जयपुर (कछवाहा) राजवंश का इतिहास — आमेर से जयपुर तक की पूरी गाथा

🎯 Quick Answer Box
कछवाहा राजवंश राजस्थान के ढूंढाड़ क्षेत्र (आमेर-जयपुर) का प्रमुख राजपूत वंश था। इसकी स्थापना दूल्हा राय (ढोला राय) ने 12वीं शताब्दी में आमेर पर विजय प्राप्त कर की थी। इस वंश का सबसे प्रतापी शासक सवाई जयसिंह द्वितीय था, जिसने 1727 ई. में जयपुर शहर की स्थापना की और जंतर मंतर का निर्माण करवाया। राजा भारमल पहले राजपूत शासक थे जिन्होंने मुगल सम्राट अकबर से वैवाहिक संबंध स्थापित किए, और मानसिंह प्रथम मुगल दरबार के "नवरत्नों" में से एक तथा सबसे शक्तिशाली सेनापतियों में गिने जाते थे।
📜 परिचय
राजस्थान के इतिहास में जिन राजपूत वंशों ने अपनी कूटनीति, स्थापत्य कला और प्रशासनिक दूरदर्शिता से विशिष्ट स्थान बनाया, उनमें कछवाहा वंश का नाम सबसे ऊपर आता है। जहाँ मेवाड़ के सिसोदिया और मारवाड़ के राठौड़ मुगलों से संघर्ष के लिए जाने जाते हैं, वहीं कछवाहा वंश मुगलों के साथ सहयोग और समन्वय की नीति अपनाकर सत्ता, समृद्धि और सांस्कृतिक वैभव के शिखर पर पहुँचा। आमेर की पहाड़ियों से शुरू हुई यह गाथा 1727 में गुलाबी नगरी जयपुर की स्थापना तक पहुँचती है — एक ऐसा शहर जो आज विश्व धरोहर सूची में शामिल है।
यह लेख RPSC, RAS, RSMSSB, पटवारी, ग्राम सेवक, REET एवं SI परीक्षाओं के दृष्टिकोण से कछवाहा वंश के संपूर्ण इतिहास, प्रमुख शासकों, वास्तुकला और परीक्षा में पूछे जाने वाले भ्रामक तथ्यों (Exam Traps) को विस्तार से कवर करता है।
1. कछवाहा वंश की उत्पत्ति
- कछवाहा राजपूत स्वयं को भगवान राम के पुत्र कुश का वंशज मानते हैं, अर्थात यह सूर्यवंशी क्षत्रिय कुल है।
- मूल रूप से यह वंश ग्वालियर (नरवर) क्षेत्र से संबंधित माना जाता है।
- दूल्हा राय (ढोला राय) को कछवाहा वंश का ढूंढाड़ क्षेत्र में संस्थापक माना जाता है। उसने स्थानीय मीणा शासकों को पराजित कर दौसा और बाद में आमेर पर अधिकार किया।
- कुछ इतिहासकार आमेर विजय का श्रेय दूल्हा राय के उत्तराधिकारी कोकिल देव (कांकिल देव) को भी देते हैं — यह एक विवादित बिंदु है जिसे परीक्षा में सावधानी से पढ़ना चाहिए।
- आमेर से पहले यह क्षेत्र मीणा जाति के अधीन था, विशेषकर भाटो मीणा और सूसावत मीणा शाखाओं के अधीन।
2. आरंभिक शासक (12वीं–15वीं शताब्दी)
आमेर विजय के बाद कछवाहा वंश की सत्ता धीरे-धीरे सुदृढ़ हुई। इस काल के शासकों ने मुख्यतः क्षेत्रीय विस्तार और सुरक्षा पर ध्यान केंद्रित किया। इस कालखंड के उल्लेखनीय नामों में कोकिल देव, हूण देव, कुंतल, पजून देव तथा उद्धरण देव शामिल हैं। हालांकि इस अवधि के अभिलेखीय प्रमाण सीमित हैं, इसलिए वंशावली को लेकर इतिहासकारों में मतभेद पाए जाते हैं।
15वीं शताब्दी में राजा पृथ्वीराज कछवाहा (1503–1527 ई.) के समय आमेर राज्य का विस्तार हुआ। कहा जाता है कि उनके तीन दर्जन से अधिक पुत्र थे, जिनमें से कई ने आगे चलकर अलग-अलग ठिकानों (जैसे शेखावाटी क्षेत्र में शेखावत शाखा) की स्थापना की। राव शेखा पृथ्वीराज के ही एक पुत्र थे, जिनके वंशज आगे चलकर शेखावत कहलाए और शेखावाटी क्षेत्र (सीकर, झुंझुनू, चूरू) में स्वतंत्र सत्ता स्थापित की।
3. मुगलों से संबंध की शुरुआत — राजा भारमल (1548–1574 ई.)
कछवाहा वंश के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण मोड़ राजा भारमल के शासनकाल में आया।
- भारमल पहले राजपूत शासक थे जिन्होंने मुगल सम्राट अकबर से 1562 ई. में वैवाहिक संबंध स्थापित किया — अपनी पुत्री हरखा बाई (जोधा बाई के नाम से प्रचलित, हालांकि यह नाम बाद में जोड़ा गया माना जाता है) का विवाह अकबर से करवाया।
- यह संबंध राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत सफल सिद्ध हुआ — इसने आमेर को मुगल साम्राज्य में एक विश्वस्त और शक्तिशाली सहयोगी के रूप में स्थापित किया।
- भारमल को अकबर के दरबार में उच्च मनसब और सम्मान प्राप्त हुआ।
ध्यान दें: भारमल की मुगल-मैत्री नीति को अक्सर मेवाड़ के महाराणा प्रताप के प्रतिरोध से तुलनात्मक रूप से पूछा जाता है — यह "सहयोग बनाम संघर्ष" की दो प्रतिस्पर्धी नीतियों का सबसे बड़ा उदाहरण है।
4. भगवंत दास (1574–1589 ई.)
भारमल के पुत्र भगवंत दास भी अकबर के विश्वस्त सामंतों में से एक थे। उन्होंने कई सैन्य अभियानों में अकबर का साथ दिया और पंजाब का सूबेदार भी नियुक्त हुए। उनकी पुत्री का विवाह अकबर के पुत्र जहाँगीर (सलीम) से हुआ, जिससे आमेर-मुगल संबंध और प्रगाढ़ हुए।
5. मानसिंह प्रथम — "मिर्जा राजा" (1589–1614 ई.)
कछवाहा वंश के सबसे प्रतापी और प्रसिद्ध शासकों में राजा मानसिंह प्रथम का नाम अग्रणी है।
- वे अकबर के दरबार के नवरत्नों में शामिल थे और उन्हें "मिर्जा राजा" की उपाधि प्राप्त थी — यह उपाधि अकबर ने उन्हें और बाद में जयसिंह प्रथम को प्रदान की थी।
- मानसिंह अकबर के सबसे विश्वसनीय सेनापतियों में से एक थे — उन्होंने 1576 ई. के हल्दीघाटी युद्ध में मुगल सेना का नेतृत्व किया, जिसमें महाराणा प्रताप की सेना का सामना हुआ।
- वे काबुल, बंगाल, बिहार और दक्कन के सूबेदार (गवर्नर) रह चुके थे — यह दर्शाता है कि मुगल प्रशासन में उनकी पकड़ कितनी व्यापक थी।
- मानसिंह ने आमेर में आमेर किले (जयगढ़ सहित) के पुनर्निर्माण की नींव रखी, जो बाद के शासकों द्वारा विस्तारित हुआ।
- उन्होंने वृंदावन में गोविंद देव जी मंदिर का निर्माण भी करवाया।
Exam Trap: हल्दीघाटी युद्ध (1576) में मुगल सेना का नेतृत्व मानसिंह प्रथम ने किया था, न कि किसी अन्य कछवाहा शासक ने — यह तथ्य अक्सर जयसिंह प्रथम या द्वितीय के साथ भ्रमित कर दिया जाता है।
6. मिर्जा राजा जयसिंह प्रथम (1621–1667 ई.)
- जयसिंह प्रथम को भी "मिर्जा राजा" की उपाधि प्राप्त हुई थी — यह उपाधि पाने वाले वे कछवाहा वंश के दूसरे शासक थे (पहले मानसिंह प्रथम)।
- वे शाहजहाँ और औरंगजेब दोनों के शासनकाल में सक्रिय रहे।
- 1665 ई. की पुरंदर की संधि के लिए सबसे अधिक जाने जाते हैं — औरंगजेब की ओर से मराठा शासक शिवाजी महाराज के साथ यह संधि जयसिंह प्रथम ने ही करवाई थी, जिसके तहत शिवाजी को अपने कई किले मुगलों को सौंपने पड़े थे।
Exam Trap: पुरंदर की संधि (1665) करवाने वाले मुगल सेनापति जयसिंह प्रथम (मिर्जा राजा जयसिंह) थे — इसे सवाई जयसिंह द्वितीय (जयपुर के संस्थापक) के साथ भ्रमित न करें। दोनों अलग-अलग शासक हैं और परीक्षाओं में यह सबसे आम गलती है।
7. सवाई जयसिंह द्वितीय — जयपुर के संस्थापक (1699–1743 ई.)
कछवाहा वंश और समूचे राजस्थान के इतिहास में सवाई जयसिंह द्वितीय का स्थान अद्वितीय है।
प्रमुख उपलब्धियाँ
- मात्र 11 वर्ष की आयु में गद्दी पर बैठे।
- मुगल सम्राट औरंगजेब ने उन्हें "सवाई" की उपाधि प्रदान की, जिसका अर्थ है "सवा गुना अधिक बुद्धिमान/शक्तिशाली" — यह उपाधि इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह उनके बाद के सभी उत्तराधिकारियों के नाम के साथ भी जुड़ी रही (सवाई प्रताप सिंह, सवाई मानसिंह द्वितीय आदि)।
- 1727 ई. में जयपुर शहर की स्थापना — आमेर की सीमित भौगोलिक क्षमता और बढ़ती जनसंख्या को देखते हुए उन्होंने एक नई, सुनियोजित राजधानी बसाने का निर्णय लिया।
- जयपुर की नगर योजना वास्तुशास्त्र और शिल्प शास्त्र के सिद्धांतों पर आधारित है और इसे वास्तुविद विद्याधर भट्टाचार्य ने डिज़ाइन किया था। यह शहर 9 वर्गाकार खंडों (चौकड़ी) में बँटा है, जो नवग्रह के सिद्धांत पर आधारित है।
- जयसिंह द्वितीय स्वयं एक कुशल खगोलशास्त्री (astronomer) थे। उन्होंने भारत के पाँच शहरों — जयपुर, दिल्ली, उज्जैन, मथुरा और वाराणसी — में जंतर मंतर (वेधशाला) का निर्माण करवाया। जयपुर का जंतर मंतर सबसे बड़ा और सबसे सुरक्षित है, जिसे 2010 में यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया।
- उन्होंने खगोलीय गणनाओं में सुधार हेतु "जिज मुहम्मदशाही" नामक खगोलीय सारणी तैयार करवाई।
- सैन्य दृष्टि से वे मुगल दरबार में मालवा और आगरा के सूबेदार भी रहे।
Exam Trap: जयपुर शहर की स्थापना 1727 ई. में हुई थी, आमेर 1727 में नहीं बसाया गया था (आमेर तो 12वीं शताब्दी से ही कछवाहा राजधानी थी) — जयपुर आमेर की जगह नई राजधानी के रूप में बसाया गया, आमेर को त्यागा नहीं गया था बल्कि दोनों साथ-साथ अस्तित्व में रहे।
8. सवाई ईश्वरी सिंह (1743–1750 ई.)
जयसिंह द्वितीय की मृत्यु के बाद उनके पुत्र ईश्वरी सिंह और सौतेले भाई माधोसिंह प्रथम के बीच उत्तराधिकार को लेकर संघर्ष हुआ, जिसमें मराठों का हस्तक्षेप भी हुआ। ईश्वरी सिंह को मराठा दबाव का लगातार सामना करना पड़ा और अंततः विषम परिस्थितियों में उन्होंने आत्महत्या कर ली — यह घटना जयपुर के इतिहास में मराठा प्रभाव के बढ़ते दबाव का प्रतीक मानी जाती है।
9. सवाई प्रताप सिंह (1778–1803 ई.)
- हवा महल (1799 ई.) के निर्माण के लिए सबसे अधिक प्रसिद्ध, जिसे राजपरिवार की महिलाओं को पर्दे में रहते हुए शहर की गतिविधियाँ देखने के लिए बनवाया गया था।
- स्वयं एक कवि और कला प्रेमी थे; उन्होंने ब्रजनिधि उपनाम से रचनाएँ भी लिखीं।
- उनके शासनकाल में जयपुर में कृष्ण भक्ति और साहित्य को व्यापक संरक्षण मिला।
10. सवाई राम सिंह द्वितीय (1835–1880 ई.)
- आधुनिकीकरण के प्रति विशेष रुचि रखने वाले शासक — उन्होंने जयपुर में स्कूल, अस्पताल, संग्रहालय (अल्बर्ट हॉल म्यूज़ियम की नींव) जैसी सुविधाएँ शुरू करवाईं।
- 1876 ई. में प्रिंस ऑफ वेल्स (एडवर्ड सप्तम) की जयपुर यात्रा के स्वागत हेतु पूरे शहर को गुलाबी रंग से रंगवाया — यहीं से जयपुर को "गुलाबी नगरी (Pink City)" कहा जाने लगा।
- 1857 की क्रांति के दौरान अंग्रेजों के प्रति सहयोगी रुख अपनाया।
Exam Trap: जयपुर को "गुलाबी नगरी" बनाने/रंगवाने का श्रेय सवाई जयसिंह द्वितीय (संस्थापक) को नहीं, बल्कि सवाई राम सिंह द्वितीय को जाता है — यह तिथि व शासक दोनों ही परीक्षाओं में बार-बार भ्रमित की जाती है।
11. सवाई माधो सिंह द्वितीय (1880–1922 ई.)
- 1876 ई. में जन्मे रामसिंह द्वितीय के दत्तक पुत्र; उनके शासनकाल में जयपुर रियासत में रेलवे, टेलीग्राफ और आधुनिक प्रशासनिक ढाँचे का विस्तार हुआ।
- 1902 में दिल्ली दरबार में भाग लिया, जहाँ उन्होंने चांदी के विशाल कलशों में गंगाजल ले जाकर अपनी धार्मिक निष्ठा प्रदर्शित की — ये कलश आज भी "गंगाजली" के नाम से सिटी पैलेस संग्रहालय में सुरक्षित हैं और गिनीज़ बुक में सबसे बड़े चाँदी के पात्रों के रूप में दर्ज हैं।
12. सवाई मानसिंह द्वितीय — अंतिम शासक (1922–1949/1970)
- जयपुर रियासत के अंतिम शासक (रूलिंग महाराजा), जिन्होंने 1949 ई. में भारतीय संघ में विलय के दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर किए।
- विलय के बाद वे राजस्थान संघ के राजप्रमुख (1949–1956) नियुक्त हुए।
- उनकी पत्नी महारानी गायत्री देवी एक प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ बनीं और स्वतंत्र भारत में जयपुर से लोकसभा सांसद चुनी गईं।
Exam Trap: राजस्थान में रियासतों के एकीकरण की प्रक्रिया में जयपुर चतुर्थ चरण (28 मार्च 1949, वृहद राजस्थान) के अंतर्गत शामिल हुआ था, न कि प्रथम चरण (मत्स्य संघ) में — जयपुर को मत्स्य संघ का हिस्सा समझ लेना एक सामान्य त्रुटि है।
13. कछवाहा वंश की संक्षिप्त वंशावली तालिका
| क्रम | शासक | शासनकाल (लगभग) | प्रमुख योगदान |
|---|---|---|---|
| 1 | दूल्हा राय (ढोला राय) | 12वीं शताब्दी | आमेर विजय, वंश संस्थापक |
| 2 | राजा पृथ्वीराज कछवाहा | 1503–1527 | विस्तार, शेखावत शाखा का उदय |
| 3 | राजा भारमल | 1548–1574 | अकबर से प्रथम वैवाहिक संबंध |
| 4 | भगवंत दास | 1574–1589 | मुगल सूबेदार, जहाँगीर से वैवाहिक संबंध |
| 5 | मानसिंह प्रथम | 1589–1614 | "मिर्जा राजा", हल्दीघाटी में मुगल सेनानायक, नवरत्न |
| 6 | मिर्जा राजा जयसिंह प्रथम | 1621–1667 | पुरंदर की संधि (1665) |
| 7 | सवाई जयसिंह द्वितीय | 1699–1743 | जयपुर की स्थापना (1727), जंतर मंतर |
| 8 | ईश्वरी सिंह | 1743–1750 | मराठा दबाव, उत्तराधिकार संघर्ष |
| 9 | सवाई प्रताप सिंह | 1778–1803 | हवा महल (1799) |
| 10 | सवाई राम सिंह द्वितीय | 1835–1880 | गुलाबी नगरी, आधुनिकीकरण |
| 11 | सवाई माधो सिंह द्वितीय | 1880–1922 | गंगाजली, दिल्ली दरबार |
| 12 | सवाई मानसिंह द्वितीय | 1922–1949 | अंतिम शासक, भारत संघ में विलय |
14. स्थापत्य एवं सांस्कृतिक योगदान
| स्मारक/धरोहर | निर्माणकर्ता | विशेषता |
|---|---|---|
| आमेर किला | मानसिंह प्रथम (आधार), बाद के शासकों द्वारा विस्तार | यूनेस्को विश्व धरोहर (हिल फोर्ट्स ऑफ राजस्थान, 2013) |
| जयगढ़ किला | जयसिंह द्वितीय | जयवाणा तोप, सुरक्षा दृष्टि से आमेर से जुड़ा |
| जंतर मंतर, जयपुर | सवाई जयसिंह द्वितीय | विश्व की सबसे बड़ी पत्थर की वेधशाला, यूनेस्को (2010) |
| हवा महल | सवाई प्रताप सिंह | 953 झरोखे, पर्दा प्रथा हेतु निर्मित |
| सिटी पैलेस, जयपुर | सवाई जयसिंह द्वितीय (आरंभ) | जयपुर राजघराने का मुख्य निवास |
| अल्बर्ट हॉल संग्रहालय | सवाई राम सिंह द्वितीय | इंडो-सारसेनिक शैली, राजस्थान का सबसे पुराना संग्रहालय |
🚫 Exam Trap Section — बार-बार पूछे जाने वाले भ्रामक तथ्य
- मानसिंह प्रथम बनाम जयसिंह प्रथम बनाम जयसिंह द्वितीय — तीनों अलग-अलग शासक हैं। मानसिंह प्रथम हल्दीघाटी (1576) से जुड़े हैं, जयसिंह प्रथम पुरंदर संधि (1665) से, और जयसिंह द्वितीय जयपुर स्थापना (1727) व जंतर मंतर से।
- "सवाई" उपाधि सर्वप्रथम जयसिंह द्वितीय को औरंगजेब ने दी थी, न कि किसी अन्य शासक ने — यह उपाधि आगे वंशानुगत रूप से प्रयुक्त होती रही।
- गुलाबी नगरी का श्रेय जयपुर के संस्थापक जयसिंह द्वितीय को नहीं बल्कि रामसिंह द्वितीय (1876) को जाता है।
- जयपुर की स्थापना 1727 ई. — इसे आमेर की स्थापना समझने की भूल न करें; आमेर 12वीं शताब्दी से कछवाहा राजधानी था।
- कछवाहा वंश सूर्यवंशी है (राम-कुश वंशावली), जबकि राठौड़ वंश भी सूर्यवंशी माना जाता है परंतु दोनों की उत्पत्ति-कथाएँ भिन्न हैं — इन्हें मिलाया नहीं जाना चाहिए।
- जयपुर का एकीकरण चरण — यह वृहद राजस्थान (चतुर्थ चरण, 30 मार्च 1949) का भाग था, मत्स्य संघ (प्रथम चरण) का नहीं।
- जंतर मंतर पाँच शहरों में बना — केवल जयपुर में नहीं; दिल्ली, उज्जैन, मथुरा और वाराणसी में भी, परंतु मथुरा वाला अब अस्तित्व में नहीं है।
🧠 Memory Tricks
- "मि-ज-पु" = मिर्जा राजा (मानसिंह प्रथम व जयसिंह प्रथम दोनों को यह उपाधि मिली) → जयसिंह द्वितीय ने पुरंदर संधि नहीं, बल्कि जयपुर बसाया (भ्रम से बचने के लिए विपरीत याद रखें: पुरंदर = जयसिंह प्रथम, जयपुर = जयसिंह द्वितीय)।
- "भारमल की बेटी, मानसिंह का बल, जयसिंह की अक्ल (सवाई)" — तीन पीढ़ियों के योगदान को याद रखने की सरल कड़ी: भारमल (वैवाहिक कूटनीति), मानसिंह प्रथम (सैन्य शक्ति), जयसिंह द्वितीय (बुद्धि/सवाई उपाधि/खगोलशास्त्र)।
- गुलाबी = राम — "गुलाबी नगरी" और "रामसिंह द्वितीय" दोनों में उभयनिष्ठ अक्षर याद रखें।
👨🏫 Teacher's Commentary
छात्रों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि कछवाहा वंश में एक ही नाम के कई शासक (जयसिंह प्रथम व द्वितीय, मानसिंह प्रथम व द्वितीय) हुए हैं, और मुगल दरबार से उनकी घनिष्ठता के कारण उपाधियाँ (मिर्जा राजा, सवाई) भी समान रूप से प्रयुक्त हुई हैं। परीक्षा में शासक के नाम के साथ शासनकाल और सबसे बड़ी घटना को जोड़कर याद करना ही सबसे सुरक्षित रणनीति है — जैसे "मानसिंह प्रथम = हल्दीघाटी", "जयसिंह प्रथम = पुरंदर संधि", "जयसिंह द्वितीय = जयपुर + जंतर मंतर"। इसके अतिरिक्त, कछवाहा वंश की मुगल-सहयोग नीति को मेवाड़ की प्रतिरोध नीति के साथ तुलनात्मक प्रश्नों (Comparative Questions) के रूप में भी पूछा जाता है, इसलिए दोनों वंशों के दृष्टिकोण का अंतर स्पष्ट रूप से समझना आवश्यक है।
सुयोग AI गुरु
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🎯 विगत वर्षों के प्रश्न (Interactive PYQs)
Q1. कछवाहा वंश (आमेर शाखा) का संस्थापक किसे माना जाता है?
Q2. जयपुर शहर की स्थापना किस वर्ष हुई थी?
Q3. अकबर से वैवाहिक संबंध स्थापित करने वाले पहले कछवाहा (राजपूत) शासक कौन थे?
Q4. हल्दीघाटी युद्ध (1576) में मुगल सेना का नेतृत्व किसने किया था?
Q5. पुरंदर की संधि (1665) किसने और किसके साथ करवाई थी?
Q6. 'सवाई' की उपाधि सवाई जयसिंह द्वितीय को किसने प्रदान की थी?
Q7. जयपुर का जंतर मंतर किसने बनवाया था?
Q8. जयपुर का जंतर मंतर किस वर्ष यूनेस्को विश्व धरोहर घोषित हुआ?
Q9. हवा महल का निर्माण किसने करवाया था?
Q10. जयपुर को 'गुलाबी नगरी' किसने और कब बनवाया?
Q11. जयपुर की नगर योजना किस वास्तुविद ने तैयार की थी?
Q12. 'गंगाजली' (विश्व के सबसे बड़े चाँदी के पात्र) किस शासक से संबंधित हैं?
Q13. जयपुर रियासत के अंतिम शासक कौन थे?
Q14. कछवाहा वंश स्वयं को किस वंश का वंशज मानता है?
Q15. आमेर विजय से पूर्व यह क्षेत्र किस जाति के अधीन था?
Q16. 'मिर्जा राजा' की उपाधि किन दो शासकों को प्राप्त हुई थी?
Q17. शेखावत शाखा (शेखावाटी क्षेत्र) की उत्पत्ति किस कछवाहा शासक के वंशजों से हुई?
Q18. जयपुर रियासत का भारतीय संघ में विलय राजस्थान एकीकरण के किस चरण में हुआ?
Q19. सवाई मानसिंह द्वितीय की पत्नी, जो स्वतंत्र भारत में सांसद बनीं, कौन थीं?
Q20. आमेर किले के प्रारंभिक निर्माण/सुदृढ़ीकरण का श्रेय किस शासक को दिया जाता है?
महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)
कछवाहा वंश (आमेर शाखा) की स्थापना दूल्हा राय (ढोला राय) ने 12वीं शताब्दी में आमेर विजय के साथ की थी।
यह उपाधि मानसिंह प्रथम और जयसिंह प्रथम — दोनों को मुगल सम्राटों द्वारा प्रदान की गई थी।
सवाई राम सिंह द्वितीय ने 1876 ई. में प्रिंस ऑफ वेल्स के स्वागत हेतु शहर को गुलाबी रंग से रंगवाया।
जयपुर शहर की स्थापना सवाई जयसिंह द्वितीय ने 1727 ई. में की थी।
सवाई मानसिंह द्वितीय जयपुर के अंतिम शासक थे; रियासत का भारतीय संघ में विलय 1949 ई. में हुआ था।
सवाई प्रताप सिंह ने 1799 ई. में हवा महल का निर्माण करवाया था।
राजा भारमल पहले कछवाहा (और पहले राजपूत) शासक थे जिन्होंने 1562 ई. में अकबर से वैवाहिक संबंध स्थापित किया।
यह संधि 1665 ई. में मुगल सेनापति मिर्जा राजा जयसिंह प्रथम और मराठा शासक शिवाजी महाराज के बीच हुई थी।
राजा मानसिंह प्रथम ने 1576 ई. के हल्दीघाटी युद्ध में मुगल सेना का नेतृत्व किया था।
सवाई जयसिंह द्वितीय ने, जो स्वयं एक कुशल खगोलशास्त्री थे, पाँच शहरों में जंतर मंतर वेधशालाएँ बनवाईं।