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चरणदासी सम्प्रदाय: संस्थापक, सिद्धांत एवं राजस्थान में प्रभाव

Sudhir SirSudhir Sir (इतिहास विशेषज्ञ)
2 अक्टूबर 2026
अंतिम समीक्षा: 2 अक्टूबर 2026
8 मिनट पठन

कैसे बना: यह नोट सुयोग अकादमी के लेखक ने परीक्षा सिलेबस के अनुसार लिखा/संपादित किया है। अंतिम समीक्षा तिथि ऊपर है। त्रुटि दिखे तो संपर्क करें। टीम परिचय

स्रोत आधार: RPSC / RSMSSB कला-संस्कृति इकाई (लोक कला, मेले, किले)। सिलेबस विषय; कॉपीराइट सामग्री का पेस्ट नहीं।

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चरणदासी सम्प्रदाय: संस्थापक, सिद्धांत एवं राजस्थान में प्रभाव

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⚡ Quick Answer: चरणदासी सम्प्रदाय के संस्थापक संत चरणदास जी (1703–1782) थे, जिनका जन्म डेहरा (अलवर) में हुआ (बचपन का नाम रणजीत)। उनके गुरु शुकदेव मुनि माने जाते हैं। यह सम्प्रदाय निर्गुण-सगुण भक्ति का समन्वय है — इसमें राधा-कृष्ण की सखी-भाव भक्ति के साथ अष्टांग योग और निर्गुण ब्रह्म की साधना मिलती है। अनुयायियों के लिए 42 नियम हैं और वे पीले वस्त्र पहनते हैं। सम्प्रदाय की मुख्य पीठ दिल्ली में है। चरणदास जी ने नादिरशाह के आक्रमण (1739) की भविष्यवाणी की थी। उनकी प्रसिद्ध शिष्याएँ — सहजोबाई (‘सहज प्रकाश’) और दयाबाई (‘दयाबोध’, ‘विनय मालिका’)।

1. चरणदासी सम्प्रदाय — परिचय

18वीं शताब्दी में जब मुग़ल सत्ता कमज़ोर हो रही थी और दिल्ली-मेवात क्षेत्र राजनीतिक उथल-पुथल से गुज़र रहा था, तब संत चरणदास ने एक ऐसा पंथ दिया जो कर्मकांड और जाति-भेद से मुक्त, पर प्रेम-भक्ति और योग दोनों से युक्त था। राजस्थान के संत-सम्प्रदायों में यह इसलिए विशिष्ट है क्योंकि इसके संस्थापक का जन्म मेवात (अलवर) में हुआ, पर कर्मक्षेत्र और मुख्य पीठ दिल्ली रही। इसकी दो शिष्याओं — सहजोबाई और दयाबाई — ने हिंदी संत-साहित्य में स्त्री-स्वर को महत्वपूर्ण स्थान दिलाया।

तथ्यविवरण
संस्थापकसंत चरणदास जी
जीवन-काल1703–1782 ई.
जन्मस्थानडेहरा (अलवर), मेवात क्षेत्र
बचपन का नामरणजीत
माता-पिता (परंपरागत)पिता मुरलीधर, माता कुंजो
गुरुशुकदेव मुनि (लोक-परंपरा में भागवत के वक्ता शुकदेव से जोड़ा जाता है)
स्वरूपनिर्गुण-सगुण समन्वय; राधा-कृष्ण की सखी-भाव भक्ति + योग
नियम42
वस्त्रपीले
मुख्य पीठदिल्ली
प्रमुख शिष्याएँसहजोबाई, दयाबाई
विशेष प्रसंगनादिरशाह के आक्रमण (1739) की भविष्यवाणी

राजस्थान के सभी संत-सम्प्रदाय एक स्थान पर: राजस्थान के संत एवं सम्प्रदाय — Master Guide।

2. संत चरणदास का जीवन

  1. जन्म (1703): अलवर के डेहरा गाँव में; बचपन का नाम रणजीत।
  2. दिल्ली आगमन: पिता की मृत्यु के बाद लगभग 7 वर्ष की आयु में ननिहाल दिल्ली लाए गए।
  3. गुरु-दीक्षा: परंपरा के अनुसार किशोरावस्था में शुकदेव मुनि से दीक्षा; नाम ‘चरणदास’ पड़ा।
  4. साधना: ब्रज व वृंदावन में लंबी तपस्या; योग और कृष्ण-भक्ति का समन्वय।
  5. पंथ-स्थापना: दिल्ली को केंद्र बनाकर अनुयायियों के लिए 42 नियमों वाला पंथ संगठित किया।
  6. नादिरशाह की भविष्यवाणी: मुग़ल बादशाह मुहम्मद शाह को लगभग छह महीने पहले लिखित रूप में नादिरशाह के आक्रमण (1739) की चेतावनी दी — यह प्रसंग उनकी ख्याति का बड़ा कारण बना।
  7. देहांत (1782): दिल्ली में; समाधि-स्थल चरणदासी पीठ के रूप में पूजित।

3. चरणदासी सम्प्रदाय के सिद्धांत

सिद्धांतअर्थ
निर्गुण-सगुण समन्वयब्रह्म निराकार भी है और राधा-कृष्ण रूप में साकार भी — दोनों की उपासना
सखी-भाव भक्तिभक्त स्वयं को राधा-कृष्ण की सखी मानकर प्रेम-भक्ति करता है
अष्टांग योगयम-नियम-आसन-प्राणायाम आदि से मन की शुद्धि; ‘स्वरोदय’ (श्वास-विज्ञान) पर बल
गुरु-महिमागुरु के चरणों में समर्पण — ‘चरणदास’ नाम स्वयं इसका प्रतीक
आडंबर-विरोधअनावश्यक कर्मकांड, मूर्ति-आडंबर व जाति-भेद का विरोध
सदाचार42 नियम — सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, नशा-त्याग, संयम

42 नियमों का सार: सत्य बोलना, हिंसा-त्याग, मांस-मदिरा का निषेध, परनिंदा न करना, गुरु-सेवा, नित्य नाम-स्मरण, संयमित भोजन, दान, समभाव — इन्हीं पर पूरी आचार-संहिता आधारित है।

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4. चरणदास जी की प्रमुख रचनाएँ

रचनाविषय
ब्रह्मज्ञान सागरनिर्गुण ब्रह्म-ज्ञान
भक्ति सागरभक्ति-सिद्धांत व सगुण-निर्गुण समन्वय
ब्रह्म चरित्रआध्यात्मिक चरित्र-वर्णन
ज्ञान स्वरोदयश्वास-विज्ञान (स्वरोदय) व योग

भाषा — ब्रज, खड़ी बोली और राजस्थानी (मेवाती) का मिश्रण; शैली सरल व गेय।

5. सहजोबाई एवं दयाबाई — संत-साहित्य की स्त्री-स्वर

आधारसहजोबाईदयाबाई
संबंधचरणदास जी की शिष्याचरणदास जी की शिष्या
क्षेत्रमेवात (डेहरा, अलवर से संबद्ध)मेवात (डेहरा, अलवर से संबद्ध)
प्रमुख रचनासहज प्रकाशदयाबोध, विनय मालिका
विषयगुरु-महिमा, वैराग्य, नाम-भक्तिविनय, प्रेम-भक्ति, गुरु-भक्ति
विशेषगुरु को भगवान से भी ऊपर रखने वाले दोहों के लिए प्रसिद्धविनय-भाव के पदों के लिए प्रसिद्ध

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6. राजस्थान में प्रभाव

  • मेवात (अलवर-भरतपुर) क्षेत्र: संस्थापक की जन्मभूमि होने से यहाँ चरणदासी अनुयायी व स्थान।
  • जयपुर व पूर्वी राजस्थान: वैश्य-व्यापारी वर्ग और ब्राह्मणों में अनुयायी; दिल्ली से संपर्क के कारण शहरों में प्रसार।
  • साहित्य: सहजोबाई-दयाबाई के दोहे राजस्थान में भी भजन-मंडलियों में गाए जाते हैं।
  • समन्वय की परंपरा: निरंजनी सम्प्रदाय (डीडवाना) की तरह यह भी निर्गुण-सगुण के बीच सेतु बना।
  • स्त्री-भागीदारी: स्त्रियों को साधना व रचना का अधिकार — उस काल में प्रगतिशील दृष्टि।

7. चरणदासी बनाम अन्य समन्वयवादी/निर्गुण पंथ

आधारचरणदासीनिरंजनीदादू पंथलालदासी
संस्थापकचरणदास जीहरिदास जीदादूदयाललालदास जी
क्षेत्रमेवात (अलवर) — पीठ दिल्लीडीडवानानरैना (जयपुर)अलवर (मेवात)
स्वरूपनिर्गुण-सगुण समन्वय (कृष्ण)निर्गुण-सगुण समन्वयनिर्गुणनिर्गुण
नियम/पहचान42 नियम, पीले वस्त्र—दादूद्वारा, सफेद वस्त्रश्रम की कमाई; मेव अनुयायी
प्रमुख शिष्यसहजोबाई, दयाबाई—सुंदरदास, रज्जब—

दादू पंथ पर विस्तृत लेख: दादू पंथ — दादूदयाल | वैष्णव सम्प्रदायों की तुलना: वल्लभ सम्प्रदाय एवं पुष्टिमार्ग

8. चरणदास जी — समयरेखा (Timeline)

वर्ष (लगभग)घटना
1703डेहरा (अलवर) में जन्म; नाम रणजीत
~1710पिता की मृत्यु; दिल्ली (ननिहाल) आगमन
किशोरावस्थाशुकदेव मुनि से दीक्षा; ‘चरणदास’ नाम
युवावस्थाब्रज-वृंदावन में साधना; योग व कृष्ण-भक्ति का समन्वय
1739 से पूर्वमुहम्मद शाह को नादिरशाह के आक्रमण की लिखित चेतावनी
1739नादिरशाह का दिल्ली पर आक्रमण — भविष्यवाणी सत्य सिद्ध
18वीं सदी मध्यदिल्ली केंद्रित सम्प्रदाय का संगठन; 42 नियम
1782दिल्ली में देहांत

9. चरणदास जी की शिक्षाओं की आज प्रासंगिकता

  • योग व श्वास-विज्ञान: ‘ज्ञान स्वरोदय’ में बताए प्राणायाम-स्वरोदय के सिद्धांत आज के योग-आंदोलन से मेल खाते हैं।
  • धार्मिक सहिष्णुता: निर्गुण-सगुण दोनों को स्वीकार करना — मत-भेदों के बीच सेतु बनाने का संदेश।
  • स्त्री-सशक्तिकरण: सहजोबाई-दयाबाई को साधना व लेखन का पूरा अधिकार — 18वीं सदी में प्रगतिशील दृष्टि।
  • नशा-मुक्ति व सदाचार: 42 नियमों की आचार-संहिता आज के सामाजिक अभियानों से मेल खाती है।
  • आडंबर-विरोध: सरल भक्ति — महँगे अनुष्ठानों के स्थान पर आंतरिक शुद्धता।

📝 One-Liner Revision (15 प्रश्न)

  1. चरणदासी सम्प्रदाय के संस्थापक — चरणदास जी
  2. चरणदास जी का जन्म — 1703, डेहरा (अलवर)
  3. बचपन का नाम — रणजीत
  4. गुरु — शुकदेव मुनि
  5. देहांत — 1782, दिल्ली
  6. मुख्य पीठ — दिल्ली
  7. नियम — 42
  8. वस्त्र — पीले
  9. स्वरूप — निर्गुण-सगुण समन्वय
  10. भक्ति-भाव — सखी-भाव (राधा-कृष्ण)
  11. किस आक्रमण की भविष्यवाणी — नादिरशाह (1739)
  12. भविष्यवाणी किस बादशाह को — मुहम्मद शाह
  13. ‘सहज प्रकाश’ — सहजोबाई
  14. ‘दयाबोध’, ‘विनय मालिका’ — दयाबाई
  15. ‘ज्ञान स्वरोदय’ — चरणदास जी

✅ मुख्य बिंदु (Key Points)

  • चरणदास (1703–1782): डेहरा (अलवर) में जन्म, दिल्ली में पीठ।
  • निर्गुण-सगुण समन्वय; सखी-भाव + योग।
  • 42 नियम, पीले वस्त्र।
  • शिष्याएँ: सहजोबाई (सहज प्रकाश), दयाबाई (दयाबोध, विनय मालिका)।

🎯 Exam Trap — इन गलतियों से बचें

  • चरणदासी की मुख्य पीठ दिल्ली — ‘अलवर’ विकल्प जन्मस्थान के लिए सही, पीठ के लिए नहीं।
  • सहजोबाई–सहज प्रकाश, दयाबाई–दयाबोध — नाम के पहले अक्षर से जोड़ें, उल्टा न करें।
  • चरणदास (चरणदासी) और रामचरण (रामस्नेही) — नाम-साम्य से भ्रम आम है।
  • 42 नियम चरणदासी; 36 जसनाथी; 29 बिश्नोई।

🧠 मेमोरी ट्रिक

“डेहरा का रणजीत, दिल्ली का चरणदास — पीले वस्त्र, 42 नियम”।

“सहजो–सहज, दया–दया” → सहजोबाई–सहज प्रकाश; दयाबाई–दयाबोध।

“राम-चरण गुलाबी, चरण-दास पीले” → रामस्नेही गुलाबी वस्त्र, चरणदासी पीले।

👨‍🏫 शिक्षक की परीक्षा टिप्पणी

चरणदासी सम्प्रदाय पर प्रश्न अपेक्षाकृत कम पर सटीक आते हैं — ‘42 नियम’, ‘पीले वस्त्र’, ‘डेहरा’, ‘सहजोबाई-दयाबाई’ और ‘नादिरशाह की भविष्यवाणी’। हिंदी साहित्य (1st Grade/2nd Grade हिंदी) में सहजोबाई व दयाबाई की रचनाएँ अलग से पूछी जाती हैं, इसलिए तालिका 5 अवश्य याद करें।

✍️ अभ्यास करें — क्विज़ व टेस्ट सीरीज़

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📖 प्रामाणिक संदर्भ एवं स्रोत

  • माध्यमिक शिक्षा बोर्ड राजस्थान (RBSE) — ‘राजस्थान का इतिहास एवं संस्कृति’ (संत एवं सम्प्रदाय)।
  • Sant Charandas — सार्वजनिक संदर्भ (en.wikipedia.org), नादिरशाह भविष्यवाणी व सम्प्रदाय-स्थापना।
  • Sufinama (Rekhta) — चरणदास जी का परिचय एवं पद।
  • आचार्य परशुराम चतुर्वेदी — ‘उत्तरी भारत की संत परंपरा’।

Author Byline

लेखक: सुयोग अकादमी कला एवं संस्कृति संपादकीय टीम

तथ्य जाँच एवं संपादन: सुधीर ढाका (BSc-BEd), सुयोग अकादमी

विषय: चरणदासी सम्प्रदाय: संस्थापक, सिद्धांत एवं राजस्थान में प्रभाव

परीक्षा उपयोगिता: RAS/RTS, RPSC स्कूल व्याख्याता/वरिष्ठ अध्यापक, Rajasthan CET, पटवारी, VDO, REET Mains, राजस्थान पुलिस, LDC एवं अन्य RSMSSB परीक्षाएँ

संपादकीय नोट: चरणदास जी के माता-पिता के नाम व गुरु शुकदेव से संबंधित विवरण परंपरागत स्रोतों पर आधारित हैं। सहजोबाई-दयाबाई के जीवन-वर्षों पर विद्वानों में मतभेद है, इसलिए यहाँ नहीं दिए गए।

अंतिम समीक्षा: 2 अक्टूबर 2026

अंतिम संशोधन (Last Updated): 2 अक्टूबर 2026
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Sudhir Sirइतिहास विशेषज्ञलेखक परिचय
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🎯 विगत वर्षों के प्रश्न (Interactive PYQs)

Q1. चरणदासी सम्प्रदाय के संस्थापक चरणदास जी का जन्म कहाँ हुआ था?

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Q2. चरणदासी सम्प्रदाय के अनुयायी किस रंग के वस्त्र पहनते हैं?

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Q3. ‘सहज प्रकाश’ किसकी रचना है?

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Q4. चरणदासी सम्प्रदाय की प्रकृति कैसी है?

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Q5. किस संत ने नादिरशाह के आक्रमण की भविष्यवाणी की थी?

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महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

चरणदासी सम्प्रदाय के संस्थापक संत चरणदास जी (1703–1782) थे, जिनका जन्म डेहरा (अलवर) में हुआ। उनका बचपन का नाम रणजीत था।

चरणदासी सम्प्रदाय में अनुयायियों के लिए 42 नियम हैं और अनुयायी पीले वस्त्र धारण करते हैं।

चरणदासी सम्प्रदाय की मुख्य पीठ दिल्ली में है, जबकि संस्थापक चरणदास जी का जन्म अलवर के डेहरा गाँव में हुआ।

सहजोबाई की प्रमुख रचना ‘सहज प्रकाश’ है, जबकि दयाबाई ने ‘दयाबोध’ और ‘विनय मालिका’ की रचना की। दोनों चरणदास जी की शिष्याएँ थीं।

चरणदास जी ने मुग़ल बादशाह मुहम्मद शाह को लगभग छह महीने पहले नादिरशाह के आक्रमण (1739) की लिखित चेतावनी दी थी।

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