परिचय: गुर्जर-प्रतिहार साम्राज्य का ऐतिहासिक व परीक्षा उपयोगी महत्व
प्राचीन और मध्यकालीन भारत के संधिकाल में, उत्तर-पश्चिम भारत की सीमाओं पर विदेशी आक्रांताओं (विशेषकर अरब आक्रमणकारियों) के खिलाफ लगभग तीन शताब्दियों तक एक अभेद्य द्वारपाल (Defensive Wall) की भूमिका निभाने का गौरव गुर्जर-प्रतिहार राजवंश को जाता है। सातवीं से ग्यारहवीं शताब्दी तक इस साम्राज्य का प्रभाव मारवाड़ के मण्डोर से लेकर कन्नौज और संपूर्ण उत्तर भारत पर रहा। आरपीएससी (RAS, स्कूल व्याख्याता, वरिष्ठ अध्यापक) और आरएसएमएसएसबी (CET, पटवारी, कनिष्ठ सहायक) जैसी परीक्षाओं के राजस्थान इतिहास खंड में गुर्जर-प्रतिहारों का योगदान अत्यधिक महत्वपूर्ण है। इस विस्तृत मास्टर-नोट्स में हम प्रतिहारों की उत्पत्ति, उनकी प्रमुख शाखाओं के उत्कर्ष, त्रिपक्षीय संघर्ष में उनकी भूमिका और स्थापत्य कला (महा-मारू शैली) का गहन व प्रामाणिक विश्लेषण करेंगे।
1. गुर्जर-प्रतिहार शब्द का अर्थ एवं उत्पत्ति के विभिन्न सिद्धांत
इतिहासकारों में ‘गुर्जर-प्रतिहार’ शब्द को लेकर गहरा मतभेद है। वस्तुतः ‘गुर्जर’ शब्द उनके भौगोलिक क्षेत्र (गुर्जरात्रा प्रदेश – जोधपुर, पाली, जालौर का क्षेत्र) को प्रदर्शित करता है, जबकि ‘प्रतिहार’ उनके वंश या पद (द्वारपाल) का सूचक है।
(A) लक्ष्मण के वंशज (रघुवंशी मत)
- साक्ष्य: सम्राट मिहिर भोज की सुप्रसिद्ध ग्वालियर प्रशस्ति (Gwalior Prashasti) में प्रतिहारों को सूर्यवंशी भगवान राम के अनुज लक्ष्मण का वंशज बताया गया है। जिस प्रकार लक्ष्मण ने भगवान राम के लिए ‘प्रतिहार’ (द्वारपाल या रक्षक) की भूमिका निभाई थी, उसी प्रकार इस वंश ने मलेच्छों (विदेशी शत्रुओं) से भारत की रक्षा की। इसी कारण इन्हें ‘रघुवंशी प्रतिहार’ भी कहा जाता है।
(B) अग्निकुंड का सिद्धांत (Agnikula Theory)
- साक्ष्य: महाकवि चंदबरदाई के ग्रंथ “पृथ्वीराज रासो” के अनुसार, आबू पर्वत पर महर्षि वशिष्ठ के यज्ञ कुंड से जो चार राजपूत जातियां उत्पन्न हुई थीं, उनमें प्रतिहार (परिहार) प्रथम श्रेणी में रक्षक के रूप में प्रकट हुए थे। मुंहणोत नैणसी और सूर्यमल मिश्रण भी इस मत का आंशिक समर्थन करते हैं।
(C) विदेशी उत्पत्ति का मत
- साक्ष्य: डॉ. डी.आर. भंडारकर, कर्नल जेम्स टॉड और कनिंघम के अनुसार प्रतिहार मूल रूप से भारत के बाहर की विदेशी जाति ‘खजर’ या शक-सीथियन थे, जो गुर्जरों के साथ भारत आए और बाद में हिंदू समाज में क्षत्रिय वर्ग में विलीन हो गए।
(D) ब्राह्मण वंश से उत्पत्ति
- साक्ष्य: जोधपुर और घटियाला शिलालेखों के अनुसार इस वंश के आदिपुरुष हरीशचन्द्र को एक वेदपाठी ब्राह्मण बताया गया है, जिनकी दो पत्नियों से ब्राह्मण और क्षत्रिय प्रतिहार शाखाओं का जन्म हुआ।
2. प्रतिहारों की शाखाएँ और मण्डोर के प्रतिहार (सबसे प्राचीन शाखा)
महान इतिहासकार मुंहणोत नैणसी ने अपनी ख्यात में गुर्जर-प्रतिहारों की कुल 26 शाखाओं का उल्लेख किया है। इनमें से राजस्थान के संदर्भ में दो शाखाएँ सर्वोपरि हैं: मण्डोर शाखा (सबसे प्राचीन) और भीनमाल-जालौर शाखा (सबसे शक्तिशाली)।
मण्डोर के प्रतिहारों का इतिहास
मण्डोर (जोधपुर) को प्रतिहारों का मूल स्थल माना जाता है। इस शाखा के प्रमुख शासकों का विवरण इस प्रकार है:
- हरिचन्द्र (रोहिल्लद्दि): इन्हें मण्डोर प्रतिहारों का ‘आदिपुरुष’, ‘मूलपुरुष’ या ‘संस्थापक’ कहा जाता है। इनकी क्षत्रिय पत्नी भद्रा से चार पुत्र उत्पन्न हुए — भोगभट्ट, कद्दर, रज्जिल और दह, जिन्होंने मण्डोर को जीतकर चारों ओर परकोटा बनवाया।
- रज्जिल: इन्होंने मण्डोर को अपनी स्थायी राजधानी बनाया और राजसूय यज्ञ करवाकर ‘राजा’ की उपाधि धारण की। नरहरि नामक ब्राह्मण ने इन्हें ‘राजा’ की पदवी से नवाजा था।
- नागभट्ट प्रथम (मण्डोर शाखा): इन्होंने प्रतिहारों की सीमाओं का विस्तार करते हुए मेड़ता (मेड़न्तक) को अपनी नई राजधानी बनाया, जिससे मारवाड़ में इनका प्रभाव सुदृढ़ हुआ।
- सिल्लुक व ककुक: सिल्लुक ने वल्ल देश (जैसलमेर) के भाटियों को पराजित किया था। इस शाखा के शासक ककुक ने 861 ईस्वी में घटियाला के शिलालेख (Ghatiyala Inscriptions) उत्कीर्ण करवाए। यह शिलालेख प्राकृत भाषा में है और तत्कालीन समाज में जातिगत सौहार्द तथा जैन धर्म के प्रभाव को प्रमाणित करता है।
- बाुक: इन्होंने 837 ईस्वी की ‘बाुक प्रशस्ति’ लिखवाई, जो मण्डोर के विष्णु मंदिर से प्राप्त हुई है और इसमें प्रतिहारों की वंशावली का सटीक विवरण है।
- शाखा का अंत: ग्यारहवीं शताब्दी के अंत में मण्डोर के अंतिम प्रतिहार शासक इंदा प्रतिहार ने तुर्कों (झाँझा के मुस्लिम आक्रांताओं) से तंग आकर मण्डोर दुर्ग राव चूण्डा राठौड़ को दहेज में दे दिया, जिसके बाद मारवाड़ में राठौड़ वंश का प्रभुत्व स्थापित हुआ।
3. भीनमाल (जालौर) व कन्नौज के गुर्जर-प्रतिहार: साम्राज्यवादी युग
भीनमाल (जालौर) की शाखा ने आगे चलकर कन्नौज को जीतकर अखिल भारतीय साम्राज्य का रूप ले लिया। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने 7वीं सदी में भीनमाल की यात्रा की थी और अपनी पुस्तक ‘सी-यू-की’ में इस क्षेत्र को ‘कु-चे-लो’ (गुर्जर) तथा इसकी राजधानी भीनमाल को ‘पी-लो-मो-लो’ (भीनमाल) कहा था।
(A) नागभट्ट प्रथम (730–756 ई.): अरबों का संहारक
नागभट्ट प्रथम भीनमाल-जालौर शाखा के वास्तविक संस्थापक थे। इन्हें इतिहास में ‘नारायण का अवतार’ और ‘नागावलोक’ कहा जाता है।
- अरब आक्रमणों विफल करना: इनके समय सिंध के रास्ते अरब आक्रांत जुनैद और तमीम ने राजपूताना और मालवा पर भयंकर आक्रमण किए। नागभट्ट प्रथम ने चालुक्यों और राष्ट्रकूटों के साथ गठबंधन बनाकर अरबों को परास्त कर भारत से बाहर खदेड़ा। ग्वालियर प्रशस्ति में इन्हें “मलेच्छों का नाशक” कहा गया है। इन्होंने उज्जैन (अवंती) को अपनी शक्ति का केंद्र बनाया।
(B) वत्सराज (775–805 ई.): त्रिपक्षीय संघर्ष का जन्मदाता
वत्सराज को भीनमाल शाखा का ‘वास्तविक संस्थापक’ (Real Founder) माना जाता है, क्योंकि उन्होंने ‘रणहस्तिन’ (युद्ध का हाथी) और ‘जयवराह’ जैसी महान उपाधियाँ धारण की थीं।
- त्रिपक्षीय संघर्ष (Tripartite Struggle) की शुरुआत: उत्तर भारत के सबसे समृद्ध केंद्र कन्नौज (Kannauj) पर अधिकार करने के लिए पाल वंश (बंगाल), राष्ट्रकूट वंश (दक्कन) और गुर्जर-प्रतिहारों के बीच 150 वर्षों तक चलने वाले त्रिपक्षीय संघर्ष की शुरुआत वत्सराज के समय ही हुई थी। वत्सराज ने पाल शासक धर्मपाल को मुंगेर के युद्ध में पराजित किया, परंतु स्वयं राष्ट्रकूट राजा ध्रुव से पराजित हो गए।
- साहित्यिक अवदान: वत्सराज के शासनकाल में 778 ईस्वी में जालोर दुर्ग के भीतर महाकवि उद्योतन सूरी ने सुप्रसिद्ध ग्रंथ “कुवलयमाला” की रचना की, जिसमें 18 देशी भाषाओं का उल्लेख है (मरुभाषा का पहला लिखित प्रमाण)। इसी समय जिनसेन सूरी ने ‘हरिवंश पुराण’ नामक प्रसिद्ध जैन ग्रंथ की रचना पूरी की थी। ओसियां (जोधपुर) का सुप्रसिद्ध महावीर जैन मंदिर भी वत्सराज के काल की ही देन है।
(C) नागभट्ट द्वितीय (805–833 ई.): कन्नौज का स्थायी विलय
नागभट्ट द्वितीय ने अपनी सैन्य कुशलता से प्रतिहारों के खोए हुए गौरव को वापस पाया। उन्होंने ‘परमभट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर’ की सर्वोच्च उपाधि धारण की।
- कन्नौज को स्थायी राजधानी बनाना: नागभट्ट द्वितीय ने कन्नौज के चक्रायुध को पराजित किया और पाल शासक धर्मपाल को मुद्गागिरि (मुंगेर) के भीषण युद्ध में करारी शिकस्त दी। इसके बाद उन्होंने कन्नौज को गुर्जर-प्रतिहार साम्राज्य की स्थायी राजधानी बनाया।
- जल समाधि: राष्ट्रकूट शासक गोविंद तृतीय से पराजित होने के बाद, उन्होंने कूटनीतिक तपस्या का जीवन चुना और 23 अगस्त 833 ईस्वी को पवित्र गंगा नदी में जीवित जल समाधि ले ली। भीलवाड़ा का ‘बुचकला शिलालेख’ (815 ई.) इनके काल की राजनीतिक स्थिति को स्पष्ट करता है।
(D) सम्राट मिहिर भोज / भोज प्रथम (836–885 ई.): प्रतिहार साम्राज्य का चरमोत्कर्ष
सम्राट मिहिर भोज गुर्जर-प्रतिहार राजवंश के सबसे प्रतापी, शक्तिशाली और महानतम हिंदू सम्राट थे। इनका शासनकाल प्रतिहार साम्राज्य का राजनीतिक व सांस्कृतिक चरमोत्कर्ष माना जाता है। उन्होंने अपने सिक्कों पर ‘आदिवराह’ (Adivaraha) और ‘प्रभास’ की उपाधियाँ उत्कीर्ण करवाई थीं।
- साम्राज्य विस्तार: मिहिर भोज ने पाल शासक देवपाल और राष्ट्रकूट राजा कृष्ण द्वितीय को पराजित कर काठियावाड़, मालवा और बुंदेलखंड पर प्रतिहारों का झंडा फहराया।
- अरब यात्री सुलेमान का विवरण: 851 ईस्वी में अरब यात्री सुलेमान भारत (मिहिर भोज के दरबार) आया था। सुलेमान ने अपनी यात्रा वृत्तांत में मिहिर भोज की अत्यधिक प्रशंसा करते हुए लिखा:“भोज के पास भारत की सबसे शक्तिशाली अश्वसेना (Cavalry) है। उसका राज्य चोर-डाकुओं से पूरी तरह मुक्त है। परंतु वह अरबों (मुसलमानों) का सबसे बड़ा कट्टर शत्रु है और इस्लाम की उन्नति की राह में सबसे बड़ी दीवार है।”सुलेमान ने मिहिर भोज के साम्राज्य को ‘बरुआ’ कहा था।
(E) महेन्द्रपाल प्रथम (885–910 ई.) व सम्राट महाकवि राजशेखर
मिहिर भोज के पुत्र महेन्द्रपाल प्रथम के काल में साम्राज्य की सीमाएं हिमालय से लेकर नर्मदा नदी तक विस्तृत थीं। इन्हें ‘रघुकुल तिलक’ और ‘निर्भय नरेन्द्र’ कहा जाता है।
- महाकवि राजशेखर का दरबारी होना: महेन्द्रपाल प्रथम के दरबार की सबसे बड़ी विशेषता सुप्रसिद्ध संस्कृत महाकवि राजशेखर (Rajasekhara) की उपस्थिति थी, जो महेन्द्रपाल के राजगुरु भी थे। राजशेखर ने भारत की साहित्यिक विरासत को समृद्ध करते हुए कालजयी ग्रंथों की रचना की:
- कर्पूरमंजरी (प्राकृत भाषा में लिखित बेजोड़ नाटक)
- काव्यमीमांसा (साहित्य शास्त्र का महाग्रंथ)
- विद्धशालभंजिका
- बालभारत एवं बालरामायण
- भुवनकोश व हरिविलास
(F) महीपाल प्रथम (912–944 ई.) व प्रतिहारों का पतन
महीपाल प्रथम के समय प्रतिहार साम्राज्य का पतन प्रारंभ हो गया था। राष्ट्रकूट राजा इन्द्र तृतीय ने कन्नौज को बुरी तरह लूटा और नष्ट कर दिया।
- विदेशी यात्री अल-मसूदी का विवरण: 915-916 ईस्वी में बगदाद का सुप्रसिद्ध अरब भूगोलवेत्ता अल-मसूदी (Al-Masudi) कन्नौज आया था। उसने गुर्जर-प्रतिहार राज्य को ‘अल-गूजर’ और यहाँ के राजा महीपाल को आदरपूर्वक ‘बौरा’ (शायद ‘आदिवराह’ का अपभ्रंश) कहकर पुकारा था। उसने प्रतिहार सेना की विशालता का सजीव वर्णन किया।
- साम्राज्य का अंत: महीपाल के बाद राज्यपाल, त्रिलोचनपाल जैसे कमजोर शासक हुए। 1018 ई. में महमूद गजनवी ने कन्नौज के कायर शासक राज्यपाल को आत्मसमर्पण करने पर मजबूर किया। अंततः 1036 ईस्वी में यशपाल इस महान गुर्जर-प्रतिहार राजवंश के अंतिम राजा सिद्ध हुए, जिसके बाद कन्नौज पर गहरवार (राठौड़) वंश का नियंत्रण स्थापित हो गया।
4. गुर्जर-प्रतिहारों की सांस्कृतिक व स्थापत्य धरोहर: महा-मारू शैली
गुर्जर-प्रतिहारों ने न केवल युद्ध लड़े, बल्कि कला के क्षेत्र में एक नई स्थापत्य शैली को जन्म दिया, जिसे ‘गुर्जर-प्रतिहार शैली’ या ‘महा-मारू शैली’ (Maha-Maru Style of Architecture) कहा जाता है। इस शैली की मुख्य विशेषताएं गर्भगृह, बारीक नक्काशीदार स्तंभ, और ऊंचे शिखरों वाले प्रासाद हैं।
प्रमुख मंदिर स्थापत्य के उदाहरण (Exam-Targeted Sites)
- ओसियां के मंदिर (जोधपुर): यहाँ का प्रसिद्ध महावीर जैन मंदिर (वत्सराज के काल का) और सूर्य मंदिर प्रतिहार कला के बेजोड़ प्रतीक हैं। ओसियां को ‘राजस्थान का भुवनेश्वर’ भी कहा जाता है।
- आभानेरी का हर्षत माता मंदिर (दौसा): आठवीं शताब्दी का यह मंदिर अपनी बारीक शिल्पकला और गहरी बावड़ी (चाँद बावड़ी) के लिए विश्व प्रसिद्ध है।
- किराडू का सोमेश्वर मंदिर (बाड़मेर): यह महा-मारू शैली का सबसे अंतिम और सबसे भव्य मंदिर माना जाता है, जिसे ‘राजस्थान का खजुराहो’ भी कहा जाता है। [राजस्थान के प्रमुख स्थल]
- चित्तौड़गढ़ दुर्ग का कालिका माता मंदिर: यह मूल रूप से प्रतिहार काल का एक सूर्य मंदिर था, जिसे बाद में शक्ति मंदिर में रूपांतरित किया गया।
📊 गुर्जर-प्रतिहार राजवंश का विश्लेषणात्मक वैचारिक मैट्रिक्स
| महत्वपूर्ण शासक | शासनकाल (Period) | गौरवशाली उपाधियाँ | विशिष्ट ऐतिहासिक योगदान / घटना | संबद्ध साहित्यिक स्रोत |
| हरिचन्द्र | 6वीं शताब्दी | रोहिल्लद्दि / आदिपुरुष | मण्डोर प्रतिहारों की मूल स्थापना; क्षत्रिय-ब्राह्मण शाखाओं के जनक। | जोधपुर व घटियाला शिलालेख |
| नागभट्ट प्रथम | 730–756 ई. | मलेच्छों का नाशक / नागावलोक | भीनमाल शाखा के संस्थापक; सिंध के अरबों के भयंकर आक्रमणों को कुचला। | ग्वालियर प्रशस्ति (मिहिर भोज) |
| वत्सराज | 775–805 ई. | रणहस्तिन / जयवराह | कन्नौज के लिए त्रिपक्षीय संघर्ष की शुरुआत की; ओसियां जैन मंदिर निर्माता। | ‘कुवलयमाला’ (उद्योतन सूरी, 778 ई.) |
| नागभट्ट द्वितीय | 805–833 ई. | परमभट्टारक महाराजाधिराज | कन्नौज को प्रतिहारों की स्थायी राजधानी बनाया; गंगा में जीवित जल समाधि ली। | बुचकला शिलालेख (815 ई.) |
| सम्राट मिहिर भोज | 836–885 ई. | आदिवराह / प्रभास | प्रतिहार साम्राज्य का स्वर्णकाल; अरबों का सबसे बड़ा शत्रु सिद्ध हुआ। | अरब यात्री सुलेमान का यात्रा वृत्तांत |
| महेन्द्रपाल प्रथम | 885–910 ई. | रघुकुल तिलक / निर्भय नरेन्द्र | साम्राज्य का हिमालय तक विस्तार; महाकवि राजशेखर को राजगुरु का स्थान दिया। | ‘कर्पूरमंजरी’, ‘काव्यमीमांसा’ (राजशेखर) |
| महीपाल प्रथम | 912–944 ई. | क्षितिपला / बौरा (अल-मसूदी के अनुसार) | राष्ट्रकूटों से भीषण संघर्ष; प्रतिहारों के विघटन की शुरुआत हुई। | अरब भूगोलवेत्ता अल-मसूदी का विवरण |
📝 स्व-मूल्यांकन टेस्ट (Exam-Targeted Practice Quiz)
प्रश्न 1: प्रतिहार शासक वत्सराज के काल में रचित ‘कुवलयमाला’ ग्रंथ का राजस्थान के भाषाई इतिहास में क्या महत्व है?
- उत्तर: उद्योतन सूरी द्वारा 778 ईस्वी में रचित ‘कुवलयमाला’ ग्रंथ में तत्कालीन भारत की 18 देशी भाषाओं का उल्लेख है। इस ग्रंथ में पश्चिमी राजस्थान की भाषा को स्पष्ट रूप से ‘मरुभाषा’ (Maru Bhasha) कहा गया है, जो राजस्थानी भाषा का सबसे प्राचीन और प्रथम लिखित साहित्यिक साक्ष्य माना जाता है।
प्रश्न 2: अरब यात्री सुलेमान और अल-मसूदी ने प्रतिहार साम्राज्य के बारे में जो विवरण दिए, उनमें मुख्य कूटनीतिक अंतर क्या थे?
- उत्तर: 1. सुलेमान (851 ई.) सम्राट मिहिर भोज के काल में आया था, उसने राजा को अरबों का कट्टर शत्रु और ‘आदिवराह’ उपाधि के कारण साम्राज्य को ‘बरुआ’ कहा।
- अल-मसूदी (915 ई.) महीपाल प्रथम के समय आया, उसने साम्राज्य को ‘अल-गूजर’ और राजा को ‘बौरा’ कहा तथा प्रतिहारों की शक्तिशाली अश्वसेना की भूरि-भूरि प्रशंसा की।
प्रश्न 3: गुर्जर-प्रतिहार कालीन ‘महा-मारू स्थापत्य शैली’ का सबसे अंतिम और उत्कृष्ट मंदिर कौन सा माना जाता है और इसे क्या संज्ञा दी गई है?
- उत्तर: बाड़मेर जिले में स्थित किराडू का सोमेश्वर शिव मंदिर (11वीं शताब्दी) महा-मारू शैली का सबसे अंतिम और कलात्मक दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ मंदिर है। अपनी कामुक मूर्तिकला और बेजोड़ वास्तुकला के कारण इसे ‘राजस्थान का खजुराहो’ कहा जाता है।
📚 प्रामाणिक संदर्भ एवं स्रोत (References & E-E-A-T Seal)
- डॉ. आर.सी. मजूमदार, “द गुर्जर-प्रतिहारस” (The Gurjar-Pratiharas – प्रामाणिक संदर्भ पाठ)
- राजस्थान राज्य पाठ्यपुस्तक मंडल, कक्षा 10 व 12 (भारत का इतिहास एवं राजस्थान का सामान्य अध्ययन)
- सम्राट मिहिर भोज की ‘ग्वालियर प्रशस्ति’ एवं ककुक के ‘घटियाला शिलालेख’ का प्रामाणिक अनुवाद।
- RPSC RAS एवं राजस्थान लोक सेवा आयोग की वरिष्ठ अध्यापक ग्रेड-II भर्ती परीक्षाओं के विगत 15 वर्षों के हल प्रश्नपत्रों का प्रामाणिक संकलन।
- तथ्य जाँच एवं संपादन: सुयोग अकादमी संपादकीय टीम (सुधीर ढाका – BSc-BEd, योगेश जांगिड़)।
📚 चौहान राजवंश: संपूर्ण अध्याय क्रमानुसार पढ़ें
RPSC & RSMSSB परीक्षा के नए सिलेबस के अनुसार नीचे दिए गए कड़ियों (Links) पर क्लिक करके चौहान वंश की सभी शाखाओं के विस्तृत नोट्स पढ़ें:


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