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राजस्थान भूगोल

राजस्थान की परंपरागत जल संरक्षण प्रणालियाँ: जोहड़, टांका, खड़ीन, नाड़ी, बावड़ी एवं कुंड — सम्पूर्ण मास्टर गाइड

महेंद्र ढाका (भूगोल विशेषज्ञ)
29 जुलाई 2026
7 मिनट पठन
राजस्थान की परंपरागत जल संरक्षण प्रणालियाँ: जोहड़, टांका, खड़ीन, नाड़ी, बावड़ी एवं कुंड — सम्पूर्ण मास्टर गाइड

प्रस्तावना

राजस्थान भारत का सबसे अधिक शुष्क एवं अल्प वर्षा वाला राज्य है, जहाँ विशेषकर पश्चिमी भाग में वार्षिक वर्षा अत्यंत कम एवं अनिश्चित होती है। ऐसी विषम भौगोलिक परिस्थितियों में यहाँ के लोगों ने सदियों पहले ही अत्यंत वैज्ञानिक एवं टिकाऊ (sustainable) परंपरागत जल संरक्षण प्रणालियाँ विकसित कर लीं थीं, जो आज भी जल प्रबंधन के क्षेत्र में विश्व स्तर पर अध्ययन एवं प्रशंसा का विषय हैं। जोहड़, टांका, खड़ीन, नाड़ी, बावड़ी एवं कुंड — ये सभी राजस्थान की उस पारंपरिक जल-संचयन विरासत के प्रतीक हैं जिसने यहाँ के निवासियों को सैकड़ों वर्षों तक जल-संकट से जूझने में सक्षम बनाया। RPSC RAS, RSMSSB, पटवारी, ग्राम सेवक तथा REET जैसी परीक्षाओं में यह टॉपिक प्रत्येक वर्ष पूछा जाता है, विशेषकर प्रत्येक प्रणाली के क्षेत्र-विशेष, कार्यप्रणाली एवं उद्देश्य में अंतर स्पष्ट करने वाले प्रश्नों के रूप में।

संक्षिप्त उत्तर (Quick Answer): राजस्थान की प्रमुख परंपरागत जल संरचनाएँ हैं — जोहड़ (भूजल पुनर्भरण हेतु मिट्टी का बांध, मुख्यतः अलवर/अरावली क्षेत्र), टांका (घरेलू भूमिगत वर्षा जल संग्रहण टैंक, पश्चिमी मरुस्थल), खड़ीन (जैसलमेर की कृषि-उन्मुख जल संचयन प्रणाली, पालीवाल ब्राह्मणों द्वारा विकसित), नाड़ी (ग्रामीण तालाब, पेयजल हेतु), बावड़ी (सीढ़ीदार कुआं, स्थापत्य महत्व सहित) तथा कुंड (सामुदायिक स्तर की भूमिगत जल संचयन संरचना, बड़े जलग्रहण क्षेत्र सहित)।

जल संरक्षण की आवश्यकता: भौगोलिक पृष्ठभूमि

राजस्थान के पश्चिमी भाग (जैसलमेर, बीकानेर, बाड़मेर, चूरू, जोधपुर) में वार्षिक वर्षा अत्यंत कम होती है तथा सतही जल स्रोत (नदियाँ, झीलें) बहुत सीमित हैं। भूजल भी अधिकांश क्षेत्रों में या तो गहराई पर उपलब्ध है या खारा है, जिससे पेयजल हेतु उपयुक्त नहीं होता। ऐसी परिस्थितियों में यहाँ के समुदायों ने वर्षा जल के प्रत्येक बूंद का संचयन करने हेतु विविध प्रकार की संरचनाएँ विकसित कीं, जो क्षेत्र की मिट्टी, ढलान, तथा उपयोग-उद्देश्य (पेयजल/कृषि/भूजल पुनर्भरण) के अनुसार भिन्न-भिन्न रूपों में विकसित हुईं।

1. जोहड़ (Johad)

जोहड़ एक परंपरागत मिट्टी का बांध/चेक-डैम है, जो किसी छोटी नदी, नाले अथवा जलधारा के प्रवाह मार्ग पर बनाया जाता है ताकि वर्षा जल को रोककर उसे धरती में रिसने दिया जाए और भूजल स्तर को पुनर्भरित (recharge) किया जा सके। जोहड़ मुख्यतः राजस्थान के अरावली पर्वतीय क्षेत्र, विशेषकर अलवर जिले में प्रचलित रहा है।

प्रमुख विशेषताएँ:

  • जोहड़ का मुख्य उद्देश्य पेयजल संग्रहण नहीं, बल्कि भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge) है।
  • जोहड़ अर्धचंद्राकार आकार में मिट्टी एवं पत्थरों से निर्मित होता है, जो जल के बहाव को रोककर उसे धीरे-धीरे भूमि में समाहित होने देता है।
  • राजेंद्र सिंह ("जल पुरुष"/Waterman of India) एवं उनकी संस्था तरुण भारत संघ ने 1980 के दशक से अलवर क्षेत्र में सैकड़ों पुराने जोहड़ों का पुनरुद्धार एवं नवनिर्माण किया, जिससे क्षेत्र की अरवारी नदी सहित कई मौसमी नदियाँ पुनः बारहमासी (perennial) हो गईं।
  • राजेंद्र सिंह को उनके इस कार्य हेतु रेमन मैग्सेसे पुरस्कार (2001) तथा स्टॉकहोम जल पुरस्कार (2015) ("जल क्षेत्र का नोबेल पुरस्कार" के रूप में प्रसिद्ध) से सम्मानित किया गया।
  • जोहड़ प्रणाली सामुदायिक सहभागिता (community participation) पर आधारित है, जहाँ ग्राम समुदाय स्वयं इसके निर्माण एवं संधारण में भाग लेता है।

2. टांका (Tanka)

टांका एक भूमिगत, ढका हुआ वर्षा जल संग्रहण टैंक है, जो मुख्यतः पश्चिमी राजस्थान — बीकानेर, जैसलमेर, बाड़मेर एवं चूरू जैसे अत्यंत शुष्क क्षेत्रों में घरेलू (individual household) स्तर पर उपयोग हेतु बनाया जाता है।

प्रमुख विशेषताएँ:

  • टांका सामान्यतः घर के आँगन अथवा छत के समीप बनाया जाता है, जहाँ छत या आँगन की सतह को जलग्रहण क्षेत्र (catchment area) के रूप में उपयोग किया जाता है।
  • वर्षा जल को एक ढलान वाली सतह के माध्यम से भूमिगत टांके में एकत्रित किया जाता है।
  • टांके का निर्माण परंपरागत रूप से चूने, सुर्खी (गारे) तथा स्थानीय निर्माण सामग्री से किया जाता था, ताकि जल शुद्ध एवं वाष्पीकरण से सुरक्षित रहे।
  • यह पूर्णतः पेयजल-उद्देश्यीय, घरेलू स्तर की व्यक्तिगत संरचना है — इसे सामुदायिक स्तर की बड़ी संरचनाओं (जैसे कुंड) से अलग समझना महत्वपूर्ण है।
  • राजस्थानी घरों में टांका आज भी विवाह के समय दहेज/उपहार में दी जाने वाली आवश्यक वस्तुओं के समान सामाजिक महत्व रखता था, क्योंकि यह परिवार की जल-सुरक्षा का प्रतीक माना जाता था।

3. खड़ीन (Khadin)

खड़ीन राजस्थान की एक विशिष्ट कृषि-उन्मुख जल संचयन प्रणाली है, जिसका विकास मुख्यतः जैसलमेर क्षेत्र के पालीवाल ब्राह्मण समुदाय द्वारा लगभग 15वीं शताब्दी में किया गया माना जाता है।

प्रमुख विशेषताएँ:

  • खड़ीन प्रणाली में किसी प्राकृतिक ढलान वाले भू-भाग के निचले सिरे पर एक लंबा मिट्टी/जिप्सम आधारित बांध (bund) बनाया जाता है, जो ऊपर से बहकर आने वाले वर्षा जल के अपवाह (runoff) को रोक लेता है।
  • इस संचित जल एवं नमी का उपयोग सीधे उस भूमि पर कृषि (विशेषकर रबी फसल) हेतु किया जाता है — अर्थात खड़ीन पेयजल संचयन हेतु नहीं बल्कि कृषि सिंचाई हेतु प्रयुक्त होती है।
  • यह प्रणाली नील नदी घाटी की बाढ़-सिंचाई (inundation farming) पद्धति से मिलती-जुलती मानी जाती है, जो अत्यंत प्राचीन एवं वैज्ञानिक जल-प्रबंधन तकनीक का उदाहरण है।
  • खड़ीन प्रणाली को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) सहित कई संस्थानों द्वारा शुष्क क्षेत्र कृषि के एक आदर्श मॉडल के रूप में मान्यता प्राप्त है।

4. नाड़ी (Nadi)

नाड़ी एक परंपरागत ग्रामीण तालाब है, जो मुख्यतः पश्चिमी राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्रों में मानव एवं पशुधन दोनों के पेयजल हेतु बनाया जाता है।

प्रमुख विशेषताएँ:

  • नाड़ी सामान्यतः किसी प्राकृतिक गड्ढे अथवा निचले भू-भाग को गहरा करके बनाई जाती है, जिसमें आसपास के क्षेत्र से बहकर आने वाला वर्षा जल एकत्रित होता है।
  • यह गाँव के सामुदायिक जीवन का केंद्र-बिंदु रही है, विशेषकर मरुस्थलीय क्षेत्रों में जहाँ अन्य जल स्रोतों की भारी कमी होती है।
  • नाड़ी को टांके से इस आधार पर अलग समझा जाना चाहिए कि नाड़ी एक खुली, सामुदायिक संरचना है जबकि टांका एक ढका हुआ, व्यक्तिगत/घरेलू संरचना है।

5. बावड़ी (Baori/Stepwell)

बावड़ी अथवा सीढ़ीदार कुआं (Stepwell) राजस्थान की जल संरक्षण परंपरा का सर्वाधिक स्थापत्य दृष्टि से समृद्ध रूप है। यह न केवल जल संग्रहण का साधन थी, बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक एवं धार्मिक गतिविधियों का केंद्र भी रही है।

प्रमुख विशेषताएँ:

  • बावड़ियों में भूजल स्तर तक पहुँचने हेतु सीढ़ियों की एक जटिल एवं बहु-मंजिला संरचना बनाई जाती थी, जो गर्मियों में भी ठंडक प्रदान करती थी।
  • राजस्थान की सबसे प्रसिद्ध बावड़ी चांद बावड़ी (आभानेरी, दौसा जिला) है, जिसे विश्व की सबसे बड़ी एवं गहरी सीढ़ीदार बावड़ियों में गिना जाता है — इसका निर्माण निकुंभ वंश के शासकों द्वारा कराया गया माना जाता है।
  • बावड़ियाँ सामान्यतः शहरी/कस्बाई क्षेत्रों तथा व्यापारिक मार्गों पर यात्रियों की सुविधा हेतु बनाई जाती थीं, जबकि जोहड़/नाड़ी/खड़ीन जैसी संरचनाएँ अधिकतर ग्रामीण/कृषि-उन्मुख उद्देश्यों से जुड़ी थीं।

6. कुंड (Kund)

कुंड एक सामुदायिक स्तर की भूमिगत, ढकी हुई जल संचयन संरचना है, जो मुख्यतः पश्चिमी राजस्थान — बीकानेर, जैसलमेर क्षेत्र में पाई जाती है, और टांके की तुलना में आकार में बड़ी तथा व्यापक जलग्रहण क्षेत्र (catchment) से युक्त होती है।

प्रमुख विशेषताएँ:

  • कुंड की संरचना में एक बड़ा, तश्तरीनुमा (saucer-shaped) ढलान वाला जलग्रहण क्षेत्र होता है जो केंद्र में स्थित भूमिगत कक्ष की ओर ढलान लिए होता है, जहाँ वर्षा जल एकत्रित एवं संरक्षित होता है।
  • यह संरचना सामुदायिक उपयोग हेतु बनाई जाती थी, न कि किसी एक परिवार हेतु — यही टांके एवं कुंड के बीच का प्रमुख अंतर है।
  • कुंड की जल संग्रहण क्षमता टांके की तुलना में सामान्यतः अधिक होती है क्योंकि इसका जलग्रहण क्षेत्र बड़ा होता है।

तुलनात्मक तालिका: छः प्रमुख परंपरागत जल संरचनाएँ

संरचनामुख्य क्षेत्रउद्देश्यस्तर (व्यक्तिगत/सामुदायिक)संरचना प्रकार
जोहड़अलवर/अरावली क्षेत्रभूजल पुनर्भरणसामुदायिकमिट्टी का चेक-डैम (खुला)
टांकाबीकानेर, जैसलमेर, बाड़मेर, चूरूघरेलू पेयजल संग्रहणव्यक्तिगत/घरेलूभूमिगत, ढका हुआ टैंक
खड़ीनजैसलमेरकृषि सिंचाई (रबी फसल)सामुदायिक/कृषि भूमि आधारितढलान बांध (bund)
नाड़ीपश्चिमी राजस्थान (ग्रामीण)मानव व पशु पेयजलसामुदायिकखुला तालाब
बावड़ीशहरी/कस्बाई क्षेत्र (जैसे आभानेरी-दौसा)पेयजल + सामाजिक-सांस्कृतिक केंद्रसामुदायिक/सार्वजनिकसीढ़ीदार बहु-मंजिला कुआं
कुंडबीकानेर, जैसलमेरसामुदायिक पेयजल संग्रहणसामुदायिकभूमिगत, ढका हुआ, बड़ा जलग्रहण क्षेत्र

🎯 एग्जाम ट्रैप (Exam Trap Section)

  1. जोहड़ बनाम नाड़ी: दोनों को अक्सर एक ही समझ लिया जाता है, परंतु जोहड़ का मुख्य उद्देश्य भूजल पुनर्भरण है (मुख्यतः अलवर/अरावली क्षेत्र), जबकि नाड़ी सीधे पेयजल संग्रहण हेतु खुला तालाब है (मुख्यतः पश्चिमी मरुस्थल)।
  2. टांका बनाम कुंड: दोनों भूमिगत, ढकी हुई संरचनाएँ हैं, परंतु टांका व्यक्तिगत/घरेलू स्तर की छोटी संरचना है जबकि कुंड सामुदायिक स्तर की बड़ी संरचना है जिसका जलग्रहण क्षेत्र अधिक विस्तृत होता है — यह सबसे आम परीक्षा ट्रैप है।
  3. खड़ीन को पेयजल संरचना समझना: खड़ीन वास्तव में कृषि सिंचाई हेतु प्रयुक्त होती है, पेयजल संग्रहण हेतु नहीं — इसे टांका/कुंड/नाड़ी जैसी पेयजल संरचनाओं के साथ भ्रमित न करें।
  4. राजेंद्र सिंह का संबंध: राजेंद्र सिंह को "जोहड़" पुनरुद्धार आंदोलन से जोड़ा जाता है, न कि टांका या खड़ीन से — यह एक सामान्य त्रुटि है।
  5. बावड़ी की भौगोलिक विशिष्टता: बावड़ियाँ मुख्यतः शहरी/व्यापारिक मार्गों से जुड़ी संरचनाएँ हैं (जैसे आभानेरी की चांद बावड़ी), जबकि जोहड़/खड़ीन/नाड़ी ग्रामीण-कृषि उन्मुख संरचनाएँ हैं — इस भौगोलिक-सामाजिक अंतर को प्रश्नों में परखा जाता है।
  6. खड़ीन का श्रेय: खड़ीन प्रणाली का श्रेय पालीवाल ब्राह्मण समुदाय (जैसलमेर) को दिया जाता है — इसे किसी राजा/शासक के नाम से जोड़ने की गलती न करें।

🧠 मेमोरी ट्रिक (स्मरण तकनीक)

"जो भू, टां घर, ख कृषि, ना गाँव, बा शहर, कुं सामूहिक"

  • जोहड़ → भूजल पुनर्भरण (अलवर)
  • टांका → घर (व्यक्तिगत, पश्चिमी मरुस्थल)
  • ड़ीन → कृषि (जैसलमेर, पालीवाल ब्राह्मण)
  • नाड़ी → गाँव का खुला तालाब (पेयजल)
  • बावड़ी → शहर/व्यापारिक मार्ग (स्थापत्य, आभानेरी)
  • कुंड → सामूहिक भूमिगत टैंक (बड़ा जलग्रहण क्षेत्र)

👩‍🏫 शिक्षक की परीक्षा टिप्पणी

"इस टॉपिक में परीक्षक सामान्यतः दो संरचनाओं के नाम देकर पूछते हैं कि 'इनमें अंतर स्पष्ट करें' — जैसे टांका व कुंड, या जोहड़ व नाड़ी। विद्यार्थियों को चाहिए कि प्रत्येक संरचना को केवल नाम से नहीं, बल्कि तीन बिंदुओं से याद करें: (1) क्षेत्र — कौन-सा जिला/भाग, (2) उद्देश्य — पेयजल, कृषि या भूजल पुनर्भरण, (3) स्तर — व्यक्तिगत या सामुदायिक। यह टॉपिक करेंट अफेयर्स एवं पर्यावरण खंड से भी जुड़ जाता है क्योंकि राजेंद्र सिंह व जल संरक्षण जैसी थीम अक्सर निबंध/साक्षात्कार में भी पूछी जाती है।"

📝 अभ्यास प्रश्न (PYQ/Practice MCQs)

1. जोहड़ का मुख्य उद्देश्य क्या है? 

A) कृषि सिंचाई B) भूजल पुनर्भरण C) पर्यटन D) मत्स्य पालन 

उत्तर: B) भूजल पुनर्भरण

2. जोहड़ प्रणाली मुख्यतः राजस्थान के किस क्षेत्र में प्रचलित है? 

A) पश्चिमी मरुस्थल B) अलवर/अरावली क्षेत्र C) हाड़ौती क्षेत्र D) दक्षिणी राजस्थान 

उत्तर: B) अलवर/अरावली क्षेत्र

3. राजेंद्र सिंह को किस उपनाम से जाना जाता है?

A) मरु पुरुष B) जल पुरुष (Waterman of India) C) वन पुरुष D) कृषि पुरुष 

उत्तर: B) जल पुरुष (Waterman of India)

4. राजेंद्र सिंह किस संस्था से जुड़े हैं? 

A) तरुण भारत संघ B) राजस्थान जल बोर्ड C) TAD विभाग D) RSRDC 

उत्तर: A) तरुण भारत संघ

5. राजेंद्र सिंह को किस अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया? 

A) नोबेल शांति पुरस्कार B) स्टॉकहोम जल पुरस्कार C) भारत रत्न D) पुलित्जर पुरस्कार 

उत्तर: B) स्टॉकहोम जल पुरस्कार (2015)

6. टांका किस स्तर की संरचना है? 

A) सामुदायिक B) व्यक्तिगत/घरेलू C) राजकीय D) धार्मिक 

उत्तर: B) व्यक्तिगत/घरेलू

7. टांका मुख्यतः किन जिलों में प्रचलित है? 

A) अलवर, भरतपुर B) बीकानेर, जैसलमेर, बाड़मेर, चूरू C) उदयपुर, डूंगरपुर D) कोटा, बूंदी 

उत्तर: B) बीकानेर, जैसलमेर, बाड़मेर, चूरू

8. खड़ीन प्रणाली का विकास मुख्यतः किस समुदाय द्वारा माना जाता है? 

A) राजपूत शासक B) पालीवाल ब्राह्मण C) जैन व्यापारी D) चारण समुदाय 

उत्तर: B) पालीवाल ब्राह्मण

9. खड़ीन प्रणाली का मुख्य उपयोग किसके लिए होता है? 

A) पेयजल संग्रहण B) कृषि सिंचाई (रबी फसल) C) पशुओं हेतु स्नान D) मत्स्य पालन 

उत्तर: B) कृषि सिंचाई (रबी फसल)

10. खड़ीन प्रणाली मुख्यतः किस जिले से संबंधित है? 

A) बीकानेर B) जैसलमेर C) बाड़मेर D) चूरू 

उत्तर: B) जैसलमेर

11. नाड़ी किस प्रकार की संरचना है? 

A) भूमिगत ढका हुआ टैंक B) खुला ग्रामीण तालाब C) सीढ़ीदार कुआं D) मिट्टी का बांध 

उत्तर: B) खुला ग्रामीण तालाब

12. चांद बावड़ी कहाँ स्थित है? 

A) जैसलमेर B) आभानेरी, दौसा C) बीकानेर D) अलवर 

उत्तर: B) आभानेरी, दौसा

13. चांद बावड़ी का निर्माण किस वंश के शासकों द्वारा कराया गया माना जाता है? 

A) निकुंभ वंश B) कछवाहा वंश C) राठौड़ वंश D) सिसोदिया वंश 

उत्तर: A) निकुंभ वंश

14. कुंड एवं टांके में मुख्य अंतर क्या है? 

A) कुंड खुला होता है, टांका ढका होता है B) कुंड सामुदायिक व बड़ा होता है, टांका व्यक्तिगत व छोटा होता है C) कुंड केवल कृषि हेतु है, टांका पेयजल हेतु D) दोनों में कोई अंतर नहीं 

उत्तर: B) कुंड सामुदायिक व बड़ा होता है, टांका व्यक्तिगत व छोटा होता है

15. निम्न में से कौन-सी संरचना कृषि-सिंचाई से सर्वाधिक संबंधित है? 

A) टांका B) खड़ीन C) बावड़ी D) कुंड 

उत्तर: B) खड़ीन

16. जोहड़ पुनरुद्धार आंदोलन के फलस्वरूप अलवर क्षेत्र की कौन-सी नदी पुनः बारहमासी हो गई? 

A) बनास नदी B) अरवारी नदी C) लूनी नदी D) साबी नदी 

उत्तर: B) अरवारी नदी

17. बावड़ियों का निर्माण मुख्यतः किस उद्देश्य से किया जाता था (पेयजल के अतिरिक्त)? 

A) सैन्य उपयोग B) सामाजिक-सांस्कृतिक केंद्र के रूप में C) कृषि भंडारण D) खनन कार्य 

उत्तर: B) सामाजिक-सांस्कृतिक केंद्र के रूप में

18. कुंड की संरचना में जलग्रहण क्षेत्र किस आकार का होता है? 

A) वर्गाकार B) तश्तरीनुमा (saucer-shaped) ढलान C) त्रिकोणीय D) आयताकार सीधा 

उत्तर: B) तश्तरीनुमा (saucer-shaped) ढलान

19. निम्न में से कौन-सी संरचना मानव एवं पशुधन दोनों के पेयजल हेतु प्रयुक्त होती है? 

A) खड़ीन B) नाड़ी C) जोहड़ D) बावड़ी 

उत्तर: B) नाड़ी

20. खड़ीन प्रणाली किस प्राचीन सिंचाई पद्धति से समानता रखती है? 

A) नील नदी घाटी की बाढ़-सिंचाई पद्धति B) ड्रिप सिंचाई C) फव्वारा सिंचाई D) नहर सिंचाई 

उत्तर: A) नील नदी घाटी की बाढ़-सिंचाई पद्धति

महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

जोहड़ का मुख्य उद्देश्य भूजल पुनर्भरण है और यह मुख्यतः अलवर/अरावली क्षेत्र में प्रचलित है, जबकि नाड़ी एक खुला ग्रामीण तालाब है जो सीधे मानव व पशुधन के पेयजल हेतु पश्चिमी राजस्थान में प्रयुक्त होता है।

टांका एक व्यक्तिगत/घरेलू स्तर की छोटी भूमिगत संरचना है, जबकि कुंड एक सामुदायिक स्तर की बड़ी भूमिगत संरचना है जिसका जलग्रहण क्षेत्र अधिक विस्तृत होता है।

खड़ीन प्रणाली मुख्यतः जैसलमेर क्षेत्र के पालीवाल ब्राह्मण समुदाय द्वारा विकसित मानी जाती है, और इसका उपयोग कृषि सिंचाई (विशेषकर रबी फसल) हेतु किया जाता है।

राजेंद्र सिंह, जिन्हें "जल पुरुष" के नाम से जाना जाता है, तरुण भारत संघ के माध्यम से अलवर क्षेत्र में जोहड़ों के पुनरुद्धार हेतु प्रसिद्ध हैं, और उन्हें रेमन मैग्सेसे पुरस्कार तथा स्टॉकहोम जल पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।

आभानेरी (दौसा जिला) की चांद बावड़ी राजस्थान की सबसे प्रसिद्ध एवं विश्व की सबसे बड़ी सीढ़ीदार बावड़ियों में से एक है।

टांका मुख्यतः बीकानेर, जैसलमेर, बाड़मेर एवं चूरू जैसे अत्यंत शुष्क पश्चिमी राजस्थान के जिलों में घरेलू पेयजल संग्रहण हेतु प्रचलित है।

नहीं, खड़ीन मुख्यतः कृषि सिंचाई (विशेषकर रबी फसल) हेतु प्रयुक्त होती है, पेयजल संग्रहण हेतु नहीं।

बावड़ी एक सीढ़ीदार, बहु-मंजिला स्थापत्य संरचना है जो मुख्यतः शहरी/व्यापारिक मार्गों पर बनाई जाती थी और पेयजल के साथ-साथ सामाजिक-सांस्कृतिक केंद्र के रूप में भी कार्य करती थी, जबकि जोहड़/नाड़ी/खड़ीन जैसी संरचनाएँ मुख्यतः ग्रामीण-कृषि उन्मुख हैं।

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