राजस्थान का मरुस्थलीय भू-आकृतिक स्वरूप: प्रमुख स्थलरूप एवं भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ

राजस्थान का पश्चिमी एवं उत्तर-पश्चिमी भाग मुख्यतः थार मरुस्थल का हिस्सा है। यहाँ कम वर्षा, उच्च तापमान, तेज हवाएँ, विरल वनस्पति तथा रेत की अधिकता के कारण विशिष्ट मरुस्थलीय भू-आकृतिक स्वरूप विकसित हुआ है। पवन अपरदन, परिवहन एवं निक्षेपण इस क्षेत्र के भू-दृश्य को निरंतर प्रभावित करते हैं।
प्रतियोगी परीक्षाओं जैसे RPSC, RSSB/RSMSSB, राजस्थान CET, REET, शिक्षक भर्ती एवं राजस्थान पुलिस में राजस्थान के मरुस्थलीय स्थलरूपों, बालुका स्तूपों, प्लाया झीलों और पवन-जनित भू-आकृतियों से संबंधित प्रश्न पूछे जाते हैं।
ध्यान दें: यह लेख मुख्य रूप से राजस्थान के मरुस्थलीय प्रदेश की भू-आकृतिक प्रक्रियाओं एवं स्थलरूपों पर केंद्रित है। थार मरुस्थल के विस्तृत भौगोलिक परिचय तथा बालुका स्तूपों के विस्तृत वर्गीकरण के लिए संबंधित विषयवार लेख देखें।
1. मरुस्थलीय भू-आकृति विज्ञान क्या है?
मरुस्थलीय भू-आकृति विज्ञान में उन भू-आकृतियों और प्रक्रियाओं का अध्ययन किया जाता है जो शुष्क एवं अर्द्ध-शुष्क क्षेत्रों में विकसित होती हैं।
राजस्थान के मरुस्थलीय क्षेत्र में प्रमुख रूप से निम्न प्रक्रियाएँ सक्रिय हैं—
पवन अपरदन
पवन परिवहन
पवन निक्षेपण
अपक्षय
सीमित जल अपरदन
बालुका का संचरण
लवण एवं महीन पदार्थों का निक्षेपण
मरुस्थल में वनस्पति का आवरण कम होने के कारण हवाओं का प्रभाव अपेक्षाकृत अधिक दिखाई देता है।
2. राजस्थान में मरुस्थलीय भू-आकृतिक प्रदेशराजस्थान का पश्चिमी भाग भारत के थार मरुस्थल का प्रमुख हिस्सा है। इसमें मुख्यतः—
जैसलमेर
बाड़मेर
बीकानेर
जैसलमेर
जोधपुर
चूरू
श्रीगंगानगर
हनुमानगढ़
नागौर
फलोदी
जालौर
आदि क्षेत्रों में विभिन्न मरुस्थलीय भू-आकृतियाँ दिखाई देती हैं।
इन क्षेत्रों में स्थलाकृति समान नहीं है। कहीं विस्तृत रेत के मैदान हैं, कहीं बालुका स्तूप हैं, तो कहीं चट्टानी एवं कंकरीले मरुस्थलीय क्षेत्र मिलते हैं।
3. मरुस्थलीय भू-आकृतियों के निर्माण में प्रमुख प्रक्रियाएँराजस्थान के मरुस्थलीय भू-दृश्य के निर्माण में निम्न प्रक्रियाओं की प्रमुख भूमिका है।
3.1 पवन अपरदन
मरुस्थलीय क्षेत्रों में तेज हवाएँ रेत, धूल एवं महीन कणों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाती हैं। इससे चट्टानों तथा भूमि की सतह का अपरदन होता है।
पवन अपरदन के प्रमुख प्रकार हैं—
अपघर्षण (Abrasion)
हवा के साथ उड़ने वाले रेत के कण चट्टानों से टकराकर उनकी सतह को घिसते हैं। इससे चट्टानों का क्षरण होता है।
अपवाहन/उड़ाव (Deflation)
हवा सतह से हल्के एवं महीन कणों को उड़ाकर दूसरी जगह ले जाती है। इससे भूमि की सतह पर अपेक्षाकृत मोटे कण और कंकड़ बच जाते हैं।
4. मरुस्थलीय पवन परिवहनहवा द्वारा रेत एवं धूल का एक स्थान से दूसरे स्थान तक परिवहन मरुस्थलीय भू-आकृति निर्माण की महत्वपूर्ण प्रक्रिया है।
हवा रेत के कणों को मुख्यतः तीन प्रकार से स्थानांतरित करती है—
4.1 Suspension
बहुत महीन धूल के कण हवा में लंबे समय तक निलंबित रह सकते हैं।
4.2 Saltation
रेत के अपेक्षाकृत छोटे कण हवा के प्रभाव से उछलते-कूदते हुए आगे बढ़ते हैं।
4.3 Surface Creep
भारी कण हवा के दबाव से भूमि की सतह पर लुढ़कते या सरकते हैं।
इन प्रक्रियाओं के कारण रेत का निरंतर स्थानांतरण होता रहता है और विभिन्न प्रकार के बालुका स्तूपों का निर्माण होता है।
5. पवन निक्षेपणजब हवा की गति कम हो जाती है, तो वह अपने साथ लाई गई रेत एवं धूल को जमा करने लगती है। इस प्रक्रिया को पवन निक्षेपण कहते हैं।
पवन निक्षेपण से राजस्थान में कई विशिष्ट भू-आकृतियाँ विकसित हुई हैं।
इनमें सबसे प्रमुख हैं—
बालुका स्तूप
रेत के टीले
बालुका मैदान
इंटरड्यून क्षेत्र
प्लाया निक्षेप
हवा द्वारा लाई गई रेत के एक स्थान पर जमा होने से बनने वाली ऊँची-नीची रेत की आकृतियों को बालुका स्तूप (Sand Dunes) कहा जाता है।
राजस्थान के पश्चिमी मरुस्थल की सबसे प्रमुख पहचान बालुका स्तूप हैं।
इनकी आकृति एवं दिशा मुख्यतः—
पवन की दिशा
पवन की गति
रेत की उपलब्धता
वनस्पति
भूमि की स्थिति
पर निर्भर करती है।
राजस्थान में विभिन्न प्रकार के बालुका स्तूप पाए जाते हैं।
प्रमुख प्रकार
बरखान
अनुप्रस्थ बालुका स्तूप
अनुदैर्ध्य बालुका स्तूप
परवलयिक बालुका स्तूप
तारा बालुका स्तूप
मिश्रित एवं जटिल बालुका स्तूप
परीक्षा तथ्य: बालुका स्तूप राजस्थान के पश्चिमी मरुस्थलीय क्षेत्र की प्रमुख भू-आकृतिक विशेषता हैं।
7. बरखानविस्तृत अध्ययन: राजस्थान के बालुका स्तूप—प्रकार, वितरण एवं विशेषताएँ।
बरखान (Barchan) अर्धचंद्राकार बालुका स्तूप होता है।
इसके दोनों सिरे पवन की दिशा में आगे की ओर निकले हुए दिखाई देते हैं। यह सामान्यतः उन क्षेत्रों में विकसित होता है जहाँ—
रेत की मात्रा सीमित हो
एक प्रमुख दिशा से हवाएँ चलती हों
भूमि अपेक्षाकृत खुली हो
बरखान गतिशील होते हैं और समय के साथ पवन की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।
8. अनुप्रस्थ बालुका स्तूपजब बालुका स्तूपों की लंबी दिशा सामान्यतः प्रमुख पवन दिशा के लगभग लंबवत होती है, तो उन्हें अनुप्रस्थ बालुका स्तूप (Transverse Dunes) कहा जाता है।
इनका निर्माण अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में उपलब्ध रेत और एक प्रमुख दिशा से आने वाली हवाओं के कारण हो सकता है।
9. अनुदैर्ध्य बालुका स्तूपअनुदैर्ध्य बालुका स्तूप (Longitudinal Dunes) प्रमुख पवन दिशा के लगभग समानांतर लंबे एवं संकरे रेत के टीले होते हैं।
इन्हें कई बार सीफ (Seif) dunes भी कहा जाता है।
राजस्थान के मरुस्थलीय प्रदेश में विभिन्न क्षेत्रों में अनुदैर्ध्य प्रकार के बालुका स्तूप पाए जाते हैं।
10. परवलयिक बालुका स्तूपपरवलयिक बालुका स्तूपों की आकृति सामान्यतः U या परवलय जैसी होती है।
इनके विकास में वनस्पति की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। जहाँ वनस्पति रेत को रोकती है, वहाँ पवन के प्रभाव से विशिष्ट परवलयिक आकृति विकसित हो सकती है।
11. तारा बालुका स्तूपजब हवाएँ विभिन्न दिशाओं से प्रभाव डालती हैं तो अनेक दिशाओं में विकसित होने वाले ऊँचे रेत के टीले तारा बालुका स्तूप (Star Dunes) कहलाते हैं।
इनकी आकृति बहु-भुजीय या तारे जैसी दिखाई देती है।
12. बालुका मैदानजहाँ रेत बहुत बड़े क्षेत्र में फैली होती है और स्पष्ट रूप से अलग-अलग ऊँचे बालुका स्तूप विकसित नहीं होते, वहाँ बालुका मैदान का निर्माण हो सकता है।
ऐसे क्षेत्रों में रेत की मोटी एवं महीन परतें व्यापक रूप से फैली होती हैं।
13. इंटरड्यून क्षेत्रदो बालुका स्तूपों के बीच स्थित अपेक्षाकृत नीचा क्षेत्र इंटरड्यून क्षेत्र (Interdune Area) कहलाता है।
इन क्षेत्रों में—
महीन रेत
मिट्टी
नमी
वनस्पति
की मात्रा आसपास के ऊँचे बालुका स्तूपों से अलग हो सकती है।
कुछ स्थानों पर ये क्षेत्र स्थानीय कृषि एवं चरागाह के लिए उपयोगी भी हो सकते हैं।
14. मरुस्थलीय समतल एवं पथरीले क्षेत्रराजस्थान का पूरा मरुस्थल केवल रेत से ढका हुआ नहीं है।
कुछ स्थानों पर—
चट्टानी सतह
कंकड़
बजरी
महीन मिट्टी
से बने विस्तृत क्षेत्र भी मिलते हैं।
पवन द्वारा महीन कणों के हट जाने के बाद भूमि पर मोटे कंकड़ एवं बजरी बच सकते हैं। इससे मरुस्थलीय सतह अपेक्षाकृत पथरीली दिखाई देती है।
15. डेजर्ट पेवमेंटपवन द्वारा महीन कणों के लगातार हट जाने पर भूमि की सतह पर अपेक्षाकृत मोटे कंकड़ एवं पत्थर रह जाते हैं। इस प्रकार विकसित सतह को डेजर्ट पेवमेंट (Desert Pavement) कहा जाता है।
यह मुख्यतः पवन अपरदन से जुड़ी भू-आकृतिक विशेषता है।
परीक्षा दृष्टि से:
डेजर्ट पेवमेंट का संबंध मुख्यतः पवन द्वारा महीन पदार्थों के हटाए जाने से है।
मरुस्थलीय क्षेत्रों में ऐसे उथले एवं अस्थायी जलाशय या झीलें, जिनमें वर्षा या सतही जल कुछ समय के लिए एकत्रित होता है और बाद में वाष्पीकरण के कारण सूख जाता है, प्लाया कहलाती हैं।
राजस्थान में इस प्रकार की अंतर्देशीय जल निकासी वाली झीलें और निम्न भूमि क्षेत्र महत्वपूर्ण हैं।
इनमें जल के वाष्पीकरण के बाद—
नमक
जिप्सम
अन्य घुलनशील खनिज
जैसे पदार्थों का निक्षेपण हो सकता है।
17. राजस्थान की प्रमुख खारी/लवणीय झीलें और मरुस्थलीय भू-आकृतिराजस्थान में कई झीलें एवं निम्न क्षेत्र मरुस्थलीय अथवा अर्द्ध-मरुस्थलीय भू-आकृतिक परिस्थितियों से जुड़े हैं।
सांभर झील राजस्थान की सबसे प्रसिद्ध खारे पानी की झील है। यह अंतर्देशीय जल निकासी प्रणाली और लवण निक्षेप के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
अन्य महत्वपूर्ण खारी झीलों में—
डीडवाना
पचपदरा
लूणकरणसर
आदि का उल्लेख किया जाता है।
18. मरुस्थलीय अपरदन में जल की भूमिकाराजस्थान का पश्चिमी मरुस्थल शुष्क है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि जल का भू-आकृतिक प्रभाव बिल्कुल नहीं है।
अल्प अवधि में होने वाली तेज वर्षा से—
अचानक बहाव
गली निर्माण
सतही अपरदन
अवसाद परिवहन
जैसी प्रक्रियाएँ हो सकती हैं।
इसलिए राजस्थान के मरुस्थलीय भू-दृश्य का निर्माण पवन के साथ-साथ अस्थायी जल प्रवाह से भी प्रभावित होता है।
19. मरुस्थलीय भू-आकृति निर्माण में जल एवं पवन का संयुक्त प्रभावराजस्थान के मरुस्थल को केवल पवन द्वारा निर्मित भू-दृश्य मानना सही नहीं होगा।
यहाँ दो प्रमुख एजेंट हैं—
पवन + जल
पवन लंबे समय तक धीरे-धीरे रेत और धूल को स्थानांतरित करता है, जबकि कभी-कभी होने वाली तेज वर्षा कम समय में सतह पर महत्वपूर्ण अपरदन कर सकती है।
इसी कारण मरुस्थलीय भू-दृश्य निरंतर परिवर्तनशील रहता है।
20. मरुस्थलीकरण और भू-आकृतिक परिवर्तनमरुस्थलीकरण केवल प्राकृतिक प्रक्रिया नहीं है। मानवीय गतिविधियाँ भी इसके विस्तार को प्रभावित कर सकती हैं।
प्रमुख कारणों में—
वनस्पति का अत्यधिक क्षरण
अतिचारण
जल का अत्यधिक दोहन
अनुचित कृषि पद्धतियाँ
भूमि का अत्यधिक उपयोग
पवन अपरदन
शामिल हो सकते हैं।
वनस्पति कम होने पर मिट्टी एवं रेत हवाओं द्वारा आसानी से उड़ाई जा सकती है।
21. इंदिरा गांधी नहर एवं मरुस्थलीय भू-दृश्य में परिवर्तनराजस्थान के पश्चिमी एवं उत्तर-पश्चिमी भाग में इंदिरा गांधी नहर परियोजना ने सिंचाई और भूमि उपयोग में महत्वपूर्ण परिवर्तन किया है।
नहर सिंचाई के कारण कई क्षेत्रों में—
कृषि का विस्तार
वनस्पति आवरण में वृद्धि
बसावट का विस्तार
भूमि उपयोग में परिवर्तन
देखने को मिला है।
हालाँकि सिंचित मरुस्थलीय क्षेत्रों में जलभराव एवं लवणता जैसी समस्याएँ भी कुछ स्थानों पर महत्वपूर्ण रही हैं।
22. राजस्थान के मरुस्थलीय भू-आकृतिक स्वरूप की प्रमुख विशेषताएँराजस्थान के मरुस्थलीय भू-दृश्य की प्रमुख विशेषताओं को इस प्रकार समझा जा सकता है—
| भू-आकृतिक विशेषता | प्रमुख प्रक्रिया |
|---|---|
| बालुका स्तूप | पवन निक्षेपण |
| बरखान | पवन निक्षेपण |
| अनुप्रस्थ स्तूप | पवन निक्षेपण |
| अनुदैर्ध्य स्तूप | पवन निक्षेपण |
| डेजर्ट पेवमेंट | पवन अपरदन/डिफ्लेशन |
| प्लाया | जल संचयन एवं वाष्पीकरण |
| लवण निक्षेप | वाष्पीकरण |
| रेत का परिवहन | पवन |
| सतही अपरदन | अस्थायी जल प्रवाह |
| रेत का संचयन | पवन निक्षेपण |
महत्वपूर्ण One-Liners
राजस्थान के मरुस्थलीय क्षेत्र में पवन प्रमुख भू-आकृतिक कारकों में से एक है।
हवा द्वारा महीन कणों को उड़ाकर ले जाने की प्रक्रिया को डिफ्लेशन कहा जाता है।
रेत के कणों द्वारा चट्टानों को घिसने की प्रक्रिया अपघर्षण (Abrasion) कहलाती है।
हवा द्वारा रेत के निक्षेपण से बालुका स्तूप बनते हैं।
अर्धचंद्राकार बालुका स्तूप को बरखान कहा जाता है।
दो बालुका स्तूपों के बीच का क्षेत्र इंटरड्यून क्षेत्र कहलाता है।
मरुस्थलीय क्षेत्र में महीन पदार्थों के हटने के बाद कंकड़युक्त सतह का निर्माण डेजर्ट पेवमेंट कहलाता है।
प्लाया में जल का संचयन अस्थायी होता है और वाष्पीकरण के बाद लवणीय निक्षेप बन सकते हैं।
राजस्थान का मरुस्थलीय भू-दृश्य केवल पवन से नहीं, बल्कि पवन एवं जल दोनों से प्रभावित है।
मरुस्थलीकरण को बढ़ाने वाले प्रमुख कारकों में वनस्पति क्षरण और अतिचारण महत्वपूर्ण हैं।
मरुस्थलीय भू-आकृतिक प्रक्रियाओं को इस क्रम में याद रखें—
अपरदन → परिवहन → निक्षेपण
अर्थात्—
हवा मिटाती है → हवा ले जाती है → हवा जमा करती है
इसी से—
डिफ्लेशन → रेत का परिवहन → बालुका स्तूप
का क्रम समझा जा सकता है।
25. निष्कर्षराजस्थान का मरुस्थलीय भू-आकृतिक स्वरूप अत्यंत गतिशील और विशिष्ट है। यहाँ की कम वर्षा, उच्च तापमान, विरल वनस्पति तथा तेज हवाएँ भू-दृश्य के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
पवन अपरदन, पवन परिवहन और पवन निक्षेपण के कारण बालुका स्तूप, डेजर्ट पेवमेंट तथा अन्य मरुस्थलीय स्थलरूप विकसित होते हैं। वहीं सीमित लेकिन तीव्र वर्षा से होने वाला जल अपरदन और प्लाया जैसे निम्न क्षेत्रों का विकास मरुस्थलीय भू-आकृति को और अधिक विविध बनाता है।
प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए इस विषय में विशेष रूप से बालुका स्तूप, बरखान, डिफ्लेशन, अपघर्षण, डेजर्ट पेवमेंट, प्लाया तथा पवन निक्षेपण को अच्छी तरह समझना आवश्यक है।
त्वरित पुनरावृत्ति
राजस्थान का मरुस्थलीय भू-आकृतिक स्वरूप =
पवन अपरदन + पवन परिवहन + पवन निक्षेपण + अस्थायी जल अपरदन
↓
मुख्य स्थलरूप
बालुका स्तूप + बरखान + अनुदैर्ध्य स्तूप + अनुप्रस्थ स्तूप + डेजर्ट पेवमेंट + प्लाया + इंटरड्यून क्षेत्र
यह विषय RPSC, RSSB/RSMSSB, राजस्थान CET, REET और अन्य राजस्थान-आधारित प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए महत्वपूर्ण है।
सुयोग AI गुरु
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Rajasthan GK Abhikathan-Karan (कथन-कारण प्रश्न) 1000+ MCQs | RPSC & RSMSSB New Exam Pattern
1000+ अभिकथन-कारण प्रश्न: RPSC और RSMSSB के latest exam pattern और recent papers पर आधारित - बिल्कुल वैसे जैसे अब exam में आते हैं।
🎯 विगत वर्षों के प्रश्न (Interactive PYQs)
Q1. मरुस्थलीय क्षेत्रों में महीन कणों को हवा द्वारा उड़ाकर ले जाने की प्रक्रिया को क्या कहा जाता है?
RPSC 2018Q2. अर्धचंद्राकार आकृति वाले बालुका स्तूप को किस नाम से जाना जाता है?
RPSC 2016Q3. मरुस्थलीय क्षेत्रों में रेत के कणों द्वारा चट्टानों की सतह को घिसने की प्रक्रिया क्या कहलाती है?
REET 2021Q4. बालुका स्तूपों का निर्माण मुख्यतः किस प्रक्रिया के परिणामस्वरूप होता है?
RPSC 2019Q5. दो बालुका स्तूपों के बीच स्थित अपेक्षाकृत नीचा क्षेत्र किस नाम से जाना जाता है?
CET Rajasthan 2022Q6. पवन द्वारा महीन कणों के हट जाने के बाद भूमि की सतह पर कंकड़ एवं मोटे पदार्थों के रह जाने से कौन-सी आकृति बनती है?
RSMSSB 2017Q7. जब हवा रेत के कणों को उछलते-कूदते हुए आगे ले जाती है, तो इस परिवहन को क्या कहा जाता है?
RPSC 2020Q8. बहुत महीन धूल के कणों का हवा में लंबे समय तक निलंबित रहकर परिवहन किस प्रक्रिया का उदाहरण है?
REET 2018Q9. हवा के दबाव से भारी रेत के कणों के भूमि की सतह पर लुढ़कने या सरकने को क्या कहा जाता है?
RPSC 2021Q10. मरुस्थलीय क्षेत्र में अस्थायी जल संचयन एवं बाद में वाष्पीकरण से बनने वाले निम्न क्षेत्र को सामान्यतः क्या कहा जाता है?
RPSC 2017Q11. राजस्थान के मरुस्थलीय भू-दृश्य के निर्माण में प्रमुख रूप से कौन-से दो प्राकृतिक कारक सक्रिय हैं?
Rajasthan CET 2023Q12. अनुदैर्ध्य बालुका स्तूप सामान्यतः किस दिशा में विकसित होते हैं?
RPSC 2019Q13. विभिन्न दिशाओं से आने वाली हवाओं के प्रभाव से बनने वाले बहु-भुजीय बालुका स्तूप को क्या कहा जाता है?
RSMSSB 2022Q14. मरुस्थलीय क्षेत्रों में पवन द्वारा रेत का एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाना किस प्रक्रिया का उदाहरण है?
REET 2020Q15. पवन की गति कम होने पर रेत के कणों का एक स्थान पर जमा होना किस प्रक्रिया को दर्शाता है?
RPSC 2018Q16. मरुस्थलीय क्षेत्रों में वनस्पति आवरण कम होने से कौन-सी प्रक्रिया अधिक प्रभावी हो सकती है?
Rajasthan CET 2024Q17. परवलयिक बालुका स्तूपों के विकास में किस कारक की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो सकती है?
RPSC 2020Q18. राजस्थान की प्रसिद्ध सांभर झील किस प्रकार की झील है?
RPSC 2015Q19. मरुस्थलीकरण को बढ़ावा देने वाली गतिविधियों में से कौन-सी एक प्रमुख गतिविधि है?
RSMSSB 2021Q20. इंदिरा गांधी नहर परियोजना से राजस्थान के पश्चिमी भाग में प्रमुख रूप से किस प्रकार का परिवर्तन हुआ है?
RPSC 2022महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)
राजस्थान के पश्चिमी एवं उत्तर-पश्चिमी भाग में पवन अपरदन, परिवहन, निक्षेपण तथा अस्थायी जल अपरदन से विकसित विभिन्न भू-आकृतियों और स्थलरूपों को राजस्थान का मरुस्थलीय भू-आकृतिक स्वरूप कहा जाता है।
पवन अपरदन, पवन परिवहन, पवन निक्षेपण, अपक्षय तथा अल्प अवधि में होने वाला जल अपरदन इसकी प्रमुख भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ हैं।
जब तेज हवाएँ भूमि की सतह से महीन एवं हल्के कणों को उड़ाकर दूसरी जगह ले जाती हैं, तो इस प्रक्रिया को डिफ्लेशन या अपवाहन कहा जाता है।
हवा के साथ उड़ने वाले रेत के कण जब चट्टानों की सतह से टकराकर उन्हें घिसते हैं, तो इस प्रक्रिया को पवन अपघर्षण या Abrasion कहा जाता है।
जब हवा की गति कम होती है तो वह अपने साथ लाई गई रेत को जमा करने लगती है। लंबे समय तक पवन निक्षेपण से रेत के ऊँचे-नीचे टीले या बालुका स्तूप बनते हैं।
बरखान एक अर्धचंद्राकार बालुका स्तूप है, जो सामान्यतः सीमित रेत तथा एक प्रमुख दिशा से चलने वाली हवाओं के प्रभाव से बनता है।
पवन द्वारा भूमि से महीन कणों को लगातार हटाए जाने के बाद सतह पर कंकड़ एवं मोटे पदार्थों की परत बच जाती है, जिसे डेजर्ट पेवमेंट कहा जाता है।
शुष्क एवं मरुस्थलीय क्षेत्रों में स्थित ऐसे निम्न एवं उथले क्षेत्र, जहाँ वर्षा या सतही जल अस्थायी रूप से जमा होकर बाद में वाष्पीकरण से सूख जाता है, प्लाया कहलाते हैं।
दो बालुका स्तूपों के बीच स्थित अपेक्षाकृत निम्न भू-भाग को इंटरड्यून क्षेत्र कहा जाता है।
पवन रेत के कणों को Suspension, Saltation और Surface Creep जैसी प्रक्रियाओं के माध्यम से एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाती है।
जब रेत के छोटे कण हवा के प्रभाव से उछलते-कूदते हुए आगे बढ़ते हैं, तो इस प्रकार के पवन परिवहन को Saltation कहा जाता है।
जब अपेक्षाकृत भारी रेत के कण हवा के दबाव से भूमि की सतह पर लुढ़कते या सरकते हुए आगे बढ़ते हैं, तो इसे Surface Creep कहते हैं।
प्रमुख पवन दिशा के लगभग समानांतर विकसित होने वाले लंबे एवं संकरे बालुका स्तूपों को अनुदैर्ध्य बालुका स्तूप कहा जाता है।
प्रमुख पवन दिशा के लगभग लंबवत विकसित होने वाले बालुका स्तूपों को अनुप्रस्थ बालुका स्तूप कहा जाता है।
जब किसी क्षेत्र में हवाएँ विभिन्न दिशाओं से चलती हैं, तो रेत कई दिशाओं में जमा होकर तारे जैसी आकृति वाले तारा बालुका स्तूप बना सकती है।
U या परवलय जैसी आकृति वाले बालुका स्तूपों को परवलयिक बालुका स्तूप कहा जाता है। इनके विकास में वनस्पति रेत को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
नहीं। पवन प्रमुख भू-आकृतिक कारक है, लेकिन अल्प अवधि में होने वाली तेज वर्षा और उससे उत्पन्न सतही जल प्रवाह भी मरुस्थलीय भू-दृश्य को प्रभावित करते हैं।
अल्प अवधि में होने वाली तेज वर्षा से सतही बहाव, गली निर्माण, मिट्टी एवं अवसाद का परिवहन तथा अपरदन जैसी प्रक्रियाएँ होती हैं, जो मरुस्थलीय भू-दृश्य को प्रभावित करती हैं।
वनस्पति का क्षरण, अतिचारण, जल का अत्यधिक दोहन, अनुचित कृषि पद्धतियाँ और पवन अपरदन मरुस्थलीकरण को बढ़ाने वाले प्रमुख कारक हैं।
इंदिरा गांधी नहर से सिंचाई सुविधाओं के विस्तार के कारण पश्चिमी राजस्थान के कई क्षेत्रों में कृषि, वनस्पति और बसावट का विस्तार हुआ तथा भूमि उपयोग में महत्वपूर्ण परिवर्तन आया।
RPSC, RSSB/RSMSSB, राजस्थान CET, REET तथा अन्य परीक्षाओं में बालुका स्तूप, बरखान, डिफ्लेशन, अपघर्षण, प्लाया, डेजर्ट पेवमेंट और पवन निक्षेपण से संबंधित प्रश्न पूछे जाते हैं।