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राजस्थान इतिहास

पृथ्वीराज चौहान का जीवन, युद्ध और इतिहास: जन्म से तराइन के द्वितीय युद्ध तक

Sudhir Dhaka (इतिहास विशेषज्ञ)
2 सितंबर 2026
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पृथ्वीराज चौहान का जीवन, युद्ध और इतिहास: जन्म से तराइन के द्वितीय युद्ध तक

सुयोग AI गुरु

नोट्स के मुख्य बिंदु, मॉक MCQ या डाउट पूछें

पृथ्वीराज चौहान (पृथ्वीराज तृतीय) चौहान या चाहमान वंश के सबसे प्रसिद्ध शासकों में से एक थे। उनका शासन मुख्यतः अजमेर और दिल्ली के राजनीतिक क्षेत्र से जुड़ा था और 12वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में उन्होंने उत्तर भारत की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

उनका इतिहास केवल तराइन के दो युद्धों तक सीमित नहीं है। उनके शासनकाल में चंदेलों के विरुद्ध महोबा अभियान, गुजरात के चालुक्य शासक से संघर्ष, भड़ानकों के विरुद्ध अभियान और आंतरिक सत्ता-संघर्ष भी महत्वपूर्ण थे।

पृथ्वीराज के जीवन के संबंध में एक महत्वपूर्ण बात यह है कि ऐतिहासिक स्रोत और बाद की लोक-परंपराएँ एक जैसी जानकारी नहीं देतीं। जयानक का पृथ्वीराजविजय अपेक्षाकृत निकटवर्ती स्रोत है, जबकि पृथ्वीराज रासो में बाद की वीरगाथात्मक परंपराओं और किंवदंतियों का बड़ा प्रभाव दिखाई देता है। इसलिए RPSC/RAS की तैयारी में दोनों को अलग-अलग समझना जरूरी है। (Egyankosh)


Quick Answer Box: पृथ्वीराज चौहान एक नजर में

बिंदु

जानकारी

पूरा नाम

पृथ्वीराज तृतीय

वंश

चौहान/चाहमान

प्रमुख सत्ता केंद्र

अजमेर और दिल्ली

पिता

सोमेश्वर

माता

कर्पूरदेवी

प्रमुख समकालीन प्रतिद्वंद्वी

मुहम्मद गौरी

चंदेल संघर्ष

लगभग 1182 ई.

गुजरात से संघर्ष

12वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में

तराइन का प्रथम युद्ध

1191 ई.

तराइन का द्वितीय युद्ध

1192 ई.

प्रथम तराइन का परिणाम

पृथ्वीराज की विजय

द्वितीय तराइन का परिणाम

पृथ्वीराज की पराजय

प्रमुख साहित्यिक स्रोत

पृथ्वीराजविजय, पृथ्वीराज रासो, हम्मीर महाकाव्य

ऐतिहासिक महत्व

उत्तर भारत में घुरिद सत्ता के विस्तार का महत्वपूर्ण चरण

Exam Fact: पृथ्वीराज तृतीय को मुस्लिम इतिहासकारों के लेखन में राय पिथौरा नाम से भी संबोधित किया गया है। (IGNCA)


1. चौहान वंश की पृष्ठभूमि

पृथ्वीराज चौहान को समझने के लिए पहले चौहान वंश की राजनीतिक पृष्ठभूमि समझना आवश्यक है।

चौहान या चाहमानों का प्रारंभिक राजनीतिक केंद्र शाकंभरी (सांभर क्षेत्र) था। बाद में इस वंश की शक्ति अजमेर तक पहुँची और अजमेर उत्तर भारत की राजनीति का महत्वपूर्ण केंद्र बन गया।

Suyog Academy पर चौहान वंश की उत्पत्ति, शाकंभरी के प्रारंभिक शासकों, अजमेर के विकास तथा चौहान वंश की राजनीतिक शक्ति का विस्तृत अध्ययन उपलब्ध है।

चौहान राजवंश का विस्तृत इतिहास पढ़ें

प्रमुख चौहान शासकों की क्रमिक पृष्ठभूमि

वासुदेव → गुवक → विग्रहराज द्वितीय → अजयराज → अर्णोराज → विग्रहराज चतुर्थ → सोमेश्वर → पृथ्वीराज तृतीय

इनमें विशेष रूप से विग्रहराज चतुर्थ का महत्व है। उन्होंने चौहान शक्ति को दिल्ली क्षेत्र तक विस्तार दिया। इसलिए पृथ्वीराज के समय अजमेर-दिल्ली संबंध को समझने के लिए विग्रहराज चतुर्थ का शासन महत्वपूर्ण है।


2. पृथ्वीराज चौहान का परिवार और वंश

पृथ्वीराज तृतीय के पिता सोमेश्वर थे। सोमेश्वर चौहान वंश के शासक थे और उनका संबंध गुजरात के चालुक्य दरबार से भी रहा था।

पृथ्वीराज की माता का नाम कर्पूरदेवी बताया जाता है। उनके संबंध और पृथ्वीराज के जन्म से जुड़े विवरणों में बाद के ग्रंथों और परंपराओं में अंतर मिलता है। पृथ्वीराजविजय कर्पूरदेवी को पृथ्वीराज की माता के रूप में प्रस्तुत करता है। (Rare Book Society of India)

पृथ्वीराज के परिवार में उनके छोटे भाई हरिराज का भी महत्वपूर्ण स्थान था। पृथ्वीराज की मृत्यु के बाद चौहान सत्ता के संघर्ष में हरिराज की भूमिका सामने आती है।

परिवार से जुड़े Exam Facts

  • पिता → सोमेश्वर

  • माता → कर्पूरदेवी

  • वंश → चाहमान/चौहान

  • प्रमुख राजनीतिक केंद्र → अजमेर और दिल्ली

  • उत्तराधिकारी संघर्ष में महत्वपूर्ण व्यक्ति → हरिराज


3. पृथ्वीराज चौहान का जन्म

पृथ्वीराज के जन्म-वर्ष को लेकर स्रोतों में मतभेद मिलता है। बाद की रासो परंपरा और आधुनिक ऐतिहासिक पुनर्निर्माण में अंतर है।

इसीलिए परीक्षा में केवल एक जन्म-वर्ष को बिना स्रोत के अंतिम सत्य मानना उचित नहीं है।

कुछ आधुनिक ऐतिहासिक अध्ययनों में उनका जन्म लगभग 1160 के दशक में माना गया है। एक पुराने ऐतिहासिक अध्ययन में 1160 ई. या उसके आसपास का अनुमान दिया गया है और यह भी बताया गया है कि पिता सोमेश्वर की मृत्यु के समय पृथ्वीराज अभी अल्पवयस्क थे। (Rare Book Society of India)

Exam Trap

पृथ्वीराज की जन्मतिथि को लेकर स्रोत-भेद है।

इसलिए RPSC/RAS में यदि किसी प्रश्न में जन्म-वर्ष पूछा जाए तो प्रश्न के विकल्प और प्रयुक्त स्रोत को ध्यान से देखना चाहिए।


4. राज्यारोहण

सोमेश्वर की मृत्यु के बाद पृथ्वीराज तृतीय चौहान सत्ता के शासक बने। उस समय वे अपेक्षाकृत कम आयु के थे, इसलिए प्रारंभिक शासन में उनकी माता कर्पूरदेवी की भूमिका महत्वपूर्ण रही।

पृथ्वीराज का शासनकाल लगभग 1170 के दशक के उत्तरार्ध से 1192 ई. तक माना जाता है।

उनका शासनकाल राजनीतिक रूप से आसान नहीं था। उन्हें एक साथ:

  • आंतरिक सामंतों और प्रतिद्वंद्वियों,

  • पड़ोसी राजपूत शक्तियों,

  • चंदेलों,

  • गुजरात के चालुक्यों,

  • तथा अंततः घुरिद आक्रमणों

का सामना करना पड़ा।


5. अजमेर और दिल्ली पर चौहान सत्ता

पृथ्वीराज के समय चौहान सत्ता का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक क्षेत्र अजमेर-दिल्ली था।

यह समझना जरूरी है कि दिल्ली पर चौहान प्रभाव पृथ्वीराज से अचानक शुरू नहीं हुआ था। विग्रहराज चतुर्थ के समय चौहान शक्ति पहले ही दिल्ली क्षेत्र में मजबूत हो चुकी थी।

दिल्ली के लौह स्तंभ से जुड़े अभिलेखीय प्रमाणों से विग्रहराज चतुर्थ के दिल्ली पर अधिकार का संकेत मिलता है। (IGNCA)

इसलिए परीक्षा के लिए क्रम याद रखें:

शाकंभरी → अजमेर → दिल्ली क्षेत्र में चौहान विस्तार → पृथ्वीराज के समय अजमेर-दिल्ली की संयुक्त राजनीतिक शक्ति


6. पृथ्वीराज की प्रारंभिक चुनौतियाँ

पृथ्वीराज के शासनकाल में केवल विदेशी आक्रमण ही समस्या नहीं थे। उन्हें अपने ही राजनीतिक क्षेत्र में विरोध का सामना करना पड़ा।

इनमें नागार्जुन का विद्रोह उल्लेखनीय है। इसके बाद पृथ्वीराज ने अपनी सैन्य शक्ति को मजबूत किया और आसपास के क्षेत्रों में अभियान चलाए।

उनके विस्तारवादी अभियानों का उद्देश्य केवल क्षेत्र-विस्तार नहीं था। अजमेर-दिल्ली क्षेत्र की सुरक्षा के लिए आसपास के सामरिक क्षेत्रों पर नियंत्रण भी आवश्यक था।


7. भड़ानकों के विरुद्ध अभियान

पृथ्वीराज के शासनकाल के प्रारंभिक महत्वपूर्ण अभियानों में भड़ानकों के विरुद्ध संघर्ष का उल्लेख मिलता है।

भड़ानक शक्ति का प्रभाव वर्तमान हरियाणा और राजस्थान के कुछ सीमावर्ती क्षेत्रों से जोड़ा जाता है।

उनके विरुद्ध अभियान ने चौहान राज्य की पूर्वोत्तर सीमा को मजबूत करने में मदद की।

Exam Fact

पृथ्वीराज के सैन्य अभियानों में भड़ानकों के विरुद्ध संघर्ष भी महत्वपूर्ण था।


8. चंदेल संघर्ष और महोबा अभियान

पृथ्वीराज के प्रमुख राजपूत संघर्षों में चंदेल शासक परमर्दिदेव (परमाल) के विरुद्ध अभियान सबसे प्रसिद्ध है।

चंदेल राज्य का प्रमुख क्षेत्र जेजाकभुक्ति (बुंदेलखंड) था और महोबा इसका महत्वपूर्ण केंद्र था।

लगभग 1182 ई. में पृथ्वीराज ने चंदेल क्षेत्र की ओर अभियान किया।

मदनपुर अभिलेखों से पृथ्वीराज के चंदेल शासक परमर्दिदेव के विरुद्ध अभियान का महत्वपूर्ण प्रमाण मिलता है। (Jatland)

आल्हा-ऊदल की परंपरा

महोबा के संघर्ष से आल्हा और ऊदल की वीरगाथाएँ भी जुड़ी हुई हैं।

लोकप्रिय परंपरा में आल्हा-ऊदल को चंदेल पक्ष के प्रमुख योद्धाओं के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। लेकिन लोकगाथा और अभिलेखीय इतिहास को एक ही स्तर का स्रोत नहीं माना जाना चाहिए।

Exam Trap

आल्हा-ऊदल की कहानी = लोक/वीरगाथा परंपरा
मदनपुर अभिलेख = ऐतिहासिक/अभिलेखीय प्रमाण

पृथ्वीराज ने महोबा पर विजय प्राप्त की, लेकिन चंदेल राज्य को स्थायी रूप से अपने साम्राज्य में शामिल करने की स्थिति लंबे समय तक नहीं रही। (IGNCA)


9. गुजरात के चालुक्यों से संघर्ष

पृथ्वीराज का एक अन्य महत्वपूर्ण संघर्ष गुजरात के चालुक्य/सोलंकी शासकों से जुड़ा था।

उस समय गुजरात में भीम द्वितीय का शासन था।

पृथ्वीराज और गुजरात की शक्ति के बीच संघर्ष को लेकर स्रोतों में अलग-अलग विवरण मिलते हैं। समकालीन और बाद के साहित्यिक स्रोतों में इस घटना की व्याख्या समान नहीं है।

भारतीय पुरातत्व एवं इतिहास संबंधी स्रोतों में पृथ्वीराज और गुजरात के चालुक्य शासक भीम द्वितीय के बीच संभावित संघर्ष का उल्लेख मिलता है। (IGNCA)

परीक्षा के लिए

गुजरात → चालुक्य/सोलंकी → भीम द्वितीय

इस संबंध को पृथ्वीराज के राजनीतिक इतिहास के साथ जोड़कर याद करें।


10. मुहम्मद गौरी और चौहान संघर्ष की शुरुआत

12वीं शताब्दी के अंतिम दशकों में उत्तर-पश्चिम भारत की राजनीति तेजी से बदल रही थी।

शिहाबुद्दीन मुहम्मद गौरी, जिसे सामान्यतः मुहम्मद गौरी कहा जाता है, उत्तर भारत में अपनी शक्ति का विस्तार कर रहा था।

गौरी के लिए पंजाब और उसके आसपास के क्षेत्र उत्तर भारत में आगे बढ़ने का आधार बन रहे थे।

दूसरी ओर पृथ्वीराज के नियंत्रण में अजमेर-दिल्ली क्षेत्र था।

इस प्रकार दोनों शक्तियों के बीच टकराव लगभग अपरिहार्य हो गया।


11. तराइन का प्रथम युद्ध, 1191 ई.

युद्ध की पृष्ठभूमि

मुहम्मद गौरी ने उत्तर भारत में अपनी स्थिति मजबूत करने के बाद चौहान शक्ति को चुनौती दी।

पृथ्वीराज और गौरी की सेनाएँ तराइन के मैदान में आमने-सामने आईं।

तराइन का मैदान वर्तमान हरियाणा के तरावड़ी/तराइन क्षेत्र से संबंधित माना जाता है।

युद्ध का परिणाम

1191 ई. के प्रथम तराइन युद्ध में पृथ्वीराज की विजय हुई।

युद्ध में गौरी की सेना को भारी नुकसान हुआ और स्वयं मुहम्मद गौरी घायल हुआ।

चौहान पक्ष की विजय के पीछे उसकी सैन्य शक्ति के साथ उसके प्रमुख सामंतों और सहयोगी राजाओं की भूमिका थी।

समकालीन स्रोतों और बाद के इतिहासकारों के विवरण में प्रथम तराइन में गौरी की पराजय और उसके कठिनाई से बच निकलने का उल्लेख मिलता है। (IGNCA)


12. प्रथम तराइन के बाद क्या हुआ?

यहीं पृथ्वीराज के इतिहास का एक महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आता है।

यदि पृथ्वीराज ने गौरी को हरा दिया था, तो वह दोबारा इतनी बड़ी शक्ति के साथ भारत क्यों लौट सका?

इस विषय में इतिहासकारों के बीच चर्चा रही है।

लोकप्रिय परंपराएँ पृथ्वीराज को अत्यधिक उदार बताते हुए कहती हैं कि उन्होंने गौरी को छोड़ दिया। लेकिन इस घटना का लोकप्रिय संस्करण बाद के साहित्य से अधिक जुड़ा हुआ है और इसे सीधे समकालीन ऐतिहासिक तथ्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए।

परीक्षा में सुरक्षित तथ्य यह है:

1191 ई. में प्रथम तराइन युद्ध में पृथ्वीराज ने मुहम्मद गौरी को पराजित किया।


13. तराइन का द्वितीय युद्ध, 1192 ई.

पहली हार के बाद मुहम्मद गौरी ने अपनी सैन्य रणनीति बदली और अगले वर्ष फिर भारत आया।

1192 ई. में तराइन के मैदान में दूसरा युद्ध हुआ।

इस बार परिणाम पूरी तरह अलग रहा।

प्रमुख कारण

घुरिद सेना की:

  • तेज घुड़सवार सेना,

  • गतिशील युद्ध-रणनीति,

  • तीरंदाजी,

  • अनुशासित सैन्य संचालन

ने राजपूत सेना के सामने बड़ी चुनौती पैदा की।

द्वितीय तराइन युद्ध में पृथ्वीराज की सेना पराजित हुई।

यह युद्ध उत्तर भारत के राजनीतिक इतिहास में महत्वपूर्ण मोड़ माना जाता है क्योंकि इसके बाद घुरिद शक्ति के लिए दिल्ली और अजमेर क्षेत्र में राजनीतिक विस्तार का मार्ग खुला। (IGNCA)


14. तराइन I बनाम तराइन II

आधार

प्रथम तराइन

द्वितीय तराइन

वर्ष

1191 ई.

1192 ई.

पक्ष

पृथ्वीराज बनाम गौरी

पृथ्वीराज बनाम गौरी

परिणाम

पृथ्वीराज की विजय

गौरी की विजय

गौरी की स्थिति

घायल होकर पीछे हटा

विजयी

ऐतिहासिक प्रभाव

घुरिद विस्तार को अस्थायी रोक

उत्तर भारत में घुरिद सत्ता के विस्तार का मार्ग

पृथ्वीराज

विजयी

पराजित और बंदी

सबसे महत्वपूर्ण Exam Fact

तराइन प्रथम = 1191 = पृथ्वीराज की विजय
तराइन द्वितीय = 1192 = गौरी की विजय


15. पृथ्वीराज की मृत्यु: इतिहास बनाम किंवदंती

पृथ्वीराज की मृत्यु से संबंधित सबसे अधिक भ्रम तराइन के द्वितीय युद्ध के बाद की घटनाओं में दिखाई देता है।

मत 1: मुस्लिम इतिहासकारों का विवरण

कुछ मुस्लिम ऐतिहासिक स्रोतों में पृथ्वीराज की गिरफ्तारी और मृत्यु का उल्लेख मिलता है। ताज-उल-मआसिर से संबंधित विवरण में पृथ्वीराज की गिरफ्तारी और मृत्यु का उल्लेख मिलता है। (LBSNAA)

मत 2: पृथ्वीराज रासो की कथा

पृथ्वीराज रासो की लोकप्रिय परंपरा के अनुसार पृथ्वीराज को गजनी ले जाया गया, उन्हें अंधा कर दिया गया और बाद में चंदबरदाई की सहायता से उन्होंने शब्दभेदी बाण द्वारा मुहम्मद गौरी को मार दिया।

यह कथा भारतीय लोक-स्मृति में अत्यंत लोकप्रिय है।

लेकिन इसे समकालीन ऐतिहासिक तथ्य मानने में सावधानी आवश्यक है।

इतिहास की दृष्टि से महत्वपूर्ण बात

पृथ्वीराजविजय में द्वितीय तराइन की पराजय का वर्णन नहीं मिलता, क्योंकि इसकी रचना पृथ्वीराज के जीवनकाल के आसपास हुई मानी जाती है। दूसरी ओर रासो बाद की वीरगाथात्मक परंपरा से जुड़ा ग्रंथ है। (राजस्थान हिस्ट्री)

इसलिए:

“पृथ्वीराज ने शब्दभेदी बाण से गौरी को मार दिया” को ऐतिहासिक रूप से निर्विवाद तथ्य नहीं माना जाना चाहिए।


16. साहित्यिक स्रोत: पृथ्वीराज का इतिहास कहाँ से मिलता है?

पृथ्वीराज के इतिहास को समझने के लिए कई प्रकार के स्रोतों का उपयोग किया जाता है।

प्रमुख स्रोत

  1. पृथ्वीराजविजय

  2. पृथ्वीराज रासो

  3. हम्मीर महाकाव्य

  4. फारसी/मुस्लिम इतिहास ग्रंथ

  5. अभिलेख

  6. सिक्के

  7. बाद की प्रबंध साहित्य परंपरा

इनमें से प्रत्येक की ऐतिहासिक उपयोगिता अलग है।


17. पृथ्वीराज विजय बनाम पृथ्वीराज रासो

यह तुलना RPSC/RAS के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

आधार

पृथ्वीराजविजय

पृथ्वीराज रासो

भाषा

संस्कृत

प्रारंभिक हिंदी/ब्रज-राजस्थानी परंपरा से संबंधित

लेखक

जयानक

परंपरा में चंदबरदाई

समय

12वीं शताब्दी के अंत के निकट

वर्तमान रूप बाद की परंपराओं से विकसित

प्रकृति

ऐतिहासिक महाकाव्य

वीरगाथात्मक महाकाव्य

पृथ्वीराज के समय से निकटता

अधिक

कम

ऐतिहासिक उपयोगिता

अपेक्षाकृत अधिक

सावधानी से उपयोग

संयोगिता कथा

स्पष्ट लोकप्रिय रूप में नहीं

प्रमुख कथा

गौरी-वध की कथा

नहीं

प्रसिद्ध कथा

तराइन II

उपलब्ध अंशों में वर्णन नहीं

बाद की कथा में महत्वपूर्ण

पृथ्वीराजविजय का महत्व इसलिए अधिक है क्योंकि यह पृथ्वीराज के समय के आसपास रचा गया साहित्यिक स्रोत माना जाता है और इसमें चौहान वंश की वंशावली तथा पृथ्वीराज के अभियानों की जानकारी मिलती है। (राजस्थान हिस्ट्री)


18. संयोगिता की कहानी कितनी ऐतिहासिक है?

पृथ्वीराज और संयोगिता की प्रेम-कथा भारतीय लोक-साहित्य की सबसे प्रसिद्ध मध्यकालीन कथाओं में से एक है।

लोकप्रिय कहानी के अनुसार संयोगिता कन्नौज के शासक जयचंद की पुत्री थीं। स्वयंवर में पृथ्वीराज उन्हें लेकर चले गए।

लेकिन ऐतिहासिक दृष्टि से यह कथा विवादित है।

पृथ्वीराज के समय के निकट माने जाने वाले पृथ्वीराजविजय में इस लोकप्रिय स्वयंवर-अपहरण कथा का स्पष्ट विवरण नहीं मिलता। इसी प्रकार कुछ अन्य अपेक्षाकृत बाद के स्रोत भी इस घटना को अलग तरीके से प्रस्तुत करते हैं। (Rare Book Society of India)

Exam Trap

संयोगिता स्वयंवर और पृथ्वीराज द्वारा उसका अपहरण = लोकप्रिय रासो परंपरा

इसे शिलालेखीय रूप से सिद्ध घटना के रूप में प्रस्तुत नहीं करना चाहिए।


19. पृथ्वीराज की साहित्यिक और सांस्कृतिक छवि

पृथ्वीराज केवल युद्धों के कारण प्रसिद्ध नहीं हुए। उनके दरबार को साहित्यिक संरक्षण के लिए भी जाना जाता है।

उनसे संबंधित साहित्यिक परंपरा में जयानक का विशेष महत्व है, जिन्होंने पृथ्वीराजविजय की रचना की।

पृथ्वीराज के पूर्ववर्ती चौहान शासकों की तरह उनके शासनकाल में भी संस्कृत साहित्य और विद्वानों को संरक्षण मिला।

यहां एक सावधानी जरूरी है। बाद की साहित्यिक परंपराओं में पृथ्वीराज के दरबार से जुड़े विद्वानों की संख्या और उनकी भूमिकाओं के बारे में कई दावे मिलते हैं, लेकिन सभी दावों को समान ऐतिहासिक प्रमाण प्राप्त नहीं हैं।


20. पृथ्वीराज का ऐतिहासिक महत्व

पृथ्वीराज चौहान का महत्व तीन स्तरों पर समझा जा सकता है।

1. चौहान सत्ता के अंतिम प्रमुख शासक

वे शाकंभरी-अजमेर चौहान शक्ति के सबसे प्रसिद्ध शासकों में थे और उनके शासन के साथ इस शाखा की स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति का एक महत्वपूर्ण चरण समाप्त हुआ।

2. उत्तर भारत की शक्ति-संरचना

अजमेर और दिल्ली पर उनका नियंत्रण उन्हें उत्तर भारत की राजनीति में महत्वपूर्ण बनाता था।

3. तराइन के युद्ध

1191 और 1192 के युद्धों ने पृथ्वीराज को भारतीय इतिहास के सबसे चर्चित मध्यकालीन शासकों में शामिल कर दिया।

ब्रिटिश म्यूज़ियम भी पृथ्वीराज तृतीय को शाकंभरी के चौहान वंश का अंतिम शासक बताते हुए अजमेर और दिल्ली से जोड़ता है तथा 1192 में घुरिद आक्रमण के दौरान उनकी मृत्यु का उल्लेख करता है। (British Museum)


21. पृथ्वीराज के बाद चौहान सत्ता

1192 के बाद चौहान सत्ता पूरी तरह तत्काल समाप्त नहीं हुई।

गौरी ने अजमेर क्षेत्र पर अपना प्रभाव स्थापित किया और पृथ्वीराज के पुत्र गोविंदराज को अधीनस्थ शासक के रूप में स्थापित करने की परंपरा मिलती है।

इसके बाद चौहान सत्ता की अलग-अलग शाखाएँ सामने आईं।

इसी क्रम में आगे चलकर रणथंभौर के चौहान और बाद में जालौर के सोनगरा चौहान राजस्थान के इतिहास में महत्वपूर्ण बने।

रणथंभौर के चौहान और हम्मीर देव का इतिहास पढ़ें

जालौर के सोनगरा चौहान का इतिहास पढ़ें

ध्यान दें: पृथ्वीराज की पराजय के बाद चौहान राजनीतिक परंपरा समाप्त नहीं हुई। उसकी विभिन्न शाखाएँ राजस्थान के अलग-अलग क्षेत्रों में आगे भी प्रभावशाली रहीं।


22. पृथ्वीराज चौहान की पूरी Timeline

वर्ष/काल

घटना

12वीं शताब्दी

पृथ्वीराज का जन्म

लगभग 1170 के दशक

सोमेश्वर के बाद राज्यारोहण

प्रारंभिक शासन

कर्पूरदेवी की संरक्षक भूमिका

प्रारंभिक अभियान

आंतरिक विरोध और भड़ानकों के विरुद्ध कार्रवाई

लगभग 1182

चंदेल शासक परमर्दिदेव के विरुद्ध महोबा अभियान

12वीं शताब्दी का उत्तरार्ध

गुजरात के चालुक्यों से संघर्ष

1191

तराइन का प्रथम युद्ध

1191

मुहम्मद गौरी की पराजय

1192

तराइन का द्वितीय युद्ध

1192

पृथ्वीराज की पराजय

1192 के बाद

चौहान सत्ता का पुनर्गठन और अधीनस्थ शासन

बाद का काल

रणथंभौर और जालौर जैसी चौहान शाखाओं का विकास


23. RPSC/RAS/CET के लिए सबसे महत्वपूर्ण Facts

🔴 Fact 1

पृथ्वीराज चौहान = पृथ्वीराज तृतीय

🔴 Fact 2

वंश = चौहान/चाहमान

🔴 Fact 3

पिता = सोमेश्वर

🔴 Fact 4

माता = कर्पूरदेवी

🔴 Fact 5

प्रमुख सत्ता केंद्र = अजमेर और दिल्ली

🔴 Fact 6

चंदेल शासक = परमर्दिदेव/परमाल

🔴 Fact 7

चंदेल संघर्ष = लगभग 1182 ई.

🔴 Fact 8

महोबा = चंदेल संघर्ष से संबंधित प्रमुख केंद्र

🔴 Fact 9

गुजरात का समकालीन शासक = भीम द्वितीय

🔴 Fact 10

प्रथम तराइन युद्ध = 1191 ई.

🔴 Fact 11

प्रथम तराइन = पृथ्वीराज की विजय

🔴 Fact 12

द्वितीय तराइन = 1192 ई.

🔴 Fact 13

द्वितीय तराइन = गौरी की विजय

🔴 Fact 14

पृथ्वीराजविजय = जयानक से संबंधित ग्रंथ

🔴 Fact 15

पृथ्वीराज रासो = चंदबरदाई की परंपरा से संबंधित

🔴 Fact 16

पृथ्वीराज की मृत्यु के विवरणों में स्रोत-भेद है।

🔴 Fact 17

शब्दभेदी बाण से गौरी-वध = रासो की लोकप्रिय कथा, निर्विवाद ऐतिहासिक तथ्य नहीं।

🔴 Fact 18

संयोगिता स्वयंवर की लोकप्रिय कथा का प्रमुख आधार बाद की रासो परंपरा है।


24. Exam Trap: इन गलतियों से बचें

❌ गलती: पृथ्वीराज ने भारत पर मुस्लिम शासन को हमेशा के लिए रोक दिया।

सही: 1191 में उन्होंने गौरी को हराया, लेकिन 1192 में गौरी ने उन्हें पराजित किया।


❌ गलती: पृथ्वीराज ने 1192 के बाद गौरी को शब्दभेदी बाण से मार दिया।

सही: यह पृथ्वीराज रासो की प्रसिद्ध कथा है। इसे समकालीन ऐतिहासिक प्रमाण से सिद्ध घटना नहीं माना जाता।


❌ गलती: संयोगिता की कहानी पूरी तरह ऐतिहासिक रूप से सिद्ध है।

सही: यह मुख्यतः बाद की वीरगाथात्मक परंपरा से प्रसिद्ध हुई और इसके ऐतिहासिक आधार पर मतभेद हैं।


❌ गलती: पृथ्वीराज ने पहली बार दिल्ली पर अधिकार किया।

सही: चौहान सत्ता का दिल्ली से संबंध पृथ्वीराज से पहले, विशेषकर विग्रहराज चतुर्थ के समय मजबूत हो चुका था। (Rare Book Society of India)


❌ गलती: चौहान वंश पृथ्वीराज की मृत्यु के साथ पूरी तरह समाप्त हो गया।

सही: बाद में रणथंभौर और जालौर जैसी चौहान शाखाएँ राजस्थान के इतिहास में महत्वपूर्ण बनीं।


25. RPSC/RAS के लिए One-Liner Revision

चौहान → शाकंभरी → अजमेर → दिल्ली → पृथ्वीराज III → महोबा → गुजरात → तराइन I (1191) → तराइन II (1192)

और स्रोतों के लिए:

जयानक → पृथ्वीराजविजय → अपेक्षाकृत समकालीन स्रोत

चंदबरदाई → पृथ्वीराज रासो → वीरगाथात्मक परंपरा

मदनपुर अभिलेख → चंदेल संघर्ष का महत्वपूर्ण प्रमाण (Jatland)


26. Suyog Academy पर संबंधित नोट्स

पृथ्वीराज चौहान को केवल एक अलग शासक के रूप में पढ़ने के बजाय चौहान वंश के पूरे राजनीतिक विकास के साथ पढ़ना अधिक उपयोगी है।

📚 संबंधित अध्ययन


निष्कर्ष

पृथ्वीराज चौहान का इतिहास केवल एक वीर राजा और दो युद्धों की कहानी नहीं है। वे शाकंभरी-अजमेर चौहान राजनीतिक परंपरा के प्रमुख शासक, अजमेर-दिल्ली की शक्ति-संरचना के प्रतिनिधि और 12वीं शताब्दी के उत्तर भारत के महत्वपूर्ण राजनीतिक पात्र थे।

उनके शासनकाल में चंदेलों और गुजरात की शक्तियों से संघर्ष हुआ तथा अंततः मुहम्मद गौरी के साथ तराइन के दो निर्णायक युद्ध हुए। 1191 का प्रथम तराइन युद्ध पृथ्वीराज की विजय और 1192 का द्वितीय तराइन युद्ध उनकी पराजय का प्रतीक है।

उनके जीवन को समझते समय सबसे जरूरी बात है कि इतिहास और लोककथा को अलग रखा जाएपृथ्वीराजविजय, अभिलेख और मुस्लिम इतिहास-ग्रंथ जहां अपेक्षाकृत ऐतिहासिक पुनर्निर्माण में मदद करते हैं, वहीं पृथ्वीराज रासो ने पृथ्वीराज की वीरगाथात्मक छवि को अत्यधिक लोकप्रिय बनाया। (राजस्थान हिस्ट्री)

राजस्थान की प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए इसलिए पृथ्वीराज चौहान को इस क्रम में याद करना सबसे उपयोगी है:

वंश → परिवार → राज्यारोहण → अजमेर-दिल्ली → भड़ानक → चंदेल/महोबा → गुजरात → तराइन I → तराइन II → मृत्यु के विभिन्न मत → साहित्यिक स्रोत।

अंतिम संशोधन (Last Updated): 2 सितंबर 2026
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लेखक / पब्लिकेशन: Gauri Publication

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🎯 विगत वर्षों के प्रश्न (Interactive PYQs)

Q1. पृथ्वीराज तृतीय किस वंश से संबंधित थे?

RAS 2018

Q2. पृथ्वीराज चौहान के पिता कौन थे?

REET 2022

Q3. प्रथम तराइन युद्ध किस वर्ष हुआ था?

RPSC 2016

Q4. द्वितीय तराइन युद्ध का प्रमुख परिणाम क्या था?

RAS 2021

Q5. पृथ्वीराज चौहान का चंदेल शासक परमर्दिदेव से संघर्ष मुख्यतः किस क्षेत्र से संबंधित था?

RPSC 2019

Q6. पृथ्वीराजविजय की रचना किससे संबंधित मानी जाती है?

RAS 2017

Q7. पृथ्वीराज रासो की परंपरागत रूप से रचना किस कवि से जोड़ी जाती है?

CET 2024

Q8. पृथ्वीराज चौहान के समय गुजरात में कौन-सा शासक सत्ता में था?

RAS 2020

Q9. तराइन के प्रथम युद्ध में किसकी विजय हुई थी?

RPSC 2015

Q10. शब्दभेदी बाण से मुहम्मद गौरी को मारने की प्रसिद्ध कथा मुख्यतः किस ग्रंथ की परंपरा से जुड़ी है?

CET 2023

महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

पृथ्वीराज तृतीय चौहान या चाहमान वंश के प्रमुख शासक थे। उनका राजनीतिक केंद्र अजमेर और दिल्ली क्षेत्र था।

पृथ्वीराज चौहान के पिता सोमेश्वर थे। उनकी माता का नाम कर्पूरदेवी बताया जाता है।

सोमेश्वर की मृत्यु के बाद पृथ्वीराज तृतीय चौहान सत्ता में आए। उनके प्रारंभिक शासन में उनकी माता कर्पूरदेवी की संरक्षक भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है।

लगभग 1182 ई. में पृथ्वीराज ने चंदेल शासक परमर्दिदेव के विरुद्ध महोबा क्षेत्र में अभियान चलाया था।

पृथ्वीराज के समय गुजरात में चालुक्य या सोलंकी शासक भीम द्वितीय था। दोनों शक्तियों के बीच संघर्ष का उल्लेख विभिन्न ऐतिहासिक स्रोतों में मिलता है।

प्रथम तराइन युद्ध 1191 ई. में पृथ्वीराज चौहान और मुहम्मद गौरी के बीच हुआ था। इसमें पृथ्वीराज की विजय हुई।

1192 ई. के द्वितीय तराइन युद्ध में मुहम्मद गौरी की विजय हुई और पृथ्वीराज चौहान पराजित हुए।

पृथ्वीराजविजय जयानक से संबंधित संस्कृत महाकाव्य है और पृथ्वीराज के समय के निकट का महत्वपूर्ण स्रोत माना जाता है। पृथ्वीराज रासो चंदबरदाई की परंपरा से जुड़ा वीरगाथात्मक ग्रंथ है, जिसके वर्तमान रूप में बाद की सामग्री भी मानी जाती है।

यह प्रसिद्ध कथा पृथ्वीराज रासो की परंपरा से जुड़ी है। उपलब्ध ऐतिहासिक स्रोतों के आधार पर इसे निर्विवाद ऐतिहासिक तथ्य नहीं माना जाता।

तराइन के द्वितीय युद्ध के बाद पृथ्वीराज की गिरफ्तारी और मृत्यु के विवरण विभिन्न स्रोतों में अलग-अलग मिलते हैं। इसलिए उनकी मृत्यु की परिस्थितियों के बारे में स्रोत-भेद को ध्यान में रखना चाहिए।

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