Mewad Rajwansh ka itihas

मेंवाड़ राजवंश का इतिहास: रावल जैत्रसिंह से महाराणा रायमल तक (RPSC / RSMSSB विशेष नोट्स)

परिचय: मेवाड़ की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और सामरिक महत्व

राजस्थान का इतिहास शौर्य, त्याग, राष्ट्रभक्ति और स्वाभिमान की अनगिनत गाथाओं से आलोकित है, जिनमें मेवाड़ का स्थान सर्वोपरि है। वैश्विक इतिहास में मेवाड़ का गुहिल और बाद में सिसोदिया राजवंश के रूप में प्रसिद्ध हुआ यह वंश अपनी संप्रभुता और विदेशी आक्रांताओं के खिलाफ निरंतर संघर्ष के लिए जाना जाता है। चित्तौड़गढ़ इस साम्राज्य का प्रमुख केंद्र रहा, जिसने कई बार बर्बर आक्रमण झेलने के बावजूद कभी अपना स्वाभिमान नहीं खोया। RPSC (RAS, 1st & 2nd Grade) और RSMSSB (CET, पटवारी, रीट, राजस्थान पुलिस) जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं में राजस्थान सामान्य ज्ञान (GK) के तहत इस खंड से 30 से 40 प्रतिशत तक वैचारिक और तथ्यात्मक प्रश्न पूछे जाते हैं। इस लेख में हम रावल जैत्रसिंह (1213 ई.) से लेकर महाराणा रायमल (1509 ई.) तक के कालखंड का प्रामाणिक, अध्याय-वार और गहन विश्लेषण करेंगे।

1. रावल जैत्रसिंह (1213–1252 ई.): मध्यकालीन मेवाड़ का नव-उत्कर्ष

रावल जैत्रसिंह का शासनकाल मध्यकालीन मेवाड़ के इतिहास में एक मील का पत्थर माना जाता है। उन्होंने परमारों को पराजित कर सामरिक दृष्टि से अभेद्य चित्तौड़गढ़ दुर्ग पर अधिकार किया और इसे मेवाड़ की नई राजधानी घोषित किया।

भूताला का युद्ध (1227 ई.) और उसके परिणाम

जैत्रसिंह के समय की सबसे बड़ी सैन्य चुनौती दिल्ली सल्तनत का गुलाम वंशीय सुल्तान इल्तुतमिश था। दोनों सेनाओं के मध्य 1227 ईस्वी में भूताला का ऐतिहासिक युद्ध लड़ा गया, जिसमें जैत्रसिंह ने अद्वितीय युद्ध कौशल का परिचय देते हुए इल्तुतमिश की सेना को बुरी तरह परास्त किया।

  • साहित्यिक साक्ष्य: इस युद्ध का विस्तृत वर्णन जयसिंह सूरी द्वारा रचित सुप्रसिद्ध कृति “हम्मीर मद-मर्दन” में मिलता है।
  • राजधानी का स्थानांतरण: यद्यपि मेवाड़ यह युद्ध जीत गया, लेकिन लौटती हुई तुर्क सेना ने मेवाड़ की तत्कालीन राजधानी नागदा को पूरी तरह तहस-नहस कर दिया। इसी विवशता के कारण जैत्रसिंह ने शासन संचालन के लिए चित्तौड़गढ़ को नई राजधानी बनाया।

शिलालेखीय साक्ष्य और इतिहासकारों के मत

  • चीरवा शिलालेख: इस शिलालेख के अनुसार, भूताला के युद्ध में वीर सेनापति योगराज के ज्येष्ठ पुत्र ने मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति पाई थी।
  • धांधसे शिलालेख: इस लेख में स्पष्ट उल्लेख है कि “म्लेच्छों का स्वामी (इल्तुतमिश) भी जैत्रसिंह का मानमर्दन नहीं कर सका।”
  • आबू शिलालेख: इस शिलालेख में जैत्रसिंह की वीरता की तुलना समुद्र का पान करने वाले महाप्रतापी अगस्त्य मुनि से की गई है।
  • सैन्य विजय: 1248 ई. में जैत्रसिंह ने सुल्तान नसीरुद्दीन महमूद की शाही सेना को भी पराजित कर अपनी संप्रभुता सिद्ध की।
  • ऐतिहासिक मूल्यांकन: प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने जैत्रसिंह को दिल्ली के गुलाम वंश काल का सबसे प्रतापी और बलवान शासक बताया है। वहीं, दशरथ शर्मा ने उनके शासनकाल को ‘मध्यकालीन इतिहास का स्वर्णकाल’ की संज्ञा दी है।

2. रावल तेजसिंह (1252–1267 ई.): कला और सांस्कृतिक प्रगति का काल

जैत्रसिंह के योग्य उत्तराधिकारी रावल तेजसिंह हुए। उन्होंने अपने पिता की सैन्य और प्रशासनिक विरासत को न केवल सुरक्षित रखा, बल्कि मेवाड़ को सांस्कृतिक रूप से भी समृद्ध किया। उन्होंने “उभापतिवरलब्धप्रौढ़प्रताप” जैसी गौरवशाली उपाधि धारण की।

राजस्थान का प्रथम चित्रित ताड़पत्र ग्रंथ

तेजसिंह का शासनकाल राजस्थान की चित्रकला के इतिहास में अमर है। इनके समय 1260 ईस्वी में आहड़ (उदयपुर) में चित्रकार कमलचंद्र द्वारा ताड़ के पत्तों पर “श्रावक प्रतिक्रमण सूत्र चूर्णि” नामक ग्रंथ तैयार किया गया। यह हस्तलिखित ग्रंथ मेवाड़ चित्रशैली का सबसे पहला और प्रामाणिक उदाहरण माना जाता है।

सल्तनत से संघर्ष और निर्माण कार्य

तेजसिंह के समय दिल्ली के क्रूर सुल्तान बलबन ने मेवाड़ पर आक्रमण किया, परंतु तेजसिंह की सजग सेना ने बलबन को परास्त कर पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। धार्मिक दृष्टिकोण से, उनकी रानी जैतलदेवी ने चित्तौड़गढ़ दुर्ग के भीतर श्याम पार्श्वनाथ मंदिर का निर्माण करवाकर तत्कालीन वास्तुकला को बढ़ावा दिया।

3. रावल समरसिंह (1273–1302 ई.): कूटनीति और जीव-दया का युग

तेजसिंह के बाद उनका पुत्र समरसिंह गद्दी पर बैठा। समरसिंह एक पराक्रमी योद्धा के साथ-साथ एक कुशल कूटनीतिज्ञ भी थे। आबू शिलालेख में उनकी वीरता की सराहना करते हुए उन्हें “तुर्कों से गुजरात का उद्धारक” कहा गया है।

खिलजी की सेना से पारगमन कर (टैक्स) वसूली

1299 ईस्वी में जब दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी की सेना उसके भाई उलुग खाँ के नेतृत्व में गुजरात पर आक्रमण करने जा रही थी, तो उसका रास्ता मेवाड़ से होकर गुजरता था। समरसिंह ने अपनी सैन्य शक्ति के बल पर उलुग खाँ को विवश किया और मेवाड़ की भूमि से गुजरने के बदले खिलजी की सेना से भारी दंड (टैक्स) वसूल किया।

धार्मिक और सामाजिक सुधार

समरसिंह जैन धर्म के विद्वानों के प्रति अगाध श्रद्धा रखते थे। अंचलगच्छ की पट्टावली के अनुसार, जैन मुनि अमितसिंह सूरी के उपदेशों से प्रभावित होकर समरसिंह ने अपने पूरे राज्य में जीव हिंसा (पशु वध) पर पूर्ण रोक लगा दी थी। इसके अलावा, उन्होंने अचलेश्वर मठ का जीर्णोद्धार करवाकर साधुओं के लिए सदाव्रत (भोजन व्यवस्था) प्रारंभ करवाई।

4. रावल रतनसिंह (1302–1303 ई.): चित्तौड़गढ़ का प्रथम ऐतिहासिक साका

रावल रतनसिंह 1302 ई. में मेवाड़ के शासक बने। इनका कालखंड छोटा था, परंतु यह राजस्थान के इतिहास की सबसे गौरवशाली और मार्मिक घटना का गवाह बना। रतनसिंह मेवाड़ की ‘रावल शाखा’ के अंतिम राजा थे।

अलाउद्दीन खिलजी का आक्रमण (1303 ई.)

28 जनवरी 1303 को दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़गढ़ दुर्ग पर अधिकार करने के उद्देश्य से घेराबंदी की। मलिक मोहम्मद जायसी द्वारा 1540 ई. में रचित महाकाव्य “पद्मावत” के अनुसार, इस भयंकर आक्रमण का मुख्य कारण रतनसिंह की अद्वितीय सुंदरी रानी पद्मिनी को प्राप्त करना था। इस ऐतिहासिक कथा का समर्थन “तारीख-ए-फरिश्ता” जैसे ग्रंथों में भी मिलता है।

चित्तौड़ का प्रथम साका (26 अगस्त 1303)

लगभग 8 महीने के कड़े संघर्ष और किले के भीतर रसद समाप्त होने के बाद राजपूतों ने आर-पार की लड़ाई का निर्णय लिया। युद्ध में रावल रतनसिंह और उनके दो महान सेनापति — गौरा और बादल — वीरतापूर्वक लड़ते हुए वीरगति (केसरिया) को प्राप्त हुए। दूसरी ओर, रानी पद्मिनी ने भारतीय इतिहास के सबसे बड़े आत्मोत्सर्ग का नेतृत्व करते हुए 1600 क्षत्राणियों के साथ 26 अगस्त 1303 को जौहर की अग्नि में प्रवेश किया। यह संयुक्त घटना चित्तौड़ का प्रथम साका कहलाती है। विजय के बाद अलाउद्दीन ने चित्तौड़ का नाम बदलकर अपने बेटे के नाम पर ‘खिजराबाद’ रख दिया।

5. राणा हम्मीर (1326–1364 ई.): सिसोदिया राजवंश की स्थापना

चित्तौड़ के पतन के बाद गुहिल वंश की कमान सिसोदा ठिकाने के जागीरदार राणा हम्मीर के हाथों में आई। हम्मीर ने 1326 ईस्वी में चित्तौड़ पर पुनः अधिकार कर गुहिल वंश की पुनर्स्थापना की और यहाँ से मेवाड़ के शासक ‘राणा’ या ‘सिसोदिया’ कहलाए।

सिंगोली का युद्ध और उपाधियाँ

  • मेवाड़ का उद्धारक: चित्तौड़गढ़ को मुस्लिम आधिपत्य से मुक्त कराने के कारण इन्हें “मेवाड़ का उद्धारक या मुक्तिदाता” कहा जाता है।
  • सिंगोली का युद्ध: हम्मीर ने सिंगोली के युद्ध में दिल्ली के सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक की शाही सेना को बुरी तरह पराजित कर अपनी सैन्य शक्ति का लोहा मनवाया।
  • विषमघाटी पंचानन: कुंभलगढ़ प्रशस्ति और कीर्ति स्तंभ प्रशस्ति में विकट परिस्थितियों में सिंह के समान अडिग रहने के कारण इन्हें “विषमघाटी पंचानन” की उपाधि दी गई है। उन्होंने चित्तौड़गढ़ दुर्ग में अपनी आराध्य अन्नपूर्णा माता के मंदिर का निर्माण करवाया।

6. राणा लाखा / लक्षसिंह (1382–1421 ई.): आर्थिक समृद्धि और भीष्म प्रतिज्ञा

राणा क्षेत्रसिंह के बाद उनके पुत्र राणा लाखा मेवाड़ के शासक बने। इनका शासनकाल सैन्य अभियानों के स्थान पर आर्थिक समृद्धि और अनूठे सामाजिक समझौतों के लिए प्रसिद्ध है।

जावर की खदानें और पिछोला झील का निर्माण

  • जावर माइंस की खोज: राणा लाखा के समय उदयपुर के जावर क्षेत्र में चांदी (Silver) और सीसे की विशाल खानों का पता चला। इस आर्थिक खोज से मेवाड़ राज्य वित्तीय रूप से अत्यंत समृद्ध और शक्तिशाली बन गया।
  • पिछोला झील: इसी कालखंड में छीतर (लक्खी) नामक एक बंजारे ने अपने बैलों की स्मृति में उदयपुर की प्रसिद्ध पिछोला झील का निर्माण करवाया।

मारवाड़ से संबंध और कुंवर चूण्डा का त्याग

मारवाड़ के शासक के पुत्र रणमल ने अपनी बहन हंसाबाई के विवाह का नारियल राणा लाखा के पुत्र कुंवर चूण्डा के लिए भेजा था, परंतु कूटनीतिक परिस्थितियों और एक परिहास के चलते वृद्ध राणा लाखा से हंसाबाई का विवाह तय हुआ। इस विवाह की शर्त यह थी कि हंसाबाई का पुत्र ही मेवाड़ का अगला राजा बनेगा। अपने पिता की इच्छा का आदर करते हुए कुंवर चूण्डा ने स्वेच्छा से सिंहासन का अधिकार त्याग दिया। इस निस्वार्थ प्रतिज्ञा के कारण कुंवर चूण्डा को “राजस्थान का भीष्म पितामह” कहा जाता है।

7. महाराणा मोकल (1421–1433 ई.): संरक्षण और स्थापत्य का विकास

राणा लाखा और हंसाबाई के पुत्र महाराणा मोकल 1421 ई. में मात्र 12 वर्ष की अल्पायु में मेवाड़ के शासक बने। शुरुआती दौर में कुंवर चूण्डा और बाद में मारवाड़ के रणमल ने इनके संरक्षक के रूप में कार्य किया।

सैन्य विजय और निर्माण कार्य

  • रामपुरा का युद्ध (1428 ई.): मोकल ने अपनी सैन्य कुशलता का परिचय देते हुए रामपुरा के युद्ध में नागौर के फिरोजखाँ की सेना को करारी शिकस्त दी।
  • स्थापत्य में योगदान: मोकल कला के महान पारखी थे। उन्होंने चित्तौड़गढ़ में द्वारिकानाथ मंदिर और प्रसिद्ध समिद्धेश्वर मंदिर (मोकल का मंदिर) का जीर्णोद्धार करवाया। इसके अलावा उन्होंने एकलिंगजी मंदिर के चारों ओर सुरक्षा परकोटे का निर्माण करवाया।
  • दुखद अंत: 1433 ईस्वी में जब वे गुजरात के अहमदशाह के विरुद्ध अभियान पर थे, तब झीलवाड़ा नामक स्थान पर उनके सगे चाचाओं — चाचा और मेरा — ने महपा पंवार के साथ मिलकर उनकी धोखे से हत्या कर दी।

8. महाराणा कुंभा (1433–1468 ई.): कला, साहित्य और सैन्य गौरव का स्वर्णयुग

महाराणा मोकल की हत्या के बाद उनके प्रतापी पुत्र महाराणा कुंभा मेवाड़ के सिंहासन पर बैठे। कुंभा का कालखंड मेवाड़ के इतिहास का ‘सांस्कृतिक पुनर्जागरण का काल’ माना जाता है। वे एक महान योद्धा, कुशल कूटनीतिज्ञ, संगीतज्ञ और अद्वितीय भवन निर्माता थे।

सैन्य उपलब्धियाँ और विजय स्तंभ

  • सारंगपुर का युद्ध (1437 ई.): कुंभा ने मोकल के हत्यारों को शरण देने वाले मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी को सारंगपुर के युद्ध में धूल चटाई।
  • विजय स्तंभ का निर्माण: इस महान सैन्य विजय की चिरस्थायी स्मृति के रूप में कुंभा ने चित्तौड़गढ़ दुर्ग में 9 मंजिला अभेद्य ‘विजय स्तंभ’ का निर्माण करवाया, जिसे भारतीय मूर्तिकला का विश्वकोश और ‘विष्णु ध्वज’ भी कहा जाता है। इसके मुख्य सूत्रधार जेता, नापा, पोमा और पूंजा थे।

स्थापत्य कला और दुर्ग निर्माण

प्रसिद्ध इतिहासकार कविराजा श्यामलदास के ऐतिहासिक ग्रंथ ‘वीर विनोद’ के अनुसार, मेवाड़ साम्राज्य के कुल 84 दुर्गों में से 32 दुर्गों का निर्माण अकेले महाराणा कुंभा ने करवाया था

  • कुंभलगढ़ दुर्ग: राजसमंद में स्थित यह दुर्ग स्थापत्य का बेजोड़ नमूना है। इसकी बाहरी दीवार की लंबाई 36 किलोमीटर है, जिसे ‘चीन की दीवार’ के बाद विश्व की दूसरी सबसे लंबी दीवार माना जाता है। इसके अतिरिक्त उन्होंने अचलगढ़, मचान दुर्ग और भोमट दुर्ग का निर्माण करवाया। प्रसिद्ध रणकपुर के जैन मंदिर भी इन्हीं के काल में धरनक शाह द्वारा बनवाए गए थे।

साहित्य, संगीत और उपाधियाँ

कुंभा स्वयं एक उच्च कोटि के विद्वान और वीणा वादक थे। उन्होंने संगीत के क्षेत्र में ग्रंथ लिखे: ‘संगीतराज’ (जो 5 कोषों में विभक्त है), ‘संगीत मीमांसा’, ‘सूड़ प्रबंध’, और ‘कामराज रतिसार’

  • दरबारी विद्वान: कुंभा के प्रधान शिल्पी का नाम मण्डन था, जिसने वास्तुशास्त्र, प्रासाद मण्डन, रूपमण्डन, और देवमूर्ति प्रकरण जैसे कालजयी ग्रंथों की रचना की। इसके अलावा कान्ह व्यास (एकलिंग महात्म्य के रचयिता), अत्रि, महेश (कीर्ति स्तंभ प्रशस्ति के लेखक), गोविन्द और नाथा उनके दरबार की शोभा थे।
  • गौरवशाली उपाधियाँ: उनकी बहुमुखी प्रतिभा के कारण उन्हें अभिनव भरताचार्य (संगीत के कारण), हिन्दू सुरताण, दानगुरु, हालगुरु (शैल दुर्गों का स्वामी), छापगुरु, अश्वपति और नरपति जैसी उपाधियों से विभूषित किया गया।
  • दुखद अंत: 1468 ईस्वी में कुंभा के मानसिक रूप से अस्वस्थ होने पर उनके पुत्र उदा ने कुंभलगढ़ दुर्ग के मामादेव कुंड के पास उनकी हत्या कर दी।

9. राणा उदा (1468–1473 ई.) एवं महाराणा रायमल (1473–1509 ई.)

राणा उदा: पितृहंता का कलंक

अपने पिता महाराणा कुंभा की हत्या करने के कारण उदा को मेवाड़ के इतिहास में “पितृहन्ता उदा” के काले नाम से जाना जाता है। मेवाड़ के स्वाभिमानी सरदारों ने पितृहंता को राजा मानने से इनकार कर दिया। दाड़िमपुर के युद्ध में उदा अपने छोटे भाई रायमल से पराजित हो गया। वह सहायता मांगने मालवा के सुल्तान के पास भाग गया, जहाँ बिजली गिरने से उसकी आकस्मिक मृत्यु हो गई।

महाराणा रायमल: स्थिरता की बहाली

उदा को निष्कासित कर 1473 ई. में महाराणा रायमल मेवाड़ के शासक बने। रायमल ने आंतरिक गृहयुद्ध से जर्जर हुए मेवाड़ में पुनः शांति और राजनीतिक स्थिरता बहाल की।

  • सांस्कृतिक कार्य: रायमल ने चित्तौड़गढ़ में अद्भुतजी के शिव मंदिर का निर्माण करवाया। उनकी प्रधान रानी शृंगारदेवी (जो मारवाड़ के राव जोधा की पुत्री थीं) ने चित्तौड़ के निकट प्रसिद्ध घौसूंड़ी की बावड़ी का निर्माण करवाया। इसी स्थान से राजस्थान में वैष्णव/भागवत संप्रदाय का सबसे प्राचीन प्रामाणिक दस्तावेज — घोसुंडी शिलालेख — प्राप्त हुआ है।
  • उत्तराधिकार का संघर्ष: रायमल के अंतिम वर्ष उनके तीन महत्वाकांक्षी पुत्रों — पृथ्वीराज सिसोदिया (जिन्हें तीव्र गति के कारण ‘उड़ना राजकुमार’ कहा जाता है), जयमल, और राणा सांगा (संग्राम सिंह) [महाराणा सांगा का संपूर्ण इतिहास] — के बीच हुए खूनी उत्तराधिकार संघर्ष के कारण अशांत रहे। इसी संघर्ष की कोख से आगे चलकर राणा सांगा के रूप में मेवाड़ का गौरव अपने चरम उत्कर्ष पर पहुँचा।

📊 संपूर्ण अध्याय का विश्लेषणात्मक वैचारिक मैट्रिक्स (Mind Map Table)

यह तालिका पूरे अध्याय के सबसे महत्वपूर्ण तथ्यों को एक नज़र में याद करने के लिए है:

शासक / ऐतिहासिक मोड़समकालीन सुल्तान / चुनौतीप्रमुख युद्ध एवं वर्षमुख्य सांस्कृतिक / ऐतिहासिक धरोहर
रावल जैत्रसिंहइल्तुतमिश (दिल्ली)भूताला का युद्ध (1227 ई.)चित्तौड़गढ़ को मेवाड़ की प्रथम बार राजधानी बनाया।
रावल तेजसिंहगयासुद्दीन बलबनबलबन का असफल घेरा‘श्रावक प्रतिक्रमण सूत्र चूर्णि’ (1260) – प्रथम चित्रित ग्रंथ।
रावल समरसिंहउलुग खाँ (खिलजी सेना)पारगमन कूटनीतिक संघर्षअंचलगच्छ पट्टावली के अनुसार संपूर्ण राज्य में जीव-हिंसा पर पूर्ण रोक।
रावल रतनसिंहअलाउद्दीन खिलजीचित्तौड़ का प्रथम साका (1303 ई.)रानी पद्मिनी का 1600 महिलाओं के साथ जौहर; ‘पद्मावत’ ग्रंथ का आधार।
राणा हम्मीरमुहम्मद बिन तुगलकसिंगोली का युद्धसिसोदिया वंश की स्थापना; अन्नपूर्णा माता मंदिर; ‘विषमघाटी पंचानन’।
राणा लाखामारवाड़ सीमा कूटनीतिबदनौर विजयजावर में चांदी की खदानें; छीतर बनजारे द्वारा पिछोला झील का निर्माण।
महाराणा मोकलफिरोजखाँ (नागौर)रामपुरा का युद्ध (1428 ई.)समिद्धेश्वर (मोकल) मंदिर एवं द्वारिकानाथ मंदिर का जीर्णोद्धार।
महाराणा कुंभामहमूद खिलजी (मालवा)सारंगपुर का युद्ध (1437 ई.)विजय स्तंभ; कुंभलगढ़ दुर्ग (36 किमी दीवार); ‘संगीतराज’ महाग्रंथ।
महाराणा रायमलपितृहंता उदा (आंतरिक संकट)दाड़िमपुर का युद्धअद्भुतजी मंदिर; रानी शृंगारदेवी द्वारा घोसुंडी की बावड़ी का निर्माण।

📝 स्व-मूल्यांकन क्विज़: परीक्षा उपयोगी महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1. ‘हम्मीर मद-मर्दन’ नामक ऐतिहासिक ग्रंथ की रचना किसने की और इसमें किस युद्ध का सजीव वर्णन मिलता है?

  • उत्तर: इस ग्रंथ की रचना जयसिंह सूरी ने की थी। इसमें 1227 ईस्वी में रावल जैत्रसिंह और दिल्ली के सुल्तान इल्तुतमिश के बीच लड़े गए ‘भूताला के युद्ध’ का विस्तृत और प्रामाणिक विवरण मिलता है।

प्रश्न 2. राजस्थान के भीष्म पितामह के नाम से किसे जाना जाता है और उन्हें यह संज्ञा क्यों दी गई?

  • उत्तर: राणा लाखा के ज्येष्ठ पुत्र कुंवर चूण्डा को। उन्होंने अपने पिता के मारवाड़ की राजकुमारी हंसाबाई के साथ विवाह का मार्ग प्रशस्त करने के लिए आजीवन मेवाड़ के राजसिंहासन का त्याग करने की कठोर प्रतिज्ञा की थी।

प्रश्न 3. कविराजा श्यामलदास के ग्रंथ ‘वीर विनोद’ के अनुसार महाराणा कुंभा ने स्थापत्य कला में क्या कीर्तिमान स्थापित किया था?

  • उत्तर: ‘वीर विनोद’ के अनुसार मेवाड़ राज्य में स्थित कुल 84 दुर्गों में से 32 दुर्गों का निर्माण अकेले महाराणा कुंभा ने करवाया था, जिसके कारण उन्हें राजस्थान की स्थापत्य कला का जनक कहा जाता है।

प्रश्न 4. घोसुंडी की बावड़ी का निर्माण किसने करवाया था और इसका ऐतिहासिक महत्व क्या है?

  • उत्तर: इसका निर्माण महाराणा रायमल की प्रधान रानी शृंगारदेवी ने करवाया था। यहाँ से प्रसिद्ध घोसुंडी शिलालेख मिला है, जो दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व का है और राजस्थान में भागवत (वैष्णव) संप्रदाय की प्राचीनता को प्रमाणित करने वाला पहला साक्ष्य है।

📚 प्रामाणिक शैक्षणिक संदर्भ (E-E-A-T Verification & References)

  • राजस्थान राज्य पाठ्यपुस्तक मंडल, कक्षा 9 व 10 (राजस्थान का इतिहास एवं संस्कृति)
  • डॉ. गोपीनाथ शर्मा, “राजस्थान का इतिहास” (मान्यता प्राप्त संदर्भ ग्रंथ)
  • RPSC एवं RSMSSB के विगत 15 वर्षों के आधिकारिक प्रश्नपत्रों का विश्लेषणात्मक संकलन।
  • शोध एवं तथ्य-जाँच: सुयोग अकादमी संपादकीय टीम (सुधीर ढाका – BSc-BEd, योगेश जांगिड़ – सॉफ्टवेयर इंजीनियर)।

3 Comments

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