मारवाड़ राजवंश — महाराजा अजीत सिंह: मारवाड़ की स्वतंत्रता की पुनर्स्थापना (RPSC विशेष)

लेखक की विशेषज्ञता नोट (E-E-A-T): यह लेख राजस्थान इतिहास के "राठौड़ वंश" अध्याय की सातवीं कड़ी है, RPSC/RAS पाठ्यक्रम-आधारित शोध पर केंद्रित। तिथियों व घटनाक्रमों को प्रकाशन से पूर्व RPSC आधिकारिक सिलेबस एवं राज्य पाठ्यपुस्तक मंडल की सामग्री से क्रॉस-वेरिफाई करने की अनुशंसा की जाती है, क्योंकि 18वीं शताब्दी के प्रारंभिक मुगल-राजपूत राजनीति की कुछ तिथियों पर विभिन्न स्रोतों में मतभेद पाया जाता है।
यह लेख श्रृंखला की सातवीं कड़ी है। इससे पहले वीर दुर्गादास राठौड़ पर प्रकाशित लेख अवश्य पढ़ें, क्योंकि महाराजा अजीत सिंह की पूरी कहानी उसी शिशु-रक्षा और 30-वर्षीय संघर्ष की परिणति है।
प्रस्तावना: संघर्ष की भट्टी में तपकर निकला शासक
पिछले लेख में हमने पढ़ा कि कैसे वीर दुर्गादास राठौड़ ने शिशु अजीत सिंह की रक्षा करते हुए तीन दशकों तक औरंगजेब से संघर्ष जारी रखा। अब हम उसी संघर्ष के फल — महाराजा अजीत सिंह के स्वतंत्र शासनकाल — को विस्तार से समझेंगे। जो बालक जन्म लेते ही मुगल साम्राज्य के लिए एक राजनीतिक खतरा बन गया था, वही आगे चलकर मारवाड़ का एक सशक्त, स्वतंत्र और सुधारवादी शासक सिद्ध हुआ।
RPSC, RAS, RSMSSB और REET जैसी परीक्षाओं में अजीत सिंह की जोधपुर-पुनर्प्राप्ति, धार्मिक पुनर्स्थापना नीति, राजपूत त्रिगुट (मारवाड़-मेवाड़-आमेर) और उनकी दुखद हत्या से जुड़े प्रश्न नियमित रूप से पूछे जाते हैं।
1. महाराजा अजीत सिंह: जन्म से स्वतंत्र शासन तक
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| पूरा नाम | महाराजा अजीत सिंह राठौड़ |
| पिता | महाराजा जसवंत सिंह प्रथम |
| जन्म | 1679 ई. (मरणोपरांत, जसवंत सिंह की मृत्यु के पश्चात) |
| संरक्षक | वीर दुर्गादास राठौड़ |
| स्वतंत्र शासनकाल | लगभग 1707/1709 ई. – 1731 ई. |
| प्रमुख उपलब्धि | जोधपुर की पूर्ण पुनर्प्राप्ति, धार्मिक पुनर्स्थापना नीति |
| मृत्यु | 1731 ई. (पुत्र बख्तसिंह द्वारा हत्या — मत-भिन्नता सहित) |
| उत्तराधिकारी | महाराजा अभयसिंह |
औरंगजेब की मृत्यु (1707 ई.) के पश्चात मुगल साम्राज्य में उत्पन्न राजनीतिक अस्थिरता का लाभ उठाते हुए अजीत सिंह ने जोधपुर पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित कर लिया। यहीं से उनके स्वतंत्र शासनकाल का वास्तविक प्रारंभ माना जाता है।
शिक्षक टिप्पणी: परीक्षा में अक्सर "अजीत सिंह के जन्म वर्ष (1679 ई.)" और "उनके औपचारिक शासन प्रारंभ (1707/1709 ई.)" के मध्य के लगभग 28-30 वर्षों के अंतराल को समझना आवश्यक है — यह पूरा काल दुर्गादास के संरक्षण में संघर्षरत रहा, न कि अजीत सिंह के प्रत्यक्ष शासन में।
1.1 बाल्यकाल: छिपकर बड़ा होता एक राजकुमार
अजीत सिंह का बचपन किसी सामान्य राजकुमार जैसा नहीं था। जन्म के तुरंत बाद से ही उन्हें औरंगजेब की खोजी निगाहों से बचाकर विभिन्न सुरक्षित स्थानों में छिपाकर रखा गया — कभी दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में, कभी विश्वस्त राजपूत परिवारों की देखरेख में, तो कभी वेश बदलकर स्थान परिवर्तन करते हुए। यह परिस्थिति उन्हें बचपन से ही सतर्कता, धैर्य और रणनीतिक सोच सिखाती रही, जो आगे चलकर उनके शासनकाल में स्पष्ट रूप से झलकती है।
दुर्गादास राठौड़ के अतिरिक्त कुछ अन्य राठौड़ सरदारों — जैसे रामसिंह मेड़तिया — का भी इस सुरक्षा-अभियान में महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है, यद्यपि दुर्गादास का नाम इस गाथा में सर्वाधिक प्रमुखता से जुड़ा है। इस दीर्घकालिक बाल्यकाल-संघर्ष के दौरान अजीत सिंह को औपचारिक राजसी शिक्षा के साथ-साथ व्यावहारिक युद्ध-कौशल व राजनीतिक सूझबूझ का भी प्रशिक्षण प्राप्त हुआ, जो उस काल के अन्य राजकुमारों से उन्हें भिन्न बनाता है।
शिक्षक टिप्पणी: RAS मुख्य परीक्षा में यदि "बाल्यकाल के अनुभवों का शासकीय व्यक्तित्व पर प्रभाव" जैसा विश्लेषणात्मक प्रश्न आए, तो अजीत सिंह का उदाहरण एक उत्कृष्ट केस-स्टडी प्रस्तुत करता है — संघर्षपूर्ण बाल्यकाल ने उन्हें एक सतर्क, व्यावहारिक व दृढ़ शासक बनाया।
1.2 1707 ई. की मुगल राजनीतिक अस्थिरता: अवसर की पृष्ठभूमि
अजीत सिंह के सत्ता तक पहुँचने को समझने के लिए 1707 ई. की मुगल राजनीतिक परिस्थिति को समझना आवश्यक है। औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात मुगल साम्राज्य में उनके पुत्रों — आज़म शाह, मुअज्जम (आगे चलकर बहादुर शाह प्रथम) और कामबख्श — के मध्य उत्तराधिकार-युद्ध छिड़ गया। इस आंतरिक कलह ने मुगल साम्राज्य की सैन्य व प्रशासनिक शक्ति को अस्थायी रूप से बुरी तरह कमजोर कर दिया।
अजीत सिंह और दुर्गादास राठौड़ ने इस अवसर को अत्यंत कुशलता से भाँपा — जब मुगल साम्राज्य अपने ही आंतरिक उत्तराधिकार-संघर्ष में उलझा था, तब मारवाड़ पर मुगल सैन्य ध्यान स्वाभाविक रूप से कम हो गया। यही राजनीतिक शून्यता वह अवसर बनी जिसका उपयोग कर अजीत सिंह ने जोधपुर पर निर्णायक व स्थायी नियंत्रण स्थापित किया।
| मुगल उत्तराधिकार-प्रतिस्पर्धी | परिणाम |
|---|---|
| मुअज्जम (आगे बहादुर शाह प्रथम) | विजयी, मुगल सिंहासन प्राप्त |
| आज़म शाह | पराजित व मारा गया |
| कामबख्श | पराजित व मारा गया |
एग्जाम ट्रैप: कई विद्यार्थी यह मान लेते हैं कि अजीत सिंह ने जोधपुर सीधे औरंगजेब से युद्ध जीतकर प्राप्त किया। ध्यान रखें — औरंगजेब की मृत्यु स्वाभाविक कारणों से हुई (1707 ई., अहमदनगर में), न कि किसी युद्ध में; अजीत सिंह ने उसके पश्चात उत्पन्न उत्तराधिकार-अराजकता का लाभ उठाकर जोधपुर पर नियंत्रण स्थापित किया।
2. जोधपुर की पूर्ण पुनर्प्राप्ति और धार्मिक पुनर्स्थापना नीति
सत्ता प्राप्त करते ही अजीत सिंह ने सबसे पहले औरंगजेब के मारवाड़-अधिग्रहण काल में लागू की गई नीतियों को पलटना प्रारंभ किया। इस संदर्भ में उनकी सबसे चर्चित नीति थी — धार्मिक पुनर्स्थापना।
प्रमुख कदम
- मस्जिदों को हटाना: मुगल अधिग्रहण के दौरान जोधपुर में बनाई गई मस्जिदों को हटाकर, कई स्थानों पर पूर्व-स्थित हिंदू मंदिरों का पुनर्निर्माण करवाया गया।
- पुनर्धर्मांतरण (शुद्धि) को प्रोत्साहन: औरंगजेब काल में बलपूर्वक इस्लाम धर्म अपनाने वाले हिंदुओं को पुनः हिंदू धर्म में वापस लाने की नीति अपनाई गई — यह भारतीय इतिहास में "शुद्धि" जैसी अवधारणा के प्रारंभिक उदाहरणों में गिना जाता है।
- प्रशासनिक ढाँचे का पुनर्गठन: मुगल-नियुक्त अधिकारियों को हटाकर राठौड़ वंश-निष्ठ प्रशासनिक ढाँचे को पुनः स्थापित किया गया।
एग्जाम ट्रैप: अजीत सिंह की "पुनर्धर्मांतरण नीति" को कई विद्यार्थी आधुनिक कालीन शुद्धि आंदोलन (जैसे आर्य समाज से संबंधित) से जोड़कर भ्रमित हो जाते हैं। ध्यान रखें — अजीत सिंह की यह नीति 18वीं शताब्दी के प्रारंभिक काल की है, आर्य समाज आंदोलन (19वीं शताब्दी) से कहीं पूर्व की। दोनों को कालक्रम की दृष्टि से स्पष्ट रूप से अलग रखें।
मेमोरी ट्रिक: "अजीत ने हटाई मस्जिद, बसाया फिर से मंदिर" — यह पंक्ति उनकी धार्मिक पुनर्स्थापना नीति को याद रखने में सहायक है।
3. राजपूत त्रिगुट: मारवाड़-मेवाड़-आमेर गठबंधन
अजीत सिंह के प्रारंभिक शासनकाल में मारवाड़, मेवाड़ और आमेर — तीनों प्रमुख राजपूत रियासतों के मध्य एक अस्थायी किंतु महत्वपूर्ण राजनीतिक-सामरिक गठबंधन (जिसे इतिहासकार "राजपूत त्रिगुट" या "हुरड़ा सम्मेलन-पूर्व सहयोग" की प्रारंभिक कड़ी मानते हैं) बना। यह गठबंधन मुगल साम्राज्य के कमजोर पड़ते नियंत्रण के दौर में राजपूत रियासतों की स्वायत्तता सुरक्षित रखने के उद्देश्य से बना था।
इस सहयोग के फलस्वरूप तीनों रियासतों ने वैवाहिक संबंधों के माध्यम से भी अपने गठबंधन को सुदृढ़ किया, जो आगे चलकर 18वीं शताब्दी की राजपूत राजनीति (और बाद में प्रसिद्ध हुरड़ा सम्मेलन, 1734 ई. — जो अजीत सिंह के काल के कुछ पश्चात हुआ) की पृष्ठभूमि तैयार करता है।
सत्यापन सलाह: "राजपूत त्रिगुट" शब्दावली को लेकर विभिन्न स्रोतों में भिन्न-भिन्न विवरण मिलते हैं — कुछ इसे औपचारिक संधि मानते हैं, तो कुछ इसे केवल कूटनीतिक सहयोग की अनौपचारिक व्यवस्था बताते हैं। परीक्षा में इसे सामान्य शब्दों में "राजपूत रियासतों के मध्य सहयोग" के रूप में प्रस्तुत करना सुरक्षित रहता है।
4. मुगल दरबार से समझौता: बहादुर शाह प्रथम के काल में सामंजस्य
यद्यपि अजीत सिंह ने प्रारंभ में मुगल-विरोधी रुख अपनाया, किंतु राठौड़ वंश की पारंपरिक व्यावहारिक कूटनीति (जैसा राव उदयसिंह के समय से चली आ रही थी) के अनुरूप, उन्होंने भी समय के साथ मुगल सम्राट बहादुर शाह प्रथम (औरंगजेब के उत्तराधिकारी) से सामंजस्य स्थापित किया।
इस सामंजस्य के अंतर्गत अजीत सिंह को पुनः मुगल दरबार में सम्मानजनक स्थान, उच्च मनसब और विभिन्न प्रांतों की सूबेदारी प्राप्त हुई।
| प्रांत | कार्यकाल (सूबेदार के रूप में) |
|---|---|
| गुजरात | विभिन्न अवधियों में सूबेदार नियुक्त |
| अजमेर | विभिन्न अवधियों में सूबेदार नियुक्त |
आगे चलकर मुगल दरबार में सैयद बंधुओं (सैयद हुसैन अली व सैयद अब्दुल्लाह — किंगमेकर के रूप में प्रसिद्ध) की राजनीति के दौर में भी अजीत सिंह ने सक्रिय भूमिका निभाई और सम्राट फर्रुखसियर व मुहम्मद शाह के काल में भी अपनी राजनीतिक स्थिति बनाए रखी।
शिक्षक की एग्जाम रणनीति: अजीत सिंह का यह "प्रतिरोध से सामंजस्य" वाला मार्ग राव उदयसिंह की परंपरा की पुनरावृत्ति जैसा प्रतीत होता है, जबकि उनका प्रारंभिक जीवन राव चंद्रसेन-दुर्गादास परंपरा (प्रतिरोध) से प्रेरित था। यह "दोहरी विरासत" — प्रतिरोध व सामंजस्य दोनों — अजीत सिंह के चरित्र को विश्लेषणात्मक प्रश्नों के लिए विशेष रूप से समृद्ध बनाती है।
5. अजीत सिंह के प्रशासनिक व सांस्कृतिक योगदान — विस्तृत विवरण
महाराजा अजीत सिंह केवल एक सैन्य-राजनीतिक व्यक्तित्व ही नहीं थे, बल्कि एक दूरदर्शी प्रशासक भी सिद्ध हुए। दीर्घकालिक युद्ध व अस्थिरता के पश्चात मारवाड़ को पुनः संगठित करने की चुनौती अत्यंत विशाल थी, जिसे उन्होंने कई स्तरों पर संबोधित किया।
5.1 राजस्व व्यवस्था का पुनर्गठन
तीन दशकों के संघर्ष-काल में मारवाड़ की परंपरागत राजस्व-संरचना बुरी तरह बाधित हो चुकी थी। अजीत सिंह ने निम्नलिखित कदम उठाए:
- परगना-स्तरीय पुनर्मूल्यांकन: प्रत्येक परगने (प्रशासनिक इकाई) में भूमि-राजस्व का पुनर्मूल्यांकन कराया गया, ताकि युद्ध-काल की अनियमितताओं को दूर किया जा सके।
- जागीरदारी व्यवस्था का सुदृढ़ीकरण: दुर्गादास सहित संघर्ष में सहयोगी रहे सरदारों को उचित जागीरें प्रदान की गईं, यद्यपि आगे चलकर यही व्यवस्था दुर्गादास के साथ हुए मतभेद का एक अप्रत्यक्ष कारण भी मानी जाती है।
- व्यापार पुनर्जीवन: मारवाड़ के परंपरागत व्यापारिक मार्गों (विशेषकर गुजरात व मालवा की ओर जाने वाले मार्गों) की सुरक्षा सुनिश्चित कर व्यापार को पुनर्जीवित किया गया।
5.2 स्थापत्य व निर्माण कार्य
राव जोधा द्वारा स्थापित व राव मालदेव द्वारा विस्तारित मेहरानगढ़ दुर्ग में अजीत सिंह के काल में भी अतिरिक्त सुदृढ़ीकरण कार्य हुए। इसके अतिरिक्त:
- मंदिर पुनर्निर्माण कार्यक्रम: धार्मिक पुनर्स्थापना नीति के अंतर्गत जोधपुर व आसपास के क्षेत्रों में कई मंदिरों का पुनर्निर्माण व जीर्णोद्धार करवाया गया।
- जल-संरक्षण संरचनाएँ: मरुस्थलीय क्षेत्र की परंपरागत आवश्यकता के अनुरूप कुछ बावड़ियों व जलाशयों के निर्माण/मरम्मत का श्रेय भी अजीत सिंह के शासनकाल को दिया जाता है।
5.3 सैन्य पुनर्गठन
दुर्गादास के नेतृत्व में विकसित गुरिल्ला-सैन्य परंपरा, जो अनौपचारिक व बिखरी हुई संरचना पर आधारित थी, अजीत सिंह के काल में एक अधिक संगठित व स्थायी सेना के ढाँचे में परिवर्तित की गई। इससे मारवाड़ न केवल आंतरिक सुरक्षा में सक्षम हुआ, बल्कि मुगल दरबार में सैन्य-सेवा हेतु भी एक विश्वसनीय शक्ति के रूप में प्रस्तुत हो सका — यही सैन्य सुदृढ़ता आगे चलकर उन्हें गुजरात व अजमेर जैसी सूबेदारियाँ प्राप्त करने में सहायक सिद्ध हुई।
5.4 अजीत सिंह बनाम अन्य समकालीन शासकों की प्रशासनिक तुलना
| शासक | रियासत | प्रशासनिक विशेषता |
|---|---|---|
| महाराजा अजीत सिंह | मारवाड़ | युद्धोत्तर पुनर्गठन, धार्मिक पुनर्स्थापना |
| महाराणा अमरसिंह द्वितीय (समकालीन) | मेवाड़ | पारंपरिक सिसोदिया प्रशासनिक निरंतरता |
| सवाई जयसिंह द्वितीय (समकालीन) | आमेर/जयपुर | खगोलशास्त्र व नगर-नियोजन में नवाचार (जयपुर नगर स्थापना, 1727 ई.) |
यह तुलना दर्शाती है कि 18वीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में राजस्थान की तीनों प्रमुख रियासतें अपने-अपने ढंग से मुगल-पश्चात की राजनीतिक शून्यता में स्वयं को पुनर्गठित कर रही थीं — अजीत सिंह का मार्ग सैन्य-धार्मिक पुनर्स्थापना का था, जबकि जयसिंह द्वितीय का मार्ग वैज्ञानिक-नगरीय नवाचार का।
6. अजीत सिंह के अंतिम वर्ष: पारिवारिक कलह और दुखद अंत
महाराजा अजीत सिंह के जीवन का अंत राजस्थान इतिहास के सबसे दुखद व विवादास्पद प्रसंगों में से एक है। अपने अंतिम वर्षों में अजीत सिंह के अपने ही पुत्रों — विशेषकर बख्तसिंह — के साथ सत्ता को लेकर गंभीर मतभेद उत्पन्न हो गए।
अधिकांश ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, 1731 ई. में महाराजा अजीत सिंह की हत्या उनके ही पुत्र बख्तसिंह के इशारे पर की गई (कुछ स्रोतों में इस घटना के प्रत्यक्ष निष्पादन व परिस्थितियों को लेकर भिन्न विवरण मिलते हैं)। इस दुखद घटना के पश्चात अजीत सिंह के दूसरे पुत्र महाराजा अभयसिंह मारवाड़ की गद्दी पर बैठे।
एग्जाम ट्रैप — अत्यंत महत्वपूर्ण: यह तथ्य कि "अजीत सिंह की हत्या उनके अपने पुत्र द्वारा करवाई गई" परीक्षा में बार-बार पूछा जाता है, और छात्र प्रायः यह भूल कर बैठते हैं कि हत्यारा पुत्र बख्तसिंह था, न कि उत्तराधिकारी बना पुत्र अभयसिंह। दोनों नामों को स्पष्ट रूप से अलग-अलग याद रखें: "बख्तसिंह ने की हत्या, अभयसिंह बना उत्तराधिकारी।"
सत्यापन सलाह: अजीत सिंह की मृत्यु से संबंधित परिस्थितियों को लेकर इतिहासकारों में पूर्ण सहमति नहीं है। परीक्षा में इसे "अधिकांश ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार" के रूप में प्रस्तुत करना अधिक सटीक रहता है।
6.1 हत्या के संभावित राजनीतिक कारण: गहन विश्लेषण
इतिहासकार अजीत सिंह की हत्या के पीछे के कारणों को लेकर कई परिकल्पनाएँ प्रस्तुत करते हैं, जो RPSC मुख्य परीक्षा के विश्लेषणात्मक प्रश्नों के लिए उपयोगी हैं:
- उत्तराधिकार की अनिश्चितता: अजीत सिंह के कई पुत्रों के मध्य भावी उत्तराधिकार को लेकर पहले से ही तनाव व्याप्त था, जो अंततः हिंसक रूप ले बैठा।
- दरबारी गुटबाजी: मारवाड़ दरबार में विभिन्न सरदार-गुटों के बीच प्रभाव-प्रतिस्पर्धा भी इस घटनाक्रम में एक उत्प्रेरक कारक मानी जाती है।
- मुगल दरबार का अप्रत्यक्ष प्रभाव: कुछ इतिहासकार यह भी मानते हैं कि मुगल दरबार में अजीत सिंह की सक्रिय व स्वतंत्र भूमिका, जो कभी-कभी मुगल हितों के विपरीत भी जाती थी, ने भी दरबारी षड्यंत्रों को बल दिया हो सकता है।
सत्यापन सलाह: इन तीनों परिकल्पनाओं में से किसी एक को निर्णायक रूप से "सही उत्तर" नहीं माना जा सकता — यह विषय आज भी इतिहासकारों के बीच वाद-विवाद का केंद्र है। परीक्षा में वर्णनात्मक प्रश्न आने पर तीनों दृष्टिकोणों को संतुलित रूप से प्रस्तुत करना उचित रहता है।
7. महाराजा अजीत सिंह बनाम वीर दुर्गादास — विरासत की निरंतरता व विरोधाभास
| बिंदु | वीर दुर्गादास राठौड़ | महाराजा अजीत सिंह |
|---|---|---|
| भूमिका | संरक्षक व संघर्ष-नायक | स्वतंत्र शासक |
| मुगलों के प्रति नीति | निरंतर प्रतिरोध | प्रारंभ में प्रतिरोध, बाद में सामंजस्य |
| दुर्गादास से संबंध | — | अंतिम वर्षों में तनावपूर्ण, दुर्गादास दरबार से दूर |
| अंत | उपेक्षा में मृत्यु (1718 ई.) | पुत्र द्वारा हत्या (1731 ई.) |
| ऐतिहासिक विडंबना | अपने ही पालित राजकुमार से दूरी | अपने ही पुत्र द्वारा हत्या |
यह तालिका एक गहन ऐतिहासिक विडंबना को उजागर करती है — दोनों ही व्यक्तित्व, जिन्होंने मारवाड़ की स्वतंत्रता के लिए इतना अधिक त्याग किया, अपने अंतिम वर्षों में पारिवारिक/आश्रित संबंधों की जटिलताओं का शिकार बने।
शिक्षक की एग्जाम रणनीति: यदि RAS मुख्य परीक्षा में "सत्ता और पारिवारिक संबंधों के मध्य द्वंद्व" जैसा विश्लेषणात्मक प्रश्न आए, तो दुर्गादास-अजीत सिंह व अजीत सिंह-बख्तसिंह — दोनों प्रसंगों को एक साथ प्रस्तुत करना एक अत्यंत प्रभावी उत्तर-रणनीति है।
8. मारवाड़ राठौड़ वंश की वंशावली — अद्यतन झलक
| क्रम | शासक/व्यक्तित्व | कार्यकाल (अनुमानित) | विशेष योगदान |
|---|---|---|---|
| 1 | राव जोधा | 1438–1489 ई. | जोधपुर व मेहरानगढ़ की स्थापना |
| 2 | राव मालदेव | 1532–1562 ई. | मारवाड़ का अधिकतम विस्तार |
| 3 | राव चंद्रसेन | 1562–1581 ई. | मुगल-प्रतिरोध, "मारवाड़ का प्रताप" |
| 4 | राव उदयसिंह (मोटा राजा) | 1583–1595 ई. | मुगल-राठौड़ गठबंधन |
| 5 | महाराजा जसवंत सिंह प्रथम | 1638–1678 ई. | धरमत युद्ध, मुगल सेवा |
| — | वीर दुर्गादास राठौड़ (संरक्षक) | 1678–1707 ई. के आसपास | अजीत सिंह की रक्षा, 30 वर्षीय संघर्ष |
| 6 | महाराजा अजीत सिंह | 1707/1709–1731 ई. | स्वतंत्रता-पुनर्स्थापना, धार्मिक पुनर्गठन |
| 7 | महाराजा अभयसिंह | 1731 ई. से | अजीत सिंह के उत्तराधिकारी |
9. PYQ अभ्यास खंड (15 प्रश्न, उत्तर व व्याख्या सहित)
प्रश्न 1. महाराजा अजीत सिंह का जन्म किस वर्ष हुआ?
(अ) 1658 ई. (ब) 1678 ई. (स) 1679 ई. (द) 1707 ई.
उत्तर: (स) 1679 ई.
प्रश्न 2. अजीत सिंह को जोधपुर पर पूर्ण नियंत्रण किस वर्ष के आसपास प्राप्त हुआ?
(अ) 1679 ई. (ब) 1707-1709 ई. (स) 1718 ई. (द) 1731 ई.
उत्तर: (ब) 1707-1709 ई.
प्रश्न 3. अजीत सिंह ने जोधपुर पुनर्प्राप्ति के पश्चात कौन-सी प्रमुख नीति अपनाई? (
अ) मुगल प्रशासन जारी रखना (ब) धार्मिक पुनर्स्थापना (मस्जिद हटाना, मंदिर पुनर्निर्माण) (स) कोई नीति परिवर्तन नहीं (द) मारवाड़ को दिल्ली में विलय करना
उत्तर: (ब) धार्मिक पुनर्स्थापना (मस्जिद हटाना, मंदिर पुनर्निर्माण)
प्रश्न 4. अजीत सिंह किस मुगल सम्राट के काल में मुगल दरबार से पुनः सामंजस्य स्थापित किया?
(अ) औरंगजेब (ब) बहादुर शाह प्रथम (स) हुमायूँ (द) अकबर
उत्तर: (ब) बहादुर शाह प्रथम
प्रश्न 5. अजीत सिंह को किन प्रांतों की सूबेदारी प्राप्त हुई?
(अ) बंगाल व बिहार (ब) गुजरात व अजमेर (स) पंजाब व सिंध (द) दक्कन व मालवा
उत्तर: (ब) गुजरात व अजमेर
प्रश्न 6. मुगल दरबार में किंगमेकर की भूमिका निभाने वाले "सैयद बंधु" कौन थे?
(अ) सैयद हुसैन अली व सैयद अब्दुल्लाह (ब) सैयद मुर्तज़ा व सैयद रज़ा (स) सैयद अहमद व सैयद जाफर (द) कोई नहीं
उत्तर: (अ) सैयद हुसैन अली व सैयद अब्दुल्लाह
प्रश्न 7. महाराजा अजीत सिंह की मृत्यु किस वर्ष हुई?
(अ) 1707 ई. (ब) 1718 ई. (स) 1731 ई. (द) 1734 ई.
उत्तर: (स) 1731 ई.
प्रश्न 8. अधिकांश ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार अजीत सिंह की हत्या किसके इशारे पर हुई?
(अ) अभयसिंह (ब) बख्तसिंह (स) दुर्गादास राठौड़ (द) बहादुर शाह
उत्तर: (ब) बख्तसिंह
प्रश्न 9. अजीत सिंह के पश्चात मारवाड़ की गद्दी पर कौन बैठा?
(अ) बख्तसिंह (ब) अभयसिंह (स) दुर्गादास (द) जसवंत सिंह द्वितीय
उत्तर: (ब) अभयसिंह
प्रश्न 10. अजीत सिंह के प्रारंभिक शासनकाल में मारवाड़, मेवाड़ व आमेर के मध्य किस प्रकार की व्यवस्था बनी?
(अ) युद्ध की स्थिति (ब) राजनीतिक-सामरिक सहयोग (त्रिगुट) (स) कोई संबंध नहीं (द) मुगलों के विरुद्ध औपचारिक सैन्य संधि केवल कागज़ पर
उत्तर: (ब) राजनीतिक-सामरिक सहयोग (त्रिगुट)
प्रश्न 11. अजीत सिंह द्वारा अपनाई गई पुनर्धर्मांतरण नीति किस अवधारणा के प्रारंभिक उदाहरणों में गिनी जाती है?
(अ) शुद्धि (ब) संथाल आंदोलन (स) वहाबी आंदोलन (द) कोई नहीं
उत्तर: (अ) शुद्धि
प्रश्न 12. अजीत सिंह के संरक्षक कौन थे, जिन्होंने उनके बाल्यकाल में मारवाड़ की रक्षा की?
(अ) राव उदयसिंह (ब) वीर दुर्गादास राठौड़ (स) राव चंद्रसेन (द) बख्तसिंह
उत्तर: (ब) वीर दुर्गादास राठौड़
प्रश्न 13. निम्न में से कौन-सा कथन असत्य है?
(अ) अजीत सिंह जसवंत सिंह प्रथम के मरणोपरांत पुत्र थे (ब) अजीत सिंह ने मुगल दरबार से कभी कोई सामंजस्य नहीं किया (स) अजीत सिंह की हत्या उनके पुत्र के इशारे पर हुई (द) अजीत सिंह ने धार्मिक पुनर्स्थापना नीति अपनाई
उत्तर: (ब) अजीत सिंह ने मुगल दरबार से कभी कोई सामंजस्य नहीं किया (यह असत्य है — उन्होंने बहादुर शाह प्रथम के काल में सामंजस्य किया)
प्रश्न 14. अजीत सिंह किस वंश से संबंधित थे?
(अ) सिसोदिया (ब) राठौड़ (स) कछवाहा (द) भाटी
उत्तर: (ब) राठौड़
प्रश्न 15. प्रसिद्ध हुरड़ा सम्मेलन, जिसकी पृष्ठभूमि अजीत सिंह के काल के राजपूत-सहयोग से जुड़ती है, किस वर्ष हुआ (सामान्य ज्ञान हेतु)?
(अ) 1707 ई. (ब) 1731 ई. (स) 1734 ई. (द) 1750 ई.
उत्तर: (स) 1734 ई. (अजीत सिंह के काल के कुछ पश्चात, किंतु उसी सहयोग-परंपरा की अगली कड़ी)
महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)
महाराजा अजीत सिंह मारवाड़ के राठौड़ शासक थे, जो जसवंत सिंह प्रथम के मरणोपरांत पुत्र थे और वीर दुर्गादास राठौड़ के संरक्षण में पले-बढ़े, आगे चलकर 1707-1709 ई. के आसपास स्वतंत्र शासक बने।
अजीत सिंह ने धार्मिक पुनर्स्थापना नीति अपनाई, जिसके अंतर्गत मुगल काल में बनाई गई मस्जिदों को हटाकर मंदिरों का पुनर्निर्माण और बलपूर्वक धर्मांतरित हिंदुओं की पुनर्धर्मांतरण की व्यवस्था की गई।
राजनीतिक व्यावहारिकता के अंतर्गत अजीत सिंह ने बहादुर शाह प्रथम के काल में मुगल दरबार से सामंजस्य स्थापित किया, जिससे उन्हें उच्च मनसब व प्रांतीय सूबेदारी प्राप्त हुई।
अधिकांश ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार 1731 ई. में उनके ही पुत्र बख्तसिंह के इशारे पर उनकी हत्या करवाई गई।
अजीत सिंह के पश्चात उनके पुत्र महाराजा अभयसिंह मारवाड़ की गद्दी पर बैठे।