1857 की क्रांति — कारण, केंद्र-नेता-अंग्रेज़ अधिकारी, असफलता और 1858 के परिणाम — UPSC/RAS
कैसे बना: यह नोट सुयोग अकादमी के लेखक ने परीक्षा सिलेबस के अनुसार लिखा/संपादित किया है। प्रकाशन तिथि ऊपर और अंतिम संशोधन तिथि लेख के अंत में दी गई है। त्रुटि दिखे तो संपर्क करें। टीम परिचय
स्रोत आधार: UPSC CSE प्रारंभिक, RPSC RAS व SSC पाठ्यक्रम की भारतीय इतिहास इकाई; NCERT इतिहास पाठ्यपुस्तकें (कक्षा 6–12) व भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के तथ्य। शब्दशः पुस्तक पाठ नहीं।
सुयोग AI गुरु
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संक्षिप्त उत्तर: 1857 की क्रांति ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन के विरुद्ध सबसे बड़ा सशस्त्र विद्रोह था, जिसके समय गवर्नर-जनरल लॉर्ड कैनिंग थे। इसके कारण चार समूहों में पढ़े जाते हैं — राजनीतिक (डलहौज़ी का व्यपगत सिद्धांत और 1856 में अवध का विलय), आर्थिक (भारी भू-राजस्व, हस्तशिल्प का पतन), सामाजिक-धार्मिक (धर्मांतरण का भय, सुधार कानूनों पर संदेह) और सैन्य (भेदभाव, विदेश सेवा का दबाव)। तात्कालिक कारण एनफील्ड राइफल के चर्बी वाले कारतूस थे। 29 मार्च 1857 को बैरकपुर में मंगल पांडे ने अंग्रेज़ अधिकारियों पर हमला किया और 10 मई 1857 को मेरठ से विद्रोह का व्यापक आरंभ हुआ; सैनिक दिल्ली पहुँचे और बहादुर शाह ज़फ़र को सम्राट घोषित किया। प्रमुख केंद्र — दिल्ली, कानपुर (नाना साहेब, तात्या टोपे), लखनऊ (बेगम हज़रत महल), झाँसी (रानी लक्ष्मीबाई), जगदीशपुर (कुँवर सिंह), बरेली (खान बहादुर खान) और फ़ैज़ाबाद (मौलवी अहमदुल्ला) थे। विद्रोह सीमित क्षेत्र, एकीकृत नेतृत्व व योजना के अभाव और अधिकांश देशी राजाओं के सहयोग न करने से असफल रहा। परिणामस्वरूप भारत शासन अधिनियम 1858 से कंपनी शासन समाप्त हुआ, 1 नवंबर 1858 को इलाहाबाद में महारानी विक्टोरिया की घोषणा पढ़ी गई और कैनिंग पहले वायसराय बने।
संक्षिप्त उत्तर
| तथ्य | उत्तर |
|---|---|
| विद्रोह के समय गवर्नर-जनरल | लॉर्ड कैनिंग (1856–1862; 1858 से वायसराय) |
| तात्कालिक कारण | एनफील्ड राइफल के चर्बी लगे कारतूस (गाय व सूअर की चर्बी की आशंका) |
| पहली प्रमुख घटना | बैरकपुर (बंगाल) — मंगल पांडे, 34वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री, 29 मार्च 1857 |
| मंगल पांडे को फाँसी | 8 अप्रैल 1857 |
| व्यापक विद्रोह का आरंभ | मेरठ, 10 मई 1857 |
| मेरठ के सैनिक दिल्ली पहुँचे | 11 मई 1857 — बहादुर शाह ज़फ़र (बहादुर शाह द्वितीय) को सम्राट घोषित किया |
| व्यपगत सिद्धांत (Doctrine of Lapse) | लॉर्ड डलहौज़ी; पहला शिकार सतारा (1848) |
| अवध का विलय | 1856 — "कुशासन" के आधार पर (व्यपगत सिद्धांत से नहीं); नवाब वाजिद अली शाह |
| दिल्ली पर अंग्रेज़ों का पुनः अधिकार | सितंबर 1857 |
| बहादुर शाह ज़फ़र का निर्वासन | रंगून (बर्मा); वहीं 1862 में मृत्यु |
| कंपनी शासन का अंत | भारत शासन अधिनियम 1858 (Act for the Better Government of India) |
| महारानी की घोषणा | 1 नवंबर 1858, इलाहाबाद दरबार में लॉर्ड कैनिंग द्वारा पढ़ी गई |
| "प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम" नाम | वी.डी. सावरकर — "The Indian War of Independence, 1857" (1909) |
| केंद्र | भारतीय नेता | दमन करने वाले प्रमुख अंग्रेज़ अधिकारी |
|---|---|---|
| दिल्ली | बहादुर शाह ज़फ़र; सैन्य नेतृत्व — बख्त खाँ | जॉन निकोलसन, विलियम हडसन |
| कानपुर | नाना साहेब, तात्या टोपे | हैवलॉक, कॉलिन कैंपबेल |
| लखनऊ | बेगम हज़रत महल | कॉलिन कैंपबेल |
| झाँसी | रानी लक्ष्मीबाई | ह्यूरोज़ (Hugh Rose) |
| जगदीशपुर / आरा (बिहार) | कुँवर सिंह | विंसेंट आयर (आरा की घेराबंदी तोड़ी) |
| बरेली (रुहेलखंड) | खान बहादुर खान | कॉलिन कैंपबेल |
| फ़ैज़ाबाद | मौलवी अहमदुल्ला | — |
| इलाहाबाद व बनारस | मौलवी लियाकत अली (इलाहाबाद) | कर्नल नील |
2. सिलेबस में यह टॉपिक क्यों महत्वपूर्ण है?
1857 की क्रांति आधुनिक भारत के इतिहास का वह मोड़ है जहाँ कंपनी शासन का विस्तार समाप्त होता है और ब्रिटिश ताज का सीधा शासन शुरू होता है। इसलिए यह टॉपिक एक ओर डलहौज़ी की नीतियों (व्यपगत सिद्धांत, अवध विलय) से जुड़ता है और दूसरी ओर 1858 के अधिनियम, वायसराय पद और सेना के पुनर्गठन से। राष्ट्रीय आंदोलन के प्रश्नों में भी "1857 के बाद ब्रिटिश नीति में बदलाव" एक स्थायी कड़ी है।
परीक्षा उपयोगिता: ★★★★★
- UPSC CSE प्रारंभिक — कारणों, स्वरूप पर मतों और 1858 के परिणामों पर कथन-आधारित प्रश्न
- RPSC RAS — अखिल भारतीय संदर्भ के साथ राजस्थान में 1857 (नसीराबाद, नीमच, आउवा, कोटा)
- SSC CGL/CHSL — केंद्र-नेता, नेता-अंग्रेज़ अधिकारी सुमेलन, तिथियाँ
- राजस्थान CET (स्नातक), RPSC व्याख्याता/वरिष्ठ अध्यापक — तथ्यात्मक व कालक्रम प्रश्न
प्रश्न कैसे आते हैं?
- केंद्र–नेता या नेता–अंग्रेज़ अधिकारी का सुमेलन (match the following)
- घटनाओं का कालक्रम — बैरकपुर, मेरठ, दिल्ली, 1858 का अधिनियम, महारानी की घोषणा
- कथन-आधारित — "अवध का विलय व्यपगत सिद्धांत से हुआ" जैसे जाल
- इतिहासकार और उनका मत / पुस्तक
- परिणाम — 1858 के अधिनियम के प्रावधान, सेना पुनर्गठन, देशी रियासतों के प्रति नीति
3. पृष्ठभूमि: 1857 से पहले की स्थिति
प्लासी (1757) से 1856 तक लगभग एक शताब्दी में कंपनी ने युद्ध, सहायक संधि (वेलेज़ली) और व्यपगत सिद्धांत (डलहौज़ी) के सहारे लगभग पूरे भारत पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष नियंत्रण कर लिया था। इस अवधि में किसानों, जनजातियों और स्थानीय शासकों के अनेक विद्रोह हुए, पर वे क्षेत्रीय रहे। 1857 में पहली बार सेना, अपदस्थ शासक, ज़मींदार, किसान और कारीगर — सब एक साथ बड़े क्षेत्र में विद्रोह में उतरे।
| नीति / घटना | किसके काल में | असंतोष क्यों |
|---|---|---|
| सहायक संधि | लॉर्ड वेलेज़ली (1798 से) | देशी राज्यों की स्वतंत्र सेना व विदेश नीति समाप्त |
| व्यपगत सिद्धांत | लॉर्ड डलहौज़ी (1848–1856) | दत्तक पुत्र को उत्तराधिकार न मिलने से राज्य कंपनी में मिले |
| अवध का विलय | डलहौज़ी, 1856 | बंगाल सेना के अधिकांश सिपाही अवध से थे — सीधी चोट |
| पेंशन व उपाधियाँ समाप्त | डलहौज़ी | नाना साहेब (पेशवा बाजीराव द्वितीय के दत्तक पुत्र) की पेंशन बंद |
| मुग़ल सम्राट की स्थिति | डलहौज़ी / कैनिंग | बहादुर शाह के उत्तराधिकारियों से सम्राट की उपाधि व लाल किला छिनने की घोषणा |
4. 1857 की क्रांति के कारण
4.1 राजनीतिक कारण
व्यपगत सिद्धांत (Doctrine of Lapse): जिस आश्रित राज्य के शासक का कोई प्राकृतिक उत्तराधिकारी न हो, वह राज्य कंपनी के अधीन हो जाएगा — दत्तक पुत्र को राज्य का उत्तराधिकार नहीं मिलेगा। डलहौज़ी ने इसे कड़ाई से लागू किया।
| राज्य | विलय का वर्ष | आधार |
|---|---|---|
| सतारा | 1848 | व्यपगत सिद्धांत (पहला राज्य) |
| संबलपुर | 1849 | व्यपगत सिद्धांत |
| उदयपुर (छत्तीसगढ़ क्षेत्र; राजस्थान का मेवाड़ नहीं) | 1852 | व्यपगत सिद्धांत |
| झाँसी | 1853 | व्यपगत सिद्धांत |
| नागपुर | 1854 | व्यपगत सिद्धांत |
| अवध | 1856 | कुशासन का आरोप — व्यपगत सिद्धांत नहीं |
अवध का विलय (1856): नवाब वाजिद अली शाह पर कुशासन का आरोप लगाकर अवध को कंपनी राज्य में मिला लिया गया और नवाब को कलकत्ता भेज दिया गया। इससे अवध के ताल्लुकेदारों की जागीरें छिनीं और बंगाल सेना के उन सिपाहियों में रोष फैला जिनके परिवार अवध में थे। यही कारण है कि अवध (लखनऊ) 1857 का सबसे लंबा और जन-आधारित केंद्र बना।
4.2 आर्थिक कारण
- भारी भू-राजस्व: स्थायी बंदोबस्त, रैयतवाड़ी और महालवाड़ी व्यवस्थाओं में ऊँचा लगान; लगान न चुकाने पर ज़मीन की नीलामी।
- ताल्लुकेदारों व ज़मींदारों की हानि: पुराने भू-स्वामियों की जाँच कर ज़मीनें छीनी गईं (विशेषकर अवध में)।
- हस्तशिल्प का पतन: ब्रिटेन के मशीन-निर्मित कपड़े के आगे भारतीय बुनकर और कारीगर बेरोज़गार हुए।
- दरबारों का अंत: रियासतों के विलय से उन पर आश्रित सैनिक, कलाकार और कर्मचारी आजीविका से वंचित हुए।
- ऊँचे पदों से भारतीयों का बहिष्कार: प्रशासन व सेना के ऊँचे पद लगभग पूरी तरह अंग्रेज़ों के पास।
4.3 सामाजिक-धार्मिक कारण
- ईसाई मिशनरियों की गतिविधियों से धर्मांतरण का भय।
- धार्मिक निर्योग्यता अधिनियम (1850): धर्म बदलने वाले व्यक्ति को पैतृक संपत्ति का अधिकार — रूढ़िवादी वर्ग ने इसे धर्मांतरण को प्रोत्साहन माना।
- सती प्रथा निषेध (1829) और हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम (1856) जैसे सुधारों को रूढ़िवादी वर्ग ने धार्मिक हस्तक्षेप के रूप में देखा (सुधारों का विवरण सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन नोट में)।
- पश्चिमी शिक्षा, रेल और तार को भी कुछ वर्गों ने परंपरागत व्यवस्था के लिए ख़तरा समझा।
4.4 सैन्य कारण
| कारण | विवरण |
|---|---|
| वेतन व पदोन्नति में भेदभाव | भारतीय सिपाही ऊँचे पद तक नहीं पहुँच सकता था; वेतन अंग्रेज़ सैनिक से बहुत कम |
| भत्ता (बट्टा) की समस्या | नए जीते क्षेत्रों में सेवा पर मिलने वाला विदेश भत्ता बंद होने से असंतोष |
| सामान्य सेवा भर्ती अधिनियम (1856) | कैनिंग के समय — नई भर्ती के सिपाही को आवश्यकता पड़ने पर समुद्र पार सेवा करनी होगी; समुद्र-यात्रा को कई सिपाही धर्म-भ्रष्टता मानते थे |
| डाकघर अधिनियम (1854) | सिपाहियों की निःशुल्क डाक सुविधा समाप्त |
| अनुपात | सेना में भारतीय सिपाहियों की संख्या अंग्रेज़ सैनिकों से कई गुना अधिक — विद्रोह का आत्मविश्वास |
| चर्बी वाले कारतूस (तात्कालिक) | नई एनफील्ड राइफल के कारतूस को चलाने से पहले दाँत से काटना पड़ता था; उसमें गाय और सूअर की चर्बी होने की आशंका से हिंदू और मुसलमान दोनों सिपाही भड़के |
विद्रोह से पहले उत्तर भारत के गाँवों में चपातियाँ और सैनिक टुकड़ियों में कमल बाँटे जाने की चर्चाएँ भी मिलती हैं; इनका वास्तविक अर्थ आज तक स्पष्ट नहीं है, इसलिए इन्हें "संगठित योजना का प्रमाण" मानना इतिहासकारों में विवादित है।
5. तात्कालिक घटनाएँ: बैरकपुर से दिल्ली तक
| तिथि | स्थान | घटना |
|---|---|---|
| 29 मार्च 1857 | बैरकपुर (कलकत्ता के पास) | 34वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री के सिपाही मंगल पांडे ने अंग्रेज़ अधिकारियों पर गोली चलाई / हमला किया |
| 8 अप्रैल 1857 | बैरकपुर | मंगल पांडे को फाँसी; बाद में 34वीं रेजिमेंट भंग |
| अप्रैल–मई 1857 | मेरठ | तीसरी देशी घुड़सवार सेना (3rd Light Cavalry) के सिपाहियों ने नए कारतूस लेने से इनकार किया; कोर्ट-मार्शल कर लंबी सज़ा दी गई |
| 10 मई 1857 | मेरठ | सिपाहियों ने विद्रोह कर बंदी साथियों को छुड़ाया, अंग्रेज़ अधिकारियों को मारा और दिल्ली की ओर कूच किया |
| 11 मई 1857 | दिल्ली | सिपाहियों ने लाल किले पहुँचकर वृद्ध बहादुर शाह ज़फ़र को "हिंदुस्तान का सम्राट" घोषित किया |
ध्यान दें: मंगल पांडे की घटना पहली प्रमुख घटना है, पर विद्रोह का व्यापक और औपचारिक आरंभ 10 मई 1857 (मेरठ) से माना जाता है। परीक्षा में "1857 का विद्रोह कहाँ से शुरू हुआ" पूछा जाए तो सामान्यतः उत्तर मेरठ होता है; "पहला शहीद / पहली घटना" पूछी जाए तो बैरकपुर — मंगल पांडे।
6. प्रमुख केंद्र, नेता और दमन
6.1 दिल्ली
नाममात्र का नेतृत्व बहादुर शाह ज़फ़र के पास था, पर वास्तविक सैन्य कमान बरेली से आए बख्त खाँ के हाथ में थी। अंग्रेज़ों ने दिल्ली की घेराबंदी की और सितंबर 1857 में शहर पर पुनः कब्ज़ा किया — इस हमले में जॉन निकोलसन मारा गया। लेफ्टिनेंट हडसन ने हुमायूँ के मकबरे से बहादुर शाह को बंदी बनाया और शहज़ादों को गोली मार दी। बहादुर शाह पर मुक़दमा चलाकर उन्हें रंगून निर्वासित किया गया, जहाँ 1862 में उनकी मृत्यु हुई। इसी के साथ मुग़ल वंश का औपचारिक अंत हो गया।
6.2 कानपुर
नाना साहेब (पेशवा बाजीराव द्वितीय के दत्तक पुत्र) ने जून 1857 में कानपुर में विद्रोह का नेतृत्व किया; उनके सहयोगियों में तात्या टोपे और सलाहकार अज़ीमुल्ला खाँ प्रमुख थे। जुलाई 1857 में हैवलॉक ने कानपुर पर अधिकार किया और बाद में कॉलिन कैंपबेल ने तात्या टोपे को पराजित कर कानपुर को निर्णायक रूप से अंग्रेज़ों के अधीन किया। नाना साहेब अंततः नेपाल की ओर चले गए। तात्या टोपे लंबे समय तक गुरिल्ला युद्ध करते रहे; 1859 में पकड़े जाने के बाद उन्हें फाँसी दी गई।
6.3 लखनऊ (अवध)
अवध में बेगम हज़रत महल ने अपने अल्पवयस्क पुत्र बिरजिस क़द्र को नवाब घोषित कर नेतृत्व किया। लखनऊ रेज़िडेंसी की घेराबंदी में चीफ़ कमिश्नर हेनरी लॉरेंस मारे गए। हैवलॉक और आउट्रम ने रेज़िडेंसी तक सहायता पहुँचाई और अंततः कॉलिन कैंपबेल ने मार्च 1858 में लखनऊ पर अधिकार किया। बेगम हज़रत महल नेपाल चली गईं। अवध में विद्रोह को ताल्लुकेदारों और किसानों का व्यापक समर्थन मिला।
6.4 झाँसी और ग्वालियर
व्यपगत सिद्धांत से झाँसी के विलय (1853) से आहत रानी लक्ष्मीबाई ने जून 1857 में विद्रोह का नेतृत्व संभाला। ह्यूरोज़ ने अप्रैल 1858 में झाँसी पर अधिकार किया। रानी कालपी होते हुए तात्या टोपे के साथ ग्वालियर पहुँचीं और ग्वालियर पर अधिकार किया, पर जून 1858 में ग्वालियर के पास अंग्रेज़ों से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुईं। ह्यूरोज़ द्वारा रानी को विद्रोहियों में "सबसे वीर" कहे जाने का उल्लेख प्रायः किया जाता है।
6.5 बिहार, रुहेलखंड और अन्य क्षेत्र
| क्षेत्र | नेता | टिप्पणी |
|---|---|---|
| जगदीशपुर / आरा (बिहार) | कुँवर सिंह | लगभग 80 वर्ष की आयु में नेतृत्व; आरा की घेराबंदी विंसेंट आयर ने तोड़ी; 1858 में मृत्यु |
| बरेली (रुहेलखंड) | खान बहादुर खान | स्वयं को मुग़ल सम्राट का प्रतिनिधि (नाज़िम) घोषित किया; 1858 में कैंपबेल ने बरेली जीता |
| फ़ैज़ाबाद | मौलवी अहमदुल्ला | अवध व रुहेलखंड में सक्रिय; 1858 में एक स्थानीय राजा द्वारा मारे गए |
| इलाहाबाद | मौलवी लियाकत अली | कर्नल नील ने इलाहाबाद व बनारस में कठोर दमन किया |
| असम | मणिराम दत्त (मणिराम दीवान) | षड्यंत्र के आरोप में फाँसी |
| संबलपुर (ओडिशा) | सुरेंद्र साय | लंबा प्रतिरोध |
6.6 राजस्थान में 1857 (संक्षेप में)
राजस्थान के अधिकांश राजा अंग्रेज़ों के साथ रहे, पर छावनियों और कुछ ठिकानों में विद्रोह हुआ। विस्तृत अध्ययन के लिए साइट का अलग "राजस्थान में 1857" नोट देखें; यहाँ केवल मुख्य तथ्य —
| स्थान | घटना / नेता |
|---|---|
| नसीराबाद छावनी | 28 मई 1857 — राजस्थान में विद्रोह का आरंभ |
| नीमच छावनी | जून 1857 में विद्रोह |
| आउवा (मारवाड़) | ठाकुर कुशाल सिंह — एरिनपुरा के विद्रोही सैनिकों के साथ |
| कोटा | जयदयाल और मेहराब खान — पॉलिटिकल एजेंट मेजर बर्टन मारा गया |
7. विद्रोह से अलग रहे क्षेत्र और वर्ग
| क्षेत्र / वर्ग | स्थिति |
|---|---|
| पंजाब | शांत रहा; सिख और गोरखा टुकड़ियों ने दिल्ली की घेराबंदी में अंग्रेज़ों की मदद की |
| दक्षिण भारत | लगभग अप्रभावित |
| बंगाल (पूर्वी भाग) | व्यापक विद्रोह नहीं हुआ |
| देशी राजा | सिंधिया (ग्वालियर), होल्कर (इंदौर), निज़ाम (हैदराबाद), राजपूताना के अधिकांश राजा अंग्रेज़ों के साथ; नेपाल के जंग बहादुर ने सैनिक सहायता दी |
| शिक्षित मध्य वर्ग | अधिकांशतः तटस्थ या अंग्रेज़ों के पक्ष में — वे ब्रिटिश शासन को आधुनिकता का माध्यम मानते थे |
| बड़े व्यापारी, साहूकार | प्रायः अंग्रेज़ों के साथ |
8. असफलता के कारण
- सीमित क्षेत्र: विद्रोह मुख्यतः उत्तर और मध्य भारत तक सीमित रहा; पंजाब, दक्षिण और पूर्वी बंगाल अलग रहे।
- एकीकृत नेतृत्व का अभाव: हर केंद्र के नेता अपने-अपने क्षेत्र के लिए लड़े; कोई अखिल भारतीय कमान नहीं थी।
- स्पष्ट योजना व भविष्य-दृष्टि का अभाव: अंग्रेज़ों को हटाने के बाद कैसी व्यवस्था बनेगी, इसका कोई साझा कार्यक्रम नहीं था; अधिकतर नेता पुरानी व्यवस्था की बहाली चाहते थे।
- देशी राजाओं का सहयोग न मिलना: सिंधिया, होल्कर, निज़ाम, राजपूत और सिख शासकों ने अंग्रेज़ों का साथ दिया।
- संसाधन और हथियार: अंग्रेज़ों के पास आधुनिक हथियार, प्रशिक्षित अधिकारी, धन और ब्रिटेन से सैनिक सहायता थी।
- संचार: रेल और तार (टेलीग्राफ) की सहायता से अंग्रेज़ सूचना व सेना तेज़ी से पहुँचा सके।
- शिक्षित वर्ग व व्यापारियों की उदासीनता।
- अनुशासन व समन्वय की कमी: विद्रोही टुकड़ियों में आपसी तालमेल और रसद-व्यवस्था कमज़ोर थी।
9. स्वरूप पर इतिहासकारों के मत
1857 का स्वरूप इतिहास-लेखन का सबसे बहस वाला प्रश्न है। नीचे दिए मत दृष्टिकोण हैं, अंतिम निर्णय नहीं — परीक्षा में प्रायः "किसने क्या कहा" या "किस पुस्तक के लेखक" के रूप में पूछे जाते हैं।
| मत | किसका / कहाँ | सार |
|---|---|---|
| सैनिक विद्रोह (Sepoy Mutiny) | तत्कालीन ब्रिटिश अधिकारी व अनेक ब्रिटिश लेखक (जैसे जॉन सीले) | केवल सिपाहियों का असंतोष, जन-आंदोलन नहीं |
| प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम | वी.डी. सावरकर — "The Indian War of Independence, 1857" (1909) | सुनियोजित राष्ट्रीय स्वतंत्रता युद्ध |
| न प्रथम, न राष्ट्रीय, न स्वतंत्रता संग्राम | आर.सी. मजूमदार | राष्ट्रीय चेतना के अभाव पर बल |
| धर्म के लिए आरंभ, स्वतंत्रता संग्राम में परिवर्तित | एस.एन. सेन — "Eighteen Fifty-Seven" (1957; शताब्दी पर सरकारी इतिहास) | आरंभ सैनिक, आगे चलकर व्यापक जन-विद्रोह |
| राष्ट्रीय विद्रोह | ब्रिटेन में बेंजामिन डिज़रायली; कार्ल मार्क्स ने भी इसे व्यापक विद्रोह के रूप में देखा | केवल सैनिक असंतोष नहीं |
| सामंती प्रतिक्रिया | कुछ आधुनिक इतिहासकार | अपदस्थ शासकों व ज़मींदारों का पुरानी व्यवस्था बचाने का प्रयास |
संतुलित निष्कर्ष (NCERT दृष्टि): विद्रोह सिपाहियों से शुरू हुआ, पर अवध, रुहेलखंड, बिहार और मध्य भारत में किसान, कारीगर, ताल्लुकेदार और अपदस्थ शासक भी इसमें शामिल हुए; हिंदू-मुस्लिम एकता इसकी उल्लेखनीय विशेषता थी। इसे "केवल सैनिक विद्रोह" कहना अधूरा है, और "आधुनिक अर्थ में राष्ट्रीय आंदोलन" कहना भी विवादित — इसलिए यह मत-भेद का विषय है।
10. परिणाम
10.1 भारत शासन अधिनियम 1858
| प्रावधान | विवरण |
|---|---|
| कंपनी शासन का अंत | भारत का शासन ईस्ट इंडिया कंपनी से ब्रिटिश ताज (Crown) को हस्तांतरित |
| भारत सचिव (Secretary of State for India) | ब्रिटिश मंत्रिमंडल का सदस्य; भारत के शासन का सर्वोच्च उत्तरदायी; पहले भारत सचिव — लॉर्ड स्टैनली |
| भारत परिषद (Council of India) | भारत सचिव की सहायता के लिए 15 सदस्यीय परिषद |
| बोर्ड ऑफ़ कंट्रोल व कोर्ट ऑफ़ डायरेक्टर्स | समाप्त (द्वैध शासन का अंत) |
| वायसराय | गवर्नर-जनरल अब ताज के प्रतिनिधि के रूप में "वायसराय" भी कहलाया — लॉर्ड कैनिंग पहले वायसराय |
10.2 महारानी विक्टोरिया की घोषणा (1 नवंबर 1858)
लॉर्ड कैनिंग ने इलाहाबाद में आयोजित दरबार में यह घोषणा पढ़ी। इसके प्रमुख बिंदु —
- राज्य-विस्तार की नीति का त्याग; देशी राजाओं से की गई संधियों का सम्मान।
- राजाओं को दत्तक पुत्र गोद लेने का अधिकार — व्यपगत सिद्धांत व्यवहार में समाप्त।
- भारतीयों के धार्मिक विश्वासों और रीति-रिवाजों में हस्तक्षेप न करने का आश्वासन।
- योग्यता के आधार पर बिना भेदभाव सरकारी सेवा का वादा।
- अंग्रेज़ों की हत्या में सीधे शामिल लोगों को छोड़कर शेष विद्रोहियों को क्षमा।
10.3 सेना का पुनर्गठन
- सेना में यूरोपीय सैनिकों का अनुपात बढ़ाया गया; तोपख़ाना जैसे महत्वपूर्ण अंग यूरोपीय नियंत्रण में रखे गए।
- सेना पुनर्गठन पर पील आयोग (1859) की सिफ़ारिशें।
- भर्ती में "फूट डालो और राज करो" — जाति, समुदाय और क्षेत्र के आधार पर अलग-अलग टुकड़ियाँ; अवध, बिहार, मध्य भारत से भर्ती घटाई गई और पंजाब, नेपाल (गोरखा) व सीमांत क्षेत्रों से बढ़ाई गई ("मार्शल रेस" की धारणा)।
10.4 अन्य दीर्घकालिक परिणाम
| क्षेत्र | परिणाम |
|---|---|
| देशी रियासतें | विलय की जगह संरक्षण — रियासतें ब्रिटिश सत्ता की सहयोगी बनीं |
| मुग़ल वंश | औपचारिक अंत; बहादुर शाह ज़फ़र रंगून निर्वासित |
| सामाजिक सुधार नीति | सरकार सामाजिक-धार्मिक कानूनों में अधिक सावधान हुई |
| नस्लीय दूरी | अंग्रेज़ों और भारतीयों के बीच अविश्वास बढ़ा |
| हिंदू-मुस्लिम संबंध | अंग्रेज़ों ने आगे चलकर विभाजनकारी नीति अपनाई |
| राष्ट्रीय चेतना | 1857 की स्मृति आगे के राष्ट्रीय आंदोलन (1885 के बाद का राष्ट्रीय आंदोलन) के लिए प्रेरणा बनी |
11. परीक्षा में कौन-सी गलतियाँ होती हैं? (Exam Trap)
Trap 1: अवध का विलय व्यपगत सिद्धांत से नहीं
सतारा, झाँसी, नागपुर — व्यपगत सिद्धांत। अवध (1856) — कुशासन का आरोप। विकल्पों में "अवध — व्यपगत सिद्धांत" दिखे तो वह गलत युग्म है।
Trap 2: बैरकपुर बनाम मेरठ
बैरकपुर (29 मार्च 1857) — मंगल पांडे की व्यक्तिगत घटना। मेरठ (10 मई 1857) — सामूहिक विद्रोह का आरंभ, जहाँ से सैनिक दिल्ली गए। "विद्रोह का आरंभ" = मेरठ।
Trap 3: दिल्ली में वास्तविक सेनापति
बहादुर शाह ज़फ़र प्रतीकात्मक नेता थे; सैन्य नेतृत्व बख्त खाँ का था। "दिल्ली में सैनिकों का वास्तविक नेतृत्व" पूछा जाए तो बख्त खाँ।
Trap 4: बेगम हज़रत महल — लखनऊ, ज़ीनत महल नहीं
लखनऊ में नेतृत्व बेगम हज़रत महल ने किया। ज़ीनत महल बहादुर शाह ज़फ़र की बेगम थीं (दिल्ली)। नाम-समानता का जाल।
Trap 5: तात्या टोपे और नाना साहेब
दोनों कानपुर से जुड़े हैं, पर तात्या टोपे बाद में झाँसी की रानी के साथ ग्वालियर और मध्य भारत में भी लड़े। "ग्वालियर पर अधिकार में रानी के सहयोगी" = तात्या टोपे।
Trap 6: ह्यूरोज़ — झाँसी; कैंपबेल — लखनऊ/कानपुर
झाँसी की रानी के विरुद्ध ह्यूरोज़; लखनऊ, कानपुर (अंतिम) और बरेली में कॉलिन कैंपबेल; दिल्ली में निकोलसन व हडसन।
Trap 7: महारानी की घोषणा — इलाहाबाद, 1 नवंबर 1858
घोषणा दिल्ली या कलकत्ता में नहीं, इलाहाबाद के दरबार में पढ़ी गई। अधिनियम (अगस्त 1858) पहले आया, घोषणा (नवंबर 1858) बाद में — कालक्रम प्रश्नों में यह क्रम याद रखें।
Trap 8: पहले वायसराय बनाम पहले गवर्नर-जनरल
भारत का पहला वायसराय — लॉर्ड कैनिंग (1858)। बंगाल का पहला गवर्नर-जनरल — वॉरेन हेस्टिंग्स; भारत का पहला गवर्नर-जनरल — लॉर्ड विलियम बेंटिक (1833 के अधिनियम से)। तीनों को अलग रखें।
Trap 9: सावरकर की पुस्तक
"The Indian War of Independence, 1857" — वी.डी. सावरकर (1909)। "Eighteen Fifty-Seven" — एस.एन. सेन। सर सैयद अहमद खाँ ने विद्रोह के कारणों पर "असबाब-ए-बग़ावत-ए-हिंद" लिखी — तीनों पुस्तकों के लेखक अलग हैं।
12. Most-Asked रिवीज़न तालिका (51 तथ्य)
| क्र. | प्रश्न-बिंदु | उत्तर |
|---|---|---|
| 1 | 1857 के समय गवर्नर-जनरल | लॉर्ड कैनिंग |
| 2 | व्यपगत सिद्धांत किसने लागू किया | लॉर्ड डलहौज़ी |
| 3 | व्यपगत सिद्धांत से विलय होने वाला पहला राज्य | सतारा (1848) |
| 4 | झाँसी का विलय | 1853 |
| 5 | नागपुर का विलय | 1854 |
| 6 | अवध का विलय | 1856, कुशासन के आधार पर |
| 7 | अवध के अंतिम नवाब | वाजिद अली शाह |
| 8 | सहायक संधि | लॉर्ड वेलेज़ली |
| 9 | नई राइफल | एनफील्ड राइफल |
| 10 | तात्कालिक कारण | चर्बी वाले कारतूस |
| 11 | सामान्य सेवा भर्ती अधिनियम | 1856 — समुद्र पार सेवा |
| 12 | धार्मिक निर्योग्यता अधिनियम | 1850 — धर्मांतरित को पैतृक संपत्ति का अधिकार |
| 13 | मंगल पांडे की घटना | 29 मार्च 1857, बैरकपुर |
| 14 | मंगल पांडे की रेजिमेंट | 34वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री |
| 15 | मंगल पांडे को फाँसी | 8 अप्रैल 1857 |
| 16 | मेरठ विद्रोह | 10 मई 1857 |
| 17 | विद्रोहियों का दिल्ली पहुँचना | 11 मई 1857 |
| 18 | दिल्ली के प्रतीकात्मक नेता | बहादुर शाह ज़फ़र |
| 19 | दिल्ली के सैन्य नेता | बख्त खाँ |
| 20 | दिल्ली विजय में मारा गया अंग्रेज़ अधिकारी | जॉन निकोलसन |
| 21 | बहादुर शाह को बंदी बनाने वाला | हडसन |
| 22 | दिल्ली पर पुनः अधिकार | सितंबर 1857 |
| 23 | बहादुर शाह का निर्वासन | रंगून; मृत्यु 1862 |
| 24 | कानपुर के नेता | नाना साहेब |
| 25 | नाना साहेब किसके दत्तक पुत्र | पेशवा बाजीराव द्वितीय |
| 26 | नाना साहेब के सलाहकार | अज़ीमुल्ला खाँ |
| 27 | तात्या टोपे को फाँसी | 1859 |
| 28 | लखनऊ की नेता | बेगम हज़रत महल |
| 29 | बेगम हज़रत महल का पुत्र (नवाब घोषित) | बिरजिस क़द्र |
| 30 | लखनऊ रेज़िडेंसी में मारे गए | हेनरी लॉरेंस |
| 31 | लखनऊ पर अंतिम अधिकार | कॉलिन कैंपबेल, मार्च 1858 |
| 32 | झाँसी की नेता | रानी लक्ष्मीबाई |
| 33 | झाँसी का दमन | ह्यूरोज़ |
| 34 | रानी लक्ष्मीबाई की वीरगति | जून 1858, ग्वालियर के पास |
| 35 | जगदीशपुर (बिहार) के नेता | कुँवर सिंह |
| 36 | बरेली के नेता | खान बहादुर खान |
| 37 | फ़ैज़ाबाद के नेता | मौलवी अहमदुल्ला |
| 38 | इलाहाबाद के नेता | मौलवी लियाकत अली |
| 39 | इलाहाबाद-बनारस में दमन | कर्नल नील |
| 40 | असम के नेता | मणिराम दत्त (दीवान) |
| 41 | राजस्थान में विद्रोह का आरंभ | नसीराबाद, 28 मई 1857 |
| 42 | आउवा के ठाकुर | कुशाल सिंह |
| 43 | "The Indian War of Independence, 1857" | वी.डी. सावरकर (1909) |
| 44 | "Eighteen Fifty-Seven" | एस.एन. सेन |
| 45 | "असबाब-ए-बग़ावत-ए-हिंद" | सर सैयद अहमद खाँ |
| 46 | कंपनी शासन समाप्त करने वाला अधिनियम | भारत शासन अधिनियम 1858 |
| 47 | पहले भारत सचिव | लॉर्ड स्टैनली |
| 48 | भारत परिषद के सदस्य | 15 |
| 49 | महारानी की घोषणा | 1 नवंबर 1858, इलाहाबाद दरबार |
| 50 | भारत के पहले वायसराय | लॉर्ड कैनिंग |
| 51 | सेना पुनर्गठन आयोग | पील आयोग (1859) |
13. परीक्षा में यह टॉपिक कैसे पूछा जाता है
नीचे दिए नमूना प्रश्न इस नोट के लिए बनाए गए अभ्यास-उदाहरण हैं, किसी विशेष पिछले पेपर के प्रश्न नहीं।
- सुमेलन (Match the following): सूची-I (केंद्र) — दिल्ली, लखनऊ, झाँसी, जगदीशपुर; सूची-II (नेता) — बख्त खाँ, बेगम हज़रत महल, रानी लक्ष्मीबाई, कुँवर सिंह। संकेत: क्रम सीधा है; प्रायः एक जोड़ी उलट दी जाती है (जैसे लखनऊ — ज़ीनत महल)।
- कालक्रम: (i) अवध का विलय (ii) मेरठ विद्रोह (iii) महारानी की घोषणा (iv) झाँसी का विलय — सही क्रम: (iv) 1853 → (i) 1856 → (ii) 1857 → (iii) 1858।
- कथन-आधारित: "1. अवध का विलय व्यपगत सिद्धांत के अंतर्गत हुआ। 2. महारानी की घोषणा इलाहाबाद में पढ़ी गई।" — केवल कथन 2 सही।
- अभिकथन-कारण (Assertion-Reason): A — अवध 1857 का प्रमुख केंद्र बना। R — बंगाल सेना के बहुत-से सिपाही अवध से थे और 1856 में अवध का विलय हुआ था। — A और R दोनों सही, R, A की सही व्याख्या।
- नेता–अंग्रेज़ अधिकारी: "रानी लक्ष्मीबाई के विरुद्ध अभियान का नेतृत्व किसने किया?" — ह्यूरोज़।
- परिणाम: "1858 के अधिनियम द्वारा कौन-सा पद सृजित हुआ?" — भारत सचिव।
14. इसे आसानी से याद कैसे रखें?
1. कारण सूत्र — "रा-आ-सा-सै": राजनीतिक (व्यपगत, अवध), आर्थिक (लगान, हस्तशिल्प), सामाजिक-धार्मिक (मिशनरी, 1850 अधिनियम), सैन्य (भेदभाव, 1856 भर्ती अधिनियम, कारतूस)।
2. विलय क्रम — "सतारा से नागपुर, फिर अवध": सतारा 48, संबलपुर 49, उदयपुर 52, झाँसी 53, नागपुर 54 — अवध 56 (कुशासन)।
3. तिथि-सूत्र: "29 मार्च बैरकपुर, 10 मई मेरठ, 11 मई दिल्ली" — मार्च में चिंगारी, मई में आग।
4. दमन सूत्र — "दिल्ली निको-हड, झाँसी ह्यू, बाक़ी कैंपबेल": दिल्ली — निकोलसन, हडसन; झाँसी — ह्यूरोज़; लखनऊ, कानपुर, बरेली — कैंपबेल।
5. महिला नेता: "हज़रत महल — लखनऊ; लक्ष्मीबाई — झाँसी" — दोनों में 'ल'।
6. 1858 सूत्र — "अगस्त में अधिनियम, नवंबर में घोषणा, इलाहाबाद में कैनिंग": कंपनी गई, भारत सचिव आया, वायसराय बना।
15. कथन अभ्यास
1857 के विद्रोह के समय लॉर्ड कैनिंग भारत के गवर्नर-जनरल थे। — सही।
अवध का विलय व्यपगत सिद्धांत के अंतर्गत किया गया था। — गलत (कुशासन के आरोप में, 1856)।
व्यपगत सिद्धांत से विलय होने वाला पहला राज्य सतारा था। — सही।
मंगल पांडे की घटना मेरठ में हुई थी। — गलत (बैरकपुर, 29 मार्च 1857)।
मेरठ के विद्रोही सैनिकों ने दिल्ली पहुँचकर बहादुर शाह ज़फ़र को सम्राट घोषित किया। — सही।
लखनऊ में विद्रोह का नेतृत्व ज़ीनत महल ने किया। — गलत (बेगम हज़रत महल)।
झाँसी में विद्रोह का दमन ह्यूरोज़ ने किया। — सही।
बिहार में विद्रोह के प्रमुख नेता कुँवर सिंह थे। — सही।
बहादुर शाह ज़फ़र को अंडमान निर्वासित किया गया। — गलत (रंगून, बर्मा)।
भारत शासन अधिनियम 1858 से भारत सचिव का पद बना। — सही।
महारानी विक्टोरिया की घोषणा दिल्ली दरबार में पढ़ी गई। — गलत (इलाहाबाद, 1 नवंबर 1858)।
वी.डी. सावरकर ने 1857 को "प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम" कहा। — सही।
16. एक दिन पहले — 14 रेखाएँ
- 1857 के समय गवर्नर-जनरल लॉर्ड कैनिंग; 1858 में वही पहले वायसराय
- व्यपगत सिद्धांत — डलहौज़ी; सतारा (1848) पहला, झाँसी 1853, नागपुर 1854
- अवध 1856 — कुशासन के आरोप में; नवाब वाजिद अली शाह
- सैन्य कारण — भेदभाव, 1856 का सामान्य सेवा भर्ती अधिनियम, एनफील्ड राइफल के चर्बी वाले कारतूस
- 29 मार्च 1857 — बैरकपुर, मंगल पांडे (34वीं BNI); 8 अप्रैल को फाँसी
- 10 मई 1857 — मेरठ से व्यापक विद्रोह; 11 मई — दिल्ली, बहादुर शाह ज़फ़र सम्राट घोषित
- दिल्ली — बहादुर शाह, बख्त खाँ — निकोलसन, हडसन; सितंबर 1857 में पतन; ज़फ़र रंगून
- कानपुर — नाना साहेब, तात्या टोपे — हैवलॉक, कैंपबेल
- लखनऊ — बेगम हज़रत महल (बिरजिस क़द्र) — कैंपबेल; हेनरी लॉरेंस मारे गए
- झाँसी — रानी लक्ष्मीबाई — ह्यूरोज़; जून 1858 में ग्वालियर के पास वीरगति
- जगदीशपुर — कुँवर सिंह; बरेली — खान बहादुर खान; फ़ैज़ाबाद — मौलवी अहमदुल्ला
- असफलता — सीमित क्षेत्र, नेतृत्व-योजना का अभाव, राजाओं-शिक्षित वर्ग का साथ न देना, हथियार व संचार
- सावरकर — प्रथम स्वतंत्रता संग्राम (1909); स्वरूप पर मत-भेद
- 1858 अधिनियम — कंपनी शासन समाप्त, भारत सचिव + 15 सदस्यीय परिषद; 1 नवंबर 1858 — इलाहाबाद में महारानी की घोषणा
17. अभ्यास
नोट पढ़ने के बाद इस पेज के अंत में दिए 25 प्रश्नों का क्विज़ हल करें। जिन प्रश्नों में गलती हो, उनके केंद्र–नेता–अधिकारी को खंड 1 की तालिका से फिर मिलाएँ और कालक्रम वाले प्रश्नों के लिए खंड 5 की तिथियाँ दोहराएँ। पूरे इतिहास खंड के मिश्रित अभ्यास के लिए UPSC CSE 2027 प्रारंभिक फ्री टेस्ट सीरीज़ और RPSC RAS प्रारंभिक 2026 टेस्ट सीरीज़ हल करें।
18. निष्कर्ष: परीक्षा के लिए क्या याद रखें?
1857 की क्रांति एक दिन की घटना नहीं, सौ वर्षों के राजनीतिक विलय, आर्थिक शोषण, सामाजिक आशंका और सैन्य भेदभाव का विस्फोट थी, जिसे चर्बी वाले कारतूसों ने चिंगारी दी। यह असफल रही, पर इसके बाद भारत का शासन कंपनी से ब्रिटिश ताज के पास गया, देशी रियासतों के प्रति नीति बदली और सेना का ढाँचा नए सिरे से बना। परीक्षा के लिए तीन तालिकाएँ सबसे महत्वपूर्ण हैं — केंद्र-नेता-अधिकारी, कारणों के चार समूह, और 1858 के परिणाम। स्वरूप वाले प्रश्नों में मतों को "किसका मत" के रूप में याद रखें, किसी एक को अंतिम सत्य न मानें।
डलहौज़ी का विलय + कारतूस = 1857 | 29 मार्च बैरकपुर · 10 मई मेरठ · 11 मई दिल्ली | दिल्ली-बख्त खाँ, कानपुर-नाना, लखनऊ-हज़रत महल, झाँसी-लक्ष्मीबाई, जगदीशपुर-कुँवर सिंह | 1858: कंपनी गई, ताज आया, कैनिंग पहले वायसराय
इस टॉपिक का क्विज़ कहाँ दें?
“1857 की क्रांति — कारण, केंद्र-नेता-अंग्रेज़ अधिकारी, असफलता और 1858 के परिणाम — UPSC/RAS” पढ़ने के बाद इन क्विज़ से तुरंत दोहराएँ — गलत उत्तर वाले बिंदु नोट में दोबारा देखें।
- 1857 की क्रांति — अभ्यास क्विज़25 प्रश्नों से खुद को परखें
- कंपनी शासन का विस्तार और गवर्नर-जनरल — अभ्यास क्विज़अभ्यास शुरू करें
- सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन — अभ्यास क्विज़25 प्रश्नों का क्विज़ दें
- राष्ट्रीय आंदोलन 1885–1919 — अभ्यास क्विज़अपनी तैयारी जाँचें
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महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)
तात्कालिक कारण नई एनफील्ड राइफल के कारतूस थे, जिन्हें दाँत से काटना पड़ता था और जिन पर गाय व सूअर की चर्बी लगी होने की आशंका थी। इससे हिंदू और मुसलमान दोनों सिपाहियों की धार्मिक भावनाएँ आहत हुईं।
व्यापक विद्रोह 10 मई 1857 को मेरठ से शुरू हुआ, जहाँ से सैनिक 11 मई को दिल्ली पहुँचे। इससे पहले 29 मार्च 1857 को बैरकपुर में मंगल पांडे ने अंग्रेज़ अधिकारियों पर हमला किया था।
लॉर्ड कैनिंग। भारत शासन अधिनियम 1858 के बाद वही भारत के पहले वायसराय बने।
लॉर्ड डलहौज़ी की इस नीति के अनुसार जिस आश्रित राज्य के शासक का प्राकृतिक उत्तराधिकारी न हो, वह कंपनी के राज्य में मिला लिया जाता था; दत्तक पुत्र को राज्य नहीं मिलता था। सतारा (1848), झाँसी (1853) और नागपुर (1854) इसके उदाहरण हैं।
नहीं। अवध का विलय 1856 में नवाब वाजिद अली शाह पर कुशासन का आरोप लगाकर किया गया था, व्यपगत सिद्धांत के आधार पर नहीं।
दिल्ली — बहादुर शाह ज़फ़र व बख्त खाँ, कानपुर — नाना साहेब व तात्या टोपे, लखनऊ — बेगम हज़रत महल, झाँसी — रानी लक्ष्मीबाई, जगदीशपुर — कुँवर सिंह, बरेली — खान बहादुर खान और फ़ैज़ाबाद — मौलवी अहमदुल्ला।
विद्रोह मुख्यतः उत्तर व मध्य भारत तक सीमित रहा, एकीकृत नेतृत्व और साझा योजना नहीं थी, अधिकांश देशी राजा और शिक्षित वर्ग अंग्रेज़ों के साथ रहे, और अंग्रेज़ों के पास बेहतर हथियार, संसाधन व संचार साधन थे।
वी.डी. सावरकर ने अपनी पुस्तक 'The Indian War of Independence, 1857' (1909) में इसे स्वतंत्रता संग्राम कहा। इसके स्वरूप पर इतिहासकारों में मत-भेद है — कुछ इसे सैनिक विद्रोह मानते हैं।
इस अधिनियम से कंपनी का शासन समाप्त होकर ब्रिटिश ताज के हाथ आया, भारत सचिव का पद और 15 सदस्यीय भारत परिषद बनी, बोर्ड ऑफ़ कंट्रोल व कोर्ट ऑफ़ डायरेक्टर्स समाप्त हुए और गवर्नर-जनरल वायसराय भी कहलाने लगा।
1 नवंबर 1858 को इलाहाबाद के दरबार में लॉर्ड कैनिंग ने यह घोषणा पढ़ी। इसमें राज्य-विस्तार की नीति त्यागने, दत्तक पुत्र के अधिकार और धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप न करने का आश्वासन दिया गया।
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