परिचय: रणथंभौर शाखा का सामरिक व परीक्षा उपयोगी महत्व
राजस्थान के चौहान राजवंश की शाखाओं में अजमेर के बाद यदि कोई शाखा अपने अप्रतिम शौर्य, शरणागत वत्सलता और अटूट देशभक्ति के लिए इतिहास में अमर हुई, तो वह रणथंभौर का चाहमान वंश था। अरावली और विंध्याचल पर्वत श्रृंखलाओं के मध्य प्राकृतिक रूप से सुरक्षित रणथंभौर दुर्ग इस राजवंश की शक्ति और स्वाभिमान का जीवंत प्रतीक रहा है। RPSC (RAS, स्कूल व्याख्याता, वरिष्ठ अध्यापक) और RSMSSB (CET, पटवारी, पुलिस सब-इंस्पेक्टर) जैसी उच्च स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं में रणथंभौर के चौहानों, विशेषकर राजा हम्मीर देव चौहान के सैन्य अभियानों और प्रशासनिक इतिहास से अत्यधिक सूक्ष्म व तथ्यात्मक प्रश्न पूछे जाते हैं। इस विस्तृत मास्टर-नोट्स में हम इस राजवंश के उदय, प्रारंभिक शासकों और हम्मीर देव के गौरवशाली इतिहास का प्रामाणिक व शोध-आधारित विश्लेषण करेंगे।
1. रणथंभौर की चाहमान शाखा की स्थापना एवं प्रारंभिक शासक
तराइन के द्वितीय युद्ध (1192 ई.) में पृथ्वीराज चौहान तृतीय की पराजय के बाद उत्तर भारत में चौहानों की केंद्रीय सत्ता बिखर गई थी। इसी संकट काल में रणथंभौर की नई शाखा का उदय हुआ।
गोविन्दराज चौहान (1194 ई.): शाखा के संस्थापक
- स्थापना का इतिहास: पृथ्वीराज चौहान तृतीय के पुत्र गोविन्दराज चौहान ने 1194 ईस्वी में रणथंभौर में चौहान वंश की स्वतंत्र शाखा की स्थापना की थी। तराइन के युद्ध के बाद कुतुबुद्दीन ऐबक की सहायता से उन्होंने इस दुर्ग पर अपना नियंत्रण स्थापित किया और दिल्ली सल्तनत के साथ कूटनीतिक संतुलन बनाकर शासन प्रारंभ किया।
प्रारंभिक राजाओं का संघर्ष
गोविन्दराज के बाद उनके उत्तराधिकारियों को दिल्ली सल्तनत के निरंतर आक्रमणों का सामना करना पड़ा:
- वाल्हणदेव व प्रह्लादन: इनके समय इल्तुतमिश ने रणथंभौर पर अधिकार करने का असफल प्रयास किया। प्रह्लादन ने जैन धर्म को संरक्षण प्रदान किया था।
- वीरनारायण: इल्तुतमिश ने कूटनीतिक छल से वीरनारायण को दिल्ली बुलाकर विष देकर उनकी हत्या करवा दी थी और कुछ समय के लिए किले पर अधिकार कर लिया था।
- वाग्भट्ट चौहान: इन्होंने मुस्लिम नियंत्रण से रणथंभौर को पुनः मुक्त कराया और मालवा तथा सुल्तान नसीरुद्दीन महमूद के आक्रमणों को सफलतापूर्वक विफल किया।
- जैत्रसिंह (जयसिंह): इन्होंने लगभग 32 वर्षों तक शासन किया। उन्होंने अपने जीवनकाल में ही अपने सबसे योग्य और छोटे पुत्र हम्मीर देव को अपना उत्तराधिकारी चुनकर उनका राज्याभिषेक कर दिया था।
2. महाराणा हम्मीर देव चौहान (1282–1301 ई.): दिग्विजय और कोटियज्ञ
हम्मीर देव चौहान 1282 ईस्वी में रणथंभौर के सिंहासन पर बैठे। गद्दी पर बैठते ही उन्होंने अपने साम्राज्य की सीमाओं के विस्तार के लिए ‘दिग्विजय की नीति’ (Policy of Conquering all Directions) अपनाई।
हम्मीर देव के सैन्य अभियान
हम्मीर देव ने अपनी दिग्विजय नीति के तहत कुल 17 युद्ध लड़े, जिनमें से 16 युद्धों में वे विजयी रहे। उनके प्रमुख सैन्य अभियान निम्नलिखित थे:
- भीमरस विजय: उन्होंने भीमरस के राजा अर्जुन को पराजित कर टैक्स वसूल किया।
- मांडलगढ़ व चित्तौड़ विजय: उन्होंने मेदपाट (मेवाड़) के शासक समरसिंह को पराजित कर उनकी सैन्य शक्ति को आघात पहुँचाया और मांडलगढ़ से कर वसूला।
- परमार साम्राज्य पर नियंत्रण: उन्होंने आबू के शासक प्रतापसिंह और धार (मालवा) के परमार राजा भोज द्वितीय को युद्ध में परास्त कर उत्तर-पश्चिम राजस्थान और मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों पर अपनी धाक जमाई।
- कोटियज्ञ का आयोजन: अपनी इन समस्त दिग्विजय विजयों के उपलक्ष्य में हम्मीर देव ने रणथंभौर में एक विशाल ‘कोटियज्ञ’ (Kotiyajna) का आयोजन करवाया। इस महायज्ञ के प्रधान पुरोहित सुप्रसिद्ध विद्वान विश्वशास्त्री (या विश्वरूप) थे।
3. जलालुद्दीन खिलजी का रणथंभौर अभियान (1290–1292 ई.)
हम्मीर देव की बढ़ती हुई सैन्य शक्ति दिल्ली सल्तनत के लिए एक बड़ा खतरा बन चुकी थी। इसी कारण खिलजी वंश के संस्थापक सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी ने रणथंभौर को जीतने का प्रयास किया।
झाईं दुर्ग पर अधिकार (रणथंभौर की कुंजी)
1290 ईस्वी में जलालुद्दीन खिलजी ने एक विशाल सेना के साथ आक्रमण किया। रणथंभौर दुर्ग की घेराबंदी करने से पूर्व उसने इसके अग्रिम रक्षक दुर्ग ‘झाईं दुर्ग’ पर आक्रमण किया। चाहमान सेनापति गुरदास सैनी वीरतापूर्वक लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए और तुर्कों ने झाईं पर अधिकार कर लिया। इतिहास में झाईं दुर्ग को ‘रणथंभौर दुर्ग की कुंजी’ (Key to Ranthambore) कहा जाता है।
जलालुद्दीन की असफलता और ऐतिहासिक कथन
झाईं को जीतने के बाद सुल्तान ने मूल रणथंभौर दुर्ग की घेराबंदी की, परंतु हम्मीर देव की सुदृढ़ रक्षा नीति के कारण वह महीनों की घेराबंदी के बाद भी किले की एक ईंट तक नहीं हिला सका। अंततः विवश होकर जब सुल्तान घेरा उठाने लगा, तो उसके सेनापति अहमद चप ने इसका विरोध किया। तब जलालुद्दीन खिलजी ने अपना प्रसिद्ध ऐतिहासिक वाक्य कहा था:
“मैं ऐसे दस (या सौ) दुर्गों को भी मुसलमान के एक बाल के बराबर भी महत्व नहीं देता।”
1292 ईस्वी में सुल्तान ने पुनः असफल प्रयास किया और हारकर दिल्ली लौट गया।
4. अलाउद्दीन खिलजी से भयंकर संघर्ष: आक्रमण के मूल कारण
1296 ई. में जलालुद्दीन की हत्या कर उसका भतीजा अलाउद्दीन खिलजी दिल्ली का सुल्तान बना। वह एक घोर साम्राज्यवादी शासक था और रणथंभौर के साथ उसका संघर्ष अवश्यंभावी था।
आक्रमण के प्रमुख कारण
- साम्राज्यवादी नीति: अलाउद्दीन संपूर्ण भारत पर एकछत्र राज करना चाहता था और दिल्ली के निकट एक स्वतंत्र, शक्तिशाली राजपूत राज्य का होना उसे स्वीकार नहीं था।
- जलालुद्दीन की हार का बदला: खिलजी राजवंश की पुरानी पराजय का बदला लेना सुल्तान की प्रतिष्ठा का प्रश्न बन चुका था।
- सबसे प्रमुख कारण – शरणागत की रक्षा (मंगोल विद्रोही): 1299 ई. में जब अलाउद्दीन की सेना गुजरात को लूटकर दिल्ली लौट रही थी, तो जालौर [जालौर के सोनगरा चौहानों का इतिहास] के निकट धन के बंटवारे को लेकर मंगोल सैनिकों ने विद्रोह कर दिया। इस विद्रोही मंगोल कमांडर मीीर मोहम्मद शाह (Mahammad Shah) और उसके भाई केहबरू को राजा हम्मीर देव ने अपने यहाँ न केवल शरण दी, बल्कि उन्हें जागीर भी प्रदान की। अलाउद्दीन ने मोहम्मद शाह को वापस सौंपने की मांग की, परंतु हम्मीर देव ने अपने क्षत्रिय धर्म का पालन करते हुए शरणागत को सौंपने से साफ इनकार कर दिया।
5. रणथंभौर की घेराबंदी और नुसरत खाँ की मृत्यु
अलाउद्दीन खिलजी ने 1299-1300 ई. में अपने दो सबसे शक्तिशाली सेनापतियों — उलुग खाँ और नुसरत खाँ — के नेतृत्व में एक विशाल सेना भेजी।
- हिंदूवाट घाटी का युद्ध: तुर्क सेना ने पुनः झाईं दुर्ग पर अधिकार कर लिया। इसके बाद हिंदूवाट घाटी के युद्ध में हम्मीर के दो सेनापतियों — भीमसिंह और धर्मसिंह — ने तुर्क सेना को पीछे धकेला। परंतु कूटनीतिक असावधानी के कारण भीमसिंह तुर्कों के अचानक हुए पलटवार में मारे गए।
- नुसरत खाँ की मृत्यु: इसके बाद तुर्क सेना ने मुख्य किले की प्राचीर के पास ‘पाशीब’ और ‘मगरबी’ (पत्थर फेंकने वाले यंत्र) का निर्माण शुरू किया। इसी दौरान किले के भीतर से हम्मीर की सेना द्वारा दागे गए एक भारी पत्थर (या तोप के गोले सदृश मलबे) की चपेट में आने से सल्तनत का महान सेनापति नुसरत खाँ बुरी तरह घायल हो गया और उसकी मृत्यु हो गई। सेनापति की मृत्यु से तुर्क सेना में हाहाकार मच गया और उलुग खाँ को पीछे हटना पड़ा।
6. सुल्तान का स्वयं आगमन, विश्वासघात और राजस्थान का प्रथम साका (1301 ई.)
नुसरत खाँ की मृत्यु और सेना के मनोबल को गिरता देख सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी स्वयं एक विशाल टिड्डी दल सेना लेकर रणथंभौर पहुँचा। जब कई महीनों की घेराबंदी के बाद भी सुल्तान किले को नहीं जीत सका, तो उसने छल-कपट का सहारा लिया।
रणमल और रतिपाल का विश्वासघात
अलाउद्दीन ने संधि वार्ता के बहाने हम्मीर देव के दो मंत्रियों — रणमल (Ranmal) और रतिपाल (Ratipal) — को अपने शिविर में बुलाया। सुल्तान ने उन्हें लालच दिया कि जीत के बाद रणथंभौर का दुर्ग उन्हें सौंप दिया जाएगा। इस गुप्त लालच में आकर दोनों मंत्रियों ने देशद्रोह किया और किले के भीतर रसद सामग्री (अनाज) पहुँचाने वाले गुप्त रास्तों और जल स्रोतों की जानकारी सुल्तान को दे दी। तुर्क सेना ने किले के गुप्त रास्तों पर नियंत्रण कर लिया और पीने के पानी के तालाबों में गाय का रक्त और हड्डियां मिलवाकर उसे दूषित कर दिया।
राजस्थान का प्रथम ऐतिहासिक साका (11 जुलाई 1301)
किले के भीतर अन्न और जल का भयंकर अकाल पड़ गया। अमीर खुसरो ने अपनी पुस्तक ‘खजाइनुल फुतूह’ में लिखा है कि “सोने के दो दानों के बदले चावल का एक दाना भी नसीब नहीं हो रहा था।” अंततः राजपूतों ने अंतिम युद्ध का निर्णय लिया।
- जल जौहर (Water Jauhar): 11 जुलाई 1301 ईस्वी को हम्मीर देव की प्रधान रानी रंगादेवी (या रंगदेवी) और उनकी पुत्री देवलदे (पद्मला) के नेतृत्व में राजपूत महिलाओं ने किले के प्रसिद्ध ‘पदमला तालाब’ में कूदकर राजस्थान के इतिहास का प्रथम और एकमात्र ‘जल जौहर’ किया।
- केसरिया व वीरगति: राजा हम्मीर देव चौहान के नेतृत्व में राजपूत योद्धाओं ने केसरिया बाना पहनकर किले के द्वार खोल दिए। हम्मीर देव अद्भुत वीरता दिखाते हुए लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। युद्ध के बाद अलाउद्दीन ने विश्वासघाती रणमल और रतिपाल की भी यह कहकर हत्या करवा दी कि “जो अपने राजा के सगे न हुए, वे मेरे क्या होंगे।” घायल विद्रोही मोहम्मद शाह से जब सुल्तान ने पूछा कि यदि मैं तुम्हें ठीक कर दूँ तो तुम क्या करोगे? तो मोहम्मद शाह ने कहा— “पहली फुर्सत में तुम्हारी हत्या करूँगा और दूसरे स्थान पर हम्मीर के पुत्र को गद्दी पर बैठाऊँगा।” क्रुद्ध सुल्तान ने उसे हाथी के पैर तले कुचलवा दिया।
7. हम्मीर देव चौहान का साहित्यिक व सांस्कृतिक अवदान
राजा हम्मीर देव इतिहास में अपने हठ (अडिग संकल्प) और शरणागत की रक्षा के लिए अमर हैं। उनके संदर्भ में आज भी राजस्थान की लोक-संस्कृति में यह दोहा गूंजता है:
“सिंह सवन सत्पुरुष वचन, कदली फलत इक बार। तिरिया तेल हम्मीर हठ, चढ़े न दूजी बार॥”
स्थापत्य और कला
- 32 खंभों की छतरी (न्याय की छतरी): हम्मीर देव ने अपने पिता जैत्रसिंह के 32 वर्षों के सफल शासनकाल की स्मृति में रणथंभौर दुर्ग के भीतर 32 खंभों की एक भव्य छतरी का निर्माण करवाया। इसी छतरी पर बैठकर हम्मीर देव अपनी प्रजा को न्याय प्रदान करते थे, इसलिए इसे ‘न्याय की छतरी’ भी कहा जाता है। उन्होंने किले के भीतर प्रसिद्ध त्रिनेत्र गणेश मंदिर का भी जीर्णोद्धार करवाया।
- दरबारी विद्वान: उनके दरबार में महान कवि बीजादित्य निवास करते थे, जिन्हें हम्मीर ने राजकीय संरक्षण प्रदान किया था। उनके गुरु का नाम राघवदेव था।
हम्मीर पर रचित सुप्रसिद्ध ग्रंथ (Exam-Targeted Books)
प्रतियोगी परीक्षाओं में हम्मीर देव के इतिहास से संबंधित पुस्तकों के लेखकों के नाम अक्सर पूछे जाते हैं:
- हम्मीर महाकाव्य: नयनचंद्र सूरी (Nayan Chandra Suri) – यह चौहान इतिहास का सबसे प्रामाणिक स्रोत है।
- हम्मीर रासो (18वीं सदी): जोधराज (Jodhraj)।
- हम्मीर रासो (13वीं सदी) व हम्मीर काव्य: सारंगधर (Sarangdhar)।
- हम्मीर हठ: चंद्रशेखर (Chandrashekhar)।
- हम्मीरायण: भंडाऊ व्यास (Bhandau Vyas)।
📊 रणथंभौर चौहान राजवंश का विश्लेषणात्मक वैचारिक मैट्रिक्स
| महत्वपूर्ण घटना / मोड़ | संबद्ध वर्ष (Year) | मुख्य नायक / प्रतिपक्षी | ऐतिहासिक परिणाम एवं परीक्षा उपयोगी तथ्य |
| रणथंभौर शाखा की स्थापना | 1194 ई. | गोविन्दराज चौहान | अजमेर के पतन के बाद सपादलक्ष के चौहानों का नया केंद्र स्थापित हुआ। |
| झाईं दुर्ग का युद्ध | 1290 ई. | गुरदास सैनी vs जलालुद्दीन खिलजी | गुरदास सैनी वीरगति को प्राप्त; तुर्कों का रणथंभौर की कुंजी पर अधिकार। |
| हिंदूवाट घाटी का युद्ध | 1300 ई. | भीमसिंह व धर्मसिंह vs उलुग खाँ | चौहान सेना की शुरुआती जीत; सैन्य कमांडर भीमसिंह वीरगति को प्राप्त। |
| रणथंभौर दुर्ग का साका | 11 जुलाई 1301 | राजा हम्मीर देव vs अलाउद्दीन खिलजी | राजस्थान का प्रथम साका; रानी रंगादेवी का ऐतिहासिक जल जौहर; चौहान शाखा का अंत। |
📝 स्व-मूल्यांकन टेस्ट (Exam-Targeted Practice Quiz)
प्रश्न 1: इतिहासकार अमीर खुसरो के किस ग्रंथ में रणथंभौर दुर्ग के साके (1301 ई.) का आंखों देखा विवरण मिलता है और उन्होंने किले के पतन पर क्या कहा था?
- उत्तर: अमीर खुसरो के प्रसिद्ध ग्रंथ ‘खजाइनुल फुतूह’ (तारीख-ए-इलाही) में इसका विस्तृत विवरण मिलता है। किले के पतन और हम्मीर देव की मृत्यु पर खुसरो ने कहा था: “आज कुफ्र का गढ़ इस्लाम का घर हो गया।”
प्रश्न 2: रणथंभौर दुर्ग के पतन के लिए उत्तरदायी दो प्रमुख विश्वासघाती कौन थे और सुल्तान ने उनके साथ क्या किया?
- उत्तर: वे दो मंत्री रणमल और रतिपाल थे। उन्होंने सोने और दुर्ग के लालच में आकर गुप्त रास्ते तुर्कों को बता दिए थे। युद्ध के बाद अलाउद्दीन ने उनकी हत्या करवा दी क्योंकि जो अपने देश के न हुए, वे सल्तनत के भी वफादार नहीं हो सकते थे।
प्रश्न 3: “सिंह सवन सत्पुरुष वचन…” यह सुप्रसिद्ध ऐतिहासिक दोहा राजा हम्मीर के किस गुण को प्रदर्शित करता है और इसके रचयिता कौन हैं?
- उत्तर: यह दोहा हम्मीर देव के अटूट हठ और शरणागत की रक्षा के संकल्प को प्रदर्शित करता है। इस हठ का विस्तृत वर्णन कवि चंद्रशेखर द्वारा रचित ग्रंथ ‘हम्मीर हठ’ में मिलता है।
📚 प्रामाणिक संदर्भ एवं स्रोत (References & E-E-A-T Seal)
- नयनचंद्र सूरी कृत ‘हम्मीर महाकाव्य’ (मूल ऐतिहासिक अनुवाद)
- राजस्थान राज्य पाठ्यपुस्तक मंडल, कक्षा 9 व 10 (राजस्थान का सामान्य अध्ययन एवं इतिहास)
- डॉ. हरिमोहन सक्सेना, “राजस्थान का प्रादेशिक भूगोल एवं इतिहास” (प्रामाणिक संदर्भ)
- RPSC RAS, राजस्थान पुलिस सब-इंस्पेक्टर और CET परीक्षाओं के विगत 15 वर्षों के हल प्रश्नपत्रों का प्रामाणिक संकलन।
- तथ्य जाँच एवं संपादन: सुयोग अकादमी संपादकीय टीम (सुधीर ढाका – BSc-BEd, योगेश जांगिड़)।
📚 चौहान राजवंश: संपूर्ण अध्याय क्रमानुसार पढ़ें
RPSC & RSMSSB परीक्षा के नए सिलेबस के अनुसार नीचे दिए गए कड़ियों (Links) पर क्लिक करके चौहान वंश की सभी शाखाओं के विस्तृत नोट्स पढ़ें:


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