भारत की राजनीतिक एकता गुप्तकाल में स्थापित हुई थी। हर्षवर्धन के शासनकाल (606-647 ई.) के दौरान उत्तर भारत में एक मजबूत केंद्रीय सत्ता रही। लेकिन हर्षवर्धन की मृत्यु (647 ई.) के बाद यह राजनीतिक एकता धीरे-धीरे समाप्त होने लगी। उत्तर भारत में अनेक छोटे-छोटे राज्यों का उद्भव हुआ जो आपस में लगातार संघर्षरत रहते थे। इन संघर्षों और विभाजनों के बीच <b>नए राजवंश उभरे जिन्हें हम राजपूत राजवंश के नाम</b> से जानते हैं। राजपूतों की उत्पत्ति, उनके विभिन्न वंश, प्रमुख शासक और उनके प्रशासनिक, युद्ध संबंधी और सांस्कृतिक योगदान पर अनेक विद्वानों ने अपने मत प्रस्तुत किए हैं। इस लेख में हम विस्तारपूर्वक चौहान वंश, पृथ्वीराज चौहान और उनके सामरिक, प्रशासनिक और सांस्कृतिक योगदान पर चर्चा करेंगे। <b>इनमें चौहान वंश का विशेष महत्व है, जिसने राजस्थान और उत्तर भारत के बड़े हिस्से पर अपनी सत्ता कायम की।</b>
राजपूतों की उत्पत्ति: प्रमुख सिद्धांत
राजपूतों की उत्पत्ति को लेकर इतिहासकार और विद्वान अलग-अलग मत रखते हैं। प्रमुख सिद्धांत निम्नलिखित हैं:
अजमेर के चौहान वंश का उद्भव और इतिहास
पृथ्वीराज चौहान का शासनकाल (1177-1192 ई.)
चौहान वंश के प्रमुख शासक और उनके योगदान
पृथ्वीराज चौहान का साहित्यिक और सांस्कृतिक योगदान
निष्कर्ष
राजपूतों की उत्पत्ति को लेकर अनेक मत हैं—अग्निकुण्ड से उत्पत्ति, वैदिक क्षत्रिय वंशज, विदेशी मूल और ब्राह्मण संतान। चौहान वंश इनमें से एक प्रमुख राजवंश था जिसने राजस्थान और उत्तर भारत में अपनी शक्ति स्थापित की। पृथ्वीराज चौहान के साथ यह वंश शिखर पर पहुँचा।<br/> चौहान वंश ने भारत के मध्यकालीन इतिहास में स्वाभिमान, शौर्य और स्वतंत्रता की रक्षा का अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत किया। <b>पृथ्वीराज चौहान</b> की वीरता आज भी भारतीय संस्कृति में अमर है। राजपूत वंश की इस परंपरा ने राजस्थान और उत्तर भारत की ऐतिहासिक धारा को नई दिशा दी।

