वर्ण विचार — स्वर, व्यंजन, उच्चारण स्थान, अल्पप्राण-महाप्राण, घोष-अघोष तालिका — CET
कैसे बना: यह नोट सुयोग अकादमी के लेखक ने परीक्षा सिलेबस के अनुसार लिखा/संपादित किया है। प्रकाशन तिथि ऊपर और अंतिम संशोधन तिथि लेख के अंत में दी गई है। त्रुटि दिखे तो संपर्क करें। टीम परिचय
स्रोत आधार: RSSB CET (12वीं/स्नातक), पटवारी, VDO व REET पाठ्यक्रम की सामान्य हिंदी इकाई; मानक हिंदी व्याकरण (NCERT) की परिभाषाएँ। शब्दशः पुस्तक पाठ नहीं।
सुयोग AI गुरु
नोट्स के मुख्य बिंदु, मॉक MCQ या डाउट पूछें
संक्षिप्त उत्तर: भाषा की वह सबसे छोटी ध्वनि जिसके और टुकड़े न किए जा सकें, वर्ण कहलाती है; वर्णों के व्यवस्थित समूह को वर्णमाला कहते हैं। हिंदी वर्णमाला के वर्ण दो वर्गों में बँटते हैं — स्वर (जो स्वतंत्र रूप से बोले जाते हैं: अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ) और व्यंजन (जो स्वर की सहायता से बोले जाते हैं)। मूल व्यंजन 33 हैं — 25 स्पर्श (क से म तक, पाँच वर्ग), 4 अंतःस्थ (य, र, ल, व) और 4 ऊष्म (श, ष, स, ह); इनके अतिरिक्त 4 संयुक्त (क्ष, त्र, ज्ञ, श्र) और 2 उत्क्षिप्त (ड़, ढ़) व्यंजन वर्णमाला में लिखे जाते हैं। वर्णों की कुल संख्या (44, 45, 46, 52 आदि) गिनती के आधार के अनुसार अलग-अलग पुस्तकों में अलग बताई जाती है। परीक्षा का असली भार उच्चारण स्थान (कंठ्य, तालव्य, मूर्धन्य, दंत्य, ओष्ठ्य, दंतोष्ठ्य, कंठ-तालव्य, कंठोष्ठ्य) और प्रयत्न (अल्पप्राण-महाप्राण, घोष-अघोष) पर रहता है। मूल सूत्र एक ही है: वर्ग का पहला-दूसरा वर्ण अघोष, तीसरा-चौथा-पाँचवाँ घोष; दूसरा-चौथा महाप्राण, बाकी अल्पप्राण।
संक्षिप्त उत्तर
| बिंदु | तथ्य |
|---|---|
| वर्ण | भाषा की सबसे छोटी मूल ध्वनि जिसके खंड न हो सकें |
| वर्णमाला | वर्णों का व्यवस्थित (क्रमबद्ध) समूह |
| लिपि | हिंदी की लिपि — देवनागरी (बाएँ से दाएँ लिखी जाती है) |
| स्वर | अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ — लिखित वर्णमाला में 11 |
| ह्रस्व स्वर | अ, इ, उ, ऋ — एक मात्रा का समय |
| दीर्घ स्वर | आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ — दो मात्राओं का समय |
| प्लुत स्वर | तीन मात्राओं का समय; ३ लिखकर दिखाते हैं — ओ३म् |
| अयोगवाह | अं (अनुस्वार), अः (विसर्ग) — न स्वर, न व्यंजन |
| स्पर्श व्यंजन | 25 — क, च, ट, त, प वर्ग (प्रत्येक में 5) |
| अंतःस्थ व्यंजन | 4 — य, र, ल, व |
| ऊष्म (संघर्षी) व्यंजन | 4 — श, ष, स, ह |
| संयुक्त व्यंजन | क्ष (क् + ष), त्र (त् + र), ज्ञ (ज् + ञ), श्र (श् + र) |
| उत्क्षिप्त (द्विगुण) व्यंजन | ड़, ढ़ |
| नासिक्य (पंचमाक्षर) | ङ, ञ, ण, न, म |
| अघोष | वर्ग का 1, 2 वर्ण + श, ष, स |
| घोष | वर्ग का 3, 4, 5 वर्ण + य, र, ल, व, ह + सभी स्वर |
| महाप्राण | वर्ग का 2, 4 वर्ण + श, ष, स, ह |
| अल्पप्राण | वर्ग का 1, 3, 5 वर्ण + य, र, ल, व |
2. सिलेबस में यह टॉपिक क्यों महत्वपूर्ण है?
वर्ण विचार हिंदी व्याकरण का पहला अध्याय है — व्याकरण के तीन खंडों (वर्ण विचार, शब्द विचार, वाक्य विचार) में से पहला। संधि के सारे नियम (वर्ग का पहला वर्ण तीसरे में बदलना, पंचमाक्षर, विसर्ग), वर्तनी के नियम (अनुस्वार बनाम चंद्रबिंदु, नुक़्ता) और तत्सम-तद्भव की पहचान (ऋ, ष, क्ष) — सब इसी अध्याय पर टिके हैं। इसलिए यह अध्याय सीधे प्रश्नों के साथ-साथ दूसरे अध्यायों के प्रश्न हल करने में भी काम आता है।
परीक्षा उपयोगिता: ★★★★☆
- CET 12th व Graduation स्तर
- पटवारी, VDO, LDC, पुलिस कांस्टेबल
- REET लेवल-1 व लेवल-2 (हिंदी भाषा व भाषा-शिक्षण खंड)
- राजस्थान पुलिस SI (हिंदी व्याकरण भाग)
- RSMSSB की अन्य भर्तियाँ, स्कूल व्याख्याता
प्रश्न कैसे आते हैं?
- "'ष' का उच्चारण स्थान क्या है?" — उच्चारण स्थान पर सीधा प्रश्न
- "निम्न में से कौन-सा वर्ण महाप्राण / घोष है?" — प्रयत्न पर आधारित
- "'क्ष' किन वर्णों के मेल से बना है?" — संयुक्त व्यंजन
- "कौन-सा युग्म सुमेलित नहीं है?" — वर्ण और उसका स्थान / प्रयत्न
- "'विद्या' का सही वर्ण-विच्छेद" — वर्ण-विच्छेद
- अनुस्वार और अनुनासिक का अंतर — हंस / हँस जैसे जोड़े
- स्वरों का वर्गीकरण — ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत; अग्र, मध्य, पश्च
3. वर्ण, अक्षर और वर्णमाला
वर्ण: वह मूल ध्वनि जिसके और खंड न किए जा सकें। जैसे 'क' में दो ध्वनियाँ हैं — क् + अ; इन्हें और नहीं तोड़ा जा सकता, इसलिए क् और अ दोनों वर्ण हैं। लिखित रूप में वर्ण को अक्षर भी कह दिया जाता है, पर भाषाविज्ञान में 'अक्षर' का अर्थ अलग है (नीचे खंड 11 देखें)।
वर्णमाला: किसी भाषा के सभी वर्णों का व्यवस्थित समूह। हिंदी वर्णमाला में पहले स्वर, फिर अयोगवाह, फिर व्यंजन — इसी क्रम में वर्ण रखे जाते हैं। व्यंजनों का क्रम उच्चारण स्थान के अनुसार है: कंठ से शुरू होकर होंठों तक (क वर्ग → च वर्ग → ट वर्ग → त वर्ग → प वर्ग)।
देवनागरी की विशेषता: जैसा बोला जाता है, वैसा ही लिखा जाता है; प्रत्येक वर्ण का एक निश्चित उच्चारण है; हर व्यंजन में 'अ' निहित रहता है (क = क् + अ); शिरोरेखा (ऊपर की पड़ी रेखा) लगती है।
3.1 वर्णों की संख्या — गिनती का आधार समझें
हिंदी वर्णमाला में कुल कितने वर्ण हैं, इस पर पुस्तकों में एक राय नहीं है। अंतर इसलिए है कि कोई केवल मूल वर्ण गिनता है, कोई अयोगवाह (अं, अः), उत्क्षिप्त (ड़, ढ़) या संयुक्त व्यंजन (क्ष, त्र, ज्ञ, श्र) भी जोड़ता है, और कोई 'ऋ' को हिंदी उच्चारण में स्वर नहीं मानता। नीचे प्रमुख गणनाएँ उनके आधार के साथ हैं:
| कुल संख्या | गिनती | आधार |
|---|---|---|
| 44 | 11 स्वर + 33 व्यंजन | केवल मूल स्वर और मूल व्यंजन (25 स्पर्श + 4 अंतःस्थ + 4 ऊष्म) |
| 45 | 10 स्वर + 35 व्यंजन | उच्चारण के आधार पर: 'ऋ' को स्वर नहीं गिना (हिंदी में इसका उच्चारण 'रि' जैसा होता है); ड़, ढ़ को व्यंजन में जोड़ा |
| 46 | 11 स्वर + 2 अयोगवाह + 33 व्यंजन | मूल वर्णों के साथ अं, अः को भी जोड़ा |
| 52 | 13 (11 स्वर + अं, अः) + 35 (33 + ड़, ढ़) + 4 संयुक्त | लेखन के आधार पर — वर्णमाला चार्ट में जितने वर्ण लिखे जाते हैं, सब गिने |
परीक्षा में क्या करें: कुल संख्या वाला प्रश्न आए तो पहले देखें कि प्रश्न किस आधार की बात कर रहा है ("मूल व्यंजन", "उच्चारण के आधार पर", "लेखन के आधार पर")। जिस संख्या पर सब पुस्तकें सहमत हैं, वह याद रखें: स्पर्श 25, अंतःस्थ 4, ऊष्म 4, संयुक्त 4, उत्क्षिप्त 2। इन उप-संख्याओं पर कोई विवाद नहीं है।
4. स्वर — परिभाषा और भेद
परिभाषा: जिन वर्णों का उच्चारण बिना किसी दूसरे वर्ण की सहायता के, स्वतंत्र रूप से होता है और बोलते समय हवा मुख से बिना रुकावट निकलती है, वे स्वर कहलाते हैं। लिखित वर्णमाला में 11 स्वर हैं: अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ। 'ऋ' संस्कृत में स्वर है; हिंदी में इसका उच्चारण 'रि' जैसा होता है और यह केवल तत्सम शब्दों में आता है (ऋषि, ऋतु, कृपा, गृह)।
4.1 उच्चारण-काल (मात्रा) के आधार पर
| भेद | समय | स्वर | टिप्पणी |
|---|---|---|---|
| ह्रस्व स्वर | एक मात्रा (कम समय) | अ, इ, उ, ऋ | इन्हें 'मूल स्वर' भी कहा जाता है |
| दीर्घ स्वर | दो मात्राएँ (ह्रस्व से दुगुना) | आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ | ए, ऐ, ओ, औ का कोई ह्रस्व रूप हिंदी वर्णमाला में नहीं है |
| प्लुत स्वर | तीन मात्राएँ (दीर्घ से भी अधिक) | किसी भी स्वर का लंबा खींचा रूप | पुकारने, गाने, मंत्र में; ३ अंक लगाकर: ओ३म्, रा३म |
प्लुत को हिंदी वर्णमाला में अलग स्वर के रूप में नहीं लिखा जाता; यह उच्चारण की अवस्था है। दूर से पुकारना — "अरे मोहना...!" — प्लुत का स्वाभाविक उदाहरण है।
4.2 रचना (बनावट) के आधार पर — मूल और संयुक्त
| भेद | स्वर | बनावट |
|---|---|---|
| मूल स्वर | अ, इ, उ, ऋ | किसी दूसरे स्वर के मेल से नहीं बने |
| सजातीय (दीर्घ) स्वर | आ, ई, ऊ | एक ही स्वर के दो बार मेल से — अ + अ = आ, इ + इ = ई, उ + उ = ऊ |
| संयुक्त (विजातीय) स्वर | ए, ऐ, ओ, औ | भिन्न स्वरों के मेल से — अ + इ = ए, अ + ए = ऐ, अ + उ = ओ, अ + ओ = औ |
यह वर्गीकरण संस्कृत परंपरा पर आधारित है और गुण तथा वृद्धि संधि के नियमों से सीधे जुड़ता है (अ + इ = ए गुण संधि, अ + ए = ऐ वृद्धि संधि)। इन नियमों का अभ्यास संधि के भेद और उदाहरण वाले नोट में करें। ध्यान रहे — आधुनिक हिंदी उच्चारण में ए और ओ प्रायः एक ही (मूल) ध्वनि की तरह बोले जाते हैं, इसलिए कुछ भाषाविज्ञान की पुस्तकें केवल ऐ, औ को संयुक्त स्वर मानती हैं।
4.3 नासिका के आधार पर — अनुनासिक और निरनुनासिक
| भेद | हवा कहाँ से निकलती है | चिह्न | उदाहरण |
|---|---|---|---|
| निरनुनासिक | केवल मुख से | कोई चिह्न नहीं | अ, आ, इ — सवार, आग |
| अनुनासिक | मुख और नासिका दोनों से | चंद्रबिंदु (ँ) | अँ, आँ, इँ — आँख, गाँव, ऊँट, हँसना |
4.4 जीभ के भाग के आधार पर — अग्र, मध्य, पश्च
| भेद | जीभ का कौन-सा भाग उठता है | स्वर |
|---|---|---|
| अग्र स्वर | जीभ का अगला भाग | इ, ई, ए, ऐ |
| मध्य स्वर | जीभ का बीच का भाग | अ |
| पश्च स्वर | जीभ का पिछला भाग | आ, उ, ऊ, ओ, औ (और आगत ऑ) |
4.5 होंठों की आकृति और मुख-द्वार के आधार पर
| आधार | भेद | स्वर |
|---|---|---|
| होंठों की आकृति | वृत्तमुखी (होंठ गोल) | उ, ऊ, ओ, औ, ऑ |
| होंठों की आकृति | अवृत्तमुखी (होंठ गोल नहीं) | अ, आ, इ, ई, ए, ऐ |
| मुख-द्वार | संवृत (मुख लगभग बंद) | इ, ई, उ, ऊ |
| मुख-द्वार | अर्धसंवृत | ए, ओ |
| मुख-द्वार | अर्धविवृत | अ, ऐ, औ, ऑ |
| मुख-द्वार | विवृत (मुख पूरा खुला) | आ |
मुख-द्वार वाला वर्गीकरण आधुनिक ध्वनि-विज्ञान से आया है और कुछ पुस्तकों में थोड़े अंतर के साथ मिलता है; इसे सामान्य जानकारी के रूप में पढ़ें। परीक्षा का मुख्य भार 4.1 और 4.4 पर है।
5. मात्राएँ
स्वर जब किसी व्यंजन के साथ जुड़ता है तो अपने पूरे रूप में नहीं, एक चिह्न के रूप में लगता है; इस चिह्न को मात्रा कहते हैं। 'अ' की कोई मात्रा नहीं होती — वह हर व्यंजन में पहले से निहित है (क = क् + अ)।
| स्वर | मात्रा | क के साथ | उदाहरण शब्द |
|---|---|---|---|
| अ | कोई मात्रा नहीं | क | कमल |
| आ | ा | का | काम |
| इ | ि | कि | किताब |
| ई | ी | की | कील |
| उ | ु | कु | कुल |
| ऊ | ू | कू | कूप |
| ऋ | ृ | कृ | कृपा |
| ए | े | के | केला |
| ऐ | ै | कै | कैलाश |
| ओ | ो | को | कोयल |
| औ | ौ | कौ | कौआ |
विशेष: 'र' के साथ उ और ऊ की मात्रा बीच में लगती है — र + उ = रु (रुपया, गुरु), र + ऊ = रू (रूप, रूमाल)। वर्तनी में 'रुप' और 'रूप' का भेद इसी से होता है। ऐसी वर्तनी-भूलें शब्द शुद्धि (वर्तनी) वाले नोट में विस्तार से दी गई हैं।
6. व्यंजन — परिभाषा और भेद
परिभाषा: जिन वर्णों का उच्चारण स्वर की सहायता के बिना नहीं हो सकता और बोलते समय हवा मुख में कहीं न कहीं रुककर या रगड़ खाकर निकलती है, वे व्यंजन कहलाते हैं। वर्णमाला में लिखा हर व्यंजन वास्तव में व्यंजन + अ है; शुद्ध (स्वर-रहित) व्यंजन हलंत (्) लगाकर लिखा जाता है — क्, ख्, ग्।
6.1 स्पर्श व्यंजन (25)
जिनके उच्चारण में जीभ या होंठ मुख के किसी भाग को पूरी तरह छूते हैं। ये पाँच वर्गों में बँटे हैं और हर वर्ग का नाम उसके पहले वर्ण पर है।
| वर्ग | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 (नासिक्य) | उच्चारण स्थान |
|---|---|---|---|---|---|---|
| क वर्ग | क | ख | ग | घ | ङ | कंठ |
| च वर्ग | च | छ | ज | झ | ञ | तालु |
| ट वर्ग | ट | ठ | ड | ढ | ण | मूर्धा |
| त वर्ग | त | थ | द | ध | न | दंत |
| प वर्ग | प | फ | ब | भ | म | ओष्ठ |
6.2 अंतःस्थ व्यंजन (4) — य, र, ल, व
'अंतःस्थ' का अर्थ है बीच में स्थित — इनका उच्चारण स्वर और व्यंजन के बीच का है; जीभ मुख के भागों को पूरी तरह नहीं छूती। इनमें य और व को अर्धस्वर कहा जाता है (य इ-जैसा, व उ-जैसा सुनाई देता है)। र को लुंठित / प्रकंपित (जीभ काँपती है) और ल को पार्श्विक (हवा जीभ के अगल-बगल से निकलती है) कहते हैं।
6.3 ऊष्म (संघर्षी) व्यंजन (4) — श, ष, स, ह
इनके उच्चारण में हवा मुख में रगड़ खाकर निकलती है और एक प्रकार की गर्माहट (ऊष्मा) पैदा होती है, इसलिए नाम 'ऊष्म' है। आधुनिक व्याकरण इन्हें संघर्षी कहता है। स्थान याद रखें — श तालव्य, ष मूर्धन्य, स दंत्य, ह कंठ्य (स्वरयंत्र से)।
6.4 संयुक्त व्यंजन (4)
दो व्यंजनों के मेल से बने वे वर्ण जो वर्णमाला में अलग से लिखे जाते हैं:
| संयुक्त व्यंजन | बनावट | उदाहरण शब्द |
|---|---|---|
| क्ष | क् + ष | क्षमा, शिक्षा, परीक्षा, क्षेत्र |
| त्र | त् + र | त्रिशूल, पत्र, मित्र, रात्रि |
| ज्ञ | ज् + ञ | ज्ञान, विज्ञान, यज्ञ, आज्ञा |
| श्र | श् + र | श्रम, श्रमिक, विश्राम, श्रावण |
'ज्ञ' हिंदी बोलचाल में प्रायः 'ग्य' जैसा बोला जाता है, पर इसकी बनावट ज् + ञ ही है — विकल्पों में 'ग् + य' आए तो वह गलत है।
6.5 उत्क्षिप्त (द्विगुण / ताड़नजात) व्यंजन — ड़, ढ़
इनके उच्चारण में जीभ ऊपर उठकर झटके से नीचे गिरती है (उत्क्षेप = ऊपर फेंकना)। ये ड और ढ के नीचे बिंदु लगाकर लिखे जाते हैं और संस्कृत में नहीं, हिंदी में विकसित हुए।
| स्थिति | कौन-सा रूप | उदाहरण |
|---|---|---|
| शब्द के आरंभ में | ड, ढ (बिना बिंदु) | डर, डाक, ढोल, ढक्कन |
| संयुक्त / द्वित्व रूप में या नासिक्य के बाद | ड, ढ (बिना बिंदु) | गड्ढा, लड्डू, ठंडा, डंडा |
| स्वर के बाद, शब्द के बीच या अंत में | ड़, ढ़ (बिंदु सहित) | सड़क, पेड़, लड़का, पढ़ना, बढ़ई, गढ़ |
नियम: ड़ और ढ़ से कोई शब्द शुरू नहीं होता।
6.6 नासिक्य व्यंजन — पंचमाक्षर
हर वर्ग का पाँचवाँ वर्ण — ङ, ञ, ण, न, म — नासिक्य है; इनके उच्चारण में हवा नाक से भी निकलती है। इन्हें 'पंचमाक्षर' या 'पंचम वर्ण' कहते हैं। अनुस्वार (ं) प्रायः इन्हीं के स्थान पर लिखा जाता है (खंड 9 देखें)।
7. उच्चारण स्थान तालिका
मुख के जिस भाग से वर्ण बोला जाता है, वही उसका उच्चारण स्थान है। यह परीक्षा का सबसे अधिक पूछा जाने वाला भाग है।
| उच्चारण स्थान | नाम | स्वर | व्यंजन व अन्य |
|---|---|---|---|
| कंठ (गला) | कंठ्य | अ, आ | क, ख, ग, घ, ङ, ह, विसर्ग (ः) |
| तालु (मुख की छत का अगला कठोर भाग) | तालव्य | इ, ई | च, छ, ज, झ, ञ, य, श |
| मूर्धा (तालु का ऊपरी पिछला भाग) | मूर्धन्य | ऋ | ट, ठ, ड, ढ, ण, र, ष (और ड़, ढ़) |
| दंत (दाँत) | दंत्य | — | त, थ, द, ध, न, ल, स |
| ओष्ठ (होंठ) | ओष्ठ्य | उ, ऊ | प, फ, ब, भ, म |
| दाँत + होंठ | दंतोष्ठ्य | — | व (और आगत फ़) |
| कंठ + तालु | कंठ-तालव्य | ए, ऐ | — |
| कंठ + ओष्ठ | कंठोष्ठ्य | ओ, औ | — |
| नासिका (+ अपना स्थान) | नासिक्य | — | ङ, ञ, ण, न, म, अनुस्वार |
7.1 संस्कृत सूत्रों से याद करें
परंपरागत व्याकरण में उच्चारण स्थान छोटे सूत्रों में दिए गए हैं। 'कु' = क वर्ग, 'चु' = च वर्ग, 'टु' = ट वर्ग, 'तु' = त वर्ग, 'पु' = प वर्ग।
| सूत्र | अर्थ | स्थान |
|---|---|---|
| अकुहविसर्जनीयानां कण्ठः | अ, क वर्ग, ह, विसर्ग | कंठ |
| इचुयशानां तालु | इ, च वर्ग, य, श | तालु |
| ऋटुरषाणां मूर्धा | ऋ, ट वर्ग, र, ष | मूर्धा |
| लृतुलसानां दन्ताः | लृ, त वर्ग, ल, स | दंत |
| उपूपध्मानीयानामोष्ठौ | उ, प वर्ग | ओष्ठ |
| ञमङणनानां नासिका च | ञ, म, ङ, ण, न | नासिका भी |
| एदैतोः कण्ठतालु | ए, ऐ | कंठ-तालु |
| ओदौतोः कण्ठोष्ठम् | ओ, औ | कंठ-ओष्ठ |
| वकारस्य दन्तोष्ठम् | व | दंत-ओष्ठ |
ध्यान दें: परंपरागत व्याकरण (और प्रतियोगी परीक्षाएँ) र को मूर्धन्य तथा ल, स, न को दंत्य मानती हैं। आधुनिक ध्वनि-विज्ञान इनमें से कुछ को वर्त्स्य (दाँतों के ठीक पीछे के उभरे भाग से बोले जाने वाले) कहता है। विकल्पों में 'वर्त्स्य' न हो तो परंपरागत उत्तर ही चुनें।
7.2 तीन 'श' — सबसे बड़ा जाल
| वर्ण | स्थान | उदाहरण शब्द |
|---|---|---|
| श | तालव्य | शक्ति, शिक्षा, आशा |
| ष | मूर्धन्य | षट्कोण, वर्षा, कृषि, विषय |
| स | दंत्य | सत्य, सागर, समाज |
8. प्रयत्न — घोष, अघोष, अल्पप्राण, महाप्राण
वर्ण बोलते समय मुख के अवयव जो कोशिश करते हैं, उसे प्रयत्न कहते हैं। इसके दो भाग हैं — बाह्य प्रयत्न (स्वरतंत्री में कंपन और हवा की मात्रा — घोष/अघोष, अल्पप्राण/महाप्राण) और आभ्यंतर प्रयत्न (मुख के भीतर रुकावट का प्रकार — स्पर्श, संघर्षी, अंतःस्थ आदि)।
8.1 स्वरतंत्री के कंपन के आधार पर
- घोष (सघोष / नाद): स्वरतंत्रियों में कंपन होता है — वर्ग का 3, 4, 5 वर्ण; य, र, ल, व, ह; ड़, ढ़; सभी स्वर।
- अघोष: स्वरतंत्रियों में कंपन नहीं होता — वर्ग का 1, 2 वर्ण; श, ष, स।
8.2 हवा की मात्रा (प्राण) के आधार पर
- अल्पप्राण: मुख से कम हवा निकलती है — वर्ग का 1, 3, 5 वर्ण; य, र, ल, व; ड़।
- महाप्राण: मुख से अधिक हवा निकलती है (एक 'ह' जैसी ध्वनि साथ होती है) — वर्ग का 2, 4 वर्ण; श, ष, स, ह; ढ़।
8.3 पूर्ण प्रयत्न तालिका — वर्ग के अनुसार
| वर्ग | 1 — अघोष, अल्पप्राण | 2 — अघोष, महाप्राण | 3 — घोष, अल्पप्राण | 4 — घोष, महाप्राण | 5 — घोष, अल्पप्राण (नासिक्य) |
|---|---|---|---|---|---|
| क वर्ग | क | ख | ग | घ | ङ |
| च वर्ग | च | छ | ज | झ | ञ |
| ट वर्ग | ट | ठ | ड | ढ | ण |
| त वर्ग | त | थ | द | ध | न |
| प वर्ग | प | फ | ब | भ | म |
| अन्य व्यंजन | घोष / अघोष | अल्पप्राण / महाप्राण |
|---|---|---|
| य, र, ल, व (अंतःस्थ) | घोष | अल्पप्राण |
| श, ष, स | अघोष | महाप्राण |
| ह | घोष | महाप्राण |
| ड़ | घोष | अल्पप्राण |
| ढ़ | घोष | महाप्राण |
जोड़ी पहचानें: हर वर्ग में 1–2, 3–4 जोड़ियाँ हैं जो केवल प्राण में अलग हैं — क/ख, ग/घ, त/थ, द/ध, प/फ, ब/भ। 'ख' = क + ह जैसी हवा, 'घ' = ग + ह जैसी हवा। संधि में 'वर्ग का पहला वर्ण तीसरे में बदलना' (जगत् + ईश = जगदीश) का अर्थ है अघोष वर्ण का घोष वर्ण में बदलना।
8.4 आभ्यंतर प्रयत्न — मुख के भीतर रुकावट का प्रकार
| भेद | रुकावट कैसी | वर्ण |
|---|---|---|
| स्पर्श | हवा पूरी तरह रुककर झटके से छूटती है | क, ट, त, प वर्ग के पहले चार वर्ण |
| स्पर्श-संघर्षी | पहले स्पर्श, फिर रगड़ | च, छ, ज, झ |
| संघर्षी | हवा रगड़ खाकर निकलती है | श, ष, स, ह (और आगत ज़, फ़) |
| नासिक्य | हवा नाक से निकलती है | ङ, ञ, ण, न, म |
| पार्श्विक | हवा जीभ के दोनों ओर से निकलती है | ल |
| लुंठित / प्रकंपित | जीभ की नोक काँपती है | र |
| उत्क्षिप्त | जीभ उलटकर झटके से नीचे आती है | ड़, ढ़ |
| अर्धस्वर | स्वर जैसी, हल्की रुकावट | य, व |
आभ्यंतर प्रयत्न का यह आधुनिक वर्गीकरण पुस्तकों में थोड़े भिन्न नामों से मिलता है (जैसे च वर्ग को कुछ पुस्तकें केवल 'स्पर्श' में रखती हैं)। प्रश्न प्रायः ल (पार्श्विक), र (लुंठित) और ड़-ढ़ (उत्क्षिप्त) पर ही आते हैं।
9. अनुस्वार, अनुनासिक, विसर्ग और हलंत
9.1 अनुस्वार (ं) और अनुनासिक / चंद्रबिंदु (ँ) का अंतर
| आधार | अनुस्वार (ं) | अनुनासिक / चंद्रबिंदु (ँ) |
|---|---|---|
| स्वरूप | नासिक्य व्यंजन जैसी ध्वनि — पंचमाक्षर का स्थान लेता है | स्वर का गुण — स्वर ही नाक से भी बोला जाता है |
| हवा | मुख्यतः नाक से | मुख और नाक दोनों से |
| उच्चारण | अधिक ज़ोर, पूरा नासिक्य | हल्की, कोमल नासिकता |
| शब्द-प्रकार | प्रायः तत्सम शब्दों में | प्रायः तद्भव / देशज शब्दों में |
| उदाहरण | गंगा, चंचल, ठंडा, संत, कंबल, अंक | आँख, चाँद, गाँव, ऊँट, हँसी, पाँच |
9.2 अनुस्वार किस पंचमाक्षर के स्थान पर?
अनुस्वार के ठीक बाद जो व्यंजन आता है, उसी के वर्ग का पाँचवाँ वर्ण अनुस्वार का उच्चारण तय करता है।
| शब्द | अनुस्वार के बाद वर्ण | पंचमाक्षर | पूरा रूप |
|---|---|---|---|
| गंगा | ग (क वर्ग) | ङ् | गङ्गा |
| अंक | क (क वर्ग) | ङ् | अङ्क |
| चंचल | च (च वर्ग) | ञ् | चञ्चल |
| पंजाब | ज (च वर्ग) | ञ् | पञ्जाब |
| ठंडा | ड (ट वर्ग) | ण् | ठण्डा |
| कंठ | ठ (ट वर्ग) | ण् | कण्ठ |
| संत | त (त वर्ग) | न् | सन्त |
| हिंदी | द (त वर्ग) | न् | हिन्दी |
| कंबल | ब (प वर्ग) | म् | कम्बल |
| चंपा | प (प वर्ग) | म् | चम्पा |
मानक हिंदी वर्तनी में पंचमाक्षर के स्थान पर अनुस्वार लिखना स्वीकृत है (हिंदी, गंगा, संत)। पर यदि पंचमाक्षर के बाद वही पंचमाक्षर या कोई दूसरा पंचमाक्षर हो तो अनुस्वार नहीं लगता — अन्न, सम्मान, उन्मुख, जन्म (अंन, संमान लिखना अशुद्ध)।
9.3 अर्थ-भेद वाले जोड़े
| अनुस्वार | अर्थ | चंद्रबिंदु | अर्थ |
|---|---|---|---|
| हंस | एक पक्षी | हँस | हँसना क्रिया |
| अंगना | स्त्री | अँगना | आँगन |
परीक्षा में सबसे अधिक हंस / हँस का जोड़ा आता है: "हंस तालाब में तैर रहा है" (पक्षी), "बच्चा हँस रहा है" (क्रिया)।
9.4 शिरोरेखा के ऊपर मात्रा हो तो
जब शिरोरेखा के ऊपर कोई मात्रा (ि, ी, े, ै, ो, ौ) लगी हो, तो चंद्रबिंदु बनाने की जगह नहीं रहती; तब उच्चारण अनुनासिक होते हुए भी केवल बिंदु लिखा जाता है — मैं, में, नहीं, कहीं, भौंरा, सिंचाई। यहाँ बिंदु दिखता अनुस्वार जैसा है, पर ध्वनि अनुनासिक है।
9.5 अनुस्वार और विसर्ग — अयोगवाह
अं और अः को अयोगवाह कहते हैं: ये स्वर नहीं हैं (स्वतंत्र नहीं बोले जाते, किसी स्वर के बाद ही आते हैं) और व्यंजन भी नहीं (इनके साथ स्वर नहीं जुड़ता)। वर्णमाला में इन्हें स्वरों के बाद रखा जाता है।
9.6 विसर्ग (ः)
विसर्ग का उच्चारण हल्के 'ह' जैसा होता है और इसका स्थान कंठ है। यह प्रायः तत्सम शब्दों में आता है — अतः, प्रातः, पुनः, स्वतः, दुःख, मनः, निःशुल्क। विसर्ग संधि में यही विसर्ग ओ, र्, श्, ष्, स् में बदलता है (मनः + बल = मनोबल, निः + चल = निश्चल)।
9.7 हलंत / हल् (्)
व्यंजन के नीचे लगी छोटी तिरछी रेखा बताती है कि उस व्यंजन में 'अ' नहीं है — वह स्वर-रहित है। हलंत वाले व्यंजन को 'हलंत व्यंजन' या 'हल्' कहते हैं। उदाहरण — जगत्, विद्वान्, महान्, सत्, पश्चात्। संयुक्त व्यंजन लिखते समय पहला व्यंजन आधा (हलंत) होता है — क्या = क् + या, प्यार = प् + या + र।
10. आगत ध्वनियाँ और र के रूप
10.1 आगत (विदेशी) ध्वनियाँ
अंग्रेज़ी, अरबी और फ़ारसी से आए शब्दों के साथ कुछ ध्वनियाँ भी हिंदी में आईं। इन्हें दिखाने के लिए अर्धचंद्र (ॅ) और नुक़्ता (नीचे बिंदु) का प्रयोग होता है।
| ध्वनि | स्रोत भाषा | उदाहरण | टिप्पणी |
|---|---|---|---|
| ऑ | अंग्रेज़ी | डॉक्टर, कॉलेज, बॉल, ऑफ़िस | आ और ओ के बीच की ध्वनि; अर्धचंद्र लगता है |
| क़ | अरबी-फ़ारसी | क़लम, क़ानून, क़िला | क से गहरी, गले के पिछले भाग से |
| ख़ | अरबी-फ़ारसी | ख़बर, ख़ुद, ख़त | रगड़ वाली ध्वनि |
| ग़ | अरबी-फ़ारसी | ग़रीब, ग़लत, बाग़ | रगड़ वाली ध्वनि |
| ज़ | अरबी-फ़ारसी व अंग्रेज़ी | ज़मीन, ज़रूर, ज़ीरो | दंत्य संघर्षी, 'ज' से भिन्न |
| फ़ | अरबी-फ़ारसी व अंग्रेज़ी | फ़ौज, फ़ैसला, फ़ोन | दंतोष्ठ्य संघर्षी, 'फ' से भिन्न |
नुक़्ते से अर्थ भी बदल सकता है — राज (शासन) और राज़ (भेद), जरा (बुढ़ापा) और ज़रा (थोड़ा)। विदेशी मूल के शब्दों की पहचान तत्सम, तद्भव, देशज, विदेशज शब्द वाले नोट में देखें।
10.2 'र' के चार रूप
| स्थिति | रूप | उदाहरण |
|---|---|---|
| स्वर-सहित पूरा र | र | राम, रथ, घर |
| स्वर-रहित र् किसी व्यंजन से पहले — रेफ (ऊपर) | र् | धर्म (ध् + अ + र् + म् + अ), कर्म, सूर्य, वर्षा |
| व्यंजन के बाद र — पदेन (नीचे तिरछी रेखा) | ्र | प्रकाश, क्रम, ग्राम, भ्रम |
| ट, ड के बाद र | ट्र, ड्र | राष्ट्र, ट्रक, ड्रम |
रेफ उच्चारण में पहले आता है पर लिखा अगले वर्ण के ऊपर जाता है — 'धर्म' में र् पहले बोला जाता है, फिर म। वर्ण-विच्छेद में यही सबसे बड़ी भूल होती है।
11. वर्ण-विच्छेद, अक्षर और बलाघात
11.1 वर्ण-विच्छेद
किसी शब्द को उसके सभी स्वरों और व्यंजनों में अलग-अलग लिखना वर्ण-विच्छेद है। नियम: हर व्यंजन को हलंत लगाकर लिखें और उसके बाद आने वाला स्वर (मात्रा न हो तो 'अ') अलग लिखें।
| शब्द | वर्ण-विच्छेद |
|---|---|
| कमल | क् + अ + म् + अ + ल् + अ |
| विद्या | व् + इ + द् + य् + आ |
| क्षमा | क् + ष् + अ + म् + आ |
| ज्ञान | ज् + ञ् + आ + न् + अ |
| श्रम | श् + र् + अ + म् + अ |
| त्रिशूल | त् + र् + इ + श् + ऊ + ल् + अ |
| कृष्ण | क् + ऋ + ष् + ण् + अ |
| धर्म | ध् + अ + र् + म् + अ |
| प्रकाश | प् + र् + अ + क् + आ + श् + अ |
| सूर्य | स् + ऊ + र् + य् + अ |
| परीक्षा | प् + अ + र् + ई + क् + ष् + आ |
| गृह | ग् + ऋ + ह् + अ |
11.2 अक्षर
भाषाविज्ञान में अक्षर वह ध्वनि-इकाई है जो एक साँस के झटके में बोली जाए (अंग्रेज़ी में syllable)। अक्षर में स्वर का होना अनिवार्य है; व्यंजन अकेले अक्षर नहीं बनाता। 'आ', 'जा', 'ना', 'क्या' — प्रत्येक एक अक्षर है। सामान्य बोलचाल में लिखे हुए वर्ण को भी 'अक्षर' कह दिया जाता है — परीक्षा में प्रश्न का संदर्भ देखें।
11.3 बलाघात (संक्षेप में)
शब्द या वाक्य बोलते समय किसी अक्षर या शब्द पर दिया गया अधिक बल बलाघात कहलाता है। हिंदी में वाक्य-बलाघात से अर्थ का ज़ोर बदल जाता है:
| वाक्य (बल वाला शब्द) | भाव |
|---|---|
| मैं कल जयपुर जाऊँगा। | कोई और नहीं, मैं जाऊँगा |
| मैं कल जयपुर जाऊँगा। | आज नहीं, कल |
| मैं कल जयपुर जाऊँगा। | कहीं और नहीं, जयपुर |
12. परीक्षा में कौन-सी गलतियाँ होती हैं? (Exam Trap)
Trap 1: 'ज्ञ' = ग् + य नहीं
बोलचाल में 'ग्यान' सुनाई देता है, पर ज्ञ की बनावट ज् + ञ है। विकल्प में 'ग् + य' या 'ज् + य' दिखे तो वह जाल है।
Trap 2: 'क्ष' = क् + ष, क् + श नहीं
क्ष में मूर्धन्य 'ष' है। इसी तरह 'श्र' = श् + र (तालव्य श) और 'त्र' = त् + र।
Trap 3: ह्रस्व स्वरों में 'ऋ' भी है
ह्रस्व स्वर चार हैं — अ, इ, उ, ऋ। 'ए' और 'ओ' छोटे दिखते हैं पर दीर्घ हैं (दो मात्रा)।
Trap 4: ष मूर्धन्य, श तालव्य, स दंत्य
तीनों 'श' अलग-अलग स्थान के हैं। 'ष' को 'षट्कोण वाला' — 'ट' वर्ग के साथ (मूर्धा) याद रखें।
Trap 5: 'व' ओष्ठ्य नहीं, दंतोष्ठ्य
प वर्ग ओष्ठ्य है, पर 'व' बोलते समय ऊपर के दाँत नीचे के होंठ को छूते हैं — दंतोष्ठ्य।
Trap 6: ए-ऐ और ओ-औ का स्थान
ए, ऐ = कंठ-तालव्य; ओ, औ = कंठोष्ठ्य। 'ए' को केवल तालव्य या 'ओ' को केवल ओष्ठ्य मानना गलत है।
Trap 7: 'ह' घोष है, अघोष नहीं
श, ष, स अघोष हैं, पर उसी ऊष्म समूह का 'ह' घोष है। चारों ऊष्म महाप्राण हैं।
Trap 8: पंचमाक्षर अल्पप्राण हैं
ङ, ञ, ण, न, म — घोष और अल्पप्राण। केवल वर्ग के दूसरे और चौथे वर्ण महाप्राण हैं।
Trap 9: ड़-ढ़ से शब्द शुरू नहीं होता
'ड़र', 'ढ़ोल' अशुद्ध; शुद्ध — डर, ढोल। 'सडक', 'पेड' अशुद्ध; शुद्ध — सड़क, पेड़।
Trap 10: हंस / हँस
हंस (पक्षी) में अनुस्वार, हँस (हँसना) में चंद्रबिंदु। "बच्चा हंस रहा है" अशुद्ध।
Trap 11: 'मैं', 'नहीं' का बिंदु अनुस्वार नहीं
ऊपर मात्रा होने से चंद्रबिंदु की जगह बिंदु लिखा गया है; ध्वनि अनुनासिक है।
Trap 12: 'अ' की मात्रा
'अ' की कोई मात्रा नहीं होती; वह हर व्यंजन में निहित है। "अ की मात्रा ा है" — गलत (ा 'आ' की मात्रा है)।
13. Most-Asked रिवीज़न तालिका (40 वर्ण-तथ्य)
| क्र. | वर्ण / बिंदु | उत्तर |
|---|---|---|
| 1 | क, ख, ग, घ, ङ | कंठ्य |
| 2 | च, छ, ज, झ, ञ | तालव्य |
| 3 | ट, ठ, ड, ढ, ण | मूर्धन्य |
| 4 | त, थ, द, ध, न | दंत्य |
| 5 | प, फ, ब, भ, म | ओष्ठ्य |
| 6 | अ, आ | कंठ्य |
| 7 | इ, ई | तालव्य |
| 8 | उ, ऊ | ओष्ठ्य |
| 9 | ऋ | मूर्धन्य |
| 10 | ए, ऐ | कंठ-तालव्य |
| 11 | ओ, औ | कंठोष्ठ्य |
| 12 | व | दंतोष्ठ्य |
| 13 | य | तालव्य |
| 14 | र | मूर्धन्य (परंपरागत) |
| 15 | ल | दंत्य (परंपरागत) |
| 16 | श | तालव्य |
| 17 | ष | मूर्धन्य |
| 18 | स | दंत्य |
| 19 | ह | कंठ्य |
| 20 | विसर्ग (ः) | कंठ्य |
| 21 | क्ष | क् + ष |
| 22 | त्र | त् + र |
| 23 | ज्ञ | ज् + ञ |
| 24 | श्र | श् + र |
| 25 | ड़, ढ़ | उत्क्षिप्त / द्विगुण |
| 26 | य, र, ल, व | अंतःस्थ |
| 27 | श, ष, स, ह | ऊष्म / संघर्षी |
| 28 | य, व | अर्धस्वर |
| 29 | ल | पार्श्विक |
| 30 | र | लुंठित / प्रकंपित |
| 31 | ख, घ, छ, झ, ठ, ढ, थ, ध, फ, भ | महाप्राण |
| 32 | क, ग, ङ, च, ज, ञ | अल्पप्राण |
| 33 | क, ख, च, छ, ट, ठ, त, थ, प, फ | अघोष |
| 34 | ग, घ, ङ, ब, भ, म | घोष |
| 35 | श, ष, स | अघोष, महाप्राण |
| 36 | ह | घोष, महाप्राण |
| 37 | अं, अः | अयोगवाह |
| 38 | अ, इ, उ, ऋ | ह्रस्व / मूल स्वर |
| 39 | इ, ई, ए, ऐ | अग्र स्वर |
| 40 | आ, उ, ऊ, ओ, औ | पश्च स्वर |
14. CET में वर्ण विचार कैसे पूछा जाता है
राजस्थान की परीक्षाओं में वर्ण विचार के प्रश्न प्रायः कुछ स्थिर ढाँचों में आते हैं। प्रश्नों की संख्या पेपर-दर-पेपर बदलती है, पर ढाँचा पहचान लेने से उत्तर जल्दी मिलता है:
- उच्चारण स्थान: "'ष' / 'व' / 'ए' का उच्चारण स्थान है —" — खंड 7 की तालिका।
- प्रयत्न: "निम्न में से महाप्राण / अघोष वर्ण कौन-सा है?" — वर्ग में स्थान गिनें (2, 4 = महाप्राण; 1, 2 = अघोष)।
- वर्ग-सदस्यता: "कौन-सा वर्ण अंतःस्थ / ऊष्म नहीं है?"
- संयुक्त व्यंजन की बनावट: क्ष, त्र, ज्ञ, श्र।
- असुमेलित युग्म: चार वर्ण–स्थान जोड़ियाँ, एक गलत (जैसे "व — ओष्ठ्य")।
- स्वर-वर्गीकरण: ह्रस्व/दीर्घ/प्लुत, अग्र/पश्च, अनुनासिक।
- वर्ण-विच्छेद: विद्या, धर्म, कृष्ण जैसे शब्द।
- अनुस्वार-अनुनासिक: हंस/हँस, गंगा में कौन-सा पंचमाक्षर।
रणनीति: कुल वर्ण-संख्या जैसे प्रश्न में विकल्पों के आधार को पढ़ें; बाकी प्रश्नों में केवल दो तालिकाएँ — उच्चारण स्थान (खंड 7) और प्रयत्न (खंड 8.3) — पक्की हों तो लगभग हर प्रश्न हल हो जाता है।
15. इसे आसानी से याद कैसे रखें?
1. 1-2 अघोष, 3-4-5 घोष: "पहले दो चुप (स्वरतंत्री शांत), बाकी तीन बोलें।"
2. सम संख्या महाप्राण: वर्ग का 2 और 4 — "जोड़े (सम) में ज़्यादा हवा।" साथ में श, ष, स, ह।
3. स्थान-क्रम: "कंठ से होंठ तक" — क (कंठ), च (तालु), ट (मूर्धा), त (दंत), प (ओष्ठ)। वर्णमाला का क्रम ही मुख में पीछे से आगे का क्रम है।
4. अंतःस्थ: "यरलव" — एक शब्द की तरह बोलें।
5. ऊष्म: "शषसह" — तालु, मूर्धा, दंत, कंठ।
6. संयुक्त: "क्ष-त्र-ज्ञ-श्र = कष, तर, जञ, शर।"
7. मिश्रित स्थान: "ए-ऐ कंठ से तालु, ओ-औ कंठ से होंठ, व दाँत से होंठ।"
8. ह्रस्व: "अइउऋ" — चार छोटे।
16. कथन अभ्यास
स्पर्श व्यंजनों की संख्या 25 है। — सही।
'व' का उच्चारण स्थान ओष्ठ है। — गलत (दंतोष्ठ्य)।
'ष' मूर्धन्य व्यंजन है। — सही।
'ज्ञ' ज् और ञ के मेल से बना है। — सही।
वर्ग का चौथा वर्ण अघोष होता है। — गलत (घोष, महाप्राण)।
'ह' अघोष व्यंजन है। — गलत (घोष, महाप्राण)।
ए और ऐ कंठ-तालव्य स्वर हैं। — सही।
'हँसना' में अनुनासिक का प्रयोग है। — सही।
ड़ से शब्द का आरंभ हो सकता है। — गलत।
अनुस्वार और विसर्ग को अयोगवाह कहते हैं। — सही।
17. एक दिन पहले — 14 रेखाएँ
- वर्ण = सबसे छोटी मूल ध्वनि; वर्णमाला = वर्णों का व्यवस्थित समूह
- कुल वर्ण-संख्या आधार पर निर्भर (44 / 45 / 46 / 52) — आधार पढ़कर उत्तर दें
- स्वर 11; ह्रस्व अ इ उ ऋ; दीर्घ आ ई ऊ ए ऐ ओ औ; प्लुत — ओ३म्
- अग्र इ ई ए ऐ; मध्य अ; पश्च आ उ ऊ ओ औ
- स्पर्श 25, अंतःस्थ 4 (य र ल व), ऊष्म 4 (श ष स ह)
- संयुक्त: क्ष = क्+ष, त्र = त्+र, ज्ञ = ज्+ञ, श्र = श्+र
- उत्क्षिप्त: ड़, ढ़ — शब्द के आरंभ में नहीं
- कंठ्य: अ आ, क वर्ग, ह, ः; तालव्य: इ ई, च वर्ग, य, श
- मूर्धन्य: ऋ, ट वर्ग, र, ष; दंत्य: त वर्ग, ल, स; ओष्ठ्य: उ ऊ, प वर्ग
- दंतोष्ठ्य: व; कंठ-तालव्य: ए ऐ; कंठोष्ठ्य: ओ औ
- अघोष: 1, 2 + श ष स; घोष: 3, 4, 5 + य र ल व ह + स्वर
- महाप्राण: 2, 4 + श ष स ह; अल्पप्राण: 1, 3, 5 + य र ल व
- अनुस्वार (ं) = पंचमाक्षर का स्थान; चंद्रबिंदु (ँ) = अनुनासिक स्वर; हंस/हँस
- विसर्ग कंठ्य, तत्सम में; हलंत = स्वर-रहित व्यंजन; ऑ, ज़, फ़ आगत ध्वनियाँ
18. अभ्यास और आगे क्या पढ़ें
नोट पढ़ने के बाद नीचे दिए 25 प्रश्नों का क्विज़ हल करें। हर गलत उत्तर पर खंड 7 और 8.3 की तालिका को एक बार बिना देखे लिखें। वर्ण विचार के बाद संधि पढ़ें — व्यंजन संधि के सारे नियम घोष-अघोष और पंचमाक्षर पर टिके हैं। मिश्रित और समयबद्ध अभ्यास के लिए हिंदी व्याकरण मेगा टेस्ट सीरीज़ 2026 हल करें।
19. निष्कर्ष: परीक्षा के लिए क्या याद रखें?
वर्ण विचार रटने से ज़्यादा वर्णमाला की बनावट समझने का अध्याय है। व्यंजनों का क्रम मुख में पीछे से आगे का क्रम है — कंठ, तालु, मूर्धा, दंत, ओष्ठ — और हर वर्ग के भीतर क्रम प्रयत्न का है: पहला अघोष-अल्पप्राण, दूसरा अघोष-महाप्राण, तीसरा घोष-अल्पप्राण, चौथा घोष-महाप्राण, पाँचवाँ नासिक्य। इतना समझ लेने पर 25 स्पर्श व्यंजनों के 50 तथ्य अपने-आप याद हो जाते हैं। बाकी ध्यान अपवादों पर दें — व दंतोष्ठ्य, ए-ऐ कंठ-तालव्य, ओ-औ कंठोष्ठ्य, ह घोष, ष मूर्धन्य। कुल वर्णों की संख्या पर पुस्तकों में मतभेद है; वहाँ आधार देखकर उत्तर दें।
कंठ-तालु-मूर्धा-दंत-ओष्ठ | 1, 2 अघोष — 3, 4, 5 घोष | 2, 4 महाप्राण | व दंतोष्ठ्य, ए-ऐ कंठ-तालव्य, ओ-औ कंठोष्ठ्य | क्ष = क्+ष, ज्ञ = ज्+ञ | हंस बनाम हँस

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महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)
भाषा की वह सबसे छोटी मूल ध्वनि जिसके और खंड न किए जा सकें, वर्ण कहलाती है। जैसे 'क' में क् और अ — दो वर्ण हैं।
यह गिनती के आधार पर निर्भर है। मूल स्वर और व्यंजन गिनें तो 44 (11 + 33), अं-अः जोड़ें तो 46, उच्चारण के आधार पर 45 (10 स्वर + 35 व्यंजन) और लेखन के आधार पर 52 (13 + 35 + 4 संयुक्त) वर्ण बताए जाते हैं। पुस्तकों में इस पर एक राय नहीं है।
उच्चारण-काल के आधार पर — ह्रस्व स्वर (अ, इ, उ, ऋ) एक मात्रा का समय लेते हैं, दीर्घ स्वर (आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ) दो मात्राओं का और प्लुत स्वर तीन मात्राओं का; प्लुत को ३ लगाकर लिखते हैं, जैसे ओ३म्।
क से म तक के 25 वर्ण स्पर्श व्यंजन हैं (पाँच वर्ग)। य, र, ल, व अंतःस्थ हैं और श, ष, स, ह ऊष्म (संघर्षी) व्यंजन हैं।
वर्णमाला में चार संयुक्त व्यंजन लिखे जाते हैं — क्ष (क् + ष), त्र (त् + र), ज्ञ (ज् + ञ) और श्र (श् + र)।
ड़ और ढ़ उत्क्षिप्त (द्विगुण) व्यंजन हैं। इनके उच्चारण में जीभ ऊपर उठकर झटके से नीचे गिरती है। इनसे कोई शब्द शुरू नहीं होता — सड़क, पढ़ना।
'व' दंतोष्ठ्य है — इसे बोलते समय ऊपर के दाँत नीचे के होंठ को छूते हैं। प वर्ग ओष्ठ्य है, पर 'व' नहीं।
अल्पप्राण वर्णों में मुख से कम हवा निकलती है (वर्ग के 1, 3, 5 वर्ण और य, र, ल, व); महाप्राण में अधिक हवा (वर्ग के 2, 4 वर्ण और श, ष, स, ह)।
जिनके उच्चारण में स्वरतंत्री में कंपन हो वे घोष हैं — वर्ग के 3, 4, 5 वर्ण, य, र, ल, व, ह और सभी स्वर। जिनमें कंपन न हो वे अघोष हैं — वर्ग के 1, 2 वर्ण और श, ष, स।
अनुस्वार (ं) पंचमाक्षर का स्थान लेता है और प्रायः तत्सम शब्दों में आता है — गंगा, संत। अनुनासिक (ँ) स्वर का नासिक्य उच्चारण है, जिसमें हवा मुख और नाक दोनों से निकलती है — आँख, चाँद। हंस (पक्षी) और हँस (हँसना) इसका प्रसिद्ध उदाहरण है।
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