों के संरक्षण को धार्मिक कर्तव्य बनाता है।

वन्यजीव संरक्षण
जीव-दया के सिद्धांत के कारण पशु-पक्षियों की रक्षा विश्नोई जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनती है।

शाकाहार
मांस का त्याग जीव-दया और अहिंसा से जुड़ा हुआ है।

नशामुक्ति
तंबाकू और अन्य नशीले पदार्थों से दूर रहने की शिक्षा अनुशासित जीवन पर बल देती है।

10. विश्नोई सम्प्रदाय के प्रमुख धार्मिक एवं साहित्यिक स्थल

मुकाम

मुकाम विश्नोई सम्प्रदाय का प्रमुख तीर्थ स्थल है। गुरु जांभोजी के निर्वाण के बाद उनकी समाधि यहीं स्थापित की गई।

राजस्थान के सरकारी स्रोत के अनुसार मुकाम को जांभोजी के निर्वाण स्थल के रूप में जाना जाता है।

यह स्थान विश्नोई समुदाय के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण धार्मिक केंद्र है।

जाम्भोलाव धाम

जाम्भोलाव धाम, जांबा गांव, राजस्थान में स्थित है और गुरु जंभेश्वर से संबंधित प्रमुख तीर्थ स्थलों में से एक है। राजस्थान पर्यटन विभाग के अनुसार जांबा गांव में श्री जंभेश्वर मंदिर और जंभ सरोवर प्रमुख दर्शनीय स्थल हैं।

सम्भराथल

सम्भराथल विश्नोई पंथ के प्रवर्तन से जुड़ा प्रमुख स्थल है। यहीं गुरु जांभोजी ने पंथ को संगठित स्वरूप दिया।

11. जांभोजी की वाणी : सबदवाणी

गुरु जांभोजी के उपदेशों का संग्रह सबदवाणी, जम्भवाणी अथवा सबद श्री वायक नामों से जाना जाता है।

राजस्थान सरकार के कला एवं संस्कृति स्रोत में सबदवाणी में 123 सबद एवं कुछ मंत्र होने का उल्लेख मिलता है।

एक अन्य राजस्थान उच्च शिक्षा विभागीय अध्ययन में जांभोजी की वाणी को शबदवाणी/जम्भवाणी के रूप में वर्णित किया गया है तथा इसे सरल राजस्थानी/मरुभाषा में रचित बताया गया है।

वाणी की प्रमुख विशेषताएँ

  • सरल भाषा

  • लोकजीवन से जुड़ी अभिव्यक्ति

  • नैतिक शिक्षा

  • ईश्वर-भक्ति

  • जीव-दया

  • पर्यावरण संरक्षण

  • सामाजिक सदाचार

  • आडंबर-विरोध

इस प्रकार जांभोजी की वाणी धार्मिक उपदेशों के साथ-साथ सामाजिक एवं पर्यावरणीय चेतना का भी माध्यम थी।

12. गुरु जांभोजी का सामाजिक सुधार

जांभोजी केवल धार्मिक गुरु नहीं थे, बल्कि समाज सुधारक भी थे।

उन्होंने व्यक्ति के मूल्यांकन में जन्म से अधिक कर्म और आचरण को महत्व दिया। राजस्थान सरकार के स्रोत में भी उनके उपदेशों में उत्तम कर्म को श्रेष्ठता का आधार माना गया है।

सामाजिक सुधार के प्रमुख पक्ष

  • जातिगत भेदभाव को कम करना

  • नैतिक जीवन पर बल

  • धार्मिक आडंबरों का विरोध

  • नशे से दूरी

  • शाकाहार

  • जीव-दया

  • स्वच्छता

  • सामाजिक सद्भाव

  • प्रकृति संरक्षण

इस दृष्टि से विश्नोई सम्प्रदाय को केवल धार्मिक पंथ न मानकर सामाजिक-नैतिक एवं पर्यावरणीय आंदोलन के रूप में भी समझा जा सकता है।

13. विश्नोई सम्प्रदाय और राजस्थान की संस्कृति

राजस्थान का भौगोलिक वातावरण मरुस्थलीय है। यहां पानी, हरियाली और चारे की उपलब्धता सीमित रही है। ऐसे वातावरण में प्रकृति के प्रति संवेदनशील जीवन-पद्धति का विकास स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण था।

विश्नोई समुदाय ने इस आवश्यकता को धार्मिक आस्था से जोड़ दिया।

इसलिए राजस्थान की संस्कृति में विश्नोई सम्प्रदाय की पहचान निम्न आधारों से की जाती है:

धर्म + प्रकृति + जीव-दया + वृक्ष संरक्षण + सामाजिक अनुशासन

यही विश्नोई परंपरा की विशिष्टता है।

14. विश्नोई सम्प्रदाय : महत्वपूर्ण घटनाओं की Timeline
वर्ष/कालघटना
1451 ई.गुरु जांभोजी का जन्म पीपासर में
1482 ई.सम्भराथल में विश्नोई पंथ का प्रवर्तन
1482 ई. के बाद29 नियमों की आचार-संहिता का प्रसार
16वीं शताब्दीजांभोजी की वाणी और उपदेशों का व्यापक प्रसार
1536 ई.लालासर में गुरु जांभोजी का निर्वाण
1730 ई.खेजड़ली में वृक्षों की रक्षा के लिए विश्नोई बलिदान
आधुनिक कालविश्नोई समुदाय पर्यावरण एवं वन्यजीव संरक्षण की परंपरा का प्रमुख प्रतीक बना
15. परीक्षा में पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण तथ्य
प्रश्नउत्तर
विश्नोई सम्प्रदाय के संस्थापक कौन थे?गुरु जांभोजी
जांभोजी का दूसरा प्रसिद्ध नाम क्या है?जंभेश्वर
जांभोजी का जन्म कहाँ हुआ?पीपासर
जांभोजी का जन्म कब हुआ?1451 ई.
विश्नोई पंथ का प्रवर्तन कब हुआ?1482 ई.
पंथ का प्रवर्तन कहाँ हुआ?सम्भराथल
विश्नोई सम्प्रदाय के कितने नियम हैं?29
विश्नोई शब्द किससे संबंधित माना जाता है?बीस + नौ
विश्नोई सम्प्रदाय का प्रमुख सिद्धांत क्या है?जीव-दया एवं पर्यावरण संरक्षण
खेजड़ली बलिदान कब हुआ?1730 ई.
खेजड़ली बलिदान से कौन प्रमुख रूप से जुड़ी हैं?अमृता देवी विश्नोई
खेजड़ली में किस वृक्ष की रक्षा की गई?खेजड़ी
जांभोजी की वाणी किस नाम से प्रसिद्ध है?सबदवाणी/जम्भवाणी
जांभोजी का निर्वाण कहाँ हुआ?लालासर
जांभोजी की समाधि का प्रमुख स्थल कौन-सा है?मुकाम
जाम्भोलाव धाम कहाँ है?जांबा गांव
विश्नोई समुदाय किस प्रकार के आहार के लिए प्रसिद्ध है?शाकाहारी
विश्नोई परंपरा में किस प्रकार के वृक्षों की रक्षा पर जोर है?हरे वृक्षों की
विश्नोई समुदाय किसके संरक्षण के लिए प्रसिद्ध है?वन्यजीव एवं वृक्ष
16. Syllabus Weight : राजस्थान परीक्षाओं में महत्व

राजस्थान की विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में राजस्थान का इतिहास एवं संस्कृति, संत-सम्प्रदाय, धार्मिक परंपराएँ, लोक परंपराएँ, पर्यावरण एवं सामाजिक-सांस्कृतिक व्यक्तित्व महत्वपूर्ण विषय हैं।

राजस्थान कर्मचारी चयन बोर्ड के एक आधिकारिक पाठ्यक्रम में राजस्थान के इतिहास एवं संस्कृति के अंतर्गत धार्मिक विश्वास, लोक परंपरा, संत, कवि, वीर पुरुष, लोक देवता एवं लोक देवियों को स्पष्ट रूप से शामिल किया गया है।

इसलिए विश्नोई सम्प्रदाय को निम्न परीक्षाओं के लिए विशेष रूप से तैयार किया जाना चाहिए:

  • RPSC

  • राजस्थान CET

  • RSSB/RSMSSB

  • शिक्षक भर्ती परीक्षाएँ

  • राजस्थान पुलिस

  • पटवारी

  • ग्राम विकास अधिकारी

  • LDC

  • राजस्थान सामान्य ज्ञान आधारित परीक्षाएँ

High Priority Topics

★★★★★ अत्यंत महत्वपूर्ण

  • गुरु जांभोजी

  • 29 नियम

  • 1482 ई.

  • सम्भराथल

  • खेजड़ली बलिदान

  • 1730 ई.

  • अमृता देवी

  • खेजड़ी संरक्षण

  • जीव-दया

  • पर्यावरण संरक्षण

★★★★ महत्वपूर्ण

  • पीपासर

  • मुकाम

  • जाम्भोलाव धाम

  • सबदवाणी

  • जांभोजी का निर्वाण

17. Exam Trap : परीक्षा में होने वाली सामान्य गलतियाँ

Trap 1 — 1482 और 1730 को न मिलाएँ

1482 ई. = विश्नोई पंथ का प्रवर्तन
1730 ई. = खेजड़ली बलिदान

यह सबसे महत्वपूर्ण अंतर है।

Trap 2 — संस्थापक और बलिदान से जुड़े व्यक्ति

गुरु जांभोजी = सम्प्रदाय के संस्थापक
अमृता देवी = खेजड़ली बलिदान की प्रमुख महिला

Trap 3 — सम्भराथल और मुकाम

सम्भराथल = विश्नोई पंथ के प्रवर्तन से संबंधित
मुकाम = जांभोजी की समाधि/प्रमुख तीर्थ

Trap 4 — खेजड़ली में किस वृक्ष की रक्षा?

उत्तर है — खेजड़ी

Trap 5 — 29 नियमों का अर्थ

विश्नोई नाम को सामान्यतः बीस + नौ = 29 से जोड़ा जाता है।

Trap 6 — विश्नोई सम्प्रदाय को केवल धार्मिक सम्प्रदाय न समझें

परीक्षा में इसे धार्मिक + सामाजिक + पर्यावरणीय परंपरा के रूप में समझना अधिक उपयोगी है।

18. एक लाइन में पूरा विश्नोई सम्प्रदाय

“गुरु जांभोजी ने 1482 ई. में सम्भराथल से 29 नियमों पर आधारित विश्नोई सम्प्रदाय का प्रवर्तन किया, जिसका मूल आधार जीव-दया, अहिंसा, सदाचार एवं पर्यावरण संरक्षण है; 1730 ई. का खेजड़ली बलिदान इसकी पर्यावरणीय चेतना का सर्वोच्च उदाहरण है।”

19. Related Notes

Suyog Academy पर राजस्थान कला एवं संस्कृति की तैयारी करते समय विश्नोई सम्प्रदाय को निम्न संबंधित विषयों के साथ पढ़ना उपयोगी रहेगा:

  • संत दादूदयाल

  • दादू पंथ

  • मीरा बाई

  • रामस्नेही सम्प्रदाय

  • गुरु जांभोजी

  • राजस्थान के संत एवं सम्प्रदाय

  • खेजड़ली बलिदान

  • राजस्थान की लोक परंपराएँ

  • राजस्थान के धार्मिक सम्प्रदाय

  • राजस्थान के पर्यावरण एवं वन्यजीव

20. Quick Revision Notes

गुरु जांभोजी

जन्म — 1451 ई., पीपासर

विश्नोई पंथ का प्रवर्तन — 1482 ई.

स्थान — सम्भराथल

29 नियम

जीव-दया + अहिंसा + वृक्ष संरक्षण + वन्यजीव संरक्षण

गुरु जांभोजी का निर्वाण — 1536 ई., लालासर

प्रमुख समाधि स्थल — मुकाम

खेजड़ली बलिदान — 1730 ई.

अमृता देवी विश्नोई

खेजड़ी वृक्ष संरक्षण

पर्यावरण संरक्षण की ऐतिहासिक परंपरा

निष्कर्ष

विश्नोई सम्प्रदाय राजस्थान की ऐसी विशिष्ट धार्मिक-सामाजिक परंपरा है जिसमें धर्म, नैतिकता और पर्यावरण संरक्षण एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। गुरु जांभोजी ने 15वीं शताब्दी में 29 नियमों के माध्यम से अनुयायियों को ऐसा जीवन जीने की प्रेरणा दी जिसमें मनुष्य के साथ-साथ पशु, पक्षी, वृक्ष और संपूर्ण प्राकृतिक संसार के प्रति जिम्मेदारी को महत्व दिया गया।

1482 ई. का सम्भराथल, 29 नियम, सबदवाणी, मुकाम, जाम्भोलाव धाम, 1730 ई. का खेजड़ली बलिदान, अमृता देवी और खेजड़ी वृक्ष—ये सभी विश्नोई सम्प्रदाय के अध्ययन के केंद्रीय बिंदु हैं।

विश्नोई परंपरा की सबसे बड़ी ऐतिहासिक उपलब्धि यह है कि इसने पर्यावरण संरक्षण को केवल प्रशासनिक या आर्थिक विषय न मानकर धार्मिक और नैतिक कर्तव्य का रूप दिया। इसी कारण राजस्थान के इतिहास और संस्कृति में विश्नोई सम्प्रदाय का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है।

स्रोत-आधारित तथ्य

इस लेख में जांभोजी के जीवन, 1482 ई. में सम्भराथल में पंथ प्रवर्तन, 29 नियम, 1536 ई. के निर्वाण और मुकाम, तथा खेजड़ली बलिदान से संबंधित तथ्यों के लिए राजस्थान सरकार के कला एवं संस्कृति, पर्यटन तथा उच्च शिक्षा विभाग के उपलब्ध स्रोतों का संदर्भ लिया गया है।

लेखक: Suyog Academy Team
श्रेणी: राजस्थान इतिहास एवं कला-संस्कृति
परीक्षा उपयोगिता: RPSC | Rajasthan CET | RSSB | Rajasthan Police | Patwari | VDO | Teacher Exams

Related Quiz: विश्नोई सम्प्रदाय पर MCQ अभ्यास के लिए Suyog Academy Quiz सेक्शन देखें।

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लेखक / पब्लिकेशन: Gauri Publication

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4.5(120+ विद्यार्थी समीक्षाएं)

🎯 विगत वर्षों के प्रश्न (Interactive PYQs)

Q1. निम्न में से कौन विश्नोई सम्प्रदाय का संस्थापक/प्रवर्तक था?

द्वितीय श्रेणी अध्यापक परीक्षा 2017

Q2. निम्न में से कौन विश्नोई सम्प्रदाय का संस्थापक/प्रवर्तक था?

महिला पर्यवेक्षक परीक्षा 2019

Q3. निम्न में से कौन विश्नोई सम्प्रदाय का संस्थापक/प्रवर्तक था?

LDC परीक्षा 2018

Q4. निम्न में से कौन विश्नोई सम्प्रदाय का संस्थापक/प्रवर्तक था?

REET Level-II 2022

Q5. विश्नोई सम्प्रदाय के प्रवर्तक कौन थे?

REET Level-II सामाजिक अध्ययन 2022

Q6. राजस्थान का कौन-सा समुदाय वन्यजीव संरक्षण एवं सुरक्षा के लिए प्रसिद्ध है?

ACF 2021

Q7. खेजड़ली गाँव, जो खेजड़ी के वृक्षों के संरक्षण हेतु बलिदान देने के लिए प्रसिद्ध है, राजस्थान के किस जिले से संबंधित है?

ACF 2021

Q8. राजस्थान के कौन से प्रसिद्ध संत बीकानेर में कतरियासर से संबंधित हैं?

संगणक परीक्षा 2018

Q9. राजस्थान के कौन से प्रसिद्ध संत बीकानेर में कतरियासर से संबंधित हैं?

वनरक्षक 2022

Q10. राजस्थान के कौन से प्रसिद्ध संत बीकानेर में कतरियासर से संबंधित हैं?

Lab Assistant Home Science 2022

Q11. विश्नोई सम्प्रदाय के प्रवर्तक कौन थे?

REET Level-II सामाजिक अध्ययन 2022

Q12. बिश्नोई सम्प्रदाय के प्रवर्तक कौन थे?

Junior Instructor (CLIT) 2024

महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

विश्नोई सम्प्रदाय के संस्थापक एवं प्रवर्तक गुरु जांभोजी (जंभेश्वर जी) थे। उन्होंने 1482 ई. में सम्भराथल में इस पंथ का प्रवर्तन किया।

विश्नोई शब्द को सामान्यतः बीस और नौ अर्थात 20 + 9 = 29 से जोड़ा जाता है। गुरु जांभोजी ने अनुयायियों के लिए 29 नियम निर्धारित किए थे।

29 नियमों में स्वच्छता, सदाचार, संतोष, ईश्वर-भक्ति, जीव-दया, अहिंसा, हरे वृक्षों की रक्षा, वन्यजीव संरक्षण, नशामुक्ति, मांस एवं मदिरा का त्याग तथा सामाजिक अनुशासन जैसे सिद्धांत प्रमुख हैं।

खेजड़ली बलिदान 1730 ई. में जोधपुर क्षेत्र के खेजड़ली गांव में हुआ था। विश्नोई समुदाय के लोगों ने खेजड़ी वृक्षों को बचाने के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया।

अमृता देवी विश्नोई खेजड़ली बलिदान की प्रमुख महिला थीं। उन्होंने खेजड़ी वृक्षों की रक्षा के लिए अपने शरीर से वृक्ष को आलिंगन किया और बलिदान दिया। उनकी तीन पुत्रियों ने भी बलिदान दिया।

विश्नोई सम्प्रदाय में प्रकृति संरक्षण को धार्मिक एवं नैतिक कर्तव्य माना जाता है। जीव-दया, हरे वृक्षों को न काटना, वन्यजीवों की रक्षा और अहिंसा इसके प्रमुख पर्यावरणीय सिद्धांत हैं।

गुरु जांभोजी की शिक्षाओं और उपदेशों का संग्रह सबदवाणी या जम्भवाणी के नाम से प्रसिद्ध है। इसमें धार्मिक, नैतिक, सामाजिक और पर्यावरण संरक्षण संबंधी विचार मिलते हैं।

गुरु जांभोजी का निर्वाण 1536 ई. में लालासर में हुआ था। उनकी समाधि का प्रमुख तीर्थ स्थल मुकाम है, जो विश्नोई सम्प्रदाय का महत्वपूर्ण धार्मिक केंद्र है।

खेजड़ी वृक्ष को विश्नोई परंपरा में विशेष महत्व प्राप्त है। खेजड़ली बलिदान इसी वृक्ष की रक्षा के लिए दिया गया था। खेजड़ी राजस्थान के मरुस्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

विश्नोई सम्प्रदाय के प्रमुख सिद्धांतों में जीव-दया, अहिंसा, पर्यावरण संरक्षण, वन्यजीवों की रक्षा, हरे वृक्षों का संरक्षण, स्वच्छता, सदाचार, शाकाहार और नशामुक्त जीवन शामिल हैं।

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