परिचय: जालौर शाखा का सामरिक, भौगोलिक व परीक्षा उपयोगी महत्व
राजस्थान के गौरवशाली इतिहास में जालौर (प्राचीन नाम- जाबालिपुर) का रणनीतिक और सांस्कृतिक स्थान अत्यंत विशिष्ट रहा है। सुकड़ी नदी के किनारे ‘सुवर्णगिरि’ (या सोनगढ़) पहाड़ी पर स्थित जालौर का किला अपनी अभेद्यता के लिए संपूर्ण भारत में प्रसिद्ध है। इस पहाड़ी के नाम पर ही यहाँ के चौहानों को ‘सोनगरा चौहान’ (Songara Chauhans) कहा गया। इतिहास में इस किले के बारे में यह उक्ति प्रसिद्ध है कि “इस दुर्ग का द्वार आज तक कोई भी आक्रमणकारी अपनी शक्ति के बल पर नहीं खोल सका।” RPSC और RSMSSB द्वारा आयोजित की जाने वाली विभिन्न प्रशासनिक व शिक्षक भर्ती परीक्षाओं के नवीन पाठ्यक्रम में जालौर के सोनगरा चौहानों, विशेषकर कान्हड़देव चौहान और वीरमदेव के बलिदान का इतिहास एक अनिवार्य अध्याय है। इस विस्तृत मास्टर-नोट्स में हम इस राजवंश के उदय, विकास और अलाउद्दीन खिलजी के साथ हुए युगांतकारी संघर्षों का प्रामाणिक विश्लेषण करेंगे।
1. जालौर के सोनगरा चौहान वंश की स्थापना एवं प्रारंभिक शासक
जालौर में चौहान राजवंश की स्थापना नाडोल (पाली) की चौहान शाखा के बिखराव और विस्तार के परिणामस्वरूप हुई थी।
कीर्तिपाल चौहान (1181–1182 ई.): शाखा के संस्थापक
- शाखा की स्थापना: नाडोल के शासक अल्हण के पुत्र कीर्तिपाल चौहान ने 1181-1182 ईस्वी में जालौर के परमार शासकों को युद्ध में पराजित कर सुवर्णगिरि दुर्ग पर अपना अधिकार स्थापित किया। इसी कारण कीर्तिपाल को जालौर के सोनगरा चौहान वंश का ‘मूल पुरुष’, ‘आदिपुरुष’ या ‘संस्थापक’ माना जाता है।
- “कीतू एक महान राजा”: राजस्थान के सुप्रसिद्ध इतिहासकार और ख्यात लेखक मुंहणोत नैणसी ने अपनी कालजयी कृति ‘नैणसी री ख्यात’ में कीर्तिपाल की वीरता और कूटनीति की अत्यधिक प्रशंसा करते हुए उन्हें “कीतू एक महान राजा” (Kitu, A Great King) की उपाधि से विभूषित किया है। सुंधा माता शिलालेख में भी उनकी कीर्ति का गान मिलता है।
मध्यकालीन शासक और साम्राज्य विस्तार
कीर्तिपाल के बाद उनके योग्य उत्तराधिकारियों ने जालौर की सीमाओं को गुजरात और मारवाड़ तक विस्तृत किया:
- समरसिंह: इन्होंने जालौर दुर्ग प्राचीर का सुदृढ़ीकरण करवाया, शस्त्रागार बनवाया और अपनी पुत्री का विवाह गुजरात के चालुक्य राजा भीमदेव द्वितीय के साथ कर कूटनीतिक संबंध मजबूत किए।
- उदयसिंह (1205–1257 ई.): इनका काल सैन्य सुदृढ़ीकरण का काल था। इन्होंने इल्तुतमिश के भयंकर आक्रमण को न केवल विफल किया, बल्कि नाडोल, बाड़मेर और मांडव्यपुर (मंडोर) को जीतकर जालौर साम्राज्य में मिला लिया।
- चाचिगदेव एवं सामंतसिंह: इनके समय दिल्ली सल्तनत के सुल्तान नसीरुद्दीन महमूद और बलबन ने आक्रमण के प्रयास किए, परंतु सोनगरा सेना की सजगता के कारण वे किले को भेद नहीं सके। सामंतसिंह के अंतिम दिनों में दिल्ली में खिलजी वंश का उदय हुआ।
2. महाराणा कान्हड़देव चौहान (1305–1311 ई.): स्वाभिमान और पराक्रम का चरमोत्कर्ष
सामंतसिंह के बाद उनके परम प्रतापी और अप्रतिम वीर पुत्र कान्हड़देव चौहान [चौहान राजवंश का इतिहास] जालौर के शासक बने। कान्हड़देव का संपूर्ण कालखंड दिल्ली के क्रूर साम्राज्यवादी सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के खिलाफ राजपूती स्वाभिमान की रक्षा का जीवंत दस्तावेज है।
अलाउद्दीन खिलजी से विवाद के मूल कारण
जालौर और दिल्ली सल्तनत के बीच वैचारिक और सैन्य कूटनीति टूटने के मुख्य रूप से दो कारण थे:
- गुजरात अभियान का पारगमन विवाद (1299 ई.): जब अलाउद्दीन खिलजी की सेना उलुग खाँ और नुसरत खाँ के नेतृत्व में गुजरात के सोमनाथ मंदिर को लूटने जा रही थी, तो दिल्ली की सेना ने जालौर के रास्ते गुजरने की अनुमति मांगी। कान्हड़देव ने दो टूक शब्दों में कहा कि “तुम्हारी सेना हमारे गांवों को लूटती है, मंदिरों को नष्ट करती है और गायों पर अत्याचार करती है, अतः हम तुम्हें अपने राज्य से रास्ता नहीं दे सकते।” खिलजी की सेना को रास्ता बदलकर मेवाड़ के रास्ते गुजरना पड़ा था।
- सोमनाथ मूर्ति के टुकड़ों की पुनर्प्राप्ति: गुजरात को लूटकर लौटती हुई खिलजी की सेना पर कान्हड़देव के सेनापति जेता और देवड़ा ने अचानक वीर प्रहार किया। उन्होंने तुर्क सेना को पराजित कर उनके चंगुल से हजारों हिंदू बंदियों को मुक्त कराया और सुल्तान की सेना द्वारा ले जाई जा रही सोमनाथ मंदिर की मूल शिवलिंग मूर्ति के पांचों टुकड़ों को वापस छीन लिया। इन टुकड़ों को जालौर के विभिन्न पवित्र स्थानों पर स्थापित करवाकर उनका शुद्धिकरण करवाया गया। इस अपमान ने अलाउद्दीन को प्रतिशोध की अग्नि में झोंक दिया।
3. सिवाना दुर्ग का ऐतिहासिक साका (1308 ई.): ‘जालौर दुर्ग की कुंजी’
अलाउद्दीन खिलजी भली-भांति जानता था कि जालौर के अभेद्य किले को सीधे जीतना असंभव है। जालौर पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए उसके रक्षक दुर्ग ‘सिवाना दुर्ग’ (बाड़मेर) को जीतना अनिवार्य था। इतिहास में सिवाना दुर्ग को ‘जालौर दुर्ग की कुंजी’ (Key to Jalor Fort) तथा मारवाड़ के राजाओं की शरणस्थली कहा जाता है।
सातलदेव (शीतलदेव) का वीर संघर्ष
सिवाना दुर्ग की रक्षा का भार कान्हड़देव के परम प्रतापी भतीजे सातलदेव (शीतलदेव) और सोमेस्वर (सोम) के हाथों में था। 1308 ईस्वी में अलाउद्दीन खिलजी ने स्वयं एक विशाल टिड्डी दल सेना लेकर सिवाना को चारों ओर से घेर लिया। महीनों की घेराबंदी के बाद भी राजपूतों ने आत्मसमर्पण नहीं किया।
भायला का विश्वासघात और सिवाना का साका
जब सुल्तान सैन्य बल से किला नहीं जीत सका, तो उसने कूटनीतिक छल का सहारा लिया। उसने सिवाना के एक सैनिक भायला (Bhayala Dahiya) को दुर्ग का लालच देकर अपनी ओर मिला लिया। भायला ने देशद्रोह करते हुए किले के भीतर पेयजल के मुख्य स्रोत ‘भांडेलाव तालाब’ में गाय का रक्त मिलवाकर उसे अपवित्र कर दिया।
- साका (1308 ई.): पीने के पानी के अभाव में राजपूत वीरों ने केसरिया बाना पहनकर अंतिम युद्ध लड़ा। सातलदेव और सोम अद्भुत वीरता दिखाते हुए वीरगति को प्राप्त हुए और राजपूत महिलाओं ने अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए जौहर की अग्नि को गले लगाया। यह सिवाना दुर्ग का प्रथम साका कहलाता है।
- खैराबाद नामकरण: विजय के बाद अलाउद्दीन ने सिवाना दुर्ग का नाम बदलकर ‘खैराबाद’ (Khairabad) कर दिया और इसका प्रशासनिक कार्य कमालुद्दीन गुर्ग को सौंप दिया।
4. जालौर दुर्ग का महासंग्राम और ऐतिहासिक साका (1311 ई.)
सिवाना के पतन के बाद जालौर का मार्ग पूरी तरह खुल चुका था। 1311 ईस्वी में सुल्तान की शाही सेना ने कमालुद्दीन गुर्ग के नेतृत्व में सुवर्णगिरि दुर्ग को चारों तरफ से घेर लिया।
वीरमदेव और शहजादी फिरोजा की अमर प्रेम कथा
पद्मनाभ रचित ‘कान्हड़दे प्रबन्ध’ और मुंहणोत नैणसी की ख्यातों के अनुसार, इस युद्ध का एक अत्यंत रोचक और भावनात्मक कारण भी था। कान्हड़देव के पुत्र कुंवर वीरमदेव अपनी अद्वितीय शारीरिक सुंदरता, मल्लविद्या और वीरता के लिए विख्यात थे। दिल्ली दरबार में प्रवास के दौरान अलाउद्दीन की पुत्री शहजादी फिरोजा (Firoza) वीरमदेव के शौर्य को देखकर उनसे एकतरफा प्रेम कर बैठी और उनसे विवाह का हठ पकड़ लिया। सुल्तान ने वीरमदेव के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा, परंतु वीरमदेव ने अपने कुल और सनातन धर्म की मर्यादा को सर्वोपरि रखते हुए कहा—
“मामो लाजे मांतुल, कुल लाजे चहुँवाण। जै मैं परणूं तुरकणी, तो पच्छम ऊगे भाण॥”
(अर्थात यदि मैं किसी तुर्क कन्या से विवाह करूँ तो मेरे ननिहाल और चौहान कुल को कलंक लगेगा, ऐसा तभी हो सकता है जब सूर्य पश्चिम से उदय हो।) वीरमदेव रातों-रात दिल्ली छोड़कर जालौर आ गए, जिसे अलाउद्दीन ने सल्तनत का घोर अपमान माना।
बीका दहिया का विश्वासघात और दुर्ग का पतन
1311 ईस्वी की लंबी घेराबंदी के दौरान जब तुर्क सेना हताश होने लगी, तो सुल्तान ने पुनः छल नीति अपनाई। उसने कान्हड़देव के एक दहिया राजपूत सैनिक बीका दहिया (Bika Dahiya) को सोने के सिक्कों और राजा बनाने का लालच देकर देशद्रोही बना लिया। बीका दहिया ने सुवर्णगिरि दुर्ग प्राचीर के उस गुप्त हिस्से की जानकारी दे दी जो कच्ची मिट्टी से बना हुआ था और जिसे पानी डालकर आसानी से तोड़ा जा सकता था (“राई के भाव रात ही बीते” उक्ति इसी घटना से प्रसिद्ध हुई क्योंकि तुर्कों ने रातों-रात महँगे दामों पर राई खरीदकर दीवार की मोटाई की जाँच की थी)।
- वीर पत्नी का राष्ट्रधर्म: जब बीका दहिया यह गद्दारी करके अपने घर पहुँचा और अपनी पत्नी हीरादे को प्राउड से बताया कि वह जल्द ही जालौर का राजा बनने वाला है, तो क्षत्रिय पत्नी हीरादे ने देशद्रोह की बात सुनते ही आव देखा न ताव, तलवार निकालकर अपने सगे पति बीका दहिया का सिर धड़ से अलग कर दिया और तुरंत दौड़कर राजा कान्हड़देव को सचेत करने पहुँची। परंतु तब तक बहुत देर हो चुकी थी, तुर्क सेना गुप्त दीवार तोड़कर किले के भीतर प्रवेश कर चुकी थी।
जालौर का अंतिम साका (1311 ई.)
किले के भीतर भयंकर कत्लेआम मच गया। कान्हड़देव चौहान अपने बचे हुए वीर सेनापतियों के साथ एकलिंग जी और आशापुरा माता का जयकारा लगाते हुए युद्ध के मैदान में टूट पड़े और वीरतापूर्वक लड़ते हुए मातृभूमि के लिए वीरगति को प्राप्त हुए।
- वीरमदेव का आत्मोत्सर्ग: अपने पिता की वीरगति के बाद कुंवर वीरमदेव ने कुलदेवी आशापुरा माता के मंदिर के सामने अपनी कटार पेट में घोंपकर मातृभूमि के लिए प्राणों की आहुति दे दी।
- जौहर: कान्हड़देव की रानी जेतलदेवी के नेतृत्व में हजारों राजपूत वीरों की पत्नियों ने जौहर की पवित्र अग्नि में कूदकर अपने सतीत्व की रक्षा की।
- जलालाबाद नामकरण: अलाउद्दीन खिलजी ने इस ऐतिहासिक विजय के बाद जालौर का नाम बदलकर ‘जलालाबाद’ (Jalalabad) रख दिया। उसने किले के भीतर एक मस्जिद का निर्माण करवाया जिसे आज भी ‘तोपखाना मस्जिद’ या ‘अलाउद्दीन की मस्जिद’ कहा जाता है। शहजादी फिरोजा वीरमदेव के कटे हुए सिर को दिल्ली ले गई, जहाँ उसने हिंदू रीति-रिवाज से उसका अंतिम संस्कार किया और स्वयं यमुना नदी में कूदकर सती हो गई।
5. साहित्यिक व सांस्कृतिक धरोहर
जालौर का सोनगरा चौहान वंश न केवल युद्धों के लिए बल्कि अपनी साहित्यिक चेतना के लिए भी अमर है। इस वंश के इतिहास को सुरक्षित रखने में निम्नलिखित ग्रंथों की भूमिका सर्वोपरि है:
- कान्हड़दे प्रबन्ध: महाकवि पद्मनाभ (Padmanabha) द्वारा रचित यह ग्रंथ राजस्थानी और हिंदी साहित्य का एक अनमोल रत्न है। इसमें जालौर के युद्ध, वीरमदेव के हठ और अलाउद्दीन के आक्रमण का सबसे सजीव और प्रामाणिक आंखों देखा विवरण मिलता है।
- वीरमदेव सोनगरा री बात: यह लघु ऐतिहासिक ग्रंथ भी महाकवि पद्मनाभ द्वारा ही रचित है, जिसमें कुंवर वीरमदेव और शहजादी फिरोजा के प्रसंग को विस्तार से समझाया गया है।
- मुंहणोत नैणसी री ख्यात: जोधपुर के दीवान मुंहणोत नैणसी द्वारा रचित इस ख्यात में जालौर राजवंश की विस्तृत वंशावली और सामाजिक स्थिति का वर्णन मिलता है।
📊 जालौर चौहान राजवंश का विश्लेषणात्मक वैचारिक मैट्रिक्स
| ऐतिहासिक घटना / मोड़ | संबद्ध वर्ष (Year) | मुख्य नायक / देशद्रोही | परीक्षा उपयोगी परिणाम एवं विशिष्ट तथ्य |
| जालौर शाखा की स्थापना | 1181–1182 ई. | कीर्तिपाल चौहान (कीतू) | परमारों को हराकर सुवर्णगिरि पर स्वतंत्र सोनगरा शाखा की नींव रखी। |
| सोमनाथ मूर्ति पुनर्प्राप्ति | 1299 ई. | जेता और देवड़ा (सेनापति) | खिलजी की सेना को परास्त कर शिवलिंग के टुकड़ों को मुक्त कराया; युद्ध का मूल कारण। |
| सिवाना दुर्ग का साका | 1308 ई. | सातलदेव व सोम / विश्वासघाती भायला | भायला ने जल दूषित किया; दुर्ग का नाम बदलकर ‘खैराबाद’ किया गया। |
| जालौर दुर्ग का साका | 1311 ई. | कान्हड़देव व वीरमदेव / विश्वासघाती बीका | जालौर का ऐतिहासिक पतन; हीरादे ने पति बीका को मारा; नाम बदलकर ‘जलालाबाद’ किया। |
📝 स्व-मूल्यांकन टेस्ट (Exam-Targeted Practice Quiz)
प्रश्न 1: “राई के भाव रात ही बीते” यह सुप्रसिद्ध लोकोक्ति राजस्थान के किस दुर्ग के पतन और किस ऐतिहासिक घटना के संदर्भ में कही जाती है?
- उत्तर: यह लोकोक्ति जालौर दुर्ग (सुवर्णगिरि) के पतन (1311 ई.) के संदर्भ में कही जाती है। जब विश्वासघाती बीका दहिया ने बताया कि किले की एक दीवार कच्ची मिट्टी की है, तो तुर्क सेना ने रातों-रात पूरे क्षेत्र से महँगे दामों पर राई खरीदकर दीवार पर पानी छिड़का ताकि जहाँ राई तुरंत उग आए या नमी सोख ले, वहाँ से दीवार तोड़ी जा सके।
प्रश्न 2: महाकवि पद्मनाभ द्वारा रचित ‘कान्हड़दे प्रबन्ध’ का ऐतिहासिक दृष्टि से क्या महत्व है?
- उत्तर: यह ग्रंथ जालौर के सोनगरा चौहानों के इतिहास का सबसे प्रामाणिक और समकालीन साहित्यिक स्रोत है। इसमें वीर राजा कान्हड़देव और अलाउद्दीन खिलजी के बीच हुए युद्धों, राजपूती संस्कृति, जौहर और कुंवर वीरमदेव के आत्मोत्सर्ग का प्रामाणिक विवरण मिलता है।
प्रश्न 3: अलाउद्दीन खिलजी द्वारा विजित राजस्थान के प्रमुख दुर्गों और उनके बदले गए नामों का सही सुमेलित युग्म क्या है?
- उत्तर: परीक्षाओं के लिए इस कूट को याद रखना अनिवार्य है:
- चित्तौड़गढ़ दुर्ग (1303 ई.) $\rightarrow$ खिजराबाद
- सिवाना दुर्ग (1308 ई.) $\rightarrow$ खैराबाद
- जालौर दुर्ग (1311 ई.) $\rightarrow$ जलालाबाद
📚 प्रामाणिक संदर्भ एवं स्रोत (References & E-E-A-T Seal)
- महाकवि पद्मनाभ कृत ‘कान्हड़दे प्रबन्ध’ (मूल साहित्यिक अनुवाद)
- डॉ. गोपीनाथ शर्मा, “राजस्थान के इतिहास के स्रोत” (प्रामाणिक संदर्भ ग्रंथ)
- राजस्थान राज्य पाठ्यपुस्तक मंडल, कक्षा 9 व 10 (राजस्थान का इतिहास, कला एवं संस्कृति)
- RPSC RAS, स्कूल व्याख्याता, और राजस्थान पुलिस सब-इस्पेक्टर परीक्षाओं के पिछले 15 वर्षों के हल प्रश्नपत्रों का विश्लेषणात्मक संकलन।
- तथ्य जाँच एवं संपादन: सुयोग अकादमी संपादकीय टीम (सुधीर ढाका – BSc-BEd, योगेश जांगिड़ – सॉफ्टवेयर इंजीनियर)।
📚 चौहान राजवंश: संपूर्ण अध्याय क्रमानुसार पढ़ें
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