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देवगढ़ चित्रकला शैली: इतिहास, विशेषताएँ एवं प्रमुख चित्रकार

Sudhir SirSudhir Sir (इतिहास विशेषज्ञ)
2 अक्टूबर 2026
अंतिम समीक्षा: 2 अक्टूबर 2026
9 मिनट पठन

कैसे बना: यह नोट सुयोग अकादमी के लेखक ने परीक्षा सिलेबस के अनुसार लिखा/संपादित किया है। अंतिम समीक्षा तिथि ऊपर है। त्रुटि दिखे तो संपर्क करें। टीम परिचय

स्रोत आधार: RPSC / RSMSSB कला-संस्कृति इकाई (लोक कला, मेले, किले)। सिलेबस विषय; कॉपीराइट सामग्री का पेस्ट नहीं।

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देवगढ़ चित्रकला शैली: इतिहास, विशेषताएँ एवं प्रमुख चित्रकार

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⚡ Quick Answer: देवगढ़ चित्रकला शैली मेवाड़ शैली की एक प्रमुख ठिकाना उपशैली है, जो वर्तमान राजसमंद जिले के देवगढ़ में चूंडावत रावतों के संरक्षण में विकसित हुई। इसका प्रारंभ रावत द्वारिकादास चूंडावत के समय (लगभग 1680 ई.) माना जाता है और 18वीं सदी के उत्तरार्ध से 19वीं सदी के प्रारंभ तक यह उत्कर्ष पर रही। प्रमुख चित्रकार — बगता, कँवला, चोखा, बैजनाथ। इस शैली में मेवाड़, मारवाड़ और जयपुर (ढूंढाड़) — तीनों शैलियों का समन्वय दिखता है। इसे प्रकाश में लाने का श्रेय कला-इतिहासकार डॉ. श्रीधर अंधारे को है। देवगढ़ के मोती महल व अजारा की ओवरी के भित्ति चित्र प्रसिद्ध हैं।

1. देवगढ़ चित्रकला शैली — परिचय

मेवाड़ राज्य के अंतर्गत अनेक बड़े ठिकाने (जागीरें) थे, जिनके सामंत महाराणा के अधीन रहते हुए भी अपने दरबार में कलाकारों को संरक्षण देते थे। इन ठिकानों में विकसित चित्र-परंपराओं को ‘ठिकाना शैलियाँ’ कहा जाता है — जैसे देवगढ़, शाहपुरा, बनेड़ा, बागोर, सलूंबर। इनमें देवगढ़ सबसे प्रसिद्ध और परीक्षा की दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।

देवगढ़ मेवाड़ और मारवाड़ की सीमा पर स्थित होने के कारण दोनों क्षेत्रों के कलात्मक प्रभावों का संगम-स्थल बना। मेवाड़ की मूल शैली के लिए मेवाड़ चित्रकला शैली और मारवाड़ के लिए मारवाड़ चित्रकला शैली पढ़ें; यह नोट केवल देवगढ़ ठिकाना शैली — इतिहास, चित्रकार, भित्ति चित्र और विशेषताओं पर केंद्रित है।

तथ्यविवरण
मूल शैलीमेवाड़ शैली (ठिकाना उपशैली)
स्थानदेवगढ़, राजसमंद जिला (मेवाड़-मारवाड़ सीमा)
संरक्षकचूंडावत रावत (मेवाड़ के ‘सोलह’ प्रथम श्रेणी सामंतों में)
प्रारंभरावत द्वारिकादास चूंडावत का काल (लगभग 1680 ई.)
उत्कर्ष काल18वीं सदी उत्तरार्ध – 19वीं सदी प्रारंभ
प्रमुख चित्रकारबगता, कँवला, चोखा, बैजनाथ
प्रमुख भित्ति चित्र स्थलमोती महल, अजारा की ओवरी (देवगढ़)
समन्वयमेवाड़ + मारवाड़ + जयपुर (ढूंढाड़)
प्रकाश में लाने वालेडॉ. श्रीधर अंधारे (कला-इतिहासकार)

2. देवगढ़ ठिकाना और चूंडावत संरक्षण

चूंडावत वंश मेवाड़ के राणा लाखा के ज्येष्ठ पुत्र चूंडा के वंशज हैं, जिन्होंने अपने पिता के वचन की रक्षा हेतु सिंहासन त्याग दिया था (‘मेवाड़ का भीष्म’)। चूंडावत सरदार मेवाड़ के सबसे प्रतिष्ठित सामंतों में रहे। देवगढ़ के चूंडावत रावतों ने 17वीं सदी के अंत में अपना ठिकाना सुदृढ़ किया और दरबार में चित्रकारों को आश्रय दिया।

  • रावत द्वारिकादास चूंडावत — शैली के प्रारंभिक संरक्षक (लगभग 1680)।
  • बाद के रावतों के समय देवगढ़ में चित्रकारों का एक परिवार-आधारित कार्यशाला तंत्र विकसित हुआ, जिसमें बगता व उनकी अगली पीढ़ियाँ (चोखा, बैजनाथ आदि) प्रमुख रहीं।
  • चित्रकारों का मेवाड़ (उदयपुर) दरबार से भी संपर्क रहा — इसलिए देवगढ़ के चित्रों में उदयपुर दरबारी शैली की झलक भी मिलती है।

3. देवगढ़ शैली के प्रमुख चित्रकार

चित्रकारयोगदान
बगतादेवगढ़ शैली के सबसे प्रसिद्ध चित्रकार; दरबार, शिकार व रावतों के व्यक्ति-चित्र; पूर्व में उदयपुर दरबार से संबद्ध माने जाते हैं
कँवलाबगता परंपरा के चित्रकार; दरबारी व धार्मिक विषय
चोखादेवगढ़ के प्रमुख चित्रकार; अभिव्यक्तिपूर्ण चेहरे, ऊर्जावान रेखांकन; उदयपुर दरबार के लिए भी कार्य
बैजनाथचोखा परंपरा के चित्रकार; 19वीं सदी के प्रारंभिक चित्र

नोट: चित्रकारों के पारिवारिक संबंधों (पिता-पुत्र) को लेकर विद्वानों में मतभेद हैं; परीक्षा में चारों नाम — बगता, कँवला, चोखा, बैजनाथ — देवगढ़ से संबद्ध रूप में पूछे जाते हैं।

4. देवगढ़ के भित्ति चित्र — मोती महल व अजारा की ओवरी

  • मोती महल: देवगढ़ महल का भाग, जहाँ दरबारी जीवन, शिकार, उत्सव व धार्मिक प्रसंगों के रंगीन भित्ति चित्र हैं।
  • अजारा की ओवरी: ‘ओवरी’ = कक्ष/कोठरी; इसकी दीवारों पर बने चित्र देवगढ़ भित्ति परंपरा के श्रेष्ठ उदाहरण हैं।
  • तकनीक: चूने के पलस्तर पर प्राकृतिक रंग — आराइश परंपरा जैसी विधि।
  • संरक्षण: देवगढ़ महल (वर्तमान में ‘देवगढ़ महल’ हेरिटेज होटल) में भित्ति चित्रों का संरक्षण पर्यटन से भी जुड़ा है।

5. देवगढ़ शैली की प्रमुख विशेषताएँ

  1. त्रि-शैली समन्वय: मेवाड़ के चटख रंग व धार्मिक विषय + मारवाड़ की वीर-ऊर्जा व पुरुष आकृतियाँ + जयपुर की दरबारी भव्यता।
  2. शिकार दृश्य: सूअर, शेर, हिरण का शिकार — रावतों के घोड़े पर शिकार के गतिशील चित्र।
  3. दरबारी जीवन: रावतों का दरबार, उत्सव, होली-दीपावली, हाथी-घोड़ों की सवारी।
  4. व्यक्ति-चित्र: ठिकानेदारों व सामंतों के आकर्षक चित्र।
  5. सशक्त रेखांकन: मोटी, स्पष्ट व ऊर्जावान रेखाएँ; चेहरों पर भाव-अभिव्यक्ति।
  6. रंग: चटख पीला, लाल, हरा; पाठ्यपुस्तकों में देवगढ़ को पीले रंग की अधिकता से भी जोड़ा जाता है।
  7. धार्मिक विषय: कृष्ण-लीला, रामायण, देवी-देवता।
  8. पृष्ठभूमि: पहाड़ियाँ, वृक्ष, खुले मैदान — अरावली का भू-दृश्य।

6. मेवाड़ की ठिकाना उपशैलियाँ — तुलनात्मक दृष्टि

ठिकाना शैलीवर्तमान जिलाविशेष पहचान
देवगढ़राजसमंदबगता-चोखा; मोती महल व अजारा की ओवरी; त्रि-शैली समन्वय
नाथद्वाराराजसमंदश्रीनाथजी व पिछवाई — देखें पिछवाई नोट
शाहपुराभीलवाड़ाफड़ चित्रकला का प्रमुख केंद्र (जोशी परिवार)
बनेड़ाभीलवाड़ाठिकाना चित्र परंपरा
सलूंबर, बागोरसलूंबर/उदयपुरमेवाड़ दरबारी परंपरा से प्रभावित

नाथद्वारा उपशैली के लिए नाथद्वारा की पिछवाई चित्रकला और शाहपुरा के लिए फड़ चित्रकला देखें।

7. देवगढ़ बनाम मूल मेवाड़ (उदयपुर) शैली

आधारमेवाड़ (उदयपुर/चावंड)देवगढ़
संरक्षणमहाराणा (राज दरबार)चूंडावत रावत (ठिकाना दरबार)
प्रमुख चित्रकारनासिरुद्दीन, साहिबदीन, मनोहरबगता, कँवला, चोखा, बैजनाथ
प्रमुख विषयरागमाला, रामायण, भागवतशिकार, दरबार, व्यक्ति-चित्र
बाहरी प्रभावअपेक्षाकृत स्वदेशीमारवाड़ व जयपुर का प्रभाव
प्रसिद्ध कृति/स्थलरागमाला (1605, चावंड)मोती महल, अजारा की ओवरी

8. देवगढ़ शैली का कला-इतिहास में महत्व

  • यह सिद्ध करती है कि राजस्थानी चित्रकला केवल राजधानियों तक सीमित नहीं थी — ठिकानों ने भी उच्च कोटि की कला को संरक्षण दिया।
  • मेवाड़-मारवाड़ सीमा पर स्थित होने से यह शैलियों के आदान-प्रदान का जीवंत उदाहरण है।
  • 18वीं-19वीं सदी के सामंती जीवन (शिकार, दरबार, उत्सव) का प्रामाणिक दृश्य दस्तावेज़।
  • डॉ. श्रीधर अंधारे के शोध ने इसे अंतरराष्ट्रीय कला-इतिहास में स्थान दिलाया।

9. Mains उत्तर-ढाँचा: ‘देवगढ़ चित्रकला शैली की विशेषताएँ’ (10 अंक)

  1. परिचय (2 पंक्ति): मेवाड़ की ठिकाना उपशैली; राजसमंद; चूंडावत संरक्षण; प्रारंभ ≈1680।
  2. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: रावत द्वारिकादास; मेवाड़-मारवाड़ सीमा पर स्थिति।
  3. चित्रकार: बगता, कँवला, चोखा, बैजनाथ — परिवार-आधारित कार्यशाला।
  4. विशेषताएँ (5-6 बिंदु): त्रि-शैली समन्वय, शिकार-दरबार, सशक्त रेखांकन, चटख रंग, व्यक्ति-चित्र, भू-दृश्य।
  5. भित्ति चित्र: मोती महल, अजारा की ओवरी।
  6. निष्कर्ष: ठिकाना कला-संरक्षण का उदाहरण; डॉ. श्रीधर अंधारे का शोध।

इस ढाँचे में लिखा गया 150-200 शब्दों का उत्तर संतुलित और अंक-योग्य माना जाता है। तथ्य के साथ एक-दो विशिष्ट उदाहरण (जैसे ‘अजारा की ओवरी’) अवश्य जोड़ें।

📝 One-Liner Revision — देवगढ़ शैली (18 प्रश्न)

  1. प्रश्न: देवगढ़ शैली किस मूल शैली की उपशैली?
    उत्तर: मेवाड़
  2. प्रश्न: देवगढ़ किस जिले में?
    उत्तर: राजसमंद
  3. प्रश्न: देवगढ़ के संरक्षक वंश?
    उत्तर: चूंडावत रावत
  4. प्रश्न: देवगढ़ शैली का प्रारंभ किसके काल में?
    उत्तर: रावत द्वारिकादास चूंडावत (लगभग 1680)
  5. प्रश्न: देवगढ़ शैली के चार प्रमुख चित्रकार?
    उत्तर: बगता, कँवला, चोखा, बैजनाथ
  6. प्रश्न: देवगढ़ शैली को प्रकाश में लाने वाले?
    उत्तर: डॉ. श्रीधर अंधारे
  7. प्रश्न: देवगढ़ के प्रसिद्ध भित्ति चित्र स्थल?
    उत्तर: मोती महल, अजारा की ओवरी
  8. प्रश्न: देवगढ़ में किन तीन शैलियों का समन्वय?
    उत्तर: मेवाड़, मारवाड़, जयपुर
  9. प्रश्न: ‘ओवरी’ शब्द का अर्थ?
    उत्तर: कक्ष/कोठरी
  10. प्रश्न: चूंडावत किसके वंशज?
    उत्तर: राणा लाखा के पुत्र चूंडा
  11. प्रश्न: ‘मेवाड़ का भीष्म’ किसे कहते हैं?
    उत्तर: चूंडा
  12. प्रश्न: देवगढ़ शैली के प्रमुख विषय?
    उत्तर: शिकार, दरबार, व्यक्ति-चित्र
  13. प्रश्न: पाठ्यपुस्तकों में देवगढ़ से जुड़ा प्रधान रंग?
    उत्तर: पीला
  14. प्रश्न: मेवाड़ की अन्य ठिकाना शैली (फड़ केंद्र)?
    उत्तर: शाहपुरा (भीलवाड़ा)
  15. प्रश्न: नाथद्वारा किस जिले में?
    उत्तर: राजसमंद
  16. प्रश्न: ठिकाना शैली का अर्थ?
    उत्तर: सामंतों (जागीरदारों) के दरबार में विकसित चित्र-परंपरा
  17. प्रश्न: देवगढ़ का भौगोलिक महत्व?
    उत्तर: मेवाड़-मारवाड़ सीमा पर स्थित
  18. प्रश्न: देवगढ़ शैली का उत्कर्ष काल?
    उत्तर: 18वीं सदी उत्तरार्ध – 19वीं सदी प्रारंभ

✅ मुख्य बिंदु (Key Points) — एक नज़र में

  • देवगढ़ — मेवाड़ की ठिकाना उपशैली; राजसमंद जिला।
  • संरक्षक — चूंडावत रावत; प्रारंभ — रावत द्वारिकादास (≈1680)।
  • चित्रकार — बगता, कँवला, चोखा, बैजनाथ।
  • भित्ति चित्र — मोती महल, अजारा की ओवरी।
  • समन्वय — मेवाड़ + मारवाड़ + जयपुर; विषय — शिकार, दरबार।
  • प्रकाश में लाए — डॉ. श्रीधर अंधारे।

🎯 Exam Trap — इन गलतियों से बचें

  1. देवगढ़ को मारवाड़ की उपशैली मानना — मूल रूप से मेवाड़ की ठिकाना शैली (मारवाड़ का प्रभाव है)।
  2. देवगढ़ को उदयपुर जिले में रखना — देवगढ़ राजसमंद में।
  3. चोखा को किशनगढ़/बूँदी से जोड़ना — चोखा देवगढ़ (व उदयपुर) से संबद्ध।
  4. देवगढ़ (राजसमंद) व देवगढ़ (प्रतापगढ़ का ऐतिहासिक नाम) में भ्रम — चित्रकला शैली राजसमंद वाले देवगढ़ की है।

🧠 मेमोरी ट्रिक

“बगता-कँवला-चोखा-बैजनाथ — देवगढ़ के चार साथ”।

“मोती की ओवरी” — मोती महल व अजारा की ओवरी।

👨‍🏫 शिक्षक की परीक्षा टिप्पणी

देवगढ़ शैली पर प्रश्न सामान्यतः तीन रूपों में आते हैं — ‘देवगढ़ किस मूल शैली की उपशैली है’, ‘बगता/चोखा किस शैली से’ और ‘अजारा की ओवरी कहाँ है’। इन तीनों का उत्तर यही नोट देता है। Mains में ‘राजस्थान की ठिकाना चित्र शैलियाँ’ पर लिखते समय देवगढ़ को मुख्य उदाहरण बनाएँ और शाहपुरा (फड़) व नाथद्वारा (पिछवाई) से तुलना करें — यह उत्तर को व्यापक बनाता है।

📚 संबंधित नोट्स (आगे क्या पढ़ें?)

📖 प्रामाणिक संदर्भ एवं स्रोत

  • डॉ. श्रीधर अंधारे — देवगढ़ चित्रकला पर शोध-लेख एवं प्रकाशन।
  • डॉ. जयसिंह नीरज — ‘राजस्थानी चित्रकला’।
  • डॉ. गोपीनाथ शर्मा — ‘राजस्थान का इतिहास’ (मेवाड़ के सामंत)।
  • RBSE — ‘राजस्थान का इतिहास एवं संस्कृति’।

Author Byline

लेखक: सुयोग अकादमी कला एवं संस्कृति संपादकीय टीम

तथ्य जाँच एवं संपादन: सुधीर ढाका (BSc-BEd), सुयोग अकादमी

विषय: देवगढ़ चित्रकला शैली: इतिहास, विशेषताएँ एवं प्रमुख चित्रकार

परीक्षा उपयोगिता: RAS/RTS, RPSC स्कूल व्याख्याता/वरिष्ठ अध्यापक (कला/इतिहास), Rajasthan CET, पटवारी, VDO, REET Mains, राजस्थान पुलिस एवं अन्य RSMSSB परीक्षाएँ

संपादकीय नोट: देवगढ़ के चित्रकारों के पारिवारिक संबंध व सटीक कालक्रम पर विद्वानों में मतभेद हैं; यहाँ परीक्षा-उपयोगी सर्वमान्य तथ्य दिए गए हैं।

अंतिम समीक्षा: 2 अक्टूबर 2026

अंतिम संशोधन (Last Updated): 2 अक्टूबर 2026
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Sudhir Sirइतिहास विशेषज्ञलेखक परिचय
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🎯 विगत वर्षों के प्रश्न (Interactive PYQs)

Q1. देवगढ़ चित्रकला शैली किस मूल शैली से संबंधित है?

सुयोग अभ्यास प्रश्न (RPSC/RSMSSB पैटर्न) 2026

Q2. देवगढ़ शैली के प्रमुख चित्रकार हैं —

सुयोग अभ्यास प्रश्न (RPSC/RSMSSB पैटर्न) 2026

Q3. ‘अजारा की ओवरी’ के भित्ति चित्र किस शैली से संबंधित हैं?

सुयोग अभ्यास प्रश्न (RPSC/RSMSSB पैटर्न) 2026

Q4. देवगढ़ शैली को प्रकाश में लाने का श्रेय किसे है?

सुयोग अभ्यास प्रश्न (RPSC/RSMSSB पैटर्न) 2026

Q5. देवगढ़ किस जिले में स्थित है?

सुयोग अभ्यास प्रश्न (RPSC/RSMSSB पैटर्न) 2026

महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

देवगढ़ चित्रकला शैली मेवाड़ शैली की ठिकाना उपशैली है, जो राजसमंद जिले के देवगढ़ में विकसित हुई।

बगता, कँवला, चोखा और बैजनाथ देवगढ़ शैली के प्रमुख चित्रकार थे।

कला-इतिहासकार डॉ. श्रीधर अंधारे ने देवगढ़ शैली को प्रकाश में लाया।

अजारा की ओवरी देवगढ़ महल का एक कक्ष है, जिसकी दीवारों पर देवगढ़ शैली के प्रसिद्ध भित्ति चित्र बने हैं।

देवगढ़ शैली में मेवाड़, मारवाड़ और जयपुर (ढूंढाड़) शैलियों का समन्वय दिखता है।

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