बैराठ सभ्यता (विराटनगर) राजस्थान का प्राचीन पुरातात्त्विक स्थल

बैराठ सभ्यता (विराटनगर) का इतिहास: उत्खनन, मौर्यकालीन बौद्ध संस्कृति और महत्वपूर्ण पुरातात्त्विक साक्ष्य

परिचय: बैराठ सभ्यता का ऐतिहासिक व परीक्षा उपयोगी महत्व

राजस्थान की प्राचीन सभ्यताओं और पुरातात्त्विक स्थलों में बैराठ सभ्यता (Bairat Civilization) का स्थान अत्यंत अनूठा और बहुआयामी है। यह भारत का एक ऐसा ऐतिहासिक स्थल है जहाँ एक ही स्थान पर प्रागैतिहासिक काल (पाषाण काल), महाभारत काल (पौराणिक युग), और मौर्य काल (बौद्ध संस्कृति) के अमिट साक्ष्य एक साथ मिलते हैं। भौगोलिक दृष्टि से यह स्थल प्राचीन बाणगंगा नदी (बाणगंगा नदी घाटी) के मुहाने पर स्थित है, जो वर्तमान में कोटपुली-बहरोड़ (पूर्व में जयपुर) जिले के अंतर्गत आता है। RPSC (RAS, स्कूल व्याख्याता, II Grade) और RSMSSB (CET, पटवारी, एलडीसी) जैसी सभी प्रमुख प्रतियोगी परीक्षाओं के राजस्थान इतिहास खंड में बैराठ सभ्यता से हमेशा गहरे, वैचारिक और तथ्यात्मक प्रश्न पूछे जाते हैं। इस विस्तृत मास्टर-नोट्स में हम बैराठ के उत्खनन इतिहास, यहाँ से प्राप्त बौद्ध व मौर्य साक्ष्यों, और विभिन्न पहाड़ियों (डूंगरियों) से मिले अवशेषों का प्रामाणिक व प्रासंगिक विश्लेषण करेंगे।

1. पौराणिक व ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: मत्स्य जनपद और महाभारत काल

बैराठ का प्राचीन नाम ‘विराटनगर’ (Viratnagar) था। छठी शताब्दी ईसा पूर्व में भारत के 16 महाजनपदों में से एक सुप्रसिद्ध महाजनपद था — मत्स्य जनपद। विराटनगर इसी मत्स्य जनपद की गौरवशाली राजधानी थी।

महाभारत कालीन संबंध (अज्ञातवास की भूमि)

  • पांडवों का अज्ञातवास: महाभारत के आख्यानों के अनुसार, पांडवों को जब 12 वर्ष के वनवास के बाद 1 वर्ष का कठिन अज्ञातवास (Agyatvas) मिला था, तो उन्होंने अपना वह समय भेस बदलकर विराटनगर के राजा ‘विराट’ के दरबार में ही व्यतीत किया था।
  • भीम की डूंगरी का रहस्य: यहाँ स्थित ‘भीम की डूंगरी’ पहाड़ी के बारे में मान्यता है कि अज्ञातवास के दौरान द्रौपदी की प्यास बुझाने के लिए महाबली भीम ने अपनी लात (घुटने) के प्रहार से धरती से पानी निकाला था, जिससे यहाँ एक प्राकृतिक जल कुंड बना, जिसे आज भी ‘भीमलता तालाब’ या ‘भीम की कीचक गदा स्थली’ कहा जाता है। राजा विराट की पुत्री उत्तरा का विवाह अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु से यहीं संपन्न हुआ था।

2. खोज, उत्खनन का इतिहास और काल निर्धारण

बैराठ सभ्यता के पुरातात्त्विक महत्व को आधुनिक दुनिया के सामने लाने का श्रेय तीन प्रमुख विद्वानों को जाता है:

  1. प्रथम सर्वेक्षण और खोज (1936–37 ई.): बैराठ सभ्यता का सर्वप्रथम वैज्ञानिक उत्खनन और प्रामाणिक खोज रायबहादुर दयाराम साहनी (Dayaram Sahni) द्वारा की गई थी। उन्होंने यहाँ की प्रमुख पहाड़ियों का सर्वेक्षण कर मौर्यकालीन अवशेषों को चिन्हित किया था।
  2. व्यापक द्वितीय उत्खनन (1962–63 ई.): दयाराम साहनी के बाद इस स्थल का विस्तृत और गहरा उत्खनन भारतीय पुरातत्व विभाग के तत्वावधान में पुरातत्वविद नीलरतन बनर्जी (N.R. Banerjee) और कैलाशनाथ दीक्षित (K.N. Dixit) द्वारा संपन्न कराया गया।
  3. काल निर्धारण (Dating): रेडियो कार्बन डेटिंग ($C^{14}$) और पुरातात्त्विक साक्ष्यों के तुलनात्मक विश्लेषण के आधार पर बैराठ सभ्यता का मुख्य सक्रिय कालखंड 600 ईसा पूर्व से 1 ईस्वी (मौर्य काल के समानांतर) माना जाता है, हालांकि इसके पाषाणकालीन अवशेष इससे हजारों वर्ष प्राचीन हैं।

3. बैराठ की प्रमुख डूंगरियाँ (पहाड़ियाँ) और पुरातात्त्विक केंद्र

बैराठ में कोई एक नगर टीला नहीं है, बल्कि यह सभ्यता मुख्य रूप से तीन ग्रेनाइट चट्टानी पहाड़ियों के इर्द-गिर्द फैली हुई है। आरपीएससी की परीक्षाओं में इन पहाड़ियों के नाम अक्सर पूछे जाते हैं:

(A) बीजक की पहाड़ी (Bijak-ki-Pahadi)

यह बैराठ का सबसे महत्वपूर्ण पुरातात्त्विक केंद्र है। यहाँ से मौर्य सम्राट अशोक के बौद्ध धर्म से संबंधित सबसे महत्वपूर्ण साक्ष्य, स्तूप, और मठ प्राप्त हुए हैं।

(B) भीम की डूंगरी (Bhim-ki-Dungri)

यह महाभारत कालीन प्रसंगों और अशोक के छोटे शिलालेखों के लिए प्रसिद्ध है। इसे पांडवों की मुख्य गतिविधि स्थली माना जाता है।

(C) महादेव जी की डूंगरी (Mahadev-ki-Dungri)

इस पहाड़ी से प्राचीन शंख लिपि के अक्षर, पाषाणकालीन कुल्हाड़ियाँ और प्रारंभिक मानव बस्तियों के अवशेष प्राप्त हुए हैं। इसके अतिरिक्त भोमजी की डूंगरी भी यहीं स्थित है।

4. बैराठ से प्राप्त अद्वितीय पुरातात्त्विक साक्ष्य (Deep-Dive Discoveries)

(A) सम्राट अशोक का ‘भाब्रू शिलालेख’ (Bhabru Rock Edict – 1837 ई.)

बैराठ सभ्यता की सबसे युगांतकारी खोज सम्राट अशोक का महान भाब्रू शिलालेख है।

  • खोजकर्ता: इस शिलालेख की खोज 1837 ईस्वी में ब्रिटिश कैप्टन बर्ट (Captain Burt) द्वारा बीजक की पहाड़ी से की गई थी।
  • भाषाई व लिपिगत स्वरूप: यह शिलालेख ब्राह्मी लिपि (Brahmi Script) और मागधी प्राकृत भाषा में उत्कीर्ण है।
  • ऐतिहासिक महत्व: यह संपूर्ण विश्व का एकमात्र ऐसा साक्ष्य है जो सम्राट अशोक के बौद्ध धर्म में धर्मपरिवर्तन को अकाट्य रूप से सिद्ध करता है। इस लेख की शुरुआत में अशोक स्पष्ट रूप से बौद्ध धर्म के त्रिरत्नों — बुद्ध, धम्म और संघ (Buddha, Dhamma, Sangha) — के प्रति अपनी अगाध श्रद्धा प्रकट करते हैं।
  • वर्तमान स्थिति: 1840 ईस्वी में इस ऐतिहासिक चट्टानी टुकड़े को सुरक्षा के दृष्टिकोण से काटकर पश्चिम बंगाल ले जाया गया, जो वर्तमान में रॉयल एशियाटिक सोसाइटी म्यूजियम, कोलकाता (कोलकाता संग्रहालय) में सुरक्षित रखा हुआ है। इसके बाद 1871-72 में कार्लाइल को भीम की डूंगरी से अशोक का दूसरा लघु शिलालेख भी प्राप्त हुआ था।

(B) भारत का प्रथम गोल बौद्ध मंदिर (Circular Buddhist Temple)

  • स्थापत्य का बेजोड़ नमूना: बीजक की पहाड़ी के उत्खनन से भारत के सबसे प्राचीन गोलाकार बौद्ध चैत्य/मंदिर (Circular Buddhist Temple) और बौद्ध विहार (मठ) के अवशेष प्राप्त हुए हैं। लकड़ी और ईंटों से निर्मित इस गोल मंदिर के चारों ओर भिक्षुओं के रहने के लिए छोटे-छोटे कमरे बने हुए थे। स्थापत्य कला के इतिहास में इसे भारत में निर्मित स्तूप कला का सबसे पहला और मौलिक ढांचा माना जाता है।

(C) सूती कपड़े में लिपटी इंडो-ग्रीक और आहत मुद्राएं (Coins)

बैराठ से व्यापारिक और कूटनीतिक संबंधों को सिद्ध करने वाला एक मिट्टी का घड़ा (मटका) प्राप्त हुआ है, जिसके भीतर कुल 36 चांदी की मुद्राएं (Coins) मिली हैं:

  • 8 आहत मुद्राएं (Punch-marked Coins): ये भारत की सबसे प्राचीन चांदी की पंचमार्क मुद्राएं हैं।
  • 28 इंडो-ग्रीक (हिंद-यवन) मुद्राएं: ये मुद्राएं यूनानी राजाओं की हैं, जिनमें से अकेले 16 मुद्राएं सुप्रसिद्ध यूनानी राजा मिनेंडर (King Menander) की हैं।
  • हस्तशिल्प व बुनाई का साक्ष्य: ये सभी 36 मुद्राएं हाथ से बुने हुए सूती कपड़े (Handwoven Cotton Cloth) के एक टुकड़े में बंधी हुई थीं। यह साक्ष्य यह प्रमाणित करता है कि ईसा पूर्व पांचवीं-छठी शताब्दी में राजस्थान के बैराठ क्षेत्र में कपास की खेती, सूत कताई और कपड़ा बुनाई तकनीक (Handloom टेक्नोलॉजी) अत्यंत उन्नत अवस्था में थी।

(D) प्राचीन रॉक पेंटिंग्स (शैल चित्रकला) और शंख लिपि

  • प्राचीन रॉक पेंटिंग गैलरी: बैराठ की पहाड़ियों की प्राकृतिक गुफाओं और कंदराओं की दीवारों पर आदिमानव द्वारा बनाए गए अनगिनत शैल चित्र मिले हैं, जिनमें हिरण, भालू, तीर-कमान और मानव आकृतियाँ प्रमुख हैं। इसी कारण बैराठ को “राजस्थान की प्राचीन रॉक पेंटिंग गैलरी” (Ancient Rock Painting Gallery of Rajasthan) कहा जाता है।
  • शंख लिपि (Shankh Lipi): यहाँ की चट्टानों पर कूट भाषा में लिखे गए रहस्यमयी अक्षर मिले हैं, जिनकी आकृति शंख जैसी है। इसे ‘शंख लिपि’ या ‘शैल लिपि’ कहा जाता है, जिसे आज तक पूरी तरह पढ़ा नहीं जा सका है।

5. विदेशी यात्रियों के विवरण, हूण आक्रमण और मुग़ल काल

(A) चीनी यात्री ह्वेनसांग (Xuanzang / Hwen Sang – 634 ई.)

प्रसिद्ध चीनी बौद्ध भिक्षु ह्वेनसांग ने 634 ईस्वी में बैराठ (विराटनगर) की यात्रा की थी। उन्होंने अपने यात्रा वृत्तांत में लिखा कि विराटनगर के लोग अत्यंत साहसी हैं और यहाँ बौद्ध धर्म के 8 विशाल बौद्ध मठ (Monasteries) सक्रिय हैं। उन्होंने इस क्षेत्र में भेड़ पालन और ऊन उद्योग की संपन्नता का भी विशेष उल्लेख किया था।

(B) हूण आक्रांता मिहिरकुल द्वारा विनाश

बैराठ की इस उन्नत बौद्ध संस्कृति का अंत एक विदेशी आक्रमणकारी के कारण हुआ। छठी शताब्दी ईस्वी में क्रूर हूण आक्रांता मिहिरकुल (Mihirakula) ने बैराठ पर बर्बर आक्रमण किया। उसने यहाँ के सभी 8 बौद्ध मठों और गोल बौद्ध मंदिर को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया और बौद्ध भिक्षुओं का सामूहिक संहार किया, जिससे यह क्षेत्र उजाड़ हो गया।

(C) मुग़ल काल और अकबर की शाही टंकशाल (Mint)

मध्यकाल में बैराठ का पुनरुत्थान मुग़ल काल में हुआ।

  • अकबर की टंकशाल: मुग़ल सम्राट अकबर के काल में बैराठ तांबे के सिक्कों के निर्माण का एक बहुत बड़ा केंद्र बना। अकबर ने यहाँ एक शाही टंकशाल (Coin Mint) की स्थापना करवाई थी, जहाँ ‘जलाली’ नामक तांबे के सिक्के ढाले जाते थे। अकबर, जहांगीर और शाहजहाँ के समय यहाँ शिकार खेलने के लिए एक ‘जैन मंदिर’ और ‘अकबर का किला/शिकारगाह’ भी बनवाया गया था।

📊 बैराठ सभ्यता का विश्लेषणात्मक पुरातात्त्विक मैट्रिक्स

यह तालिका पूरे अध्याय के सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्षों को एक नज़र में याद करने के लिए है:

पुरातात्त्विक श्रेणी / साक्ष्यसंबद्ध कालखंड / वर्षखोजकर्ता / मुख्य नायकऐतिहासिक महत्व एवं परीक्षा केंद्रित निष्कर्ष
सर्वप्रथम सर्वेक्षण व उत्खनन1336–37 ई.रायबहादुर दयाराम साहनीबाणगंगा नदी घाटी में मौर्यकालीन और पाषाणकालीन स्तरों की पहचान की।
भाब्रू शिलालेख की खोज1837 ई.कैप्टन बर्ट (बीजक पहाड़ी)सम्राट अशोक को ‘बौद्ध धर्म’ का अनुयायी सिद्ध करने वाला विश्व का एकमात्र साक्ष्य (कोलकाता में सुरक्षित)।
गोल बौद्ध चैत्य / मंदिरमौर्य काल (ईसा पूर्व)नीलरतन बनर्जी (1962)भारत का सबसे प्राचीन वृत्ताकार मंदिर संरचना; ईंट व लकड़ी का उत्कृष्ट समन्वय।
36 चांदी की मुद्राएंइंडो-ग्रीक कालकैलाशनाथ दीक्षित16 मुद्राएं राजा मिनेंडर की; हाथ से बुने सूती कपड़े में लिपटी मिलीं (बुनाई उद्योग का साक्ष्य)।
विदेशी यात्रा विवरण634 ई.चीनी यात्री ह्वेनसांगविराटनगर में 8 सक्रिय बौद्ध विहारों/मठों की उपस्थिति का आंखों देखा वर्णन किया।
सभ्यता का सामूहिक विध्वंस6ठी शताब्दी ई.हूण राजा मिहिरकुलबौद्ध सांस्कृतिक केंद्रों, मठों और मूर्तियों को पूरी तरह तोड़कर नष्ट कर दिया।
शाही टंकशाल (Mint)मुग़ल कालसम्राट अकबरतांबे के सिक्कों के निर्माण का मुख्य केंद्र; मुग़ल प्रशासनिक केंद्र के रूप में पुनरुत्थान।

📝 स्व-मूल्यांकन क्विज़: परीक्षा उपयोगी महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1: बैराठ (विराटनगर) से प्राप्त 36 चांदी की मुद्राओं का ऐतिहासिक और आर्थिक विश्लेषण क्या सिद्ध करता है?

  • उत्तर: इन 36 मुद्राओं में से 8 आहत (पंचमार्क) और 28 इंडो-ग्रीक मुद्राएं हैं, जिनमें 16 मुद्राएं यूनानी सम्राट मिनेंडर की हैं। यह साक्ष्य सिद्ध करता है कि प्राचीन काल में बैराठ का व्यापारिक संबंध उत्तर-पश्चिम सीमांत और यूनानी साम्राज्यों से था। इसके अतिरिक्त, इनका सूती कपड़े में लिपटा होना यह प्रमाणित करता है कि यहाँ टेक्सटाइल (कपड़ा बुनाई) उद्योग ईसा पूर्व ही विकसित हो चुका था।

प्रश्न 2: “राजस्थान की प्राचीन रॉक पेंटिंग गैलरी” किस पुरातात्त्विक स्थल को कहा जाता है और वहाँ किस विशिष्ट लिपि के साक्ष्य मिले हैं?

  • उत्तर: यह संज्ञा बैराठ सभ्यता को दी गई है क्योंकि यहाँ की प्राकृतिक ग्रेनाइट गुफाओं (बीजक, भीम व महादेव डूंगरी) की दीवारों पर आदिमानव द्वारा निर्मित प्राचीनतम शैलचित्र प्रचुर मात्रा में मिले हैं। यहाँ की चट्टानों पर रहस्यमयी ‘शंख लिपि’ (Shell Script) के साक्ष्य भी मिले हैं।

प्रश्न 3: मौर्य सम्राट अशोक के भाब्रू शिलालेख का वर्तमान स्थान क्या है और इतिहास में इसकी प्रामाणिकता क्यों अद्वितीय है?

  • उत्तर: भाब्रू शिलालेख वर्तमान में रॉयल एशियाटिक सोसाइटी म्यूजियम, कोलकाता में सुरक्षित है। इसकी प्रामाणिकता इसलिए अद्वितीय है क्योंकि इसमें सम्राट अशोक स्पष्ट रूप से बौद्ध धर्म के त्रिरत्नों (बुद्ध, धम्म, संघ) के प्रति निष्ठा व्यक्त करते हैं, जो उनके बौद्ध होने का सबसे बड़ा लिखित राजकीय प्रमाण है।

📚 प्रामाणिक संदर्भ एवं स्रोत (References & E-E-A-T Seal)

  • राजस्थान राज्य पाठ्यपुस्तक मंडल, कक्षा 9 व 10 (राजस्थान का इतिहास, कला एवं प्राचीन सभ्यताएं)
  • डॉ. एच.डी. सांकलिया, “प्री-हिस्ट्री एंड प्रोटो-हिस्ट्री ऑफ इंडिया एंड पाकिस्तान” (प्रामाणिक पुरातात्त्विक संदर्भ)
  • भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की बैराठ (विराटनगर) उत्खनन रिपोर्ट (नीलरतन बनर्जी व के.एन. दीक्षित)।
  • RPSC RAS, राजस्थान पुलिस सब-इंस्पेक्टर और कनिष्ठ लिपिक परीक्षाओं के विगत 15 वर्षों के हल प्रश्नपत्रों का प्रामाणिक संकलन।
  • तथ्य जाँच एवं संपादन: सुयोग अकादमी संपादकीय टीम (सुधीर ढाका – BSc-BEd, योगेश जांगिड़ – सॉफ्टवेयर इंजीनियर)।

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