बीकानेर का इतिहास

बीकानेर राजवंश का इतिहास: राव बीका से महाराजा गंगा सिंह तक (RPSC / RSMSSB विशेष नोट्स)

परिचय: बीकानेर (राठौड़ राजवंश) का सामरिक व भौगोलिक महत्व

राजस्थान के उत्तर-पश्चिमी मरुस्थलीय भूभाग में स्थित बीकानेर (प्राचीन नाम- जांगलदेश) का इतिहास राजपूती कूटनीति, अदम्य साहस और आधुनिक दूरदर्शिता का एक अनूठा मिश्रण है। मारवाड़ के राठौड़ राजवंश से निकलकर इस शाखा ने विषम भौगोलिक परिस्थितियों के बीच एक शक्तिशाली साम्राज्य खड़ा किया। मध्यकाल में मध्य एशिया और गुजरात के व्यापारिक मार्गों के केंद्र में होने के कारण बीकानेर का सामरिक महत्व अत्यधिक था। RPSC (RAS, स्कूल व्याख्याता, वरिष्ठ अध्यापक) और RSMSSB (CET, पटवारी, सब-इंस्पेक्टर) जैसी परीक्षाओं के राजस्थान इतिहास खंड में बीकानेर के राठौड़ शासकों के सैन्य अभियानों, मुग़ल कूटनीति और आधुनिक विकास (जैसे गंगनहर परियोजना) से हमेशा गहरे और विश्लेषणात्मक प्रश्न पूछे जाते हैं। इस विस्तृत मास्टर-नोट्स में हम इस राजवंश की स्थापना से लेकर आधुनिक भारत के निर्माता महाराजा गंगा सिंह तक के कालखंड का प्रामाणिक विश्लेषण करेंगे।

1. स्थापना का इतिहास: राव बीका (1465–1504 ई.) और जांगलदेश का नव-उदय

बीकानेर के राठौड़ राजवंश की स्थापना मारवाड़ (जोधपुर) के संस्थापक राव जोधा के पांचवें पुत्र राव बीका (Rao Bika) ने की थी।

जोधपुर का परित्याग और गुरुमंत्र

दरबार में एक दिन राव जोधा द्वारा व्यंग्यपूर्वक कहे गए परिहास के कारण राव बीका अपने चाचा राव कांधल के साथ मारवाड़ साम्राज्य छोड़कर उत्तर की ओर जांगलदेश की तरफ बढ़ गए। उन्होंने अपनी आराध्य देवी करणी माता (देशनोक) के आशीर्वाद से इस नवीन साम्राज्य की स्थापना की।

  • कोडमदेसर (प्रथम केंद्र): 1465 ईस्वी में राव बीका ने सबसे पहले कोडमदेसर को अपनी गतिविधियों का केंद्र बनाया और वहाँ कोडमदेसर भैरव मंदिर की स्थापना की।
  • बीकानेर शहर की स्थापना (1488 ई.): राव बीका ने 1488 ईस्वी में वैशाख शुक्ल तृतीया (आखा तीज) के दिन ‘बीका’ और स्थानीय जाट नेता ‘नेरा’ के नाम पर बीकानेर शहर की नींव रखी। इस संदर्भ में राजस्थानी लोक-संस्कृति में यह दोहा अमर है—“पंद्रह सौ पैंतालवे, सुद बैसाख सुमेर। थावर बीज थरपियो, बीका बीकानेर॥”आज भी आखा तीज के दिन बीकानेर का स्थापना दिवस धूमधाम से मनाया जाता है और पतंगें उड़ाई जाती हैं।

2. प्रारंभिक राजाओं का सैन्य संघर्ष: राव लूणकरण से राव कल्याणमल

(A) राव लूणकरण (1505–1526 ई.): “कलयुग का कर्ण”

राव बीका के बाद उनके पुत्र लूणकरण शासक बने। वे एक आक्रामक विजेता थे जिन्होंने नागौर के मुसलमानों और चुरू के मोहिलों को पराजित किया।

  • कलयुग का कर्ण: महाकवि बिठू सूजा ने अपने सुप्रसिद्ध ग्रंथ “राव जैतसी रो छंद” में लूणकरण की अत्यधिक दानशीलता के कारण उन्हें “कलयुग का कर्ण” (Kalyug ka Karna) कहा है। उन्होंने लूणकरणसर झील का निर्माण करवाया था। 1526 ई. में धोसी के युद्ध में नारनौल के नवाब की सेना के खिलाफ लड़ते हुए वे वीरगति को प्राप्त हुए।

(B) राव जैतसी (1526–1542 ई.): काबुल के कामरान पर विजय

  • राठौड़-मुग़ल संघर्ष (1534 ई.): मुग़ल सम्राट हुमायूं के भाई और काबुल के शासक कामरान ने भटनेर दुर्ग को जीतते हुए बीकानेर पर अधिकार करने के लिए आक्रमण किया। 1534 ईस्वी के इस भीषण युद्ध में राव जैतसी ने अपनी रणनीतिक कुशलता से कामरान की मुग़ल सेना को करारी शिकस्त दी। इस गौरवशाली विजय का आंखों देखा विवरण बिठू सूजा के ग्रंथ ‘राव जैतसी रो छंद’ में सुरक्षित है।
  • पाहेबा / साहेबा का युद्ध (1542 ई.): मारवाड़ (जोधपुर) के महत्वाकांक्षी राजा मालदेव ने साम्राज्य विस्तार नीति के तहत बीकानेर पर आक्रमण किया। जोधपुर और बीकानेर की सेनाओं के मध्य 1542 ई. में पाहेबा (फलोदी के निकट) का युद्ध लड़ा गया, जिसमें राव जैतसी वीरतापूर्वक लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए और बीकानेर पर मालदेव का नियंत्रण हो गया।

(C) राव कल्याणमल (1542–1574 ई.): मुग़ल अधीनता का प्रारंभ

राव जैतसी की मृत्यु के बाद उनके पुत्र कल्याणमल ने मालदेव से प्रतिशोध लेने के लिए शेरशाह सूरी की शरण ली और 1544 ई. के गिरि-सुमेल के युद्ध में शेरशाह की ओर से भाग लेकर मालदेव को पराजित किया।

  • नागौर दरबार (1570 ई.): जब मुग़ल सम्राट अकबर ने 1570 ईस्वी में नागौर में अपना प्रसिद्ध दरबार आयोजित किया, तो राव कल्याणमल अपने दो पुत्रों (रायसिंह और पृथ्वीराज राठौड़) के साथ वहाँ पहुँचे। कल्याणमल अकबर की अधीनता स्वीकार करने वाले बीकानेर के प्रथम राठौड़ शासक बने।

3. मुग़ल कूटनीति और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का युग

(A) महाराजा रायसिंह (1574–1612 ई.): “राजपूतों का कर्ण”

महाराजा रायसिंह बीकानेर के इतिहास के सबसे प्रतापी और मुग़ल दरबार के सबसे विश्वसनीय राजपूत सेनापति थे। अकबर और जहांगीर दोनों ने उन्हें 4000 और 5000 का ऊँचा मनसब प्रदान किया था।

  • राजपूतने का कर्ण: मुंशी देवी प्रसाद ने उनकी अद्वितीय दानशीलता और प्रजावत्सलता को देखते हुए उन्हें “राजपूताने का कर्ण” (Karna of Rajputana) की उपाधि दी थी। अकबर ने जोधपुर पर नियंत्रण के समय रायसिंह को ही वहां का प्रशासनिक गवर्नर नियुक्त किया था।
  • जूनागढ़ दुर्ग का निर्माण (1589–1594 ई.): रायसिंह ने अपने कुशल प्रधानमंत्री करमचंद की देखरेख में बीकानेर के प्रसिद्ध जूनागढ़ दुर्ग (धान्वन व भूमि दुर्ग) की नींव रखी, जिसे ‘चिंतामणि दुर्ग’ या ‘रति घाटी का किला’ भी कहा जाता है। किले के मुख्य द्वार (सूरज पोल) पर उन्होंने ‘रायसिंह प्रशस्ति’ उत्कीर्ण करवाई तथा 1303 के चित्तौड़ साके के वीर नायक जयमल और फत्ता की गजारूढ़ (हाथी पर सवार) मूर्तियाँ स्थापित करवाईं।
  • साहित्यिक अवदान: रायसिंह स्वयं एक उच्च कोटि के विद्वान थे; उन्होंने ‘रायसिंह महोत्सव’, ‘वैद्यक वंशावली’, और ‘ज्योतिष रत्नमाला’ जैसे ग्रंथों की रचना की।

(B) पृथ्वीराज राठौड़: डिंगल का हेरोस

महाराजा रायसिंह के छोटे भाई पृथ्वीराज राठौड़ अकबर के नवरत्नों के समान दरबारी कवि थे। अकबर ने उन्हें गागरोन (झालावाड़) का किला जागीर में दिया था।

  • वेलि क्रिसन रुक्मणी री: पृथ्वीराज ने गागरोन दुर्ग में बैठकर डिंगल भाषा (राजस्थानी) में इस अमर महाकाव्य की रचना की। इस ग्रंथ की महानता को देखते हुए सुप्रसिद्ध अध्येता दुरसा आढ़ा ने इसे “पांचवां वेद और उन्नीसवां पुराण” की संज्ञा दी थी। इटली के भाषा वैज्ञानिक डॉ. एल.पी. टेसिटोरी ने पृथ्वीराज राठौड़ को “डिंगल भाषा का हेरोस” (Horace of Dingal) कहा था। कन्हाईलाल सेठिया की प्रसिद्ध कविता ‘पीथल और पाथल’ में ‘पीथल’ शब्द इन्हीं पृथ्वीराज राठौड़ के लिए आया है।

(C) महाराजा अनूप सिंह (1669–1698 ई.): विद्यानुरागी शासक

अनूप सिंह का काल बीकानेर के सांस्कृतिक इतिहास का ‘स्वर्णकाल’ माना जाता है। औरंगजेब ने उनके दक्षिण अभियानों (गोलकुंडा व बीजापुर विजय) से प्रसन्न होकर उन्हें “माही मरातब” (Mahi Maratib) की सर्वोच्च राजकीय उपाधि से विभूषित किया था।

  • अनूप संस्कृत पुस्तकालय: औरंगजेब जब उत्तर भारत में हिंदू ग्रंथों और मूर्तियों को नष्ट कर रहा था, तब अनूप सिंह ने दक्षिण भारत से हज़ारों दुर्लभ संस्कृत पांडुलिपियों को खरीदकर बीकानेर में सुरक्षित किया और ‘अनूप संस्कृत लाइब्रेरी’ की स्थापना की। उनके दरबार में भावभट्ट (प्रसिद्ध संगीतकार) जैसे विद्वान थे, जिन्होंने ‘अणूपसंगीत विलास’ की रचना की।

4. आधुनिक काल, ब्रिटिश संधियाँ और महाराजा गंगा सिंह का युग

(A) महाराजा सूरत सिंह एवं महाराजा रतन सिंह

  • भटनेर विजय (1805 ई.): सूरत सिंह ने 1805 ईस्वी में मंगलवार के दिन भटनेर के भाटी शासकों को युद्ध में पराजित कर इस किले पर अधिकार कर लिया। मंगलवार का दिन भगवान हनुमान जी को समर्पित होने के कारण उन्होंने भटनेर का नाम बदलकर ‘हनुमानगढ़’ (Hanumangarh) रख दिया। उन्होंने 1818 में ईस्ट इंडिया कंपनी से सहायक संधि की।
  • कन्या वध पर रोक (1836 ई.): महाराजा रतन सिंह ने 1836 ईस्वी में पवित्र गया जी (बिहार) के घाट पर बीकानेर के सभी सामंतों को कसम दिलवाकर राज्य में ‘कन्या वध’ (Female Infanticide) पर पूर्ण वैधानिक प्रतिबंध लगा दिया था।

(B) महाराजा गंगा सिंह (1887–1943 ई.): “आधुनिक भारत के भगीरथ”

महाराजा गंगा सिंह बीकानेर ही नहीं बल्कि आधुनिक भारतीय इतिहास के सबसे दूरदर्शी, कूटनीतिज्ञ और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त शासक थे।

  • गंगनहर परियोजना (1927 ई.): बीकानेर के भयानक अकालों से प्रजा को मुक्ति दिलाने के लिए गंगा सिंह ने पंजाब की सतलज नदी के पानी को मरुभूमि तक लाने का भगीरथ प्रयास किया। 1927 ईस्वी में भारत की पहली सबसे बड़ी पक्की नहर ‘गंगनहर’ (Gang Canal) बीकानेर आई। इस युगांतकारी सिंचाई क्रांति के कारण ही गंगा सिंह को “आधुनिक भारत का भगीरथ” (Bhagirath of Modern India) कहा जाता है।
  • गंगा रिसाला (Camel Corps): महाराजा गंगा सिंह ने ऊँटों की एक विशेष अनुशासित सैन्य टुकड़ी तैयार की थी, जिसे ‘गंगा रिसाला’ कहा जाता था। इस सेना ने प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध में ब्रिटिश साम्राज्य की ओर से चीन, मिस्र और फ्रांस के मैदानों में अद्वितीय वीरता का प्रदर्शन किया।
  • अंतरराष्ट्रीय संधियाँ और गोलमेज सम्मेलन: वे संपूर्ण भारत के एकमात्र ऐसे राजा थे जिन्होंने 1919 की ‘वर्साय की शांति संधि’ (Treaty of Versailles) पर भारत के प्रतिनिधि के रूप में हस्ताक्षर किए थे। उन्होंने लंदन में आयोजित तीनों गोलमेज सम्मेलनों (Round Table Conferences, 1930-1932) में भाग लिया और 1921 से 1926 तक ‘नरेंद्र मंडल’ (Chamber of Princes) के प्रथम चांसलर (अध्यक्ष) रहे। उन्होंने बीकानेर में भव्य लालगढ़ पैलेस का निर्माण करवाया।

📊 बीकानेर राजवंश का विश्लेषणात्मक वैचारिक मैट्रिक्स (Mind Map Table)

शासक (Ruler)शासनकाल / मोड़मुख्य सैन्य व कूटनीतिक उपलब्धिसांस्कृतिक / विशेष योगदानपरीक्षा उपयोगी विशिष्ट तथ्य (E-E-A-T)
राव बीका1465–1504 ई.जांगलदेश में स्वतंत्र साम्राज्य की स्थापनाकोडमदेसर भैरव मंदिर व बीकानेर शहर1488 में आखा तीज के दिन बीकानेर बसाया; करणी माता का आशीर्वाद।
राव लूणकरण1505–1526 ई.धोसी का युद्ध (वीरगति पाई)लूणकरणसर झील का निर्माणबिठू सूजा ने “राव जैतसी रो छंद” में इन्हें ‘कलयुग का कर्ण’ कहा।
राव जैतसी1526–1542 ई.कामरान (मुग़ल सेना) को पराजित कियाबिठू सूजा को राजकीय संरक्षणपाहेबा का युद्ध (1542) में मालदेव के विरुद्ध लड़ते हुए वीरगति पाई।
राव कल्याणमल1542–1574 ई.गिरि-सुमेल युद्ध में शेरशाह की सहायतानागौर दरबार में उपस्थितिमुग़ल अधीनता स्वीकार करने वाले बीकानेर के प्रथम शासक (1570 ई.)।
महाराजा रायसिंह1574–1612 ई.अकबर व जहांगीर के प्रमुख सेनापतिजूनागढ़ दुर्ग का निर्माण (1589)मुंशी देवी प्रसाद ने इन्हें ‘राजपूताने का कर्ण’ की उपाधि प्रदान की।
पृथ्वीराज राठौड़16वीं शताब्दीगागरोन दुर्ग की जागीर प्राप्त की‘वेलि क्रिसन रुक्मणी री’ महाग्रंथटेसिटोरी ने इन्हें ‘डिंगल का हेरोस’ कहा; कविता ‘पीथल’ के नायक।
महाराजा अनूप सिंह1669–1698 ई.गोलकुंडा व बीजापुर सैन्य अभियानअनूप संस्कृत पुस्तकालय की स्थापनाऔरंगजेब द्वारा ‘माही मरातब’ की सर्वोच्च गौरवशाली उपाधि।
महाराजा गंगा सिंह1887–1943 ई.वर्साय संधि (1919), गोलमेज सम्मेलनगंगनहर परियोजना (1927)“आधुनिक भारत के भगीरथ”; इनकी ऊँट सेना ‘गंगा रिसाला’ कहलाई।

📝 स्व-मूल्यांकन टेस्ट (Exam-Targeted Practice Quiz)

प्रश्न 1: बीकानेर के इतिहास में “कलयुग का कर्ण” और “राजपूताने का कर्ण” उपाधियाँ क्रमशः किन शासकों को और किन विद्वानों द्वारा दी गई हैं?

  • उत्तर: 1. “कलयुग का कर्ण” की उपाधि राव लूणकरण को महाकवि बिठू सूजा ने अपने ग्रंथ ‘राव जैतसी रो छंद’ में दी थी।
  1. “राजपूताने का कर्ण” की उपाधि महाराजा रायसिंह को प्रसिद्ध आधुनिक अन्वेषक मुंशी देवी प्रसाद ने उनकी प्रजावत्सलता और दानशीलता के कारण दी थी।

प्रश्न 2: पृथ्वीराज राठौड़ द्वारा रचित ग्रंथ ‘वेलि क्रिसन रुक्मणी री’ का साहित्यिक व ऐतिहासिक विश्लेषण क्या है?

  • उत्तर: यह ग्रंथ डिंगल भाषा का एक उत्कृष्ट महाकाव्य है, जिसकी रचना गागरोन दुर्ग में की गई थी। इस ग्रंथ की साहित्यिक गहराई को देखते हुए कवि दुरसा आढ़ा ने इसे “पांचवां वेद और उन्नीसवां पुराण” कहा, तथा इटैलियन विद्वान डॉ. टेसिटोरी ने पृथ्वीराज को “डिंगल का हेरोस” की महान संज्ञा दी थी।

प्रश्न 3: महाराजा गंगा सिंह को “आधुनिक भारत का भगीरथ” क्यों कहा जाता है और उनकी कूटनीतिक अंतरराष्ट्रीय उपलब्धियाँ क्या थीं?

  • उत्तर: गंगा सिंह ने मरुभूमि के भीषण अकाल को समाप्त करने के लिए 1927 ईस्वी में सतलज नदी के पानी को ‘गंगनहर’ के माध्यम से बीकानेर लाकर मरुस्थल में प्रथम सिंचाई क्रांति की, इसलिए उन्हें यह संज्ञा दी गई। उनकी अंतरराष्ट्रीय उपलब्धियों में— प्रथम विश्व युद्ध के बाद ‘वर्साय की शांति संधि’ (11919) पर भारत की ओर से हस्ताक्षर करना और लंदन के तीनों गोलमेज सम्मेलनों में भाग लेना प्रमुख था।

📚 प्रामाणिक संदर्भ एवं स्रोत (References & E-E-A-T Seal)

तथ्य जाँच एवं संपादन: सुयोग अकादमी संपादकीय टीम (सुधीर ढाका – BSc-BEd, योगेश जांगिड़ – सॉफ्टवेयर इंजीनियर)।

पण्डित गौरीशंकर हीराचंद ओझा, “बीकानेर राज्य का इतिहास” (भाग 1 व 2 – प्रामाणिक संदर्भ ग्रंथ)

बिठू सूजा कृत “राव जैतसी रो छंद” (मूल ऐतिहासिक काव्य अनुवाद)

राजस्थान राज्य पाठ्यपुस्तक मंडल, कक्षा 9, 10 व 12 (राजस्थान का सामान्य अध्ययन एवं प्रशासनिक इतिहास – नवीन संस्करण)

RPSC RAS, स्कूल व्याख्याता (इतिहास) और RSMSSB परीक्षाओं के विगत 15 वर्षों के हल प्रश्नपत्रों का प्रामाणिक विश्लेषणात्मक संकलन।

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