मारवाड़ राजवंश — वीर दुर्गादास राठौड़ और अजीत सिंह की गाथा: 30 वर्षों का संघर्ष (RPSC विशेष)

लेखक की विशेषज्ञता नोट (E-E-A-T): यह लेख राजस्थान इतिहास के "राठौड़ वंश" अध्याय की छठी और सबसे भावनात्मक कड़ी है, RPSC/RAS पाठ्यक्रम-आधारित शोध पर केंद्रित।
इससे पहले महाराजा जसवंत सिंह प्रथम पर प्रकाशित लेख अवश्य पढ़ें, क्योंकि यही लेख इस गाथा की सीधी पृष्ठभूमि प्रस्तुत करता है — जसवंत सिंह की मृत्यु (1678 ई.) और उसके पश्चात उत्पन्न उत्तराधिकार-संकट से ही यह पूरी कहानी प्रारंभ होती है।
प्रस्तावना: राजस्थान के इतिहास की सबसे रोमांचक और बलिदान-गाथा
यदि राव चंद्रसेन का जीवन "मारवाड़ का प्रताप" कहलाने योग्य था, तो वीर दुर्गादास राठौड़ का जीवन उससे भी आगे — स्वामिभक्ति, बुद्धि-कौशल और दीर्घकालिक बलिदान का ऐसा उदाहरण है, जो राजस्थान के इतिहास में अद्वितीय माना जाता है। एक शिशु राजकुमार की रक्षा के लिए मुगल साम्राज्य के सबसे शक्तिशाली और चतुर सम्राट औरंगजेब से सीधी टक्कर लेना, और लगभग तीन दशकों तक निरंतर संघर्ष जारी रखना — यह गाथा आज भी राजस्थान के लोकगीतों, कहावतों और पाठ्यक्रम दोनों में जीवंत है।
RPSC, RAS, RSMSSB, पटवारी और REET जैसी परीक्षाओं में वीर दुर्गादास राठौड़, अजीत सिंह की सुरक्षा, मारवाड़ का 30-वर्षीय मुगल-प्रतिरोध, और राजपूत विद्रोह (1679 ई.) से जुड़े प्रश्न अत्यंत उच्च वेटेज के साथ पूछे जाते हैं। इस लेख में हम इस संपूर्ण गाथा को विस्तार से समझेंगे।
1. वीर दुर्गादास राठौड़: जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| पूरा नाम | दुर्गादास राठौड़ |
| पिता | आसकरण राठौड़ (महाराजा जसवंत सिंह के विश्वस्त सरदार) |
| जन्म वर्ष (मत-भिन्नता सहित) | लगभग 1638 ई. |
| पद | महाराजा जसवंत सिंह के प्रमुख सरदार व सैन्य सलाहकार |
| मुख्य उपलब्धि | शिशु अजीत सिंह की रक्षा व 30 वर्षीय मुगल-प्रतिरोध का नेतृत्व |
| मृत्यु वर्ष (मत-भिन्नता सहित) | लगभग 1718 ई. (उज्जैन क्षेत्र के निकट) |
दुर्गादास राठौड़ का जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ जो पीढ़ियों से मारवाड़ के राठौड़ शासकों की सेवा में समर्पित था। उनके पिता आसकरण राठौड़ स्वयं महाराजा जसवंत सिंह प्रथम के विश्वस्त सरदारों में गिने जाते थे। इसी पारिवारिक स्वामिभक्ति-परंपरा ने दुर्गादास को आगे चलकर मारवाड़ के इतिहास की सबसे निर्णायक भूमिका के लिए तैयार किया।
शिक्षक टिप्पणी: परीक्षा में दुर्गादास को कभी-कभी "राजा" या "शासक" समझने की भूल की जाती है। ध्यान रखें — दुर्गादास कभी भी मारवाड़ के सिंहासन पर नहीं बैठे; वे एक सरदार, संरक्षक (रीजेंट) और सेनानायक थे, जिन्होंने बालक अजीत सिंह के नाम पर संघर्ष का नेतृत्व किया।
2. पृष्ठभूमि: जसवंत सिंह की मृत्यु और औरंगजेब की मंशा
जैसा कि पिछले लेख में विस्तार से पढ़ा गया, 1678 ई. में जमरूद में महाराजा जसवंत सिंह की मृत्यु हो गई, और उनका कोई जीवित पुत्र नहीं था। इसी दौरान उनकी रानियों में से एक ने मरणोपरांत पुत्र अजीत सिंह को जन्म दिया।
औरंगजेब, जो पहले से ही राजपूत रियासतों पर सीधा मुगल नियंत्रण स्थापित करने की नीति अपना रहा था, इस अवसर को मारवाड़ को स्थायी रूप से मुगल साम्राज्य में सम्मिलित करने के अवसर के रूप में देखने लगा। उसने निम्नलिखित रणनीति अपनाई:
- शिशु अजीत सिंह और उनकी माताओं को दिल्ली/मुगल-नियंत्रित क्षेत्र में सुरक्षा के बहाने बुलाया।
- वयस्क होने पर अजीत सिंह को इस्लाम में परिवर्तित करने अथवा पूर्णतः मुगल-नियंत्रित कठपुतली शासक के रूप में स्थापित करने की योजना बनाई (इतिहासकारों में इस उद्देश्य की सटीक प्रकृति को लेकर कुछ मतभेद है, किंतु मूल मंशा मारवाड़ पर सीधा नियंत्रण स्थापित करना स्पष्ट है)।
- मारवाड़ राज्य को खालसा भूमि घोषित कर सीधे मुगल प्रशासन के अधीन लाने की कोशिश की।
यही वह क्षण था जब दुर्गादास राठौड़ और अन्य वफादार राठौड़ सरदारों ने यह निर्णय लिया कि किसी भी मूल्य पर शिशु राजकुमार को मुगल नियंत्रण से बाहर निकालना है।
3. महान पलायन: शिशु अजीत सिंह की रक्षा
यह घटनाक्रम राजस्थान इतिहास की सबसे नाटकीय और साहसिक घटनाओं में गिना जाता है।
घटनाक्रम
दुर्गादास राठौड़ ने अन्य विश्वस्त राठौड़ सरदारों के साथ मिलकर एक अत्यंत जोखिम भरी योजना बनाई। मुगल निगरानी में रह रहे शिशु अजीत सिंह और उनकी माताओं को गुप्त रूप से वहाँ से निकालकर मारवाड़ की सुरक्षित पहाड़ियों की ओर ले जाया गया।
लोक-कथाओं व परंपरागत विवरणों के अनुसार, इस पलायन के दौरान मुगल सैनिकों को चकमा देने के लिए एक अत्यंत साहसिक बलिदान की कथा भी प्रचलित है — कहा जाता है कि सुरक्षा-दल में सम्मिलित एक अन्य राठौड़ शिशु (कुछ स्रोतों में जिसका नाम सुजान सिंह बताया जाता है) की माँ ने अपने पुत्र को अजीत सिंह के स्थान पर बलिदान होने दिया, ताकि वास्तविक राजकुमार सुरक्षित निकल सके।
सत्यापन सलाह: यह "स्थानापन्न बालक बलिदान" वाली कथा अधिकतर लोक-परंपरा (ख्यात व मौखिक इतिहास) पर आधारित है, और आधुनिक इतिहासकार इसकी ऐतिहासिक प्रामाणिकता को लेकर सतर्क रहते हैं। परीक्षा में इसे "परंपरागत विवरण के अनुसार" के रूप में प्रस्तुत करना उचित रहता है, न कि निर्विवाद तथ्य के रूप में।
इस साहसिक अभियान के परिणामस्वरूप शिशु अजीत सिंह को सुरक्षित मारवाड़ के दुर्गम क्षेत्रों में पहुँचाया गया, जहाँ दुर्गादास राठौड़ ने उनके संरक्षक और वास्तविक शासन-संचालक के रूप में जिम्मेदारी संभाली।
मेमोरी ट्रिक: "दुर्गादास ने बचाया अजीत को, औरंगजेब से किया मुकाबला वर्षों तक" — यह सरल पंक्ति पूरी गाथा के केंद्रीय भाव को स्मरण रखने में सहायक है।
4. राजपूत विद्रोह, 1679 ई.: मेवाड़ व मारवाड़ की संयुक्त प्रतिक्रिया
अजीत सिंह की सुरक्षा के तुरंत बाद, औरंगजेब की राजपूत-विरोधी नीतियों (जिसमें जजिया कर की पुनर्स्थापना, 1679 ई. भी सम्मिलित थी) के विरुद्ध एक व्यापक राजपूत प्रतिक्रिया उत्पन्न हुई।
| रियासत | प्रतिक्रिया |
|---|---|
| मारवाड़ (राठौड़) | दुर्गादास के नेतृत्व में सशस्त्र प्रतिरोध |
| मेवाड़ (सिसोदिया) | महाराणा राजसिंह प्रथम द्वारा मारवाड़ को समर्थन व सहायता |
| मुगल दरबार (आंतरिक) | औरंगजेब के पुत्र शहजादा अकबर का अस्थायी विद्रोह व राजपूतों से गठबंधन (1681 ई. के आसपास) |
एग्जाम ट्रैप: यह प्रश्न बार-बार पूछा जाता है — "किस मुगल शहजादे ने राजपूतों के साथ मिलकर औरंगजेब के विरुद्ध विद्रोह किया?" उत्तर है शहजादा अकबर (औरंगजेब का पुत्र, मुगल सम्राट अकबर से भिन्न व्यक्ति)। दुर्गादास राठौड़ ने इस विद्रोही शहजादे को भी सहायता व शरण प्रदान की थी, यद्यपि यह विद्रोह अंततः असफल रहा और शहजादा अकबर को फारस (ईरान) की ओर पलायन करना पड़ा।
5. तीन दशकों का संघर्ष: गुरिल्ला रणनीति व दुर्गादास का नेतृत्व
1678 ई. से लेकर लगभग 1707-1709 ई. तक — यानी लगभग तीन दशकों तक — दुर्गादास राठौड़ ने मारवाड़ की स्वतंत्रता व अजीत सिंह के अधिकार की रक्षा के लिए निरंतर संघर्ष जारी रखा। इस दीर्घकालिक संघर्ष की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित थीं:
- गुरिल्ला युद्ध-नीति: राव चंद्रसेन की परंपरा के अनुरूप, दुर्गादास ने भी प्रत्यक्ष सामरिक युद्ध की बजाय पहाड़ी व दुर्गम क्षेत्रों से संचालित गुरिल्ला-प्रतिरोध की नीति अपनाई।
- मेवाड़ से सहयोग: मेवाड़ के महाराणा राजसिंह व बाद में महाराणा जयसिंह के साथ रणनीतिक सहयोग बनाए रखा गया, जिससे मुगल सेना को दो मोर्चों पर संघर्ष करना पड़ा।
- कूटनीतिक व सैन्य दोनों मोर्चों पर संतुलन: दुर्गादास ने आवश्यकतानुसार अस्थायी समझौतों और सैन्य प्रतिरोध — दोनों रणनीतियों का संतुलित प्रयोग किया, ताकि मारवाड़ की सीमित सैन्य शक्ति दीर्घकाल तक बनी रह सके।
- अजीत सिंह का संरक्षण व प्रशिक्षण: दुर्गादास ने बालक अजीत सिंह को न केवल शारीरिक रूप से सुरक्षित रखा, बल्कि उन्हें भावी शासक के रूप में प्रशिक्षित करने की जिम्मेदारी भी निभाई।
शिक्षक की एग्जाम रणनीति: यदि प्रश्न-पत्र में "औरंगजेब की राजपूत-नीति की असफलता के कारण" जैसा वर्णनात्मक प्रश्न आए, तो दुर्गादास के दीर्घकालिक गुरिल्ला-प्रतिरोध व मेवाड़-मारवाड़ सहयोग को केंद्रीय उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करना एक उच्च-गुणवत्ता वाला उत्तर सुनिश्चित करता है।
6. औरंगजेब की मृत्यु (1707 ई.) और अजीत सिंह की गद्दी-प्राप्ति
1707 ई. में औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात मुगल साम्राज्य में उत्तराधिकार-संघर्ष व राजनीतिक अस्थिरता उत्पन्न हुई, जिसका दुर्गादास राठौड़ ने कुशलता से लाभ उठाया। इस राजनीतिक शून्यता के दौरान अजीत सिंह — जो अब तक एक सक्षम युवा राजकुमार बन चुके थे — को अंततः मारवाड़ की गद्दी पर औपचारिक रूप से स्थापित किया गया।
| घटनाक्रम | वर्ष (अनुमानित) |
|---|---|
| जसवंत सिंह की मृत्यु व संकट प्रारंभ | 1678 ई. |
| राजपूत विद्रोह प्रारंभ | 1679 ई. |
| औरंगजेब की मृत्यु | 1707 ई. |
| अजीत सिंह की औपचारिक गद्दी-प्राप्ति (जोधपुर पर पूर्ण नियंत्रण) | लगभग 1707-1709 ई. |
इस प्रकार दुर्गादास राठौड़ के नेतृत्व में चला यह लगभग तीन दशकों का संघर्ष अंततः सफल हुआ, और मारवाड़ की स्वतंत्र सत्ता पुनः राठौड़ वंश के हाथों में सुरक्षित हुई।
एग्जाम ट्रैप: ध्यान रखें — अजीत सिंह की गद्दी-प्राप्ति की सटीक तिथि को लेकर स्रोतों में भिन्नता पाई जाती है (कुछ स्रोत 1707 ई. बताते हैं, कुछ 1709 ई.)। परीक्षा में "औरंगजेब की मृत्यु के तुरंत पश्चात" जैसे व्यापक कथन का प्रयोग अधिक सुरक्षित रहता है, जब तक कि RPSC प्रश्न-पत्र में विशिष्ट वर्ष न माँगा जाए।
7. दुर्गादास और अजीत सिंह के संबंधों में बाद का तनाव
यह गाथा का सबसे मार्मिक व कम-ज्ञात पहलू है, जो RPSC मुख्य परीक्षा के विश्लेषणात्मक प्रश्नों में विशेष महत्व रखता है।
अजीत सिंह के वयस्क होने और स्वतंत्र रूप से शासन-सत्ता संभालने के पश्चात, ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार दोनों — संरक्षक दुर्गादास और अब पूर्ण शासक बन चुके अजीत सिंह — के मध्य संबंधों में तनाव उत्पन्न हो गया। इसके संभावित कारणों में निम्नलिखित बताए जाते हैं:
- अजीत सिंह द्वारा स्वतंत्र सत्ता-संचालन की इच्छा, जबकि दुर्गादास का प्रभाव दरबार में अब भी अत्यधिक व्यापक था।
- दरबारी राजनीति व अन्य सरदारों की ईर्ष्या, जिसने दोनों के मध्य अविश्वास को बढ़ावा दिया हो सकता है।
अंततः दुर्गादास को दरबार से दूर कर दिया गया, और अपने जीवन के अंतिम वर्ष उन्होंने मारवाड़ से बाहर, कुछ हद तक उपेक्षित स्थिति में बिताए। लगभग 1718 ई. में उज्जैन क्षेत्र के निकट उनकी मृत्यु हुई।
एग्जाम ट्रैप: यह विडंबनापूर्ण तथ्य परीक्षा में अक्सर अनदेखा किया जाता है, किंतु RAS मुख्य परीक्षा जैसी उच्च-स्तरीय परीक्षाओं में यह विश्लेषणात्मक प्रश्नों का आधार बन सकता है — "क्या दुर्गादास के साथ मारवाड़ राजतंत्र का व्यवहार न्यायसंगत था?" जैसे प्रश्नों के लिए यह पृष्ठभूमि आवश्यक है।
8. दुर्गादास राठौड़ बनाम राव चंद्रसेन — तुलनात्मक दृष्टिकोण
| बिंदु | राव चंद्रसेन | वीर दुर्गादास राठौड़ |
|---|---|---|
| पद | मारवाड़ के शासक स्वयं | सरदार व संरक्षक (शासक नहीं) |
| प्रतिद्वंद्वी | अकबर | औरंगजेब |
| प्रतिरोध की अवधि | लगभग 16 वर्ष (1565–1581 ई.) | लगभग 30 वर्ष (1678–1707 ई. के आसपास) |
| प्रतिरोध का उद्देश्य | व्यक्तिगत स्वाभिमान व सिंहासन | शिशु राजकुमार की रक्षा व वंश-निरंतरता |
| परिणाम | असफल (मृत्यु तक संघर्षरत) | सफल (अजीत सिंह की गद्दी-प्राप्ति) |
मेमोरी ट्रिक: "चंद्रसेन ने खुद के लिए लड़ा, दुर्गादास ने दूसरे (अजीत सिंह) के लिए" — यह भेद उनके संघर्ष की प्रकृति को स्पष्ट करता है, और तुलनात्मक प्रश्नों में उपयोगी है।
9. मारवाड़ राठौड़ वंश की वंशावली — अद्यतन झलक
| क्रम | शासक/व्यक्तित्व | कार्यकाल (अनुमानित) | विशेष योगदान |
|---|---|---|---|
| 1 | राव जोधा | 1438–1489 ई. | जोधपुर व मेहरानगढ़ की स्थापना |
| 2 | राव मालदेव | 1532–1562 ई. | मारवाड़ का अधिकतम विस्तार |
| 3 | राव चंद्रसेन | 1562–1581 ई. | मुगल-प्रतिरोध, "मारवाड़ का प्रताप" |
| 4 | राव उदयसिंह (मोटा राजा) | 1583–1595 ई. | मुगल-राठौड़ गठबंधन |
| 5 | महाराजा जसवंत सिंह प्रथम | 1638–1678 ई. | धरमत युद्ध, मुगल सेवा |
| — | वीर दुर्गादास राठौड़ (संरक्षक) | 1678–1707 ई. के आसपास | अजीत सिंह की रक्षा, 30 वर्षीय संघर्ष |
| 6 | महाराजा अजीत सिंह | 1707/1709 ई. से | मुगल-अधीनता से मुक्ति, स्वतंत्र मारवाड़ की पुनर्स्थापना |
10. PYQ अभ्यास खंड (18 प्रश्न, उत्तर व व्याख्या सहित)
प्रश्न 1. वीर दुर्गादास राठौड़ के पिता कौन थे?
(अ) राव उदयसिंह (ब) आसकरण राठौड़ (स) राव चंद्रसेन (द) जसवंत सिंह
उत्तर: (ब) आसकरण राठौड़
प्रश्न 2. दुर्गादास राठौड़ किसके संरक्षक/सरदार थे?
(अ) राव मालदेव (ब) महाराजा जसवंत सिंह प्रथम व अजीत सिंह (स) राव चंद्रसेन (द) राव उदयसिंह
उत्तर: (ब) महाराजा जसवंत सिंह प्रथम व अजीत सिंह
प्रश्न 3. अजीत सिंह किसके मरणोपरांत पुत्र थे?
(अ) राव उदयसिंह (ब) महाराजा जसवंत सिंह प्रथम (स) राव चंद्रसेन (द) दुर्गादास राठौड़
उत्तर: (ब) महाराजा जसवंत सिंह प्रथम
प्रश्न 4. शिशु अजीत सिंह की सुरक्षा किसने की?
(अ) राव उदयसिंह (ब) दुर्गादास राठौड़ (स) राव चंद्रसेन (द) महाराणा राजसिंह
उत्तर: (ब) दुर्गादास राठौड़
प्रश्न 5. राजपूत विद्रोह किस वर्ष प्रारंभ हुआ?
(अ) 1658 ई. (ब) 1678 ई. (स) 1679 ई. (द) 1707 ई.
उत्तर: (स) 1679 ई.
प्रश्न 6. 1679 ई. में औरंगजेब द्वारा पुनर्स्थापित किस कर के कारण राजपूत असंतोष और बढ़ा?
(अ) भू-राजस्व कर (ब) जजिया कर (स) आयात कर (द) व्यापार कर
उत्तर: (ब) जजिया कर
प्रश्न 7. मारवाड़ के प्रतिरोध में किस मेवाड़ शासक ने सहयोग दिया?
(अ) महाराणा प्रताप (ब) महाराणा राजसिंह प्रथम (स) महाराणा कुंभा (द) महाराणा सांगा
उत्तर: (ब) महाराणा राजसिंह प्रथम
प्रश्न 8. औरंगजेब के किस पुत्र ने राजपूतों के साथ मिलकर विद्रोह किया?
(अ) शहजादा मुअज्जम (ब) शहजादा अकबर (स) शहजादा आजम (द) शहजादा कामबख्श
उत्तर: (ब) शहजादा अकबर
प्रश्न 9. विद्रोह असफल होने पर शहजादा अकबर कहाँ पलायन कर गए?
(अ) काबुल (ब) फारस (ईरान) (स) दक्कन (द) बंगाल
उत्तर: (ब) फारस (ईरान)
प्रश्न 10. औरंगजेब की मृत्यु किस वर्ष हुई?
(अ) 1678 ई. (ब) 1679 ई. (स) 1707 ई. (द) 1718 ई.
उत्तर: (स) 1707 ई.
प्रश्न 11. अजीत सिंह की मारवाड़ पर औपचारिक गद्दी-प्राप्ति लगभग किस वर्ष हुई?
(अ) 1679 ई. (ब) 1707-1709 ई. (स) 1718 ई. (द) 1638 ई.
उत्तर: (ब) 1707-1709 ई.
प्रश्न 12. दुर्गादास राठौड़ की मृत्यु लगभग किस वर्ष व कहाँ हुई?
(अ) 1707 ई., जोधपुर (ब) 1718 ई., उज्जैन क्षेत्र (स) 1679 ई., दिल्ली (द) 1638 ई., काबुल
उत्तर: (ब) 1718 ई., उज्जैन क्षेत्र
प्रश्न 13. दुर्गादास और अजीत सिंह के संबंधों में बाद के वर्षों में क्या हुआ?
(अ) संबंध सदैव आदर्श बने रहे (ब) संबंधों में तनाव आया, दुर्गादास दरबार से दूर हो गए (स) दुर्गादास स्वयं शासक बन गए (द) कोई परिवर्तन नहीं हुआ
उत्तर: (ब) संबंधों में तनाव आया, दुर्गादास दरबार से दूर हो गए
प्रश्न 14. मारवाड़ का यह मुगल-प्रतिरोध संघर्ष लगभग कितने वर्षों तक चला?
(अ) 10 वर्ष (ब) 16 वर्ष (स) 30 वर्ष (द) 50 वर्ष
उत्तर: (स) 30 वर्ष (लगभग 1678–1707/1709 ई.)
प्रश्न 15. लोक-परंपरा के अनुसार अजीत सिंह के स्थान पर किस बालक के बलिदान की कथा प्रचलित है?
(अ) सुजान सिंह (ब) सूरसिंह (स) चंद्रसेन (द) गजसिंह
उत्तर: (अ) सुजान सिंह (परंपरागत/लोक-कथा आधारित, ऐतिहासिक प्रामाणिकता सत्यापन योग्य)
प्रश्न 16. दुर्गादास राठौड़ किस वंश से संबंधित थे?
(अ) सिसोदिया (ब) राठौड़ (स) कछवाहा (द) भाटी
उत्तर: (ब) राठौड़
प्रश्न 17. निम्न में से कौन-सा कथन असत्य है?
(अ) दुर्गादास कभी मारवाड़ के सिंहासन पर नहीं बैठे (ब) दुर्गादास ने अजीत सिंह को शिशु अवस्था में सुरक्षित रखा (स) दुर्गादास स्वयं मारवाड़ के राजा घोषित हुए (द) दुर्गादास ने 30 वर्षों तक संघर्ष का नेतृत्व किया
उत्तर: (स) दुर्गादास स्वयं मारवाड़ के राजा घोषित हुए (यह कथन असत्य है)
प्रश्न 18. महाराजा जसवंत सिंह प्रथम की मृत्यु और अजीत सिंह की गद्दी-प्राप्ति के मध्य लगभग कितना समयांतराल रहा?
(अ) लगभग 5 वर्ष (ब) लगभग 15 वर्ष (स) लगभग 30 वर्ष (द) लगभग 50 वर्ष
उत्तर: (स) लगभग 30 वर्ष
महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)
दुर्गादास राठौड़ महाराजा जसवंत सिंह प्रथम के विश्वस्त सरदार थे, जिन्होंने जसवंत सिंह की मृत्यु के पश्चात शिशु अजीत सिंह की रक्षा की और लगभग 30 वर्षों तक मारवाड़ की स्वतंत्रता के लिए औरंगजेब से संघर्ष किया।
दुर्गादास ने अन्य राठौड़ सरदारों के साथ मिलकर एक साहसिक योजना के माध्यम से शिशु अजीत सिंह और उनकी माताओं को मुगल निगरानी से गुप्त रूप से निकालकर मारवाड़ के सुरक्षित क्षेत्रों में पहुँचाया।
यह संघर्ष लगभग 1678 ई. से 1707-1709 ई. तक, यानी लगभग 30 वर्षों तक चला।
औरंगजेब की मृत्यु (1707 ई.) के पश्चात उत्पन्न राजनीतिक अस्थिरता का लाभ उठाकर अजीत सिंह को औपचारिक रूप से मारवाड़ की गद्दी प्राप्त हुई।
अजीत सिंह के वयस्क होने पर दोनों के संबंधों में तनाव उत्पन्न हुआ, और दुर्गादास को दरबार से दूर होना पड़ा; उनकी मृत्यु लगभग 1718 ई. में उज्जैन क्षेत्र के निकट हुई।