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राजस्थान इतिहास

मारवाड़ राजवंश — राव मालदेव: मारवाड़ के स्वर्णकाल के निर्माता | गिरी सुमेल युद्ध RPSC नोट्स

Sudhir Dhaka (इतिहास विशेषज्ञ)
25 जुलाई 2026
7 मिनट पठन
मारवाड़ राजवंश — राव मालदेव: मारवाड़ के स्वर्णकाल के निर्माता | गिरी सुमेल युद्ध RPSC नोट्स

लेखक की विशेषज्ञता नोट (E-E-A-T): यह लेख राजस्थान इतिहास के "राठौड़ वंश" अध्याय पर केंद्रित RPSC/RAS पाठ्यक्रम-आधारित शोध का परिणाम है। तिथियों व घटनाक्रमों को प्रकाशन से पूर्व RPSC आधिकारिक सिलेबस एवं राजस्थान राज्य पाठ्यपुस्तक मंडल की सामग्री से क्रॉस-वेरिफाई करने की अनुशंसा की जाती है, क्योंकि विभिन्न ऐतिहासिक स्रोतों में मामूली मतभेद पाए जाते हैं।

यह लेख राव जोधा पर प्रकाशित लेख की अगली कड़ी है। यदि आपने अभी तक राव जोधा और जोधपुर की स्थापना वाला लेख नहीं पढ़ा है, तो पहले उसे पढ़ना उपयोगी रहेगा, क्योंकि राव मालदेव उसी राठौड़ वंश-परंपरा के प्रत्यक्ष उत्तराधिकारी थे।

प्रस्तावना: वह शासक जिसने मारवाड़ को साम्राज्य बना दिया

यदि राव जोधा को जोधपुर और मेहरानगढ़ का संस्थापक कहा जाता है, तो राव मालदेव को निर्विवाद रूप से मारवाड़ के "स्वर्णकाल" (Golden Age) का शिल्पकार कहा जाता है। राव मालदेव के शासनकाल में मारवाड़ की सीमाएँ इतनी विस्तृत हो गई थीं कि यह राज्य उस समय के उत्तर भारत की सबसे शक्तिशाली रियासतों में गिना जाने लगा — यहाँ तक कि दिल्ली की सल्तनत पर काबिज़ शेरशाह सूरी जैसे शक्तिशाली शासक को भी राव मालदेव से युद्ध में उलझना पड़ा।

RPSC, RAS, RSMSSB, पटवारी और REET जैसी परीक्षाओं में राव मालदेव, गिरी सुमेल का युद्ध (सामेल का युद्ध), और हुमायूँ-मालदेव प्रकरण से जुड़े प्रश्न बहुत उच्च वेटेज के साथ पूछे जाते हैं। यह अध्याय "राजस्थान का इतिहास — राठौड़ वंश" श्रृंखला की दूसरी महत्वपूर्ण कड़ी है।

इस लेख में हम राव मालदेव के प्रारंभिक जीवन, उनके विशाल राज्य-विस्तार, शेरशाह सूरी से संघर्ष, हुमायूँ से जुड़े प्रसंग, प्रशासनिक सुधारों और परीक्षा-दृष्टि से महत्वपूर्ण हर बिंदु को विस्तार से समझेंगे।

1. राव मालदेव: जन्म, वंश-परंपरा और सिंहासनारोहण

बिंदु विवरण
पूरा नाम राव मालदेव राठौड़
वंश राठौड़ वंश (मारवाड़), राव जोधा की वंश-परंपरा
पिता राव गांगा (गंगा)
जन्म वर्ष (मत-भिन्नता सहित) लगभग 1511-1512 ई.
शासनकाल लगभग 1532 ई. – 1562 ई.
प्रसिद्ध कार्य मारवाड़ का अधिकतम भौगोलिक विस्तार, शेरशाह सूरी से संघर्ष
पुत्र राव चंद्रसेन सहित अनेक पुत्र
पत्नी (प्रमुख) रानी उमादे भटियाणी (जैसलमेर राजकुमारी)



राव मालदेव, राव जोधा के प्रपौत्र (वंशक्रम में राव जोधा → राव सातल/सूजा → राव गांगा → राव मालदेव) की परंपरा से संबंधित थे। अपने पिता राव गांगा की मृत्यु के पश्चात राव मालदेव सन् 1532 ई. के आसपास मारवाड़ की गद्दी पर बैठे। सिंहासनारोहण के समय से ही उन्होंने अपनी सैन्य महत्वाकांक्षा और संगठनात्मक क्षमता का परिचय देना प्रारंभ कर दिया था।

शिक्षक टिप्पणी: परीक्षा में अक्सर राव जोधा और राव मालदेव के बीच की वंश-कड़ी को लेकर भ्रम पैदा किया जाता है। ध्यान रखें — राव मालदेव, राव जोधा के सीधे पुत्र नहीं बल्कि आगे की पीढ़ी के वंशज थे। इस वंशक्रम की तालिका को बार-बार दोहराएँ ताकि "पिता-पुत्र" बनाम "वंशज" वाली त्रुटि न हो।

2. मारवाड़ का अधिकतम भौगोलिक विस्तार

राव मालदेव के शासनकाल की सबसे बड़ी विशेषता थी — मारवाड़ राज्य का ऐतिहासिक रूप से सबसे बड़ा भौगोलिक विस्तार। उन्होंने अपनी सैन्य शक्ति और कूटनीतिक कौशल के बल पर निम्नलिखित क्षेत्रों पर अधिकार स्थापित किया:

विजित क्षेत्र महत्व
मेड़ता (मेड़तिया राठौड़ों से) सामरिक व सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण, मीराबाई से संबंधित क्षेत्र
अजमेर व नागौर क्षेत्र उत्तर-पश्चिम भारत के व्यापारिक मार्गों पर नियंत्रण
सिवाना, जालोर क्षेत्र दक्षिण-पश्चिम मारवाड़ में सुदृढ़ीकरण
बीकानेर व जैसलमेर से सीमा-विस्तार पारिवारिक/वैवाहिक संबंधों के माध्यम से प्रभाव-क्षेत्र में वृद्धि



इतिहासकारों के अनुसार, राव मालदेव के शासनकाल में मारवाड़ राज्य लगभग 70,000 वर्ग मील (मत-भिन्नता सहित) तक फैल गया था, जो उस समय राजस्थान की किसी भी अन्य रियासत से बड़ा क्षेत्रफल था। यही कारण है कि इतिहासकार इस काल को "मारवाड़ का स्वर्णकाल" कहते हैं।

एग्जाम ट्रैप: कई विद्यार्थी यह मान लेते हैं कि मारवाड़ का अधिकतम विस्तार महाराजा जसवंत सिंह प्रथम या किसी मुगलकालीन शासक के समय हुआ। ध्यान रखें — भौगोलिक विस्तार की दृष्टि से राव मालदेव का काल ही मारवाड़ का सर्वोच्च शिखर माना जाता है, भले ही मुगल दरबार में प्रभाव बाद के शासकों के समय अधिक रहा हो।

3. मेड़ता विजय: राव मालदेव की सबसे चर्चित सैन्य सफलता

मेड़ता क्षेत्र मूलतः मेड़तिया राठौड़ों (राव जोधा के ही एक अन्य वंशज-शाखा) के अधीन था, जिसका नेतृत्व राव वीरमदेव कर रहे थे। राव मालदेव ने कूटनीतिक व सैन्य दबाव के माध्यम से मेड़ता पर अधिकार स्थापित किया, जिसके फलस्वरूप राव वीरमदेव को क्षेत्र छोड़कर पलायन करना पड़ा।

सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण तथ्य: मेड़ता वही क्षेत्र है जहाँ प्रसिद्ध भक्ति-कवयित्री मीराबाई का ससुराल था। मेड़ता पर राव मालदेव के अधिकार के पश्चात के राजनीतिक घटनाक्रम का मीराबाई के जीवन पर भी अप्रत्यक्ष प्रभाव माना जाता है, यद्यपि यह विषय स्वतंत्र रूप से "भक्ति आंदोलन एवं मीराबाई" खंड में विस्तार से पढ़ा जाना चाहिए।

मेमोरी ट्रिक: "मालदेव ने मेड़ता मिलाया, वीरमदेव को भगाया" — यह सरल पंक्ति मेड़ता-विजय और उसके मूल शासक वीरमदेव के नाम को जोड़कर याद रखने में सहायक है।

4. शेरशाह सूरी से संघर्ष: गिरी सुमेल (सामेल) का युद्ध, 1544 ई.

यह प्रकरण राव मालदेव के जीवन की सबसे परीक्षा-प्रासंगिक घटना है।

पृष्ठभूमि

जब शेरशाह सूरी ने हुमायूँ को पराजित कर दिल्ली की सत्ता हथिया ली, तब उसकी दृष्टि राजस्थान की शक्तिशाली मारवाड़ रियासत पर भी पड़ी। राव मालदेव का बढ़ता हुआ प्रभाव-क्षेत्र शेरशाह सूरी के लिए एक संभावित खतरा बन चुका था, विशेषकर इसलिए क्योंकि मारवाड़ अजमेर-नागौर जैसे सामरिक क्षेत्रों तक फैल चुका था।

युद्ध का घटनाक्रम

1544 ई. में शेरशाह सूरी ने विशाल सेना के साथ मारवाड़ की ओर कूच किया। गिरी सुमेल (वर्तमान जोधपुर-नागौर सीमा क्षेत्र में स्थित, जिसे सामेल भी कहा जाता है) नामक स्थान पर दोनों सेनाओं के मध्य भीषण युद्ध हुआ।

युद्ध का पक्ष नेतृत्वकर्ता
मारवाड़ सेना राव मालदेव (व्यक्तिगत रूप से युद्धक्षेत्र में उपस्थित नहीं, सेनापतियों के माध्यम से संचालन — इस बिंदु पर स्रोतों में मतभेद)
मारवाड़ के वीर सेनापति जैता व कूपा (कुम्पा) — इन दोनों सेनापतियों ने अद्वितीय शौर्य दिखाया
सूरी सेना शेरशाह सूरी स्वयं



परिणाम और प्रसिद्ध कथन

यद्यपि मारवाड़ सेना अंततः पीछे हटी और युद्धक्षेत्र शेरशाह सूरी के हाथ आया, किंतु मारवाड़ सैनिकों — विशेषकर जैता व कूपा के नेतृत्व वाली टुकड़ियों — के अदम्य साहस और भीषण प्रतिरोध से शेरशाह सूरी इतना प्रभावित व क्षतिग्रस्त हुआ कि उसने स्वयं एक ऐतिहासिक कथन कहा, जिसका आशय था कि उसने "बाजरे की मुट्ठी भर के लिए हिंदुस्तान के साम्राज्य को लगभग गँवा दिया" — यह कथन आज भी राजस्थान इतिहास की सबसे उद्धृत पंक्तियों में गिना जाता है और लगभग हर वर्ष किसी न किसी परीक्षा में इससे जुड़ा प्रश्न अवश्य पूछा जाता है।

एग्जाम ट्रैप: कई विद्यार्थी यह भूल कर बैठते हैं कि गिरी सुमेल के युद्ध में राव मालदेव स्वयं युद्धक्षेत्र में उपस्थित नहीं थे (अधिकांश मान्य स्रोतों के अनुसार) — वास्तविक युद्ध-नेतृत्व जैता और कूपा जैसे सेनापतियों ने किया। इस सूक्ष्म तथ्य को परीक्षा में सावधानीपूर्वक पढ़ें, क्योंकि वस्तुनिष्ठ प्रश्नों में "सेनापति कौन थे" पूछा जाता है, न कि केवल "युद्ध किसने लड़ा"।

सत्यापन सलाह: गिरी सुमेल के युद्ध की सही तिथि (1544 ई.) और स्थान को लेकर कुछ स्रोतों में "सामेल" व "गिरी सुमेल" को अलग-अलग स्थान बताया गया है, जबकि अधिकांश मुख्यधारा स्रोत दोनों को एक ही घटना का पर्यायवाची मानते हैं। कृपया RPSC सिलेबस-अनुशंसित पुस्तकों से पुष्टि अवश्य करें।

5. हुमायूँ और राव मालदेव: एक जटिल राजनीतिक प्रकरण

गिरी सुमेल युद्ध के कुछ समय बाद ही एक और महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाक्रम घटित हुआ, जो परीक्षा की दृष्टि से समान रूप से महत्वपूर्ण है।

जब मुगल सम्राट हुमायूँ शेरशाह सूरी से पराजित होकर भारत से पलायन कर रहे थे, तब उन्होंने शरण की तलाश में मारवाड़ की ओर रुख किया, क्योंकि राव मालदेव उस समय शेरशाह सूरी के विरोधी माने जाते थे। प्रारंभ में यह अपेक्षा की गई थी कि राव मालदेव हुमायूँ को सहायता प्रदान करेंगे। किंतु राजनीतिक व सामरिक कारणों से (गिरी सुमेल युद्ध के पश्चात मारवाड़ की सैन्य व आर्थिक स्थिति पहले से ही कमजोर हो चुकी थी, तथा शेरशाह सूरी से पुनः सीधे संघर्ष का जोखिम उठाना व्यवहारिक नहीं था) राव मालदेव ने हुमायूँ को अपेक्षित सहयोग नहीं दिया।

परिणामस्वरूप हुमायूँ को मारवाड़ छोड़कर आगे अमरकोट (वर्तमान पाकिस्तान में स्थित) की ओर जाना पड़ा, जहाँ आगे चलकर अकबर का जन्म हुआ।

एग्जाम ट्रैप: यह प्रश्न बार-बार पूछा जाता है — "अकबर का जन्म कहाँ हुआ?" उत्तर है अमरकोट, न कि मारवाड़/जोधपुर। किंतु यह घटनाक्रम राव मालदेव-हुमायूँ प्रकरण से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा है, इसलिए दोनों तथ्यों को साथ जोड़कर याद रखें: "मालदेव ने साथ नहीं दिया, इसलिए हुमायूँ अमरकोट गया, वहीं अकबर का जन्म हुआ।"

6. राव मालदेव के प्रशासनिक व स्थापत्य योगदान

राव मालदेव केवल एक सैन्य विजेता ही नहीं, बल्कि एक कुशल प्रशासक और निर्माता भी थे।

  • मेहरानगढ़ दुर्ग का विस्तार: राव जोधा द्वारा स्थापित मूल दुर्ग-संरचना को राव मालदेव ने महत्वपूर्ण रूप से विस्तारित व सुदृढ़ किया। दुर्ग की कई सुरक्षा-दीवारें व बुर्ज इसी काल में जोड़े गए।
  • राजस्व व्यवस्था में सुधार: राव मालदेव ने विजित क्षेत्रों में एक व्यवस्थित राजस्व-संग्रहण प्रणाली लागू करने का प्रयास किया, जिससे विशाल राज्य का प्रशासनिक संचालन सुगम हो सके।
  • व्यापार व सड़क-मार्ग सुरक्षा: अजमेर-नागौर जैसे व्यापारिक मार्गों पर नियंत्रण के फलस्वरूप मारवाड़ की व्यापारिक समृद्धि में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।
  • सैन्य संगठन: जैता व कूपा जैसे सेनापतियों को उच्च सैन्य दायित्व सौंपकर राव मालदेव ने एक सुदृढ़ सैन्य-नेतृत्व संरचना विकसित की, जो आगे चलकर मारवाड़ की सैन्य परंपरा की पहचान बनी।

7. राव मालदेव बनाम राव जोधा — तुलनात्मक तालिका

RPSC परीक्षाओं में दोनों शासकों के मध्य तुलनात्मक प्रश्न पूछे जाते रहे हैं। निम्न तालिका इस तुलना को स्पष्ट करती है:

बिंदुराव जोधाराव मालदेव
संबंधपूर्वज (राठौड़ वंश)वंशज (राव जोधा की आगामी पीढ़ी)
शासनकाल1438–1489 ई.1532–1562 ई.
प्रमुख उपलब्धिजोधपुर व मेहरानगढ़ की स्थापनामारवाड़ का अधिकतम भौगोलिक विस्तार
प्रमुख संघर्षमंडोर पुनः प्राप्ति, क्षेत्रीय संघर्षशेरशाह सूरी (गिरी सुमेल युद्ध, 1544 ई.)
स्थापत्य योगदानमेहरानगढ़ की आधारशिलामेहरानगढ़ का विस्तार व सुदृढ़ीकरण
पुत्र से संबंधित प्रसिद्ध घटनाराव बीका द्वारा बीकानेर की स्थापनाराव चंद्रसेन का मुगलों से संघर्ष (अगली पीढ़ी)

मेमोरी ट्रिक: "जोधा ने बसाया, मालदेव ने बढ़ाया" — यह पंक्ति दोनों शासकों की भूमिका (स्थापना बनाम विस्तार) को स्पष्ट रूप से अलग-अलग रखने में सहायक है।

8. राव मालदेव के उत्तराधिकार और आगामी घटनाक्रम

राव मालदेव के पश्चात मारवाड़ की गद्दी पर उनके पुत्र राव चंद्रसेन आसीन हुए। चंद्रसेन के शासनकाल में मुगल सम्राट अकबर की विस्तारवादी नीति के कारण मारवाड़ को नई चुनौतियों का सामना करना पड़ा, और चंद्रसेन को "मारवाड़ का प्रताप" भी कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने मुगल अधीनता स्वीकार करने से इनकार किया — यह विषय अगली कड़ी में विस्तार से पढ़ा जाएगा।

शिक्षक की एग्जाम रणनीति: राव मालदेव के पश्चात के उत्तराधिकार-क्रम को स्वतंत्र रूप से एक पंक्ति में याद रखें: "मालदेव → चंद्रसेन → (आगे मुगल-अधीनता का दौर, उदयसिंह/मोटा राजा के माध्यम से)"। यह क्रम RPSC में वंशावली-आधारित प्रश्नों के लिए अनिवार्य है।

9. PYQ अभ्यास खंड (15+ प्रश्न, उत्तर व व्याख्या सहित)

प्रश्न 1. राव मालदेव के पिता कौन थे? (अ) राव जोधा (ब) राव गांगा (स) राव सातल (द) राव सूजा उत्तर: (ब) राव गांगा

प्रश्न 2. गिरी सुमेल (सामेल) का युद्ध किसके मध्य हुआ था? (अ) राव मालदेव व अकबर (ब) राव मालदेव व शेरशाह सूरी (स) राव जोधा व हुमायूँ (द) राव चंद्रसेन व अकबर उत्तर: (ब) राव मालदेव व शेरशाह सूरी

प्रश्न 3. गिरी सुमेल का युद्ध किस वर्ष हुआ? (अ) 1526 ई. (ब) 1540 ई. (स) 1544 ई. (द) 1556 ई. उत्तर: (स) 1544 ई.

प्रश्न 4. गिरी सुमेल युद्ध में मारवाड़ सेना का नेतृत्व किन सेनापतियों ने किया? (अ) जैता व कूपा (ब) वीरमदेव व चंद्रसेन (स) राव बीका व राव सातल (द) उदयसिंह व मालदेव उत्तर: (अ) जैता व कूपा

प्रश्न 5. शेरशाह सूरी ने गिरी सुमेल युद्ध के संदर्भ में क्या प्रसिद्ध कथन कहा था? (अ) "मारवाड़ अभेद्य है" (ब) "बाजरे की मुट्ठी भर के लिए हिंदुस्तान का साम्राज्य खोते-खोते बचा" (स) "राजपूत अजेय हैं" (द) कोई नहीं उत्तर: (ब) बाजरे की मुट्ठी भर के लिए हिंदुस्तान का साम्राज्य खोते-खोते बचा (आशय)

प्रश्न 6. राव मालदेव ने मेड़ता पर किससे विजय प्राप्त की? (अ) राव वीरमदेव (ब) राव चूंडा (स) राव बीका (द) राव सातल उत्तर: (अ) राव वीरमदेव

प्रश्न 7. हुमायूँ को राव मालदेव से अपेक्षित सहायता न मिलने के पश्चात वे कहाँ गए? (अ) जैसलमेर (ब) अमरकोट (स) बीकानेर (द) चित्तौड़गढ़ उत्तर: (ब) अमरकोट

प्रश्न 8. अकबर का जन्म कहाँ हुआ था? (अ) आगरा (ब) दिल्ली (स) अमरकोट (द) जोधपुर उत्तर: (स) अमरकोट

प्रश्न 9. राव मालदेव के शासनकाल को किस रूप में जाना जाता है? (अ) मारवाड़ का पतन काल (ब) मारवाड़ का स्वर्णकाल (स) मारवाड़ का संक्रमण काल (द) कोई नहीं उत्तर: (ब) मारवाड़ का स्वर्णकाल

प्रश्न 10. राव मालदेव के पश्चात मारवाड़ की गद्दी पर कौन बैठा? (अ) राव उदयसिंह (ब) राव चंद्रसेन (स) राव बीका (द) राव सातल उत्तर: (ब) राव चंद्रसेन

प्रश्न 11. मेड़ता क्षेत्र किस भक्ति-कवयित्री से सांस्कृतिक रूप से संबद्ध है? (अ) मीराबाई (ब) करणी माता (स) गवरी बाई (द) कोई नहीं उत्तर: (अ) मीराबाई

प्रश्न 12. राव मालदेव की प्रमुख रानी, जो जैसलमेर की राजकुमारी थीं, का नाम क्या था? (अ) उमादे भटियाणी (ब) पद्मिनी (स) कर्मावती (द) हाड़ी रानी उत्तर: (अ) उमादे भटियाणी

प्रश्न 13. राव मालदेव के शासनकाल में मारवाड़ की सीमाएँ किन क्षेत्रों तक विस्तृत हुईं? (अ) केवल जोधपुर तक (ब) मेड़ता, अजमेर, नागौर, सिवाना, जालोर (स) केवल बीकानेर (द) केवल जैसलमेर उत्तर: (ब) मेड़ता, अजमेर, नागौर, सिवाना, जालोर

प्रश्न 14. मेहरानगढ़ दुर्ग का पर्याप्त विस्तार व सुदृढ़ीकरण किस शासक के काल में हुआ? (अ) राव जोधा (ब) राव मालदेव (स) राव बीका (द) राव सातल उत्तर: (ब) राव मालदेव (मूल आधारशिला राव जोधा द्वारा)

प्रश्न 15. राव चंद्रसेन को किस उपनाम से जाना जाता है? (अ) मारवाड़ का अकबर (ब) मारवाड़ का प्रताप (स) मारवाड़ का हुमायूँ (द) कोई नहीं उत्तर: (ब) मारवाड़ का प्रताप

प्रश्न 16. गिरी सुमेल युद्ध में राव मालदेव के व्यक्तिगत युद्धक्षेत्र-उपस्थिति के संदर्भ में क्या सत्य है? (अ) वे स्वयं उपस्थित थे (ब) अधिकांश स्रोतों के अनुसार वे स्वयं उपस्थित नहीं थे (स) पूर्णतः अनुपस्थित रहे, सेना भी नहीं भेजी (द) कोई ऐतिहासिक जानकारी उपलब्ध नहीं उत्तर: (ब) अधिकांश स्रोतों के अनुसार वे स्वयं उपस्थित नहीं थे

प्रश्न 17. राव मालदेव किस वंश-परंपरा से संबंधित थे? (अ) सिसोदिया (ब) राठौड़ (स) कछवाहा (द) भाटी उत्तर: (ब) राठौड़

निष्कर्ष

राव मालदेव का शासनकाल मारवाड़ के इतिहास का वह अध्याय है जहाँ सैन्य शक्ति, कूटनीतिक चतुराई और भौगोलिक विस्तार तीनों एक साथ अपने चरम पर पहुँचे। गिरी सुमेल का युद्ध और हुमायूँ प्रकरण — ये दोनों घटनाएँ न केवल मारवाड़ के इतिहास, बल्कि समूचे उत्तर भारत के मुगल-सूरी सत्ता-संघर्ष के व्यापक फलक से भी जुड़ती हैं, जिसके कारण RPSC परीक्षाओं में इनका महत्व दोहरा हो जाता है — एक ओर राजस्थान-विशिष्ट इतिहास और दूसरी ओर राष्ट्रीय मध्यकालीन इतिहास दोनों के प्रश्न-पत्रों में यह टॉपिक प्रासंगिक बनता है।

अगला अध्ययन सुझाव: इसके बाद "राव चंद्रसेन — मारवाड़ का प्रताप" तथा "बीकानेर का इतिहास — राव बीका" लेख अवश्य पढ़ें, जिससे राठौड़ वंश की संपूर्ण कड़ी (जोधा → मालदेव → चंद्रसेन) स्पष्ट रूप से जुड़ जाएगी।


महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

राव मालदेव राठौड़ मारवाड़ के शासक थे, जिन्होंने अपने शासनकाल (1532–1562 ई.) में मारवाड़ राज्य का ऐतिहासिक रूप से सबसे बड़ा भौगोलिक विस्तार किया।

गिरी सुमेल (सामेल) का युद्ध 1544 ई. में राव मालदेव की सेना और शेरशाह सूरी के मध्य हुआ था, जिसमें मारवाड़ के सेनापति जैता व कूपा ने असाधारण वीरता दिखाई।

हुमायूँ ने शेरशाह सूरी से पराजित होने के बाद मारवाड़ में शरण की अपेक्षा की थी, किंतु राव मालदेव ने राजनीतिक कारणों से अपेक्षित सहायता नहीं दी, जिसके बाद हुमायूँ अमरकोट चले गए, जहाँ अकबर का जन्म हुआ।

राव मालदेव ने मेड़ता, अजमेर, नागौर, सिवाना और जालोर सहित कई क्षेत्रों पर विजय प्राप्त कर मारवाड़ का विस्तार किया।

राव मालदेव के पश्चात उनके पुत्र राव चंद्रसेन मारवाड़ की गद्दी पर बैठे, जिन्हें मुगल अधीनता न स्वीकारने के कारण "मारवाड़ का प्रताप" भी कहा जाता है।

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