करणी माता: राजस्थान की लोकदेवी — इतिहास, चमत्कार और आस्था का प्रतीक

प्रस्तावना
राजस्थान की धरती को लोकदेवताओं और लोकदेवियों की धरती कहा जाता है। यहाँ की मिट्टी में शौर्य, त्याग और करुणा की जो कहानियाँ रची-बसी हैं, उनमें करणी माता का नाम सबसे श्रद्धेय नामों में गिना जाता है। बीकानेर से लगभग 30-33 किलोमीटर दूर स्थित देशनोक कस्बे में उनका विश्व-प्रसिद्ध मंदिर है, जिसे "चूहों का मंदिर" (Rat Temple) के नाम से भी जाना जाता है। यह लेख राजस्थान की प्रतियोगी परीक्षाओं—विशेषकर RPSC, RAS, RSMSSB, पटवारी, ग्राम सेवक, REET और SI भर्ती परीक्षाओं—की दृष्टि से करणी माता के जीवन, इतिहास, मंदिर वास्तुकला और सांस्कृतिक महत्व का विस्तृत और परीक्षोपयोगी अध्ययन प्रस्तुत करता है।
करणी माता केवल एक धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं हैं, बल्कि वे राजस्थान के दो प्रमुख राजवंशों—बीकानेर के राठौड़ और जोधपुर के राठौड़—के इतिहास से गहराई से जुड़ी हुई हैं। उन्हें राव बीका द्वारा बीकानेर की स्थापना और राव जोधा द्वारा मेहरानगढ़ दुर्ग की नींव रखने के प्रसंगों में आशीर्वाद देने वाली दैवीय शक्ति के रूप में स्मरण किया जाता है। इसीलिए राजस्थान के इतिहास और संस्कृति दोनों खंडों में उनका प्रश्न बार-बार पूछा जाता रहा है।
करणी माता का जन्म और प्रारंभिक जीवन
करणी माता का जन्म चारण जाति की किनिया शाखा में हुआ था। उनके पिता का नाम मेहाजी (मेहा किनिया) और माता का नाम देवल देवी (देवलबाई) था। जन्म-स्थान को लेकर स्रोतों में कुछ भिन्नता मिलती है—अधिकांश स्रोत उनका जन्म-स्थान जोधपुर जिले की फलौदी तहसील का सुवाप (सुआप) गाँव बताते हैं, हालांकि जन्म वर्ष को लेकर भी संवत् 1444 (1387 ई.) और कुछ अन्य स्रोतों में भिन्न तिथियाँ दी गई हैं।
बचपन में उनका नाम रिद्धिबाई (रिधुबाई) रखा गया था। मेहाजी की सात संतानों में करणीजी छठी संतान थीं। कहा जाता है कि जन्म के समय उन्होंने अपनी माता को चतुर्भुजी देवी स्वरूप में दर्शन दिए, जिससे परिवार में यह विश्वास दृढ़ हुआ कि यह कन्या कोई साधारण बालिका नहीं, अपितु देवी शक्ति का अवतार है।
बड़ी होने पर रिद्धिबाई का विवाह साठीका गाँव के चारण देवाजी (देपाजी) बीठू के साथ हुआ। किंतु करणीजी प्रारंभ से ही सांसारिक भोग-विलास से विरक्त रहीं। मान्यता है कि उन्होंने अपने पति देवाजी को समझाकर उनका दूसरा विवाह अपनी छोटी बहन गुलाबकुँवरी (गुलाबबाई) से करवा दिया और स्वयं आजीवन तपस्विनी जीवन व्यतीत करने लगीं। देवाजी के देहावसान के बाद करणीजी ने लगभग 84 वर्षों तक वैधव्य-जीवन बिताया, जिसमें उन्होंने अपने वस्त्रों का रंग भी बदल कर सादगीपूर्ण जीवन अपनाया।
देशनोक की स्थापना और नेहड़ी स्थल
करणी माता अपने गोधन (गायों के झुंड) के साथ भ्रमण करती हुई एक स्थान पर पहुँचीं, जहाँ उन्होंने विश्राम किया—यही स्थान आगे चलकर नेहड़ी के नाम से प्रसिद्ध हुआ। यहीं वे खेजड़ी वृक्ष के नीचे बैठकर दही मंथन (विलोवणा) किया करती थीं। यही नेहड़ी स्थल वर्तमान करणी माता मंदिर, देशनोक से लगभग दो किलोमीटर दूर स्थित है और आज भी दर्शनीय स्थल के रूप में जाना जाता है।
करणी माता ने ही देशनोक कस्बे को बसाया, जो आज उनके मुख्य मंदिर का केंद्र है। "देशनोक" नाम की व्युत्पत्ति के विषय में मान्यता है कि करणी माता के मंदिर के कारण यह स्थान जांगल-प्रदेश (बीकानेर और आसपास का क्षेत्र) की "नाक" अर्थात शान बन गया, इसीलिए इसे देशनोक कहा जाने लगा।
करणी माता और राजवंशों का संबंध
करणी माता का सबसे बड़ा ऐतिहासिक महत्व राजस्थान के दो प्रमुख राठौड़ राज्यों की स्थापना से जुड़ाव है:
- बीकानेर की स्थापना: मान्यता है कि राव बीका ने करणी माता के आशीर्वाद से ही बीकानेर राज्य की स्थापना की थी।
- जोधपुर एवं मेहरानगढ़ दुर्ग: राव जोधा ने करणी माता के आशीर्वाद से जोधपुर नगर बसाया तथा मेहरानगढ़ दुर्ग की नींव सन् 1459 में रखी। कुछ कथाओं के अनुसार दुर्ग की आधारशिला स्वयं करणी माता ने रखी थी।
- राव जैतसी और भटनेर दुर्ग: मान्यता है कि कामरान (हुमायूँ के भाई) के आक्रमण के समय बीकानेर के शासक राव जैतसी ने देशनोक पहुँचकर करणी माता का आशीर्वाद लिया और विजय प्राप्त की।
- महाराजा कर्णसिंह और औरंगजेब: कथाओं के अनुसार औरंगजेब की सेना करणी माता की कृपा से बीकानेर पर बिना आक्रमण किए ही लौट गई। इस घटना से प्रसन्न होकर महाराजा कर्णसिंह ने अपने मनसब क्षेत्र औरंगाबाद में भी करणी माता का मंदिर बनवाया।
इन्हीं ऐतिहासिक संबंधों के कारण करणी माता को बीकानेर के राठौड़ शासकों की कुलदेवी (आराध्य देवी) माना जाता है, और यह तथ्य परीक्षाओं में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
यह ध्यान देने योग्य है कि मध्यकालीन राजस्थान में लोकदेवी-लोकदेवताओं और राजसत्ता के बीच का यह संबंध केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं था। नवगठित राज्यों को वैधता (legitimacy) प्रदान करने के लिए शासक वर्ग प्रायः किसी न किसी लोकदेवी को अपनी कुलदेवी घोषित करता था, जिससे जनसाधारण में शासन के प्रति स्वीकार्यता बढ़ती थी। करणी माता के मामले में यह प्रक्रिया विशेष रूप से स्पष्ट दिखाई देती है—चारण समाज की एक साधारण स्त्री का शक्ति-स्वरूपा देवी के रूप में प्रतिष्ठित होना और फिर राजसत्ता द्वारा उसे कुलदेवी के रूप में अपनाया जाना, राजस्थान के सामाजिक-राजनीतिक इतिहास की एक महत्वपूर्ण प्रवृत्ति को उजागर करता है। इतिहासकार इसे "चारण-राजपूत गठबंधन" के प्रतीक के रूप में भी देखते हैं, जिसमें चारण समुदाय को राजदरबार में विशेष सम्मान, भूमि-अनुदान (जागीर) और संरक्षण प्राप्त होता था, तथा बदले में चारण कवि-भाट राजाओं की कीर्ति का बखान करते थे।
प्रमुख चमत्कार-कथाएँ
करणी माता के जीवन से जुड़ी अनेक चमत्कारिक कथाएँ लोक-मानस में प्रचलित हैं:
- राव कान्हा का वध: गोधन (गायों) पर आक्रमण करने वाले राव कान्हा का करणी माता ने वध किया, जिससे उनकी गौ-रक्षक और शक्ति-स्वरूपा छवि और सुदृढ़ हुई।
- दशरथ मेघवाल की कथा: करणी माता की गायों की रखवाली करने वाला ग्वाला दशरथ मेघवाल गायों की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुआ, जिसे लोक-स्मृति में सम्मानपूर्वक स्मरण किया जाता है।
- झगड़ूशाह की कथा: चित्तौड़ के महाराजा लाखा द्वारा निष्कासित सेठ झगड़ूशाह करणी माता की शरण में खींवसर बस गया। समुद्री यात्रा के दौरान जब उसका जहाज तूफान में फँसा, तो करणी माता ने अपनी दैवीय शक्ति से उसे सुरक्षित किनारे पहुँचाया।
- चूहों की उत्पत्ति की कथा: सबसे प्रचलित कथा के अनुसार करणी माता के पुत्रवत् स्नेह पाने वाले लक्ष्मण (या पौत्र) की मृत्यु जल में डूबने से हो गई। शोकाकुल करणी माता ने यमराज से प्रार्थना की कि लक्ष्मण को मनुष्य योनि में पुनः जीवित किया जाए। यमराज के अस्वीकार करने पर करणी माता ने घोषणा की कि उनके परिवार के सभी सदस्य मृत्यु के बाद चूहे (काबा) के रूप में जन्म लेंगे और अगले जन्म में पुनः मनुष्य रूप धारण करेंगे। इसी मान्यता के कारण मंदिर में हजारों चूहों को पूजनीय माना जाता है। इस कथा का सांस्कृतिक-मानवशास्त्रीय (anthropological) महत्व भी कम नहीं है। मरुस्थलीय क्षेत्र में जहाँ जल की कमी और अकाल जीवन की सबसे बड़ी चुनौतियाँ रही हों, वहाँ मृत्यु और पुनर्जन्म से जुड़ी ऐसी कथाएँ समुदाय को आपसी संबंधों, वंश-निरंतरता और सामूहिक स्मृति से जोड़े रखने का माध्यम बनती हैं। मंदिर में आज भी हजारों चूहों को भोजन कराना, उनकी संख्या का धार्मिक अनुष्ठान की तरह ध्यान रखा जाना, तथा चूहों द्वारा जूठा किया गया प्रसाद (जिसे "प्रसाद" के रूप में अत्यंत पवित्र माना जाता है) श्रद्धालुओं द्वारा ग्रहण किया जाना — ये सभी परंपराएँ मंदिर की विशिष्ट पहचान का हिस्सा हैं। मंदिर प्रबंधन प्रतिदिन बड़ी मात्रा में अनाज, दूध और मिठाई चूहों के भोजन हेतु व्यय करता है, जो मंदिर की आर्थिक-प्रबंधन व्यवस्था का भी एक दिलचस्प पहलू है।
- अणदा खाती की रक्षा: देशनोक की ओर यात्रा के दौरान करणी माता एक गाँव में रुकीं, जहाँ अणदा खाती नामक व्यक्ति (जो कुओं की मरम्मत का कार्य करता था) ने उनकी सेवा की। करणी माता ने उसे आशीर्वाद दिया कि विपत्ति के समय स्मरण करने पर वे सहायता करेंगी। यह कथा करणी माता की जनसाधारण के प्रति करुणा और सुलभता को दर्शाती है।
देशनोक मंदिर: वास्तुकला और विशेषताएँ
करणी माता का मुख्य मंदिर बीकानेर से लगभग 30-33 किलोमीटर दूर देशनोक कस्बे में राष्ट्रीय राजमार्ग-89 पर स्थित है। मंदिर की वास्तुकला और निर्माण-इतिहास परीक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है:
| निर्माण-चरण | निर्माणकर्ता शासक | विवरण |
|---|---|---|
| मूल मंदिर निर्माण | राव राजा जैतसिंह (19वीं शताब्दी में उल्लेखित) | प्रारंभिक ढाँचा |
| भव्यता प्रदान | महाराजा सूरतसिंह | मंदिर को विस्तृत रूप |
| संगमरमर द्वार व प्रांगण | महाराजा गंगासिंह | चाँदी के द्वार व संगमरमर की नक्काशी |
मंदिर की प्रमुख विशेषताएँ:
- चाँदी के विशाल द्वार और संगमरमर पर बारीक नक्काशी इस मंदिर की मुगल-राजपूत शैली की स्थापत्य कला को दर्शाती है।
- मंदिर में काले चूहों की भारी संख्या है, जिनमें कुछ सफेद चूहे (काबा) भी पाए जाते हैं—इनके दर्शन को अत्यंत शुभ माना जाता है।
- मंदिर परिसर में करणी माता की पाँच बहनों की मूर्तियाँ तथा सात आवड़ माता की मूर्तियाँ स्थापित हैं।
- मंदिर में सावन-भादो नामक दो विशाल कड़ाही रखी हुई हैं, जो प्रसाद निर्माण के लिए प्रयुक्त होती हैं।
- मंदिर के पुजारी परंपरागत रूप से चारण समाज के होते हैं।
- सफेद चील को करणी माता का प्रतीक माना जाता है।
- मंदिर के निकट तेमड़ेराय माता का मंदिर भी स्थित है, जिन्हें करणी माता की इष्ट देवी कहा जाता है।
मंदिर की स्थापत्य शैली को समझने के लिए यह जानना आवश्यक है कि यह राजस्थान की इंडो-इस्लामिक (राजपूत-मुगल मिश्रित) मंदिर-निर्माण शैली का उदाहरण है, जो 19वीं शताब्दी के बीकानेर स्थापत्य में सामान्यतः देखी जाती है। संगमरमर पर की गई नक्काशी में कमल, बेल-बूटे और ज्यामितीय पैटर्न प्रमुखता से मिलते हैं, जो समकालीन जूनागढ़ किले की स्थापत्य कला से भी साम्यता रखते हैं। मंदिर का मुख्य द्वार पश्चिम दिशा की ओर है, और गर्भगृह में करणी माता की लगभग दो फीट ऊँची प्रतिमा स्थापित है, जिनके गले में पारंपरिक राजस्थानी आभूषण "आड़" पहनाया गया है।
निर्माण-कालक्रम (Timeline) — त्वरित रिवीजन तालिका
| समय/शासनकाल | घटना |
|---|---|
| संवत् 1444 (लगभग) | करणी माता का जन्म, सुवाप गाँव |
| संवत् 1511 (1454 ई.) | पति देवाजी का देहावसान |
| 1459 ई. | राव जोधा द्वारा मेहरानगढ़ दुर्ग की नींव |
| 19वीं शताब्दी (प्रारंभ) | राव राजा जैतसिंह द्वारा मूल मंदिर निर्माण |
| महाराजा सूरतसिंह का काल | मंदिर को भव्य रूप प्रदान |
| महाराजा गंगासिंह का काल | संगमरमर द्वार व प्रांगण निर्माण |
| 21 मार्च 1538 (मान्यतानुसार) | गड़ियाला/जैसलमेर क्षेत्र में महापरिनिर्वाण |
| 28-07-2018 | श्री करणी माता पेनोरमा (देशनोक) का लोकार्पण |
धार्मिक पर्यटन, प्रशासन और आधुनिक संदर्भ
वर्तमान समय में करणी माता मंदिर राजस्थान के प्रमुख धार्मिक-पर्यटन स्थलों में गिना जाता है। राजस्थान पर्यटन विभाग और राजस्थान धरोहर संरक्षण एवं संवर्धन प्राधिकरण (Rajasthan Heritage Protection & Promotion Authority) द्वारा देशनोक में श्री करणी माता पेनोरमा का निर्माण करवाया गया, जिसका लोकार्पण 28 जुलाई 2018 को हुआ। यह पेनोरमा करणी माता के जीवन-प्रसंगों को मूर्तिकला और चित्रकला के माध्यम से दर्शाता है, ताकि नई पीढ़ी और पर्यटक उनके जीवन-दर्शन को सरलता से समझ सकें। यह परियोजना राजस्थान सरकार की उन नीतियों का हिस्सा है जिनके अंतर्गत राज्य के लोकदेवी-लोकदेवताओं से जुड़े स्थलों को धरोहर-पर्यटन (heritage tourism) के रूप में विकसित किया जा रहा है।
मंदिर देशनोक कस्बे की अर्थव्यवस्था का भी महत्वपूर्ण आधार है — प्रसाद-निर्माण, पूजा-सामग्री, हस्तशिल्प तथा पर्यटन-सेवाओं (होटल, परिवहन, गाइड सेवाएँ) से जुड़े हजारों लोगों की आजीविका इसी मंदिर के इर्द-गिर्द केंद्रित है। रेल मार्ग से देशनोक सीधे जुड़ा हुआ है, तथा बीकानेर से नियमित बस व टैक्सी सेवाएँ उपलब्ध हैं, जिससे यह जयपुर, जोधपुर, नागौर और जैसलमेर जैसे शहरों से सुगमता से जुड़ा हुआ है।
मेले, उत्सव और सांस्कृतिक महत्व
करणी माता मंदिर में प्रतिवर्ष चैत्र नवरात्र और आश्विन (शारदीय) नवरात्र के अवसर पर भव्य मेले का आयोजन होता है, जिनमें राजस्थान सहित देश-विदेश से श्रद्धालु दर्शन हेतु पहुँचते हैं। इन मेलों का प्रशासनिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से भी महत्व है, क्योंकि यह राजस्थान पर्यटन एवं मेला प्रबंधन के अंतर्गत अध्ययन का विषय रहा है।
जैसलमेर जिले के गड़ियाली मठ को करणी माता का निर्वाण-स्थल (महापरिनिर्वाण-स्थल) माना जाता है। कुछ स्रोतों के अनुसार 21 मार्च 1538 को करणी माता ने अपने पौत्र पूँजा तथा अन्य अनुयायियों के साथ इसी स्थान के निकट देह त्याग किया।
अन्य प्रमुख मंदिर
करणी माता को समर्पित मंदिर केवल देशनोक तक सीमित नहीं हैं:
- श्री मनीषपूर्णा करणी माता मंदिर, उदयपुर — माछला पहाड़ियों पर स्थित।
- करणी माता मंदिर, मथानिया (जोधपुर) — अमराजी बारहठ द्वारा निर्मित प्रथम मंदिर माना जाता है।
- धिनेरू तलाई गुफा, बीकानेर — करणी माता की गुफा के रूप में प्रसिद्ध।
- करणी माता मंदिर, औरंगाबाद (महाराष्ट्र) — महाराजा कर्णसिंह द्वारा निर्मित।
चारण समाज, लोक-साहित्य और करणी माता
करणी माता का जीवन-चरित्र चारण समाज के सांस्कृतिक इतिहास से अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है। चारण समुदाय को पारंपरिक रूप से राजस्थान में कवि, इतिहासकार (ख्यात-लेखक), और राजदरबार के भाट के रूप में सम्मान प्राप्त था। चारण स्त्रियों को शक्ति-स्वरूपा माना जाना कोई अपवाद नहीं, बल्कि एक व्यापक परंपरा का हिस्सा है — आवड़ माता, नागणेची माता, स्वांगिया माता जैसी अनेक लोकदेवियाँ भी चारण कुल में ही अवतरित मानी जाती हैं। करणी माता को स्वयं आवड़ माता (हिंगलाज माता का ही एक रूप) की सात बहनों में से एक माना जाता है, जो इन सभी लोकदेवियों को एक व्यापक शक्ति-परंपरा से जोड़ता है।
करणी माता से जुड़े लोकगीत, चिरजा (स्तुति-गीत), और मौखिक परंपराएँ आज भी देशनोक क्षेत्र में गाई जाती हैं। ये साहित्यिक परंपराएँ न केवल धार्मिक भक्ति की अभिव्यक्ति हैं, बल्कि राजस्थानी भाषा, लोक-संगीत और मौखिक इतिहास-लेखन परंपरा (ओरल हिस्ट्री) के अध्ययन के लिए भी मूल्यवान स्रोत मानी जाती हैं। सांस्कृतिक अध्ययन की दृष्टि से करणी माता की कथा यह भी दर्शाती है कि किस प्रकार मध्यकालीन राजस्थान में स्त्री-शक्ति, त्याग और सामाजिक न्याय के मूल्यों को लोक-आस्था के माध्यम से संरक्षित किया गया — करणी माता ने स्वयं गृहस्थ जीवन का त्याग कर सामाजिक कल्याण (गौ-रक्षा, जल-प्रबंधन, अकाल-राहत जैसी मान्यताओं) को अपना जीवन-लक्ष्य बनाया, जो उन्हें केवल एक पौराणिक देवी नहीं, अपितु एक ऐतिहासिक-सामाजिक व्यक्तित्व के रूप में भी प्रासंगिक बनाता है।
समान लोकदेवताओं/लोकदेवियों से तुलना (परीक्षा हेतु उपयोगी)
| लोकदेवी/लोकदेवता | कुलदेवी/संबंधित वंश | मुख्य मंदिर स्थान | प्रसिद्धि का कारण |
|---|---|---|---|
| करणी माता | बीकानेर व जोधपुर के राठौड़ | देशनोक (बीकानेर) | चूहों की देवी, गौ-रक्षा |
| जीण माता | चौहान वंश | रेवासा, सीकर (हर्ष की पहाड़ी) | तांत्रिक शक्तिपीठ, सबसे लंबा लोकगीत (चिरजा) |
| नागणेची माता | राठौड़ (जोधपुर मूल कुलदेवी) | नागाणा, बाड़मेर | 18 भुजाओं वाली प्रतिमा |
| आशापुरा माता | बीसा जाति | पोकरण के पास, जैसलमेर | मनोकामना पूर्ति की देवी |
| स्वांगिया माता | भाटी वंश (जैसलमेर) | जैसलमेर | आहड़देवी का रूप |
| जिलाणी/जिलाड़ी माता | — | बहरोड़ (कोटपूतली-बहरोड़) | धर्म-परिवर्तन के विरुद्ध संघर्ष |
| सुगाली माता | चम्पावत राठौड़ | आउवा, पाली | 1857 क्रांति की देवी, 10 सिर-54 भुजाएँ |
पाबूजी राठौड़ और रामदेवजी की तरह करणी माता भी राजस्थान की लोक-आस्था में इतिहास और भक्ति का संगम मानी जाती हैं, किंतु करणी माता की विशिष्टता यह है कि वे प्रत्यक्षतः राजवंशों की स्थापना-गाथाओं से जुड़ी हैं, जबकि पाबूजी और रामदेवजी की कथाएँ मुख्यतः लोक-नायकत्व और सामाजिक समरसता पर केंद्रित हैं।
शिक्षक की टिप्पणी (Common Exam Traps)
- परीक्षाओं में अक्सर करणी माता को "जोधपुर के राठौड़ों की कुलदेवी" के रूप में गलत विकल्प में भ्रमित किया जाता है — सही उत्तर है बीकानेर के राठौड़ों की कुलदेवी, हालांकि जोधपुर के इतिहास (मेहरानगढ़) से भी उनका संबंध जोड़ा जाता है, अतः प्रश्न को ध्यान से पढ़ें।
- नागणेची माता और करणी माता को अक्सर परीक्षार्थी गड़बड़ा देते हैं — नागणेची राठौड़ों की मूल कुलदेवी (कन्नौज से लाई गई प्रतिमा) हैं, जबकि करणी माता बीकानेर शाखा से विशेष रूप से जुड़ी हैं।
- मंदिर निर्माणकर्ताओं के नाम (राव राजा जैतसिंह/सूरतसिंह/गंगासिंह) को क्रम में याद रखने के लिए स्मृति-सूत्र: "जैत ने नींव धरी, सूरत ने रूप दिया, गंगा ने चाँदी चढ़ाई।"
- जन्मस्थान और जन्म-तिथि पर स्रोत-भेद है — RPSC पाठ्यक्रम/राजस्थान राज्य पाठ्यपुस्तक में दी गई तिथि को ही अंतिम आधार मानें।
PYQ / अभ्यास प्रश्न ब्लॉक (परीक्षा-वार टैग सहित)
प्रश्न 1. करणी माता का प्रसिद्ध मंदिर किस स्थान पर स्थित है? (a) पाली (b) देशनोक (c) नागौर (d) फलौदी
उत्तर: (b) देशनोक व्याख्या: करणी माता का मंदिर बीकानेर से लगभग 30-33 किमी दूर देशनोक कस्बे में स्थित है। (RPSC, RAS)
प्रश्न 2. करणी माता किस वंश की कुलदेवी मानी जाती हैं? (a) सिसोदिया (b) कछवाहा (c) राठौड़ (बीकानेर) (d) चौहान
उत्तर: (c) राठौड़ (बीकानेर) व्याख्या: करणी माता को बीकानेर के राठौड़ शासकों की कुलदेवी माना जाता है। (RAS, Patwari)
प्रश्न 3. करणी माता के बचपन का नाम क्या था? (a) गुलाबकुँवरी (b) रिद्धिबाई (c) देवलबाई (d) लालबाई
उत्तर: (b) रिद्धिबाई व्याख्या: करणी माता का बचपन का नाम रिद्धिबाई (रिधुबाई) था। (REET, RSMSSB)
प्रश्न 4. करणी माता के मंदिर में पाए जाने वाले सफेद चूहों को क्या कहा जाता है? (a) काबा (b) चालक (c) आवड़ (d) नेहड़ी
उत्तर: (a) काबा व्याख्या: मंदिर में सफेद चूहों को "काबा" कहा जाता है और उनके दर्शन शुभ माने जाते हैं। (RPSC, SI)
प्रश्न 5. करणी माता के पिता का क्या नाम था? (a) देपाजी (b) मेहाजी (c) पूँजा (d) झगड़ूशाह
उत्तर: (b) मेहाजी व्याख्या: करणी माता के पिता मेहाजी, चारण जाति की किनिया शाखा से थे। (Gram Sevak)
प्रश्न 6. करणी माता के आशीर्वाद से किस शासक ने बीकानेर की स्थापना की? (a) राव जोधा (b) राव बीका (c) राव जैतसी (d) महाराजा सूरतसिंह
उत्तर: (b) राव बीका व्याख्या: मान्यतानुसार राव बीका ने करणी माता के आशीर्वाद से बीकानेर राज्य की स्थापना की। (RAS, RPSC)
प्रश्न 7. मेहरानगढ़ दुर्ग की नींव किस वर्ष रखी गई थी? (a) 1449 (b) 1459 (c) 1469 (d) 1479
उत्तर: (b) 1459 व्याख्या: राव जोधा ने करणी माता के आशीर्वाद से 1459 में मेहरानगढ़ दुर्ग की नींव रखी। (Patwari, RSMSSB)
प्रश्न 8. करणी माता के मंदिर के वर्तमान संगमरमर द्वार व प्रांगण का निर्माण किसने करवाया? (a) राव जैतसिंह (b) सूरतसिंह (c) गंगासिंह (d) कर्णसिंह
उत्तर: (c) गंगासिंह व्याख्या: मंदिर के प्रांगण व संगमरमर के दरवाजे महाराजा गंगासिंह ने बनवाए। (RPSC)
प्रश्न 9. करणी माता की इष्ट देवी किसे माना जाता है? (a) जीण माता (b) तेमड़ेराय माता (c) आशापुरा माता (d) नागणेची माता
उत्तर: (b) तेमड़ेराय माता व्याख्या: तेमड़ेराय माता, करणी माता की इष्ट देवी मानी जाती हैं और उनका मंदिर भी देशनोक में स्थित है। (RAS)
प्रश्न 10. करणी माता का महापरिनिर्वाण-स्थल किस जिले में माना जाता है? (a) बीकानेर (b) जैसलमेर (c) जोधपुर (d) नागौर
उत्तर: (b) जैसलमेर व्याख्या: जैसलमेर जिले के गड़ियाली मठ को करणी माता का निर्वाण-स्थल माना जाता है। (RPSC, SI)
प्रश्न 11. करणी माता के मंदिर के पुजारी परंपरागत रूप से किस समाज के होते हैं? (a) ब्राह्मण (b) चारण (c) राजपूत (d) जाट
उत्तर: (b) चारण व्याख्या: करणी माता के मंदिर के पुजारी चारण समाज के लोग होते हैं। (REET)
प्रश्न 12. करणी माता के मंदिर में किन दो कड़ाहियों का उल्लेख मिलता है? (a) गंगा-जमुना (b) सावन-भादो (c) चैत्र-आश्विन (d) राम-लक्ष्मण
उत्तर: (b) सावन-भादो व्याख्या: मंदिर में स्थित दो विशाल कड़ाहियों को सावन-भादो नाम दिया गया है। (RSMSSB)
प्रश्न 13. करणी माता की गायों की रक्षा करते हुए किस ग्वाले की मृत्यु हुई थी? (a) अणदा खाती (b) दशरथ मेघवाल (c) झगड़ूशाह (d) पूँजा
उत्तर: (b) दशरथ मेघवाल व्याख्या: करणी माता की गायों का ग्वाला दशरथ मेघवाल गायों की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुआ। (RAS, Patwari)
प्रश्न 14. करणी माता के मंदिर में किस पक्षी को माताजी का प्रतीक माना जाता है? (a) मोर (b) कबूतर (c) सफेद चील (d) तोता
उत्तर: (c) सफेद चील व्याख्या: सफेद चील को करणी माता का प्रतीक माना जाता है। (RPSC)
प्रश्न 15. करणी माता का विवाह किसके साथ हुआ था? (a) राव कान्हा (b) देवाजी (देपाजी) बीठू (c) अमराजी बारहठ (d) मेहाजी
उत्तर: (b) देवाजी (देपाजी) बीठू व्याख्या: करणी माता का विवाह साठीका गाँव के चारण देवाजी बीठू से हुआ था। (REET, Gram Sevak)
प्रश्न 16. करणी माता का प्रथम मंदिर किसने बनवाया था? (a) महाराजा गंगासिंह (b) अमराजी बारहठ (c) राव राजा जैतसिंह (d) महाराजा कर्णसिंह
उत्तर: (b) अमराजी बारहठ व्याख्या: करणी माता का पहला मंदिर मथानिया में अमराजी बारहठ द्वारा बनवाया गया था। (RPSC)
प्रश्न 17. करणी माता मंदिर के प्रांगण में किन देवियों की मूर्तियाँ स्थापित हैं? (a) नवदुर्गा (b) पाँच बहनों व सात आवड़ माता (c) दस महाविद्या (d) चौंसठ योगिनी
उत्तर: (b) पाँच बहनों व सात आवड़ माता व्याख्या: मंदिर परिसर में करणी माता की पाँच बहनों तथा सात आवड़ माता की मूर्तियाँ स्थापित हैं। (RAS)
प्रश्न 18. करणी माता किस देवी के अवतार के रूप में पूजी जाती हैं? (a) दुर्गा (b) हिंगलाज देवी (c) लक्ष्मी (d) सरस्वती
उत्तर: (b) हिंगलाज देवी व्याख्या: करणी माता को उनके अनुयायियों द्वारा देवी हिंगलाज के अवतार के रूप में पूजा जाता है। (RPSC, RAS)
महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)
करणी माता चारण जाति में जन्मीं एक लोकपूज्य देवी हैं, जिन्हें बीकानेर के राठौड़ शासकों की कुलदेवी माना जाता है और जिनका मुख्य मंदिर देशनोक (बीकानेर) में स्थित है।
मंदिर में हजारों चूहों (काबा) का निवास है, जिन्हें करणी माता के परिवार का पुनर्जन्मित रूप माना जाता है, इसीलिए इसे चूहों का मंदिर कहा जाता है।
यह मंदिर बीकानेर शहर से लगभग 30-33 किलोमीटर दूर, राष्ट्रीय राजमार्ग-89 पर स्थित देशनोक कस्बे में है।
करणी माता का संबंध बीकानेर के राव बीका और जोधपुर के राव जोधा से जुड़ा है, दोनों ने उनके आशीर्वाद से अपने-अपने राज्यों/दुर्गों की स्थापना की।
चैत्र और आश्विन (शारदीय) नवरात्रों के अवसर पर करणी माता के मंदिर में भव्य मेले का आयोजन होता है।