राजस्थान में मौर्यकाल: अशोक, बैराठ एवं बौद्ध धर्म का प्रभाव

परिचय
राजस्थान का प्राचीन इतिहास केवल सिंधु-सरस्वती सभ्यता, आहड़ -बनास संस्कृति, कालीबंगा और गणेश्वर-जोधपुरा जैसी प्राचीन सभ्यताओं तक सीमित नहीं है। राजस्थान के इतिहास में मौर्यकाल एक महत्वपूर्ण परिवर्तनकारी चरण था, जब राजस्थान का एक बड़ा भाग पहली बार एक शक्तिशाली अखिल-भारतीय साम्राज्य की राजनीतिक और सांस्कृतिक गतिविधियों से जुड़ा। विशेष रूप से बैराठ (प्राचीन विराटनगर) मौर्यकालीन राजस्थान का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र बनकर सामने आता है।
सम्राट अशोक के समय बैराठ में बौद्ध धर्म से संबंधित गतिविधियों, अभिलेखों और स्थापत्य अवशेषों की उपस्थिति इस बात का महत्वपूर्ण प्रमाण है कि मौर्यकाल में राजस्थान के कुछ क्षेत्रों में बौद्ध धर्म का प्रभाव स्थापित हुआ था। बैराठ से प्राप्त अशोक के दो अभिलेख, बीजक की पहाड़ी के बौद्ध अवशेष तथा मौर्यकालीन स्थापत्य इसे राजस्थान के प्राचीन इतिहास और पुरातत्व का अत्यंत महत्वपूर्ण केंद्र बनाते हैं।
भारतीय इतिहास में अशोक को सामान्यतः धम्म, बौद्ध धर्म, अहिंसा, नैतिक जीवन और धार्मिक सहिष्णुता की नीति के लिए जाना जाता है। राजस्थान के संदर्भ में अशोक का महत्व विशेष रूप से इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि बैराठ से प्राप्त अभिलेख उसके व्यक्तिगत धार्मिक विश्वास तथा बौद्ध संघ और बौद्ध साहित्य के प्रति उसकी आस्था पर प्रकाश डालते हैं।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अनुसार बैराठ, जिसे प्राचीन विराटनगर से जोड़ा जाता है, यहाँ प्राप्त दो अशोक अभिलेखों तथा महत्वपूर्ण बौद्ध अवशेषों के कारण विशेष रूप से प्रसिद्ध है। बीजक की पहाड़ी पर खुदाई से मौर्यकालीन गोलाकार स्तूप-श्राइन और मठ के अवशेष भी मिले हैं।
मौर्यकाल क्या था?
मौर्य साम्राज्य प्राचीन भारत के सबसे शक्तिशाली और विस्तृत साम्राज्यों में से एक था। इसकी स्थापना लगभग चौथी शताब्दी ईसा पूर्व में चंद्रगुप्त मौर्य ने की। चंद्रगुप्त मौर्य ने नंद सत्ता को समाप्त करके मगध में मौर्य सत्ता स्थापित की और बाद में विशाल साम्राज्य का निर्माण किया।
मौर्य वंश के प्रमुख शासक थे—
चंद्रगुप्त मौर्य
बिंदुसार
अशोक
चंद्रगुप्त मौर्य के शासनकाल में मौर्य साम्राज्य का विस्तार पश्चिमोत्तर भारत तक हुआ। अशोक के समय साम्राज्य ने और अधिक विस्तार प्राप्त किया तथा कलिंग युद्ध के बाद अशोक की नीतियों में महत्वपूर्ण परिवर्तन आया।
राजस्थान और मौर्य साम्राज्य
राजस्थान का पूरा क्षेत्र मौर्य साम्राज्य के प्रत्यक्ष प्रशासन में किस सीमा तक था, यह विषय इतिहासकारों के बीच अध्ययन का विषय रहा है। लेकिन बैराठ से प्राप्त अशोक के अभिलेख और मौर्यकालीन बौद्ध स्थापत्य इस बात का स्पष्ट पुरातात्त्विक प्रमाण देते हैं कि वर्तमान राजस्थान का बैराठ क्षेत्र मौर्यकालीन राजनीतिक-सांस्कृतिक संपर्क में महत्वपूर्ण स्थान रखता था।
इसलिए राजस्थान के इतिहास में मौर्यकाल को समझने के लिए सबसे महत्वपूर्ण केंद्र है—
बैराठ — प्राचीन विराटनगर — अशोक — बौद्ध धर्म — अभिलेख
यही श्रृंखला राजस्थान के मौर्यकाल को समझने का सबसे सरल और प्रभावी तरीका है।
बैराठ: राजस्थान में मौर्यकाल का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र
बैराठ राजस्थान के प्राचीन इतिहास का अत्यंत महत्वपूर्ण पुरातात्त्विक स्थल है। इसे प्राचीन विराटनगर से जोड़ा जाता है। वर्तमान प्रशासनिक व्यवस्था में बैराठ क्षेत्र कोटपूतली-बहरोड़ जिले में आता है; पुराने स्रोतों और पुरानी पुस्तकों में इसे जयपुर जिले के अंतर्गत भी बताया गया है। यह जिला पुनर्गठन के कारण परीक्षा की दृष्टि से ध्यान देने योग्य तथ्य है।
बैराठ का महत्व केवल मौर्यकाल तक सीमित नहीं है। यहाँ प्रागैतिहासिक काल से लेकर ऐतिहासिक काल तक विभिन्न चरणों के पुरातात्त्विक साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। किंतु राजस्थान के मौर्यकालीन इतिहास में इसका महत्व मुख्यतः निम्न कारणों से है—
अशोक के दो अभिलेख
बौद्ध धर्म से संबंधित साक्ष्य
बीजक की पहाड़ी
मौर्यकालीन गोलाकार बौद्ध स्थापत्य
मठ के अवशेष
अशोक और बौद्ध संघ के संबंधों का प्रमाण
प्राचीन विराटनगर की ऐतिहासिक पहचान
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अनुसार बैराठ को प्राचीन विराटनगर से जोड़ा जाता है और यहाँ बीजक की पहाड़ी पर मौर्यकालीन गोलाकार स्तूप-श्राइन तथा मठ के अवशेष मिले हैं।
बैराठ और प्राचीन विराटनगर
बैराठ की पहचान प्राचीन विराटनगर से की जाती है। प्राचीन साहित्यिक परंपरा में विराटनगर को मत्स्य जनपद से जोड़ा जाता है।
महाभारत की परंपरा में राजा विराट का उल्लेख मिलता है और विराटनगर को मत्स्य क्षेत्र की राजधानी के रूप में जाना जाता है। हालांकि महाभारत संबंधी परंपराओं और पुरातात्त्विक इतिहास को अलग-अलग स्तरों पर समझना चाहिए।
प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए महत्वपूर्ण संबंध इस प्रकार याद रखा जा सकता है—
बैराठ → विराटनगर → मत्स्य क्षेत्र → बाणगंगा क्षेत्र → मौर्यकालीन महत्व → अशोक के अभिलेख → बौद्ध धर्म
बैराठ का भौगोलिक महत्व भी उल्लेखनीय है। यह क्षेत्र बाणगंगा नदी के आसपास स्थित प्राचीन सांस्कृतिक क्षेत्र से जुड़ा रहा है।
बैराठ में मौर्यकालीन पुरातात्त्विक साक्ष्य
बैराठ के पुरातात्त्विक अवशेष राजस्थान में मौर्यकालीन संस्कृति के अध्ययन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
यहाँ से प्राप्त प्रमुख साक्ष्यों को चार भागों में समझा जा सकता है—
1. अशोक के अभिलेख
बैराठ से अशोक के दो महत्वपूर्ण अभिलेख मिले हैं।
2. बौद्ध स्थापत्य
बीजक की पहाड़ी पर गोलाकार बौद्ध स्थापत्य के अवशेष मिले हैं।
3. बौद्ध मठ
मठीय संरचनाओं के अवशेष बौद्ध संघ की उपस्थिति का संकेत देते हैं।
4. अन्य पुरातात्त्विक अवशेष
बैराठ क्षेत्र में विभिन्न कालों के पुरातात्त्विक अवशेष मिले हैं, जिससे इसकी सांस्कृतिक निरंतरता का पता चलता है।
बैराठ के पुरातात्त्विक परिदृश्य में अशोक के अभिलेखों और बौद्ध स्थापत्य के बीच संबंध इसे मौर्यकालीन धार्मिक इतिहास का महत्वपूर्ण केंद्र बनाता है।
अशोक और राजस्थान
सम्राट अशोक मौर्य वंश का सबसे प्रसिद्ध शासक था। उसके शासनकाल में मौर्य साम्राज्य राजनीतिक रूप से अत्यंत शक्तिशाली था।
अशोक के शासनकाल को समझते समय दो अवधारणाओं में अंतर करना जरूरी है—
बौद्ध धर्म और अशोक का धम्म।
अशोक स्वयं बौद्ध धर्म से प्रभावित हुआ और उसके कुछ अभिलेखों में बुद्ध, धम्म और संघ के प्रति उसकी श्रद्धा स्पष्ट दिखाई देती है। लेकिन शासन की व्यापक नीति के रूप में उसका धम्म केवल बौद्ध धार्मिक सिद्धांतों तक सीमित नहीं था।
उसका धम्म नैतिक आचरण, दया, अहिंसा, माता-पिता के सम्मान, प्राणियों के प्रति करुणा, धार्मिक सहिष्णुता और सामाजिक सद्भाव जैसे मूल्यों पर आधारित था।
राजस्थान के संदर्भ में अशोक का सबसे महत्वपूर्ण प्रमाण बैराठ के अभिलेख हैं।
अशोक का बैराठ से संबंध
बैराठ से प्राप्त अशोक के अभिलेख यह दर्शाते हैं कि यह क्षेत्र अशोक की दृष्टि में महत्वपूर्ण था।
आधुनिक शोध में बैराठ के दो अशोक अभिलेखों को विशेष महत्व दिया जाता है—
बैराठ लघु शिलालेख / Minor Rock Edict
भाब्रू या कलकत्ता-बैराठ अभिलेख
इन दोनों को एक ही अभिलेख समझना सही नहीं है। प्रतियोगी परीक्षाओं में यही एक महत्वपूर्ण तथ्यात्मक भ्रम हो सकता है।
भाब्रू शिलालेख
भाब्रू शिलालेख क्या है?
भाब्रू शिलालेख अशोक के सबसे महत्वपूर्ण अभिलेखों में से एक है। इसे बैराठ शिलालेख या कलकत्ता-बैराठ शिलालेख भी कहा जाता है।
यह अभिलेख विशेष रूप से इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें अशोक की बुद्ध, धम्म और संघ के प्रति श्रद्धा का स्पष्ट उल्लेख मिलता है।
इस अभिलेख के माध्यम से अशोक के बौद्ध धर्म के प्रति व्यक्तिगत संबंध को समझने में महत्वपूर्ण सहायता मिलती है।
भारत में अशोक के अभिलेखों के अध्ययन के संदर्भ में बैराठ का यह अभिलेख इसलिए भी विशेष है क्योंकि इसमें बौद्ध साहित्य के अध्ययन की अनुशंसा से संबंधित सामग्री मिलती है। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के एक अध्ययन के अनुसार इस अभिलेख में अशोक ने बुद्ध, धम्म और संघ के प्रति अपनी आस्था व्यक्त की तथा बौद्ध अध्ययन के लिए सात ग्रंथों/पाठों की अनुशंसा की थी।
भाब्रू शिलालेख की खोज
भाब्रू शिलालेख की खोज का संबंध कैप्टन बर्ट से जोड़ा जाता है।
यह अभिलेख बैराठ की बीजक की पहाड़ी से संबंधित है। बाद में इसे कोलकाता ले जाया गया, इसलिए इसे कलकत्ता-बैराठ अभिलेख भी कहा जाता है।
इसके वर्तमान संरक्षण स्थान को लेकर प्रतियोगी परीक्षाओं में सामान्यतः एशियाटिक सोसाइटी, कोलकाता का उल्लेख किया जाता है।
परीक्षा के लिए याद रखें
बीजक की पहाड़ी → भाब्रू शिलालेख → अशोक → बुद्ध-धम्म-संघ → बौद्ध धर्म
भाब्रू शिलालेख का ऐतिहासिक महत्व
भाब्रू शिलालेख केवल एक धार्मिक अभिलेख नहीं है। यह अशोक के व्यक्तिगत धार्मिक दृष्टिकोण और बौद्ध समुदाय से उसके संबंधों को समझने के लिए महत्वपूर्ण प्राथमिक स्रोत है।
इससे निम्न बातें समझने में सहायता मिलती है—
1. अशोक की बौद्ध धर्म में आस्था
अशोक ने बुद्ध और बौद्ध परंपरा के प्रति सम्मान व्यक्त किया।
2. बुद्ध, धम्म और संघ का उल्लेख
बौद्ध धर्म के प्रमुख त्रिरत्नों का उल्लेख इस अभिलेख की विशेषता है।
3. बौद्ध साहित्य का उल्लेख
अभिलेख में कुछ बौद्ध शिक्षाओं/ग्रंथों को अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण बताया गया।
4. बैराठ का बौद्ध केंद्र होना
अभिलेख और स्थापत्य अवशेष मिलकर बैराठ की बौद्ध गतिविधियों के महत्व को दर्शाते हैं।
5. अशोक की धार्मिक नीति को समझने में सहायता
यह अभिलेख बताता है कि अशोक के बौद्ध धर्म से व्यक्तिगत संबंध को केवल बाद के साहित्यिक स्रोतों से नहीं, बल्कि उसके स्वयं के अभिलेखों से भी समझा जा सकता है।
अशोक का दूसरा बैराठ अभिलेख
बैराठ से अशोक का एक अन्य अभिलेख भी प्राप्त हुआ है, जिसे Minor Rock Edict से जोड़ा जाता है।
यह अभिलेख अशोक के व्यापक लघु शिलालेखों की परंपरा का हिस्सा है।
इस अभिलेख और भाब्रू अभिलेख को अलग-अलग समझना आवश्यक है।
दोनों अभिलेखों का सरल अंतर
आधार | बैराठ लघु शिलालेख | भाब्रू/कलकत्ता-बैराठ अभिलेख |
|---|---|---|
संबंधित शासक | अशोक | अशोक |
स्थान | बैराठ क्षेत्र | बैराठ से प्राप्त |
प्रकृति | लघु शिलालेख | विशेष बौद्ध धार्मिक अभिलेख |
मुख्य महत्व | अशोक के धम्म और संदेश का प्रमाण | बुद्ध, धम्म, संघ के प्रति श्रद्धा |
बौद्ध संबंध | अप्रत्यक्ष/व्यापक संदर्भ | अत्यंत स्पष्ट |
विशेष तथ्य | अशोक के अभिलेखीय प्रसार का हिस्सा | बौद्ध ग्रंथों/पाठों की अनुशंसा |
बैराठ क्षेत्र में दो अशोक अभिलेखों की उपस्थिति आधुनिक शोध में भी प्रमुख विषय रही है। बैराठ के दोनों अभिलेखों को उसके भौगोलिक और पुरातात्त्विक संदर्भ में समझना मौर्यकालीन इतिहास के पुनर्निर्माण के लिए महत्वपूर्ण है।
बीजक की पहाड़ी
बीजक की पहाड़ी बैराठ का सबसे महत्वपूर्ण पुरातात्त्विक क्षेत्र है।
यहाँ से—
अशोक से संबंधित अभिलेख
मौर्यकालीन बौद्ध स्थापत्य
गोलाकार मंदिर/चैत्य जैसी संरचना
स्तूप
मठीय अवशेष
प्राप्त हुए हैं।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अनुसार बीजक की पहाड़ी की विभिन्न सतहों पर उत्खनन से मौर्यकालीन गोलाकार स्तूप-श्राइन के अवशेष मिले। इसमें ईंटों से निर्मित संरचना और 26 अष्टकोणीय लकड़ी के स्तंभों की व्यवस्था का उल्लेख मिलता है। इसके आगे मठीय अवशेष भी मिले, जिनमें खुले आंगन के चारों ओर कक्षों की दोहरी पंक्ति थी।
बैराठ का गोलाकार बौद्ध मंदिर
बैराठ की सबसे उल्लेखनीय स्थापत्य उपलब्धियों में से एक यहाँ प्राप्त गोलाकार बौद्ध स्थापत्य है।
इस संरचना में केंद्रीय स्तूप के चारों ओर स्तंभों की व्यवस्था और बाहरी घेरा दिखाई देता है।
यह प्रारंभिक बौद्ध स्थापत्य के विकास को समझने में महत्वपूर्ण है।
बैराठ की यह संरचना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रारंभिक भारतीय वास्तुकला में इस प्रकार की गोलाकार स्वतंत्र संरचनाएँ दुर्लभ हैं।
इसकी प्रमुख विशेषताएँ
गोलाकार योजना
केंद्रीय स्तूप
स्तंभों की व्यवस्था
ईंटों का उपयोग
लकड़ी के स्तंभों के अवशेष/आधार
धार्मिक उपयोग
समीप मठीय परिसर
इस प्रकार बैराठ केवल अभिलेखीय स्थल नहीं था, बल्कि यहाँ वास्तविक बौद्ध धार्मिक-संस्थागत गतिविधियों के पुरातात्त्विक प्रमाण भी मौजूद थे।
बैराठ का बौद्ध मठ
बीजक की पहाड़ी पर प्राप्त मठीय अवशेष बैराठ में बौद्ध संघ की गतिविधियों की ओर संकेत करते हैं।
मठ में कक्षों की व्यवस्था एक खुले आंगन के आसपास की गई थी। इससे अनुमान लगाया जाता है कि यह स्थान केवल पूजा का केंद्र नहीं था, बल्कि भिक्षुओं के निवास और धार्मिक गतिविधियों के लिए भी उपयोग किया जाता था।
यही कारण है कि बैराठ को राजस्थान में मौर्यकालीन बौद्ध धर्म के प्रमुख केंद्र के रूप में पढ़ाया जाता है।
राजस्थान में बौद्ध धर्म का प्रभाव
मौर्यकाल में बौद्ध धर्म का विस्तार भारत के विभिन्न भागों में हुआ। अशोक की व्यक्तिगत आस्था और उसके संरक्षण ने बौद्ध धर्म को व्यापक भौगोलिक क्षेत्र में फैलने में सहायता की।
राजस्थान में बौद्ध धर्म के प्रभाव के सबसे महत्वपूर्ण प्रमाणों में बैराठ का स्थान प्रमुख है।
हालांकि यह कहना उचित नहीं होगा कि पूरे राजस्थान में बौद्ध धर्म समान रूप से प्रभावशाली हो गया था।
राजस्थान के अधिकांश क्षेत्रों से मौर्यकालीन बौद्ध अवशेष बहुत अधिक मात्रा में नहीं मिले हैं। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के राजस्थान संबंधी अध्ययन में भी उल्लेख है कि अशोक के समय राजस्थान में बौद्ध धर्म की उपस्थिति के बावजूद इसके बौद्ध स्मारक अपेक्षाकृत कम और बिखरे हुए हैं।
इससे एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक निष्कर्ष निकलता है—
मौर्यकाल में राजस्थान में बौद्ध धर्म का प्रभाव था, लेकिन उसका प्रभाव पूरे राजस्थान में समान रूप से व्यापक नहीं था।
अशोक का धम्म और राजस्थान
अशोक के इतिहास को समझने में धम्म अत्यंत महत्वपूर्ण अवधारणा है।
अशोक का धम्म किसी एक संप्रदाय तक सीमित धार्मिक व्यवस्था नहीं था। यह नैतिक और सामाजिक जीवन को बेहतर बनाने की नीति थी।
इसमें प्रमुख रूप से निम्न मूल्यों पर बल दिया गया—
माता-पिता का सम्मान
गुरुजनों का सम्मान
ब्राह्मणों और श्रमणों के प्रति आदर
प्राणियों के प्रति दया
अहिंसा
संयम
सत्यनिष्ठा
धार्मिक सहिष्णुता
सामाजिक सद्भाव
नैतिक जीवन
इसलिए प्रतियोगी परीक्षाओं में यह अंतर याद रखना आवश्यक है—
अशोक का व्यक्तिगत धर्म = बौद्ध धर्म से गहरा संबंध
लेकिन
अशोक का राजकीय धम्म = व्यापक नैतिक-सामाजिक आचार संहिता
यह अंतर राजस्थान के इतिहास के साथ-साथ भारतीय इतिहास के प्रश्नों में भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
क्या अशोक ने राजस्थान में बौद्ध धर्म का प्रचार किया?
बैराठ से प्राप्त अभिलेख और बौद्ध स्थापत्य यह प्रमाणित करते हैं कि अशोक के समय बैराठ में बौद्ध धर्म से संबंधित गतिविधियाँ थीं।
अशोक के अभिलेखों का उद्देश्य केवल धार्मिक प्रचार नहीं था। वे नैतिक आचरण और शासन संबंधी संदेशों को भी जनता तक पहुँचाने का माध्यम थे।
भाब्रू अभिलेख का स्वरूप विशेष है क्योंकि इसमें अशोक की बौद्ध आस्था स्पष्ट रूप से सामने आती है।
इसलिए राजस्थान के संदर्भ में कहा जा सकता है कि—
अशोक के शासनकाल में बैराठ बौद्ध धर्म और मौर्यकालीन धार्मिक-सांस्कृतिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र बना।
मौर्य प्रशासन और राजस्थान
मौर्य साम्राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था अत्यंत संगठित थी।
मौर्य प्रशासन की प्रमुख विशेषताओं में शामिल थे—
केंद्रीकृत शासन
प्रांतीय प्रशासन
अधिकारियों की नियुक्ति
कर व्यवस्था
राजकीय नियंत्रण
व्यापारिक मार्गों की निगरानी
कानून और व्यवस्था
विशाल सेना
राजस्थान का भूगोल उत्तर भारत, पश्चिमी भारत और गुजरात की ओर जाने वाले मार्गों के बीच स्थित होने के कारण रणनीतिक और व्यापारिक दृष्टि से महत्वपूर्ण था।
बैराठ का स्थान भी प्राचीन मार्गों से जुड़ा हुआ था। इसलिए इसका महत्व केवल धार्मिक नहीं बल्कि भौगोलिक और व्यापारिक संपर्क की दृष्टि से भी देखा जा सकता है।
राजस्थान में मौर्यकालीन संस्कृति की प्रमुख विशेषताएँ
राजस्थान में मौर्यकाल को केवल राजनीतिक विस्तार के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। इस काल में विभिन्न सांस्कृतिक और धार्मिक संपर्क भी विकसित हुए।
1. बौद्ध धर्म का प्रवेश और प्रभाव
बैराठ इसके सबसे महत्वपूर्ण प्रमाणों में से है।
2. अभिलेखीय परंपरा
अशोक के अभिलेख राजस्थान के प्राचीन इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण लिखित स्रोतों में शामिल हैं।
3. स्थापत्य विकास
बैराठ का गोलाकार बौद्ध स्थापत्य प्रारंभिक धार्मिक वास्तुकला की महत्वपूर्ण कड़ी है।
4. मठीय जीवन
मठ के अवशेष बौद्ध संघ की संस्थागत उपस्थिति की ओर संकेत करते हैं।
5. उत्तर भारत से संपर्क
मौर्य साम्राज्य के विस्तार के कारण राजस्थान का कुछ क्षेत्र व्यापक भारतीय राजनीतिक-सांस्कृतिक नेटवर्क से जुड़ा।
मौर्यकालीन राजस्थान के स्रोत
राजस्थान के मौर्यकालीन इतिहास को समझने के लिए इतिहासकारों को विभिन्न प्रकार के स्रोतों का सहारा लेना पड़ता है।
1. अभिलेख
सबसे महत्वपूर्ण स्रोत हैं—
अशोक के अभिलेख।
बैराठ के अभिलेख विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे सीधे मौर्य सम्राट अशोक से जुड़े हैं।
2. पुरातात्त्विक अवशेष
बैराठ की खुदाई से प्राप्त—
स्तूप
गोलाकार धार्मिक संरचना
मठ
ईंट संरचनाएँ
स्तंभों के अवशेष
मौर्यकालीन सांस्कृतिक जीवन को समझने में सहायता करते हैं।
3. साहित्यिक स्रोत
बौद्ध साहित्य और अन्य प्राचीन ग्रंथों से भी मौर्य और बौद्ध इतिहास की जानकारी मिलती है।
लेकिन साहित्यिक स्रोतों को पुरातात्त्विक और अभिलेखीय प्रमाणों के साथ मिलाकर पढ़ना अधिक उचित है।
बैराठ के उत्खनन और पुरातात्त्विक अध्ययन
बैराठ के महत्व को आधुनिक पुरातत्वविदों ने व्यवस्थित उत्खनन और अध्ययन के माध्यम से सामने रखा।
बैराठ में प्रारंभिक पुरातात्त्विक कार्य और बाद के उत्खननों ने इस क्षेत्र की बहुस्तरीय ऐतिहासिक प्रकृति को सामने लाया।
विशेष रूप से रायबहादुर दयाराम साहनी का नाम बैराठ के उत्खनन से जुड़ा है। बाद में पुरातत्व विभाग द्वारा यहाँ व्यापक कार्य किया गया।
बैराठ के पुरातात्त्विक अध्ययन से यह स्पष्ट हुआ कि यहाँ केवल किसी एक काल की संस्कृति नहीं थी, बल्कि इस क्षेत्र में लंबे समय तक मानवीय गतिविधियाँ होती रहीं।
बैराठ और अशोक: सबसे महत्वपूर्ण तथ्य
राजस्थान इतिहास की परीक्षा की दृष्टि से बैराठ से जुड़े निम्न तथ्यों को विशेष रूप से याद रखना चाहिए—
बैराठ
प्राचीन विराटनगर से संबंधित महत्वपूर्ण पुरातात्त्विक स्थल।
बीजक की पहाड़ी
बैराठ का प्रमुख मौर्यकालीन पुरातात्त्विक क्षेत्र।
अशोक के अभिलेख
बैराठ से दो अशोक अभिलेख प्राप्त हुए हैं।
भाब्रू शिलालेख
अशोक की बौद्ध आस्था का महत्वपूर्ण अभिलेखीय प्रमाण।
बुद्ध-धम्म-संघ
भाब्रू अभिलेख का प्रमुख धार्मिक संदर्भ।
बौद्ध स्थापत्य
बैराठ से गोलाकार बौद्ध संरचना और स्तूप के अवशेष।
बौद्ध मठ
बीजक की पहाड़ी पर मठीय अवशेष।
वर्तमान प्रशासनिक संदर्भ
बैराठ वर्तमान में कोटपूतली-बहरोड़ जिले से संबंधित है; पुराने स्रोतों में इसे जयपुर जिले में रखा गया मिलता है।
मौर्यकाल के बाद राजस्थान: शुंग काल की ओर संक्रमण
मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद भारतीय उपमहाद्वीप में राजनीतिक परिस्थितियों में महत्वपूर्ण बदलाव आया।
मौर्य सत्ता के कमजोर होने के बाद शुंग वंश का उदय हुआ। शुंग वंश की स्थापना पुष्यमित्र शुंग ने की।
मौर्योत्तर काल में राजस्थान का राजनीतिक इतिहास पहले की तरह किसी एक साम्राज्य के अधीन नहीं रहा। विभिन्न स्थानीय और क्षेत्रीय शक्तियों का प्रभाव बढ़ा।
इसीलिए राजस्थान के इतिहास में मौर्यकाल से शुंग काल की ओर संक्रमण को समझते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि राजनीतिक सत्ता के बदलने का अर्थ यह नहीं था कि पहले से मौजूद सांस्कृतिक या धार्मिक परंपराएँ तुरंत समाप्त हो गईं।
राजस्थान में शुंग काल
शुंग काल सामान्यतः मौर्य साम्राज्य के बाद का महत्वपूर्ण चरण माना जाता है।
शुंग वंश का केंद्र मुख्यतः मध्य भारत और गंगा क्षेत्र में था। राजस्थान में शुंगकालीन प्रभाव को समझने के लिए प्रत्यक्ष प्रमाण मौर्यकाल की तुलना में कम स्पष्ट हैं।
फिर भी मौर्योत्तर राजस्थान में विभिन्न धार्मिक परंपराओं और स्थानीय शक्तियों के विकास की प्रक्रिया को समझने के लिए शुंग काल महत्वपूर्ण है।
इस काल में—
क्षेत्रीय शक्तियों का विकास
व्यापारिक गतिविधियों का निरंतर विस्तार
धार्मिक संस्थाओं का विकास
कला एवं स्थापत्य में परिवर्तन
स्थानीय राजनीतिक केंद्रों का महत्व
जैसी प्रक्रियाएँ दिखाई देती हैं।
मौर्य और शुंग काल में अंतर
आधार | मौर्य काल | शुंग काल |
|---|---|---|
प्रमुख सत्ता | मौर्य वंश | शुंग वंश |
प्रमुख संस्थापक | चंद्रगुप्त मौर्य | पुष्यमित्र शुंग |
प्रसिद्ध शासक | अशोक | पुष्यमित्र शुंग |
राजस्थान में प्रमुख केंद्र | बैराठ | प्रत्यक्ष प्रमाण अपेक्षाकृत कम |
बौद्ध संदर्भ | अशोक के समय स्पष्ट | क्षेत्रीय और विविध परिस्थितियाँ |
प्रमुख स्रोत | अशोक के अभिलेख, पुरातात्त्विक अवशेष | पुरातात्त्विक एवं साहित्यिक स्रोत |
ऐतिहासिक महत्व | राजनीतिक एकीकरण एवं अशोक का धम्म | मौर्योत्तर क्षेत्रीय राजनीतिक विकास |
क्या शुंग काल में बौद्ध धर्म समाप्त हो गया?
यह एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक प्रश्न है।
शुंग काल को कभी-कभी केवल "बौद्ध विरोधी काल" के रूप में प्रस्तुत कर दिया जाता है, लेकिन इतिहास को इतने सरल तरीके से नहीं समझना चाहिए।
शुंग काल में कुछ क्षेत्रों में बौद्ध संस्थानों और स्मारकों की गतिविधियाँ जारी रहीं। इसलिए किसी एक शासक या वंश की धार्मिक नीति को पूरे भारत में एक समान प्रभाव के रूप में देखना उचित नहीं है।
राजस्थान के संदर्भ में भी यह आवश्यक है कि मौर्यकालीन बैराठ की बौद्ध गतिविधियों को सीधे शुंगकालीन राजनीतिक परिस्थितियों के साथ जोड़कर कोई अतिरंजित निष्कर्ष न निकाला जाए।
राजस्थान के इतिहास में मौर्यकाल का महत्व
राजस्थान में मौर्यकाल का महत्व कई स्तरों पर समझा जा सकता है।
राजनीतिक महत्व
मौर्य साम्राज्य के विस्तार ने राजस्थान के कुछ क्षेत्रों को व्यापक साम्राज्यवादी राजनीतिक व्यवस्था से जोड़ा।
धार्मिक महत्व
अशोक के संरक्षण और बौद्ध धर्म के विस्तार के कारण बैराठ जैसे केंद्रों में बौद्ध गतिविधियों को प्रोत्साहन मिला।
स्थापत्य महत्व
बैराठ का गोलाकार बौद्ध स्थापत्य प्रारंभिक भारतीय वास्तुकला के अध्ययन में महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
अभिलेखीय महत्व
अशोक के बैराठ अभिलेख राजस्थान के प्राचीन इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण प्राथमिक स्रोतों में हैं।
सांस्कृतिक महत्व
मौर्यकाल में राजस्थान के कुछ क्षेत्रों का उत्तर भारत और व्यापक भारतीय सांस्कृतिक क्षेत्र से संपर्क मजबूत हुआ।
राजस्थान में बौद्ध धर्म के प्रभाव की सीमाएँ
यह कहना गलत होगा कि अशोक के समय पूरे राजस्थान में बौद्ध धर्म प्रमुख धर्म बन गया था।
बौद्ध धर्म का प्रभाव राजस्थान में क्षेत्रीय और केंद्रित दिखाई देता है। बैराठ इसके सबसे मजबूत प्रमाणों में से एक है।
राजस्थान की भौगोलिक परिस्थितियाँ भी विविध थीं। पश्चिमी राजस्थान का विशाल मरुस्थलीय क्षेत्र, दक्षिणी राजस्थान के पहाड़ी क्षेत्र और पूर्वी राजस्थान के नदी-मैदानी क्षेत्र अलग-अलग प्रकार की आर्थिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों के केंद्र रहे।
इसीलिए बौद्ध धर्म के प्रसार को पूरे राजस्थान में एक समान प्रक्रिया के रूप में देखना ऐतिहासिक रूप से उचित नहीं है।
राजस्थान में बौद्ध अवशेषों की तुलनात्मक कमी के बावजूद बैराठ के अभिलेख और स्थापत्य इसे अत्यंत महत्वपूर्ण बनाते हैं।
बैराठ क्यों बना बौद्ध केंद्र?
बैराठ के बौद्ध केंद्र के रूप में विकसित होने के पीछे कई संभावित कारण माने जा सकते हैं।
भौगोलिक स्थिति
बैराठ पूर्वी राजस्थान में स्थित था और प्राचीन आवागमन मार्गों से जुड़ा था।
व्यापारिक संपर्क
व्यापारिक मार्गों पर स्थित नगरों में धार्मिक विचारों और संप्रदायों का प्रसार अपेक्षाकृत आसान होता था।
मौर्य संरक्षण
अशोक जैसे शासक के संरक्षण ने बौद्ध संस्थाओं के विकास को प्रोत्साहन दिया।
स्थानीय राजनीतिक महत्व
विराटनगर की प्राचीन राजनीतिक और सांस्कृतिक पहचान ने इसे एक महत्वपूर्ण केंद्र बनाया।
इन सभी कारणों ने मिलकर बैराठ को मौर्यकालीन राजस्थान का प्रमुख धार्मिक-सांस्कृतिक केंद्र बनाने में भूमिका निभाई होगी।
अशोक के अभिलेख: इतिहास के प्राथमिक स्रोत
अशोक के अभिलेख भारतीय इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण प्राथमिक स्रोतों में से हैं।
इन अभिलेखों के माध्यम से हमें स्वयं अशोक की नीतियों, विचारों और शासन संबंधी दृष्टिकोण के बारे में जानकारी मिलती है।
अशोक के अधिकांश अभिलेख प्राकृत भाषा और ब्राह्मी लिपि में पाए जाते हैं, जबकि उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों में अन्य लिपियों का भी उपयोग मिलता है।
बैराठ के अभिलेख विशेष महत्व रखते हैं क्योंकि वे अशोक के बौद्ध संबंधों और उसके धार्मिक दृष्टिकोण के बारे में प्रत्यक्ष जानकारी प्रदान करते हैं।
भाब्रू अभिलेख में बौद्ध त्रिरत्न
बौद्ध धर्म के तीन प्रमुख रत्न माने जाते हैं—
बुद्ध + धम्म + संघ
भाब्रू अभिलेख की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक है कि इसमें अशोक इन बौद्ध तत्वों के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करता है।
इस कारण राजस्थान इतिहास में एक अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य बनता है—
बैराठ का भाब्रू अभिलेख अशोक की बौद्ध आस्था का महत्वपूर्ण अभिलेखीय प्रमाण है।
यह तथ्य राजस्थान की लगभग सभी प्रमुख प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए महत्वपूर्ण है।
बैराठ का ऐतिहासिक महत्व: एक समग्र दृष्टि
यदि बैराठ को केवल एक "अशोक के शिलालेख वाला स्थान" मान लिया जाए तो इसके इतिहास का बड़ा हिस्सा छूट जाएगा।
बैराठ को एक बहुस्तरीय ऐतिहासिक परिदृश्य के रूप में समझना अधिक सही है।
यहाँ—
प्रागैतिहासिक गतिविधियाँ → प्राचीन विराटनगर → मत्स्य क्षेत्र → मौर्यकाल → अशोक → बौद्ध धर्म → शुंग एवं मौर्योत्तर परिवर्तन
जैसी विभिन्न ऐतिहासिक परतें दिखाई देती हैं।
यही बहुस्तरीयता बैराठ को राजस्थान के सबसे महत्वपूर्ण पुरातात्त्विक स्थलों में शामिल करती है।
प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए सुपर-फास्ट रिवीजन
राजस्थान + मौर्यकाल
मौर्य वंश
→ चंद्रगुप्त मौर्य से स्थापना
प्रमुख मौर्य शासक
→ चंद्रगुप्त मौर्य, बिंदुसार, अशोक
राजस्थान का प्रमुख मौर्यकालीन स्थल
→ बैराठ
प्राचीन नाम
→ विराटनगर
प्रमुख पहाड़ी
→ बीजक की पहाड़ी
प्रमुख शासक
→ सम्राट अशोक
अशोक के अभिलेख
→ बैराठ से दो
प्रमुख अभिलेख
→ भाब्रू/कलकत्ता-बैराठ अभिलेख
भाब्रू अभिलेख का महत्व
→ अशोक की बौद्ध आस्था का स्पष्ट प्रमाण
बौद्ध त्रिरत्न
→ बुद्ध, धम्म, संघ
प्रमुख पुरातात्त्विक अवशेष
→ गोलाकार बौद्ध संरचना, स्तूप, मठ
नदी क्षेत्र
→ बाणगंगा
वर्तमान जिला
→ कोटपूतली-बहरोड़
Exam Trap: इन तथ्यों में भ्रम न करें
भ्रम 1: बैराठ और भाब्रू अभिलेख एक ही हैं
दोनों को पूरी तरह समान नहीं मानना चाहिए। बैराठ से दो अशोक अभिलेख संबंधित हैं और भाब्रू/कलकत्ता-बैराठ अभिलेख उनमें से विशेष बौद्ध-संबंधी महत्व वाला अभिलेख है।
भ्रम 2: अशोक का धम्म = केवल बौद्ध धर्म
यह गलत है।
अशोक व्यक्तिगत रूप से बौद्ध धर्म से प्रभावित था, लेकिन उसका धम्म व्यापक नैतिक-सामाजिक नीति थी।
भ्रम 3: पूरे राजस्थान में बौद्ध धर्म का व्यापक प्रभुत्व था
ऐसा निष्कर्ष उपलब्ध पुरातात्त्विक प्रमाणों से नहीं निकाला जा सकता। बैराठ महत्वपूर्ण बौद्ध केंद्र था, लेकिन राजस्थान के अन्य क्षेत्रों में इसके प्रमाण तुलनात्मक रूप से सीमित हैं।
भ्रम 4: बैराठ केवल मौर्यकालीन स्थल है
बैराठ की ऐतिहासिक परंपरा इससे कहीं अधिक लंबी है। यहाँ विभिन्न कालों के पुरातात्त्विक साक्ष्य मिले हैं।
भ्रम 5: पुराने जिले की जानकारी को वर्तमान प्रशासन से मिलाना
पुरानी पुस्तकों में बैराठ को जयपुर जिले में बताया जा सकता है। वर्तमान प्रशासनिक व्यवस्था में बैराठ कोटपूतली-बहरोड़ जिले से संबंधित है। परीक्षा में प्रश्न के वर्ष और स्रोत के अनुसार प्रशासनिक संदर्भ को ध्यान से पढ़ें।
राजस्थान मौर्यकाल को याद रखने की ट्रिक
मौर्यकालीन राजस्थान को एक लाइन में याद करें—
"बैराठ में अशोक ने बुद्ध-धम्म-संघ का संदेश दिया और बौद्ध स्थापत्य ने मौर्यकालीन राजस्थान की पहचान बनाई।"
या फिर यह सूत्र याद रखें—
बैराठ → बीजक पहाड़ी → अशोक → भाब्रू अभिलेख → बुद्ध-धम्म-संघ → बौद्ध मठ → गोलाकार स्तूप
यह क्रम राजस्थान इतिहास के अधिकांश वस्तुनिष्ठ प्रश्नों में उपयोगी है।
राजस्थान के मौर्यकाल का ऐतिहासिक मूल्यांकन
राजस्थान में मौर्यकाल का मूल्यांकन करते समय केवल राजनीतिक नियंत्रण के प्रश्न पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है।
इस काल का वास्तविक महत्व तीन प्रमुख आयामों में दिखाई देता है—
1. साम्राज्य और क्षेत्रीय संपर्क
मौर्य साम्राज्य के विस्तार ने राजस्थान के कुछ क्षेत्रों को विशाल भारतीय राजनीतिक नेटवर्क से जोड़ा।
2. धर्म और विचार
अशोक की बौद्ध आस्था और धम्म नीति ने बैराठ जैसे केंद्रों को धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाया।
3. पुरातत्व और अभिलेख
बैराठ से प्राप्त अभिलेख और स्थापत्य अवशेष राजस्थान के प्राचीन इतिहास को प्रत्यक्ष प्रमाण प्रदान करते हैं।
इस प्रकार बैराठ केवल राजस्थान के इतिहास का एक अध्याय नहीं है, बल्कि यह मौर्य साम्राज्य, अशोक, बौद्ध धर्म, अभिलेखीय परंपरा और प्रारंभिक भारतीय स्थापत्य के बीच संबंधों को समझने की एक महत्वपूर्ण कड़ी है।
निष्कर्ष
राजस्थान में मौर्यकाल भारतीय इतिहास और राजस्थान के प्राचीन इतिहास के बीच एक महत्वपूर्ण सेतु का कार्य करता है। इस काल में राजस्थान के कुछ क्षेत्रों का संपर्क मौर्य साम्राज्य की व्यापक राजनीतिक और सांस्कृतिक व्यवस्था से हुआ।
इस पूरे कालखंड को समझने के लिए बैराठ या प्राचीन विराटनगर सबसे महत्वपूर्ण केंद्र है। यहाँ से प्राप्त अशोक के दो अभिलेख, विशेष रूप से भाब्रू/कलकत्ता-बैराठ अभिलेख, अशोक की बौद्ध आस्था और बुद्ध, धम्म तथा संघ के प्रति उसके सम्मान को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
बीजक की पहाड़ी पर प्राप्त गोलाकार बौद्ध स्थापत्य, स्तूप और मठ के अवशेष यह प्रमाणित करते हैं कि बैराठ केवल अभिलेखों का स्थान नहीं था, बल्कि यहाँ बौद्ध धार्मिक-संस्थागत गतिविधियों का भी महत्वपूर्ण केंद्र था। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण भी बैराठ को अशोक के अभिलेखों और मौर्यकालीन बौद्ध अवशेषों के कारण महत्वपूर्ण पुरातात्त्विक स्थल मानता है।
राजस्थान में बौद्ध धर्म का प्रभाव पूरे प्रदेश में समान रूप से व्यापक नहीं था, लेकिन बैराठ इसके प्रभाव का अत्यंत मजबूत और प्रत्यक्ष प्रमाण प्रस्तुत करता है। इस दृष्टि से बैराठ राजस्थान में अशोक, मौर्यकाल और बौद्ध धर्म के संबंधों को समझने की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है।
मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद शुंग काल और अन्य मौर्योत्तर राजनीतिक शक्तियों का विकास हुआ, लेकिन मौर्यकालीन सांस्कृतिक और धार्मिक प्रक्रियाओं का प्रभाव तत्काल समाप्त नहीं हुआ। यही कारण है कि राजस्थान के प्राचीन इतिहास में मौर्य से शुंग काल का संक्रमण राजनीतिक परिवर्तन के साथ-साथ सांस्कृतिक निरंतरता का भी अध्ययन प्रस्तुत करता है।
अंततः राजस्थान के प्रतियोगी परीक्षार्थियों के लिए इस पूरे विषय का सबसे महत्वपूर्ण सूत्र है—
बैराठ = विराटनगर + बीजक की पहाड़ी + अशोक के अभिलेख + भाब्रू अभिलेख + बुद्ध-धम्म-संघ + मौर्यकालीन बौद्ध स्थापत्य।
यही राजस्थान में मौर्यकाल, अशोक और बौद्ध धर्म के प्रभाव को समझने की आधारभूत कुंजी है।
सुयोग AI गुरु
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1000+ अभिकथन-कारण प्रश्न: RPSC और RSMSSB के latest exam pattern और recent papers पर आधारित - बिल्कुल वैसे जैसे अब exam में आते हैं।
🎯 विगत वर्षों के प्रश्न (Interactive PYQs)
Q1. राजस्थान में अशोक के अभिलेखों के लिए कौन-सा स्थल विशेष रूप से प्रसिद्ध है?
Rajasthan Patwari 2016Q2. प्राचीन विराटनगर की पहचान राजस्थान के किस स्थल से की जाती है?
Rajasthan CET 2023Q3. भाब्रू अभिलेख का संबंध किस मौर्य शासक से है?
RPSC 2018Q4. बैराठ का बीजक की पहाड़ी क्षेत्र किस कारण से ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण है?
REET 2021Q5. भाब्रू अभिलेख में अशोक की श्रद्धा मुख्यतः किनसे संबंधित दिखाई देती है?
Rajasthan Police 2020Q6. बैराठ में प्राप्त गोलाकार धार्मिक संरचना मुख्यतः किस काल से संबंधित मानी जाती है?
Rajasthan VDO 2022Q7. राजस्थान में मौर्यकालीन बौद्ध गतिविधियों का सबसे प्रमुख पुरातात्त्विक प्रमाण किस स्थल से मिलता है?
Rajasthan CET 2024Q8. अशोक के 'धम्म' को किस रूप में समझना अधिक उपयुक्त है?
RPSC 2020Q9. बैराठ से संबंधित 'कलकत्ता-बैराठ अभिलेख' का दूसरा प्रचलित नाम क्या है?
Rajasthan Patwari 2021Q10. बैराठ की पुरातात्त्विक पहचान मुख्यतः किस प्राचीन नगर से जोड़ी जाती है?
Rajasthan CET 2022Q11. मौर्यकालीन बैराठ में प्राप्त मठीय संरचना किस धार्मिक परंपरा से संबंधित थी?
REET 2022Q12. अशोक के किस अभिलेख में बौद्ध साहित्य के अध्ययन से संबंधित महत्वपूर्ण संकेत मिलते हैं?
RPSC 2019Q13. बैराठ को प्राचीन मत्स्य क्षेत्र से जोड़ने का प्रमुख आधार क्या है?
Rajasthan VDO 2021Q14. बैराठ में मौर्यकालीन बौद्ध स्थापत्य की कौन-सी विशेषता उल्लेखनीय है?
Rajasthan CET 2023Q15. मौर्य साम्राज्य के संदर्भ में अशोक का प्रमुख धार्मिक परिवर्तन किस घटना के बाद हुआ?
Rajasthan Police 2019महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)
राजस्थान में मौर्यकाल का सबसे महत्वपूर्ण पुरातात्त्विक स्थल बैराठ है, जिसे प्राचीन विराटनगर से जोड़ा जाता है। यहाँ अशोक के अभिलेख तथा मौर्यकालीन बौद्ध स्थापत्य के अवशेष मिले हैं।
बैराठ की पहचान प्राचीन विराटनगर से की जाती है। इसे प्राचीन मत्स्य क्षेत्र से भी जोड़ा जाता है।
बैराठ से सम्राट अशोक के दो महत्वपूर्ण अभिलेख मिले हैं।
भाब्रू अभिलेख सम्राट अशोक से संबंधित है और यह उसकी बौद्ध धर्म के प्रति आस्था का महत्वपूर्ण अभिलेखीय प्रमाण है। इसे कलकत्ता-बैराठ अभिलेख भी कहा जाता है।
भाब्रू अभिलेख में अशोक की बुद्ध, धम्म और संघ के प्रति श्रद्धा का उल्लेख मिलता है। इसमें बौद्ध शिक्षाओं और पाठों के अध्ययन से संबंधित महत्वपूर्ण संकेत भी मिलते हैं।
बैराठ की बीजक की पहाड़ी से अशोक के अभिलेख तथा मौर्यकालीन बौद्ध स्थापत्य, गोलाकार धार्मिक संरचना और मठीय अवशेष प्राप्त हुए हैं।
बैराठ से प्राप्त अशोक के अभिलेख और बौद्ध स्थापत्य राजस्थान में अशोक तथा बौद्ध धर्म के प्रभाव के प्रमुख प्रमाण हैं।
नहीं। अशोक व्यक्तिगत रूप से बौद्ध धर्म से प्रभावित था, लेकिन उसका धम्म व्यापक नैतिक-सामाजिक नीति थी, जिसमें दया, अहिंसा, बड़ों का सम्मान और धार्मिक सहिष्णुता जैसे मूल्य शामिल थे।
बैराठ की बीजक की पहाड़ी पर गोलाकार बौद्ध धार्मिक संरचना, स्तूप-संबंधी अवशेष तथा मठीय संरचना के प्रमाण मिले हैं।
नहीं। उपलब्ध पुरातात्त्विक प्रमाणों के आधार पर बौद्ध धर्म का प्रभाव पूरे राजस्थान में समान रूप से व्यापक नहीं माना जाता। बैराठ इसका सबसे प्रमुख प्रमाणित केंद्र है।
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