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राजस्थान इतिहास

दुर्गादास राठौड़: जीवन, संघर्ष और मारवाड़ की स्वतंत्रता | संपूर्ण इतिहास एवं RPSC Notes

Sudhir Dhaka (इतिहास विशेषज्ञ)
1 सितंबर 2026
7 मिनट पठन
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दुर्गादास राठौड़: जीवन, संघर्ष और मारवाड़ की स्वतंत्रता | संपूर्ण इतिहास एवं RPSC Notes

सुयोग AI गुरु

नोट्स के मुख्य बिंदु, मॉक MCQ या डाउट पूछें

दुर्गादास राठौड़ राजस्थान के मध्यकालीन इतिहास के उन प्रमुख व्यक्तित्वों में से हैं जिन्होंने किसी राजसिंहासन पर बैठकर नहीं, बल्कि एक शासक परिवार और राज्य की स्वतंत्र सत्ता की रक्षा करते हुए इतिहास में अपना स्थान बनाया। महाराजा जसवंत सिंह प्रथम की मृत्यु के बाद उत्पन्न संकट में उन्होंने बालक अजीत सिंह की रक्षा की और मुगल सम्राट औरंगजेब के विरुद्ध लंबे समय तक मारवाड़ के प्रतिरोध का नेतृत्व किया।

दुर्गादास की भूमिका केवल एक योद्धा की नहीं थी। वे सेनानायक, कूटनीतिज्ञ, संरक्षक और रणनीतिकार भी थे। उन्होंने परिस्थितियों के अनुसार युद्ध, गुरिल्ला रणनीति, राजनीतिक गठबंधन और कूटनीति का प्रयोग किया। मेवाड़ के सहयोग तथा औरंगजेब के पुत्र शहजादा अकबर के विद्रोह जैसे घटनाक्रमों में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।

राजस्थान की प्रतियोगी परीक्षाओं में दुर्गादास राठौड़ से संबंधित प्रश्न मुख्यतः जन्म, पिता, जसवंत सिंह की मृत्यु, अजीत सिंह की रक्षा, 1679 का राजपूत विद्रोह, मेवाड़ का सहयोग, शहजादा अकबर, औरंगजेब की मृत्यु तथा दुर्गादास की मृत्यु से जुड़े होते हैं।

एक लाइन में उत्तर: दुर्गादास राठौड़ वह प्रमुख राठौड़ सरदार थे जिन्होंने महाराजा जसवंत सिंह प्रथम की मृत्यु के बाद बालक अजीत सिंह की रक्षा की और लंबे मुगल-विरोधी संघर्ष के माध्यम से मारवाड़ की राठौड़ सत्ता को पुनः स्थापित कराने में निर्णायक भूमिका निभाई।


दुर्गादास राठौड़: एक नजर में

बिंदु

जानकारी

नाम

वीर दुर्गादास राठौड़

वंश

राठौड़

जन्म

1638 ई. के आसपास

जन्मस्थान

सालवा, मारवाड़

पिता

आसकरण राठौड़

संबंधित शासक

महाराजा जसवंत सिंह प्रथम

प्रमुख भूमिका

सरदार, सेनानायक एवं अजीत सिंह के संरक्षक

प्रमुख संघर्ष

मुगल सत्ता के विरुद्ध मारवाड़ का प्रतिरोध

प्रमुख मुगल शासक

औरंगजेब

प्रमुख सहयोग

मेवाड़ के सिसोदिया शासक

प्रमुख संरक्षित व्यक्ति

बालक अजीत सिंह

महत्वपूर्ण काल

1678–1707/09 ई.

औरंगजेब की मृत्यु

1707 ई.

दुर्गादास की मृत्यु

1718 ई.

मृत्यु स्थान

उज्जैन

समाधि/छतरी

क्षिप्रा नदी के तट, उज्जैन

जन्म और मृत्यु की तिथियों को लेकर स्रोतों में कुछ अंतर मिलता है। राजस्थान के शैक्षिक स्रोत दुर्गादास का जन्म 1638 ई. के आसपास तथा मृत्यु 1718 ई. में बताते हैं। (Wikipedia)


1. दुर्गादास राठौड़ कौन थे?

दुर्गादास राठौड़ मारवाड़ के राठौड़ राजवंश से जुड़े एक प्रमुख सरदार और सेनानायक थे। वे महाराजा जसवंत सिंह प्रथम के विश्वस्त सरदार आसकरण राठौड़ के पुत्र थे।

उनका महत्व इसलिए बढ़ गया क्योंकि 1678 ई. में जसवंत सिंह प्रथम की मृत्यु के बाद मारवाड़ के उत्तराधिकार का गंभीर संकट पैदा हुआ। इस समय राठौड़ सत्ता के सामने सबसे बड़ी चुनौती मुगल सम्राट औरंगजेब की मारवाड़ पर सीधा नियंत्रण स्थापित करने की नीति थी।

इसी संकट में दुर्गादास ने बालक अजीत सिंह की सुरक्षा और राठौड़ सत्ता के संरक्षण का दायित्व संभाला।

यहाँ एक महत्वपूर्ण बात याद रखनी चाहिए:

दुर्गादास स्वयं मारवाड़ के शासक नहीं थे।

वे राठौड़ सत्ता के संरक्षक और प्रमुख सेनानायक थे। उनका लक्ष्य स्वयं सिंहासन प्राप्त करना नहीं, बल्कि राठौड़ उत्तराधिकार और मारवाड़ की स्वतंत्र राजनीतिक सत्ता को सुरक्षित रखना था। Suyog Academy के उपलब्ध अध्ययन में भी इस अंतर को परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण बताया गया है। (Suyog Academy)


2. दुर्गादास राठौड़ का जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि

दुर्गादास का जन्म 1638 ई. के आसपास मारवाड़ के सालवा क्षेत्र में माना जाता है। उनके पिता आसकरण राठौड़ महाराजा जसवंत सिंह प्रथम के विश्वस्त सरदार थे।

उनका परिवार राठौड़ शासकों की सेवा से जुड़ा हुआ था। इसी कारण दुर्गादास को प्रारंभ से ही मारवाड़ की राजनीतिक और सैन्य परिस्थितियों की समझ प्राप्त हुई।

उनके व्यक्तित्व के विकास में तीन बातें विशेष रूप से महत्वपूर्ण रहीं:

  1. राठौड़ स्वामिभक्ति की परंपरा

  2. सैन्य जीवन और युद्ध का अनुभव

  3. मारवाड़ की राजनीतिक परिस्थितियों की समझ

यही गुण बाद में उन्हें एक साधारण सरदार से आगे बढ़ाकर मारवाड़ के सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक-सैन्य नेताओं में शामिल करते हैं।

शिक्षक नोट

परीक्षा में यदि पूछा जाए:

"दुर्गादास राठौड़ के पिता कौन थे?"

तो उत्तर होगा:

आसकरण राठौड़।

इसे महाराजा जसवंत सिंह के नाम से confuse न करें। जसवंत सिंह उनके स्वामी थे, पिता नहीं।


3. जसवंत सिंह प्रथम और दुर्गादास का संबंध

दुर्गादास का राजनीतिक जीवन महाराजा जसवंत सिंह प्रथम के शासनकाल से जुड़ा था।

जसवंत सिंह मारवाड़ के शक्तिशाली शासकों में से एक थे और मुगल साम्राज्य के साथ उनके संबंध समय-समय पर सहयोग और तनाव दोनों से प्रभावित रहे।

इस पृष्ठभूमि को समझने के लिए Suyog Academy का महाराजा जसवंत सिंह प्रथम: औरंगजेब काल का जटिल अध्याय पढ़ना उपयोगी है। इसमें धरमत के युद्ध, जसवंत सिंह और औरंगजेब के संबंध तथा उत्तराधिकार संकट को विस्तार से समझाया गया है। (Suyog Academy)

जसवंत सिंह की मृत्यु के बाद ही वह राजनीतिक संकट सामने आया जिसमें दुर्गादास की भूमिका ऐतिहासिक रूप से निर्णायक बनी।


4. 1678 ई. में जसवंत सिंह की मृत्यु और मारवाड़ का संकट

महाराजा जसवंत सिंह प्रथम की मृत्यु 1678 ई. में जमरूद में हुई।

उनकी मृत्यु के समय मारवाड़ के उत्तराधिकार का प्रश्न गंभीर हो गया। बाद में उनकी रानी से बालक अजीत सिंह का जन्म हुआ।

यही स्थिति औरंगजेब के लिए मारवाड़ पर अपना नियंत्रण मजबूत करने का अवसर बन गई।

मुगल सत्ता चाहती थी कि मारवाड़ को सीधे मुगल प्रशासन के अधीन किया जाए। इससे राठौड़ सरदारों के सामने केवल उत्तराधिकार का सवाल नहीं था, बल्कि उनकी राजनीतिक स्वायत्तता का भी प्रश्न खड़ा हो गया।

यहीं से दुर्गादास के संघर्ष का वास्तविक प्रारंभ माना जाता है।


5. बालक अजीत सिंह की रक्षा

दुर्गादास राठौड़ के जीवन की सबसे प्रसिद्ध घटना बालक अजीत सिंह की रक्षा है।

मुगल सत्ता की निगरानी और राजनीतिक दबाव के बीच राठौड़ सरदारों ने अजीत सिंह को सुरक्षित रखने का प्रयास किया।

दुर्गादास ने इस अभियान में प्रमुख भूमिका निभाई और बालक अजीत सिंह को मुगल नियंत्रण से बाहर निकालकर सुरक्षित क्षेत्र में पहुँचाने में सहायता की।

राजस्थान पर्यटन विभाग के अनुसार, मारवाड़ की परंपराओं में दुर्गादास और अजीत सिंह की सुरक्षा से जुड़ी घटनाओं का संबंध नाथ का मगरा जैसे स्थानों से भी बताया जाता है। (Rajasthan Tourism)

यह घटना केवल एक राजकुमार की रक्षा नहीं थी। इसके पीछे मारवाड़ के राठौड़ राजवंश की राजनीतिक निरंतरता को बचाने का उद्देश्य था।


6. अजीत सिंह की रक्षा क्यों महत्वपूर्ण थी?

इस प्रश्न को परीक्षा की दृष्टि से समझना बहुत जरूरी है।

यदि अजीत सिंह मुगल नियंत्रण में चले जाते और राठौड़ उत्तराधिकार समाप्त या कमजोर हो जाता, तो मारवाड़ को मुगल साम्राज्य में स्थायी रूप से शामिल करने की संभावना बढ़ जाती।

इसलिए दुर्गादास का संघर्ष तीन स्तरों पर था:

व्यक्ति → अजीत सिंह की रक्षा

वंश → राठौड़ उत्तराधिकार की रक्षा

राज्य → मारवाड़ की राजनीतिक स्वायत्तता की रक्षा

यही कारण है कि दुर्गादास का संघर्ष केवल व्यक्तिगत स्वामिभक्ति का उदाहरण नहीं था, बल्कि मारवाड़ की राजनीतिक स्वतंत्रता के संरक्षण से भी जुड़ा था।


7. औरंगजेब की मारवाड़ नीति और राठौड़ प्रतिरोध

औरंगजेब ने मारवाड़ की राजनीतिक स्थिति को अपने साम्राज्य के हित में बदलने का प्रयास किया।

मारवाड़ का भौगोलिक क्षेत्र सामरिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण था। पश्चिमी भारत में स्थित होने के कारण इसका संबंध गुजरात, सिंध और उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों की ओर जाने वाले मार्गों से था।

मुगल सत्ता के बढ़ते हस्तक्षेप ने राठौड़ सरदारों में असंतोष पैदा किया।

दुर्गादास ने इस असंतोष को संगठित प्रतिरोध में बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।


8. 1679 ई. का राजपूत विद्रोह

1679 ई. दुर्गादास राठौड़ के संघर्ष का एक महत्वपूर्ण वर्ष है।

इसी समय राजपूतों और मुगल सत्ता के बीच संघर्ष व्यापक रूप लेता है।

औरंगजेब द्वारा जजिया कर की पुनर्स्थापना ने भी राजपूत असंतोष को बढ़ाने में भूमिका निभाई।

मारवाड़ के राठौड़ और मेवाड़ के सिसोदिया मुगल नीति के विरोध में आए।

दुर्गादास ने मारवाड़ की ओर से प्रतिरोध का नेतृत्व किया।

इस संघर्ष में मेवाड़ के महाराणा राजसिंह प्रथम का सहयोग महत्वपूर्ण था। राजस्थान सरकार के सांस्कृतिक स्रोत भी बताते हैं कि महाराणा राजसिंह ने दुर्गादास और अजीत सिंह को संरक्षण दिया था। (Jawahar Kala Kendra)


9. राठौड़-सिसोदिया सहयोग

मुगल सत्ता के विरुद्ध संघर्ष में मारवाड़ और मेवाड़ का सहयोग विशेष महत्व रखता है।

मारवाड़ के राठौड़ और मेवाड़ के सिसोदिया पहले से ही राजस्थान की दो महत्वपूर्ण राजपूत शक्तियाँ थीं।

जब दोनों शक्तियों ने मुगल दबाव के विरुद्ध सहयोग किया, तो मुगल सेना के सामने पश्चिमी राजस्थान में एक बड़ी राजनीतिक और सैन्य चुनौती उत्पन्न हुई।

परीक्षा में याद रखें

मारवाड़ → राठौड़ → दुर्गादास

मेवाड़ → सिसोदिया → महाराणा राजसिंह प्रथम

यह संबंध RPSC और RAS के लिए महत्वपूर्ण है।


10. दुर्गादास की गुरिल्ला युद्ध नीति

दुर्गादास की सबसे बड़ी सैन्य विशेषताओं में से एक थी गुरिल्ला युद्ध का प्रभावी उपयोग

मुगल साम्राज्य के पास बड़ी सेना, आर्थिक संसाधन और विशाल प्रशासनिक व्यवस्था थी। ऐसी स्थिति में राठौड़ों के लिए लगातार खुले मैदान में मुगल सेना से निर्णायक युद्ध करना कठिन था।

इसलिए दुर्गादास ने:

  • दुर्गम क्षेत्रों का उपयोग किया।

  • छोटे सैन्य दलों से अचानक आक्रमण किए।

  • मुगल संचार और रसद व्यवस्था को चुनौती दी।

  • अवसर देखकर आक्रमण और पीछे हटने की नीति अपनाई।

  • स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों का लाभ उठाया।

  • राजनीतिक गठबंधनों के माध्यम से मुगल दबाव को विभाजित किया।

यह रणनीति तत्काल निर्णायक विजय के बजाय दीर्घकालिक प्रतिरोध पर आधारित थी।

Teacher Note

महाराणा प्रताप और दुर्गादास की युद्ध रणनीति को पढ़ते समय केवल "गुरिल्ला युद्ध" शब्द याद करना पर्याप्त नहीं है।

मुख्य अंतर यह है कि दोनों ने अपनी-अपनी परिस्थितियों के अनुसार दुर्गम भूगोल, स्थानीय समर्थन और गतिशील सैन्य रणनीति का उपयोग किया।

महाराणा प्रताप के संघर्ष को समझने के लिए Suyog Academy का महाराणा प्रताप के जीवन की पूरी Timeline और दिवेर का युद्ध भी पढ़ सकते हैं। (Suyog Academy)


11. दुर्गादास केवल योद्धा नहीं, कूटनीतिज्ञ भी थे

दुर्गादास की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक थी उनकी राजनीतिक समझ।

उन्होंने यह समझ लिया था कि केवल सैन्य शक्ति के बल पर विशाल मुगल साम्राज्य से लंबे समय तक संघर्ष करना कठिन होगा।

इसलिए उन्होंने राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार गठबंधन और कूटनीति का प्रयोग किया।

उनकी रणनीति में प्रमुख रूप से शामिल थे:

  • मेवाड़ से सहयोग

  • मुगल दरबार की आंतरिक राजनीति का लाभ उठाना

  • शहजादा अकबर के विद्रोह से संपर्क

  • अजीत सिंह की सुरक्षा

  • आवश्यकता के अनुसार राजनीतिक समझौते

  • मुगल सत्ता की कमजोरी के समय निर्णायक कार्रवाई

इस कारण दुर्गादास को केवल "वीर योद्धा" कहना उनके व्यक्तित्व को सीमित कर देता है। वे एक राजनीतिक रणनीतिकार भी थे।


12. औरंगजेब का पुत्र शहजादा अकबर और दुर्गादास

दुर्गादास के संघर्ष का एक रोचक अध्याय औरंगजेब के पुत्र शहजादा अकबर से जुड़ा है।

यहाँ एक महत्वपूर्ण परीक्षा भ्रम है:

शहजादा अकबर ≠ मुगल सम्राट अकबर

शहजादा अकबर, औरंगजेब का पुत्र था।

उसने राजपूतों के सहयोग से अपने पिता औरंगजेब के विरुद्ध विद्रोह किया। दुर्गादास ने इस राजनीतिक परिस्थिति का लाभ उठाने की कोशिश की।

विद्रोह सफल नहीं हुआ और शहजादा अकबर को अंततः भारत से बाहर जाना पड़ा।

यह घटना दिखाती है कि दुर्गादास केवल मारवाड़ की सीमित समस्या तक सीमित नहीं थे। वे मुगल साम्राज्य की आंतरिक राजनीतिक परिस्थितियों को भी समझते थे।


13. शहजादा अकबर के बच्चों की सुरक्षा

दुर्गादास से संबंधित इतिहास में एक महत्वपूर्ण प्रसंग शहजादा अकबर के बच्चों से जुड़ा है।

परंपरागत विवरणों के अनुसार दुर्गादास ने शहजादा अकबर के बच्चों की सुरक्षा और देखभाल की।

यह घटना उनके चरित्र के एक अलग पक्ष को सामने लाती है।

जिस मुगल शासक से वे राजनीतिक रूप से संघर्ष कर रहे थे, उसी शाही परिवार के बच्चों के प्रति उन्होंने सुरक्षा और मानवीय व्यवहार दिखाया।

राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की इतिहास सामग्री भी दुर्गादास द्वारा अकबर के बच्चों की देखभाल तथा बाद में उन्हें सम्मानपूर्वक मुगल पक्ष को सौंपे जाने का उल्लेख करती है। (Rajasthan Education Board)

परीक्षा के लिए महत्व

इस घटना का उपयोग वर्णनात्मक प्रश्न में दुर्गादास की कूटनीतिक नीति और व्यक्तिगत आचरण समझाने के लिए किया जा सकता है।


14. दुर्गादास और धार्मिक सहिष्णुता

दुर्गादास के व्यक्तित्व का मूल्यांकन केवल मुगल-विरोध के आधार पर करना उचित नहीं है।

उनसे संबंधित स्रोतों में शहजादा अकबर के बच्चों के प्रति उनके व्यवहार का उल्लेख मिलता है। इससे यह संकेत मिलता है कि उनका संघर्ष किसी समुदाय के सामान्य लोगों के विरुद्ध नहीं, बल्कि मुख्यतः राजनीतिक प्रभुत्व और मारवाड़ की सत्ता की रक्षा से जुड़ा था।

यह distinction RAS मुख्य परीक्षा में उपयोगी है।

उत्तर लिखने का बेहतर तरीका

कमजोर उत्तर:

दुर्गादास ने मुगलों के खिलाफ युद्ध किया।

बेहतर उत्तर:

दुर्गादास का संघर्ष मुख्यतः मारवाड़ की राजनीतिक स्वायत्तता, राठौड़ उत्तराधिकार और बालक अजीत सिंह के अधिकार की रक्षा से जुड़ा था। उनकी रणनीति में सैन्य प्रतिरोध के साथ कूटनीति और राजनीतिक गठबंधन का भी महत्वपूर्ण स्थान था।


15. लगभग 30 वर्षों का संघर्ष

दुर्गादास के संघर्ष को सामान्यतः लगभग 30 वर्षों का संघर्ष कहा जाता है।

इस संघर्ष की शुरुआत 1678-79 ई. के उत्तराधिकार संकट और मुगल हस्तक्षेप से हुई और औरंगजेब की मृत्यु के बाद परिस्थितियाँ तेजी से बदलीं।

यह संघर्ष केवल एक युद्ध नहीं था।

यह लंबे समय तक चलने वाला:

  • राजनीतिक संघर्ष

  • सैन्य प्रतिरोध

  • गुरिल्ला युद्ध

  • कूटनीतिक प्रयास

  • राजपूत गठबंधन

  • उत्तराधिकार संरक्षण

का मिश्रण था।

Suyog Academy के मौजूदा अध्ययन में भी इसे लगभग 30 वर्षों के संघर्ष के रूप में प्रस्तुत किया गया है। (Suyog Academy)


16. 1707 ई. में औरंगजेब की मृत्यु

1707 ई. में औरंगजेब की मृत्यु हुई।

औरंगजेब की मृत्यु मुगल साम्राज्य के लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक मोड़ था।

उसके बाद मुगल साम्राज्य में उत्तराधिकार संघर्ष और राजनीतिक अस्थिरता बढ़ी। दुर्गादास और अजीत सिंह ने इस परिस्थिति का लाभ उठाया।

अब मुगल सत्ता पहले की तरह केंद्रीकृत दबाव बनाए रखने की स्थिति में नहीं थी।

राठौड़ सेना ने मारवाड़ में अपनी स्थिति मजबूत की और अजीत सिंह ने अपने पैतृक राज्य पर अधिकार स्थापित किया।


17. अजीत सिंह की मारवाड़ में पुनर्स्थापना

अजीत सिंह को मारवाड़ की सत्ता वापस दिलाना दुर्गादास के संघर्ष का सबसे बड़ा राजनीतिक परिणाम था।

1707 ई. के बाद बदलती मुगल परिस्थितियों में अजीत सिंह ने जोधपुर पर अपना अधिकार स्थापित किया।

राजस्थान बोर्ड की इतिहास सामग्री के अनुसार, औरंगजेब की मृत्यु की सूचना मिलने के बाद अजीत सिंह ने जोधपुर के मुगल प्रतिनिधि को हटाकर अपने पैतृक राज्य पर अधिकार कर लिया। (Rajasthan Education Board)

इससे राठौड़ सत्ता की पुनर्स्थापना का मार्ग प्रशस्त हुआ।


18. क्या दुर्गादास ने मारवाड़ की स्वतंत्रता वापस दिलाई?

इस प्रश्न का उत्तर थोड़ा सावधानी से देना चाहिए।

हाँ, दुर्गादास की भूमिका निर्णायक थी, लेकिन मारवाड़ की राजनीतिक पुनर्स्थापना एक लंबे संघर्ष और बदलती मुगल परिस्थितियों का परिणाम थी।

दुर्गादास ने:

  • अजीत सिंह को बचाया।

  • राठौड़ प्रतिरोध को बनाए रखा।

  • मुगल सेना के विरुद्ध संघर्ष किया।

  • मेवाड़ से सहयोग प्राप्त किया।

  • राजनीतिक गठबंधन बनाए।

  • मुगल साम्राज्य की आंतरिक कमजोरी का लाभ उठाया।

  • अजीत सिंह के सिंहासन पर पुनः अधिकार का मार्ग तैयार किया।

इसलिए उन्हें मारवाड़ की स्वतंत्र राठौड़ सत्ता की पुनर्स्थापना के प्रमुख शिल्पियों में गिना जाता है।


19. दुर्गादास और अजीत सिंह के संबंधों में तनाव

दुर्गादास के जीवन का अंतिम चरण उनकी संघर्ष-गाथा से बिल्कुल अलग है।

जिस अजीत सिंह की रक्षा के लिए उन्होंने अपना जीवन लगा दिया, बाद में उसी अजीत सिंह के साथ उनके संबंधों में तनाव उत्पन्न हुआ।

अजीत सिंह के वयस्क होकर स्वयं शासन करने के बाद दरबार में शक्ति-संतुलन बदल गया।

दुर्गादास का प्रभाव बहुत अधिक था। संभवतः यही कारण दरबारी राजनीति और व्यक्तिगत मतभेदों के साथ मिलकर दोनों के संबंधों में तनाव का कारण बना।

अंततः दुर्गादास को मारवाड़ से दूर होना पड़ा।

राजस्थान बोर्ड की सामग्री में भी अजीत सिंह के साथ मतभेद के बाद दुर्गादास के मेवाड़ चले जाने और बाद में उनके उज्जैन में रहने का उल्लेख मिलता है। (Rajasthan Education Board)


20. दुर्गादास का मेवाड़ से संबंध

दुर्गादास के जीवन में मेवाड़ का स्थान महत्वपूर्ण रहा।

मारवाड़ के संघर्ष के दौरान महाराणा राजसिंह प्रथम ने अजीत सिंह और दुर्गादास को समर्थन दिया था।

बाद के समय में दुर्गादास ने मेवाड़ में भी आश्रय प्राप्त किया।

यह घटना बताती है कि मेवाड़ और मारवाड़ के राजनीतिक संबंध केवल राजवंशीय प्रतिद्वंद्विता तक सीमित नहीं थे। मुगल सत्ता के दबाव के समय दोनों राजपूत शक्तियों के बीच रणनीतिक सहयोग भी देखने को मिला।


21. दुर्गादास का अंतिम जीवन

अजीत सिंह के साथ मतभेद के बाद दुर्गादास ने मारवाड़ से बाहर जीवन बिताया।

मेवाड़ के महाराणा अमरसिंह द्वितीय से उन्हें संरक्षण मिला। बाद में उन्हें रामपुरा की जिम्मेदारी भी दी गई।

अंततः दुर्गादास की मृत्यु 22 नवंबर 1718 ई. को उज्जैन में हुई।

उनकी स्मृति में क्षिप्रा नदी के तट पर छतरी स्थित है। राजस्थान बोर्ड की सामग्री भी उज्जैन में उनकी मृत्यु और क्षिप्रा तट पर छतरी का उल्लेख करती है। (Rajasthan Education Board)


22. दुर्गादास राठौड़ की मृत्यु

तथ्य

जानकारी

मृत्यु

22 नवंबर 1718 ई.

स्थान

उज्जैन

नदी

क्षिप्रा

स्मारक

छतरी

अंतिम जीवन

मारवाड़ से बाहर

Exam Fact

दुर्गादास → उज्जैन → क्षिप्रा नदी

यह एक बहुत उपयोगी memory chain है।


23. दुर्गादास राठौड़ का ऐतिहासिक महत्व

दुर्गादास का महत्व केवल इसलिए नहीं है कि उन्होंने युद्ध लड़े।

उनका वास्तविक ऐतिहासिक महत्व इन कारणों में है:

1. राठौड़ उत्तराधिकार की रक्षा

उन्होंने अजीत सिंह को सुरक्षित रखकर राठौड़ वंश की राजनीतिक निरंतरता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

2. मुगल केंद्रीकरण को चुनौती

उन्होंने मारवाड़ को पूर्णतः मुगल प्रशासन के अधीन जाने से रोकने के लिए लंबे समय तक प्रतिरोध किया।

3. गुरिल्ला रणनीति

उन्होंने बड़े साम्राज्य के विरुद्ध छोटे और गतिशील सैन्य बलों का प्रभावी उपयोग किया।

4. कूटनीति

उन्होंने मेवाड़ और मुगल दरबार की आंतरिक राजनीति को अपने पक्ष में उपयोग करने का प्रयास किया।

5. स्वामिभक्ति

उन्होंने अपने व्यक्तिगत हित से ऊपर राठौड़ राज्य और अजीत सिंह के अधिकार को रखा।


24. दुर्गादास और राव चंद्रसेन में अंतर

दुर्गादास को समझने के लिए राव चंद्रसेन से तुलना उपयोगी है।

Suyog Academy पर राव चंद्रसेन के मुगल-विरोध तथा राव चंद्रसेन बनाम महाराणा प्रताप की तुलना पर अलग-अलग अध्ययन उपलब्ध हैं। (Suyog Academy)

आधार

राव चंद्रसेन

दुर्गादास राठौड़

स्थिति

मारवाड़ के शासक

प्रमुख सरदार

काल

अकबर का काल

औरंगजेब का काल

प्रमुख प्रतिद्वंद्वी

अकबर

औरंगजेब

मुख्य उद्देश्य

मारवाड़ की सत्ता व स्वाभिमान

अजीत सिंह और राठौड़ सत्ता की रक्षा

रणनीति

प्रतिरोध व संघर्ष

गुरिल्ला + कूटनीति + गठबंधन

मेवाड़ संबंध

महाराणा प्रताप से सहयोग

महाराणा राजसिंह से सहयोग

परिणाम

संघर्ष जारी रहा, राज्य की पूर्ण पुनर्स्थापना नहीं

अजीत सिंह की पुनर्स्थापना में सफलता

Memory Trick

चंद्रसेन = स्वयं शासक होकर संघर्ष

दुर्गादास = शासक के अधिकार की रक्षा के लिए संघर्ष


25. दुर्गादास और महाराणा प्रताप में समानताएँ

दुर्गादास और महाराणा प्रताप अलग-अलग काल के व्यक्तित्व थे, लेकिन दोनों के संघर्ष में कुछ समानताएँ दिखाई देती हैं।

  • दोनों ने मुगल सत्ता के विरुद्ध प्रतिरोध किया।

  • दोनों ने कठिन भौगोलिक परिस्थितियों का उपयोग किया।

  • दोनों ने दीर्घकालीन संघर्ष को प्राथमिकता दी।

  • दोनों के संघर्ष में स्थानीय संसाधनों और सहयोगियों की भूमिका रही।

  • दोनों राजस्थान की राजनीतिक स्वायत्तता के प्रतीक बने।

लेकिन दोनों को एक जैसा मानना सही नहीं है।

महाराणा प्रताप स्वयं मेवाड़ के शासक थे, जबकि दुर्गादास राठौड़ एक सरदार और संरक्षक थे।


26. दुर्गादास राठौड़ की युद्ध नीति

दुर्गादास की युद्ध नीति को चार शब्दों में समझा जा सकता है:

गतिशीलता + गुरिल्ला + भूगोल + कूटनीति

गतिशीलता

छोटे सैन्य दलों की तेज आवाजाही।

गुरिल्ला

अचानक हमला और सुरक्षित क्षेत्र में वापसी।

भूगोल

मरुस्थलीय और दुर्गम क्षेत्रों का सैन्य उपयोग।

कूटनीति

मुगल साम्राज्य के विरोधी या असंतुष्ट पक्षों से संपर्क।

यही संयोजन उनके लंबे प्रतिरोध को संभव बनाता है।


27. Teacher Notes: परीक्षा में दुर्गादास को कैसे पढ़ें?

अगर आप RPSC, RAS, CET, Patwari, VDO या अन्य राजस्थान आधारित प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं, तो दुर्गादास को केवल जीवनी की तरह न पढ़ें।

इसे इस cause-effect chain में पढ़ें:

जसवंत सिंह की मृत्यु

उत्तराधिकार संकट

अजीत सिंह का जन्म

मुगल हस्तक्षेप

दुर्गादास का प्रतिरोध

अजीत सिंह की सुरक्षा

1679 का राजपूत विद्रोह

मेवाड़ का सहयोग

शहजादा अकबर का विद्रोह

लगातार राठौड़ प्रतिरोध

1707 में औरंगजेब की मृत्यु

अजीत सिंह की सत्ता में वापसी

यह sequence किसी भी objective या descriptive प्रश्न में बहुत मदद करेगा।


28. Exam Important Facts

बहुत महत्वपूर्ण तथ्य

  1. दुर्गादास राठौड़ का संबंध मारवाड़ के राठौड़ वंश से था।

  2. उनके पिता का नाम आसकरण राठौड़ था।

  3. वे महाराजा जसवंत सिंह प्रथम के विश्वस्त सरदार थे।

  4. जसवंत सिंह की मृत्यु 1678 ई. में हुई।

  5. अजीत सिंह जसवंत सिंह के मरणोपरांत पुत्र थे।

  6. दुर्गादास ने बालक अजीत सिंह की रक्षा की।

  7. मारवाड़ का प्रमुख मुगल-विरोधी संघर्ष औरंगजेब के काल में हुआ।

  8. 1679 ई. राजपूत विद्रोह का महत्वपूर्ण वर्ष है।

  9. 1679 ई. में औरंगजेब ने जजिया पुनः लगाया।

  10. महाराणा राजसिंह प्रथम ने राठौड़ों को सहयोग दिया।

  11. औरंगजेब का पुत्र शहजादा अकबर राजपूतों के सहयोग से विद्रोह में शामिल हुआ।

  12. औरंगजेब की मृत्यु 1707 ई. में हुई।

  13. इसके बाद अजीत सिंह ने मारवाड़ में अपना अधिकार मजबूत किया।

  14. दुर्गादास और अजीत सिंह के संबंधों में बाद में तनाव उत्पन्न हुआ।

  15. दुर्गादास की मृत्यु 1718 ई. में उज्जैन में हुई।

  16. उनकी छतरी क्षिप्रा नदी के किनारे है।

  17. दुर्गादास स्वयं मारवाड़ के राजा नहीं बने।

  18. उनका मुख्य योगदान अजीत सिंह और राठौड़ सत्ता की रक्षा था।

  19. उनके संघर्ष में सैन्य शक्ति के साथ कूटनीति की भी महत्वपूर्ण भूमिका थी।

  20. दुर्गादास का संघर्ष लगभग तीन दशकों तक चला।


29. Exam Trap: इन गलतियों से बचें

Trap 1

दुर्गादास = मारवाड़ का राजा

❌ गलत

वे प्रमुख राठौड़ सरदार और सेनानायक थे।

Trap 2

शहजादा अकबर = सम्राट अकबर

❌ गलत

शहजादा अकबर औरंगजेब का पुत्र था।

Trap 3

दुर्गादास ने अकेले संघर्ष किया

❌ अधूरा

मेवाड़ का सहयोग और राजनीतिक गठबंधन भी महत्वपूर्ण थे।

Trap 4

दुर्गादास की मृत्यु जोधपुर में हुई

❌ गलत

उनकी मृत्यु उज्जैन में हुई।

Trap 5

दुर्गादास ने अजीत सिंह को हराकर सत्ता प्राप्त की

❌ गलत

उन्होंने अजीत सिंह के अधिकार की रक्षा की।

Trap 6

दुर्गादास का संघर्ष केवल धार्मिक संघर्ष था

❌ अतिसरलीकरण

मुख्य प्रश्न राजनीतिक सत्ता, उत्तराधिकार और मारवाड़ की स्वायत्तता से जुड़ा था।


30. दुर्गादास राठौड़ की प्रमुख घटनाओं की Timeline

वर्ष

घटना

लगभग 1638 ई.

दुर्गादास का जन्म

1658 ई.

मुगल उत्तराधिकार संघर्ष का दौर

1678 ई.

जसवंत सिंह प्रथम की मृत्यु

1678–79 ई.

अजीत सिंह के उत्तराधिकार का संकट

1679 ई.

राजपूत प्रतिरोध व्यापक हुआ

1679 ई.

जजिया की पुनर्स्थापना

1680 के दशक

दुर्गादास का दीर्घकालिक प्रतिरोध

लगभग 1681 ई.

शहजादा अकबर का विद्रोह

1707 ई.

औरंगजेब की मृत्यु

1707 के बाद

अजीत सिंह का मारवाड़ पर अधिकार

1708–09 ई.

राठौड़ सत्ता का सुदृढ़ीकरण

बाद का काल

दुर्गादास और अजीत सिंह में तनाव

1718 ई.

दुर्गादास की उज्जैन में मृत्यु


31. मारवाड़ के इतिहास में दुर्गादास का स्थान

मारवाड़ के इतिहास को यदि एक लंबी राजनीतिक यात्रा के रूप में देखें, तो दुर्गादास एक महत्वपूर्ण कड़ी हैं।

राठौड़ सत्ता के प्रारंभिक विकास से लेकर जोधपुर की स्थापना और बाद के मुगल संबंधों तक मारवाड़ ने कई राजनीतिक चरण देखे।

Suyog Academy पर राठौड़ वंश का इतिहास: कन्नौज से मारवाड़ तक इस पूरी पृष्ठभूमि को समझने के लिए उपयोगी है। इसमें राव सीहा से लेकर राव जोधा, मालदेव, चंद्रसेन, जसवंत सिंह और दुर्गादास तक की कड़ी मिलती है। (Suyog Academy)

इसके साथ आप:

को क्रम से पढ़ सकते हैं।


32. दुर्गादास और मारवाड़ की स्वतंत्रता: विश्लेषण

दुर्गादास की सफलता को केवल युद्ध की जीत से नहीं समझना चाहिए।

उनकी सबसे बड़ी सफलता थी समय खरीदना

मुगल साम्राज्य के पास विशाल संसाधन थे। राठौड़ शक्ति तुलनात्मक रूप से सीमित थी। यदि दुर्गादास एक ही निर्णायक युद्ध में मुगल सेना से भिड़कर हार जाते, तो राठौड़ प्रतिरोध समाप्त हो सकता था।

उन्होंने इसके बजाय लंबे संघर्ष को चुना।

उन्होंने मुगल सत्ता को लगातार व्यस्त रखा।

जब तक औरंगजेब जीवित रहा, राठौड़ प्रतिरोध पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। 1707 में औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुगल साम्राज्य के सामने उत्तराधिकार और प्रशासनिक समस्याएँ बढ़ीं।

यही वह राजनीतिक परिस्थिति थी जिसमें राठौड़ शक्ति ने अपना खोया प्रभाव पुनः स्थापित किया।

इस दृष्टि से दुर्गादास की सबसे बड़ी उपलब्धि थी:

राठौड़ प्रतिरोध को उस समय तक जीवित रखना जब तक राजनीतिक परिस्थितियाँ उनके पक्ष में नहीं आ गईं।


33. दुर्गादास की नेतृत्व शैली

दुर्गादास की नेतृत्व शैली में तीन प्रमुख तत्व दिखाई देते हैं।

सैन्य नेतृत्व

उन्होंने मुगल सेना के विरुद्ध लंबे समय तक प्रतिरोध को बनाए रखा।

राजनीतिक नेतृत्व

उन्होंने विभिन्न शक्तियों के बीच गठबंधन बनाए और राजनीतिक अवसरों का उपयोग किया।

व्यक्तिगत नेतृत्व

उन्होंने अजीत सिंह की सुरक्षा को अपने व्यक्तिगत हित से ऊपर रखा।

इसलिए उनका नेतृत्व केवल battlefield leadership नहीं था।

यह political-military leadership का उदाहरण था।


34. RAS/RPSC मुख्य परीक्षा के लिए मॉडल उत्तर का ढांचा

यदि प्रश्न आए:

"मारवाड़ की स्वतंत्रता की रक्षा में दुर्गादास राठौड़ की भूमिका का मूल्यांकन कीजिए।"

तो उत्तर इस क्रम में लिखें:

भूमिका

जसवंत सिंह की मृत्यु के बाद मारवाड़ में उत्पन्न उत्तराधिकार संकट ने राठौड़ सत्ता को गंभीर चुनौती दी।

मुख्य भाग

  1. बालक अजीत सिंह की रक्षा

  2. मुगल हस्तक्षेप का विरोध

  3. राठौड़ सरदारों का संगठन

  4. 1679 का राजपूत प्रतिरोध

  5. मेवाड़ से सहयोग

  6. गुरिल्ला युद्ध

  7. शहजादा अकबर के विद्रोह का राजनीतिक उपयोग

  8. लगभग तीन दशकों तक प्रतिरोध

  9. 1707 के बाद बदलती राजनीतिक परिस्थितियों का लाभ

  10. अजीत सिंह की सत्ता में पुनर्स्थापना

निष्कर्ष

दुर्गादास की भूमिका ने राठौड़ उत्तराधिकार और मारवाड़ की राजनीतिक स्वायत्तता को बचाए रखने में निर्णायक योगदान दिया। उनकी सफलता सैन्य प्रतिरोध के साथ कूटनीतिक रणनीति और दीर्घकालिक राजनीतिक धैर्य का परिणाम थी।


35. याद रखने की सबसे आसान Trick

"जसवंत → अजीत → दुर्गादास → औरंगजेब → राजपूत विद्रोह → अकबर → 1707 → अजीत की वापसी"

इस पूरी chain को याद कर लें।

अगर प्रश्न दुर्गादास के बारे में आएगा तो अधिकांश घटनाएँ इसी sequence में जुड़ जाएंगी।


36. दुर्गादास राठौड़ से जुड़े 15 One-Liner Facts

  1. दुर्गादास राठौड़ किस वंश से थे?
    राठौड़।

  2. उनके पिता कौन थे?
    आसकरण राठौड़।

  3. वे किस शासक से जुड़े थे?
    महाराजा जसवंत सिंह प्रथम।

  4. जसवंत सिंह की मृत्यु कब हुई?
    1678 ई.

  5. अजीत सिंह किसके पुत्र थे?
    महाराजा जसवंत सिंह प्रथम।

  6. अजीत सिंह की रक्षा किसने की?
    दुर्गादास राठौड़ और अन्य राठौड़ सरदारों ने।

  7. राजपूत विद्रोह का महत्वपूर्ण वर्ष?
    1679 ई.

  8. 1679 में कौन-सा कर पुनः लगाया गया?
    जजिया।

  9. मेवाड़ के किस शासक ने राठौड़ों को सहयोग दिया?
    महाराणा राजसिंह प्रथम।

  10. औरंगजेब का कौन-सा पुत्र राजपूतों के साथ विद्रोह में शामिल हुआ?
    शहजादा अकबर।

  11. औरंगजेब की मृत्यु कब हुई?
    1707 ई.

  12. इसके बाद किस राठौड़ शासक की सत्ता पुनः स्थापित हुई?
    अजीत सिंह।

  13. दुर्गादास की मृत्यु कब हुई?
    1718 ई.

  14. मृत्यु कहाँ हुई?
    उज्जैन।

  15. उनकी छतरी किस नदी के किनारे है?
    क्षिप्रा।


37. Suyog Academy पर संबंधित अध्ययन

दुर्गादास को अकेले पढ़ने की बजाय मारवाड़ के पूरे इतिहास को क्रम से पढ़ना अधिक उपयोगी रहेगा।

मारवाड़ History Sequence

1. राठौड़ वंश का इतिहास: कन्नौज से मारवाड़ तक
राठौड़ वंश की पृष्ठभूमि समझने के लिए।

2. राव सीहा: मारवाड़ के राठौड़ वंश का प्रारंभिक इतिहास
मारवाड़ में राठौड़ सत्ता के शुरुआती चरण के लिए।

3. राव जोधा: जोधपुर के संस्थापक
जोधपुर और मेहरानगढ़ की स्थापना के लिए।

4. राव मालदेव: गिरी सुमेल युद्ध
मारवाड़ के विस्तार और शक्ति को समझने के लिए।

5. राव चंद्रसेन: मारवाड़ का प्रताप
मारवाड़ के प्रारंभिक मुगल-विरोध को समझने के लिए।

6. राव चंद्रसेन बनाम महाराणा प्रताप
मुगल-विरोध की comparative understanding के लिए।

7. महाराजा जसवंत सिंह प्रथम
दुर्गादास के संघर्ष की तत्काल पृष्ठभूमि के लिए।

8. दुर्गादास राठौड़ और अजीत सिंह की गाथा
अजीत सिंह, 30 वर्षीय संघर्ष और मारवाड़ की पुनर्स्थापना के लिए।

9. महाराजा अजीत सिंह: मारवाड़ की स्वतंत्रता की पुनर्स्थापना
दुर्गादास के संघर्ष के परिणाम को समझने के लिए।

Suyog Academy के Rajasthan History hub में मारवाड़ राजवंश को राव सीहा से लेकर दुर्गादास और अजीत सिंह तक क्रमबद्ध तरीके से रखा गया है। (Suyog Academy)


निष्कर्ष

दुर्गादास राठौड़ का इतिहास केवल वीरता की कहानी नहीं है। यह राजनीतिक धैर्य, स्वामिभक्ति, कूटनीति और दीर्घकालीन प्रतिरोध का उदाहरण है।

1678 ई. में जसवंत सिंह प्रथम की मृत्यु के बाद मारवाड़ जिस संकट में फँसा, उसमें दुर्गादास ने बालक अजीत सिंह की रक्षा करके राठौड़ उत्तराधिकार को बचाया। इसके बाद उन्होंने लगभग तीन दशकों तक मुगल सत्ता के विरुद्ध संघर्ष जारी रखा। इस संघर्ष में गुरिल्ला युद्ध, मेवाड़ का सहयोग, राजनीतिक गठबंधन और मुगल दरबार की आंतरिक राजनीति का उपयोग महत्वपूर्ण रहा।

1707 ई. में औरंगजेब की मृत्यु के बाद राजनीतिक परिस्थितियाँ बदलीं और अजीत सिंह ने मारवाड़ में अपनी सत्ता पुनः स्थापित की। इस पूरी प्रक्रिया में दुर्गादास की भूमिका निर्णायक रही।

इसलिए राजस्थान इतिहास में दुर्गादास राठौड़ को समझने का सबसे सही तरीका है:

"दुर्गादास स्वयं राजा नहीं बने, लेकिन उन्होंने राजा के अधिकार और मारवाड़ की राठौड़ सत्ता को बचाने के लिए अपना पूरा जीवन संघर्ष में लगा दिया।"

यही कारण है कि RPSC, RAS, CET, Patwari, VDO और अन्य राजस्थान-केंद्रित परीक्षाओं के लिए दुर्गादास राठौड़ मारवाड़ के इतिहास का एक अनिवार्य अध्याय हैं।

अंतिम संशोधन (Last Updated): 1 सितंबर 2026
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लेखक / पब्लिकेशन: Gauri Publication

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🎯 विगत वर्षों के प्रश्न (Interactive PYQs)

Q1. दुर्गादास राठौड़ के पिता का नाम क्या था?

REET 2022

Q2. महाराजा जसवंत सिंह प्रथम की मृत्यु के बाद दुर्गादास राठौड़ ने किसकी रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई?

RPSC 2021

Q3. जसवंत सिंह प्रथम की मृत्यु किस वर्ष हुई थी?

Rajasthan CET 2022

Q4. दुर्गादास राठौड़ का प्रमुख संघर्ष किस मुगल सम्राट के शासनकाल में हुआ?

RPSC 2020

Q5. मारवाड़ के संघर्ष में दुर्गादास राठौड़ को मेवाड़ के किस शासक का सहयोग मिला?

Rajasthan Police 2022

Q6. 1679 ई. में औरंगजेब की किस नीति से राजपूत असंतोष बढ़ा?

RPSC 2019

Q7. शहजादा अकबर, जिसके विद्रोह से दुर्गादास का संबंध रहा, किसका पुत्र था?

Rajasthan CET 2023

Q8. औरंगजेब की मृत्यु के बाद किस राठौड़ शासक ने मारवाड़ में अपना अधिकार पुनः स्थापित किया?

REET 2023

Q9. दुर्गादास राठौड़ की मृत्यु कहाँ हुई थी?

RPSC 2022

Q10. दुर्गादास राठौड़ का ऐतिहासिक महत्व मुख्यतः किससे संबंधित है?

Rajasthan CET 2024

महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

दुर्गादास राठौड़ मारवाड़ के प्रमुख राठौड़ सरदार, सेनानायक और रणनीतिकार थे। उन्होंने महाराजा जसवंत सिंह प्रथम की मृत्यु के बाद बालक अजीत सिंह की रक्षा की और औरंगजेब के विरुद्ध लंबे समय तक मारवाड़ के प्रतिरोध का नेतृत्व किया।

दुर्गादास राठौड़ के पिता का नाम आसकरण राठौड़ था।

दुर्गादास राठौड़ का जन्म सामान्यतः 1638 ई. के आसपास माना जाता है।

दुर्गादास राठौड़ का जन्म सालवा, मारवाड़ में माना जाता है।

दुर्गादास राठौड़ ने महाराजा जसवंत सिंह प्रथम के पुत्र अजीत सिंह की रक्षा की।

दुर्गादास और औरंगजेब के बीच संघर्ष मुख्यतः मारवाड़ के उत्तराधिकार और राजनीतिक स्वायत्तता के प्रश्न को लेकर हुआ। जसवंत सिंह की मृत्यु के बाद मुगल हस्तक्षेप के विरुद्ध दुर्गादास ने अजीत सिंह और राठौड़ सत्ता की रक्षा की।

मारवाड़ और मेवाड़ से जुड़ा प्रमुख राजपूत प्रतिरोध 1679 ई. में व्यापक रूप से सामने आया।

दुर्गादास राठौड़ को मेवाड़ के महाराणा राजसिंह प्रथम का सहयोग मिला।

शहजादा अकबर औरंगजेब का पुत्र था। उसने राजपूतों के सहयोग से अपने पिता औरंगजेब के विरुद्ध विद्रोह किया था।

मुगल सम्राट औरंगजेब की मृत्यु 1707 ई. में हुई।

औरंगजेब की मृत्यु के बाद उत्पन्न राजनीतिक परिस्थितियों का लाभ उठाकर अजीत सिंह ने मारवाड़ में अपना अधिकार पुनः स्थापित किया।

दुर्गादास राठौड़ की मृत्यु उज्जैन में हुई।

दुर्गादास राठौड़ की छतरी उज्जैन में क्षिप्रा नदी के तट पर स्थित है।

नहीं। दुर्गादास राठौड़ मारवाड़ के राजा नहीं बने थे। वे प्रमुख सरदार, सेनानायक और अजीत सिंह के संरक्षक थे तथा उन्होंने राठौड़ सत्ता की रक्षा के लिए संघर्ष किया।

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