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कला एवं संस्कृति

बेणेश्वर मेला — राजस्थान के प्रमुख मेले

Sudhir Dhaka (इतिहास विशेषज्ञ)
15 जुलाई 2026
7 मिनट पठन
बेणेश्वर मेला — राजस्थान के प्रमुख मेले

भूमिका

राजस्थान के आदिवासी-बहुल वागड़ अंचल की सबसे बड़ी सांस्कृतिक-धार्मिक पहचान है बेणेश्वर मेला। डूंगरपुर जिले में सोम, माही और जाखम नदियों के त्रिवेणी संगम पर लगने वाला यह मेला भारत के सबसे बड़े जनजातीय (आदिवासी) मेलों में गिना जाता है, और इसे "आदिवासियों का कुंभ", "वागड़ का प्रयाग" तथा "वनवासियों का महाकुंभ" जैसे नामों से भी जाना जाता है। जिस तरह पुष्कर मेला ब्रह्मा-आस्था और पशु-व्यापार का संगम है, उसी तरह बेणेश्वर मेला भील जनजाति की गहरी आध्यात्मिक आस्था, संत मावजी महाराज की भक्ति-परंपरा और त्रिवेणी संगम-स्नान का अनूठा संगम है।

राजस्थान की कला-संस्कृति एवं जनजातीय अध्ययन खंड में यह विषय RPSC, RAS, पटवारी, ग्राम सेवक जैसी लगभग सभी परीक्षाओं में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि यह न केवल भूगोल (डूंगरपुर, नदी-संगम) बल्कि जनजातीय समाज, धार्मिक-सांस्कृतिक इतिहास और लोक-परंपराओं — तीनों दृष्टिकोणों से प्रश्नों का स्रोत बनता है।

इस लेख में हम बेणेश्वर मेले का भौगोलिक स्थान, पौराणिक कथा, संत मावजी महाराज की भूमिका, मेले की परंपराएँ, तथा परीक्षा-उपयोगी तथ्यों को विस्तार से समझेंगे।

बेणेश्वर: स्थान और भौगोलिक परिचय

बेणेश्वर धाम, डूंगरपुर जिले में स्थित है और यह डूंगरपुर व बांसवाड़ा जिलों की सीमा के निकट, सोम, माही और जाखम नदियों के त्रिवेणी संगम पर बसा एक छोटा-सा टापू-नुमा तीर्थ स्थल है। इसे स्थानीय वागड़ी भाषा में "डेल्टा का स्वामी/मास्टर" के अर्थ में जोड़ा जाता है, क्योंकि यह स्थान माही व सोम नदियों द्वारा निर्मित डेल्टा पर स्थित है।

महत्वपूर्ण तथ्य (परीक्षा दृष्टि से):

  • जिला: डूंगरपुर (बांसवाड़ा जिले की सीमा के निकट)
  • नदी-संगम: सोम + माही + जाखम (त्रिवेणी संगम)
  • क्षेत्र: वागड़ अंचल (दक्षिणी राजस्थान का आदिवासी-बहुल क्षेत्र)
  • अन्य नाम: वागड़ का प्रयाग, आदिवासियों का कुंभ, वनवासियों का महाकुंभ, जनजातीय कुंभ

सत्यापन सलाह: डूंगरपुर मुख्यालय से बेणेश्वर की दूरी को लेकर स्रोतों में 60-68 किमी के बीच भिन्नता मिलती है। इस दूरी की सटीक पुष्टि राजस्थान पर्यटन विभाग के आधिकारिक दस्तावेज़ों से अवश्य करें।

बेणेश्वर नाम और शिवलिंग की पौराणिक कथा

बेणेश्वर धाम के केंद्र में स्थित शिवालय को लेकर एक रोचक लोक-कथा प्रचलित है। मान्यता है कि एक स्थानीय ग्वाला अपनी गायों को यहाँ चराने लाता था, और एक गाय प्रतिदिन एक विशेष स्थान पर जाकर अपने थनों से दूध की धार छोड़ती थी। एक दिन ग्वाले ने पीछा कर देखा कि गाय एक शिवलिंग का दुग्धाभिषेक कर रही थी। अचानक मालिक को देखकर गाय घबराकर भागी और उसके खुर से वह शिवलिंग खंडित हो गया। तभी से इस स्थान पर उसी खंडित शिवलिंग की पूजा की जाती है, और यहाँ बना शिव मंदिर "बेणेश्वर महादेव" के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इसी शिवलिंग/शिवालय के नाम पर संपूर्ण तीर्थ-स्थल और मेले का नाम बेणेश्वर पड़ा।

बेणेश्वर धाम परिसर में शिव मंदिर के साथ-साथ विष्णु मंदिर, ब्रह्मा मंदिर, राधा-कृष्ण मंदिर, वेदमाता (गायत्री) मंदिर तथा वाल्मीकि मंदिर भी स्थित हैं, जिससे इसे त्रिदेव (ब्रह्मा-विष्णु-महेश) की समवेत उपासना-स्थली भी माना जाता है।

संत मावजी महाराज और भक्ति परंपरा

बेणेश्वर धाम के धार्मिक-सांस्कृतिक इतिहास में संत मावजी महाराज का स्थान केंद्रीय है। वागड़ अंचल में मावजी महाराज को भगवान श्रीकृष्ण का अवतार माना जाता है, और उन्होंने इस क्षेत्र में भक्ति और सामाजिक-सुधार की परंपरा को व्यापक रूप से फैलाया। मान्यता है कि यहाँ स्थित विष्णु मंदिर का निर्माण उसी काल में हुआ जब मावजी महाराज ने इस स्थान पर तपस्या की थी।

मावजी महाराज के शिष्यों — अजे और वाजे — ने संगम-तट पर लक्ष्मी-नारायण मंदिर का निर्माण करवाया, और माघ शुक्ल एकादशी को मूर्तियों की प्राण-प्रतिष्ठा के साथ इसी परंपरा से मेले का शुभारंभ हुआ माना जाता है। आज भी मावजी महाराज की "हरि मंदिर, साबला" पीठ के उत्तराधिकारी महंत प्रतिवर्ष मेले में पालकी-यात्रा के साथ बेणेश्वर पहुँचकर ध्वजारोहण करते हैं — यह मेले का सबसे प्रमुख अनुष्ठान है।

सत्यापन सलाह: बेणेश्वर धाम के शिव मंदिर के निर्माण-काल को लेकर कुछ स्रोतों में विक्रम संवत 1605-1637 के आसपास महाराज आसकरण के शासनकाल का उल्लेख मिलता है, तथा धाम के इतिहास को सामान्यतः लगभग 300 वर्ष पुराना बताया जाता है। यह तिथि RPSC पाठ्यक्रम-अनुमोदित इतिहास सामग्री से अवश्य सत्यापित करें, क्योंकि लोकप्रिय स्रोतों में इसकी सटीकता को लेकर एकरूपता नहीं है।

मेले का समय और अनुष्ठान-क्रम

बेणेश्वर मेला प्रतिवर्ष हिंदू पंचांग के माघ मास में आयोजित होता है। इसका शुभारंभ माघ शुक्ल एकादशी को ध्वजारोहण के साथ होता है, और मुख्य मेला व पवित्र स्नान माघ शुक्ल पूर्णिमा (माघ पूर्णिमा) को होता है। यह मेला सामान्यतः 5 से 10 दिनों तक चलता है, और अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार यह प्रायः जनवरी के अंत से फरवरी माह के बीच पड़ता है।

मेले का अनुष्ठान-क्रम:

  1. ध्वजारोहण — माघ शुक्ल एकादशी को साबला की हरि मंदिर पीठ के महंत की अगुवाई में पालकी-यात्रा के साथ ध्वजारोहण
  2. संगम-स्नान — माघ पूर्णिमा को सोम-माही-जाखम के त्रिवेणी संगम में लाखों श्रद्धालुओं का पवित्र स्नान ("शाही स्नान")
  3. अस्थि-विसर्जन — दिवंगत परिजनों की अस्थियों का संगम में विधिवत विसर्जन, जिसे मोक्ष-प्राप्ति की परंपरा माना जाता है
  4. सामूहिक भोज एवं लोक-रीतियाँ — संगम-तट पर परंपरागत भोजन (दाल-बाटी, चूरमा) बनाकर सामूहिक भोज
  5. भजन-संध्या — तानपूरा, तंबूरा, ढोल, मंजीरे और हारमोनियम की संगत में परंपरागत भजन-गायन

अस्थि-विसर्जन: बेणेश्वर मेले की विशिष्ट पहचान

बेणेश्वर मेले की सबसे विशिष्ट और मार्मिक परंपरा है अस्थि-विसर्जन। वागड़ अंचल के आदिवासी समुदाय (मुख्यतः भील जनजाति) वर्षभर अपने दिवंगत परिजनों की अस्थियाँ संजोकर रखते हैं, और माघ पूर्णिमा के अवसर पर पूरे परिवार सहित बेणेश्वर आकर कमर तक जल में उतरकर, दक्षिण दिशा की ओर मुख कर विधिवत अस्थि-विसर्जन करते हैं। इस कारण बेणेश्वर को आदिवासी समाज के लिए वही स्थान प्राप्त है जो हिंदू परंपरा में हरिद्वार या प्रयागराज को प्राप्त है — यही कारण है कि इसे "वागड़ का प्रयाग" कहा जाता है।

आदिवासी संस्कृति का जीवंत प्रदर्शन

बेणेश्वर मेला केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है — यह वागड़ अंचल की भील जनजातीय संस्कृति के भव्य प्रदर्शन का सबसे बड़ा मंच भी है। मेले में राजस्थान के साथ-साथ मध्य प्रदेश और गुजरात से भी लाखों आदिवासी अपनी परंपरागत वेशभूषा पहनकर, पारंपरिक वाद्य-यंत्र बजाते हुए, नाचते-गाते हुए बेणेश्वर पहुँचते हैं।

मेले के प्रमुख सांस्कृतिक आकर्षण:

  • पारंपरिक भील लोक-नृत्य एवं लोक-गीत
  • तानपूरा, तंबूरा, ढोल, मंजीरे व हारमोनियम पर आधारित भजन-गायकी
  • जादुई तमाशे व करतब-प्रदर्शन
  • हस्तशिल्प, आदिवासी आभूषण व वस्त्रों के स्टॉल
  • जिला प्रशासन व पर्यटन विभाग द्वारा आयोजित रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम

कृषि से जुड़ी लोक-मान्यता

बेणेश्वर के त्रिवेणी संगम को लेकर एक रोचक कृषि-संबंधी लोक-मान्यता भी प्रचलित है। स्थानीय लोगों का विश्वास है कि यदि संगम पर सोम नदी का जल पहले पूर्ण प्रवाह से बहे, तो उस वर्ष धान (चावल) की अच्छी फसल होती है, जबकि यदि माही नदी का जल पहले बहे, तो वह वर्ष कृषि की दृष्टि से शुभ नहीं माना जाता। यह मान्यता बेणेश्वर के कृषि-आधारित आदिवासी समाज से जुड़ाव को दर्शाती है।

पर्यटन एवं प्रशासनिक महत्व

बेणेश्वर मेले को राजस्थान सरकार द्वारा "राष्ट्रीय बेणेश्वर मेला" के रूप में मान्यता प्राप्त है, और जिला प्रशासन तथा राजस्थान पर्यटन विभाग प्रतिवर्ष इस मेले के आयोजन में सक्रिय भूमिका निभाते हैं। सुरक्षा, स्वास्थ्य-सुविधाओं और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की विशेष व्यवस्था की जाती है, तथा यह मेला ट्रैवल-टूर एजेंसियों के पैकेज में भी शामिल किया जाने लगा है, जिससे यह आदिवासी संस्कृति में रुचि रखने वाले राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों को भी आकर्षित करता है।

राजस्थान के अन्य प्रमुख मेलों से तुलना

मेले का नामस्थान/जिलासमर्पित देवता/अवसरविशेष पहचान
बेणेश्वर मेलाडूंगरपुरशिव जी, माघ पूर्णिमा, सोम-माही-जाखम संगमआदिवासियों (भील) का सबसे बड़ा मेला/कुंभ
पुष्कर मेलाअजमेरब्रह्मा जी, कार्तिक पूर्णिमाविश्व का सबसे बड़ा ऊँट मेला
चंद्रभागा मेलाझालावाड़शिव जी, कार्तिक पूर्णिमापशु मेला, चंद्रभागा नदी तट
कैला देवी मेलाकरौलीकैला देवी, चैत्र माहलक्खी मेला
रामदेवरा मेलाजैसलमेर (पोकरण)बाबा रामदेव, भाद्रपद माहलोकदेवता मेला
श्री महावीरजी मेलाकरौलीजैन तीर्थंकर महावीर, चैत्र माहजैन धार्मिक मेला
गोगामेड़ी मेलाहनुमानगढ़गोगाजी, भाद्रपद माहलोकदेवता (सर्प-पूजा) मेला

याद रखने योग्य अंतर: पुष्कर मेला और बेणेश्वर मेला दोनों को "कुंभ" जैसी संज्ञा से जोड़ा जाता है, परंतु पुष्कर मेला ब्रह्मा-केंद्रित तीर्थाटन व पशु-व्यापार मेला है, जबकि बेणेश्वर मेला आदिवासी (भील) समुदाय का शिव-केंद्रित संगम-स्नान व अस्थि-विसर्जन मेला है। दोनों की तिथि, देवता, जिला व सामाजिक स्वरूप — सभी भिन्न हैं।

एग्जाम ट्रैप — सामान्य भ्रांतियाँ जो छात्र अक्सर करते हैं

  1. भ्रांति: बेणेश्वर मेला बांसवाड़ा जिले में आयोजित होता है। तथ्य: बेणेश्वर मेला मुख्यतः डूंगरपुर जिले में आयोजित होता है, हालांकि यह स्थान डूंगरपुर-बांसवाड़ा जिलों की सीमा के निकट स्थित है। परीक्षा में मुख्य जिला डूंगरपुर ही माना जाता है।
  2. भ्रांति: बेणेश्वर मेला कार्तिक पूर्णिमा को मनाया जाता है (पुष्कर मेले जैसा)। तथ्य: बेणेश्वर मेला माघ पूर्णिमा को मनाया जाता है, जबकि पुष्कर व चंद्रभागा मेले कार्तिक पूर्णिमा से जुड़े हैं। यह भ्रम परीक्षा में सामान्यतः पैदा किया जाता है।
  3. भ्रांति: बेणेश्वर मेला विष्णु भगवान को समर्पित है। तथ्य: बेणेश्वर मंदिर परिसर मुख्यतः शिव जी को समर्पित है (बेणेश्वर महादेव), यद्यपि परिसर में ब्रह्मा, विष्णु व अन्य मंदिर भी स्थित हैं। मुख्य पूजनीय देवता को लेकर विष्णु/मावजी से भ्रमित न हों।
  4. भ्रांति: त्रिवेणी संगम में केवल दो नदियाँ (सोम व माही) सम्मिलित हैं। तथ्य: यह त्रिवेणी संगम सोम, माही और जाखम — तीन नदियों का संगम है, यद्यपि जाखम नदी को कुछ स्रोतों में विलुप्तप्राय/लुप्त बताया गया है।
  5. भ्रांति: बेणेश्वर मेला केवल राजस्थान के आदिवासियों तक सीमित है। तथ्य: इस मेले में राजस्थान के अतिरिक्त मध्य प्रदेश और गुजरात के आदिवासी समुदाय भी बड़ी संख्या में भाग लेते हैं, जिससे यह अंतर्राज्यीय जनजातीय महत्व रखता है।
  6. भ्रांति: मेले का प्रारंभ मुख्य दिवस (पूर्णिमा) से होता है। तथ्य: मेले की शुरुआत माघ शुक्ल एकादशी को ध्वजारोहण से होती है; पूर्णिमा को मुख्य मेला व मुख्य स्नान होता है, यह मेले का समापन-बिंदु नहीं बल्कि केंद्र-बिंदु है — मेला पूर्णिमा के बाद भी कुछ दिन जारी रह सकता है।

याद रखने की युक्तियाँ (मेमोरी ट्रिक्स)

  • "स-मा-जा = सोम-माही-जाखम" — तीन नदियों के नाम याद रखने के लिए यह संक्षिप्त सूत्र प्रयोग करें।
  • "बेणेश्वर = शिव, पुष्कर = ब्रह्मा" — दोनों तीर्थ-मेलों के मुख्य देवता को जोड़े में याद रखें ताकि भ्रम न हो।
  • "माघ में बेणेश्वर, कार्तिक में पुष्कर" — दोनों प्रमुख मेलों की माह-आधारित तिथि याद रखने का सूत्र।
  • "डूंगरपुर का वागड़ प्रयाग" — जिला और उपनाम को जोड़कर याद रखें।
  • "मावजी के शिष्य अजे-वाजे" — मावजी महाराज के शिष्यों के नाम को याद रखने हेतु तुकबंदी सूत्र।

PYQ ब्लॉक — पूर्व वर्षों में पूछे गए एवं संभावित प्रश्न (20 प्रश्न)

प्रश्न 1. बेणेश्वर मेला राजस्थान के किस जिले में आयोजित होता है?

 (अ) बांसवाड़ा (ब) डूंगरपुर (स) उदयपुर (द) प्रतापगढ़ 

उत्तर: (ब) डूंगरपुर

प्रश्न 2. बेणेश्वर धाम किन तीन नदियों के त्रिवेणी संगम पर स्थित है? 

(अ) चंबल-बनास-बेड़च (ब) सोम-माही-जाखम (स) लूनी-जोजरी-सुकड़ी (द) बनास-कोठारी-खारी 

उत्तर: (ब) सोम-माही-जाखम

प्रश्न 3. बेणेश्वर मेला हिंदू पंचांग के किस माह में आयोजित होता है?

 (अ) कार्तिक (ब) चैत्र (स) माघ (द) श्रावण 

उत्तर: (स) माघ

प्रश्न 4. बेणेश्वर मेले का मुख्य स्नान किस तिथि को होता है?

 (अ) माघ अमावस्या (ब) माघ पूर्णिमा (स) माघ एकादशी (द) माघ द्वादशी 

उत्तर: (ब) माघ पूर्णिमा

प्रश्न 5. बेणेश्वर मेले को निम्न में से किस नाम से भी जाना जाता है? 

(अ) मारवाड़ का कुंभ (ब) वागड़ का प्रयाग (स) मेवाड़ का हरिद्वार (द) शेखावाटी का तीर्थ 

उत्तर: (ब) वागड़ का प्रयाग

प्रश्न 6. बेणेश्वर धाम का मुख्य मंदिर किस देवता को समर्पित है?

 (अ) विष्णु (ब) ब्रह्मा (स) शिव (द) गणेश

  उत्तर: (स) शिव

प्रश्न 7. बेणेश्वर धाम में भक्ति और सामाजिक सुधार का प्रचार करने वाले संत कौन थे?

 (अ) संत मावजी महाराज (ब) संत पीपाजी (स) संत जांभोजी (द) संत दादूदयाल 

उत्तर: (अ) संत मावजी महाराज

प्रश्न 8. वागड़ अंचल में संत मावजी महाराज को किसका अवतार माना जाता है?

 (अ) शिव (ब) श्रीकृष्ण (स) राम (द) ब्रह्मा 

उत्तर: (ब) श्रीकृष्ण

प्रश्न 9. बेणेश्वर मेले की शुरुआत किस दिन ध्वजारोहण के साथ होती है?

 (अ) माघ कृष्ण एकादशी (ब) माघ शुक्ल एकादशी (स) माघ शुक्ल त्रयोदशी (द) माघ अमावस्या 

उत्तर: (ब) माघ शुक्ल एकादशी

प्रश्न 10. बेणेश्वर मेले में मुख्यतः किस जनजाति के लोग सबसे अधिक संख्या में भाग लेते हैं? 

(अ) मीणा (ब) गरासिया (स) भील (द) सहरिया 

उत्तर: (स) भील

प्रश्न 11. बेणेश्वर मेले में दिवंगत परिजनों की अस्थियों के संगम में विसर्जन की परंपरा को क्या कहा जाता है?

 (अ) तर्पण यात्रा (ब) अस्थि-विसर्जन (स) पिंडदान मेला (द) मोक्ष स्नान 

उत्तर: (ब) अस्थि-विसर्जन

प्रश्न 12. मावजी महाराज की गद्दी (पीठ) किस स्थान पर स्थित है, जहाँ से पालकी-यात्रा बेणेश्वर आती है?

 (अ) साबला (ब) सागवाड़ा (स) आसपुर (द) गलियाकोट 

उत्तर: (अ) साबला

प्रश्न 13. बेणेश्वर मेले में राजस्थान के अतिरिक्त किन राज्यों से आदिवासी बड़ी संख्या में आते हैं?

 (अ) पंजाब व हरियाणा (ब) मध्य प्रदेश व गुजरात (स) उत्तर प्रदेश व बिहार (द) महाराष्ट्र व कर्नाटक 

उत्तर: (ब) मध्य प्रदेश व गुजरात

प्रश्न 14. निम्न में से किस नदी को बेणेश्वर के त्रिवेणी संगम में विलुप्तप्राय बताया जाता है?

 (अ) सोम (ब) माही (स) जाखम (द) बनास 

उत्तर: (स) जाखम

प्रश्न 15. बेणेश्वर धाम परिसर में शिव मंदिर के अतिरिक्त निम्न में से किस मंदिर का उल्लेख नहीं मिलता? 

(अ) राधा-कृष्ण मंदिर (ब) वाल्मीकि मंदिर (स) ब्रह्मा मंदिर (द) एकलिंगजी मंदिर 

उत्तर: (द) एकलिंगजी मंदिर व्याख्या: एकलिंगजी मंदिर उदयपुर के निकट कैलाशपुरी में स्थित है, बेणेश्वर परिसर से इसका कोई संबंध नहीं है — यह एक सामान्य भ्रामक विकल्प है।

प्रश्न 16. स्थानीय वागड़ी भाषा में "बेणेश्वर" शब्द किस अर्थ से जुड़ा माना जाता है? 

(अ) पर्वतों का स्वामी (ब) डेल्टा का स्वामी (स) वनों का रक्षक (द) संगम का देवता उत्तर: (ब) डेल्टा का स्वामी

प्रश्न 17. बेणेश्वर मेले को लेकर प्रचलित लोक-मान्यता के अनुसार, यदि संगम पर कौन-सी नदी पहले पूर्ण प्रवाह से बहे तो अच्छी धान की फसल होती है?

 (अ) माही (ब) सोम (स) जाखम (द) बनास

  उत्तर: (ब) सोम

प्रश्न 18. बेणेश्वर मेले में अस्थि-विसर्जन के समय श्रद्धालु किस दिशा की ओर मुख करते हैं? 

(अ) उत्तर (ब) पूर्व (स) दक्षिण (द) पश्चिम

  उत्तर: (स) दक्षिण

प्रश्न 19. बेणेश्वर मेले को राजस्थान सरकार द्वारा किस उपाधि से मान्यता प्राप्त है?

 (अ) राज्य मेला (ब) राष्ट्रीय बेणेश्वर मेला (स) अंतरराष्ट्रीय जनजातीय मेला (द) राजकीय कुंभ मेला 

उत्तर: (ब) राष्ट्रीय बेणेश्वर मेला

प्रश्न 20. निम्न में से कौन-सा युग्म सही सुमेलित है?

 (अ) पुष्कर मेला — माघ पूर्णिमा (ब) बेणेश्वर मेला — कार्तिक पूर्णिमा (स) बेणेश्वर मेला — माघ पूर्णिमा (द) चंद्रभागा मेला — माघ पूर्णिमा 

उत्तर: (स) बेणेश्वर मेला — माघ पूर्णिमा

महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

बेणेश्वर मेला हिंदू पंचांग के माघ मास में लगता है, जिसका शुभारंभ माघ शुक्ल एकादशी को ध्वजारोहण से होता है और मुख्य मेला व स्नान माघ पूर्णिमा को होता है।

बेणेश्वर मेला राजस्थान के डूंगरपुर जिले में, सोम-माही-जाखम नदियों के त्रिवेणी संगम पर आयोजित होता है।

यह वागड़ अंचल का सबसे बड़ा जनजातीय मेला है, जहाँ भील समुदाय के लाखों श्रद्धालु पवित्र त्रिवेणी संगम में स्नान करते हैं और अपने दिवंगत परिजनों की अस्थियों का विसर्जन करते हैं — यह परंपरा हिंदू कुंभ स्नान से मिलती-जुलती होने के कारण इसे "आदिवासियों का कुंभ" कहा जाता है।

बेणेश्वर धाम का मुख्य मंदिर भगवान शिव को समर्पित है (बेणेश्वर महादेव), यद्यपि परिसर में ब्रह्मा, विष्णु, राधा-कृष्ण व वाल्मीकि के मंदिर भी स्थित हैं।

संत मावजी महाराज को वागड़ अंचल में भगवान श्रीकृष्ण का अवतार माना जाता है; उन्होंने बेणेश्वर में भक्ति व सामाजिक-सुधार की परंपरा स्थापित की, और उनकी गद्दी (साबला की हरि मंदिर पीठ) के महंत आज भी प्रतिवर्ष मेले में पालकी-यात्रा के साथ पहुँचते हैं।

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